श्री मुचुकुन्द जी की कथा

 महाराज मुचुकुन्द राजा मान्धाता के पुत्र थे। ये पृथ्वी के एक छत्र सम्राट थे। बल और पराक्रम इतना कि देवराज इन्द्र भी इनकी सहायता के इच्छुक रहते थे। एक बार असुरों ने देवताओं को परास्त कर दिया। दुखी होकर देवताओं ने महाराज मुचुकुन्द से सहायता की प्रार्थना की। देवराज की प्रार्थना स्वीकार करके वे बहुत समय तक असुरों से युद्ध करते रहे। बहुत समय पश्चात देवताओं को शिव जी की कृपा से स्वामी कार्तिकेय के रूप में योग्य सेनापति मिल गये। तब देवराज इन्द्र ने महाराज से कहा –राजन् ! आपने हमारी बड़ी सेवा की। आप हजारों वर्षों से यहाँ हैं। अतः अब आपकी राजधानी का कहीं पता नहीं है। आपके परिवार वाले सब काल के गाल में चले गये। हम आप पर प्रसन्न हैं। मोक्ष को छोड़ आप कुछ भी वर माँग लें; क्योंकि मोक्ष देना हमारी शक्ति से बाहर है। महाराज को मानवीय बुद्धि ने दबा लिया। उन्होंने कहा – देवराज ! मैं यह वरदान माँगता हूँ कि मैं जी भर सो लूँ, कोई विघ्न न डाले।जो मेरी निद्रा भंग करे, वह तुरंत भस्म हो जाय। देवराज ने कहा –ऐसा ही होगा, आप पृथ्वी पर जाकर शयन कीजिए। जो आपको जगायेगा, वह तुरंत भस्म हो जायगा। महाराज मुचुकुन्द भारतवर्ष में आकर एक गुफा में सो गये। सोते सोते उन्हें कई युग बीत गये। द्वापर आ गया, भगवान ने यदुवंश में अवतार लिया। उसी समय कालयवन ने मथुरा को घेर लिया। उसे मरवाने की नियत से और महाराज मुचुकुन्द पर कृपा करने की इच्छा से भगवान श्री कृष्ण कालयवन के सामने से छिपकर भागे। भागते भागते भगवान उस गुफा में घुसकर छिप गये, जहाँ महाराज मुचुकुन्द सो रहे थे। भगवान ने अपना पीताम्बर धीरे से उन्हें ओढ़ा दिया और आप छिपकर तमाशा देखने लगे। कालयवन गुफा में आया और महाराज को ही भगवान कृष्ण समझकर दुपट्टा खींच कर जगाने लगा। महाराज जल्दी से उठे। सामने कालयवन खड़ा था, दृष्टि पड़ते ही वह जलकर भस्म हो गया । अब तो महाराज इधर उधर देखने लगे। भगवान के तेज से गुफा जगमगा रही थी। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को मंद मंद मुस्कराते हुए देखा। देखते ही वे समझ गये कि ये साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं, वे भगवान के चरणों में लोट पोट हो गये। भगवान ने उन्हें उठाकर छाती से लगाया, भाँति भाँति के वरों का प्रलोभन दिया; परंतु उन्होंने यही कहा -प्रभो ! मुझे देना है तो अपनी भक्ति दीजिए। भगवान ने कहा –अब अगले जन्म में तुम सब जीवों में समान दृष्टि बाले ब्राह्मण होओगे, तब तुम मेरी जी खोलकर उपासना करना। वरदान देकर भगवान अन्तर्धान हो गये।

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वनवास काल में महाराज युधिष्ठिर को श्री कृष्ण ने दी राम नाम की दीक्षा

अब एक भूत-समन्वित भविष्य की कथा सुनिए। जब युधिष्ठुर अपनी माता और भाइयों को साथ लिए वनवास कर रहे थे, तब उन्हें देखने के लिए श्री कृष्ण जी वन में गये। वहाँ पाण्डवों ने बड़े प्रेम से श्री कृष्ण जी की पूजा की और युधिष्ठर ने कहा — हे जगन्नाथ ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे कुछ पूछता हूँ। हे देवेश ! यह तो आपको ज्ञात ही है कि मैं राज्यभ्रष्ट हूँ। इससे आप मुझे ऐसा कोई व्रत बतलाइये जो लक्ष्मी की प्राप्तिकारक हो और पुत्र-पौत्र को बढ़ाने वाला हो। श्री कृष्ण जी बोले — हे राजन ! तुम इस बात को पूछते हो तो सुनो, मैं गुप्त से भी गुप्त व्रत को तुम्हें बतलाता हूँ। राम नाम से बढ़कर मोक्षदायक और लक्ष्मी-वर्धक कोई व्रत नहीं है।यह राम नाम तेजोरूप और अव्यक्त है। राम नाम को जपने वाला राम का ही रूप हो जाता है। इसे स्वयं राम ने ही हनुमान जी से कहा था। युधिष्ठर बोले — हे रुक्मिणीपते ! इस बात को श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी से कब कहा था? श्री कृष्ण जी बोले –रामावतार में जब रावण सीता को हर ले गया था, तब रामचंद्र जी ने हनुमान को बुलाकर कहा कि, हे महावीर ! तुम सीता को खोजने के लिए दक्षिण दिशा में भ्रमण करने जाओ और जैसा समाचार हो, शीघ्र दो। श्री हनुमान जी बोले — हे रघुनाथ! दक्षिण दिशा में तो विशाल सागर है और बहुत से राक्षस रहते हैं, वहाँ मेरा क्या बल लगेगा? श्री रामचंद्र जी बोले — हे हनुमान ! रावण आदि राक्षसों का निवारण करने वाला वह अत्यंत सरल मन्त्र मैं तुम्हें बतलाता हूँ, जिसकी सहायता से तुम सर्वत्र विजयी होओगे। हनुमान जी बोले — हे प्रभो ! अवश्य ही आप हमें उस मन्त्र को पूर्णतया बतलाइये। हनुमान के इस प्रकार प्रार्थना करने पर राम ने उन्हें एकांत में बुलाया।फिर उनके दाहिने कान में “श्री राम ” इस नाम का उपदेश दिया । हनुमान ने उस नाम को एक लाख बार जपा और तब वे दक्षिण दिशा को प्रस्थित हुए।उसी मन्त्र के प्रभाव से वे दुर्गम सागर को पार कर लंका में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने बड़ी खोज की।इतने पर भी सीता का पता न लगा। तब वे अशोक वाटिका में गये, जहाँ सीता एक वृक्ष के नीचे बैठी हुई थीं ।उन्होंने शीघ्रता से समीप जाकर प्रणाम किया । फिर दण्ड के समान पृथ्वी पर पड़ गये।उस समय उन्होंने बालक का रूप धारण कर रखा था ।उन्हें भूमि पर पड़े देखकर सीता ने कहा — हे बालक! तुम कहाँ से आये हो? किसके बालक हो? हनुमान बोले — मेरी माता सीता और पिता श्री रामचंद्र जी हैं। मैं उन्हीं के समीप से आया हूँ। मेरा नाम हनुमान है। इस मुद्रिका को आप लीजिए। उसे देखकर सीता को यह ज्ञात हुआ कि यह अँगूठी श्री रामचंद्र जी की है तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। हनुमान ने कहा — माता! मुझे बड़ी भूख लगी है, इस वन में बड़े मधुर फल लगे हैं। यदि आप की आज्ञा हो, तो मैं इन सब का भक्षण कर जाऊँ। सीता बोली — हे हनुमान ! इस वन का अधिपति रावण है। तुम ऐसे शक्तिशाली तो नहीं हो। फिर कैसे इन फलों को भक्षण कर सकोगे? हनुमान बोले — मेरे हृदयान्तर में ‘श्रीराम’ का प्रबल शस्त्र है। उससे मैं सब राक्षसों को तृण के समान जानता हूँ। तब उनकी इस उक्ति को सुनकर सीता जी ने आज्ञा दे दी। हनुमान ने फल खाये, वृक्षों को नष्ट किया। समाचार सुनकर बहुत से राक्षस वहाँ आ पहुँचे। हनुमान ने उन्हें सबसे भीषण युद्ध किया। हनुमान ने श्री राम मन्त्र के प्रभाव से उनके बल का दलन कर लंका को जला दिया। सीता जी ने श्री रामचंद्र जी को देने के लिए एक आभूषण दिया। उसे लेकर हनुमान श्री रामचंद्र जी के पास लौट आये। उस अलंकार को लेकर और हनुमान की बातें सुनकर रामचंद्र जी बहुत प्रसन्न हुए। हे महाराज युधिष्ठर ! यह सब राम नाम की महिमा है। इसलिए हे राजेन्द्र ! तुम राम का नाम जपा करो। युधिष्ठुर बोले — इसके जप की क्या विधि है और इसके पुरश्चरण का क्या फल है? श्री कृष्ण जी बोले — हे राजेन्द्र ! स्नान करके तुलसी की माला लेकर पवित्र स्थान में जप करे, अथवा किसी पुस्तक पर लिखे अथवा हृदय में स्मरण करे। एक करोड़ अथवा एक लाख की संख्या में उसकी परिसमाप्ति करे। अनेक मन्त्र और विधियाँ हैं। हे युधिष्ठर! उनमें से एक उत्तम मन्त्र मैं तुमसे कहता हूँ । पहले ‘श्री’ शब्द, मध्य में ‘जय’ शब्द और अन्त में दो ‘जय’ शब्द को प्रयुक्त कर एक मन्त्र हुआ। यथा – श्री राम जय राम जय जय राम। यदि इस मन्त्र को इक्कीस बार जपा जावे तो करोड़ों ब्रह्महत्या का पाप नष्ट हो जाता है। बुद्धिमान को उचित है कि वह इसी मन्त्र से एक लाख जप करे। पश्चात सविधि उद्यापन करे। जप की अपेक्षा राम नाम लिखने में सौ गुना अधिक पुण्य है। इस प्रकार प्रत्येक लाख मन्त्र जप लेने पर उद्यापन का पृथक कार्य करे।

