राम नाम की महिमा

कबीर पुत्र कमाल की एक कथा हैं। एक बार राम नाम के प्रभाव से कमाल द्वारा एक कोढ़ी का कोढ़ दूर हो गया। कमाल समझने लगे कि रामनाम की महिमा मैं जान गया हूँ। कमाल के इस कार्य से किंतु कबीर जी प्रसन्न नहीं हुए। कबीरजी ने कमाल को तुलसीदास जी के पास भेजा।तुलसीदासजी ने तुलसी के पत्र पर रामनाम लिखकर वह तुलसी पत्र जल में डाला और उस जल से 500 कोढ़ियों को ठीक कर दिया। कमाल समझने लगा कि तुलसीपत्र पर एक बार रामनाम लिखकर उसके जल से 500 कोढ़ियों को ठीक किया जा सकता है, रामनाम की इतनी महिमा हैं। किंतु कबीर जी इससे भी संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने कमाल को भेजा संत सूरदास जी के पास। संत सूरदास जी ने गंगा में बहते हुए एक शव के कान में राम शब्द का केवल र कार कहा और शव जीवित हो गया। तब कमाल ने सोचा कि राम शब्द के र कार से मुर्दा जीवित हो सकता हैं। यह राम शब्द की महिमा हैं। तब कबीर जी ने कहाः यह भी नहीं। इतनी सी महिमा नहीं है राम शब्द की। भृकुटि विलास सृष्टि लय होई। जिसके भृकुटि विलास मात्र से प्रलय हो सकता है, उसके नाम की महिमा का वर्णन तुम क्या कर सकोगे? राम नाम महिमा में एक अन्य कथा:समुद्रतट पर एक व्यक्ति चिंतातुर बैठा था, इतने में उधर से विभीषण निकले। उन्होंने उस चिंतातुर व्यक्ति से पूछाः क्यों भाई! तुम किस बात की चिंता में पड़े हो? मुझे समुद्र के उस पार जाना हैं परंतु मेरें पास समुद्र पार करने का कोई साधन नहीं हैं। अब क्या करूँ मुझे इस बात की चिंता हैं। अरे भाई, इसमें इतने अधिक उदास क्यों होते हो? ऐसा कहकर विभीषण ने एक पत्ते पर एक नाम लिखा तथा उसकी धोती के पल्लू से बाँधते हुए कहाः इसमें मेनें तारक मंत्र बाँधा हैं। तू इश्वर पर श्रद्धा रखकर तनिक भी घबराये बिना पानी पर चलते आना। अवश्य पार लग जायेगा। विभीषण के वचनों पर विश्वास रखकर वह व्यक्ति समुद्र की ओर आगे बढ़ने लगा। वहं व्यक्ति सागर के सीने पर नाचता-नाचता पानी पर चलने लगा। वह व्यक्ति जब समुद्र के बीचमें आया तब उसके मन में संदेह हुआ कि विभीषण ने ऐसा कौन सा तारक मंत्र लिखकर मेरे पल्लू से बाँधा हैं कि मैं समुद्र पर सरलता से चल सकता हूँ। इस मुझे जरा देखना चाहिए। उस व्यक्ति ने अपने पल्लू में बँधा हुआ पत्ता खोला और पढ़ा तो उस पर दो अक्षर में केवल राम नाम लिखा हुआ था। राम नाम पढ़ते ही उसकी श्रद्धा तुरंत ही अश्रद्धा में बदल गयीः अरे ! यह कोई तारक मंत्र हैं ! यह तो सबसे सीधा सादा राम नाम हैं ! मन में इस प्रकार की अश्रद्धा उपजते ही वह व्यक्ति डूब कर मरगया। कथा सार: इस लिये विद्वानो ने कहां हैं श्रद्धा और विश्वास के मार्ग में संदेह नहीं करना चाहिए क्योकि अविश्वास एवं अश्रद्धा ऐसी विकट परिस्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं कि मंत्र जप से काफी ऊँचाई तक पहुँचा हुआ साधक भी विवेक के अभाव में संदेहरूपी षड्यंत्र का शिकार होकर अपना अति सरलता से पतन कर बैठता हैं। इस लिये साधारण मनुष्य को तो संदेह की आँच ही गिराने के लिए पर्याप्त हैं। हजारों-लाखों-करोडों मंत्रो की साधना जन्मों-जन्म की साधना अपने सदगुरु पर संदेह करने मात्र से नष्ट हो जाती है। तुलसीदास जी कहते हैं-राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अर्थात्: ब्रह्म ने ही परमार्थ के लिए राम रूप धारण किया था। रामनाम की औषधि खरी नियत से खाय।अंगरोग व्यापे नहीं महारोग मिट जाय ।।

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भीम क्यों जला देना चाहते थे युधिष्ठिर के दोनों हाथ?

भीम और युधिष्ठिर | महाभारत के प्रमुख पात्र भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव अपने बड़े भाई युधिष्ठिर का बहुत आदर करते थे। युधिष्ठिर जो आज्ञा देते, उनके भाई उसे किसी भी तरह पूरी करते थे। महाभारत में सभा पर्व में एक प्रसंग ऐसा भी आता है जब भीम युधिष्ठिर पर बहुत गुस्सा हो जाते हैं और सहदेव से अग्नि लाने को कहते हैं, जिससे वे युधिष्ठिर के दोनों हाथ जला सकें।आइए जानते है क्या है यह प्रसंग –जब युधिष्ठिर जुएं में द्रोपदी को हार जाते हैं तो द्रोपदी को भरी सभा में बुला कर उसका अपमान किया जाता है। यह देखकर भीम को बहुत गुस्सा आता हैं। भीम युधिष्ठिर से कहते हैं कि – आपने जुएं में जो धन हारा है, उससे मुझे क्रोध नहीं हैं, लेकिन द्रोपदी को आपने जो दांव पर लगाया है, यह बहुत ही गलत है। भीम कहते हैं कि – द्रोपदी अपमान करने के योग्य नहीं है, लेकिन आपके कारण ये दुष्ट कौरव उसे कष्ट दे रहे यहीं और भरी सभा में अपमानित कर रहे हैं। भीम युधिष्ठिर से कहते हैं कि द्रोपदी की इस दशा का कारण आप है। इसलिए मैं आपके दोनों हाथ जला डालूंगा। भीम सहदेव से आग लाने को कहते हैं। भीम की यह बात सुनकर अर्जुन उन्हें समझाते हैं और कहते हैं कि युधिष्ठिर ने क्षत्रिय धर्म के अनुसार ही जुआ खेला हैं। इसमें इनका कोई दोष नहीं हैं।अर्जुन की बात सुनकर भीम का क्रोध शांत हो गया और वे बोले कि ये बात मैं भी जानता हूं, नहीं तो मैं बलपूर्वक इनके दोनों हाथ अग्नि में जला डालता।

