हिन्दू धर्म के पौराणिक काल के 7 रहस्यमयी लोग

भारत चमत्कारों और रहस्यों से भरा देश है। भारत को देवभूमि कहे जाने के कई कारणों में से एक कारण यह ‍भी है कि यहां का दर्शन, धर्म और अध्यात्म सत्य सनातन है। इसके कारण ही दुनिया के अन्य धर्मों की उत्पत्ति हुई। ऋग्वेद दुनिया का प्रथम ऐसा धर्म ग्रंथ है जिसमें दर्शन, अध्यात्म, विज्ञान, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, कृषि, मौसम, समाज, राजनीति आदि अनेक विषयों की गंभीर जानकारी सम्मलित है। भारत की सीमा हिमालय के कैलाश पर्वत से लेकर श्रीलंका तक और हिन्दुकुश की पहाड़ी से लेकर अरुणाचल की पहाड़ियों तक फैली है। नीचे अरुणाचल की पहाड़ियों से लेकर बर्मा, थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया आदि तक फैली है। इसी भारत में कालांतर में पहले जनपद हुआ करते थे अब राष्ट्र और भिन्न भिन्न धर्मों में यह क्षेत्र बंट गया है। यह संपूर्ण क्षेत्र रहस्य, रोमांच, प्राचीन इतिहास और अध्यात्मिक ज्ञान से भरा हुआ है। आओ जानते हैं भारत के ऐसे 10 रहस्यमयी व्यक्तियों के बारे में जिनमें से कुछ के बारे में आप शायद ही जानते होंगे। ‘अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः॥ सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।’- पद्म पुराण (51/6-7) हम यह नहीं बताने वाले हैं:- हम आपको हनुमानजी, अश्वत्थामा, अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम और ऋषि मार्कण्डेय के बारे में बताने वाले नहीं है, जोकि आज भी जीवित हैं। हम जो ऐसे रहस्यमयी लोगों के बारे में बताने वाले हैं जिन्होंने विश्व की कई सभ्यताओं को प्रभावित किया है। जाम्बवन्त, जाम्बवंत, जामवंत या जाम्बवन  धरती पर जाम्बिया, जिम्बाब्वे, जामवन, जामुन, जाम्बेजी नदी आदि जाम्बवंतजी से मिलते जुलते कई नाम मिल जाएंगे। जाम्बवंतजी सतयुग में जन्मे और उनकी चर्चा रामायण काल के बाद द्वापाल काल में भी होती है। जाम्बवंतजी अग्नि देव और गंधर्व कन्या के पुत्र थे। जामवन्त की माता एक गंधर्व कन्या थी। जब पिता देव और माता गंधर्व थीं तो वे कैसे रीछमानव हो सकते हैं? प्राचीन काल में इंद्र पुत्र, सूर्य पुत्र, चंद्र पुत्र, पवन पुत्र, वरुण पुत्र, ‍अग्नि आदि देवताओं के पुत्रों का अधिक वर्णन मिलता है। जाम्बवन्तजी का जन्म सतयुग में हुआ था।  जाम्बवन्तजी रामायण काल में थे। उन्होंने ही हनुमानजी को उनकी खोई हुई शक्ति का स्मरण कराया था। आश्चर्य की वे लगभग 2500 वर्ष बाद बाद हुए महाभारत के काल में भी मौजूद थे जबकि वे अपनी पुत्री जाम्बवंति का विवाह भगवान श्रीकृष्ण से करते हैं। महाभारत में जाम्बवन्त, भगवान श्रीकृष्ण के साथ युद्ध करते हैं तथा यह पता पड़ने पर की वो एक विष्णु अवतार है, अपनी बेटी जामवंती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर देते हैं। जाम्बवन्तजी को रहस्यमयी व्यक्ति इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह सभी जानते हैं कि वे एक रीछ मानव थे। अब यह शोध का विषय हो सकता है कि वे मानव जैसे रीछ थे या कि रीछ जैसे मानव। वह कैसे इतने वर्षों तक जीवित रहे और महाभारत काल में उन्होंने उनकी पुत्री जामवंती कैसी थी? क्या वह भी रीछ मानव थी? एक दूसरी मान्यता अनुसार भगवान ब्रह्मा ने एक ऐसा रीछ मानव बनाया था जो दो पैरों से चल सकता था और जो मानवों से संवाद कर सकता था। पुराणों अनुसार वानर और मानवों की तुलना में अधिक विकसित रीछ जनजाति का उल्लेख मिलता है। वानर और किंपुरुष के बीच की यह जनजाति अधिक विकसित थी। हालांकि इस संबंध में अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है। गरुड़ : भगवान विष्णु के वाहन के रूप में गरुढ़ की प्रसिद्धि है। कहते हैं कि प्राचीनकाल में बहुत विशालकाय पक्षी हुआ करते थे। गरुड़ इतना विशालकाय पक्षी था कि वह अपनी चोंच में हाथी तक को दबा कर उड़ जाता था। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि वह कितना विशालकाय रहा होगा। इनके नाम से एक अलग पुराण भी है जिसे गरुड़ पुराण कहते हैं। इस पुराण को तब पढ़ा जाता है जब किसी के घर में किसी की मृत्यु हो गई हो। प्रत्येक घरों में गरुढ़ घंटी होती है। माता के मंदिर के द्वारा पर एक ओर गरुड़ तो दूसरी ओर हनुमानजी की मूर्ति प्रतिष्ठापित होती है। गरुड़ के बारे में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती है। रामायण में तो गरुड़ का सबसे महत्वपूर्ण पार्ट है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु की सवारी और भगवान राम को मेघनाथ के नागपाश से मुक्ति दिलाने वाले गरुड़ के बारे में कहा जाता है कि यह सौ वर्ष तक जीने की क्षमता रखता है। काकभुशुंडी नामक एक कौए ने गरुड़ को श्रीराम कथा सुनाई थी। लेकिन आज कल गरुड़ के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है। जटायु और संपाति गरुढ़ कुल के ही पक्षी थे। दक्ष प्रजापति की विनिता या विनता नामक कन्या का विवाह कश्यप ऋषि के साथ हुआ। कश्यप ऋषि से विनिता प्रसव के दौरान दो अंडे दिए। एक से अरुण का और दूसरे गरुढ़ का जन्म हुआ। अरुण तो सूर्य के रथ के सारथी बन गए तो गरुड़ ने भगवान विष्णु का वाहन होना स्वीकार किया। पक्षियों में गरुड़ को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यह समझदार और बुद्धिमान होने के साथ-साथ तेज गति से उड़ने की क्षमता रखता है। गिद्ध और गरुड़ में फर्क होता है। संपूर्ण भारत में गरुड़ का ज्यादा प्रचार और प्रसार किसलिए है यह जानना जरूरी है। गरुड़ भारत का धार्मिक और अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी है। भारत के इतिहास में स्वर्ण युग के रूप में जाना जाने वाले गुप्त शासकों का प्रतीक चिन्ह गरुड़ ही था। कर्नाटक के होयसल शासकों का भी प्रतीक गरुड़ था। गरुड़ इंडोनेशिया, थाईलैंड और मंगोलिया आदि में भी सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में लोकप्रिय है। इंडोनेसिया का राष्ट्रिय प्रतीक गरुड़ है। वहां की राष्ट्रिय एयरलाइन्स का नाम भी गरुड़ है। इंडोनेशिया की सेनाएं संयुक्त राष्ट्र मिशन पर गरुड़ नाम से जाती है। इंडोनेशिया पहले एक हिन्दू राष्ट्र ही था। थाईलैंड का शाही परिवार भी प्रतीक के रूप में गरुड़ का प्रयोग करता है। थाईलैंड के कई बौद्ध मंदिर में गरुड़ की मूर्तियाँ और चित्र बने हैं। मंगोलिया की राजधानी उलनबटोर का प्रतीक गरुड़ है।  मयासुर : बहुत ही कम लोगों को मालूम होगा की रावण के ससुर यानी मंदोदरी के पिता मयासुर थे। रावण की पत्नी मंदोदरी की मां हेमा एक अप्सरा थी और उसके पिता एक असुर। रामायण के उत्तरकांड के अनुसार मयासुर, कश्यप

