कब है रंग पंचमी? जानिए, शुभ मुहूर्त, महत्व और उपाय

चैत्र मास की पंचमी तिथि को रंग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा से होली का त्योहार आरंभ होता है जो कि रंगपंचमी तक मनाया जाता है। रंगपंचमी को श्रीपंचमी और देवपंचमी भी कहा जाना जाता है। इस दिन देवी-देवता भी रंगोत्सव मनाते हैं। रंगपंचमी का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल होलिका दहन 7 मार्च को होगी। इसके अगले दिन यानी 8 मार्च को होली खेली जाएगी। वहीं इसके पांच दिन बाद यानी 12 मार्च को रंगपंचमी का त्योहार मनाया जाएगा। जानिए रंगपंचमी का शुभ मुहूर्त, महत्व और उपाय।  रंग पंचमी का महत्व रंग पंचमी के दिन एक-दूसरे को गुलाल लगाने का विधान है। इस दिन रंगों से नहीं बल्कि गुलाल से होली खेली जाती है। इस दिन हुरियारे गुलाल उड़ाते हैं। मान्यता है इस दिन इस दिन देवी-देवता भी पृथ्वी पर आकर आम मनुष्य के साथ गुलाल खेलते हैं। इस दिन श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु को पीला रंग अर्पित करना चाहिए। वहीं विशेष प्रकार के पकवान बनाएं और भगवान को भोग लगाने चाहिए। रंगपंचमी से जुड़ी पौराणिक कथा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रंगपंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने राधारानी के साथ होली खेली थी। इसी कारण इस दिन विधि-विधान से राधा-कृष्ण का पूजा करने के बाद गुलाल आदि अर्पित करके खेला जाता है। दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार, होलाष्टक के दिन भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था जिसके कारण देवलोक में सब दुखी थे। लेकिन देवी रति और देवताओं की प्रार्थना पर कामदेव को दोबारा जीवित कर देने का आश्वासन भगवान शिव ने दिया तो सभी देवी-देवता प्रसन्न हो गए और रंगोत्सव मनाने लगे। इसके बाद से ही पंचमी तिथि को रंगपंचमी का त्योहार मनाया जाने लगा। सोते समय इन 4 चीजों को रखना होता है बहुत शुभ, जानिए कौन-कौन सी होती हैं ये चीजें र व्यक्ति अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की इच्छा रखता है। जब व्यक्ति के जीवन में सुख और शांति रहती है तो व्यक्ति के मन में हमेशा ही सकारात्मकता का रहता है। हमारे शास्त्रों में जीवन को खुशहाल और समृद्धिशाली बनाने के लिए कई तरह के उपाय बताए गए हैं जिनका पालन करने पर जीवन में हमेशा ही सुख और शांति रहती है। वास्तु में रात में सोने के दौरान कुछ नियम बनाए गए हैं जिसका पालन करने पर हर व्यक्ति को फायदा जरूर मिलता है। किस दिशा में सिर रखकर सोने से क्या प्रभाव स्मृति को बढ़ाती है पूर्व दिशादेवताओं के राजा इंद्र पूर्व दिशा के स्वामी कहे गए हैं। सुबह उठते ही इस दिशा के दर्शन करने से देवेंद्र से अपनी सम्पन्नता के लिए आशीर्वाद लेने के समान पुण्यकार्य है।इस दिशा में सिर करके सोने से स्मृति,एकाग्रता एवं  स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है और मनुष्य का आध्यात्मिकता के प्रति झुकाव बढ़ता है।वास्तु के अनुसार छात्रों को स्मृति में वृद्धि एवं एकाग्रता बढ़ाने के लिए पूर्व दिशा में सिर करके सोना लाभकारी हो सकता है। पश्चिम दिशा है अनुकूलजल के अधिपति देवता वरुण पश्चिम दिशा के स्वामी कहे गए हैं जो हमारी आत्मा,आध्यात्मिक भावना एवं विचारों को प्रभावित करते हैं। वास्तु के अनुसार पश्चिम दिशा में सिर करके सोना भी अनुकूल है क्योंकि यह दिशा नाम,प्रसिद्धि,प्रतिष्ठा और समृद्धि को बढ़ाती है। श्रेष्ठ है दक्षिण दिशामृत्यु के देवता यम दक्षिण दिशा के स्वामी हैं, इस दिशा में सिर करके सोना सबसे अच्छा है। वास्तु में कहा गया है कि ‘स्वस्थ आयु चाहने वाले मनुष्य को सदैव अपना सिर दक्षिण में एवं पैर उत्तर दिशा की और करके सोना चाहिए’। इस दिशा की ओर सिर करके सोने से व्यक्ति को धन, ख़ुशी, समृद्धि एवं यश की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति गहरी नींद में आराम से सोता है। कभी नहीं सोए उत्तर दिशा मेंधन के अधिपति देवता कुबेर उत्तर दिशा के स्वामी हैं। वास्तु के अनुसार इस दिशा में सिर करके सोने से नींद बाधित होती है जिस कारण सिरदर्द रह सकता है।जो लोग उत्तर की तरफ सिर एवं दक्षिण की तरफ पैर रखकर सोते हैं ऐसे लोग रातभर करवटें बदलते रहेंगे,सुबह उठकर भी आलस्य बना रहेगा।मानसिक बीमारियों की संभावना बढ़ जाएगी अतः वास्तु की मानें तो इस दिशा में सिर करके कभी न सोएं।

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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी आज, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और चंद्रोदय समय

फाल्गुन माह में कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस बार फाल्गुन मास की द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत 9 फरवरी दिन गुरुवार को रखा जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन विधि-विधान से गौरी पुत्र श्री गणेश की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से गणपति बप्पा की पूजा अर्चना करता है, उसके जीवन से सभी दुख और संकट दूर हो जाते हैं। साथ ही जीवन में मंगल का आगमन होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी का आशय संकट को रहने वाली चतुर्थी तिथि से है। ऐसे में आइए जानते हैं संकष्टी चतुर्थी का मुहूर्त, व्रत विधि और इसका महत्व क्या है द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2023 तिथि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पूजा-विधि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्वफाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का शास्त्रों में विशेष महत्व है। इस दिन पूरे विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा और व्रत किया जाता है। भगवान गणेश देवताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं और सर्वप्रथम पूजनीय हैं। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से जातक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं और सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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इस कथा से करें होलिका माता की पूजा, होगी मनोकामनाएं पूरी