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 निर्जला एकादशी व्रत कथा | व्रत विधि | महत्व

 हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष में चौबीस एकादशियां होती हैं। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी या भीमसेनी एकादशी कहते हैं। इस व्रत में भोजन करना और पानी पीना वर्जित है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इस एकादशी पर व्रत करने से वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य मिलता है। निर्जला एकादशी व्रत विधि | निर्जला एकादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सबसे पहले शेषशायी भगवान विष्णु की पंचोपचार पूजा करें। इसके बाद मन को शांत रखते हुए ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। शाम को पुन: भगवान विष्णु की पूजा करें व रात में भजन कीर्तन करते हुए धरती पर विश्राम करें। दूसरे दिन (6 जून, मंगलवार) किसी योग्य ब्राह्मण को आमंत्रित कर उसे भोजन कराएं तथा जल से भरे कलश के ऊपर सफेद वस्त्र ढक कर और उस पर शर्करा (शक्कर) तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें। इसके अलावा यथाशक्ति अन्न, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखा तथा फल आदि का दान करना चाहिए। इसके बाद स्वयं भोजन करें। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। इस एकादशी का व्रत करने से अन्य तेईस एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाता है-एवं य: कुरुते पूर्णा द्वादशीं पापनासिनीम् ।सर्वपापविनिर्मुक्त: पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ इस प्रकार जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है। निर्जला एकादशी व्रत कथा एक बार जब महर्षि वेदव्यास पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प करा रहे थे। तब महाबली भीम ने उनसे कहा- पितामह। आपने प्रति पक्ष एक दिन के उपवास की बात कही है। मैं तो एक दिन क्या, एक समय भी भोजन के बगैर नहीं रह सकता- मेरे पेट में वृक नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए मुझे कई लोगों के बराबर और कई बार भोजन करना पड़ता है। तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्य व्रत से वंचित रह जाऊंगा? तब महर्षि वेदव्यास ने भीम से कहा- कुंतीनंदन भीम ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला नाम की एक ही एकादशी का व्रत करो और तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होगा। नि:संदेह तुम इस लोक में सुख, यश और मोक्ष प्राप्त करोगे। यह सुनकर भीमसेन भी निर्जला एकादशी का विधिवत व्रत करने को सहमत हो गए और समय आने पर यह व्रत पूर्ण भी किया। इसलिए वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। जानिए निर्जला एकादशी का महत्व 1. निर्जला एकादशी के व्रत से साल की सभी 24 एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है।2. एकादशी व्रत से मिलने वाला पुण्य सभी तीर्थों और दानों से ज्यादा है। मात्र एक दिन बिना पानी के रहने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश हो जाता है।3. व्रती (व्रत करने वाला) मृत्यु के बाद यमलोक न जाकर भगवान के पुष्पक विमान से स्वर्ग को जाता है।4. व्रती को स्वर्ण दान का फल मिलता है। हवन, यज्ञ करने पर अनगिनत फल पाता है। व्रती विष्णुधाम यानी वैकुण्ठ पाता है।5. व्रती चारों पुरुषार्थ यानी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को प्राप्त करता है।6. व्रत भंग दोष- शास्त्रों के मुताबिक अगर निर्जला एकादशी करने वाला व्रती, व्रत रखने पर भी भोजन में अन्न खाए, तो उसे चांडाल दोष लगता है और वह मृत्यु के बाद नरक में जाता है।

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आखिर जनक ने सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश दशरथ को आमंत्रण क्यों नहीं भेजा