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नवरात्रि में 9 दिनों की पूजा विधि और मंत्र

हिंदू धर्म में नवरात्रि के दौरान साधना और उपासना करने के सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। ऐसी मान्यता है की सामान्य दिनों में किसी भी साधना में सिद्धि हासिल करने के लिए कम से कम 40 दिनों की आवश्यकता होती है। वहीं, नवरात्रि में नौ दिन ही अनुष्ठान में सफलता हासिल करने के लिए पर्याप्त होते हैं। बता दें कि साल भर में चार मास चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ इन चार मासों में नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। लेकिन, इनमें से चैत्र और शारदीय नवरात्रि प्रमुख होते हैं। इस बार 2 अप्रैल से चैत्र या बासंतिक नवरात्र शुरू हो रहे हैं। तो आइए जानते हैं नवरात्रि की पूजा विधि और इन नौ दिनों किन मंत्रों का जप करने से आपको लाभ होगा। शैलपुत्री शैलपुत्री मां दुर्गा का प्रथम स्वरुप हैं। मान्यता है कि शक्ति की प्रथम उत्पत्ति शैलपुत्री के रूप में ही हुई थी। नवरात्रि के पहले दिन इनकी ही पूजा करनी चाहिए। मां के सामने धूप, दीप जलाएं और देसी घी का दीपक जलाकर मां की आरती उतारें। इसके बाद शैलपुत्री माता की कथा, दुर्गा स्तुति या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। इस दिन मां को गाय के घी से बनी सफेद चीजों का भोग लगाएं। इसके बाद शाम के समय मां की आरती कर उनका ध्यान करें।मंत्र- ऊं शैलपुत्र्यै नम:। ब्रह्मचारिणी नवरात्रि के दूसरे दिन मां भगवती के द्वितीय रूप ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा की जाती है। सुबह पूजा के समय अपने हाथों में एक फूल लेकर देवी का ध्यान करें।इसके बाद उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं, फिर फूल, कुमकुम, सिंदूर अर्पित करें। बता दें की देवी को सफेद और सुगंधित फूल प्रिय हैं। इसके अलावा आप कमल का फूल भी चढ़ा सकते हैं।मंत्र – ऊँ ब्रह्मचारिण्यै नम:दूसरा मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। चंद्रघंटानवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा के रूप की पूजा की जाती है। सबसे पहले देवी के गंगा जल से स्नान कराएं। इसके बाद धूप-दीप, रोली , फूल और फल अर्पित करें। इसके बाद मां का ध्यान करें और मन में ऊं चंद्रघण्टायै नम: का जप करते रहें।मंत्र- पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता.प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥ कूष्मांडा इन दिन रोज की तरह सबसे पहले कलश की पूजा कर माता कूष्मांडा को नमन करें। इसके बाद मां को जल और पुष्प अर्पित करें। बता दें कि इस दिन पूजा में बैठने के लिए हरे रंग के आसन का इस्तेमाल करें। इस दिन मां को कद्दू के हलवे का भोग लगाएं। मंत्र- ऊं कूष्माण्डायै नम:दूसरा मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: स्कंदमातानवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। इस दिन सबसे पहले स्कंदमाता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगाजल से शुद्धिकरण करें। चौकी पर मिट्टी, तांबे या फिर चांदी के घड़े में जल भरकर उस पर कलश रखें और देवी का ध्यान करें। स्कंदमाता की उपासना करने से मनुष्य की सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती है। माता स्कंदमाता को केला प्रिय है। इस दिन मां को केले का भोग जरुर लगाएं। मंत्र- या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।दूसरा मंत्र- ऊं स्कंदमात्र्यै नम: ।। कात्यायनी नवरात्र के छठे दिन देवी कात्यायनी की पूजा अर्चना करनी चाहिए। इस दिन पूजा करते समय लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद कात्यायनी देवी की प्रतिमा स्थापित करें और फिर गंगाजल से उसकी शुद्धी करें। इसके बाद मां के सामने घी का दीपक जलाएं और पुष्प भी चढ़ाएं। इसके असाला मां को पीले रंग के फूलों के साथ कच्ची हल्दी की गांठ भी चढ़ाएं। मंत्र – या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥दूसरा मंत्र – ऊं स्कन्दमात्र्यै नम: कालरात्रि सातवें दिन कालरात्रि की आराधना करना चाहिए। मां की प्रतिमा की स्थापना करने के बाद मां को कुमकुम, लाल पुष्प, रोली आदि चढ़ाएं। इसके बाद मां को नींबूओं की माला पहने और उनके सामने दीपक जलाकर उनका पूजन करें। मां के मंत्रों का जाप करें या सप्तशती का पाठ करें। मां कालरात्रि को लाल रंग के फूल अर्पित करें। माता कालरात्रि को गुड़ या उससे बनी चीजों का भोग लगाना चाहिए। या देवी सर्वभू‍तेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।ॐ कालरात्र्यै नम: महागौरीनवरात्र के आठवें दिन महागौरी की पूजा करना चाहिए। इस दिन सबसे पहले लकड़ी की चौकी या मंदिर में महागौरी की प्रतिमा की स्थापना करें। इसके बाद चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर महागौरी यंत्र की स्थापना करें। मां महागौरी की पूजा करते समय पीले ये सफेद रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं। महागौरी को हलवा और चने का भोग लगाना चाहिए। मंत्र- श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।दूसरा मंत्र – ऊं महागौयैं नम: सिद्धिदात्री मां जगदंबा का ये रूप पूर्ण स्वरूप है। पहले दिन जो पूजा अर्चना शैलपुत्री के रूप में की गई थी वह सिद्धिदात्री के रुप पर आकर पूर्ण हो जाती है। इस दिन सबसे पहले कलश की पूजा और पूजा स्थल पर सभी देवी-देवताओं का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद माता के मंत्रो का जाप कर उनकी पूजा करनी चाहिए। मां सिद्धिदात्री को मौसमी फल, पूड़ी, खीर, नारियल, चना, और हलवा का भोग लगाना चाहिए। मंत्र- या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।दूसरा मंत्र- ऊं सिद्धिदात्र्यै नम:। नोट : यह तमाम जानकारी जनरुचि को ध्यान में रखकर दी जा रहा है, ज्योतिष और धर्म के उपाय और सलाहों को आपनी आस्था और विश्वास पर आजमाएं। कंटेट का उद्देश्य मात्र आपको बेहतर सलाह देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।

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जब तुलसीदास को भगवान जगन्नाथ ने दिये राम रुप में दर्शन