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जब सत्यभामा को हुआ रूप का घमंड

श्रीकृष्ण भगवान द्वारका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। निकट ही गरूड़ और सुदर्शन चक्र भी बैठे हुए थे। तीनों के चेहरे पर दिव्य तेज झलक रहा था। बातों  ही बातों में रानी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु! आपने त्रेतायुग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं? द्वारकाधीश समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है। तभी गरूड़ ने कहा कि भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है? इधर सुदर्शन चक्र से भी रहा नहीं गया और वे भी कह उठे कि भगवान! मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है, क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। वे जान रहे थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट करने का समय आ गया है। ऐसा सोचकर उन्होंने गरूड़  से कहा कि हे गरूड़! तुम हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। गरूड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमान को लाने चले  गए। इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी! आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया। मधुसूदन ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते  हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई प्रवेश न करे।  भगवान की आज्ञा पाकर चक्र महल के प्रवेश द्वार पर तैनात हो गए। गरूड़ ने हनुमान के पास पहुंचकर कहा कि हे वानरश्रेष्ठ! भगवान राम, माता सीता के साथ द्वारका में आपसे  मिलने के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप मेरे साथ चलें। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा।  हनुमान ने विनयपूर्वक गरूड़ से कहा, आप चलिए, मैं आता हूं। गरूड़ ने सोचा, पता नहीं यह बूढ़ा वानर कब पहुंचेगा? खैर मैं भगवान के पास चलता हूं। यह सोचकर गरूड़ शीघ्रता से द्वारका की ओर उड़े। पर यह क्या? महल में पहुंचकर गरूड़ देखते हैं कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे हैं। गरूड़ का सिर लज्जा से झुक गया।  तभी श्रीराम ने हनुमान से कहा कि पवनपुत्र! तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं? हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के सामने रख दिया। हनुमान ने कहा कि प्रभु! आपसे मिलने से मुझे इस चक्र ने रोका था इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें।  भगवान मन ही मन मुस्कुराने लगे।  हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया- हे प्रभु! आज आपने माता सीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है?  अब रानी सत्यभामा का अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पलभर में चूर हो गया था। रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र व गरूड़जी तीनों का गर्व चूर-चूर  हो गया था। वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंखों से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए।  अद्भुत लीला है प्रभु की! अपने भक्तों के अंहकार को अपने भक्त द्वारा ही दूर किया उन्होंने। जीवन में कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। जरूरी नहीं है कि आज जो आपके पास है, वह कल भी होगा। अपने अंदर जरा-सा भी अगर अहंकार आने लगे तो स्वयं ठाकुरजी हमसे दूर हो जाते हैं। ठाकुरजी को नि:स्वार्थ भक्तों की ही जरूरत है, अहंकारी की नहीं। 

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भगवान श्रीहरि विष्णु के दशावतार की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथाएं

भगवान श्रीहरि विष्‍णु ने धर्म की रक्षा हेतु हर काल में अवतार लिया। वैसे तो भगवान विष्णु के अनेक अवतार हुए हैं लेकिन उनमें 10 अवतार ऐसे हैं, जो प्रमुख रूप से स्थान पाते हैं। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं भगवान श्रीहरि विष्णु के 10 अवतार यानी दशावतार की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथाएं।  1. मत्स्य अवतार पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए मत्स्यावतार लिया था। इसकी कथा इस प्रकार है- कृतयुग के आदि में राजा सत्यव्रत हुए। राजा सत्यव्रत एक दिन नदी में स्नान कर जलांजलि दे रहे थे। अचानक उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। उन्होंने देखा तो सोचा वापस सागर में डाल दूं, लेकिन उस मछली ने बोला- आप मुझे सागर में मत डालिए अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी। तब राजा सत्यव्रत ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। मछली और बड़ी हो गई तो राजा ने उसे अपने सरोवर में रखा, तब देखते ही देखते मछली और बड़ी हो गई। राजा को समझ आ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। राजा ने मछली से वास्तविक स्वरूप में आने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना सुन साक्षात चारभुजाधारी भगवान विष्णु प्रकट हो गए और उन्होंने कहा कि ये मेरा मत्स्यावतार है। भगवान ने सत्यव्रत से कहा- सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन बाद प्रलय होगी। तब मेरी प्रेरणा से एक विशाल नाव तुम्हारे पास आएगी। तुम सप्त ऋषियों, औषधियों, बीजों व प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को लेकर उसमें बैठ जाना, जब तुम्हारी नाव डगमगाने लगेगी, तब मैं मत्स्य के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा। उस समय तुम वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग से बांध देना। उस समय प्रश्न पूछने पर मैं तुम्हें उत्तर दूंगा, जिससे मेरी महिमा जो परब्रह्म नाम से विख्यात है, तुम्हारे ह्रदय में प्रकट हो जाएगी। तब समय आने पर मत्स्यरूपधारी भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत को तत्वज्ञान का उपदेश दिया, जो मत्स्यपुराण नाम से प्रसिद्ध है। 2. कूर्म अवतार धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। इसकी कथा इस प्रकार है- एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इन्द्र को श्राप देकर श्रीहीन कर दिया। इन्द्र जब  भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन करने के लिए कहा। तब इन्द्र भगवान विष्णु के कहे अनुसार दैत्यों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। देवताओं और दैत्यों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर ले चले, लेकिन वे उसे अधिक दूर तक नहीं ले जा सके। तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया। देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकि को नेती बनाया। किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए। भगवान कूर्म  की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ। 3. वराह अवतार धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने दूसरा अवतार वराह रूप में लिया था। वराह अवतार से जुड़ी कथा इस प्रकार है- पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए। जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। 4. भगवान नृसिंह भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- धर्म ग्रंथों के अनुसार दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से भी अधिक बलवान मानता था। उसे मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था। उसके राज में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था उसको दंड दिया जाता था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकशिपु का पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया। हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई। तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। 5. वामन अवतार सत्ययुग में प्रह्लाद के पौत्र दैत्यराज बलि ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। सभी देवता इस विपत्ति से बचने के लिए भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हें स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा। कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया। एक बार जब बलि महान यज्ञ कर रहा था तब भगवान वामन बलि की यज्ञशाला में गए और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने से मना कर दिया।

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इस दिन पड़ रही है मीन संक्रांति, जानें शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