किसी भी पर्व पर पूजा-पाठ के साथ ही कथा का भी विशेष महत्‍व होता है। होलिका दहन के समय भी कथा करने का विधान है। मान्‍यता है इस दिन होलिका दहन की कथा करके पूजा होलिका दहन पर पढ़ें ये पौराणिक कथा होलिका दहन के मौके पर असुर राज हिरण्‍यकश्‍यप की कथा पढ़ी जाती है। इसके मुताबिक हिरण्‍यकश्‍यप काफी बलशाली असुर था। यही वजह थी कि उसको अपनी शक्तियों का भी खूब गुमान था। उसका यह अभिमान इस कदर बढ़ गया था कि उसने संपूर्ण प्रजा को उसे भगवान मानकर पूजा करने का आदेश दे डाला। उसने यह भी कहा कि अगर उसके अलावा किसी और भगवान की पूजा की गई तो वह ठीक नहीं होगा। असुर राज को बेटे की भक्ति भी नहीं आई रास असुर राज हिरण्‍यकश्‍यप का अभिमान इतना बढ़ गया था कि क्‍या प्रजा क्‍या उसका अपना वारिस। यानी कि बेटा। उसे यह नहीं पसंद था कि उसके अलावा किसी और की पूजा की जाए। लेकिन उसका बेटा प्रह्लााद नारायण का परम भक्‍त था। वह हर समय श्री हर‍ि-श्री हरि का नाम जपता रहता था। हिरण्‍यकश्‍यप को इससे काफी समस्‍या थी। कई बार उसे खुद समझाया तो कई बार अपनी सभा के मंत्रिमंडल को भेजा। लेकिन प्रह्लााद पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वह तो बस हरि भक्ति में ही लीन रहते। जब नहीं बनी बात तो बुलवा भेजा बहन को हिरण्‍यकश्‍यप के लाख समझाने के बाद भी जब प्रह्लााद नहीं माने तो असुर राज ने दूसरी ही युक्ति निकाली। उसने अपनी बहन होलिका को बुलवाया। इसके पीछे यह कारण था कि उसे वरदान में एक ऐसा दुशाला मिला था जिसे ओढ़ने के बाद अग्नि उसे छू भी नहीं सकती थी। हिरण्‍यकश्‍यप ने होलिका को यह आदेश दिया कि उन्‍हें प्रह्लााद को अपने गोदी में लेकर अग्नि में बैठना है। ताकि भगवान विष्‍णु का नाम लेने वाला प्रह्लााद जलकर भस्‍म हो जाए। या फिर अग्नि के डर से वह हिरण्‍यकश्‍यप को अपना भगवान मानने लगेगा। फिर भी श्री हर‍ि का जपते रहे नाम हिरण्‍यकश्‍यप के आदेश पर होलिका अपने भतीजे प्रह्लााद को लेकर अग्नि में बैठ गई। उस समय होलिका ने वरदान में प्राप्‍त वही दुशाला ओढ़ा हुआ था। यह सबकुछ देखकर भी प्रह्लााद तनिक भी विचलित न हुए। पूरी श्रद्धा से वह भगवान विष्‍णु का नाम जपते रहे। थोड़ी ही देर में कुछ ऐसा हुआ कि शांत मौसम में भी तेज हवाएं चलने लगीं। वह भी इतनी तेज कि होलिका का दुशाला हवा में उड़कर प्रह्लााद के ऊपर चला गया और वह अग्नि में जलकर भस्‍म हो गई। इस कथा के श्रवण मात्र से बनते है बिगड़े काम होलिका दहन के पूर्व पूजन के दौरान असुर राज ह‍िरण्‍यकश्‍यप और भक्‍तपरायण प्रह्लााद की यह कथा पढ़ने का विधान है। मान्‍यता है कि जो भी जातक इस कथा को पूरी श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है। उसपर श्री हरि विष्‍णु की कृपा बनी रहती है। उसकी सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती हैं। साथ ही जीवन की सभी परेशान‍ियां भी दूर हो जाती हैं। सुख-समृद्धि का वास होता है।

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होलिका दहन होलिका दहन क्यों मनाया जाता है, जानिए प्रहलाद, होलिका हिरण्यकश्यप, पौराणिक कथा और नरसिंह मंत्र

होली हिंदू समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। होली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, होलिका दहन। इसे फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसके अगले दिन रंग-गुलाल से होली खेली जाती है। इसे धुलेंडी, धुलंडी और धूलि भी कहा जाता है। होलिका दहन क्यों मनाया जाता है: होली हिंदू समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। होली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, होलिका दहन। इसे फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसके अगले दिन रंग-गुलाल से होली खेली जाती है। इसे धुलेंडी, धुलंडी और धूलि भी कहा जाता है। कई अन्य हिंदू त्योहारों की तरह होली भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। होलिका दहन की तैयारी त्योहार से 40 दिन पहले शुरू हो जाती हैं। लोग सूखी टहनियां, पत्ते जुटाने लगते हैं। फिर फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को अग्नि जलाई जाती है और मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। दूसरे दिन सुबह नहाने से पहले इस अग्नि की राख को अपने शरीर लगाते हैं, फिर स्नान करते हैं। होलिका दहन का महत्व है कि आपकी मजबूत इच्छाशक्ति आपको सारी बुराइयों से बचा सकती है।होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत के पर्व के रूप में मनाया जाता है। होलिका दहन की पौराणिक कथाहोलिका दहन का पौराणिक महत्व भी है। इस त्योहार को लेकर सबसे प्रचलित है प्रहलाद, होलिका और हिरण्यकश्यप की कहानी। राक्षस हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का परम भक्त था। वहीं, हिरण्यकश्यप भगवान नारायण को अपना घोर शत्रु मानता था। पिता के लाख मना करने के बावजूद प्रह्लाद विष्णु की भक्ति करता रहा। असुराधिपति हिरण्यकश्यप ने कई बार अपने पुत्र को मारने की, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से उसका बाल भी बांका नहीं हुआ। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान मिला था कि उसे अग्नि नहीं जला सकती। उसने अपने भाई से कहा कि वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि की चिता पर बैठेगी और उसके हृदय के कांटे को निकाल देगी। वह प्रह्लाद को लेकर चिता पर बैठी भी, पर भगवान विष्णु की ऐसी माया कि होलिका जल गई, जबकि प्रह्लाद को हल्की सी आंच भी नहीं आई। होलिका दहन से जुड़ी एक कहानीहोलिका दहन से जुड़ी एक कथा भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी। श्री राम के एक पूर्वज रघु, के राज में एक असुर नारी थी। वह नगरवासियों पर तरह-तरह के अत्याचार करती। उसे कोई मार भी नहीं सकता था, क्योंकि उसने वरदान का कवच पहन रखा था। उसे सिर्फ बच्चों से डर लगता। एक दिन गुरु वशिष्ठ ने बताया कि उस राक्षसी को मारने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि अगर बच्चे नगर के बाहर लकड़ी और घास के ढेर में आग लगाकर उसके चारों ओर नृत्य करें, तो उसकी मौत हो जाएगी। फिर ऐसा ही किया गया और राक्षसी की मौत के बाद उस दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। होलिका दहन पर नरसिंह मंत्र-1नमस्ते नरसिंहाय प्रह्लादाह्लाद दायिनेहिरण्यकशिपोर्वक्षः शिला-टङ्क-नखालयेइतो नृसिंहः परतो नृसिंहोयतो यतो यामि ततो नृसिंहःबहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहोनृसिंहमादिं शरणं प्रपद्य नरसिंह मंत्र-2उग्रं वीरं महा विष्णुम ज्वलन्तम सर्वतो मुखम्नृसिंहं भीभूतम् भद्रम मृत्युर्मृत्युम् नाम: अहम्उग्र वीरम महा विष्णुम ज्वालां सर्वतो मुखम्नृसिंहमं भेशंम् भद्रं मृत्योर्मित्यं नमाम्यहम् होलिका दहन पर महालक्षमी मंत्र का जाप मस्तेस्तु महामाये श्री पीठे सुर पूजिते!शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते!! नमस्तेतु गरुदारुढै कोलासुर भयंकरी!सर्वपाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते!! सर्वज्ञे सर्व वरदे सर्व दुष्ट भयंकरी!सर्वदुख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते!! सिद्धि बुद्धि प्रदे देवी भक्ति मुक्ति प्रदायनी!मंत्र मुर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते!!

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भक्त प्रहलाद का संपूर्ण जीवन परिचय: जन्म, कथा, यातनाएं, राज्याभिषेक व मृत्यु