तुलसीदास जी अपने इष्टदेव का दर्शन करने श्रीजगन्नाथपुरी गये। मंदिर में भक्तों की भीड़ देख कर प्रसन्न मन से अंदर प्रविष्ट हुए। जगन्नाथ जी का दर्शन करते ही निराश हो गये। विचार किया कि यह हस्तपादविहीन देव हमारा इष्ट नहीं हो सकता। बाहर निकल कर दूर एक वृक्ष के तले बैठ गये। सोचा कि इतनी दूर आना ब्यर्थ हुआ। क्या गोलाकार नेत्रों वाला हस्तपादविहीन दारुदेव मेरा राम हो सकता है? कदापि नहीं। रात्रि हो गयी, थके-माँदे, भूखे-प्यासे तुलसी का अंग टूट रहा था। अचानक एक आहट हुई। वे ध्यान से सुनने लगे।अरे बाबा ! तुलसीदास कौन है? एक बालक हाथों में थाली लिए पुकार रहा था। तभी आप उठते हुए बोले –‘हाँ भाई ! मैं ही हूँ तुलसीदास।’ बालक ने कहा, ‘अरे ! आप यहाँ हैं। मैं बड़ी देर से आपको खोज रहा हूँ। ‘बालक ने कहा -‘लीजिए, जगन्नाथ जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है।’ तुलसीदास बोले –‘कृपा करके इसे बापस ले जायँ। बालक ने कहा, आश्चर्य की बात है, ‘जगन्नाथ का भात-जगत पसारे हाथ’ और वह भी स्वयं महाप्रभु ने भेजा और आप अस्वीकार कर रहे हैं। कारण? तुलसीदास बोले, ‘अरे भाई ! मैं बिना अपने इष्ट को भोग लगाये कुछ ग्रहण नहीं करता। फिर यह जगन्नाथ का जूठा प्रसाद जिसे मैं अपने इष्ट को समर्पित न कर सकूँ, यह मेरे किस काम का? ‘ बालक ने मुस्कराते हुए कहा, बाबा ! आपके इष्ट ने ही तो भेजा है । तुलसीदास बोले -यह हस्तपादविहीन दारुमूर्ति मेरा इष्ट नहीं हो सकता। बालक ने कहा कि अपने श्रीरामचरितमानस में तो आपने इसी रूप का वर्णन किया है — बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना ।।आनन रहित सकल रस भोगी।बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।**** अब तुलसीदास की भाव-भंगिमा देखने लायक थी। नेत्रों में अश्रु-बिन्दु, मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे। थाल रखकर बालक यह कहकर अदृश्य हो गया कि मैं ही राम हूँ। मेरे मंदिर के चारों द्वारों पर हनुमान का पहरा है।विभीषण नित्य मेरे दर्शन को आता है। कल प्रातः तुम भी आकर दर्शन कर लेना। तुलसीदास जी ने बड़े प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया। प्रातः मंदिर में उन्हें जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के स्थान पर श्री राम, लक्ष्मण एवं जानकी के भव्य दर्शन हुए। भगवान ने भक्त की इच्छा पूरी की। जिस स्थान पर तुलसीदास जी ने रात्रि व्यतीत की थी, वह स्थान ‘तुलसी चौरा’ नाम से विख्यात हुआ। वहाँ पर तुलसीदास जी की पीठ ‘बड़छता मठ’ के रूप में प्रतिष्ठित है।

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श्री कृष्ण ने किए थे 8 विवाह, जानिए उनकी कहानियां

पुराणों के अनुसार श्री कृष्ण ने 8 स्त्रियों से विवाह किया था जो उनकी पटरानियां बानी थी। ये थी – रुक्मिणी, जाम्बवती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रविंदा, सत्या(नाग्नजिती), भद्रा और लक्ष्मणा। आइए जानते है श्रीकृष्ण द्वारा इन आठ के साथ किए गए विवाह की कहानियां – 1. रुक्मिणी-विदर्भ राज्य का भीष्म नामक एक वीर राजा था। उसकी पुत्री का नाम रुक्मिणी था। वह साक्षात लक्ष्मीजी का ही अंश थीं। वह अत्यधिक सुंदर और सभी गुणों वाली थी। नारद जी द्वारा श्रीकृष्ण के गुणों सा वर्णन सुनने पर रुक्मिणी श्रीकृष्ण से ही विवाह करना चाहती थी। रुक्मिणी के रूप और गुणों की चर्चा सुनकर भगवान कृष्ण ने भी रुक्मिणी के साथ विवाह करने का निश्चय कर लिया था। रुक्मिणी का एक भाई था, जिसना नाम रुक्मि था। उसने रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से साथ तय कर दिया था। जब यह बात श्रीकृष्ण को पता चली तो वे विवाह से एक दिन पहले बलपूर्वक रुक्मिणी का हरण कर द्वारका ले गए। द्वारका पहुंचने के बाद श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह किया गया। 2. जाम्बवती-सत्राजित नामक एक यादव था। उसने भगवान सूर्य की बहुत भक्ति की। जिससे खुश होकर भगवान ने उसे एक मणि प्रदान की थी। भगवान कृष्ण ने सत्राजित को वह मणि राजा उग्रसेन को भेंट करने को कहा, लेकिन सत्राजित ने उनकी बात नहीं मानी और मणि अपने पास ही रखी। एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन उस मणि को लेकर जंगल में शिकार करने गया। वहां एक शेर ने प्रसेन का वध करके वह मणि छीन ली और अपनी गुफा में जा छिपा। कुछ दिनों बाद ऋक्षराज जाम्बवन्त ने शेर को मारकर वह मणि अपने पास रख ली। सत्राजित ने मणि चुराने और अपने भाई का वध करने का दोष श्रीकृष्ण पर लगा। इस दोष के मुक्ति पाने के लिए श्रीकृष्ण उस मणि की खोज करने के लिए वन में गए। मणि की रोशनी से श्रीकृष्ण उस गुफा तक पहुंच गए, जहां जाम्बवन्त और उसकी पुत्री जाम्बवती रहती थी। श्रीकृष्ण और जाम्बवन्त के बीच घोर युद्ध हुआ। युद्ध में पराजित होने पर जाम्बवन्त को श्रीकृष्ण के स्वयं विष्णु अवतार होने की बात पता चली। श्रीकृष्ण का असली रूप जानने पर जाम्बवन्त ने उनसे क्षमा मांगी और अपने अपराध का प्रायश्चित करने के लिए अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। 3. सत्यभामा-मणि लेकर श्रीकृष्ण द्वारका पहुंचे। वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण ने वह मणि सत्राजित को दी और खुद पर लगाए दोष को गलत साबित किया। श्रीकृष्ण के निर्दोष साबित होने पर सत्राजित खुद को अपमानित महसूस करने लगा। वह श्रीकृष्ण के तेज को जानता था, इसलिए वह बहुत भयभीत हो गया। उसकी मूर्खता की वजह से कहीं श्रीकृष्ण की उससे कोई दुश्मनी न हो जाए, इस डर से सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। 4. सत्या (नग्नजिती)-कौशल राज्य के राजा नग्नजित की एक पुत्री थी। जिसका नाम नग्नजिती थी। वह बहुत सुंदर और सभी गुणों वाली थी। अपनी पुत्री के लिए योग्य वर पाने के लिए नग्नजित ने शर्त रखी। शर्त यह थी कि जो भी क्षत्रिय वीर सात बैलों पर जीत प्राप्त कर लेगा, उसी के साथ नग्नजिती का विवाह किया जाएगा। एक दिन भगवान कृष्ण को देख नग्नजिती उन पर मोहित हो गई और मन ही मन भगवान कृष्ण से ही विवाह करने का प्रण ले लिया। भगवान कृष्ण यह बात जान चुके थे। अपनी भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान कृष्ण ने सातों बैल को अपने वश में करके उन पर विजय प्राप्त की। भगवान का यह पराक्रम देखकर नग्नजित ने अपनी पुत्री का विवाह भगवान कृष्ण के साथ किया। 5. कालिन्दी-एक बार भगवान कृष्ण अपने प्रिय अर्जुन के साथ वन में घूम रहे थे। यात्रा की धकान दूर करने के लिए वे दोनों यमुना नदीं के किनार जाकर बैठ गए। वहां पर श्रीकृष्ण और अर्जुन को एक युवती तपस्या करती हुई दिखाई दी। उस युवती को देखकर अर्जुन ने उसका परिचय पूछा। अर्जुन द्वारा ऐसा पूछने पर उस युवती ने अपना नाम सूर्यपुत्री कालिन्दी बताया। वह यमुना नदीं में निवास करते हुए भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। यह बात जान कर भगवान कृष्ण ने कालिन्दी को अपने भगवान विष्णु के अवतार होने की बात बताई और उसे अपने साथ द्वारका ले गए। द्वारका पहुंचने पर भगवान कृष्ण और कालिन्दी का विवाह किया गया। 6. लक्ष्मणा-लक्ष्मणा ने देवर्षि नारद से भगवान विष्णु के अवतारों के बारे में कई बातों सुनी थी। उसका मन सदैव भगवान के स्मरण और भक्ति में लगा रहता था। लक्ष्मणा भगवान विष्णु को ही अपने पति रूप में प्राप्त करना चाहती थी। उसके पिता यह बात जानते थे। अपनी पुत्री की इच्छा पूरी करने के लिए उसके पिता ने स्वयंवर का एक ऐसा आयोजन किया, जिसमें लक्ष्य भेद भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के सिवा कोई दूसरा न कर सके। लक्ष्मणा के पिता ने अपनी पुत्री के विवाह उसी वीर से करने का निश्चय किया, जो की पानी में मछली की परछाई देखकर मछली पर निशाना लगा सके। शिशुपाल, कर्ण, दुर्योधन, अर्जुन कोई भी इस लक्ष्य का भेद न कर सका। तब भगवान कृष्ण ने केवल परछाई देखकर मछली पर निशाना लगाकर स्वयंवर में विजयी हुए और लक्ष्मणा के साथ विवाह किया। 7. मित्रविंदा-अवंतिका (उज्जैन) की राजकुमारी मित्रविंदा के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया गया था। उस स्वयंवर में मित्रविंदा जिसे भी अपने पति रूप में चुनती उसके साथ मित्रविंदा का विवाह कर दिया जाता। उस स्वयंवर में भगवान कृष्ण भी पहुंचे। मित्रविंदा भगवान कृष्ण के साथ ही विवाह करना चाहती था, लेकिन उसका भाई विंद दुर्योधन का मित्र था। इसलिए उसने अपनी बहन को बल से भगवान कृष्ण को चुनने से रोक लिया। जब भगवान कृष्ण को मित्रविंदा के मन की बात पता चली। तब भगवान ने सभी विरोधियों के सामने ही मित्रविंदा का हरण कर लिया और उसके साथ विवाह किया। 8. भद्रा-भगवान कृष्ण की श्रुतकीर्ति नामक एक भुआ कैकय देश में रहती थी। उनकी एक भद्रा नामक कन्या थी। भद्रा और उसके भाई भगवान कृष्ण के गुणों को जानते थे। इसलिए भद्रा के भाइयों ने उसका विवाह भगवान कृष्ण के साथ करने का निर्णय किया। अपनी भुआ और भाइयों के