 राजा जनक के शासनकाल में एक व्यक्ति का विवाह हुआ। जब वह पहली बार सज-सँवरकर ससुराल के लिए चला, तो रास्ते में चलते-चलते एक जगह उसको दलदल मिला, जिसमें एक गाय फँसी हुई थी, जो लगभग मरने के कगार पर थी। उसने विचार किया कि गाय तो कुछ देर में मरने वाली ही है तथा कीचड़ में जाने पर मेरे कपड़े तथा जूते खराब हो जाएँगे, अतः उसने गाय के ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ गया। जैसे ही वह आगे बढ़ा गाय ने तुरन्त दम तोड़ दिया तथा शाप दिया कि जिसके लिए तू जा रहा है, उसे देख नहीं पाएगा, यदि देखेगा तो वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी। वह व्यक्ति अपार दुविधा में फँस गया और गौ-शाप से मुक्त होने का विचार करने लगा। ससुराल पहुँचकर वह दरवाजे के बाहर घर की ओर पीठ करके बैठ गया और यह विचार कर कि यदि पत्नी पर नजर पड़ी, तो अनिष्ट नहीं हो जाए। परिवार के अन्य सदस्यों ने घर के अन्दर चलने का काफी अनुरोध किया, किन्तु वह नहीं गया और न ही रास्ते में घटित घटना के बारे में किसी को बताया। उसकी पत्नी को जब पता चला, तो उसने कहा कि चलो, मैं ही चलकर उन्हें घर के अन्दर लाती हूँ। पत्नी ने जब उससे कहा कि आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हो, तो भी चुप रहा। काफी अनुरोध करने के उपरान्त उसने रास्ते का सारा वृतान्त कह सुनाया। पत्नी ने कहा कि मैं भी पतिव्रता स्त्री हूँ। ऐसा कैसे हो सकता है? आप मेरी ओर अवश्य देखो। पत्नी की ओर देखते ही उसकी आँखों की रोशनी चली गई और वह गाय के शापवश पत्नी को नहीं देख सका। पत्नी पति को साथ लेकर राजा जनक के दरबार में गई और सारा कह सुनाया। राजा जनक ने राज्य के सभी विद्वानों को सभा में बुलाकर समस्या बताई और गौ-शाप से निवृत्ति का सटीक उपाय पूछा। सभी विद्वानों ने आपस में मन्त्रणा करके एक उपाय सुझाया कि, यदि कोई पतिव्रता स्त्री छलनी मेम गंगाजल लाकर उस जल के छींटे इस व्यक्ति की दोनों आँखों पर लगाए, तो गौ-शाप से मुक्ति मिल जाएगी और इसकी आँखों की रोशनी पुनः लौट सकती है। राजा ने पहले अपने महल के अन्दर की रानियों सहित सभी स्त्रियों से पूछा, तो राजा को सभी के पतिव्रता होने में संदेह की सूचना मिली। अब तो राजा जनक चिन्तित हो गए। तब उन्होंने आस-पास के सभी राजाओं को सूचना भेजी कि उनके राज्य में यदि कोई पतिव्रता स्त्री है, तो उसे सम्मान सहित राजा जनक के दरबार में भेजा जाए। जब यह सूचना राजा दशरथ (अयोध्या नरेश) को मिली, तो उसने पहले अपनी सभी रानियों से पूछा। प्रत्येक रानी का यही उत्तर था कि राजमहल तो क्या आप राज्य की किसी भी महिला यहाँ तक कि झाडू लगाने वाली, जो कि उस समय अपने कार्यों के कारण सबसे निम्न श्रेणि की मानी जाती थी, से भी पूछेंगे, तो उसे भी पतिव्रता पाएँगे। राजा दशरथ को इस समय अपने राज्य की महिलाओं पर आश्चर्य हुआ और उसने राज्य की सबसे निम्न मानी जाने वाली सफाई वाली को बुला भेजा और उसके पतिव्रता होने के बारे में पूछा। उस महिला ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी। तब राजा ने यह दिखाने कर लिए कि अयोध्या का राज्य सबसे उत्तम है, उस महिला को ही राज-सम्मान के साथ जनकपुर को भेज दिया। राजा जनक ने उस महिला का पूर्ण राजसी ठाठ-बाट से सम्मान किया और उसे समस्या बताई। महिला ने कार्य करने की स्वीकृति दे दी। महिला छलनी लेकर गंगा किनारे गई और प्रार्थना की कि, ‘हे गंगा माता! यदि मैं पूर्ण पतिव्रता हूँ, तो गंगाजल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरनी चाहिए।’ प्रार्थना करके उसने गंगाजल को छलनी में पूरा भर लिया और पाया कि जल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरी। तब उसने यह सोचकर कि यह पवित्र गंगाजल कहीं रास्ते में छलककर नीचे नहीं गिर जाए, उसने थोड़ा-सा गंगाजल नदी में ही गिरा दिया और पानी से भरी छलनी को लेकर राजदरबार में चली आयी। राजा और दरबार में उपस्थित सभी नर-नारी यह दृश्य देक आश्चर्यचकित रह गए तथा उस महिला को ही उस व्यक्ति की आँखों पर छींटे मारने का अनुरोध किया और पूर्ण राजसम्मान देकर काफी पारितोषिक दिया। जब उस महिला ने अपने राज्य को वापस जाने की अनुमति माँगी, तो राजा जनक ने अनुमति देते हुए जिज्ञाशावश उस महिला से उसकी जाति के बारे में पूछा। महिला द्वारा बताए जाने पर, राजा आश्चर्यचकित रह गए।सीता स्वयंवर के समय यह विचार कर कि जिस राज्य की सफाई करने वाली इतनी पतिव्रता हो सकती है, तो उसका पति कितना शक्तिशाली होगा? यदि राजा दशरथ ने उसी प्रकार के किसी व्यक्ति को स्वयंवर में भेज दिया, तो वह तो धनुष को आसानी से संधान कर सकेगा और कहीं राजकुमारी किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति को न वर ले, अयोध्या नरेश को राजा जनक ने निमन्त्रण नहीं भेजा, किन्तु विधाता की लेखनी को कौन मिटा सकता है? अयोध्या के राजकुमार वन में विचरण करते हुए अपने गुरु के साथ जनकपुर पहुँच ही गए और धनुष तोड़कर राजकुमार राम ने सीता को वर लिया।

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महाभारत से जुड़े कुछ रोचक किस्से

महाभारत युद्ध में भीम ने दुर्योधन के छोटे भाई दु:शासन का वध किया था। इसके बाद भीम ने छाती फाड़कर उसका खून भी पीया था। ये बात तो सभी जानते हैं, लेकिन इस घटना से जुड़ी कुछ बातें ऐसी भी हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको महाभारत से जुड़ी कुछ ऐसी ही रोचक बातें बता रहे हैं- भीम के दांतों से आगे नहीं गया दु:शासन का खूनमहाभारत के अनुसार, युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव जब धृतराष्ट्र व गांधारी से मिलने गए। गांधारी दुर्योधन के अन्याय पूर्वक किए गए वध से बहुत गुस्से में थीं। भीम ने गांधारी को समझाया कि- यदि मैं अधर्मपूर्वक दुर्योधन को नहीं मारता तो वह मेरा वध कर देता। गांधारी ने कहा कि- तुमने दु:शासन का खून पिया, क्या वह सही था? तब भीम ने कहा कि- जब दु:शासन ने द्रौपदी के बाल पकड़ थे, उसी समय मैंने ऐसी प्रतिज्ञा की थी। यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं करता तो क्षत्रिय धर्म का पालन नहीं कर पाता। लेकिन दु:शासन का खून मेरे दांतों से आगे नहीं गया। काले हो गए थे युधिष्ठिर के नाखूनभीम के बाद युधिष्ठिर गांधारी से बात करने के लिए आगे आए। गांधारी उस सिय में क्रोध में थीं। जैसे ही गांधारी की नजर पट्टी से होकर युधिष्ठिर के पैरों के नाखूनों पर पड़ी, वह काले हो गए। यह देख अर्जुन श्रीकृष्ण के पीछे छिप गए और नकुल, सहदेव भी इधर-उधर हो गए। थोड़ी देर बाद जब गांधारी का क्रोध शांत हो गया, तब पांडवों ने उनसे आशीर्वाद लिया। भीम की हत्या करना चाहते थे धृतराष्ट्रगांधारी से मिलने के बाद पांडव धृतराष्ट्र से मिलने गए। दुर्योधन की मृत्यु को याद कर धृतराष्ट्र भीम का वध करना चाहते थे। श्रीकृष्ण ये बात ताड़ गए और उन्होंने धृतराष्ट्र से गले मिलने के लिए भीम की लोहे की प्रतिमा आगे कर दी। धृतराष्ट्र ने उस लोहे की प्रतिमा को ही भीम समझकर अपनी भुजाओं के बल से तोड़ डाला। उन्हें लगा कि भीम की मृत्यु हो चुकी है। यह सोच कर वे दु:खी हुए। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि धृतराष्ट्र का क्रोध शांत हो गया है, तो उन्होंने कहा कि भीम जीवित है। आपने भीम की प्रतिमा को नष्ट किया है। यह जानकर धृतराष्ट्र को संतोष हुआ। भीम कहते थे धृतराष्ट्र को भला-बुरायुधिष्ठिर के राजा बनने के बाद अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी हमेशा धृतराष्ट्र व गांधारी की सेवा में लगे रहते थे, लेकिन भीम हमेशा धृतराष्ट्र को भला-बुरा कहता रहता था। इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी को पांडवों के साथ रहते-रहते 15 साल गुजर गए। एक दिन भीम ने धृतराष्ट्र व गांधारी के सामने कुछ ऐसी बातें कह दी, जिसे सुनकर उन्हें बहुत दुख हुआ। तब धृतराष्ट्र ने वानप्रस्थ आश्रम (वन में रहना) में जाने का निर्णय लिया। गांधारी ने भी धृतराष्ट्र के साथ वन जाने में सहमति दे दी। धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर, संजय व कुंती भी वन चली गईं। ऐसे हुई विदुरजी की मृत्युधृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती व विदुर वन में रहते हुए कठोर तप कर रहे थे। तब एक दिन युधिष्ठिर सभी पांडवों के साथ उनसे मिलने पहुंचे। धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती के साथ जब युधिष्ठिर ने विदुर को नहीं देखा तो धृतराष्ट्र से उनके बारे में पूछा। धृतराष्ट्र ने बताया कि वे कठोर तप कर रहे हैं। तभी विदुर उसी ओर आते हुए दिखाई दिए, लेकिन आश्रम में इतने सारे लोगों को देखकर विदुरजी पुन: लौट गए। युधिष्ठिर उनसे मिलने के लिए पीछे-पीछे दौड़े। तब वन में एक पेड़ के नीचे उन्हें विदुरजी खड़े हुए दिखाई दिए। उसी समय विदुरजी के शरीर से प्राण निकले और युधिष्ठिर में समा गए। (क्योंकि महात्मा विदुर व युधिष्ठिर धर्मराज (यमराज) के अंश से पैदा हुए थे।) एक रात के लिए जीवित हुए थे सभी योद्धाजब युधिष्ठिर धृतराष्ट्र से मिलने वन में गए, उसी समय आश्रम में महर्षि भी वेदव्यास आ गए। उन्होंने कहा कि- युद्ध में मारे गए जितने भी वीर हैं, उन्हें आज रात तुम सभी देख पाओगे। महर्षि सभी को गंगा तट पर ले गए। रात होने पर महर्षि वेदव्यास ने सभी मृत योद्धाओं का आवाहन किया। थोड़ी ही देर में भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रौपदी के पांचों पुत्र, आदि वीर जल से बाहर निकल आए। अपने मृत परिजनों को देख सभी के मन में हर्ष छा गया। सुबह होने पर वे पुन: अपने लोक में लौट गए। इस प्रकार वह अद्भुत रात समाप्त हुई। कैसे हुई धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती की मृत्यु?महाभारत के अनुसार, युद्ध के बाद धृतराष्ट्र व गांधारी पांडवों के साथ 15 साल तक रहे। इसके बाद वे कुंती, विदुर व संजय के साथ वन में तपस्या करने चले गए। एक दिन जब वे गंगा स्नान कर आश्रम आ रहे थे, तभी वन में भयंकर आग लग गई। दुर्बलता के कारण धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती भागने में असमर्थ थे। इसलिए उन्होंने उसी अग्नि में प्राण त्यागने का विचार किया और वहीं एकाग्रचित्त होकर बैठ गए। इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती ने अपने प्राणों का त्याग कर दिया।