प्रह्लाद ने दैत्य कुल में जन्म लिया था जिसके माता-पिता दैत्य जाति से थे। दैत्य कुल में जन्म लेने के पश्चात भी वह भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहता था जिस कारण आज तक उसका नाम भगवान विष्णु के सबसे बड़े भक्तों के रूप में लिया जाता है। आज हम भक्त प्रह्लाद के जन्म से जुड़ी कथा, उसको अपने पिता से मिली यातनाएं, भगवान विष्णु के द्वारा हर बार उसकी रक्षा करना व अपने पिता की मृत्यु के बाद उसके जीवन के बारे में विस्तार से जानेंगे। भक्त प्रह्लाद का जीवन परिचय भक्त प्रह्लाद का जन्म जब प्रह्लाद अपनी माँ कयाधु के पेट में था तब उसके चाचा हिरण्याक्ष का भगवान विष्णु के वराहावतार ने वध कर दिया था। इससे कुंठित होकर उसके पिता हिरण्यकश्यप भगवान ब्रह्मा की तपस्या करने चले गए थे। इसके बाद दैत्य नगरी में हिरण्यकश्यप को ना पाकर देवताओं ने वहां पर आक्रमण कर दिया था। उन्होंने दैत्य नगरी पर अधिकार कर लिया तथा कयाधु (Prahlad Ki Mata Ka Naam) को बंदी बना लिया। इंद्र देव कयाधु को बंदी बनाकर अपने साथ ले जाने लगे कि नारद मुनि ने उन्हें रोक दिया। नारद मुनि ने इंद्र से कहा कि तुम एक गर्भवती स्त्री पर अत्याचार नही कर सकते और वह भी तब जब उसके गर्भ में भगवान विष्णु का भक्त पल रहा हो। इसके पश्चात नारद मुनि कयाधु को इंद्र के चंगुल से छुड़ाकर अपने आश्रम में ले आये तथा हिरण्यकश्यप की तपस्या पूर्ण होने तक अपने आश्रम में रखा। इस दौरान नारद मुनि कयाधु को हरी भजन सुनाते व भगवान विष्णु की कथाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करते। नारद मुनि के इन वचनों का सकारात्मक प्रभाव कयाधु के गर्भ में पल रहे अजन्मे प्रह्लाद पर भी पड़ रहा था। यही कारण था कि जब उसका जन्म हुआ तब वह विष्णु भक्त बना। उससे पहले उसके चार बड़े भाई भी थे जिनका जन्म दैत्य नगरी में ही हुआ था किंतु उनमे से केवल प्रह्लाद ही विष्णु भक्ति में लीन रहता था। इसी बीच हिरण्यकश्यप की तपस्या समाप्त हो गयी तथा भगवान ब्रह्मा से उसने तीनों लोकों में सर्वशक्तिशाली होने का वरदान प्राप्त कर लिया। इसके बाद वह पुनः अपनी दैत्य नगरी वापस आ गया और वहां देवताओं का अधिकार हुए देखा। इसके बाद उसने अपने मिले वरदान से ना केवल दैत्य नगरी को वापस पाया अपितु तीनों लोकों पर अधिकार स्थापित कर लिया और इंद्र देव को स्वर्ग के आसन से अपदस्थ कर दिया। हिरण्यकश्यप की तपस्या समाप्त हो जाने और पुनः अपनी नगरी लौट आने की सूचना मिलने के पश्चात कयाधु और भक्त प्रह्लाद भी नारद मुनि से आशीर्वाद लेकर पुनः अपनी नगरी लौट गए। भक्त प्रह्लाद पर हिरण्यकश्यप के अत्याचार हिरण्यकश्यप भगवान ब्रह्मा से मिले वरदान के फलस्वरूप अति-शक्तिशाली हो चुका था। इसी अहंकार में उसने विष्णु को भगवान मानने से मना कर दिया और स्वयं को भगवान की उपाधि दे दी। तीनों लोकों में जो कोई भी विष्णु की पूजा करता, वह उसे मरवा डालता किंतु जब उसने अपने स्वयं के पुत्र को ही विष्णु भक्ति में लीन देखा तो क्रोध की अग्नि में जलने लगा। उसने अपने पांच वर्ष के छोटे से पुत्र प्रह्लाद को मारने की कई बार चेष्ठा की लेकिन हर प्रयास असफल सिद्ध हुआ। उसने प्रह्लाद को पागल हाथियों के सामने फिंकवा दिया ताकि वह उनके पैरों के नीचे कुचलके मारा जाये, सांपों से भरे कुएं में फिंकवा दिया, ऊपर पर्वत की चोटी से नीचे खाई में फेंक दिया, बेड़ियाँ बांधकर समुंद्र में फिंकवाया, अस्त्र-शस्त्र से मरवाने की कोशिश की, अपनी बहन होलिका के द्वारा अग्नि में जलवाने की कोशिश की लेकिन हर बार प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा करने स्वयं भगवान विष्णु आ जाते। प्रह्लाद का तीनों लोकों का राजा बनना एक दिन जब हिरण्यकश्यप प्रह्लाद के ऊपर अत्याचार कर रहा था तब भगवान विष्णु का क्रोध अत्यधिक बढ़ गया। उस समय उन्होंने अत्यंत भयानक रूप लिया जो नृसिंह अवतार कहलाया। इस अवतार को धारण कर उन्होंने प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप का वध कर डाला। इसके पश्चात भगवान नृसिंह के क्रोध को भक्त प्रह्लाद ने शांत करवाया। भगवान नृसिंह ने भी अपने नन्हे से भक्त प्रह्लाद को बहुत स्नेह दिया तथा उसे अपने पिता के राज सिंहासन (Bhakt Prahlad Ka Rajyabhishek) पर स्थान दिया। प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे तीनों लोकों का राज प्रदान किया। इसके पश्चात भगवान नृसिंह पुनः भगवान विष्णु में समा गए। हिरण्यकश्यप की मृत्यु के पश्चात प्रह्लाद का जीवन अपने पिता की मृत्यु के पश्चात प्रह्लाद तीनों लोकों का राजा बन गया। दैत्य कुल से होते हुए भी उसने अहिंसा तथा धर्म का मार्ग अपनाया तथा सभी की रक्षा की। उसके राज्य में सभी प्रजा कुशल मंगल से रह रही थी। वह प्रतिदिन ब्राह्मणों को दान करता था तथा बिना अस्त्र उठाये सभी पर विजय पा लेता था। प्रह्लाद के स्वभाव के कारण वह देवता तथा दानवों दोनों में प्रिय हो गया था। जब प्रह्लाद बड़ा हुआ तब उसका विवाह धृति नामक स्त्री से हुआ। इस प्रकार प्रह्लाद की पत्नी का नाम धृति (Prahlad Ki Patni Ka Naam) था जिससे उसके विरोचन नामक पुत्र (Prahlad Ka Putra) हुआ। विरोचन के पुत्र का नाम बलि था जिसका मानभंग भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर किया था। अपने दानवीर व्यवहार के कारण एक दिन इंद्र ने प्रह्लाद के साथ छल किया था। उसने प्रातःकाल के समय ब्राह्मण वेश में प्रह्लाद से उसका शील/राज्य मांग लिया था। इस कारण प्रह्लाद के हाथों से संपूर्ण राज्य चला गया था। इससे क्रुद्ध होकर दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया था। बाद में प्रह्लाद के पास पुनः अपना राज्य आ गया था तथा उसने अपने पुत्र विरोचन को राज्य का भार सौंप दिया तथा स्वयं मोक्ष प्राप्त करने चले गए। इस प्रकार प्रह्लाद ने अपना संपूर्ण जीवन भगवान विष्णु की भक्ति, सदाचार, धर्म की स्थापना करने में बिताया। प्रह्लाद के इसी व्यवहार के कारण ही वह दैत्य कुल में जन्म लेने के पश्चात भी भगवान विष्णु का सबसे प्रिय भक्त बन गया था।

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हिरण्यकश्यप के बारे में संपूर्ण जानकारी: पूर्व जन्म से लेकर अगले जन्म तक