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अपने पुत्रों को ही नदी में बहाया था गंगा ने, पर क्यों?, जानिए गंगा से जुडी ऐसी ही रोचक बातें

हिन्दू धर्म में गंगा को सबसे पूजनीय नदी माना गया है। गंगा के संबंध में अनेक पुराणों में कई कथाएं पढ़ने को मिलती है। महाभारत के सबसे प्रमुख पात्र भीष्म भी गंगा के ही पुत्र थे। आज हम आपको गंगा से जुड़ी कुछ ऐसी रोचक बातें बता रहे हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं- ब्रह्मा ने दिया था महाभिष को श्रापप्राचीन समय में इक्ष्वाकु वंश में राजा महाभिष थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ करके स्वर्ग लोक प्राप्त किया था। एक दिन बहुत से देवता और राजर्षि, जिनमें महाभिष भी थे, ब्रह्माजी की सेवा में आए। वहां गंगा भी उपस्थित थीं। तभी हवा के वेग से गंगा के वस्त्र शरीर पर से खिसक गए। वहां उपस्थित सभी लोगों ने अपनी आंखें नीची कर ली, मगर राजा महाभिष गंगा को देखते रहे। जब परमपिता ब्रह्मा ने ये देखा तो उन्होंने महाभिष को मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जन्म लेने का श्राप दिया और कहा कि गंगा के कारण ही तुम्हारा अप्रिय होगा और जब तुम उस पर क्रोध करोगे तब इस श्राप से मुक्त हो जाओगे। राजा शांतनु की पत्नी बनी गंगाब्रह्मा के श्राप के कारण राजा महाभिष ने पूरूवंश में राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु के रूप में जन्म लिया। एक बार राजा शांतनु शिकार खेलते-खेलते गंगा नदी के तट पर आए। यहां उन्होंने एक परम सुदंर स्त्री (वह स्त्री देवी गंगा ही थीं) को देखा। उसे देखते ही शांतनु उस पर मोहित हो गए। शांतनु ने उससे प्रणय निवेदन किया। उस स्त्री ने कहा कि मुझे आपकी रानी बनना स्वीकार है, लेकिन मैं तब तक ही आपके साथ रहूंगी, जब तक आप मुझे किसी बात के लिए रोकेंगे नहीं, न ही मुझसे कोई प्रश्न पूछेंगे। ऐसा होने पर मैं तुरंत आपको छोड़कर चली जाऊंगी। राजा शांतनु ने उस सुंदर स्त्री का बात मान ली और उससे विवाह कर लिया। इस तरह गंगा ने किया राजा शांतनु का अप्रियविवाह के बाद राजा शांतनु उस सुंदर स्त्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। समय बीतने पर शांतनु के यहां सात पुत्रों ने जन्म लिया, लेकिन सभी पुत्रों को उस स्त्री ने गंगा नदी में डाल दिया। शांतनु यह देखकर भी कुछ नहीं कर पाएं क्योंकि उन्हें डर था कि यदि मैंने इससे इसका कारण पूछा तो यह मुझे छोड़कर चली जाएगी। आठवां पुत्र होने पर जब वह स्त्री उसे भी गंगा में डालने लगी तो शांतनु ने उसे रोका और पूछा कि वह यह क्यों कर रही है?उस स्त्री ने बताया कि मैं देवनदी गंगा हूं तथा जिन पुत्रों को मैंने नदी में डाला था वे सभी वसु थे जिन्हें वसिष्ठ ऋषि ने श्राप दिया था। उन्हें मुक्त करने लिए ही मैंने उन्हें नदी में प्रवाहित किया। आपने शर्त न मानते हुए मुझे रोका। इसलिए मैं अब जा रही हूं। ऐसा कहकर गंगा शांतनु के आठवें पुत्र को लेकर अपने साथ चली गई। वसुओं ने क्यों लिया गंगा के गर्भ से जन्म?महाभारत के आदि पर्व के अनुसार, एक बार पृथु आदि वसु अपनी पत्नियों के साथ मेरु पर्वत पर घूम कर रहे थे। वहां वसिष्ठ ऋषि का आश्रम भी था। वहां नंदिनी नाम की गाय भी थी। द्यो नामक वसु ने अन्य वसुओं के साथ मिलकर अपनी पत्नी के लिए उस गाय का हरण कर लिया। जब महर्षि वसिष्ठ को पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर सभी वसुओं को मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। वसुओं द्वारा क्षमा मांगने पर ऋषि ने कहा कि तुम सभी वसुओं को तो शीघ्र ही मनुष्य योनि से मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन इस द्यौ नामक वसु को अपने कर्म भोगने के लिए बहुत दिनों तक पृथ्वीलोक में रहना पड़ेगा। इस श्राप की बात जब वसुओं ने गंगा को बताई तो गंगा ने कहा कि मैं तुम सभी को अपने गर्भ में धारण करूंगी और तत्काल मनुष्य योनि से मुक्त कर दूंगी। गंगा ने ऐसा ही किया। वसिष्ठ ऋषि के श्राप के कारण भीष्म को पृथ्वी पर रहकर दुख भोगने पड़े। भीष्म को दिलाई श्रेष्ठ शिक्षागंगा जब शांतनु के आठवे पुत्र को साथ लेकर चली गई तो वे बहुत उदास रहने लगे। इस तरह थोड़ा और समय बीता। शांतनु एक दिन गंगा नदी के तट पर घूम रहे थे। वहां उन्होंने देखा कि गंगा में बहुत थोड़ा जल रह गया है और वह भी प्रवाहित नहीं हो रहा है। इस रहस्य का पता लगाने जब शांतनु आगे गए तो उन्होंने देखा कि एक सुंदर व दिव्य युवक अस्त्रों का अभ्यास कर रहा है और उसने अपने बाणों के प्रभाव से गंगा की धारा रोक दी है। यह दृश्य देखकर शांतनु को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी वहां शांतनु की पत्नी गंगा प्रकट हुई और उन्होंने बताया कि यह युवक आपका आठवां पुत्र है। इसका नाम देवव्रत है। इसने वसिष्ठ ऋषि से वेदों का अध्ययन किया है तथा परशुरामजी से इसने समस्त प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने की कला सीखी है। यह श्रेष्ठ धनुर्धर है तथा इंद्र के समान इसका तेज है। देवव्रत ही आगे जाकर भीष्म कहलाए।