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भीम, हनुमान और पुरुषमृगा हनुमान ने भीम को क्यों दिए अपने तीन बाल

एक बार पांडवों के पास नारद मुनि आए और उन्होंने युधिष्ठर से कहा की स्वर्ग में आपके पिता पांडु दुखी हैं। कारण पूछने पर उन्होंने कहा की पांडु अपने जीते जी राजसूय यज्ञ करना चाहते थे जो न कर सके ऐसे में आपको ऐसा कर उनकी आत्मा को शांति पहुंचना चाहिए।तब पांडवो ने राजसूय यज्ञ आयोजित किया, आयोजन को भव्य बनाने के लिए युधिष्ठर ने यज्ञ में भगवान शिव के परम भक्त ऋषि पुरुष मृगा को आमंत्रित करने का फैसला किया। ऋषि पुरुष मृगा जन्म से ही अपने नाम के जैसे थे। उनका आधा शरीर पुरुष का था और पैर मृग के समान थे। उन्हें ढूंढने और बुलाने का जिम्मा भीम को सौंपा गया। जब भीम, पुरुषमृगा की खोज में निकलने लगे तो श्री कृष्ण ने भीम को चेताया की यदि तुम पुरुषमृगा की गति का मुकाबला नहीं कर पाए तो वो तुम्हें मार देगा। इस बात से भयभीत भीम, पुरुषमृगा की खोज में हिमालय की ओर चल दिए। जंगल से गुजरते वक़्त उन्हें हनुमान जी मिले। हनुमान जी ने भीम से उसके चिंतित होने का कारण पूछा। भीम ने हनुमान को पूरी कहानी बताई। हनुमान ने कहा यह सच है कि पुरुषमृगा की गति बहुत तेज है और उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। उसकी गति मंद करने का एक ही उपाय है। चूँकि वो शिवजी का परम भक्त है इसलिए यदि हम उसके रास्ते में शिवलिंग बना दे तो वो उनकी पूजा करने अवश्य रुकेगा। हनुमान ने ऐसा कहकर भीम को अपने 3 केश* दिए और कहा की जब भी लगे कि पुरुषमृगा तुम्हें पकड़ने वाले है तो तुम एक बाल वहां गिरा देना। यह एक बाल 1000 शिवलिंगों में परिवर्तित हो जाएगा। पुरुषमृगा अपने स्वाभाव अनुसार हर शिवलिंग की पूजा करेंगे और तुम आगे निकल जाना। उसके बाद भीम आज्ञा लेकर आगे बढ़े. कुछ दूर जाकर ही भीम को पुरुष मृगा मिल गए जो को भगवान महादेव की स्तुति कर रहे थे। भीम ने उन्हें प्रणाम किया और अपने आने का कारण बताया, इस पर ऋषि ने सशर्त जाने के लिए हां कर दी। शर्त ये थी की भीम को उनसे पहले हस्तिनापुर पहुंचाना था और अगर वो ऐसा न कर सके तो ऋषि पुरुष मृगा भीम को खा जाएंगे. भीम ने भाई की इच्छा को ध्यान में रखते हुए हां कर दी और हस्तिनापुर की तरफ पुरे बल से दौड़ पड़े। काफी दौड़ने के बाद भीम ने भागते भागते ही पलट कर देखा की पुरुषमृगा पीछे आ रहे है या नहीं, तो चौंक गए की पुरुषमृगा उसे बस पकड़ने वाले ही हैं। तभी भीम को हनुमान के बाल याद आए और उनमे से एक को गिरा दिया, गिरा हुआ बाल हज़ार शिवलिंगो में बदल गया। शिव के परमभक्त होने के नाते पुरुषुमृगा हर शिवलिंग को प्रणाम करने लगे और भीम भागता रहा। ऐसा भीम ने तीन बार किया और जब वो हस्तिनापुर के द्वार में घुसने ही वाला था तो पुरुषमृगा ने भीम को पकड़ लिया, हालांकि भीम ने छलांग लगाई थी पर उसके पैर दरवाजे के बाहर ही रह गए। इस पर पुरुषमृगा ने भीम को खाना चाहा, इसी दौरान कृष्णा और युधिष्ठर द्वार पर पहुंच गए। दोनों को देख कर भीम ने भी बहस शुरू कर दी, तब युधिष्ठर से पुरुषमृगा ने न्याय करने को कहा। तब युधिष्ठर ने कहा की भीम के पांव द्वार के बाहर रह गए थे। इसलिए आप सिर्फ भीम के पैर ही खाने के हक़दार है, युधिष्ठर के न्याय से पुरुषमृगा प्रसन्न हुए और भीम को बक्श दिया। उन्होंने राजसूय यज्ञ में भाग लिया और सबको आशीर्वाद भी दिया।(*कई जगह ऐसा भी वर्णित है कि हनुमना ने भीम को हज़ारों बालो का एक गुच्छा दिया था और हर बाल नीचे गिराने पर एक शिवलिंग में बदल गया था। )