सनातन धर्म में मीन संक्रांति का विशेष महत्व है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर माह एक संक्रांति तिथि पड़ती है। यानी पूरे साल में 12 महीनों की तरह 12 संक्रांति होती है। मीन संक्रांति भी उन्हीं में से एक है। हर माह में सूर्य के राशि परिवर्तन के साथ ही एक नई संक्रान्ति शुरू होती है। जब सूर्यदेव राशियों को बदलते हुए मीन राशि में प्रवेश करते हैं, तो इसे मीन संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में मीन संक्रान्ति को बहुत ज्यादा शुभ माना गया है। साथ ही इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। हिंदी कैलेंडर के मुताबिक मीन संक्रान्ति फाल्गुन माह में पड़ती है, इसलिए इसे साल की आखिरी संक्रान्ति के रूप में मनाया जाता हैं। इस बार मीन संक्रान्ति 15 मार्च को पड़ रही है। तो चलिए आज जानते हैं मीन संक्रान्ति का धार्मिक महत्व  और अन्य जानकारियां…  मीन संक्रान्ति का धार्मिक महत्व मान्यताओं के अनुसार मीन संक्रान्ति बहुत खास होती है। मीन संक्रान्ति से ही सूर्यदेव की गति उत्तरायण की तरफ बढ़ने लगती है। उत्तरायण के साथ दिन बड़ा और रात छोटी होने लगती है। कहा जाता है कि मीन संक्रान्ति पर पवित्र नदियों में स्नान करने से नकारात्मकता दूर होती है और पाप कटते हैं। साथ ही सुख समृद्धि आती है।  मीन संक्रांति का शास्त्रों में खास महत्व बताया गया है। इस दिन को सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ही पवित्र और शुभ नहीं माना जाता है, बल्कि व्यवहारिक रूप से भी उत्तम माना जाता है। मीन संक्रान्ति से उत्तरायण शुरू हो जाता है, जिसे देवताओं का समय कहा गया है। माना जाता है कि इस समय देवता काफी सशक्त हो जाते हैं। कहा जाता है कि  इस समय रातें छोटी होने के कारण नकारात्मक शक्तियों में भी कमी आ जाती है और दिन में ऊर्जा प्राप्त होती है। मीन संक्रांति का महत्व वैसे तो सभी संक्रांतियों का विशेष महत्व होता है लेकिन मीन संक्रांति के दिन गंगा स्नान और दान करने पर विशेष रूप से फलदायी मानी गई है। इस दिन सुबह जल्दी से उठकर भगवान सूर्यदेव की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। ज्योतिष में सूर्यदेव को आत्मा और मान-सम्मान का कारक ग्रह माना गया है इसलिए संक्रांति पर गंगा स्नान और सूर्यदेव की पूजा करने पर पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। संक्रांति के दिन में गुप्त शत्रुओं का नाश करने और मन से नकारात्मक ऊर्जा का दूर करने के लिए आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। इस दिन की जाती है सूर्य की उपासना मान्यता है कि इस दिन सूर्य की उपासना की जाती है। ऐसा करने से नकारात्मकाता दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। साथ ही इस दिन तिल, वस्त्र और अनाज का दान करना शुभ माना जाता है। सूर्य की साधना में मंत्रों का जप करने पर मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती है। सुख-समृद्धि और अच्छी सेहत का आशीर्वाद प्राप्त होता है। तमाम तरह की बीमारी और जीवन से जुड़े अपयश दूर हो जाते हैं। सूर्य के आशीर्वाद से आपके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता है। जीवन में सुख-समृद्धि और सफलता दिलाने वाले सूर्य मंत्र इस प्रकार हैं –  एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणाध्र्य दिवाकर।। ॐ घृणि सूर्याय नमः।। ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पतेए अनुकंपयेमां भक्त्याए गृहाणार्घय दिवाकररू।। ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ।।

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तिरुपति बालाजी की क्या है कहानी, भक्त क्यों देते हैं अपने बालों का दान

तिरुपति बालाजी का विश्व प्रसिद्ध आन्ध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के तिरुपति के पास तिरूमाला पहाड़ी पर स्थित है, जहां पर भगवान श्रीहरि विष्णु की वेंकटेश्वर के रूप में पूजा होती है। भगवान श्री वेंकटेश्वर अपनी पत्नी पद्मावती (लक्ष्मी माता) के साथ तिरुमला में निवास करते हैं। आओ जानते बालाजी की कहानी और भक्त क्यों देते हैं यहां पर अपने बालों का दान। तिरुपति बालाजी की कहानी तिरुपति बालाजी मंदिर से जुड़ी हमें दो कथाएं मिलती है। पहली कथा उनके वराह अवतार से जुड़ी है और दूसरी कथा माता लक्ष्मी और उनके वेंकटेश्‍वर रूप से जुड़ी हुई है। पहली कथा आदि काल में धरती पर जल ही जल हो गया था। यानी पैर रखने के लिए कोई जमीन नहीं बची थी। कहते हैं कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पवन देव ने भारी अग्नि को रोकने के लिए उग्र रूप से उड़ान भरी जिससे बादल फट गए और बहुत बारिश हुई और धरती जलमग्न हो गई। धरती पर पुन: जीवन का संचार करने के लिए श्रीहरि विष्णु ने तब आदि वराह अवतार लिया। उन्होंने अपने इस अवतार में जल के भीतर की धरती को ऊपर तक अपने तुस्क का उपयोग करके खींच लिया। इसके बाद पुन: ब्रह्मा के योगबल से लोग रहने लगे और आदि वराह ने तब बाद में ब्रह्मा के अनुरोध पर एक रचना का रूप धारण किया और अपने बेहतर आधे (4 हाथों वाले भूदेवी) के साथ कृदचला विमना पर निवास किया और लोगों को ध्यान योग और कर्म योग जैसे ज्ञान और वरदान देने का फैसला किया। दूसरी कथा  कलयुग के प्रारंभ होने पर आदि वराह वेंकटाद्री पर्वत छोड़कर अपने लोक चले गए जिसके चलते ब्रह्माजी चिंतित रहने लगे और नारद जी से विष्णु को पुन: लाने के लिए कहा। नारद एक दिन गंगा के तट पर गए जहां पर ऋषि इस बात को लेकर भ्रम में थे कि हमारे यज्ञ का फल त्रिदेवों में से किसे मिलेगा। नारद जी ने उनके शंका समाधान हेतु भृगु को यह कार्य सौंपा। भृगु ऋषि सभी देवताओं के पास गए, लेकिन भगवान शिव और विष्णुजी ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया तो वे क्रोधित हो गए। क्रोधित होकर भृगु ऋषि ने विष्णुजी की छाती पर एक लात मार दी। इसके बावजूद विष्णु जी ने ऋषि के पैरों की यह सोचकर मालिश की कि कहीं उनके पैरों में दर्द ना होने लगा हो। यह देखकर ऋषि भृगु को सभी ऋषियों को उत्तर दिया कि उनके यज्ञ का फल हमेशा भगवान विष्णु को समर्पित होगा। परंतु श्रीहरि विष्णु की छाती पर लात मारने के कारण माता लक्ष्मी क्रोधित हो गई। उन्हें अपने पति का अपमान सहन  नहीं हुआ और वे चाहती थीं कि भगवान विष्णु ऋषि भृगु को दंडित करें, परंतु ऐसा नहीं हुआ।परिणामस्वरूप उन्होंने वैकुंठ को छोड़ दिया और तपस्या करने के लिए धरती पर आ गई और करवीरापुरा (कोल्हापुर) में ध्यान करना शुरू कर दिया।  इधर, विष्णुजी के इस बात से दु:खी थे कि माता लक्ष्मी उन्हें छोड़कर चली गई। कुछ समय बाद वे भी धरती पर आकर माता लक्ष्मी को ढूंढने लगे। जंगल और पहाड़ियों पर भटकने के बाद भी वह माता को खोज नहीं पाए। आखिर परेशान होकर विष्णु जी वेंकटाद्री पर्वत में एक चींटी के आश्रय में विश्राम करने लगे। यह देखकर ब्रह्माजी के उनकी सहायता करने के फैसला किया। वे गाय और बछड़े का रूप धारण कर माला लक्ष्मी के पास गए।  देवी लक्ष्मी ने उन्हें देखा और उस वक्त के सत्ताशीस शासक चोल राजा को उन्हें सौंप दिया। राजा ने उसे चरवाहे को सौंप दिया। परंतु वह गाय सिर्फ विष्णुजी के रूप श्रीनिवास को ही दूध देती थी जिस कारण चरवाहे ने उस गाय को मारने का प्रयास किया। तब श्रीनिवास ने चरवाहे पर हमला करके गाय को बचाया और क्रोधित होकर उन्होंने चोल राजा को एक राक्षस के रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया। राजा ने दया की प्रार्थना की तब श्रीनिवास ने कहा कि राजा को दया तब मिलेगी जब वह अपनी बेटी पद्मावती का विवाह मुझसे करेगा। जब यह बात देवी लक्ष्मी (पद्मावती) को पता चली तो वे वहां आई और तब उन्होंने श्रीहरि को पहचान लिया और जिसके बाद भगवान् विष्णु और लक्ष्मी जी एक दूसरे से लिपट गए और इसके बाद वे पत्थर में बदल गए। फिर ब्रह्माजी और शिवजी ने हस्तक्षेप करके लोगों को इस अवतार के उद्देश्‍य से अवगत कराया। कहते हैं कि किसी काल में श्रीहरि विष्णु ने वेंकटेश्वर स्वामी के रूप में अवतार लिया था। यह भी कहा जाता है कि कलयुग के कष्ट से लोगों को बचाने के लिए उन्होंने यह अवतार लिया था। इसीलिए भगवान के इस रूप में मां लक्ष्मी भी समाहित हैं इसीलिए यहां बालाजी को स्त्री और पुरुष दोनों के वस्त्र पहनाने की यहां परम्परा है। बालाजी को प्रतिदिन नीचे धोती और उपर साड़ी से सजाया जाता है। तिरुपति बालाजी में बाल क्यों काटते हैं? बाल दान दने के पीछे का कारण यह माना जाता है कि भगवान वेंकटेश्वर कुबेर से लिए गए ऋण को चुकाते हैं। कथा अनुसार जब भगवान वेंकटेश्वर का पद्मावती से विवाह हुआ था। तब एक परंपरा के अनुसार वर को शादी से पहले कन्या के परिवार को एक तरह का शुल्क देना होता था, लेकिन भगवान वेंकटेश्वर ये शुल्क देने में असमर्थ थे, इसलिए उन्होंने कुबेर देवता से ऋण लेकर पद्मावती से विवाह किया और वचन दिया कि कलयुग के अंत तक वे कुबेर का सारा ऋण चुका देंगे। उन्होंने देवी लक्ष्मी की ओर से भी वचन देते हुए कहा कि जो भी भक्त उनका ऋण लौटाने में उनकी मदद करेंगे देवी लक्ष्मी उन्हें उसका दस गुना ज्यादा धन देंगी। इस कारण तिरुपति जाने वाले विष्णु भगवान पर आस्था रखने वाले भक्त बालों का दान कर भगवान विष्णु का ऋण चुकाने में उनकी मदद करते हैं।

