रक्षाबंधन पर रहेगी भद्रा जानें 30 या 31 अगस्त राखी बांधना कब रहेगा शुभ

इस साल रक्षाबंधन पर भद्रा होने की वजह से इसकी डेट को लेकर लोगों में कंफ्यूजन है. 30 या 31 अगस्त रक्षाबंधन का त्योहार किस दिन मनाया सही होगा, आइए जानते हैं सही मुहूर्त और डेट हर साल सावन पूर्णिमा पर रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है, इस साल रक्षाबंधन पर भद्रा का साया है. जानकारों के अनुसार इस बार राखी का पर्व 30 और 31 अगस्त 2023 दोनों दिन मनाया जा सकेगा. रक्षाबंधन का पर्व हमेशा ही भद्रा रहित काल में मनाया जाता है, साथ ही शुभ मुहूर्त देखकर ही भाई की कलाई पर राखी बांधी जाती है. 30 अगस्त 2023 को भद्रा रात 09.02 मिनट तक रहेगी. इसके बाद ही राखी बांध सकते हैं. पंचांग अनुसार 30 अगस्त को राखी बांधने के लिए रात 09.03 के बाद का समय शुभ है. शास्त्रों के अनुसार राखी बांधने के लिए दोपहर का मुहूर्त सबसे अच्छा माना, ऐसे में जो लोग रात में राखी नहीं बांधते वह अगले दिन 31 अगस्त 2023 को सुबह 07.05 मिनट से पहले तक राखी बांध सकते हैं, क्योंकि पूर्णिमा तिथि इस दिन सुबह इसी समय समाप्त हो जाएगी. खास बात ये है कि 31 अगस्त को भद्रा का साया भी नहीं रहेगा. रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है.ये रिश्ता बहुत पवित्र धागे से बंधा होता है. ऐसे में भाई के लिए राखी लेते समय कुछ विशेष बातों का जरुर ध्यान रखें. जैसे कि राखी का धागा काला न हो. इस पर कोई अशुभ चिन्ह नहीं बना होना चाहिए. राखी खरीदते समय ये भी ध्यान रखें कि इस पर देवी-देवता की तस्वीर न बनी हो. रोजाना के कामों में हम पवित्रता का ध्यान नहीं रख पाते, ऐसे में इस तरह की राखी बांधने से भगवान का अपमान होता है. रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त इस साल शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 30 अगस्त को सुबह 10 बजकर 58 मिनट पर प्रारंभ हो रही है। पूर्णिमा तिथि का समापन 31 अगस्त को सुबह 7 बजकर 5 मिनट पर होगा। ऐसे में रक्षाबंधन का त्योहार 30 अगस्त को ही मनाया जाएगा। हालांकि, इस दिन भद्रा लगने के कारण आपको मुहूर्त का खास ख्याल रखना होगा। आगे बढ़ने से पहले बता दें कि पंजाब सहित कुछ क्षेत्रों में जहां उदया तिथि की मान्यता है वहां 31 तारीख को सुबह 7 बजकर 5 मिनट से पहले रक्षाबंधन का पर्व मना लेना अत्यंत फलदायी रहेगा। राखी बांधने का मुहूर्त भद्रा 30 अगस्त को रात के समय 9 बजकर 1 मिनट पर समाप्त होगी। शास्त्रों में ऐसा विधान है की भद्रा स्थिति में भद्रा मुख का त्याग करके भद्रा पूंछ जब हो उस समय शुभ कार्य जैसे रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा सकता है। इस बार भद्रा पूंछ शाम में 5 बजकर 30 मिनट से 6 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। आप चाहें तो इस समय रक्षाबंधन का पर्व मना सकते हैं। इसमें आपको भद्रा का दोष नहीं लगेगा। ख्याल रखें की भद्रा मुख के दौरान आपको राखी नहीं बांधनी है। 30 अगस्त 2023 को भद्रा पूंछ का समय में 5 बजकर 30 मिनट से 6 बजकर 31 मिनट तक30 अगस्त 2023 को भद्रा मुख का समय शाम में 6 बजकर 31 मिनट से 8 बजकर 11 मिनट तक। इस समय बांधे राखी30 अगस्त को भद्र रात में 9 बजकर 1 मिनट तक होने के कारण आप चौघड़िया मुहूर्त में भी राखी बांध सकते हैं।

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 यम द्वितीया भाई दूज कथा, पूजा विधि व महत्व

भाई दूज या यम द्वितीया त्यौहार की कथा सूर्य देव की पत्नी का नाम संज्ञा हैं। उससे उन्हें यमराज रूप में सबसे बड़े पुत्र व यमुना रूप में सबसे बड़ी पुत्री प्राप्त हुई। यमराज मृत्यु के देवता बने जबकि यमुना धरती पर एक नदी के रूप में रहने लगी। दोनों भाई-बहन में बहुत लगाव था लेकिन यमराज अपने कार्यो में इतना व्यस्त रहते थे कि उन्हें अपनी बहन से मिलने का अवसर ही नही मिल पाता था। एक दिन अपनी बहन के बार-बार आग्रह करने पर यमराज अपने कार्य में से समय निकाल कर यमुना के घर चले गए। अपने भाई यमराज को आया देखकर यमुना माता बहुत प्रसन्न हुई और उसने उनकी बहुत आवाभगत की। माता यमुना ने यमराज के माथे पर रोली चंदन से तिलक किया तथा उनके सुखद भविष्य की कामना की। इसके बाद माता यमुना ने उन्हें कई प्रकार के पकवान बनाकर खिलाए। अपनी बहन के द्वारा इतनी आवाभगत होने पर यमराज अत्यधिक प्रसन्न हो गए तथा यमुना से एक वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने यह वर मांग लिया कि आज के दिन वे हमेशा अपनी बहन के घर आयेंगे व उनका आतिथ्य स्वीकार करेंगे। यमराज ने अपनी बहन को यह वर दे दिया और वहां से चले गए। भाई दूज क्यों मनाया जाता हैं? अब बात आती हैं कि हम आज तक इस पर्व को क्यों मनाते हैं व यह पर्व रक्षाबंधन की तरह भाई-बहन के बीच इतना लोकप्रिय क्यों है? दरअसल यमराज ने अपनी बहन यमुना को वर देने के साथ-साथ यह भी कहा था कि पृथ्वी पर जो भाई अपनी व्यस्तता से समय निकाल कर आज के दिन अपनी बहन के घर जाएगा तो उसे अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलेगी। इसी के साथ उन्होंने यह भी वरदान दिया कि यदि इस दिन भाई-बहन यमुना नदी में डुबकी लगाएंगे तो वे यमराज के प्रकोप से बच पाएंगे। तब से इस पर्व की महत्ता बहुत बढ़ गयी व इसे सभी भाई-बहन के बीच मनाया जाने लगा। मध्य प्रदेश के रहस्यमयी मंदिर कहीं पानी से जलता है दीपक, कहीं ट्रेन रुककर करती है प्रणाम भाई दूज की पूजा विधि इस दिन सभी भाई अपनी बहन के घर जाते है। वैसे तो यह त्यौहार विवाहिता बहनों का अपने भाई के साथ मनाया जाता है लेकिन अविवाहित बहने भी इसे मना सकती है। इसलिये यदि आपकी बहन का विवाह हो चुका हैं तो इस दिन आप अपनी बहन के घर जाए। बहने अपने भाई के स्वागत के लिए पूजा की थाली तैयार करे व उसमे सभी आवश्यक वस्तुएं रखे। जब भाई आपके घर आए तब उनका रोली-चंदन से तिलक करे और उनकी लंबी आयु व सुखद स्वास्थ्य की कामना करे। भाई को कुछ मीठा खिलाए व उनका आशीर्वाद प्राप्त करे। बदले में भाई भी अपनी बहन की रक्षा का वचन दे तथा जीवन में उसे कोई भी कष्ट आने पर उसकी सहायता करने को तैयार रहे। अपनी बहन को आशीर्वाद देकर उसे शगुन रूप में कुछ पैसे या उपहार भी अवश्य दे। इसके बाद दोनों भाई-बहन मिलकर स्वादिष्ट पकवानों का आनंद ले। यही बात माँ को आकर बताई तो वह बावड़ी सी हो कर भाई के पीछे भागी। रास्ते भर लोगों से पूछती की किसी ने मेरा गैल बाटोई देखा, किसी ने मेरा बावड़ा सा भाई देखा। तब एक ने बताया की कोई लेटा तो है पेड़ के नीचे, देख ले वही तो नहीं। भागी भागी पेड़ के नीचे पहुची। अपने भाई को नींद से उठाया। भैया भैया कहीं तूने मेरे लड्डू तो नही खाए!! भाई बोला- ये ले तेरे लड्डू, नहीं खाए मैने। ले दे के लड्डू ही तो दिए थे, उसके भी पीछे पीछे आ गयी। बहिन बोली- नहीं भाई, तू झूठ बोल रहा है, ज़रूर तूने खाया है| अब तो मैं तेरे साथ चलूंगी। भाई बोला- तू न मान रही है तो चल फिर। चलते चलते बहिन को प्यास लगती है, वह भाई को कहती है की मुझे पानी पीना है। भाई बोला- अब मैं यहाँ तेरे लिए पानी कहाँ से लाउ, देख ! दूर कहीं चील उड़ रहीं हैं,चली जा वहाँ शायद तुझे पानी मिल जाए। तब बहिन वहाँ गयी, और पानी पी कर जब लौट रही थी तो रास्ते में देखती है कि एक जगह ज़मीन में 6 शिलाए गढ़ी हैं, और एक बिना गढ़े रखी हुई थी। उसने एक बुढ़िया से पूछा कि ये शिलाएँ कैसी हैं।