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जब श्रीकृष्ण के परम भक्त नरसी मेहता ने धन के लिए गिरवी रखा मूंछ का बाल

भगवान श्रीकृष्ण के महान भक्तों में नरसी मेहता का नाम जरूर लिया जाता है। उनकी भक्ति के साथ ही दानी स्वभाव के कारण भी वे बहुत प्रसिद्ध हैं। नरसीजी ने भगवान कृष्ण की भक्ति में अपना सबकुछ दान कर दिया था। मान्यता है कि इस महान भक्त के वश में होकर ही कृष्ण ने नानी बाई का मायरा भरा था। इसकी कथा तो आप सभी लोग जानते होंगे, हम आप सभी को यहाँ नरसी मेहता की एक दूसरी रोचक कथा बता रहे हैं।इस कथा के अनुसार, नरसीजी अपना सबकुछ दान करने के बाद जब साधु-संतों के साथ तीर्थयात्रा कर रहे थे तो उनकी मुलाकात कुछ याचकों से हुई। वे उनसे धन, भोजन और जीवन के लिए जरूरी चीजें मांगने लगे। चूंकि भक्त नरसी अपना सर्वस्व दान कर ही चुके थे, इसलिए वे धन देने में समर्थ नहीं थे। आखिरकार उन्हें एक उपाय सूझा। वे एक साहूकार के पास गए और अपनी मूंछ का एक बाल उसके पास गिरवी रख आए। उस जमाने में मूंछ के बाल को भी प्रतिष्ठा और सत्यनिष्ठा का प्रतीक समझा जाता था।साहूकार ने उन्हें मूंछ के बाल के बदले कर्ज दे दिया। नरसीजी ने वह पूरा धन याचकों को दे दिया। इस घटना को जब एक व्यक्ति ने देखा तो उसे लालच हो गया। वह भी इसी तरीके से धन पाना चाहता था। मौका देखकर वह उसी साहूकार के पास गया और बोला- मुझे भी मूंछ के बाल के बदले उतना ही धन दे दीजिए जितना कि आपने नरसी को दिया था। साहूकार ने सहमति जता दी। उसने मूंछ का बाल मांगा। व्यक्ति ने मूंछ का बाल दिया, लेकिन साहूकार संतुष्ट नहीं हुआ। उसने कहा- ये बाल सीधा नहीं है, इसमें अमुक कमी है। कोई दूसरा दीजिए।धन के लोभ में वह व्यक्ति मूंछ के बाल उखाड़कर देता रहा और साहूकार कमियां निकालता रहा। आखिर उस व्यक्ति ने पूछा- मुझे मूंछ का बाल तोड़ने में जो दर्द हो रहा है, उसका आपको अंदाजा भी नहीं है। मेरी आंखों में आंसू आ गए हैं।साहूकार ने कहा- मित्र, तुम्हारी मूंछ का बाल इस योग्य ही नहीं कि मैं उसे गिरवी रखकर एक फूटी कौड़ी भी दे दूं। मैंने नरसी को भी इसी तरह परखा था, परंतु उसने अपनी तकलीफ की परवाह नहीं की। उसके लिए तो याचकों का अभाव ही सबसे बड़ा दर्द था। इसलिए मैंने उसके मूंछ के बाल के बदले धन दे दिया। जिसमें दीन-दुखी के लिए इतना समर्पण हो, उसे मानव ही नहीं ईश्वर भी इंकार नहीं कर सकता।

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पद्म पुराण की कथा | जानिए क्यों स्वयं श्रीराम ने तोड़ दिया था रामसेतु

वाल्मीकि रामायण के अनुसार लंका पर चढ़ाई करते समय भगवान श्रीराम के कहने पर वानरों और भालुओं ने रामसेतु का निर्माण किया था, ये बात हम सभी जानते हैं। लेकिन जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही तोड़ दिया था, ये बात बहुत कम लोग जानते हैं। इससे जुड़ी कथा का वर्णन पद्म पुराण के सृष्टि खंड में मिलता है। श्रीराम इसलिए गए थे लंकापद्म पुराण के अनुसार, अयोध्या का राजा बनने के बाद एक दिन भगवान श्रीराम को विभीषण का विचार आया। उन्होंने सोचा कि- रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं, उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है। जब श्रीराम ये सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए। भरत के पूछने पर श्रीराम उन्हें पूरी बात बताई। ऐसा विचार मन में आने पर श्रीराम लंका जाने की सोचते हैं। भरत भी उनके साथ जाने को तैयार हो जाते हैं। अयोध्या की रक्षा का भार लक्ष्मण को सौंपकर श्रीराम व भरत पुष्पक विमान पर सवार होकर लंका जाते हैं। जब श्रीराम से मिले सुग्रीव और विभीषणजब श्रीराम व भरत पुष्पक विमान से लंका जा रहे होते हैं, रास्ते में किष्किंधा नगरी आती है। श्रीराम व भरत थोड़ी देर वहां ठहरते हैं और सुग्रीव से अन्य वानरों से भी मिलते हैं। जब सुग्रीव को पता चलता है कि श्रीराम व भरत विभीषण से मिलने लंका जा रहे हैं, तो वे उनके साथ हो जाते हैं। रास्ते में श्रीराम भरत को वह पुल दिखाते हैं, जो वानरों व भालुओं ने समुद्र पर बनाया था। जब विभीषण को पता चलता है कि श्रीराम, भरत व सुग्रीव लंका आ रहे हैं तो वे पूरे नगर को सजाने के लिए कहते हैं। विभीषण श्रीराम, भरत व सुग्रीव से मिलकर बहुत प्रसन्न होते हैं। श्रीराम ने इसलिए तोड़ा था सेतुश्रीराम तीन दिन तक लंका में ठहरते हैं और विभीषण को धर्म-अधर्म का ज्ञान देते हैं और कहते हैं कि तुम हमेशा धर्म पूर्वक इस नगर पर राज्य करना। जब श्रीराम पुन: अयोध्या जाने के लिए पुष्पक विमान पर बैठते हैं तो विभीषण उनसे कहता है कि- श्रीराम आपने जैसा मुझसे कहा है, ठीक उसी तरह मैं धर्म पूर्वक राज्य करूंगा। लेकिन इस सेतु (पुल) के मार्ग से जब मानव यहां आकर मुझे सताएंगे, उस स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए। विभीषण के ऐसा कहने पर श्रीराम ने अपने बाणों से उस सेतु के दो टुकड़े कर दिए। फिर तीन भाग करके बीच का हिस्सा भी अपने बाणों से तोड़ दिया। इस तरह स्वयं श्रीराम ने ही रामसेतु तोड़ा था।