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वनवास के बाद सीता जी का आगमन, अश्वमेघ यज्ञ का आरम्भ तथा अश्व के पूर्व जन्म की कथा

तदनन्तर लक्ष्मण ने जाकर पुनः जानकी के चरणों में प्रणाम किया। लक्ष्मण को आया देख पुनः अपने को बुलाये जाने की बात सुनकर सीता ने कहा —- ‘लक्ष्मण ! मुझे श्री रामचंद्र जी ने त्याग दिया है अतः अब मैं कैसे चल सकती हूँ? मैं यहीं रहकर श्री राम को स्मरण किया करूँगी।उनकी बात सुनकर लक्ष्मण ने कहा —- माता ! आप पतिव्रता हैं, श्री रघुनाथ जी बारंबार आपको बुला रहे हैं।पति परायणा स्त्री अपने पति के अपराध को मन में नहीं लाती; इसलिए आप रथ पर बैठकर मेरे साथ चलने की कृपा कीजिए। लक्ष्मण की ये बातें सुनकर सीता सभी तपस्विनी स्त्रियों तथा मुनियों को प्रणाम करके मन ही मन श्री राम का स्मरण करती हुई रथ पर बैठकर अयोध्या की ओर चलीं। नगरी में पहुँच कर वे सरयू तट पर गयीं। सीता वहाँ जाकर रथ से उतर गयीं और श्री रामचंद्र जी के समीप पहुँच कर उनके चरणों में लग गयीं। श्री रामचंद्र जी बोले —-‘साध्वि ! इस समय तुम्हारे साथ मैं यज्ञ की समाप्ति करूँगा।’ तत्पश्चात् सीता महर्षि वाल्मीकि तथा अन्य ऋषियों को प्रणाम करके माताओं के चरणों में प्रणाम करने के लिए उनके पास गयीं। जानकी को आया देख कौशल्या को बड़ा हर्ष हुआ। सीता ने सभी माताओं के चरणों में प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया। सीता को आया देख कर महर्षि कुम्भज ने सोने की सीता को हटा दिया और उसकी जगह उन्हें ही बिठाया। फिर उत्तम समय आने पर श्री रघुनाथ जी ने यज्ञ का कार्य आरंभ किया। उन्होंने महर्षि वसिष्ठ से पूछकर सभी महर्षियों तथा ब्राहणों की पूजा की और रत्न व सुवर्णों के भार दक्षिणा में देकर संतुष्ट किया। इसके बाद श्री रामचंद्र जी सीता के साथ सोने के घड़े में जल ले आने के लिए गये। उनके पीछे सभी भाई व उनके पुत्र पत्नियों सहित तथा अन्य राजा भी अपनी अपनी पत्नियों सहित चले। महर्षि वसिष्ठ ने सरयू में जाकर वेद मंत्र के द्वारा उसके जल को अभिमन्त्रित किया। वे बोले —हे जल ! तुम श्री रामचंद्र जी के यज्ञ के लिए निश्चित किए हुए इस अश्व को पवित्र करो। मुनि के अभिमन्त्रित किए हुए उस जल को राम आदि सभी राजा यज्ञ मण्डप में ले आये। उस जल से उस श्वेत अश्व को नहलाकर महर्षि कुम्भज ने राम के हाथ से उसे अभिमन्त्रित कराया। श्री रामचंद्र जी अश्व को लक्ष्य करके बोले — महावाह ! ब्राह्मणों से भरे इस यज्ञ-मण्डप में तुम मुझे पवित्र करो। ऐसा कहकर श्री राम ने सीता के साथ उस अश्व का स्पर्श किया। उस समय यह बात सभी ब्राह्मणों को बड़ी विचित्र लगी। वे कहने लगे —-‘अहो ! जिनके नाम का स्मरण करने से मनुष्य बड़े बड़े पापों से छूट जाता है, वे ही श्री रघुनाथ जी यह क्या कह रहे हैं? (क्या अश्व इन्हें पवित्र करेगा? ) श्री राम के हाथ का स्पर्श होते ही उस अश्व ने पशु शरीर का परित्याग करके तुरंत दिव्य रूप धारण कर लिया। दिव्य रूप धारी उस अश्व को देख कर सब लोगों को बड़ा विस्मय हुआ। श्री रामचंद्र जी ने सब जानते हुए भी उससे पूछा —-‘दिव्य शरीर धारण करने वाले पुरुष ! तुम कौन हो? अश्व योनि में क्यों पड़े थे तथा इस समय क्या करना चाहते हो? ये सब बातें बताओ। अश्वमेध यज्ञ के अश्व के पूर्व जन्म की कथा- राम की बात सुनकर दिव्य रूप धारी पुरुष ने कहा —–‘भगवन् ! आपसे कोई बात छिपी नहीं है। फिर भी यदि आप पूछ रहे हैं तो मैं आपसे सब कुछ ठीक ठीक बता रहा हूँ । पूर्व जन्म में मैं एक परम धर्मात्मा ब्राह्मण था, किन्तु मुझसे एक अपराध हो गया। एक दिन मैं सरयू के तट पर गया और वहाँ स्नान, दान करके वेदोक्त रीति से आपका ध्यान करने लगा। उस समय मेरे पास बहुत से लोग आये और उनको ठगने के लिए मैंने कई प्रकार का दम्भ प्रकट किया।इसी समय महातेजस्वी महर्षि दुर्वासा पृथ्वी पर विचरते हुए वहाँ आये और सामने खड़े हो कर मुझे देखने लगे।मैंने मौन धारण कर रखा था; न तो उठकर उन्हें अर्ध्य दिया और न कोई स्वागत सत्कार किया। महर्षि दुर्वासा का स्वभाव तो यों ही तीक्ष्ण है, मुझे दम्भ करते देख कर वे प्रचण्ड क्रोध के वशीभूत हो गये तथा शाप देते हुए बोले —–तापसाधम ! यदि तू सरयू के तट पर ऐसा घोर दम्भ कर रहा है तो पशु योनि को प्राप्त हो जा।’ मुनि के शाप को सुनकर मुझे बड़ा दुख हुआ और मैंने उनके चरण पकड़ लिए। तब मुनि ने मुझ पर महान अनुग्रह किया। वे बोले —–‘तापस ! तू श्री रामचंद्र जी के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा बनेगा; फिर भगवान के हाथ का स्पर्श होने से तू दम्भहीन एवं दिव्य रूप धारण करके परमपद को प्राप्त हो जायगा।’ महर्षि का दिया हुआ यह शाप मेरे लिए अनुग्रह बन गया। अनेक जन्मों के बाद भी जिसकी प्राप्ति कठिन है वही आपकी अंगुलियों का स्पर्श आज मुझे प्राप्त हुआ है । महाराज ! अब आज्ञा दीजिए, मैं आपकी कृपा से महत् पद को प्राप्त हो रहा हूँ । यह कहकर उसने श्री राम की परिक्रमा की और विमान पर बैठ कर वह उनके सनातन धाम को चला गया।उसकी बातें सुनकर अन्य साधारण लोगों को भी श्री राम की महिमा का ज्ञान हुआ। तदनन्तर, मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी बोले —–‘रघुनन्दन ! आप देवताओं को कर्पूर भेंट कीजिए, जिससे वे प्रत्यक्ष प्रकट होकर हविष्य ग्रहण करेंगे ।’ यह सुनकर श्री रामचंद्र जी ने देवताओं को सुंदर कर्पूर अर्पण किया ।महर्षि वशिष्ठ जी ने प्रसन्न होकर देवताओं का आवाहन किया ।मुनि के आवाहन पर सभी देवता अपने अपने परिवार सहित वहाँ आ पहुँचे। यज्ञ की हवि का इन्द्र सहित सभी देवताओं ने आस्वादन किया। इसके बाद सभी देवता अपना अपना भाग लेकर अपने धाम को चले गये। स्त्रियाँ श्री राम के ऊपर लाजा(खील) की वर्षा करने लगीं। तव श्री राम ने सीता के साथ सरयू के पावन जल में स्नान किया। इस प्रकार भगवान श्री राम ने सीता के साथ तीन अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया और अनुपम कीर्ति प्राप्त की।