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मध्य प्रदेश के रहस्यमयी मंदिर कहीं पानी से जलता है दीपक, कहीं ट्रेन रुककर करती है प्रणाम

अश्वत्थामा को जिसने देखा हो जाता है पागल महाभारत के अश्वत्थामा को पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के दौरान हुई  एक चूक भारी पड़ी और भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें युगों-युगों तक भटकने का श्राप दे दिया. ऐसा कहा जाता है कि पिछले लगभग 5 हजार वर्षों से अश्वत्थामा भटक रहे हैं. मध्यप्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किमी दूर असीरगढ़ का किला है. कहा जाता है कि इस किले में स्थित शिव मंदिर में अश्वत्थामा आज भी पूजा करने आते हैं. स्थानीय निवासी अश्वत्थामा से जुड़ी कई कहानियां सुनाते हैं. वे बताते हैं कि अश्वत्थामा को जिसने भी देखा, उसकी मानसिक स्थिति हमेशा के लिए खराब हो गई. इस मंदिर में जीवित अवस्था में है शिवलिंग मतंगेश्वर महादेव नामक ये शिव मंदिर खजुराहो में है. कहा जाता है कि ये दुनिया का एकमात्र ऐसा शिवलिंग है जो लगातार बढ़ता जा रहा है. यही नहीं इस मंदिर के शिवलिंग की ख़ासियत है कि ये जितना धरती के ऊपर है उतना ही ये जमीन में धंसा हुआ है. इसके साथ ही शिवलिंग की ऊंचाई हर साल एक इंच बढ़ती जा रही है. कहते हैं इंसान की तरह शिवलिंग का आकार भी बढ़ता चला जा रहा है, जिस वजह से इसे जीवित शिवलिंग कहा जाता है. इसके पीछे के रहस्य को आज तक कोई वैज्ञानिक भी नहीं समझ पाया है. आपको बता दें कि शिवलिंग की ऊंचाई 9 फ़ीट है.  रोहिणी व्रत की पूरी यहां जलता है पानी से दीया आप जब भी मंदिरों में जाते होंगे तो घी या तेल का दिया जरूर जलाते होंगे. मध्य प्रदेश के गड़ियाघाट माताजी का माताजी का मंदिर ऐसा है जहां दिया घी या तेल से नहीं जलता है बल्कि पानी से जलता है. यह मंदिर काली सिंध नदी के किनारे आगर-मालवा के नलखेड़ा गांव से करीब 15 किलोमीटर गाड़िया गांव में है. मंदिर में पिछले 5 सालों से घी तेल के बदले पानी से दीपक जलाए जा रहे हैं. पुजारी बताते हैं कि, पहले तेल का दीपक जला करता था, लेकिन करीब पांच साल पहले माता ने सपने में अपना दर्शन देकर पानी से दीपक जलाने के लिए कहा. जिसके बाद सुबह उठकर पास बह रही कालीसिंध नदी से पानी भरा और उसे दीए में डाला. जैसे ज्योत जलाई, दीपक जलने लगा. तभी से मंदिर का दिया कालीसिंध नदी के पानी से जलाया जाता है. इतना ही नहीं जब दीपक में पानी डाला जाता है, तो वह चिपचिपा हो जाता और दीपक जल उठता है. दीपक को लेकर पुजारी ने बताया कि पानी से जलने वाला ये दीपक बारिश के मौसम में नहीं जलता है. क्योंकि बारिश  के मौसम में कालीसिंध नदी का जलस्तर लेवल बढ़ने की वजह मंदिर पानी में डूब जाता है, जिससे यहां पूजा उस समय नहीं हो पाती. ये दिया फिर सितंबर-अक्टूबर में आने वाली शारदीय नवरात्रि के पहले दिन दोबारा ज्योत जला दी जाती है, फिर ये दिया अगले साल बारीश के मौसम तक जलती रहती है. यहां तेल के बजाए पानी से जोत जलाए जाने का दावा किए जाने के बाद लोगों ने उत्सुकतावश यहां आना शुरु किया। इस तरह मंदिर का गुणगान आस-पास के जगहों के साथ काफी दूर-दूर तक होने लगा। धीरे-धीरे मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ती गई और आज दूर से यहां माता की चमत्कारी जोत का दर्शन करने के लिए आते हैं। नवरात्रों में तो यहां भारी संख्या में दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर की बढ़ती प्रसिद्धि इस बात की प्रतीक है कि आज भी लोग ईश्वरीय शक्ति में पूरा विश्वास रखते हैं। कहा जाता है कि देवी के इस मंदिर के दर्शन से मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।