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सूर्य ग्रहण पौराणिक कथा

सूर्य ग्रहण पौराणिक कथा नमस्कार पाठकों, इस लेख के माध्यम से आप सूर्य ग्रहण पौराणिक कथा प्राप्त कर सकते हैं।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य ग्रहण की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। मंधन के बाद जब अमृत निकला तो देवों और दानवों के बीच अमृत पान को लेकर विवाद और युद्ध हो रहा था। तब भगवान विष्णु जी ने इस समस्या को सुलझाने के लिए उपाय निकाला।सूर्य ग्रहण पौराणिक कथा का पाठ करने से भगवान् श्री हरी विष्णु नारायण जी की कृपा प्राप्त होती है तथा उसके घर में धन – धान्य के भंडार सदा – सदा के लिए भर जाते हैं। सूर्य ग्रहण संसार के लिए एक बहुत ही बड़ी भौगोलिक व आध्यात्मिक घटनाएं होती हैं। यदि आप भी ग्रहण के दौरान सकरात्मक रहना चाहते हैं, तो इस पौराणिक कथा का पाठ अवश्य करें सूर्य ग्रहण की पौराणिक कथा पौराणिक कथानुसार समुद्र मंथन के दौरान जब देवों और दानवों के साथ अमृत पान के लिए विवाद हुआ तो इसको सुलझाने के लिए मोहनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। जब भगवान विष्णु ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग बिठा दिया।लेकिन असुर छल से देवताओं की लाइन में आकर बैठ गए और अमृत पान कर लिया। देवों की लाइन में बैठे चंद्रमा और सूर्य ने राहु को ऐसा करते हुए देख लिया। इस बात की जानकारी उन्होंने भगवान विष्णु को दी, जिसके बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन राहु ने अमृत पान किया हुआ था, जिसके कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई और उसके सिर वाला भाग राहु और धड़ वाला भाग केतु के नाम से जाना गया। इसी कारण राहु और केतु सूर्य और चंद्रमा को अपना शत्रु मानते हैं और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा को ग्रस लेते हैं। इसलिए चंद्रग्रहण होता है। सूर्य नारायण की आरती जय कश्यप-नन्दन,ॐ जय अदिति नन्दन। त्रिभुवन – तिमिर – निकन्दन,भक्त-हृदय-चन्दन॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन। सप्त-अश्वरथ राजित,एक चक्रधारी। दु:खहारी, सुखकारी,मानस-मल-हारी॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन। सुर – मुनि – भूसुर – वन्दित,विमल विभवशाली। अघ-दल-दलन दिवाकर,दिव्य किरण माली॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन। सकल – सुकर्म – प्रसविता,सविता शुभकारी। विश्व-विलोचन मोचन,भव-बन्धन भारी॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन। कमल-समूह विकासक,नाशक त्रय तापा। सेवत साहज हरतअति मनसिज-संतापा॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन। नेत्र-व्याधि हर सुरवर,भू-पीड़ा-हारी। वृष्टि विमोचन संतत,परहित व्रतधारी॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन। सूर्यदेव करुणाकर,अब करुणा कीजै। हर अज्ञान-मोह सब,तत्त्वज्ञान दीजै॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।

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भगवान् परशुराम ने क्यों किया था महाबली सहस्त्रबाहु का वध