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जानिए शनिदेव कैसे हुए लंगड़े

ज्योतिष शास्त्रानुसार शनि एक धीमी गति से चलने वाला ग्रह है। शनिदेव को एक राशि को पार करने में लगभग ढा़ई वर्ष का समय लगता है। पौराणिक शास्त्रानुसार शनिदेव लंगड़ाकर चलते हैं जिस कारण उनकी चलने की गति धीमी है।आखिर शनि देव लंगड़े कैसे हुए, इसके बारे शास्त्रों में एक रोचक कथा दी हुई है। कथानुसार शनिदेव की सौतेली मां के कारण शनिदेव को लगा श्राप और शनिदेव हो गए मंदगामी। आइए जानते हैं शनिदेव के जीवन से जुड़ा यह रहस्य। सूर्य देव का तेज सहन न कर पाने की वजह से उनकी पत्नी संज्ञा (छाया) देवी ने अपने शरीर से अपने जैसी ही एक प्रतिमूर्ति तैयार की और उसका नाम स्वर्णा रखा। संज्ञा देवी ने स्वर्णा को आज्ञा दी कि तुम मेरी अनुपस्थिति में मेरी सारी संतानों की देखरेख करते हुए सूर्यदेव की सेवा करो और पत्नी सुख भोगो। ये आदेश देकर वह अपने पिता के घर चली गई। स्वर्णा ने भी अपने आप को इस तरह ढाला कि सूर्यदेव भी यह रहस्य न जान सके। इस बीच सूर्यदेव से स्वर्णा को पांच पुत्र व दो पुत्रियां हुई। स्वर्णा अपने बच्चों पर अधिक और संज्ञा की संतानों पर कम ध्यान देने लगी। एक दिन संज्ञा के पुत्र शनि को तेज भूख लगी, तो उसने स्वर्णा से भोजन मांगा। तब स्वर्णा ने कहा कि अभी ठहरो, पहले मैं भगवान का भोग लगा लूं और तुम्हारे छोटे भाई बहनों को खाना खिला दूं, फिर तुम्हें भोजन दूंगी। यह सुन शनि को क्रोध आ गया और उन्होंने भोजन पर लात मरने के लिए अपना पैर उठाया तो स्वर्णा ने शनि को श्राप दे दिया कि तेरा पांव अभी टूट जाए। माता का श्राप सुनकर शनिदेव डरकर अपने पिता के पास गए और सारा किस्सा कह दिया। सूर्यदेव समझ गए कि कोई भी माता अपने बच्चे को इस तरह का श्राप नहीं दे सकती। तब सूर्यदेव ने क्रोध में आकर पूछा कि बताओ तुम कौन हो? सूर्य का तेज देखकर स्वर्णा घबरा गई और सारी सच्चाई बता दी। तब सूर्य देव ने शनि को समझाया कि स्वर्णा तुम्हारी माता तो नहीं है परंतु मां के समान है इसलिए उसका श्राप व्यर्थ तो नहीं होगा परंतु यह उतना कठोर नहीं होगा कि टांग पूरी तरह से अलग हो जाएं। हां, तुम आजीवन एक पांव से लंगड़ाकर चलते रहोगे। यही कारण हैं शनिदेव की मंदगति का। पिप्पलाद मुनि से जुडी है एक अन्य कथा पुराणों के अनुसार, भगवान शंकर ने अपने परम भक्त दधीचि मुनि के यहां पुत्र रूप में जन्म लिया। भगवान ब्रह्मा ने इनका नाम पिप्पलाद रखा, लेकिन जन्म से पहले ही इनके पिता दधीचि मुनि की मृत्यु हो गई। युवा होने पर जब पिप्पलाद ने देवताओं से अपने पिता की मृत्यु का कारण पूछा तो उन्होंने शनिदेव की कुदृष्टि को इसका कारण बताया। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए और उन्होंने शनिदेव के ऊपर अपने ब्रह्म दंड का प्रहार किया। शनिदेव ब्रह्म दंड का प्रहार नहीं सह सकते थे इसलिए वे उससे डर कर भागने लगे। तीनों लोगों की परिक्रमा करने के बाद भी ब्रह्म दंड ने शनिदेव का पीछा नहीं छोड़ा और उनके पैर पर आकर लगा। मुनि पिप्पलाद द्वारा फेंके गए ब्रह्म दंड के पैर पर लगने से शनिदेव लंगड़े हो गए। तब देवताओं ने पिप्पलाद मुनि से शनिदेव को क्षमा करने के लिए कहा। देवताओं ने कहा कि शनिदेव तो न्यायाधीश हैं और वे तो अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। आपके पिता की मृत्यु का कारण शनिदेव नहीं है। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक के शिवभक्तों को कष्ट नहीं देंगे, यदि ऐसा हुआ तो शनिदेव भस्म हो जाएंगे। तभी से पिप्पलाद मुनि का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। ।। जय शनि देव ।।

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कहानी जयद्रथ कि – बेटे कि मृत्यु के साथ ही फट गया था पिता का भी मस्तक