हिरण्यकश्यप सतयुग में जन्मा एक दैत्य राजा था जो अति-पराक्रमी तथा शक्तिशाली था। उसका जन्म महर्षि कश्यप के कुल में हुआ था। साथ ही उसको भगवान ब्रह्मा से विचित्र वरदान मिला था। भगवान ब्रह्मा से मिले इसी वरदान के कारण स्वयं नारायण को मृत्यु लोक में अपना अवतार लेकर उसका वध करना पड़ा था। हिरण्यकश्यप के कुल में ही उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु भक्त था जो उसकी मृत्यु के पश्चात उसका उत्तराधिकारी बना था। आज हम हिरण्यकश्यप की कथा के बारे में जानेंगे। हिरण्यकश्यप का जीवन परिचय हिरण्यकश्यप का पूर्व जन्म अपने पूर्व जन्म में हिरण्यकश्यप तथा उसका छोटा भाई हिरण्याक्ष भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम के प्रहरी थे जिनका नाम जय-विजय था। एक दिन उन्होंने भगवान ब्रह्मा के चार मानस पुत्रों का अपमान किया था तथा वैकुंठ में जाने से रोका था। तब उन्हें श्राप मिला था कि वे तीन जन्म तक असुर कुल में जन्म लेंगे तथा उनका वध भगवान विष्णु के हाथों होगा। इसलिये जय-विजय का अगला जन्म हिरण्यकश्यप तथा हिरण्याक्ष के रूप में हुआ था। हिरण्यकश्यप का जन्म हिरण्यकश्यप तथा उसके भाई हिरण्याक्ष के माता-पिता का नाम महर्षि कश्यप तथा दिति था। महर्षि कश्यप की कई पत्नियाँ थी जिसमें से एक दिति थी। उसी के गर्भ से दैत्यों का जन्म हुआ था। दरअसल एक दिन दिति किसी कारणवश कामातुर हो उठी थी और उसने गलत तिथि में महर्षि कश्यप को संभोग के लिए कहा था। महर्षि कश्यप के मना करने के बाद भी जब दिति नही मानी तो दोनों के बीच संभोग हो गया। इसके परिणामस्वरुप दो दैत्यों हिरण्यकश्यप तथा हिरण्याक्ष का जन्म हुआ। हिरण्यकश्यप की पत्नी का नाम हिरण्यकश्यप का विवाह कयाधु नाम की स्त्री से हुआ था जिससे उसे प्रह्लाद नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी। यही पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बना था। दरअसल जब हिरण्यकश्यप भगवान ब्रह्मा की तपस्या करने में लीन था तो उस समय देवताओं ने उसकी नगरी पर आक्रमण करके वहां अपना शासन स्थापित कर लिया था। तब देवर्षि नारद मुनि ने कयाधु के रक्षा की थी और उसे अपने आश्रम में स्थान दिया था। वही पर हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद का जन्म हुआ था। देवर्षि नारद मुनि की संगत में रहने के कारण वह विष्णु भगवान का भक्त बन गया था। हिरण्यकश्यप के भाई का वध जब हिरण्यकश्यप के छोटे भाई हिरण्याक्ष ने अपने अहंकार में पृथ्वी को समुंद्र में डुबो दिया तब भगवान नारायण ने अपना तृतीय अवतार वराह लेकर उसका वध कर दिया तथा पृथ्वी को समुंद्र से निकाल दिया। अपने भाई की मृत्यु से हिरण्यकश्यप इतना ज्यादा क्रोधित हो गया था कि वह विष्णु से बदला लेना चाहता था, इस कारण उसने भगवान ब्रह्मा की कठिन तपस्या की। हिरण्यकश्यप को भगवान ब्रह्मा का वरदान लगभग सौ वर्षों तक कठिन तपस्या करने के पश्चात हिरण्यकश्यप को भगवान ब्रह्मा ने दर्शन दिए। उसने वरदान माँगा कि उसकी मृत्यु भगवान ब्रह्मा के बनाये हुए किसी भी प्राणी से ना हो फिर चाहे वह मनुष्य हो या पशु। इसके साथ जी उसकी मृत्यु न अस्त्र-शस्त्र से, ना दिन व रात में, ना भवन के बाहर और ना ही अंदर, न भूमि ना आकाश में हो। इस वरदान को पाकर वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया था। हिरण्यकश्यप का अत्याचार व प्रह्लाद भगवान ब्रह्मा से यह वरदान पाकर उसनें तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया तथा इंद्र का भी आसन छीन लिया। जगह-जगह उसने अधर्म के कार्य किये तथा ऋषि-मुनियों की हत्याएं करवा दी। वह स्वयं को भगवान मानने के लिए लोगों को बाध्य करने लगा लेकिन स्वयं उसका पांच वर्ष का पुत्र प्रह्लाद विष्णु भक्ति में लीन रहता। शुरू में तो उसने अपने छोटे से पुत्र को धमकियाँ दी लेकिन जब वह नहीं माना तब उसने उसकी हत्या के कई षड़यंत्र रचे। हिरण्यकश्यप के द्वारा प्रह्लाद को सांपों से भरे कक्ष में रखना, हाथियों के पैरों के सामने फेंकना, पर्वत से गिराना, अग्नि में जलाना इत्यादि सम्मिलित है। किंतु हर बार प्रह्लाद की भगवान विष्णु के द्वारा रक्षा कर ली जाती थी। हिरण्यकश्यप की बहन का नाम हिरण्यकश्यप की बहन का नाम होलिका था। होलिका को भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था कि उसे कोई भी अग्नि में जला नही सकता। इसी का लाभ उठाकर हिरण्यकश्यप ने होलिका को कहा कि वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए ताकि प्रह्लाद वहां से भाग न सके और वह उसी अग्नि में जलकर ख़ाक हो जाए। चूँकि होलिका को वरदान प्राप्त था, इसलिये वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ गयी। किंतु आश्चर्यजनक बात यह रही कि उस अग्नि में होलिका जलकर ख़ाक हो गयी जबकि प्रह्लाद सकुशल बाहर आ गया। दरअसल भगवान ब्रह्मा ने होलिका को वरदान देते समय यह भी कहा था कि यदि वह इस वरदान का दुरूपयोग करेगी तो यह वरदान स्वयं ही निष्प्रभावी हो जायेगा। हिरण्यकश्यप का वध भगवान विष्णु वैकुंठ में बैठे अपने भक्त प्रह्लाद पर यह सब अत्याचार होते हुए देख रहे थे तथा धीरे-धीरे उनके क्रोध का घड़ा भरता जा रहा था। एक दिन हिरण्यकश्यप प्रह्लाद से विष्णु के होने का प्रमाण मांग रहा था। तब प्रह्लाद ने कहा कि वे तो कण-कण में हैं। इस पर हिरण्यकश्यप ने अपने भवन के एक स्तंभ की ओर ईशारा करते हुए कहा कि क्या वे इसमें भी हैं? तब प्रह्लाद ने इस पर हां में उत्तर दिया। यह सुनकर हिरण्यकश्यप ने क्रोध में वह स्तंभ तोड़ डाला। जैसे ही वह स्तंभ टूटा उसमें से भगवान विष्णु का अत्यंत क्रोधित रूप नरसिंह अवतार में प्रकट हुआ जिसका आधा शरीर सिंह का तथा बाकि का आधा शरीर मनुष्य का था। उस नरसिंह अवतार ने हिरण्यकश्यप को उसके भवन की चौखट पर ले जाकर, संध्या के समय, अपने गोद में रखकर नाखूनों की सहायता से उसका वध कर दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु ने उसको मिले वरदान की काट ढूंढ़कर हिरण्यकश्यप का अंत किया तथा उसका उत्तराधिकारी भक्त प्रह्लाद को बनाया। हिरण्यकश्यप का अगला जन्म चूँकि जय-विजय को तीन बार राक्षस कुल में जन्म लेना था जिनका वध भगवान विष्णु के अवतार के हाथों ही होना था। हिरण्यकश्यप व हिरण्याक्ष तो उनका पहला जन्म था। इसलिये अपने दूसरे जन्म में दोनों फिर से राक्षस कुल में जन्मे। हिरण्यकश्यप का अगला जन्म महर्षि विश्रवा के कुल में रावण के रूप में हुआ