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सीता की निंदा करने वाले धोबी के पूर्व जन्म का वृत्तान्त

मिथिला नाम की नगरी में महाराज जनक राज्य करते थे। उनका नाम था सीरध्वज। एक बार वे यज्ञ के लिए पृथ्वी जोत रहे थे उस समय फाल से बनी गहरी रेखा द्वारा एक कुमारी कन्या का प्रादुर्भाव हुआ। रति से भी सुंदर कन्या को देख कर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उस कन्या का नाम सीता रख दिया। परम सुंदरी सीता एक दिन सखियों के साथ उद्यान में खेल रहीं थीं। वहाँ उन्हें एक शुक पक्षी का जोड़ा दिखाई दिया,जो बड़ा मनोरम था। वे दोनों पक्षी एक पर्वत की चोटी पर बैठ कर इस प्रकार बोल रहे थे —-‘पृथ्वी पर श्री राम नाम से विख्यात एक बड़े सुंदर राजा होंगे। उनकी महारानी, सीता के नाम से विख्यात होंगी। श्री राम, सीता के साथ ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करेंगे। धन्य हैं वे जानकी देवी और धन्य हैं वे श्री राम। तोते को ऐसी बातें करते देख सीता ने यह सोचा कि ये दोनों मेरे ही जीवन की कथा कह रहे हैं, इन्हें पकड़ कर सभी बातें पूछूँ।ऐसा विचार कर उन्होंने अपनी सखियों से कहा, ‘यह पक्षियों का जोड़ा सुंदर है तुम लोग चुपके से जाकर इसे पकड़ लाओ।’ सखियाँ उस पर्वत पर गयीं और दोनों सुंदर पक्षियों को पकड़ लायीं। सीता उन पक्षियों से बोलीं—‘तुम दोनों बड़े सुंदर हो; देखो, डरना नहीं। बताओ, तुम कौन हो और कहाँ से आये हो? राम कौन हैं? और सीता कौन हैं? तुम्हें उनकी जानकारी कैसे हुई? सारी बातों को जल्दी जल्दी बताओ। भय न करो। सीता के इस प्रकार पूछने पर दोनों पक्षी सब बातें बताने लगे —–‘देवि ! वाल्मीकि नाम से विख्यात एक बहुत बड़े महर्षि हैं। हम दोनों उन्हीं के आश्रम में रहते हैं। महर्षि ने रामायण नाम का एक ग्रन्थ बनाया है जो सदा मन को प्रिय जान पड़ता है। उन्होंने शिष्यों को उस रामायण का अध्ययन भी कराया है। रामायण का कलेवर बहुत बड़ा है। हम लोगों ने उसे पूरा सुना है । राम और जानकी कौन हैं, इस बात को हम बताते हैं तथा इसकी भी सूचना देते हैं कि जानकी के विषय में क्या क्या बातें होने वाली हैं; तुम ध्यान देकर सुनो। ‘महर्षि ऋष्यश्रंग के द्वारा कराये हुए पुत्रेष्टि-यज्ञ के प्रभाव से भगवान विष्णु राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—ये चार शरीर धारण करके प्रकट होंगे। देवांगनाएँ भी उनकी उत्तम कथा का गान करेंगी। श्री राम महर्षि विश्वामित्र के साथ भाई लक्ष्मण सहित हाथ में धनुष लिए मिथिला पधारेंगे। उस समय वहाँ वे शिव जी के धनुष को तोड़ेंगे और अत्यन्त मनोहर रूप वाली सीता को अपनी पत्नी के रूप में ग्रहण करेंगे। फिर उन्हीं के साथ श्री राम अपने विशाल राज्य का पालन करेंगे। ये तथा और भी बहुत सी बातें वहाँ हमारे सुनने में आयी हैं। सुंदरी ! हमने तुम्हें सब कुछ बता दिया। अब हम जाना चाहते हैं, हमें छोड़ दो। पक्षियों की ये अत्यंत मधुर बातें सुनकर सीता ने उन्हें मन में धारण किया और पुनः उन दोनों से पूछा —-‘राम कहाँ होंगे? वे किसके पुत्र हैं और कैसे वे आकर जानकी को ग्रहण करेंगे? मनुष्यावतार में उनका श्री विग्रह कैसा होगा? उनके प्रश्न सुनकर शुकी मन ही मन जान गयी कि ये ही सीता हैं। उन्हें पहचान कर वह सामने आ उनके चरणों पर गिर पड़ी और बोली —- श्री रामचन्द्र का मुख कमल की कली के समान सुंदर होगा। नेत्र बड़े बड़े तथा खिले हुए, नासिका ऊँची, पतली और मनोहारिणी होगी। भुजाएँ घुटनों तक, गला शंख के समान होगा। वक्षःस्थल उत्तम व चौड़ा होगा। उसमें श्रीवत्स का चिन्ह होगा। श्री राम ऐसा ही मनोहर रूप धारण करने वाले हैं। मैं उनका क्या वर्णन कर सकती हूँ। जिसके सौ मुख हैं, वह भी उनके गुणों का बखान नहीं कर सकता। फिर हमारे जैसे पक्षी की क्या बिसात है ।वे जानकी देवी धन्य हैं जो शीघ्र रघुनाथ जी के साथ हजारों वर्षों तक प्रसन्नतापूर्वक विहार करेंगी। परंतु सुंदरी ! तुम कौन हो? पक्षियों की बातें सुनकर सीता अपने जन्म की चर्चा करती हुई बोलीं—-‘जिसे तुम लोग जानकी कह रहे हो, वह जनक की पुत्री मैं ही हू। श्री राम जब यहाँ आकर मुझे स्वीकार करेंगे, तभी मैं तुम दोनों को छोड़ूँगी। तुम इच्छानुसार खेलते हुए मेरे घर में सुख से रहो। यह सुनकर शुकी ने जानकी से कहा —-‘साध्वी ! हम वन के पक्षी हैं। हमें तुम्हारे घर में सुख नहीं मिलेगा। मैं गर्भिणी हूँ, अपने स्थान पर जाकर बच्चे पैदा करूँगी। उसके बाद फिर यहाँ आ जाऊँगी। उसके ऐसा कहने पर भी सीता ने उसे नहीं छोड़ा। तब उसके पति ने कहा —-‘सीता ! मेरी भार्या को छोड़ दो। यह गर्भिणी है। जब यह बच्चों को जन्म दे लेगी, तब इसे लेकर फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। तोते के ऐसा कहने पर जानकी ने कहा — महामते ! तुम आराम से जा सकते हो, मगर यह मेरा प्रिय करने वाली है। मैं इसे अपने पास बड़े सुख से रखूँगी । जब सीता ने उस शुकी को छोड़ने से मना कर दिया, तब वह पक्षी अत्यंत दुखी हो गया। उसने करुणायुक्त वाणी में कहा —-‘योगी लोग जो बात कहते हैं वह सत्य ही है—-किसी से कुछ न कहे, मौन होकर रहे, नहीं तो उन्मत्त प्राणी अपने वचनरूपी दोष के कारण ही बन्धन में पड़ता है। यदि हम इस पर्वत के ऊपर बैठकर वार्तालाप न करते होते तो हमारे लिए यह बन्धन कैसे प्राप्त होता। इसलिए मौन ही रहना चाहिए ।’ इतना कहकर पक्षी पुनः बोला—– ‘सुन्दरी ! मैं अपनी इस भार्या के विना जीवित नहीं रह सकता, इसलिए इसे छोड़ दो। सीता ! तुम बहुत अच्छी हो, मेरी प्रार्थना मान लो।’ इस तरह उसने बहुत समझाया, किन्तु सीता ने उसकी पत्नी को नहीं छोड़ा, तब उसकी भार्या ने क्रोध और दुख से व्याकुल होकर जानकी को शाप दिया ——- ‘अरी ! जिस प्रकार तू मुझे इस समय अपने पति से अलग कर रही है, वैसे ही तुझे स्वयं भी गर्भिणी की अवस्था में श्री राम से अलग होना पड़ेगा।’ यों कहकर पति वियोग के कारण उसके प्राण निकल गये। उसने श्री रामचंद्र जी का स्मरण तथा पुनः पुनः राम नाम का उच्चारण करते हुए प्राण त्याग किया था, इसलिए उसे ले जाने के लिए एक सुंदर विमान आया और वह