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में अनेक ऐसे पात्र हैं, जिनके बारे में लोग कम ही जानते हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही पात्र जयद्रथ के बारे में बता रहे हैं। जयद्रथ की मृत्यु अर्जुन के हाथों हुई थी। अर्जुन ने जयद्रथ का सिर इस प्रकार काटा था कि वह जाकर तपस्या कर रहे वृद्धक्षत्र (जयद्रथ के पिता) की गोद में गिरा। जैसे ही वृद्धक्षत्र ने जयद्रथ का मस्तक पृथ्वी पर गिराया, उनका सिर भी फट गया। कौन था जयद्रथ?जयद्रथ सिंधु देश का राजा था। उसका विवाह कौरवों की बहन दु:शला से हुआ था। महाभारत के अनुसार, जब पांडव 12 वर्ष के वनवास पर थे, तब एक दिन राजा जयद्रथ उसी जंगल में गुजरा, जहां पांडव रह रहे थे। उस समय आश्रम में द्रौपदी को अकेला देख जयद्रथ ने उसका हरण कर लिया। जब पांडवों को यह बात पता चली तो उन्होंने पीछा कर जयद्रथ को पकड़ लिया। भीम जयद्रथ का वध करना चाहते थे, लेकिन कौरवों की बहन दु:शला का पति होने के कारण अर्जुन ने उन्हें रोक दिया। गुस्से में आकर भीम ने जयद्रथ के बाल मूंडकर पांच चोटियां रख दी। जयद्रथ की ऐसी हालत देखकर युधिष्ठिर को उस पर दया आ गई और उन्होंने जयद्रथ को मुक्त कर दिया। जयद्रथ ने लिया था महादेव से वरदानपांडवों से पराजित होकर जयद्रथ अपने राज्य नहीं गया। अपने अपमान का बदला लेने के लिए वह हरिद्वार जाकर भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या करने लगा। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने के लिए कहा। जयद्रथ ने भगवान शिव से युद्ध में पांडवों को जीतने का वरदान मांगा। तब भगवान शिव ने जयद्रथ से कहा कि- पांडवों से जीतना या उन्हें मारना किसी के भी बस में नहीं है। लेकिन युद्ध में केवल एक दिन तुम अर्जुन को छोड़ शेष चार पांडवों को युद्ध में पीछे हटा सकते हो। क्योंकि अर्जुन स्वयं भगवान नर का अवतार है इसलिए उस पर तुम्हारा वश नहीं चलेगा। ऐसा कहकर भगवान शंकर अंतर्धान हो गए और जयद्रथ अपने राज्य में लौट गया। जयद्रथ के कारण ही हुई थी अभिमन्यु की मृत्युमहाभारत युद्ध में जब गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह बनाया तो उसके मुख्य द्वार पर जयद्रथ को नियुक्त किया। योजना के अनुसार, संशप्तक योद्धा अर्जुन को युद्ध के लिए दूर ले गए। जब युधिष्ठिर ने देखा कि चक्रव्यूह के कारण उनके सैनिक मारे जा रहे हैं तो उन्होंने अभिमन्यु से इस व्यूह को तोड़ने के लिए कहा। अभिमन्यु ने कहा कि- मुझे इस व्यूह में प्रवेश करना तो आता है, लेकिन इससे बाहर निकलने का उपाय मुझे नहीं पता। तब युधिष्ठिर व भीम ने अभिमन्यु को विश्वास दिलाया कि तुम जिस स्थान से व्यूह भंग करोगे, हम भी उसी स्थान से व्यूह में प्रवेश कर जाएंगे और व्यूह का विध्वंस कर देंगे। युधिष्ठिर व भीम की बात मानकर अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदकर उस में प्रवेश कर गया, लेकिन महादेव के वरदान से युधिष्ठिर, भीम, नकुल व सहदेव आदि वीरों को जयद्रथ ने बाहर ही रोक दिया। चक्रव्यूह में फंसकर अभिमन्यु की मृत्यु हो गई। श्रीकृष्ण ने माया से उत्पन्न कर दिया अंधकारअर्जुन को जब पता चला कि अभिमन्यु की मृत्यु का कारण जयद्रथ है तो उन्होंने प्रतिज्ञा की कि- कल निश्चय ही मैं जयद्रथ का वध कर डालूंगा या स्वयं अग्नि समाधि ले लूंगा। जयद्रथ की रक्षा के लिए गुरु द्रोणाचार्य ने अगले दिन चक्र शकटव्यूह की रचना की। शाम तक युद्ध करने के बाद भी अर्जुन जयद्रथ तक नहीं पहुंच पाया क्योंकि उसकी रक्षा कर्ण, अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, शल्य आदि महारथी कर रहे थे। जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि सूर्य अस्त होने वाला है तब उन्होंने अपनी माया से सूर्य को ढ़कने के लिए अंधकार उत्पन्न कर दिया। सभी को लगा कि सूर्य अस्त हो गया है। यह देखकर जयद्रथ व उसके रक्षक असावधान हो गए। जयद्रथ स्वयं अर्जुन के सामने आ गया और उससे अग्नि समाधि लेने के लिए कहने लगा। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तुरंत जयद्रथ का वध कर दो। इसलिए फटा जयद्रथ के पिता का मस्तकश्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक गुप्त बात बताई कि जयद्रथ के पिता वृद्धक्षत्र ने उसे वरदान दिया है कि जो भी वीर इसका सिर पृथ्वी पर गिराएगा, उसके मस्तक के भी सौ टुकड़े हो जाएंगे। इसलिए तुम इस प्रकार बाण चलाओ कि जयद्रथ का मस्तक कट कर उसके पिता की गोद में गिरे। वे इस समय समंतकपंचक क्षेत्र में तपस्या कर रहे हैं।अर्जुन ने अमोघ तीर चलाकर जयद्रथ का मस्तक काट दिया, यह मस्तक सीधे वृद्धक्षत्र की गोद में जाकर गिरा। जैसे ही उन्होंने जयद्रथ का मस्तक पृथ्वी पर गिराया, उनके मस्तक के सौ टुकड़े हो गए। इस प्रकार अर्जुन ने जब जयद्रथ का वध कर दिया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी माया से उत्पन्न अंधकर दूर कर दिया।

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कूर्म जयंती | भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की कहानी