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भक्त प्रह्लाद की कहानी

विष्णु पुराण में भक्त प्रह्लाद की कथा का उल्लेख है। प्रह्लाद भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक थे। विष्णु पुराण में भक्त प्रह्लाद की कथा का उल्लेख है। प्रह्लाद भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक थे। आइये विस्तार से जानते हैं भक्त प्रह्लाद की कहानी जो अत्यंत रोचक और बच्चों के लिए प्रेरणादायक है। सनकादि ऋषियों के शाप के कारण भगवान विष्णु के पार्षद जय एवं विजय को दैत्ययोनि में जन्म लेना पड़ा था। भक्त प्रह्लाद का जन्म महर्षि कश्यप की पत्नी दक्षपुत्री दिति के गर्भ से दो महान पराक्रमी बालकों का जन्म हुआ। इनमें से बड़े का नाम हिरण्यकशिपु और छोटे का नाम हिरण्याक्ष था। दोनों भाइयों में बड़ी प्रीति थी। दोनों ही महाबलशाली, अमित पराक्रमी और आत्मबल संपन्न थे। दोनों भाइयों ने युद्ध में देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। एक समय जब हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में ले जाकर छिपा दिया तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर पृथ्वी की रक्षा के लिए हिरण्याक्ष का वध किया। अपने प्रिय भाई हिरण्याक्ष के वध से दुखी होकर हिरण्यकशिपु ने दैत्यों को प्रजा पर अत्याचार करने की आज्ञा देकर स्वयं महेन्द्राचल पर्वत पर चला गया। वह भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करने लगा। इधर दैत्यों के राज्य को राजाविहीन देखकर देवताओं ने उनपर आक्रमण कर दिया। दैत्यगण इस युद्ध में पराजित हुए और पाताललोक को भाग गए। देवराज इन्द्र ने हिरण्यकशिपु के महल में प्रवेश करके उसकी पत्नी कयाधु को बंदी बना लिया। उस समय कयाधु गर्भवती थी, इसलिए इन्द्र उसे साथ लेकर अमरावती की ओर जाने लगे। रास्ते में उनकी देवर्षि नारद से भेंट हो गयी। नारद जी ने पुछा – ” देवराज ! इसे कहाँ ले जा रहे हो ? “ इन्द्र ने कहा – ” देवर्षे ! इसके गर्भ में हिरण्यकशिपु का अंश है, उसे मार कर इसे छोड़ दूंगा। “ यह सुनकर नारदजी ने कहा – ” देवराज ! इसके गर्भ में बहुत बड़ा भगवद्भक्त है, जिसे मारना तुम्हारी शक्ति के बाहर है, अतः इसे छोड़ दो। “ नारदजी के कथन का मान रखते हुए इन्द्र ने कयाधु को छोड़ दिया और अमरावती चले गए। नारदजी कयाधु को अपने आश्रम पर ले आये और उससे बोले – ” बेटी ! तुम यहाँ आराम से रहो जब तक तुम्हारा पति अपनी तपस्या पूरी करके नहीं लौटता। “ कयाधु उस पवित्र आश्रम में नारदजी के सुन्दर प्रवचनों का लाभ लेती हुई सुखपूर्वक रहने लगी जिसका गर्भ में पल रहे शिशु पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। समय होने पर कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। इधर हिरण्यकशिपु की तपस्या पूरी हुई और वह ब्रह्माजी से मनचाहा वरदान लेकर वापस अपनी राजधानी चला आया। कुछ समय के बाद कयाधु भी प्रह्लाद को लेकर नारदजी के आश्रम से राजमहल में आ गयी। भक्त प्रह्लाद की लीला जब प्रह्लाद कुछ बड़े हुए तब हिरण्यकशिपु ने उनके शिक्षा की व्यवस्था की। प्रह्लाद गुरु के सान्निध्य में शिक्षा ग्रहण करने लगे। एक दिन हिरण्यकशिपु अपने मंत्रियों के साथ सभा में बैठा हुआ था। उसी समय प्रह्लाद अपने गुरु के साथ वहाँ गए। प्रह्लाद को प्रणाम करते देखकर हिरण्यकशिपु ने उसे अपनी गोद में बिठाकर दुलार किया और कहा – ” वत्स ! तुमने अब तक अध्ययन में निरंतर तत्पर रहकर जो कुछ सीखा है, उसमें से कुछ अच्छी बात सुनाओ। “ तब प्रह्लाद बोले – ” पिताजी ! मैंने अब तक जो कुछ सीखा है उसका सारांश आपको सुनाता हूँ। जो आदि, मध्य और अंत से रहित, अजन्मा, वृद्धि-क्षय से शुन्य और अच्युत हैं, समस्त कारणों के कारण तथा जगत के स्थिति और अन्तकर्ता उन श्रीहरि को मैं प्रणाम करता हूँ। “ यह सुनकर दैत्यराज हिरण्यकशिपु के नेत्र क्रोध से लाल हो उठे, उसने कांपते हुए होठों से प्रह्लाद के गुरु से कहा – ” अरे दुर्बुद्धि ब्राह्मण ! यह क्या ? तूने मेरी अवज्ञा करके इस बालक को मेरे परम शत्रु की स्तुति से युक्त शिक्षा कैसे दी ? “ गुरूजी ने कहा – ” दैत्यराज ! आपको क्रोध के वशीभूत नहीं होना चाहिए। आपका पुत्र मेरी सिखाई हुई बात नहीं कह रहा है। “ हिरण्यकशिपु बोला – ” बेटा प्रह्लाद ! बताओ तुमको यह शिक्षा किसने दी है ? तुम्हारे गुरूजी कहते हैं कि मैंने तो इसे ऐसा उपदेश दिया ही नहीं है। “ प्रह्लाद बोले – ” पिताजी ! ह्रदय में स्थित भगवान विष्णु ही तो सम्पूर्ण जगत के उपदेशक हैं। उनको छोड़कर और कौन किसी को कुछ सीखा सकता है। “ हिरण्यकशिपु बोला – ” अरे मुर्ख ! जिस विष्णु का तू निश्शंक होकर स्तुति कर रहा है, वह मेरे सामने कौन है ? मेरे रहते हुए और कौन परमेश्वर कहा जा सकता है ? फिर भी तू मौत के मुख में जाने की इक्षा से बार-बार ऐसा बक रहा है। “ ऐसा कहकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेकों प्रकार से समझाया पर प्रह्लाद के मन से श्रीहरि के प्रति भक्ति और श्रद्धाभाव को कम नहीं कर पाया। तब अत्यंत क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने अपने सेवकों से कहा – ” अरे ! यह बड़ा दुरात्मा है। इसको मार डालो। अब इसके जीने से कोई लाभ नहीं है, क्योंकि यह शत्रुप्रेमी तो अपने कुल का ही नाश करने वाला हो गया है। “ हिरण्यकशिपु की आज्ञा पाकर उसके सैनिकों ने प्रह्लाद को अनेकों प्रकार से मारने की चेष्टा की पर उनके सभी प्रयास श्रीहरि की कृपा से असफल हो जाते थे। उन सैनिकों ने प्रह्लाद पर अनेक प्रकार के अस्त्र शस्त्रों से आघात किये पर प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। उन्होंने प्रह्लाद के हाथ-पैर बाँधकर समुद्र में डाल दिया पर प्रह्लाद फिर भी बच गए। उन सबने प्रह्लाद को अनेकों विषैले साँपों से डसवाया और पर्वत शिखर से गिराया पर भगवद्कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। रसोइयों के द्वारा विष मिला हुआ भोजन देने पर प्रह्लाद उसे भी पचा गए। होलिका दहन जब प्रह्लाद को मारने के सब प्रकार के प्रयास विफल हो गए तब हिरण्यकशिपु के पुरोहितों ने अग्निशिखा के समान प्रज्ज्वलित शरीरवाली कृत्या उत्पन्न कर दी। उस अति भयंकरी कृत्या ने अपने पैरों से पृथ्वी को कम्पित करते हुए वहाँ प्रकट