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कभी सपने में हो शिवलिंग के दर्शन, तो जान लें इसका मतलब

अक्सर हम रात को सोते समय सपने देखते हैं। हम में से ज्यादातर लोग सपनों में वही देखते हैं जो असल में हमारे जीवन में हो रहा होता है।ऐसे में अगर आप सपने में कोई देवता देखते हैं तो उसके भी अलग-अलग अर्थ होते हैं।  सपने में दिखाई देने वाली चीजों का हमारे जीवन से गहरा संबंध होता हैं। आज हम आपको सपने में शिवजी से जुड़ी चीजें दिखाई देने का तात्पर्य बताने जा रहे हैं। तो आइये जानते है कि सपने में शिवजी से जुड़ी चीजें दिखना कैसे आपके जीवन पर प्रभाव डालता हैं। सपने में शिव पार्वती को एक साथ देखना यदि आप शिव और पार्वती को एक साथ देखते हैं तो इसका मतलब है कि आपके दरवाजे पर नए अवसर हैं। जल्द ही आपको लाभ, यात्रा, अन्न और खाद्यान्न प्राप्त करने, धन और बहुतायत के समाचार सुनने को मिलेंगे। शिव और पार्वती को एक साथ देखना एक अच्छा शगुन है। सपने में सांप दिखना-सपने मे सांप का देखना धन प्राप्ति का संकेत होता है। अगर सांप फन फैलाए हुए हो और आप उसको पीछे की ओर से देखें तो आपके लिए शुभ फल देने वाला रहेगा। सपने में शिव को नृत्य करते हुए देखना- अगर आप सपने में शिव को नाचते हुए देखते हैं तो इसका मतलब है कि आपकी समस्या का जल्द ही समाधान हो जाएगा। यह यह भी दर्शाता है कि आप धन प्राप्त करेंगे लेकिन कुछ संघर्ष के बाद। सपने में चंद्रमा देखना-यदि आप चंद्रमा का सपना देखते हैं, तो इसका मतलब है कि आपको जीवन में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे।  सपने में सपरिवार भगवान शिव की पूजा करना यदि आप खुद को अपने परिवार के साथ शिवजी की पूजा करते देखते हैं तो यह इस बात का संकेत है कि आप अपने काम में पूरे त्‍याग, समर्पण और ईमानदारी के साथ लगे रहते हैं। ऐसा सपना आना बताता है कि कार्यक्षेत्र में आपकी आने वाली परेशानियां जल्‍द ही दूर होने वाली हैं। आपके जीवन में सुख समृद्धि और सौभाग्‍य आने वाला है। ऐसा सपना उन्‍नति और सुख सौभाग्‍य का प्रतीक माना जाता है। सपने में सफेद शिवलिंग देखना अगर आपको सपने में यदि सफेद शिवलिंग के दर्शन हों तो यह इस बात का संकेत माना जाता है कि आने वाले वक्‍त में आपको या फिर आपके परिवार के किसी सदस्‍य को गंभीर रोग से छुटकारा मिल सकता है और आपके जीवन में कुछ अच्‍छा होने वाला है। सपने में शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना सपने में शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना भी असल जीवन में बहुत ही शुभ संकेत देता है। इसका अर्थ है कि आप अपने जीवन में सुख शांति की ओर बढ़ रहे हैं। संघर्ष का दौर आपके जीवन से समाप्‍त होने वाला है और जल्‍द ही आपके जीवन में स्‍थायित्‍व आने वाला है और सब कुछ आपके अनुसार होने वाला है।

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रोहिणी व्रत की पूरी

रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लिए महत्वपूर्ण दिनों में से एक है, क्योंकि इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं. हालांकि, इस महीने ये व्रत 10 अगस्त, 2023 को मनाया जाएगा. रोहिणी व्रत कथा प्राचीन कथा के अनुसार चंपापुरी राज्य में राजा माधवा, और रानी लक्ष्मीपति का राज्य था। उनके सात बेटे और एक बेटी थी। एक बार राजा ने बेटी रोहिणी के बारे में ज्योतिषी से जानकारी ली तो उसने बताया कि रोहिणी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ होगा। इस पर इसके बाद राजा ने स्वयंवर का आयोजन किया, इसमें रोहिणी-अशोक का विवाह करा दिया गया। बाद में रोहिणी-अशोक राजा रानी बने। एक समय हस्तिनापुर के वन में श्री चारण मुनिराज आए, उनके दर्शन के लिए राजा पहुंचे और धर्मोपदेश ग्रहण किया। बाद में पूछा कि उनकी रानी शांतचित्त क्यों है, तब उन्होंने बताया कि इसी नगर में एक समय में वस्तुपाल नाम का राजा था, जिसका धनमित्र नाम का मित्र था, जिसकी दुर्गंधा नाम की कन्या पैदा हुई। लेकिन धनमित्र परेशान रहता था कि उसकी बेटी से विवाह कौन करेगा। लेकिन बाद में उसने धन का लालच देकर वस्तुपाल के बेटे श्रीषेण से दुर्गंधा का विवाह कर दिया। इधर दुर्गंधा की दुर्गंध से परेशान होकर श्रीषेण एक माह में ही कहीं चला गया। पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में राजा माधव अपनी रानी लक्ष्मीपति के साथ चंपापुरी नामक नगर में राज्य करते थे। उनके 7 पुत्र और 1 पुत्री का नाम रोहिणी था। एक बार राजा ने निमित्ज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा। तो उन्होंने कहा कि तुम्हारी पुत्री का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ होगा। यह सब सुनने के बाद राजा ने कन्या का ऐलान किया और स्वयंवर में कन्या रोहिणी ने राजकुमार अशोक को वरमाला पहनाई पहनाई और इस प्रकार दोनों की शादी हो गई एक बार नगरी हस्तिनापुर के वनों में श्री चरण मुनिराज आए। राजा स्वजनों सहित उनके दर्शन को गए और प्रणाम कर के उपदेश ग्रहण किया। सपने में रुपये-पैसे देखना शुभ या अशुभ, जानें क्या कहता है स्वप्न शास्त्र इसके बाद राजा जी ने मुनिराज से एक प्रश्न पूछा कि मेरी रानी इतनी  शांत क्यों है तब गुरुवर ने उत्तर देते हुए कहा कि इस नगर में वास्तुपाल नाम का एक राजा रहता था जिसके मित्र का नाम धनमित्र था । उस धनमित्र के एक दुर्गंधयुक्त कन्या उत्पन्न हुई। धनमित्र को हमेशा यही चिंता रहती थी कि इस कन्या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लालच देकर उसका विवाह अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से करा दिया, लेकिन दुर्गंध से पीड़ित होकर उसने एक महीने के भीतर ही उसे छोड़ देता है। उसी समय नगर में मुनिराज जी विहार करते हुए आ गए तब धनमित्र जी अपनी बेटी दुर्गंध के साथ पूजा करने के लिए गए और मुनिराज से अपनी बेटी दुर्गंध के भविष्य के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि गिरनार पर्वत के समीप एक नगर में राजा भूपाल राज्य करते थे। उसकी सिंधुमती नाम की एक रानी थी। एक दिन राजा रानी सहित वन क्रीड़ा के लिए गया तो रास्ते में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के भोजन की व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली गई, लेकिन क्रोधित होकर उसने मुनिराज को करेले का आहार दिया, जिससे मुनिराज को बड़ी पीड़ा हुई और उन्होंने तुरंत अपने प्राण त्याग दिए। जब राजा को इस बात का पता चला तो उसने रानी को नगर से बाहर निकाल दिया और इस पाप के कारण रानी के शरीर में कोढ़ हो गया। अत्यंत पीड़ा और दु:ख को भोगती हुई वह क्रोध से मरकर नरक में चली गई। वह अनंत दु:खों को भोगकर पशु योनि में उत्पन्न हुई और फिर तुम्हारे घर में दुर्गंधयुक्त कन्या बनी। इस पूरी कथा को सुनकर धनमित्र ने पूछा- मुझे कोई व्रत-विधि आदि धार्मिक कार्य बताओ जिससे यह पाप दूर हो जाए। तब स्वामी ने कहा – रोहिणी व्रत सम्यग्दर्शन सहित करें अर्थात् जिस दिन प्रत्येक मास में रोहिणी नक्षत्र आता हो, उस दिन चारों प्रकार के अन्नों का त्याग कर श्री जिन चैत्यल के पास जाकर धर्मध्यान अर्थात् सामायिक, स्वाध्याय सहित 16 प्रहर व्यतीत करें। धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय व्यतीत करें और आत्मबल का दान करें। इस प्रकार 5 वर्ष 5 माह तक इस व्रत को करें। दुर्गन्धा ने भक्तिपूर्वक व्रत किया और अपने जीवन के अंत में सन्यास लेकर मरकर पहले स्वर्ग में देवी बनी। वहाँ से तेरी प्यारी रानी आई। इसके बाद राजा अशोक ने उसका भविष्य पूछा तो स्वामी ने कहा- भील होकर तुमने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, अत: तुम मरकर नरक में गये और फिर अनेक कुयोनियों में भटकते हुए एक व्यापारी के घर में जन्म लिया, अत: बहुत निराशाजनक। आपको शरीर मिला, तब आपने मुनिराज के कहने पर रोहिणी व्रत किया। फलस्वरूप स्वर्ग में जन्म लेकर अशोक नाम का एक राजा हुआ। इस प्रकार रोहिणी व्रत के प्रभाव से राजा अशोक और रानी रोहिणी ने स्वर्गलोक का सुख भोगकर मोक्ष प्राप्त किया।