एक बार सहस्त्रबाहु अर्जुन अपनी सेना के साथ जंगल में ब्रह्मण के लिए गए होते है। उसी जंगल में परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि का आश्रम भी रहता है । सहस्त्रबाहु अर्जुन जंगल में विश्राम करने लिए लिए जमदग्नि के आश्रम देख अपनी सेनाओ के साथ आश्रम की और चल देते है । आश्रम पहुंचने के बाद ऋषि जमदग्नि सहस्त्रबाहु अर्जुन और उनकी सेनाओ का खूब सेवा सत्कार करते है और अपनी कामधेनु गाय की सहायता से उनका और उनकी सेनाओ के लिए राजसी भोजन की व्यवस्था भी करते है। ऋषी जग्मद्नी द्वारा सहस्त्रबाहु और उनके सानिको का इत्नी जल्दी राजसी भोजन की व्यव्स्था देख अचम्भित हो जाते है और सोचने लगते है की इतनी जल्दी और वो भी राजसी भोजन का प्रबनध एक साधरण ऋषि मुनि कैसे कर सकता है। जरूर इसके पास कोई रहस्य है। सहस्त्रबाहु ऋषि जग्मद्नी से यह सभी व्यवस्था करने का राज पूछते है । चमत्कारी कामधेनु गाय को बालपूर्वक ले जाते है ऋषि जगमदनी सहस्रबाहु अर्जुन को अपनी गाय कामधेनु के बारे में बातते हुए कहते है की महाराज यह सब इस गाय की कृपा है। कामधेनु गाय को देख और उसकी इस चमत्कार से प्रसन्न उस पर मोह जाते है और ऋषि जमदग्नि से कामधेनु गाय को अपने साथ ले जाने की इच्छा जाहिर करते है। परन्तु ऋषि जग्मद्नी कामधेनु गाय को ले जाने से इंकार कर देते हैं। ऋषि जग्मद्नी द्वारा मना करने पर सहस्रबाहु क्रोधित हो जाते है और बलपूर्वक काम धेनु गाय को अपने साथ ले जाते है। अपने पिता के अपमान सुन परशुराम क्रोधित हो उठते है कुछ समय बाद परशुराम जब आश्रम आते तो उन्हें उनके पिता घटना के बारे में बताते है और यह सुन परशुराम अत्यंत क्रोधित हो उठते और अपना फ़ारसु उठा सहस्रबाहु के नगर महिस्मती की और चल देते हैं। सहस्रबाहु कामधेनु और अपनी सेनाओ के साथ रास्ते में ही होते है । सहस्रबाहु परशुराम को अपनी ओर त्रीव गति से आते हुए देख अपनी सेनाओ को परशुराम को रोकने का आदेश देते है। सहस्रबाहु की सेना परशुरराम को रोकने के लिए उनके पास आती है पर कुछ पालों मे ही परशुराम हजारो सेनिको के रक्त से युद्ध भूमि को लाल कर देते है । अपनी सेनाओ का नष्ट होता देख सहस्रबाहु अर्जुन स्वयं परशुराम से युद्ध करने के लिए आ जाते हैं और घनघोर युद्ध प्रारम्भ हो जाता है। सहस्रबाहु का वध परन्तु सहस्रबाहु के लिए परशुराम के समक्ष टिक पाना असंभव ही था सहस्रबाहु जब अपनी हजारो भुजाओ से परशुराम को जकड़ने के लिए आगे बढते है तो परशुराम अपनी परसु से उनकी एक एक कर सभी भुजाओ को काट उसका सर धड़ से अलग कर डालते है । सहस्रबाहु अर्जुन वध के बाद भगववान परशुराम अपनी कामधेनु गाय को लेकर अपने पिता को सौप देते है। ऋषि जग्मद्नी अपने गाय को देख काफी प्रसन्न हो जाते है और अपने पुत्र परशुराम को गले लगाकर उन्हें आशीर्वाद देते है। क्यों परशुराम पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय विहीन करते है कहा जाता है जब सहस्रबाहु के पुत्रों ने अपने पिता का प्रतिशोध लेने के लिए परशुराम के पिता का छल पूर्वक वध कर देते है। जब जमदन्गि का वध हो जाता है तो उनकी पत्नी रेणुका भी उनके साथ अग्नि में लीन हो जाती है। इस घटना से परशुराम अति क्रोधित हो सहस्रबाहु के पुत्रों का वध कर देते है और साथ ही महिस्मती राज्य को भी उजाड़ डालते है और पृथ्वी से 21 बार सभी क्षत्रियों का नाश कर पृथ्वी को क्षत्रियविहीन करने के बाद परशुराम एक बड़े पर्वत पर जा भगवान् शिव के ध्यान में लीन हो जाते है। क्यों काटा था भगवान परशुराम ने अपनी ही माँ का सिर पुराणों के अनुसार भगवान परशुराम को श्री हरि विष्णु के अवतार माना गया है। भगवान विष्णु का यह सबसे क्रूर अवतार था। शिव जी द्वारा प्राप्त परशु के कारण ही उनका नाम परशुराम पड़ा था। परशुराम महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका की संतान थे। परशुराम उनके सबसे छोटे कर लाडले पुत्र थे पांचो भाइयों में परशुराम ही सबसे तेजस्वी और न्याय पूर्ण योद्धा थे।  धरती पर उनके जैसा योद्धा कोई नहीं था। परशुराम अपने माता-पिता के सबसे लाडले और आज्ञाकारी पुत्र होते हुए भी उन्होंने माता का सिर काट दिया था आखिर उन्होने ऐसा कठोर कदम क्यों लेना पड़ा ऐसा क्या कारण था जो उनकी माता के जीवन से भी बढ़कर था। आगे हम इसके बारे में विस्तारपूर्वक पड़ेंगे। परशुराम के पिता जगमदनी बड़े ज्ञानी और तपस्वी थे उन्हें सभी प्रकार की सिद्धियों का ज्ञान था।  परशुराम अपने पिता की आज्ञाकारी पुत्र थे और पिताजी की हर आज्ञा को पत्थर की लकीर मान हर हाल में पूर्ण करते थे। माता रेणुका से हो गई थी यह एक भूल और महर्षि जमदग्नि हुए क्रोधित एक बार की बात है ऋषि जग मदनी के स्नान के लिए पत्नी रेणुका नदी में पानी लेने के लिए गई वही कुछ दूरी पर राजा चित्र भी स्नान कर रहे थे। राजा चित्ररथ को देख वह काफी समय तक वह उन्हें ही स्नान करते देखती रही। उनका मन विचलित हो गया और भूल गई कि उन्हें अपने पति के लिए स्नान का पानी ले जाना था। काफी समय हो गया महर्षि जमदग्नि पत्नी रेणुका की प्रतीक्षा में बैठे उनका इंतजार करते रहे। जब पत्नी रेणुका आश्रम पहुंची तो ऋषि जगमदनी ने अपनी ध्यानशक्ति से उनके देर में आने का कारण ज्ञात करना चहा इससे उन्हें सब ज्ञात हो गया और महाऋषि जगमादनी अपनी पत्नी पर क्रोधित हो उठे। पिता ने दया चारो पुत्रों को दिया अपनी ही माँ का सर काट देने का आदेश उसी समय उनके चारो पुत्र रघुवंशी शुरू वस्तु और विश्वासों भी आश्रम आ गए  थे। महर्षि जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को बारी-बारी से अपनी मां का वध करने को कहा पर किसी ने भी माँ की मोहा वश ऐसा करने का हिम्मत नहीं जुटा पाए। किसी ने भी पिता की आज्ञा को नहीं माना और सभी पीछे हट गए क्योंकि हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार किसी भी स्त्री की हत्या को बहुत बड़ा पाप माना गया है और यही अपनी ही मां का वध करने की बात थी लेकिन पिता आज्ञा

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 महाभारत के सबसे शक्तिशाली अस्त्र सुदर्शन चक्र से जुडी कुछ रोचक कथा

के अनुसार ऐसा अस्त्र है जो विरोधी के हर वार को विफल कर देता था ऐसा अस्त्र जो अभेद और अपना कार्य  को  पूरा करने के बाद ही वापस आता था । आखिर महाभारत के बाद सुदर्शन का क्या हुआ और अब सुदर्शन चक्र कहां है और भगवान विषणु जी को यह अस्त्त्र कैसे प्राप्त हुआ था। अखिर भगवान विषणु जी को सुदर्शन चक्र कैसे प्रप्त हुआ  दरअसल सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का अस्त्र था और इसे उनके ही अवतार धारण कर सकते थे । यह अस्त्र एक साथ कई कार्य कर सकता था इसके निर्माण के पीछे भी कई अलग-अलग मान्यताएं है । शिव पुराण के अनुसार एक बार भगवान विषणु कैलाश पर्वत पर चले गए और वहां पहुंचकर वह विधि पूर्वक शिव की तपस्या करने लग गए । श्री विष्णु भगवान ने कई हजार नामों से शिवजी की स्तुति कर तथा प्रत्येक नाम उच्चारण के साथ एक कमल पुष्प शिवज को अर्पण करते थे ।  भगवान विष्णु की उपासना कई वर्षों तक निर्वात चलती रही एक दिन भगवान शिव परमात्मा ने विष्णु की भक्ति की परीक्षा लेनी चाही । भगवान विष्णु हर बार की तरह एक कमल पुष्प शिव को अर्पण करने के लिए लेकर आए तब भगवान शिव ने एक कमल पुष्प कहीं छुपा दिया । शिव माया के द्वारा इस घटना का पता भगवान विष्णु को भी नहीं लगा उन्होंने गिनती में एक पुष्प कम पाकर उसकी खोज आरंभ कर दी ।   श्री भगवान विष्णु ने पुरे ब्रह्मांड का भ्रमण कर लिया परंतु उन्हें वह पुष्प नहीं नहीं मिला । तत्पश्चात भगवान विष्णु एक कमल के बदले अपना एक नेत्र उस स्थान अर्पित कर दिया ।   भगवान विष्णु के इस त्याग से खुश होकर भगवान शिव प्रकट हो विष्णु भगवान को सुदर्शान चक्र कि भेट करते है। बोलते है यह चक्र सृष्टि संचालन के कार्य के लिए उपयोग में आएगी । अन्य पुराणों के अनुसार यह बताया गया है कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने सूर्य की अभेद राख से उन्होंने तीन चीजों का निर्माण किया था पहला पुष्पक विमान, त्रिशूल और सुदर्शन चक्र । जबकि ऋग्वेद के अनुसार सुदर्शन चक्र का वर्णन अलग ही तरह से किया गया है इसमें सुदर्शन चक्र को समय का चक्र बताया गया है कि वह समय को भी माप सकता था सुदर्शन चक्र से ही भगवान विष्णु ने माता सती के पार्थिव शरीर के 51 हिस्से किए थे महाभारत काल में भी श्री कृष्णा ने शिशु पाल का वध सुदर्शान चक्र से ही किया था । महाभारत में जब अर्जुन ने जब जयद्रत को सूरज ढलने से पहले मारने  का वचन लिया जब श्री कृष्ण ने  सुदर्शन चक्र से ही सूर्य को ढक लिया था लेकिन इसके बाद सुदर्शन चक्र का कोई भी कोई वर्णन नहीं मिलता । आखिर जब श्री कृष्ण ने देह त्याग किया तब सुदर्शान चक्र का क्या हुआ ? इसका जवाब हमें भविष्य पुराण में मिलता है जिसमें बताया गया है कि सुदर्शन चक्र को भगवान विष्णु या उनके अवतार के सिवा ना ही कोई धारण कर सकता है और न ही कोई चल चला सकता है जब श्री कृष्ण ने देह त्याग किया सुदर्शन चक्र वही धरती में समा गया और भविष्य में जब कल्कि अवतार जन्म लेंगे तब वही सुदर्शन चक्र को दोबारा पृथ्वी गर्भ से ग्रहण करेंगे । कलयुग के अंत के समय जब बुराई अपनी चरम पर होगी तब भगवान परशुराम और हनुमान कलकी अवतार में आएंगे और उन्हें प्रशिक्षण देंगे तब युद्ध में कल्कि अवतार सुदर्शन चक्र को धारण कर उसका उपयोग करेंगे जिससे वह बुराई अंत कर देंगे। परंतु हम ऋग्वेद में बताएं जल चक्र का वर्णन देखें तो सुदर्शन चक्र ऐसा अस्त्र नहीं था जैसा हम समझते हैं । उसमें बताया गया है सुदर्शन चक्र समय के चक्र को कहा गया है । इसी का इस्तेमाल भगवान विष्णु करते हैं समय के अंतराल का उपयोग कर वह किसी बी विरोधी को शक्तिहीन कर देते हैं । महाभारत में भी जब श्री कृष्ण ने अर्जुन को विराट रूप दिखाया था तब सुदर्शन चक्र के इस्तेमाल से ही समय को रोक दिया था तब रुके हुए समय में ही श्री कृष्ण अर्जुन को गीता का पूरा ज्ञान दिया था अगर हम ऋग्वेद के ज्ञान से समझें तो सुदर्शन चक्र कोई भौतिक अस्त्र था ही नहीं जो कोई और देख या धारण कर सके यह सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु का अवैध गुण है जो हमेशा उनके और उनके अवतारों के साथ रहेगा। तो दोस्तों कैसे लगी आपको यह पौराणिक कथा Comment box मे कमेंट कर बातायें ।