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हनुमान जयंती

मित्रो, हम दूरदर्शनपर अनेक मालिकाएं देखते हैं । उसमें शक्तिमान जैसी कोई कल्पित व्यक्तिरेखा दिखाई जाती है । वह देखकर हमें लगता है कि हम भी ऐसे शक्तिमान बनें । कई बच्चे इन व्यक्तिरेखाओं को सही मानकर वैसे कृत्य करने का प्रयास करते हैं; किंतु यह सब झूठा तथा काल्पनिक होता है । इनसे अपने देवता बहुत अधिक शक्तिशाली तथा सर्वांग आदर्श हैं । हनुमान बहुत शक्तिशाली थे । उन्होंने केवल एक हाथपर द्रोणागिरि पर्वत उठाया था, तथा समुद्र के ऊपर से उडान भरकर लंका में प्रवेश किया था । मित्रो, हमें ऐसे सर्वशक्तिशाली हनुमान जैसा बनना अच्छा लगेगा या झूठी व्यक्तिरेखा के रूप में शक्तिमान एवं स्पाइडरमैन बनना अच्छा लगेगा ?         आपके मन में यह प्रश्न आया होगा कि हनुमान इतने शक्तिशाली कैसे ? इसका उत्तर है, `हनुमान ने श्रीराम की उपासना की’ । भक्ति से ही शक्ति मिलती है । यदि हम भक्ति करें, तो हम भी हनुमान जैसे शक्तिशाली बनेंगे । विद्यार्थी मित्रो, हमें सर्वशक्तिशाली तथा महापराक्रमी होने की इच्छा है ना ? हम भी हनुमान का आदर्श अपने समक्ष रखकर राष्ट्र तथा धर्म की रक्षा करने हेतु सिद्ध होते हैं । आज हम हनुमान जयंती के अवसरपर सर्वशक्तिशाली हनुमान का जन्म तथा अन्य जानकारी प्राप्त कर समझ लेते हैं, उसी प्रकार किन गुणों के कारण वह भगवान श्रीराम के चहेते तथा परमभक्त बने, यह भी जान लेते हैं । मारुति के जन्म का इतिहास तथा उन्हें हनुमान नाम प्राप्त होने का कारण राजा दशरथ ने पुत्र की प्राप्ति हेतु यज्ञ किया था । यज्ञ से अग्निदेव प्रकट हुए तथा प्रसन्न होकर राजा दशरथ की रानियों को पायस अर्थात खीर का प्रसाद दिया । राजा दशरथ की रानियों समान तप करनेवाली अंजनी को अर्थात मारुति की माताजी को भी प्रसाद प्राप्त हुआ । अत: अंजनी को मारुति जैसा पुत्र प्राप्त हुआ । उस दिन चैत्र पूर्णिमा थी । वह दिन हनुमान जयंती के रूप में मनाया जाता है । मारुति ने जन्म के समय ही उदीयमान सूरज देखा तथा उसे फल मानकर, उन्होंने सूर्य की दिशा में उडान भरी । उस समय सूर्य को निगलने हेतु राहु आया था । इंद्रदेव को लगा मारुति ही राहु है, अत: उन्होंने मारुति की ओर वङ्का फेंका । वह मारुति की ठोढीपर लगा तथा उनकी ठोढी कट गई । तबसे उन्हें हनुमान नाम प्राप्त हुआ । २. कार्य तथा विशेषताएं २ अ. महापराक्रमी : हनुमंत ने जंबू, माली, अक्ष, धूम्राक्ष, निकुंभ जैसे बडेबडे वीरों का नाश किया । उन्होंने रावण को भी बेहोश किया । समुद्र के ऊपर से उडान भरकर लंका दहन किया तथा द्रोणागिरी पर्वत भी उठा लाया । मित्रो, इन सब बातों से हमें पता चलता है कि मारुति कितने पराक्रमी थे । २ आ. निस्सीम भक्त : मित्रो, मारुति केवल पराक्रमी ही नहीं थे , अपितु वे भगवान श्रीराम के परम भक्त भी थे । भगवान के लिए प्राण देने की उनकी सिद्धता थी वह निरंतर भगवान का नामस्मरण करते थे । भगवान के नाम में ही शक्ति होती है, यह बात वह जानते थे । आओ, हम भी निरंतर नामस्मरण कर के भगवान के भक्त बनते हैं तथा भगवान से शक्ति प्राप्त करते हैं । मारुति को भगवान की सेवा के आगे सब तुच्छ लगता था । ऐसा भक्त ही भगवान को अच्छा लगता है । हमें भी मारुति जैसा भक्त बनने का प्रयास करना चाहिए । २ इ. अखंड साधना : जब युद्ध होते रहता था, तब मारुति थोडी देर अलग बैठकर ध्यान लगाते थे तथा हर पल भगवान का स्मरण करते रहते थे २ ई. बुदि्धमान : मारुति सभी व्याकरण सूत्र जानते थे । उन्हें ग्यारहवां व्याकरणकार माना जाता है । वह इतने बुदि्धमान कैसे थे ? मित्रो, जो भक्ति करते हैं, उनकी बुदि्ध सात्ति्वक होती है । आजसे हम भी मारुति जैसी भक्ति करके बुदि्धमान बनने का प्रयास करें । २ उ. जितेंद्रिय : मारुति को अपनी इंद्रियोंपर नियंत्रण था । सीतामाता को ढूंढने हेतु वह लंका गए । वहां उन्होंने राक्षस कुल की अनेक स्त्रीयों को देखा; किंतु उनके मन में एक भी स्त्री के प्रति क्षणभर के लिए कोई बुरा विचार नहीं आया; क्योंकि उन्होंने अपने सारे विकारोंपर नियंत्रण प्राप्त कर लिया था । मित्रो, भगवान की भक्ति करनेवाला सच्चा भक्त ही अपने विकारोंपर, अर्थात बुरे विचारोंपर नियंत्रण प्राप्त करता है । वह विकारों का दास नहीं होता । आजकल हम बहुतसी बातें सीखते हैं; किंतु अपने विकार नहीं जाते, क्योंकि हम भगवान के भक्त नहीं हैं । २ ऊ. भाषणकला में प्रवीण : मारुति उत्तम वक्ता थे । रावण के दरबार में उनके द्वारा भाषण देनेपर सारा दरबार आश्चर्यचकित रह गया । मित्रो, ऊपर दिए सारे गुण अपने में आने हेतु हम मारुति की प्रार्थना करते हैं, हे मारुतिराय, हमें तुम्हारे जैसी भक्ति करने की शक्ति तथा बुद्धि दें । आपके सर्व गुण हम में आने हेतु हमसे प्रयास होने दे, आपके  चरणों में यही विनम्र प्रार्थना है । ३. मारुति की मूर्ति का रंग सिंदूरी होने तथा उन्हें सिंदूर लगाने का कारण ३ अ. प्रभु श्रीराम के प्रति निस्सीम भक्ति का प्रतीक होने के कारण पूरे शरीरपर सिंदूर लगाना : मारुति का रंग सिंदूरी होने के पीछे एक कथा है । एक बार माता सीता ने स्नानोपरांत माथेपर सिंदूर लगाया । तब हनुमान ने उसका कारण पूछा । सीतामाता ने कहा, भगवान श्रीरामा की आयु लंबी हो; इस हेतु मैं सिंदूर लगाती हूं । मित्रो, मारुतिराय श्रीराम के निस्सीम भक्त थे । उन्होंने कहा, ऐसा करने से यदि मेरे स्वामी की आयु लंबी होती हो, तो मैं पूरे शरीरपर सिंदूर लगा लेता हूं । ऐसा कहकर उन्होंने अपने पूरे शरीरपर सिंदूर लगा लिया । प्रभु श्रीराम को जब इस बात का पता चला तो अति प्रसन्न होकर वे बोले, `मारुतिराय, तुम्हारे जैसा मेरा अन्य कोई भी भक्त नहीं । उसके उपरांत ही मारुति का रंग सिंदूरी हो गया । ३ आ. मारुति को सिंदूर तथा तेल अर्पण करना : हनुमान द्रोणागिरि पर्वत लेकर जा रहे थे, तब भरत ने उन्हें बाण मार दिया । उससे उनके पांव में चोट लग गई तथा सिंदूर एवं तेल लगाने से वह ठीक हो गया, इसलिए हनुमान को सिंदूर लगाते हैं तथा तेल अर्पण करते हैं । ४. मारुति के रूप ४ अ. प्रताप मारुति : एक हाथ में द्रोणागिरी पर्वत तथा