वैशाख मास की पूर्णिमा पर कूर्म जयंती का पर्व मनाया जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लिया था तथा समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। कूर्मावतार भगवान के प्रसिद्ध दस अवतारों में द्वितीय अवतार है, और २४ अवतारों में ग्यारहवा अवतार है। कूर्म अवतार की कहानी (Kurma Avatar Story) – एक समय की बात है कि महर्षि दुर्वासा देवराज इंद्र से मिलाने के लिये स्वर्ग लोक में गये। उस समय देवताओं से पूजित इंद्र ऐरावत हाथी पर आरूढ़ हो कहीं जाने के लिये तैयार थे। उन्हें देख कर महर्षि दुर्वासा का मन प्रसन्न हो गया और उन्होंने विनीत भाव से देवराज को एक पारिजात-पुष्पों की माला भेंट की।देवराज ने माला ग्रहण तो कर ली, किन्तु उसे स्वयं न पहन कर ऐरावत के मस्तक पर डाल दी और स्वयं चलने को उद्यत हुए। हाथी मद से उन्मत्त हो रहा था उसने सुगन्धित तथा कभी म्लान न होने वाली उस माला को सूंड से मस्तक पर से खींच कर मसलते हुए फेंक दिया और पैरों से कुचल डाला। यह देखकर ऋषि दुर्वासा अत्यंत क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने शाप देते हुए कहा- रे मूढ़! तुमने मेरी दी हुई माला का कुछ भी आदर नहीं किया। तुम त्रिभुवन की राजलक्ष्मी से संपन्न होने के कारण मेरा अपमान करते हो, इसलिये जाओ आज से तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो जायेगी और यह तुम्हारा यह वैभव भी श्रीहीन हो जाएगा। इतना कहकर दुर्वासा ऋषि शीघ्र ही वहाँ से चल दिये। श्राप के प्रभाव से इन्द्रादि सभी देवगण एवं तीनों लोकश्रीहीन हो गये। यह दशा देख कर इन्द्रादि देवता अत्यंत दु:खी हो गये। महर्षि का शाप अमोघ था, उन्हें प्रसन्न करने की सभी प्राथनाएं भी विफल हो गयीं। तब असहाय, निरुपाय तथा दु:खी देवगण, ऋषि-मुनि आदि सभी प्रजापति ब्रह्माजी के पास गये। ब्रह्मा जी ने उन्हें साथ लेकर वैकुण्ठ में श्री नारायण के पास पहुंचे और सभी ने अनेक प्रकार से नारायण की स्तुति की और बताया कि “प्रभु” एक तो हम दैत्यों के द्वारा अत्यंत कष्ट में हैं और इधर महर्षि के शाप से श्रीहीन भी हो गये हैं।आप शरणागतों के रक्षक हैं, इस महान कष्ट से हमारी रक्षा कीजिये। स्तुति से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने गंभीर वाणी में कहा- तुम लोग समुद्र का मंथर करो, जिससे लक्ष्मी तथा अमृत की प्राप्ति होगी, उसे पीकर तुम अमर हो जाओगे, तब दैत्य तुम्हारा कुछ भी अनिष्ट न कर सकेंगे। किन्तु यह अत्यंत दुष्कर कार्य है, इसके लिये तुम असुरों को अमृत का प्रलोभन देकर उनके साथ संधि कर लो और दोनों पक्ष मिलकर समुद्र मंथन करो। यह कहकर प्रभु अन्तर्हित हो गये। प्रसन्नचित्त इन्द्रादि देवों ने असुरराज बलि तथा उनके प्रधान नायकों को अमृत का प्रलोभन देकर सहमत कर लिया। मथानी के लिये मंदराचल का सहारा लिया और वासुकिनाग की रस्सी बनाकर सिर की ओर दैत्यों ने तथा पूछ की ओर देवताओं ने पकड़ कर समुद्र का मंथन आरम्भ कर दिया। किन्तु अथाह सागर में मंदरगिरी डूबता हुआ रसातल में धसने लगा। यह देखकर अचिन्त्य शक्ति संपन्न लीलावतारी भगवान श्रीहरि ने कूर्मरूप धारण कर मंदराचल पर्वत अपनी पीठ पर धारण कर लिया। भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घूमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ।

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नृसिंह चतुर्दशी : व्रत पूजन विधि और कथा

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नृसिंह चतुर्दशी कहते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इसी तिथि को भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस दिन भगवान नृसिंह को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखा जाता है व पूजा भी की जाती है। व्रत व पूजा की विधि इस प्रकार है- व्रत व पूजा विधिनृसिंह चतुर्दशी की सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद व्रत के लिए संकल्प लें। इसके बाद दोपहर में नदी, तालाब या घर पर ही वैदिक मंत्रों के साथ मिट्टी, गोबर, आंवले का फल और तिल लेकर उनसे सब पापों की शांति के लिए विधिपूर्वक स्नान करें। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर संध्या तर्पण करें। अब पूजा स्थल को गाय के गोबर से लीप कर उस पर अष्ट दल (आठ पंखुड़ियों वाला) कमल बनाएं। कमल के ऊपर पंचरत्न सहित तांबे का कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर चावलों से भरा हुआ बर्तन रखें और बर्तन में अपनी इच्छा के अनुसार सोने की लक्ष्मी सहित भगवान नृसिंह की प्रतिमा रखें। इसके बाद दोनों मूर्तियों को पंचामृत से स्नान करवाएं। योग्य विद्वान ब्राह्मण (आचार्य) को बुलाकर उनके हाथों फूल व षोडशोपचार सामग्रियों से विधिपूर्वक भगवान नृसिंह का पूजन करवाएं। भगवान नृसिंह को चंदन, कपूर, रोली व तुलसीदल भेंट करें तथा धूपदीप दिखाएं। इसके बाद घंटी बजाकर आरती उतारें और नीचे लिखे मंत्र के साथ भोग लगाएं- नैवेद्यं शर्करां चापि भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्।ददामि ते रमाकांत सर्वपापक्षयं कुरु।। अब भगवान नृसिंह से सुख की कामना करें। रात में जागरण करें तथा भगवान नृसिंह की कथा सुनें। दूसरे दिन यानी पूर्णिमा पर स्नान करने के बाद फिर से भगवान नृसिंह की पूजा करें। ब्राह्मणों को दान दें उन्हें भोजन करवाएं व दक्षिणा भी दें। इसके बाद पुन: भगवान नृसिंह से मोक्ष की प्रार्थना करें। अंत में आचार्य (पूजन करने वाला ब्राह्मण) को दक्षिणा से संतुष्ट करके विदा करें। इसके बाद स्वयं भोजन करें। धर्म ग्रंथों के अनुसार, जो इस प्रकार नृसिंह चतुर्दशी के पर्व पर भगवान नृसिंह की पूजा करता है, उसके मन की हर कामना पूरी हो जाती है। उसे मोक्ष की प्राप्ति भी होती है नृसिंह अवतार की कहानीदैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से भी अधिक बलवान मानता था। उसे मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था। उसके राज्य में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था, उसको दंड दिया जाता था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकशिपु को पता चली तो पहले उसने प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया। लेकिन हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई।तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था, तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वध कर दिया।

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