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सपने में रुपये-पैसे देखना शुभ या अशुभ, जानें क्या कहता है स्वप्न शास्त्र

सपने हमारे जीवन का आईना होते हैं। कहा जाता है कि इंसान जिस तरह की स्थिति से गुजर रहा होता है, उसे वैसे ही सपने आते हैं। स्वप्न विज्ञान के जानकारों की मानें तो कुछ सपने ऐसे भी होते हैं जिनसे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हमें अक्सर जो सपने आते हैं वह हम तुरंत अपनों के साथ या फिर दोस्तों के साथ साझा कर लेते हैं। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, आने वाले हर सपने का कोई ना कोई संकेत जरूर होता है, जो हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं को लेकर सचेत करता है। हर व्यक्ति पैसा कमाने की चाह रखता है। ऐसे में यदि सपने में पैसे दिख जाएं तो व्यक्ति को बहुत खुशी होती है। लेकिन सपने में रुपये पैसे का दिखना शुभ होता है या अशुभ आइए जानते हैं विस्तार से।  सपने में दिखें ये चीजें तो समझ लें कि जल्द ही आपको होने वाला धन लाभ सपने में रुपये-पैसे देखना शुभ या अशुभ 1. स्वप्न शास्त्र  में अगर आपको सपने में खुद को बुत सारे सिक्कों के बीच देखें जाएं और सिक्के खड़कने की आवाज आए, तो यह सपना आपके लिए शुभ नहीं है. ऐसा माना जाता है कि सपने में सिक्के देखने से आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. 2. अगर आपको सपने में खुद को कोई कीमती चीज ढूंढते हुए देखना भी अशुभ माना जाता है. ऐसे सपने आने से व्यक्ति को धन हानि होने की संभावना रहती है और आपको असफलता मिलती है. इसलिए सचेत रहें.  3. स्वप्न शास्त्र में आपको अगर कोई व्यक्ति नोट देता हुआ दिखे, ये सपना आपके लिए बहुत शुभ है. इस सपने का मतलब है कि आपको कहीं से अचानक धन की प्राप्ति होगी और आपकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी. 4. सपने में खुद को बैंक में पैसे जमा करते हुए देखना या फिर किसी भी प्रकार की बचत करते हुए देखना शुभ माना जाता है. आपको धन लाभ होगा और आपके आपके आय के स्त्रोत भी बढ़ेंगे. 5. अगर आप अपने आपको नोटों के ढेर में देखते हैं, तो ये बहुत ही शुभ सपना माना जाता है. इसका मतलब यह है कि आपके जीवन में जल्द पैसों से संबंधित परेशानियां दूर होने वाली है.  

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भगवान शिव के इन 108 नाम का जाप मिलेगा मनवांछित फल

प्रत्येक माह में शिव रात्रि की तिथि होती है। लेकिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को भगवान शिव का वरदान प्राप्त है और यह तिथि भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए समर्पित मानी गई है। भगवान शिव को भोले भंडारी कहा जाता है। अगर कोई उन्हें सच्चे मन से एक लोटा जल चढ़ा दें तो ही वो प्रसन्न होकर उसे सब कुछ दे डालते हैं। आइए आज जानें भोलेनाथ के 108 नामों के बारे में जिनका यदि सच्चे मन से सोमवार को जाप करते हुए भगवान शिव को जल चढ़ाया जाए या शिव के इन नामों का साधारण जाप किया जाए तो कठिन से कठिन काम भी संवर जाता है। 

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केदारनाथ मंदिर के आसपास मौजूद है कई बेहतरीन जगह, आप भी पहुंचें