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शीतला अष्टमी को क्यों किया जाता है बासी भोजन, जानें पौराणिक कथा

चैत्र मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन माता शीतला की पूजा करने का विधान है। मान्यता है कि शीतला अष्टमी पर माता शीतला की पूजा करने से चेचक और नेत्रों से संबंधित विकारों से मुक्ति प्राप्त होती है। शीतला अष्टमी पर लोग अपने घरों में चूल्हा नहीं जलाते हैं। इस दिन माता शीतला को दही, राबड़ी, मीठे चावल और पुआ का भोग लगाया जाता है। ये सभी सामान सप्तमी की रात में ही बनाकर रख लिया जाता है। इसके साथ ही अष्टमी तिथि को शीतल जल से ही स्नान किया जाता है। मान्यता है कि माता शीतला को शीतल जल और ठंडा भोजन बहुत प्रिय है। इससे माता प्रसन्न होती हैं और आरोग्यता प्रदान करती हैं। माता शीतला को रात का बासी भोजन और शीतल जल अर्पित करने के पीछे पौराणिक कथा है, तो चलिए जानते हैं कि शीतला अष्टमी पर क्यों है बासी भोजन का भोग लगाने और बासी भोजन करने की परंपरा। शीतल अष्टमी की पौराणिक कथाशीतला माता के संदर्भ में प्रचलित एक कथा के अनुसार, एक दिन माता ने सोचा कि धरती पर चल कर देखें कि उनकी पूजा कौन-कौन करता है। माता एक बुढ़िया का रूप धारण कर राजस्थान के डूंगरी गांव में गई। माता जब गांव में जा रही थी कि तभी ऊपर से किसी ने चावल का उबला हुआ पानी डाल दिया। जिससे माता के पूरे शरीर पर छाले हो गए और पूरे शरीर में जलन होने लगी। माता दर्द में कराहते हुए गांव में सभी से सहायता मांगी परंतु किसी ने भी उनकी सहायता नहीं की। गांव में कुम्हार परिवार की एक महिला ने जब देखा कि एक बुढ़िया दर्द से कराह रही है तो उसने माता को बुलाकर घर पर बैठाया और बहुत सारा ठंडा जल माता के ऊपर डाला। ठंडे जल के प्रभाव से माता को उन छालों की पीड़ा में राहत महसूस हुई। इसके बाद कुम्हारिन महिला ने माता से कहा कि मेरे पास केवल रात के दही और राबड़ी रखी हुई हैं आप इनको खाये। रात के रखे दही और ज्वार की राबड़ी खा कर माता को शरीर में बहुत ठंडक मिली। इसके बाद कुम्हारिन ने माता से कहा कि आपके बाल बिखरे है लाइए मैं इनको गूथ देती हूं।जैसे ही वह महिला माता शीतला की चोटी बनाने लगी तो उसे बालों के नीचे छुपी तीसरी आंख दिखी। यह देखकर वह डर कर भागने लगी। तभी माता ने कहा बेटी डरो मत में शीतला माता हूं और मैं धरती पर ये देखने आई थी कि मेरी पूजा कौन करता है। माता शीतला अपने मूल रूप में प्रकट हो गई। कुम्हारिन महिला शीतला माता को देख कर भाव विभोर हो गई। उस कुम्हारिन ने माता से कहा माता मैं तो बहुत गरीब हूं। आपको कहा बैठाऊ। मेरे पास तो आसन भी नहीं है। माता मुस्कुराते कुम्हारिन के गधे पर जाकर बैठ गई और झाडू से कुम्हारिन के घर से सफाई कर डलिया में डाल कर उसकी गरीबी को बाहर फेंक दिया। कुम्हारिन के निस्वार्थ श्रद्धा भाव से प्रसन्न होकर माता ने उससे वर मांगने को कहा। कुम्हारिन ने हाथ जोड़कर कहा माता आप वर देना चाहती है तो आप हमारे डूंगरी गांव में ही निवास करे और जो भी इंसान आपकी श्रद्धा भाव से सप्तमी और अष्टमी को पूजा करें और व्रत रखे तथा आपको ठंडा व्यंजन का भोग लगाएं उसकी गरीबी भी ऐसे ही दूर करें। पूजा करने वाली महिला को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दें। माता शीतला ने कहा बेटी ऐसा ही होगा और कहा कि मेरी पूजा का मुख्य अधिकार कुम्हार को ही होगा। कहा जाता है कि इसलिए ही माता शीतला को ठंडा बासी भोजन और शीतल जल प्रिय है।  बच्चों की लंबी उम्र के लिए कर रहे हैं संतान सप्तमी का व्रत तो जरूर पढ़ें यह व्रत कथा भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन संतान सप्तमी का व्रत किया जाता है. यह व्रत महिला और पुरुष दोनों रख सकते हैं. यह व्रत संतान प्राप्ति की मनोकामना और संतान की सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है. इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन होता है. कहते हैं कि अगर वह प्रसन्न हो जाएं तो जातक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. अगर आप भी संतान सप्तमी का व्रत कर रहे हैं तो व्रत कथा अवश्य पढ़ें. कथा के बिना कोई भी अधूरा माना जाता है. संतान सप्तमी व्रत कथा पौराणिक कथा के अनुसार यह कथा श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी. एक बार मथुरा में लोमश ऋषि आए. देवकी और वसुदेव ने भक्तिपूर्वक उनकी सेवा की. देवकी और वसुदेव की सेवा से प्रसन्न होकर लोमेश ऋषि ने उन्हें कंस द्वारा मारे गए पुत्रों के शोक से उबरने का उपाया बताया और कहा कि उन्हें ‘संतान सप्तमी’ का व्रत करना चाहिए. लोमश ऋषि ने देवकी और वसुदेव को व्रत की विधि और कथा सुनाई, जो इस प्रकार है- अयोध्यापुरी नगर का प्रतापी राजा था, जिसका नाम नहुष था. उसकी पत्नी का नाम चंद्रमुखी था. उसी राज्य में विष्णुदत्त नाम का एक ब्राह्मण भी रहता था. उसकी पत्नी का नाम रूपवती था. रानी चंद्रमुखी तथा रूपवती सखियां थीं. दोनों साथ में ही सारा काम करतीं. स्नान से लेकर पूजन तक दोनों एक साथ ही करतीं. एक दिन सरयू नदी में दोनों स्नान कर रही थीं और वहीं कई स्त्रियां स्नान कर रही थीं. सभी ने मिलकर वहां भगवान शंकर और मां पार्वती की एक मूर्ति बनाई और उसकी पूजा करने लगीं. चंद्रमुखी और रूपवती ने उन स्त्रियों से इस पूजन का नाम और विधि बताने कहा. उन्होंने बताया कि यह संतान सप्तमी व्रत है और यह व्रत संतान देने वाला है. यह सुनकर दोनों सखियों ने इस व्रत को जीवनभर करने का संकल्प लिया. लेकिन घर पहुंचकर रानी भूल गईं और भोजन कर लिया. मृत्यु के बाद रानी वानरी और ब्राह्मणी मुर्गी की योनि में पैदा हुईं. कालांतर में दोनों पशु योनि छोड़कर पुनः मनुष्य योनि में आईं. चंद्रमुखी मथुरा के राजा पृथ्वीनाथ की रानी बनी तथा रूपवती ने फिर एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया. इस जन्म में रानी का नाम ईश्वरी तथा ब्राह्मणी का नाम भूषणा था.