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वटपूर्णिमा पूजा

बच्चो, वटपूर्णिमा के दिन अपने में परोपकारी वृक्षों के गुण लाने का निश्चय करें  बालमित्रो, महान हिंदू धर्म एवं संस्कृति ने हमें बहुत बडा उत्तरदायित्व दिया है । आदर्श एवं आनंदमय जीवन जीने हेतु तथा चराचर में ईश्वर है, इसका आंतरिक बोध प्रत्येक जीव को निरंतर होता रहे, इस हेतु हमें ऋषिमुनियों ने हिंदू धर्मशास्त्र में अनेक व्रत बताए हैं । पूर्व में इन व्रतों का अचूक पालन करने के लिए प्रत्येक हिंदू परिश्रम करता था । उससे, जो विविध अनुभूतियां होती थीं, उसके कारण उसकी इन व्रतोंपर दृढ श्रद्धा होती थी तथा चराचर में प्रत्येक वस्तु में ईश्वर का अस्तित्व है, ऐसा भाव उसमें निर्मित होता था । वर्तमान में भी यदि हम वैसी श्रद्धा के साथ आचरण करेंगे, तो हमें भी वैसी अनुभूतियां होकर भाव निर्मित होगा एवं समाज में दिखाई देनेवाला रक्तपात, बलात्कार, विध्वंस, आगजनी, लूटपाट जैसी कोई समस्या शेष नहीं रहेगी । बालमित्रो, ज्येष्ठ पूर्णिमा को वटपूर्णिमा यह व्रत मनाते है!इस अवसरपर हमें जीवन के नैतिक मूल्यों का संवर्धन कर संस्कारित, आदर्श तथाआनंदमय जीवन जीना सीखना है । १. सौभाग्य अखंड रहें, इस हेतु हिंदू स्त्रियोंद्वारा वटवृक्ष की पूजा होना हम वर्ष में एक बार वटपूर्णिमा मनाते हैं । उस दिन प्रत्येक विवाहित हिंदू स्त्री अपना सौभाग्य अखंडबना रहे, इस हेतु वटवृक्ष की पूजा करती है । ऋषिमुनियों ने हमें इससे यही संदेश दिया है कि प्रत्येक वृक्ष में देवता हैं तथा उनकी ईश्वर समान पूजा करें ! २. प्रत्येक वृक्ष में ईश्वर का वास है, यह मानना आवश्यक बालमित्रो, हमें पाठशाला में पर्यावरण का विषय पढाया जाता है । इसमें पेड लगाएं एवं पेड बचाएं !उसी प्रकार वृक्ष हमारा मित्र है, ऐसा बताया जाता है; परंतु क्या हमें इस बात का आंतरिक बोध होता है ? नहीं ना ? पूर्वकाल में पेड लगाओ एवं पेड बचाओ तथा वृक्ष हमारा मित्र है, यह हमारे हिंदू बंधुओं को बताने की आवश्यकता नहीं होती थी । उस समय सभी हिंदुओं की ऐसी श्रद्धा होती थी कि प्रत्येक वृक्ष में ईश्वर है । इसलिए वे प्रतिदिन वृक्षों को नमस्कार करते थे । उनके मन में ऐसा कृतज्ञता का भाव होता था कि वृक्षों के कारण हम जीवित हैं । वटपूर्णिमा के अवसरपर आज से ही ईश्वर के चरणों में हम ऐसी प्रार्थना करेंगे कि प्रत्येक वृक्ष में ईश्वर हैं, यह अनुभव हमें नित्य होता रहे । ३. पर्यावरण का विषय केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करने के लिए न पढकर वृक्षों में विद्यमान गुण अपने में लाने के लिए अभ्यास करेंगे हमें पाठशाला में पर्यावरण का विषय पढाया जाता है । किंतु, यह विषय क्यों पढाया जाता है, कभी इस बात का विचारआप करते हैं ? आजकल के विद्यार्थी वार्षिक परीक्षा में केवल अंक अर्जित करने के लिए यह विषय पढते हैं, यह उचित है क्या ? नहीं न ! तो आज वटपूर्णिमा के दिन आपको निश्चय करना है कि ‘मैं परीक्षा में केवल अंक बढाने के लिए पर्यावरण विषय की पढाई नहीं करूंगा, अपितु प्रत्येक वृक्ष में देवता हैं, इसका अनुभव लेकर वृक्षों के उपयोगी गुणअपनाने का प्रयास करूंगा ।’ ४. वृक्षों में गुण ४ अ. परोपकारी : मित्रो, वृक्ष तेज धूप सहकर अन्यों को छाया देते हैं । वर्षाऋतु में पानी की शीतल और तेज बौछारें सहकर अपने नीचे आनेवाले सभी जीवों की वर्षा से रक्षा करते हैं तथा हमें फल-फूल देते हैं । इनसे हमे यह सीखने के लिए मिलता है कि हमें भी निरंतर दूसरों की सहायता करना चाहिए । हम से लोगों को आनंद मिलना चाहिए । ध्यान रखिए, हमारे धर्म ने कभी ऐसा आचरण करने के लिए नहीं कहा है, जिससे दूसरों को कष्ट हो । ४ आ. अहंकारशून्य : वृक्ष हमें सदैव कुछ-न-कुछ देते रहते हैं; परंतु उनमें यह सबकरनेका घमंड नहीं होता । सबकुछ ईश्वर ही करते हैं, ऐसा उनका विचार अथवा भावहोता है । परंतु हम क्या करते हैं ? थोडा भी किया, तो घमंडके साथ कहते हैं, मैंने येकिया, मैंने वो किया । बच्चो, आगेसे हम भी इन वृक्षोंके समान भाव रखकर कार्यकरेंगे कि ईश्वर ही सबकुछ करते हैं । ४ इ. दूसरों को आनंद देना : वृक्षों से प्राप्त फल-फूल-पत्तों आदि से हम अनेक प्रकार कीऔषधियां बनाते हैं । वृक्षों से हमें बहुत आनंद मिलता है । आगे से हम भी अपने प्रत्येक कार्य से  दूसरों को आनंद देने का प्रयास करेंगे । ४ ई. नत्रवायु (नाइट्रोजन वायु) सोखकर प्राणि-मात्र के लिए उपयुक्त प्राणवायु(ऑक्सीजन) उपलब्ध करवाना : प्राणि-मात्र के लिए वातावरण में विद्यमान घातकनत्रवायु वृक्ष सोख लेते हैं तथा हमारे लिए उपयुक्त प्राणवायु देते हैं । मनुष्य, प्राणी,पक्षी, कीट तथा लताएं, इन सबको वृक्ष आधार देते हैं । हमें इनके प्रति निरंतर कृतज्ञ होना चाहिए । बच्चो, अब बताओ, वृक्षों में ईश्वर हैं अथवा नहीं ? ५. आनंदमय तथा आदर्श जीवन जीने के लिए वृक्षों के समान त्याग करना सीखिए! हिंदू धर्म में ऐसा कहा गया है कि त्याग में आनंद है । बच्चो, वृक्ष हमें त्याग करना सिखाते हैं । हानि सहकर भी दूसरों को लाभ पहुंचाना और आनंद देना सिखाते हैं ।परोपकार करना, दूसरों की सहायता करना, ये सब गुण हमें वृक्षों से सिखने के लिए मिलते हैं । इसलिए, हिदू धर्मशास्त्र में वृक्षों की पूजा करने के लिए कहा गया है । वृक्षों के गुण हम अपनाएंगे, तो आनंदमय तथा आदर्श जीवन निश्चित जी सकेंगे । बालमित्रो, आज से हम सब वृक्ष के सभी गुण अपने में लाकर अपना तथा दूसरों का जीवन आनंदमय बनाने का प्रयास करेंगे । इसके लिए हम ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि वे हमें शक्ति तथा बुदि्ध दें ।

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इस पौराणिक कथा के पीछे छिपी है होली की कहानी, जानिए क्यों किया जाता है होलिका दहन 

हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक भाई दूज भी माना जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, साल में दो बार भाई दूज का पर्व मनाया जाता है , जो होली और दीपावली के बाद पड़ता है। इस दिन बहनें भाई की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए तिलक लगाकर रक्षा सूत्र बांधती हैं। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज का पर्व मनाते हैं। इसे भ्रातृ द्वितीया नाम से भी जानते हैं। जानिए होली भाई दूज की तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व। भाई दूज 2023 की तिथि और शुभ मुहूर्त चैत्र मास की द्वितीया तिथि आरंभ- 8 मार्च को रात 7 बजकर 42 मिनट से शुरू चैत्र मास की द्वितीया तिथि समाप्त- 9 मार्च को रात 8 बजकर 54 मिनट तक होली भाई दूज तिथि- 9 मार्च 2023, गुरुवार अभिजीत मुहूर्त – सुबह 11 बजकर 55 मिनट से दोपहर 12 बजकर 42 मिनट तक हस्त नक्षत्र- 9 मार्च को सुबह 4 बजकर 20 मिनट से 10 मार्च को सुबह 5 बजकर 57 मिनट तक होली  भाई दूज 2023 महत्व भाई दूज हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। दिवाली में होने वाली भाई दूज का अधिक महत्व है। लेकिन होली के अगले दिन पड़ने वाले भाई दूज का विशेष महत्व है। ये पर्ल भाई-बहन को एक-दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करने का अवसर देता है। इस दिन बहनें अपने भाईयों के लिए सुख, स्वस्थ और समृद्ध जीवन की कामना करती हैं। इसके साथ ही भाई अपनी बहनों को प्यार सा उपहार देते हैं।  कब है होली भाई दूज? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक भाई दूज भी माना जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, साल में दो बार भाई दूज का पर्व मनाया जाता है , जो होली और दीपावली के बाद पड़ता है। इस दिन बहनें भाई की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए तिलक लगाकर रक्षा सूत्र बांधती हैं। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज का पर्व मनाते हैं। इसे भ्रातृ द्वितीया नाम से भी जानते हैं। जानिए होली भाई दूज की तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व। भाई दूज 2023 की तिथि और शुभ मुहूर्त चैत्र मास की द्वितीया तिथि आरंभ- 8 मार्च को रात 7 बजकर 42 मिनट से शुरू चैत्र मास की द्वितीया तिथि समाप्त- 9 मार्च को रात 8 बजकर 54 मिनट तक होली भाई दूज तिथि- 9 मार्च 2023, गुरुवार अभिजीत मुहूर्त – सुबह 11 बजकर 55 मिनट से दोपहर 12 बजकर 42 मिनट तक होली  भाई दूज 2023 महत्व भाई दूज हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। दिवाली में होने वाली भाई दूज का अधिक महत्व है। लेकिन होली के अगले दिन पड़ने वाले भाई दूज का विशेष महत्व है। ये पर्ल भाई-बहन को एक-दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करने का अवसर देता है। इस दिन बहनें अपने भाईयों के लिए सुख, स्वस्थ और समृद्ध जीवन की कामना करती हैं। इसके साथ ही भाई अपनी बहनों को प्यार सा उपहार देते हैं। 