केदारनाथ की यात्रा भारत की सबसे पवित्र धार्मिक यात्रा में से एक है। केदारनाथ मंदिर का दर्शन करने के लिए हर साल लाखों भक्त जाते हैं। कई लोग मंदिर दर्शन के साथ घूमने-फिरने भी पहुंचते हैं। सैलानी जब केदारनाथ मंदिर दर्शन के लिए पहुंचते हैं तो सिर्फ मंदिर दर्शन करके वापस आ जाते हैं, लेकिन मंदिर के आसपास ऐसी कई अद्भुत जगहें मौजूद हैं जहां घूमने के बाद एक अलग भी आनंद मिलता है। केदारनाथ के आसपास में मौजूद किसी बेहतरीन जगह की बात होती है तो सबसे पहले वासुकी ताल की बात होती है। इस खूबसूरत ताल का हिन्दू पौराणिक कथा भी काफी फेमस है। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने रक्षा बंधन के असवर पर इसी झील में स्नान किया था। इसलिए इस झील को वासुकी के नाम से जाना जाता है। हिमालय पर्वत के बीच में मौजूद यह झील अद्भुत नजारा प्रस्तुत करती है। आपको बता दें कि यह केदारनाथ मंदिर से लगभग 8 किमी की दूरी पर है और यहां ट्रैकिंग करके आसानी से पहुंचा जा सकता है। भैरव नाथ मंदिर रूप में जाना जाने वाला पूज्य हिंदू देवता भैरवनाथ मंदिर के अंदर स्थित है, जो केदारनाथ मंदिर के दक्षिणी हिस्से में पाया जा सकता है और लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। यह एक पहाड़ी के शिखर पर स्थित है और हिमालय श्रृंखला और इसके नीचे केदारनाथ घाटी के लुभावने दृश्य प्रदान करता है। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि भगवान भैरव भगवान शिव की प्राथमिक अभिव्यक्ति हैं; इसलिए, इस मान्यता के कारण मंदिर का और भी अधिक महत्व है। मंदिर में विराजमान भगवान को क्षेत्रपाल के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है “क्षेत्र का रक्षक।” उन महीनों के दौरान जब केदारनाथ मंदिर सर्दियों के लिए बंद कर दिया जाता है, भैरव को क्षेत्रपाल की भूमिका निभाने के लिए कहा जाता है, जो मंदिर और पूरी केदार घाटी की रक्षा करता है। वह अपने प्राथमिक हथियार के रूप में त्रिशूल का इस्तेमाल करते हैं, जबकि एक कुत्ता परिवहन के अपने प्राथमिक साधन के रूप में कार्य करता है। गौरीकुंडो मार्ग में एक महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थान है जिसे गौरीकुंड के नाम से जाना जाता है। यह केदारनाथ से करीब 14 किलोमीटर और सोनप्रयाग से 4 किलोमीटर दूर है। गौरीकुंड में एक मंदिर है जिसे गौरी देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर देवी पार्वती को समर्पित है। ऐसा कहा जाता है कि पार्वती ने गौरीकुंड की यात्रा की और भगवान शिव को अपना जीवनसाथी बनने के लिए मनाने के लिए वहां काफी समय तक ध्यान में बैठी रहीं। तीर्थयात्री अक्सर गौरीकुंड में रात बिताते हैं क्योंकि यह केदारनाथ ट्रेक के लिए आधार शिविर के रूप में भी कार्य करता है और क्योंकि केदारनाथ मंदिर की यात्रा शुरू करने से पहले यह अंतिम पड़ाव है। सोनप्रयाग ने गौरीकुंड को हाइक के गंतव्य के रूप में बदल दिया है। सोनप्रयाग ऊंचाई के साथ मीटर, सोनप्रयाग गौरीकुंड से पांच किलोमीटर और केदारनाथ से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सोनप्रयाग का महत्वपूर्ण धार्मिक महत्व है क्योंकि कहा जाता है कि यह भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह का स्थान रहा है। मंदाकिनी नदी और बासुकी नदी इस बिंदु पर एक साथ आती हैं, जो सुंदर बर्फ से ढके पहाड़ों और प्रकृति के उपहारों से घिरी हुई है। सोनप्रयाग केदारनाथ के रास्ते में रुद्रप्रयाग और गौरीकुंड के बीच स्थित है। गौरीकुंड तक सोनप्रयाग होते हुए कैब, साझा जीप या रुद्रप्रयाग से बस से पहुंचा जा सकता है। गुप्तकाशी केदारनाथ की ओर जाने वाले लोग पाएंगे कि गुप्तकाशी रास्ते में एक सुविधाजनक पड़ाव बनाता है। अपने समृद्ध इतिहास और संस्कृति के अलावा, शहर की अद्भुत जलवायु, हरे-भरे जंगल और चौखंबा रेंज के मंत्रमुग्ध कर देने वाले नज़ारे इसे एक संपूर्ण अनुभव की तलाश में छुट्टियों के लिए एक आदर्श स्थान बनाते हैं। गुप्तकाशी अपने प्राचीन मंदिरों जैसे विश्वनाथ और अर्धनारीश्वर के कारण आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण शहर है। गुप्तकाशी रुद्रप्रयाग क्षेत्र के मुख्य शहरों में से एक है, और केदारनाथ के प्रसिद्ध मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग के साथ इसके स्थान के परिणामस्वरूप, शहर में कई प्रकार के ठहरने के विकल्प उपलब्ध हैं जो शहर के चारों ओर फैले हुए हैं।

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केदारनाथ मंदिर के ऐसे रहस्य जिन्हें जानकर आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे