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शीतला सप्तमी व्रत कथा

शीतला सप्तमी का त्योहार हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। वहीं कुछ जगह पर ये व्रत अष्टमी तिथि पर भी मनाया जाता है। मुख्य रूप से ये त्योहार उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के क्षेत्रों में मनाया जाता है। शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए इस त्योहार पर ठंडा खाना खाया जाता है। इस व्रत में एक दिन पूर्व बनाया हुआ भोजन किया जाता है, अत: इसे बसौड़ा, बसियौरा व बसोरा भी कहते हैं। कथा के अनुसार एक साहूकार था जिसके सात पुत्र थे। साहूकार ने समय के अनुसार सातों पुत्रों की शादी कर दी परंतु कई वर्ष बीत जाने के बाद भी सातो पुत्रों में से किसी के घर संतान का जन्म नहीं हुआ। पुत्र वधूओं की सूनी गोद को देखकर साहूकार की पत्नी बहुत दु:खी रहती थी। एक दिन एक वृद्ध स्त्री साहूकार के घर से गुजर रही थी और साहूकार की पत्नी को दु:खी देखकर उसने दु:ख का कारण पूछा। साहूकार की पत्नी ने उस वृद्ध स्त्री को अपने मन की बात बताई। इस पर उस वृद्ध स्त्री ने कहा कि आप अपने सातों पुत्र वधूओं के साथ मिलकर शीतला माता का व्रत और पूजन कीजिए, इससे माता शीतला प्रसन्न हो जाएंगी और आपकी सातों पुत्र वधूओं की गोद हरी हो जाएगी। साहूकार की पत्नी तब माघ मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि (Magha Shukla Shasti tithi) को अपनी सातों बहूओं के साथ मिलकर उस वृद्धा के बताये विधान के अनुसार माता शीतला का व्रत किया। माता शीतला की कृपा से सातों बहूएं गर्भवती हुई और समय आने पर सभी के सुन्दर पुत्र हुए। समय का चक्र चलता रहा और माघ शुक्ल षष्ठी तिथि आई लेकिन किसी को माता शीतला के व्रत का ध्यान नहीं आया। इस दिन सास और बहूओं ने गर्म पानी से स्नान किया और गरमा गरम भोजन किया।माता शीतला इससे कुपित हो गईं और साहूकार की पत्नी के स्वप्न में आकर बोलीं कि तुमने मेरे व्रत का पालन नहीं किया है इसलिए तुम्हारे पति का स्वर्गवास हो गया है। स्वप्न देखकर साहूकार की पत्नी पागल हो गयी और भटकते भटकते घने वन में चली गईं। वन में साहूकार की पत्नी ने देखा कि जिस वृद्धा ने उसे शीतला माता का व्रत करने के लिए कहा था वह अग्नि में जल रही है। उसे देखकर साहूकार की पत्नी चंक पड़ी और उसे एहसास हो गया कि यह शीतला माता है। अपनी भूल के लिए वह माता से विनती करने लगी, माता ने तब उसे कहा कि तुम मेरे शरीर पर दही का लेपन करो इससे तुम्हारे पर जो दैविक ताप है वह समाप्त हो जाएगा। साहूकार की पत्नी ने तब शीतला माता के शरीर पर दही का लेपन किया इससे उसका पागलपन ठीक हो गया व साहूकार के प्राण भी लट आये। शीतला माता व्रत विधि कथा में माता शीतला के व्रत की विधि का जैसा उल्लेख आया है उसके अनुसार अनुसार शीतला षष्ठी के दिन स्नान ध्यान करके शीतला माता की पूजा करनी चाहिए (Sheetla Shasti)। इस दिन कोई भी गरम चीज़ सेवन नहीं करना चाहिए। शीतला माता के व्रत के दिन ठंढ़े पानी से स्नान करना चाहिए। ठंढ़ा ठंढ़ा भोजन करना चाहिए। उत्तर भारत के कई हिस्सों में इसे बसयरा (Basyorra) भी कहते हैं। इसे बसयरा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन लोग रात में बना बासी खाना पूरे दिन खाते हैं। शीतला षष्ठी के दिन लोग चुल्हा नहीं जलाते हैं बल्कि चुल्हे की पूजा करते हैं। इस दिन भगवान को भी रात में बना बासी खाना प्रसाद रूप में अर्पण किया जाता है। इस तिथि को घर के दरबाजे, खिड़कियों एवं चुल्हे को दही, चावल और बेसन से बनी हुई बड़ी मिलाकर भेंट किया जाता है। इस तिथि को व्रत करने से जहां तन मन शीतल रहता है वहीं चेचक से आप मुक्त रहते हैं। शीतला षष्ठी (Sheetla Sasti) के दिन देश के कई भागो में मिट्टी पानी का खेल उसी प्रकार खेला जाता है जैसे होली में रंगों से। शीतला सप्तमी का महत्व शीतला सप्तमी का व्रत करने से शीतला माता प्रसन्न होती हैं तथा जो यह व्रत करता है, उसके परिवार में दाहज्वर, पीतज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े, नेत्र के समस्त रोग तथा ठंड के कारण होने वाले रोग नहीं होते। इस व्रत की विशेषता है कि इसमें शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी पदार्थ एक दिन पूर्व ही बना लिए जाते हैं और दूसरे दिन इनका भोग शीतला माता को लगाया जाता है। इसीलिए इस व्रत को बसोरा भी कहते हैं। मान्यता के अनुसार इस दिन घरों में चूल्हा भी नहीं जलाया जाता यानी सभी को एक दिन बासी भोजन ही करना पड़ता है। शीतला माता की आरतीजय शीतला माता, मैया जय शीतला माता,आदि ज्योति महारानी सब फल की दाता।।ऊं जय शीतला माता।रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भ्राता।ऋद्धिसिद्धि चंवर डोलावें, जगमग छवि छाता।।ऊं जय शीतला माता।विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता।वेद पुराण बरणत पार नहीं पाता।।ऊं जय शीतला माता।इन्द्र मृदंग बजावत चन्द्र वीणा हाथा।सूरज ताल बजाते नारद मुनि गाता।।ऊं जय शीतला माता।घंटा शंख शहनाई बाजै मन भाता।करै भक्त जन आरति लखि लखि हरहाता।।ऊं जय शीतला माता।ब्रह्म रूप वरदानी तुही तीन काल ज्ञाता,भक्तन को सुख देनौ मातु पिता भ्राता।।ऊं जय शीतला माता।जो भी ध्यान लगावैं प्रेम भक्ति लाता।सकल मनोरथ पावे भवनिधि तर जाता।।ऊं जय शीतला माता।रोगन से जो पीडित कोई शरण तेरी आता।कोढ़ी पावे निर्मल काया अन्ध नेत्र पाता।।ऊं जय शीतला माता।बांझ पुत्र को पावे दारिद कट जाता।ताको भजै जो नाहीं सिर धुनि पछिताता।।ऊं जय शीतला माता।शीतल करती जननी तुही है जग त्राता।उत्पत्ति व्याधि विनाशत तू सब की घाता।।ऊं जय शीतला माता।दास विचित्र कर जोड़े सुन मेरी माता ।भक्ति आपनी दीजै और न कुछ भाता।।ऊं जय शीतला माता।

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सबसे बड़ा पुण्य

एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था . यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था. एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए. राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा- “ महाराज, आपके हाथ में यह क्या है देव बोले- “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं.” राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?” देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया. राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है.” उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए. कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी. इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी. राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा- “महाराज ! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?” देव ने कहा- “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं !” राजा ने कहा- “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग ? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे !! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है ? ” देव महाराज ने बहीखाता खोला , और ये क्या , पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था। राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ ? देव ने कहा- “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं. जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है. ऐ राजन! तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है. परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं. देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे..”अर्थात ‘कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे.’ राजन! भगवान दीनदयालु हैं. उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है.. सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो. दीन-दुखियों का हित-साधन करो. अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है..” राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं। मित्रों, जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है. हमारे पूर्वजों ने कहा भी है- “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है. और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप वह ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे .

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हनुमान जी की मां से हुई भूल, बन गई अप्सरा से वानरी 

एक बार देवराज इंद्र की सभा स्वर्ग में लगी हुई थी। इसमें दुर्वासा ऋषि भी भाग ले रहे थे। जिस समय सभा में विचार-विमर्श चल रहा था उसी समय सभा के मध्य ही ‘पुंजिकस्थली’ नामक इंद्रलोक की अप्सरा बार-बार इधर से उधर आ-जा रही थी। सभा के मध्य पुंजिकस्थली का यह  एक बार देवराज इंद्र की सभा स्वर्ग में लगी हुई थी। इसमें दुर्वासा ऋषि भी भाग ले रहे थे। जिस समय सभा में विचार-विमर्श चल रहा था उसी समय सभा के मध्य ही ‘पुंजिकस्थली’ नामक इंद्रलोक की अप्सरा बार-बार इधर से उधर आ-जा रही थी। सभा के मध्य पुंजिकस्थली का यह आचरण ऋषि दुर्वासा को अच्छा न लगा। दुर्वासा ऋषि अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने पुंजिकस्थली को कई बार टोक कर ऐसा करने से मना किया लेकिन वह अनसुना कर वैसा ही करती रही तो दुर्वासा ऋषि ने कहा, ‘‘तुझे देव-सभा की मर्यादा का ज्ञान नहीं। तू कैसी देव-अप्सरा है जो वानरियों की तरह बार-बार आ-जाकर सभा में व्यवधान डाल रही है। जा, अपनी इस आदत के कारण तू वानरी हो जा। दुर्वासा ऋषि का शाप सुन कर पुंजिकस्थली सन्न रह गई। अपने आचरण का यह परिणाम वह सोच भी नहीं सकती थी, पर अब क्या हो सकता था ? भूल हो चुकी थी। उसके कारण वह शापग्रस्त भी हो गई। उसने हाथ जोड़कर अनुनय-विनय कर कहा, ‘‘ऋषिवर! अपनी मूढ़ता के कारण यह भूल मैं अनजाने में करती रही और आपकी वर्जना पर भी ध्यान न दिया। सभा में व्यवधान डालने का मेरा कोई उद्देश्य न था। कृपया बताइए, अब आपके इस श्राप से मेरा उद्धार कैसे होगा?’’ अप्सरा की विनती सुन कर ऋषि दुर्वासा पसीजे बोले, ‘‘अपनी इस चंचलता के कारण अगले जन्म में तू वानर जाति के राजा विरज की कन्या के रूप में जन्म लेगी। तू देव-सभा की अप्सरा है, अत: तेरे गर्भ से एक महान बलशाली, यशस्वी तथा प्रभु-भक्त बालक का जन्म होगा।’’ पुंजिक अप्सरा को संतोष हुआ। पुनर्जन्म में वानर राज विरज की कन्या के रूप में उसका जन्म हुआ। उसका नाम अंजना रखा गया। विवाह योग्य होने पर इसका विवाह वानर राज केसरी से हुआ। अंजना केसरी के साथ सुखपूर्वक प्रभास तीर्थ में रहने लगी। इस क्षेत्र में बहुत शांति थी तथा बहुत से ऋषि आश्रम बनाकर यज्ञादि करते रहते थे। एक बार ऐसा हुआ कि वन में विचरने वाला शंखबल नामक जंगली हाथी प्रमत्त हो उठा तथा वन में उत्पात मचाने लगा। उसने कई आश्रमों को रौंद डाला। यज्ञ-वेदियां नष्ट कर दीं। उसके भय से भागते हुए अनेक तपस्वी बालक आहत हो गए। कई आश्रम उजड़ गए। कई ऋषि भय के कारण आश्रम छोड़कर चले गए। केसरी को जब शंखबल नामक हाथी के इस उत्पात का पता लगा तो वह आश्रम तथा आश्रम वासियों की रक्षा के लिए तत्काल वहां आए और शंखबल को बड़ी कुशलता से घेर कर उसके दोनों दांतों को पकड़ कर उखाड़ दिया। पीड़ा से चिंघाड़ता हुआ वह हाथी वहीं धराशायी हो गया और मर गया। आश्रम की रक्षा के लिए उनके अचानक पहुंचने तथा हाथी को मार कर आश्रम वासियों को निर्भय कर देने वाले केसरी का ऐसा बल देख कर ऋषि-मुनि बहुत प्रसन्न हुए और केसरी के पास आकर आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘‘वानर राज केसरी! जिस प्रकार तुमने आज हम सबकी तथा आश्रम की रक्षा की, इसी प्रकार भविष्य में तुम्हारा होने वाला पुत्र पवन जैसे वेग वाला होगा तथा रुद्र जैसा महान बलशाली होगा। तुम्हारे बल तेज के साथ-साथ उसमें पवन तथा रुद्र का तेज भी व्याप्त रहेगा।’’ केसरी ने कहा, ‘‘ऋषिवरो! मैंने तो बिना किसी कामना के प्रमत्त हाथी को, जो किसी प्रकार वश में नहीं आ रहा था, मार कर आपकी इस यज्ञ भूमि को निर्भय किया है। आपका दिया यह स्वत: आशीर्वाद मुझे शिरोधार्य है।’’ केसरी ऋषियों को प्रणाम कर चले गए। समय आने पर अंजना के गर्भ से एक बालक का जन्म हुआ। उसमें अपने बाल्यकाल से ही ऋषियों द्वारा दिए आशीर्वाद का तेज झलकने लगा। आश्रमों में वह पवन वेग की तरह जहां-तहां पहुंच जाता। आश्रमों में विघ्न डालने वाले वन्य जीवों तथा दुष्ट व्यक्तियों को अपने अपार बल से खदेड़ देता। अपने इस पराक्रम से वह मदमत्त हो जाता तथा अपने साथियों के साथ वह आश्रमों में क्रीड़ा करने लगता। उसको खेलने से कोई रोकता तो वह उसको भी तंग करने लगता। बालक तो था ही। उसके बाल कौतुक से जब ऋषियों को असुविधा होने लगी तथा उनके पूजा-पाठ और यज्ञ में व्यवधान आने लगा तो उन्होंने उसके स्वभाव में शांति लेने के लिए आशीर्वाद जैसा शाप दिया कि तुम अपने बल को हमेशा भूले रहोगे जब कोई तुम्हें आवश्यक होने पर तुम्हारे बल की याद दिलाएगा तब फिर तुममें अपार बल जागृत हो जाएगा। इससे वह बालक शांत स्वभाव का हो गया। केसरी नंदन यह बालक आगे चल कर हनुमान नाम से प्रसिद्ध हुआ। सीता जी की खोज के लिए जब कोई समुद्र पार करने का साहस नहीं कर रहा था और हनुमान भी चुप बैठे थे तो जामवंत ने हनुमान जी को उनके बल की याद दिलाई थी। तब उन्होंने समुद्र पार कर सीता की खोज की।

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