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होलिका के रंगोत्सव परंपरा की 5 पौराणिक कथाएं

होली का त्योहार क्यों मनाया जाता है इसके पीछे कुछ कारण या परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है, परंतु 5 ऐसी पौराणिक कथाएं हैं जिनके कारण होली का पर्व या रंगोत्सव मनाया जाता है। आओ जानते हैं कि आखिर इस त्योहार को मनाने की क्या है कथा। 1. आर्यों का होलका : प्राचीनकाल में होली को होलाका के नाम से जाना जाता था और इस दिन आर्य नवात्रैष्टि यज्ञ करते थे। इस पर्व में होलका नामक अन्य से हवन करने के बाद उसका प्रसाद लेने की परंपरा रही है। होलका अर्थात खेत में पड़ा हुआ वह अन्न जो आधा कच्चा और आधा पका हुआ होता है। संभवत: इसलिए इसका नाम होलिका उत्सव रखा गया होगा। प्राचीन काल से ही नई फसल का कुछ भाग पहले देवताओं को अर्पित किया जाता रहा है। इस तथ्य से यह पता चलता है कि यह त्योहार वैदिक काल से ही मनाया जाता रहा है। सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेषों में भी होली और दिवाली मनाए जाने के सबूत मिलते हैं। 2. होलिका दहन : होलिका दहन और होली के रंग के उत्सव की प्राचीन कथा भक्त प्रहलाद और उनकी बुआ होलिका और पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी हुई है। हिरण्यकश्यप खुद को भगवान समझता है और वह अपने पुत्र को विष्णु की पूजा और भक्ति से रोकता है। परंतु प्रहलाद इससे इनकार कर देता है। तब प्रहलाद को कई तरह से मारने का उपक्रम किया जाता है परंतु श्रीहरि विष्णु उसे बचा लेते हैं। अंत में होलिका प्रहलाद को गोदी में लेकर अग्नि में बैठ जाती हैं क्योंकि उसे अग्नि नहीं जलने का वरदान था। इसीलिए इस दिन असुर हरिण्याकश्यप की बहन होलिका दहन हुआ था। प्रहलाद बच गए थे। इसी की याद में होलिका दहन किया जाता है। यह होली का प्रथम दिन होता है। संभव: इसकी कारण इसे होलिकात्वस कहा जाता है। 3. कामदेव को किया था भस्म : इस दिन शिव ने कामदेव को भस्म करने के बाद जीवित किया था। कामदेव ने सभी देवताओं के कहने पर शिवजी की तपस्या को भंग कर दिया था क्योंकि सभी देवता चाहते थे कि शिवजी अपनी तपस्या से जागकर मां पार्वती से विवाह करें और उनसे जो पुत्र होगा वह हमारी तारकासुर से रक्षा करेगा। परंतु शिवजी ने कामदेव को भस्म कर दिया और बाद में रति को यह वचन दिया कि तुम्हारा यह पति द्वापर में श्रीकृष्‍ण का पुत्र प्रद्युम्न बनकर जन्मेगा।  4. राक्षसी ढुंढी और राजा पृथु : यह भी कहते हैं कि इसी दिन राजा पृथु ने राज्य के बच्चों को बचाने के लिए राक्षसी ढुंढी को लकड़ी जलाकर आग से मार दिया था। इसीलिए होली को ‘वसंत महोत्सव’ या ‘काम महोत्सव’ भी कहते हैं। 5. पूतना वध : जिस दिन राक्षसी पूतना का वध हुआ था उस दिन फाल्गुन पूर्णिमा थी। अत: बुराई का अंत हुआ और इस खुशी में समूचे नंदगांववासियो ने खूब जमकर रंग खेला, नृत्य किया और जमकर उत्सव मनाया। तभी से होली में रंग और भंग का समावेश होने लगा। फाग उत्सव : त्रैतायुग के प्रारंभ में विष्णु ने धूलि वंदन किया था। इसकी याद में धुलेंडी मनाई जाती है। होलिका दहन के बाद ‘रंग उत्सव’ मनाने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के काल से प्रारंभ हुई। तभी से इसका नाम फगवाह हो गया, क्योंकि यह फागुन माह में आती है। कृष्ण ने राधा पर रंग डाला था। इसी की याद में रंग पंचमी मनाई जाती है। श्रीकृष्ण ने ही होली के त्योहार में रंग को जोड़ा था। पहले होली के रंग टेसू या पलाश के फूलों से बनते थे और उन्हें गुलाल कहा जाता था। वो रंग त्वचा के लिए बहुत अच्छे होते थे क्योंकि उनमें कोई रसायन नहीं होता था। लेकिन समय के साथ रंगों में नए नए प्रयोग किए जाने लगे।

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होली से पहले शनि प्रदोष व्रत की डेट, शुभ मुहूर्त और उपाय यहां देखें

इस साल फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में आने वाला प्रदोष व्रत कब है आइए जानते हैं. फाल्गुन माह के दूसरे प्रदोष व्रत की डेट, मुहूर्त और पूजा विधि प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखा जाता है. ये तिथि भगवान शिव को समर्पित है. त्रयोदशी तिथि सप्ताह के जिस वार को होती है, प्रदोष व्रत उस नाम से जाना जाता है. जैसे सोमवार को आने वाला प्रदोष सोम प्रदोष कहलाता है. कहते हैं शिव को प्रसन्न करने के लिए सोम प्रदोष और शनि प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है. मान्यता है कि प्रदोष व्रत रखने वालों को हर दोष, रोग, दुख खत्म होते हैं और अच्छे दिनों की शुरुआत होने लग जाती है. इस साल फाल्गुन माह  के शुक्ल पक्ष में आने वाला प्रदोष व्रत कब है आइए जानते हैं. फाल्गुन माह के दूसरे प्रदोष व्रत की डेट, मुहूर्त और पूजा विधि पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की शनि त्रयोदशी तिथि 04 मार्च 2023, शुक्रवार के दिन प्रात:काल 11 बजकर 43 से प्रारंभ होकर 05 फरवरी 2023 को दोपहर 02 बजकर 07 बजे समाप्त होगी. प्रदोष व्रत में शिव पूजा शाम के समय की जाती है, इसलिए शनि प्रदोष व्रत 4 मार्च को मान्य होगा फाल्गुन प्रदोष व्रत फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाला प्रदोष व्रत 4 मार्च 2023, शनिवार को है. ये शनि प्रदोष व्रत होगा. फाल्गुन का ये दूसरा शनि प्रदोष व्रत है. इससे पहले महाशिवरात्रि के दिन शनि प्रदोष व्रत का संयोग बना था. शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से साधक को शिव और शनि देव दोनों का आशीर्वाद मिलता है. पुत्र प्राप्ति के लिए कामना के लिए शनि प्रदोष व्रत शुभ फलदायी माना गया है शनि प्रदोष व्रत 2023 मुहूर्त पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की शनि त्रयोदशी तिथि 04 मार्च 2023, शुक्रवार के दिन प्रात:काल 11 बजकर 43 से प्रारंभ होकर 05 फरवरी 2023 को दोपहर 02 बजकर 07 बजे समाप्त होगी. प्रदोष व्रत में शिव पूजा शाम के समय की जाती है, इसलिए शनि प्रदोष व्रत 4 मार्च को मान्य होगा शनि प्रदोष व्रत पूजा मुहूर्त –  शाम 06 बजकर 23 मिनट – रात 08 बजकर 50 (4 मार्च 2023) शनि प्रदोष व्रत पूजा मुहूर्त –  शाम 06 बजकर 23 मिनट – रात 08 बजकर 50 (4 मार्च 2023) यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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