केदारनाथ मंदिर की पौराणिक कथा/कहानी कहा जाता है कि केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना का ऐतिहासिक आधार तब निर्मित हुआ जब एक दिन हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार एवं महातपस्वी नर और नारायण तप कर रहे थे। उनकी तपस्या से भगवान शंकर प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए तथा उनकी प्रार्थना के फल स्वरूप उन्हें आशीर्वाद दिया कि वह ज्योतिर्लिंग के रूप में सदैव यहां वास करेंगे। केदारनाथ मंदिर के बाहरी भाग में स्थित नंदी बैल के वाहन के रूप में विराजमान एवं स्थापित होने का आधार तब बना जब द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के दौरान पांडवों की विजय पर तथा भातर हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शंकर के दर्शन करना चाहते थे। इसके फलस्वरूप वह भगवान शंकर के पास जाना चाहते और उनका आशीर्वाद पाना चाहते थे परंतु भगवान शंकर उनसे नाराज थे। पांडव भगवान शंकर के दर्शन के लिए काशी पहुंचे परंतु भगवान शंकर ने उन्हें वहां दर्शन नहीं दिए। इसके पश्चात पांडवों ने हिमालय जाने का फैसला किया और हिमालय तक पहुंच गए परंतु भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे इसलिए भगवान शंकर वहां से भी अंतर्ध्यान हो गए और केदार में वास किया। पांडव भी भगवान शंकर का आशीर्वाद पाने के लिए एकजुटता से और लगन से भगवान शंकर को ढूंढते ढूंढते केदार पहुंच गए। भगवान शंकर ने केदार पहुंचकर बैल का रूप धारण कर लिया था। केदार पर बहुत सारी बैल उपस्थित थी। पांडवों को कुछ संदेह हुआ इसीलिए भीम ने अपना विशाल रूप धारण किया और दो पहाड़ों पर अपने पैर रख दिए भीम के इस रूप से भयभीत होकर बैल भीम के पैर के नीचे से दोनों पैरों में से होते हुए भागने लगे परंतु एक बैल भीम के पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं थी। भीम बलपूर्वक उस बैल पर हावी होने लगे परंतु वेल धीरे-धीरे अंतर्ध्यान होते हुए भूमि में सम्मिलित होने लगा परंतु भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। पांडवों के इस दृढ़ संकल्प और एकजुटता से भगवान शंकर प्रसन्न हुए और तत्काल ही उन्हें दर्शन दिए। भगवान शंकर ने आशीर्वाद रूप में उन्हें पापों से मुक्ति का वरदान दिया। तब से ही नंदी बैल के रूप में भगवान शंकर की पूजा की जाती है। केदारनाथ मंदिर के रोचक तथ्य  स्थानीय लोगों का मानना है कि केदारनाथ  मंदिर धाम के पीछे शंकराचार्य की समाधि है मान्यताओं के अनुसार गुरु शंकराचार्य ने केदारनाथ धाम में ही महा समाधि ली थी। 2013 में आई बाढ़ के बाद केदारनाथ धाम क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हुआ था लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस आपदा में केदारनाथ धाम को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं हुई  शरणार्थी श्रद्धालुओं के लिए केदारनाथ धाम को पूरे 1 वर्ष के लिए बंद कर दिया गया था। मंदिर के सामने एक छोटा सा स्तंभ स्थित है जिस पर माता पार्वती और पांचो पांडव के चित्र अंकित है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि अभिमन्यु के प्रपौत्र जन्मेजय जोकि परीक्षित के पुत्र थे उन्हीं ने केदारनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार अर्थात पुनर्निर्माण करवाया था केदारनाथ का रहस्य 400 वर्षों तक हिम में दबा रहा केदारनाथ  पांडवों के बाद इस मंदिर का पुनः निर्माण आदि शंकराचार्य के द्वारा किया गया था। इसके बाद उन्होंने इसी मंदिर के पीछे समाधि ले ली थी जो आज तक वहां है। इसके बाद 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच कई भारतीय राजाओं के द्वारा मंदिर का पुनः निर्माण करवाया गया था जिससे इसका जीर्णोद्धार हुआ था। क्यों की जाती है महाकाल की भस्म आरती, जानिये इसका रहस्य वाडिया इंस्टिट्यूट हिमालय के द्वारा किये गए शोध में यह बात सामने आई थी कि 13वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक यह क्षेत्र पूरी तरह से हिम/ बर्फ से ढक गया था। तब लगभग 400 वर्षों तक केदारनाथ मंदिर पूरी तरह से हिम से ढका रहा था। इस कारण भी मंदिर को कोई क्षति नही हुई थी। इसके प्रमाण आज भी मंदिर की दीवारों पर देखने को मिल जाते हैं। हालाँकि 17वीं शताब्दी के बाद जब हिम का अनुपात कम हुआ तो मंदिर पुनः दृष्टि में आया। इसके बाद से केदारनाथ की यात्रा पुनः सुचारू रूप से शुरू हो गयी थी। केदारनाथ के पास स्थित श्री भैरवनाथ मंदिर  केदारनाथ मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर प्रसिद्ध भैरवनाथ जी का मंदिर स्थित हैं। इसे इस क्षेत्र का क्षेत्रपाल भी कहा जाता हैं जो इस मंदिर की सुरक्षा करते हैं। सर्दियों के माह में दीपावली के अगले दिन से केदारनाथ मंदिर के कपाट भीषण बर्फबारी के कारण बंद कर दिए जाते हैं और उसके छह माह के बाद मई माह में अक्षय तृतीया के दिन खोले जाते हैं। मान्यता हैं कि इन छह माह में मंदिर की सुरक्षा का भार श्री भैरवनाथ जी ही सँभालते हैं। जो भी भक्तगण केदारनाथ मंदिर के दर्शन करने हेतु यहाँ आते हैं उन्हें पहले श्री भैरवनाथ मंदिर के दर्शन करना अनिवार्य होता हैं अन्यथा केदारनाथ की यात्रा विफल मानी जाती हैं। केदारनाथ में जलती अखंड ज्योत  सर्दियों के माह में जब केदारनाथ मंदिर छह माह के लिए बंद हो जाता हैं तब यहाँ रहस्यमय तरीके से अखंड ज्योत लगातार छह माह तक प्रज्ज्वलित रहती हैं। दीपावली के बाद से यहाँ पर भीषण बर्फबारी का दौर शुरू हो जाता हैं जिस कारण केदारनाथ भगवान के प्रतीकात्मक स्वरुप को नीचे उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में स्थापित कर दिया जाता हैं। इन छह माह में वहां के स्थानीय नागरिक भी वहां रह नही पाते हैं। इस कारण वहां से सभी श्रद्धालु, भक्तगण, स्थानीय नागरिक, दुकानवाले, उत्तराखंड सरकार के अधिकारी इत्यादि सब नीचे आ जाते हैं। छह माह तक यह स्थल एक दम सुनसान रहता हैं व केदारनाथ धाम जाने के सभी मार्ग भी बंद हो जाते हैं। जब मंदिर के पुजारियों के द्वारा छह माह बाद केदारनाथ धाम के कपाट खोले जाते हैं तब भी वहां अखंड ज्योत जलती हुई मिलती हैं। साथ ही ऐसा प्रतीत होता हैं कि कल ही यहाँ किसी ने पूजा की थी। छह माह तक मंदिर बंद रहने के पश्चात भी ऐसा प्रतीत होता हैं कि मंदिर की अच्छे से साफ-सफाई की गयी हैं। यह केदारनाथ मंदिर के रहस्यों में

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सपने में दिखें ये चीजें तो समझ लें कि जल्द ही आपको होने वाला धन लाभ