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महाशिवरात्रि व्रत कथा

एक बार एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूँ. शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना। ‘ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया। कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।’ शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई। शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी. इस समय मुझे मत मार। शिकारी हँसा और बोला, ‘सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ. मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, ‘जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ। मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,’ हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े, मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा। मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, ‘मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ। उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा। थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की. तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।

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नाभाग की कथा

मनुपुत्र नभग का पुत्र था नाभाग। जब वह कई वर्ष ब्रह्मचर्य का पालन कर लौटा, तब बड़े भाइयों ने उसे हिस्से में केवल पिता को दिया। सम्पत्ति तो उन्होंने पहले ही आपस में बाँट ली थी। उसने अपने पिता से कहा — पिता जी ! मेरे बड़े भाइयों ने हिस्से में मेरे लिए आपको ही दिया है।पिता ने कहा — बेटा! तुम उनकी बात न मानो। देखो, ये आंगिरस गोत्र ब्राह्मण बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं । परंतु वे प्रत्येक छठे दिन अपने कर्म में भूल कर बैठते हैं। तुम उनके पास जाकर उन्हें वैश्वदेव सम्बन्धी दो सूक्त बतला दो; जब वे स्वर्ग जाने लगेंगे, तब यज्ञ से बचा हुआ सारा धन तुम्हें दे देंगे। उसने अपने पिता के आज्ञानुसार वैसा ही किया। उन ब्राह्मणों ने भी यज्ञ का बचा हुआ धन उसे दे दिया और वे स्वर्ग में चले गये। जब नाभाग धन लेने लगा, तब उत्तर दिशा से एक काले रंग का पुरुष आया। उसने कहा — ‘इस यज्ञभूमि में जो कुछ बचा हुआ है, वह सब धन मेरा है ‘। नाभाग ने कहा —‘ ऋषियों ने यह धन मुझे दिया है, इसलिए यह मेरा है ‘। इस पर उस पुरुष ने कहा —‘हमारे विवाद के विषय में तुम्हारे पिता से ही प्रश्न किया जाय ‘। तब नाभाग ने जाकर पिता से पूछा। पिता ने कहा — ‘एक बार दक्षप्रजापति के यज्ञ में ऋषि लोग यह निश्चय कर चुके हैं कि यज्ञभूमि में जो कुछ बच रहता है, वह सब रुद्रदेव का हिस्सा है। इसलिए यह धन तो महादेव जी को ही मिलना चाहिए ‘। नाभाग ने जाकर उन काले रंग के पुरुष रुद्र भगवान को प्रणाम किया और कहा कि ‘प्रभो ! यज्ञभूमि की सभी वस्तुएँ आपकी हैं, मेरे पिता ने ऐसा ही कहा है। भगवन्! मुझसे अपराध हुआ, मैं सिर झुकाकर आपसे क्षमा माँगता हूँ । तब भगवान रुद्र ने कहा — ‘तुम्हारे पिता ने धर्म के अनुकूल निर्णय दिया है और तुमने भी मुझसे सत्य ही कहा है।तुम वेदों का अर्थ तो पहले से ही जानते हो।अब मैं तुम्हें सनातन ब्रह्म तत्व का ज्ञान देता हूँ । यहाँ यज्ञ में बचा हुआ मेरा जो अंश है, यह धन भी मैं तुम्हें ही दे रहा हूँ; तुम इसे स्वीकार करो। इतना कहकर भगवान रुद्र अन्तर्धान हो गये। जो मनुष्य प्रातः और सायंकाल एकाग्रचित्त से इस आख्यान का स्मरण करता है, वह प्रतिभाशाली एवं वेदज्ञ तो होता ही है, साथ ही अपने स्वरूप को भी जान लेता है।

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भगवान श्री कृष्ण द्वारा मारे गये धेनुकासुर के पूर्व जन्म की कथा

एक समय की बात है। राजा बलि का पुत्र साहसिक देवताओं को परास्त कर गन्धमादन की ओर प्रस्थित हुआ। उसके साथ बहुत बड़ी सेना थी। इसी समय स्वर्ग की अप्सरा तिलोत्तमा उधर से निकली। उसने साहसिक को देखा और साहसिक ने उसको। दोनों आकर्षित हो गये।तिलोत्तमा ने अपने सौन्दर्य से साहसिक को मोहित कर दिया। वे दोनों एकांत में यथेच्छ विहार करने लगे। वहीं ऋषि दुर्वासा श्री कृष्ण के चरणों का चिंतन कर रहे थे। वे दोनों उस समय कामवश चेतनाशून्य थे। उन्होंने अत्यंत निकट बैठे मुनि को नहीं देखा। शोर सुनकर सहसा मुनि का ध्यान भंग हो गया। उन्होंने उन दोनों की कुत्सित चेष्टाएँ देख क्रोध में भरकर कहा। दुर्वासा बोले —ओ गदहे के समान निरलज्ज नराधम। उठ ! भक्त बलि का पुत्र होकर तू पशुवत् आचरण कर रहा है। पशुओं के सिवा सभी मैथुन कर्म में लज्जा करते हैं। विशेषतः गदहे लज्जा से हीन होते हैं; अतः अब तू गदहे की योनि में जा। तिलोत्तमे ! तू भी उठ। दैत्य के प्रति ऐसी आसक्ति; तो अब तू दानव योनि में जन्म ग्रहण कर। ऐसा कहकर दुर्वासा मुनि चुप हो गये । फिर वे दोनों लज्जित और भयभीत होकर मुनि की स्तुति करने लगे । साहसिक बोला –मुने ! आप ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात् महेश्वर हैं। भगवन् ! मेरे अपराध को क्षमा करें। कृपा करें। यों कहकर वह फूट फूट कर रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़ा। तिलोत्तमा बोली —हे नाथ ! हे दीनबन्धो ! मुझ पर कृपा कीजिए। कामुक प्राणी में लज्जा और चेतना नहीं रह जाती है। ऐसा कहकर वह रोती हुई दुर्वासा की शरण में गयी। उन दोनों की व्याकुलता देखकर मुनि को दया आ गयी। दुर्वासा बोले — दानव ! तू विष्णु भक्त बलि का पुत्र है। पिता का स्वभाव पुत्र में अवश्य रहता है। जैसे कालिय के सिर पर अंकित श्री कृष्ण का चरण चिन्ह सभी सर्पों के मस्तक पर रहता है। वत्स ! एक बार गदहे की योनि में जन्म लेकर तू मोक्ष को प्राप्त हो जा। अब तू वृन्दावन के तालवन में जा। वहाँ श्री कृष्ण के चक्र से प्राणों का परित्याग करके तू शीघ्र मोक्ष को प्राप्त कर लेगा। तिलोत्तमे ! तू वाणासुर की पुत्री होगी; फिर श्री कृष्ण –पौत्र अनिरुद्ध का आलिंगन पाकर शुद्ध हो जायगी। यह कहकर दुर्वासा मुनि चुप हो गये। तत्पश्चात् वे दोनों भी उन मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम करके यथा स्थान चले गये। इस प्रकार साहसिक गर्दभ योनि में जन्म लेकर धेनुकासुर हुआ और तिलोत्तमा बाणासुर की पुत्री उषा होकर अनिरुद्ध की पत्नी हुई।

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द्रोपदी जन्म कथा, आखिर कैसे मिले ! द्रोपदी को पांच पति ?