सपने मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं। एक इष्ट फल को बताने वाले यानी पॉजिटिव चीज़ों को बताने वाले और दूसरे निगेटिव चीज़ों को बताने वाले। आचार्य इंदु प्रकाश के अनुसार सामुद्रिक शास्त्र में हर सपने का एक मतलब बताया गया है। जानिए कौन से सपने देते हैं धनलाभ के संकेत। इन सपनों का मतलब है धनलाभ सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार जो व्यक्ति सपने में अपने दाहिनी, यानी सीधे हाथ पर सफेद सांप को कांटता हुआ देखता है, उसे दस दिन के अंदर- अंदर बहुत-सी धन राशि का लाभ मिलता है। साथ ही जो व्यक्ति सपने में दूध देख ले या जो सपने में वटवृक्ष और फलों से लदे हुए वृक्ष पर अकेले चढ़ जाने के साथ ही जाग जायें, तो उस व्यक्ति को भी बहुत जल्द धन लाभ मिलता है। इसके अलावा जो व्यक्ति खुद को बैल के रथ में अकेला बैठा देखे और उसके बाद तुंरत सपने से उठ जाये, तो आपको बता दूं कि यह भी जल्दी मालामाल होने का संकेत है। धन-सम्पत्ति से जुड़े कुछ खास सपनों के बारे में सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार जो व्यक्ति सपने में अपने आपको गाडी, आसन, बिछौने या पालकी में चलते हुए देखे या फिर खुद को अकेले बिनी किसी गाडी के चलते हुए देखे तो उस व्यक्ति को चारों ओर से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। साथ ही जिस व्यक्ति को सपने में पान का बीड़ा, कपूर, अगर, सफेद चंदन या सफेद फूल, इनमें से कोई वस्तु मिले, तो उस व्यक्ति को हर तरफ से सम्पत्ति मिलती हुयी दिखायी देती है। साथ ही अगर आपको सपने में अनार मिल जाये, या जिसे सपने में गेहूं का ढेर दिख जाये, तो उस व्यक्ति को अचानक से धन लाभ होता है। सपने में दिखते हैं सोने के गहने? जानिए ये शुभ संकेत है या अशुभ यह सपनों लाते है शुभ समाचार सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार अगर आपको सपने में हरे- भरे खेत-खलिहान दिखायी दे, तो ये आपके लिये बड़ा ही शुभ संकेत है। इससे जल्द ही कोई खुशी का समाचार सुनने को मिलता है और ये खुशी का समाचार कुछ और नहीं, बल्कि संतान प्राप्ति का संकेत है। इसके अलावा अगर आपको सपने में कोई मृत व्यक्ति कपड़ा या कोई फल देता दिखायी दे, तो इसका भी यही संकेत है कि आपको जल्द ही संतान सुख की प्राप्ति होने वाली है। सपने में इन चीजों का दिखना होता है शुभ अगर आपको सपने में बहुत बारिश दिखाई देती हैं तो यह एक शुभ संकेत है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार इस सपने का मतलब है कि आपके जीवन में आ रही आर्थिक समस्याएं जल्द ही खत्म होने वाली हैं. साथ ही आय के नए साधन भी मिलेंगे और आय में वृद्धि होगी. स्वप्न शास्त्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को सपने में सफेद हाथी नजर आता है तो यह भी आने वाले अच्छे समय की ओर एक इशारा है. यह सपना बताता है कि आपको जल्द ही धन लाभ होने वाला है जिससे आपकी किस्मत बदल जाएगी. कई बार हम सपने में मंदिर देखते हैं और स्वप्न शास्त्र के अनुसार मंदिर देखना भी एक खास संकेत देता है. अगर किसी को सपने में मंदिर दिखाई तो यह बहुत शुभ होता है. इसका मतलब है कि आपके ऊपर भगवान कुबेर अपनी कृपा बरसाने वाले हैं और आर्थिक संकटों से छुटकारा मिलने वाला है. सपने में चीटियां देखना भी शुभ माना गया है. यह सपना इस बात की ओर इशारा करता है कि आने वाले दिनों में आपके सभी कार्य सफल होंगे. यदि कोई काम काफी समय से रूका हुआ है वह पूरा होगा और कहीं फंसा हुआ धन जल्द ही वापस आएगा. यदि कोई व्यक्ति सपने में खुद को पेड़ पर चढ़ते हुए देखता है या फिर किसी ऊंचाई पर चढ़ते हुए देखता है तो यह सपना भी शुभ माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार इस सपने का मतलब है कि आपको कार्यक्षेत्र में तरक्की मिलने वाली है. अगर आप बिजनेस करते हैं तो आने वाले दिनों में आपको मुनाफा होगा.

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सपने में दिखते हैं सोने के गहने? जानिए ये शुभ संकेत है या अशुभ

स्वप्न शास्त्र के अनुसार, हर सपने का अपना एक अर्थ होता है। हर एक सपने में भविष्य का एक संकेत छिपा होता है जिसे बस आप समझ कर उसके बारे में आसानी से जान सकते हैं। इसी तरह सपने में कई लोगों को सोने से बनी चीजें दिखाई देती है। आमतौर पर माना जाता है कि इससे आपको धन लाभ के संकेत मिलने वाले हैं। लेकिन कई बार सपने में सोने से बनी चीजें देखने का अर्थ नुकसान होने का संकेत भी देता है। जानिए सपने में सोने से बनी चीजों को देखने का क्या होता है  अगर सपने में आपको एक साथ काफी मात्रा में सोने के आभूषण रखे हुए दिखाई देते हैं तो समझ लें कि आने वाले समय में आपकी काफी जेब ढीली हो सकती है। इसलिए पैसों को सोच-समझकर ही खर्च करें वरना आपका पूरा बजट बिगड़ जाएगा। अगर सपने में चांदी को सोने के रूप में परिवर्तित होते हुए देखते है तो इसका अर्थ है कि आने वाले समय में धन लाभ के साथ बिजनेस में उन्नति मिलेगी। सपने में खुद को किसी ज्वेलरी शॉप में सोने के आभूषण खरीदते देखते हैं तो यह शुभ संकेत माना जाता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, भविष्य में आपका भाग्य साथ देगा और कोई बड़ी सफलता आपके हाथ लगेगी। अगर सपने में आप खुद को आभूषण पहने हुए देखते हैं तो इसका मतलब है कि आने वाले समय में किसी करीबी की मृत्यु की खबर मिलेगी। अगर आपको सपने में कही सोने से बनी चीज गिरी हुई मिलती है तो इसका अर्थ हुआ कि आने वाले समय में धन हानि होगी। सपने में आभूषण चोरी होते हुए देखना का मतलब है कि आने वाले समय में आपके बिजनेस या नौकरी के किसी व्यक्ति द्वारा आपको फंसाया जा सकता है। सपने में अगर आप किसी को सोने से बनी ज्वेलरी गिफ्ट करते हुए नजर आते हैं तो यह शुभ माना जाता है। क्योंकि इस सपने का अर्थ है कि आपको नौकरी में अच्छा प्रमोशन मिलने वाला है। सपने में सोना मिलना अगर आप को सपने में सोना मिलता है तो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार यह एक अच्छा संकेत माना जाता है। इस तरह के सपने का मतलब होता है कि आपके धन में वृद्धि होगी और लाभ बढ़ेगा। इसके अलावा अगर आपने पहले से ही कहीं पर निवेश किया है तो इस समय में आपको उसको अच्छे लाभ प्राप्त हो सकते हैं। अगर आप नौकरी करते हैं तो आपकी आय इस समय में बढ़ सकती है और अगर आप व्यापार करते हैं तो आपके व्यापार में वृद्धि होगी। सपने में कपड़े खरीदना का मतलब क्या होता है सपने में सोने का खजाना देखना सपने में सोने का खजाना देखना भी सामुद्रकि शास्त्र के मुताबिक अच्छा माना जाता है। इस सपने के अनुसार आपके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन आ सकता है। यह बदलाव शुभ है  और आपको धनलाभ होने वाला है। सपने में सोना गिरवी रखना सपने में सोना गिरवी रखना अपमान का सूचक है। ये इस बात का संकेत है कि आपका अपमान हो सकता है। आपको बहुत सतर्क रहने की जरूरत है। आप सोच समझकर ही कोई भी फैसला लें।  सपने में सोना चोरी होना अगर आप अपने सपने में देखते हैं कि भरी भीड़ में आपके  पास से कोई सोना चोरी करके ले गया है तो इसका मतलब होता है कि आपके दुश्मन या विरोधी के द्वारा आपको नुकसान पहुंचाया जा सकता है। इसलिए ऐसा सपना आने पर आपको सावधान हो जाना चाहिए।  सपने में सोने का गहना मिलना अगर आपको सपने में सोने का कोई गहना मिलता है तो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार यह एक अच्छा संकेत माना जाता है। इसके अनुसार आपको आने वाले समय में किसी प्रकार का कोई बड़ा लाभ हो सकता है। यह लाभ आपको परिवारिक या आर्थिक किसी भी रूप में हो सकता है। अगर आप नौकरी करते हैं तो इस समय में आपकी आय बढ़ सकती है। इसके अलावा अगर  आप व्यापार करते हैं तो आपको अपने बिजनेस के माध्यम से धन लाभ हो सकता है।