प्राचीन काल की बात है। नैमिषारण्य क्षेत्र में देवताओं का एक महान यज्ञ चल रहा था। यमराज ने यज्ञ में दीक्षा ले ली थी, इसलिए वे यज्ञीय पशुओं के अतिरिक्त और किसी का वध नहीं करते थे। इससे मर्त्य-लोक के प्राणियों की मृत्यु का समय बीतने लगा और वे अमर सरीखे हो गये। पृथ्वी पर प्रजा की संख्या बहुत बढ़ गयी। इससे देवताओं को बड़ी चिंता हुई। वे सोचने लगे कि पृथ्वी इतना भार कैसे सह सकेगी। पृथ्वी भी तो देवी ही है। देवी के भार से देवताओं को चिंता होनी ही चाहिए। उनके मन में यह बात भी आयी कि पृथ्वी के प्राणियों से हम इसी अर्थ में अच्छे हैं कि वे मर जाते हैं और हम नहीं मरते। यदि वे भी नहीं मरेंगे तो हममें और उनमें अंतर ही क्या रहेगा। इसका कुछ न कुछ उपाय निकालना चाहिए।इन्द्र, वरुण, कुवेर, चन्द्रमा, रुद्र, वसु, अश्विनी कुमार आदि सब मिलकर श्री ब्रह्मा जी के पास गये।उन्होंने ब्रह्मा जी के चरणों में प्रणाम कर निवेदन किया — ‘दादाजी ! इस समय हम सब बड़े भयभीत हैं; इसका कारण यह है कि आजकल मनुष्यों की संख्या बहुत बढ़ रही है और उसके घटने का कोई उपाय नहीं हो रहा है। हमारी व्याकुलता बढ़ रही है। इस दुख से स्वर्ग में रहने पर भी हमें सुख के दर्शन नहीं हो रहे हैं, सुख-शान्ति पाने के लिए हम आपकी शरण में आये हैं।’ ब्रह्मा ने कहा — ‘देवताओ ! तुम लोग स्वर्ग में रहते हो, तुम्हारे पास भोग की सब सामग्री है। बुढ़ापा और मृत्यु का तुम्हें डर नहीं है, तुम्हें कामना है नहीं; फिर मर्त्य-लोक में रहने वाले बेचारे मनुष्यों से तुम क्यों भयभीत होते हो? तुम्हें मनुष्यों से डरने का कोई कारण नहीं है।’ देवताओं ने अञजलि बाँध कर प्रार्थना की —–‘प्रभो ! आजकल किसी की मृत्यु नहीं हो रही है इससे मृत्यु लोक के मनुष्य भी अमर हो गये हैं। मर्त्यलोक के मनुष्य हमारी बराबरी करें —यह हमसे देखा नहीं जाता, हमें इस बात का बड़ा दुख है। अब आप कोई ऐसी व्यवस्था कीजिए कि हममें और उनमें अंतर मालूम पड़े; इसीलिए हम सब आपके पास आये हैं ‘। ब्रह्मा जी ने कहा —-‘इस समय सूर्यपुत्र यमराज महायज्ञ में लगे हुए हैं, इसी से पृथ्वी के प्राणियों की मृत्यु नहीं हो रही है। जब वे अपना सब काम पूरा कर लेंगे, तब लोगों की मृत्यु होगी । तुम लोगों की शक्ति से शक्तिमान् होकर यमराज मर्त्यलोक के प्राणियों का संहार करेंगे। तब मनुष्य तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकेंगे।’ ब्रह्मा जी की यह बात सुनकर देवता लोग उसी स्थान पर गये, जहाँ यज्ञ हो रहा था। एक दिन सब लोग नदी के तट पर बैठे हुए थे। उन्होंने देखा कि धारा में एक बड़ा ही सुंदर सोने का कमल बहा जा रहा है। उसे देखकर उन लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। देवताओं में सबसे श्रेष्ठ देवराज इन्द्र वहाँ उपस्थित थे। उनके मन में उस पुष्प का ठीक ठीक समाचार जानने की उत्सुकता हुई। वे चल पड़े, आगे जाने पर उन्होंने देखा कि जहाँ से नदी निकली है, वहाँ एक बड़ी ही तेजस्विनी स्त्री नदी के भीतर खड़ी होकर जल भर रही है। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। आँसू की जो बूँद नदी में गिरती, वही सोने का कमल हो जाता। इन्द्र उसके पास गये। उन्होने पूछा —– ‘कल्याणी ! तुम कौन हो? किसलिए रो रही हो? अपनी सब बात मुझसे कहो।’उस स्त्री ने इन्द्र की ओर देख कर कहा —-‘देवराज ! तुम तनिक मेरे साथ आगे चले आओ, तुम्हें मालूम हो जायगा कि मैं कौन हूँ और क्यों रो रही हूँ ।’ इन्द्र उसके पीछे पीछे चलने लगे । इन्द्र ने आगे जाकर देखा कि हिमाचल के शिखर पर एक परम सुंदर युवा पुरुष सिद्धासन लगाये बैठा है और उसके पास ही एक सुंदरी युवती बैठी है। वे दोनों आपस में चौसर खेल रहे थे। इन्द्र के पहुँचने पर भी उन लोगों ने कुछ विशेष ध्यान नहीं दिया। इन्द्र को ऐसा मालूम हुआ कि ये तो मेरा अपमान कर रहे हैं। उन्हें थोड़ी थोड़ी जलन होने लगी। उन्होंने क्रोध पूर्वक दृष्टि से उस युवक की ओर देख कर कहा — ‘युवक! क्या तुम नहीं जानते कि मैं इस लोक का स्वामी हूँ? यह लोक मेरे ही अधीन है। अब भी तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मैं ईश्वर हूँ ‘। वह पुरुष अपने खेल में तन्मय हो रहा था। इन्द्र के इस प्रकार कहने पर उसने एक बार धीरे से सिर ऊपर उठाया और हँस दिया। एक बार उसकी दृष्टि इन्द्र पर पड़ गई । दृष्टि पड़ते ही इन्द्र ठूँठ के समान हो गये —न वे हिल सकते थे न डोल सकते थे। वह स्त्री रोने लगी। खेल समाप्त होने पर उस युवा पुरुष ने रोती हुयी स्त्री से कहा —– ‘इन्द्र को मेरे पास ले आओ, मैं इन्द्र का अनिष्ट नहीं कर रहा हूँ। मैं ऐसा उपाय कर रहा हूँ जिससे फिर इन्द्र को अपने ईश्वरपने का कभी गर्व न हो।’ स्त्री ने जाकर ज्यों ही इन्द्र के शरीर का स्पर्श किया, त्यों ही इन्द्र पृथ्वी पर गिर पड़े । तेजस्वी युवक रूपधारी भगवान शंकर ने कहा —–‘इन्द्र ! अब कभी इस प्रकार का अभिमान मत करना कि मैं ईश्वर हूँ। तुम्हारे शरीर में जो शक्ति है, वह तुम्हारी नहीं दूसरे की है। अच्छा, माना कि तुम्हारे अन्दर बड़ी शक्ति है; इसलिए तुम इस बड़ी सी पर्वत शिला को हटा कर नीचे की गुफा में जाओ, वहाँ तुम्हारे समान और भी तेजस्वी इन्द्र हैं ।’ इन्द्र ने वैसा ही किया। उस शिला के हटाने पर इन्द्र ने देखा कि उन्हीं के समान और भी चार इन्द्र वहाँ हैं । उन्हें देखकर इन्द्र बहुत ही दुखी हुए। वे सोचने लगे —– क्या मेरी दशा भी इन्हीं के समान होगी। भगवान शंकर ने अपने दया भरे चेहरे को तनिक कठोर बनाया और भयंकर भाव प्रकट करते हुए कहा ——‘ इन्द्र ! मूर्खता के कारण तुमने मेरा अनादर किया है । जाओ, तुम भी इसी गुफा में रहो।’ शंकर की बात सुनकर इन्द्र डर के मारे थर थर काँपने लगे। उन्होंने अञ्जलि बाँध कर सिर नवाकर भगवान शंकर से निवेदन किया —– ‘प्रभो ! आपने मुझ पर विजय पायी। आप स्वयं तीनों

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