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क्यों की जाती है महाकाल की भस्म आरती, जानिये इसका रहस्य

वैसे तो उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती होती है और वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में भी आरती के लिए चिता की अग्नि का इस्तेमाल किया जाता है। भगवान शंकर के ये दोनों ही मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंग में शामिल हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त अगर देश में कोई अन्य ऐसा शिवालय है जहां आरती की ज्योत प्रज्जवलित करने के लिए जलती हुई चिता की लकड़ी का सहारा लिया जाता है, तो वह है कोलकाता के नीमतल्ला घाट के समीप बना बाबा भूतनाथ मंदिर। महाकाल शिव शंकर भोलेनाथ का वह स्वरूप जो रुद्र है प्रचंड है, जो काल का भी काल है वो महाकाल हैं। जी हाँ यूँ तो भोलेनाथ बड़े ही सौम्य स्वभाव के हैं लेकिन महाकाल शिव का वह रूप है जिसमें गुस्सा है, आग है, पापियों का सर्वनाश करने की क्षमता है, जिसमें समाहित है धर्म और सत्य की विजय। महाकाल जो लिंगम रूप में विराजमान हैं। उज्जैन के रुद्र सागर झील के किनारे महाकालेश्वर में जो भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और दक्षिण मुखी है। प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में महाकालेश्वर को भगवान शिव का सबसे पवित्र निवास स्थान माना जाता है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ चिता की राख से भस्म आरती की रस्म निभाई जाती है लेकिन क्या आप जानते हैं कि भस्म क्यों लगाते है बाबा भोले नाथ। क्या है शिव के शरीर पर भस्म लगाने का रहस्य, भस्म में छिपा है कौन सा जीवन का सार ये सब हम आपको बताएंगे लेकिन इससे पहले आपको बताते हैं महाकालेश्वर की अद्भुत कथा जिसके बारे में शिवपुराण में भी बताया गया है। पुराणो में लिखा है कि उज्जैन की अवंती नगरी में एक वेद प्रिय नाम के ब्राह्मण रहते थे एक दिन वेदप्रिय अपने बेटों और अन्य धर्म आत्माओं के साथ पूजा पाठ में लीन थे तभी एक दूषण नाम के असुर ने उन पर आक्रमण कर दिया लेकिन भयंकर आक्रमण से भी शिव पर विश्वास करने वाले ब्राह्मण के पुत्र नहीं डरे और शिव की पूजा करते रहे लेकिन जब असुर को लगा कि ब्राह्मण के पुत्र उस से नहीं डर रहे तो गुस्साएं दैत्य ने जैसे ही शस्त्र उठाये वैसे ही वहाँ भगवान शिव प्रकट हो गए और फिर भगवान शिव ने दूषण को भस्म कर दिया और फिर उसकी राख से अपना श्रृंगार किया इसी वजह से इस मंदिर का नाम महाकालेश्वर रख दिया गया। और इस शिवलिंग की भस्म से आरती की जाने लगी। इसके अलावा भगवान शिव के भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण भी बताए गए हैं। भोले नाथ का अपने शरीर पर भस्म लगाने का दार्शनिक अर्थ यह है की ये शरीर जिस पर हम गर्व करते हैं 700 साल पुरानी है भूतनाथ मंदिर, मनोवांछित फल और भक्तों की मुरादे होती है पूरी एक दिन इसका भस्म के समान ही अंत हो जाना है। वहीं भस्म की एक विशेषता यह भी है की ये शरीर के रोमछिद्रों को बंद कर देता है साथ ही इसका मुख्य गुण ये है की यदि कोई व्यक्ति इसे शरीर पर लगाता है तो गर्मी में गर्मी और सर्दी में ठंड नहीं लगती। तो ये वो रहस्य है जो ज्यादातर लोग भस्म को लेकर नहीं जानते हैं लेकिन अब बात शिव के भस्म आरती की भी कर लेते हैं जिससे जुड़े कई नियम भी हैं जो की इस आरती के दौरान किए जाते हैं। दरअसल महिलाओं को इस आरती में शामिल होने के लिए साड़ी पहनना जरूरी होता है और जिस वक्त शिवलिंग पर भस्म चढ़ती है उस वक्त महिलाओं को घूंघट करने को भी कहा जाता है। मान्यता है कि उस वक्त भगवान शिव निराकार स्वरूप में होते हैं इस स्वरूप के दर्शन करने की अनुमति महिलाओं के लिए वर्जित है इसलिए महिलाओं को आरती के दौरान घूंघट में रहना होता है। लेकिन ऐसा नहीं के नियम केवल महिलाओं के लिए हैं। पुरुषों को भी इस आरती के दौरान कई नियमों का पालन करना होता है। इस आरती में शामिल होने के लिए पुरुषों को केवल धोती पहननी होती है वो भी साफ, स्वच्छ और सूती होनी चाहिए। पुरुष इस आरती को केवल देख सकते हैं और करने का अधिकार केवल यहाँ के पुजारियों को ही होता है। वैसे आपको बता दें कि देशभर में ये इकलौता ऐसा शिव मंदिर है जहाँ भगवान शिव की 6 बार आरती की जाती है और हर आरती में भगवान शिव के एक नए स्वरूप के दर्शन होते हैं। सबसे पहले भस्म आरती फिर दूसरी आरती में भगवान शिव को घटाटोप स्वरूप दिया जाता है तीसरी आरती में शिवलिंग को हनुमानजी का रूप दिया जाता है। चौथी में भगवान शिव का शेषनाग अवतार, पाँचवी में शिव भगवान के दूल्हे का रूप और छठवीं आरती में शयन आरती होती है। जिसमें भगवान शिव खुद के स्वरूप में होते हैं। ऐसे में अगर आप भी इस मंदिर में भस्म आरती में शामिल होना चाहते हैं तो आप इसके लिए पहले से ही रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। भूतनाथ मंदिर का इतिहास खंगालने पर पता चला है कि बिल्कुल श्मशान भूमि पर ही शिवलिंग यानी मंदिर बना हुआ था इसीलिए आरती के वक्त जब ज्योति प्रज्जवलन की जरूरत होती थी तब पुजारी किसी भी जलती हुई चिता से एक लकड़ी उठा लेता था। यह प्रथा तब से आज तक जारी है। गंगा नदी के पश्चिम किनारे पर बने भूतनाथ मंदिर के भव्य व दिव्य मंदिर के संचालन का जिम्मा हिंदू सत्कार समिति के पास है, जबकि प्रबंधन का कार्य मंदिर कमेटी देखती है। हिंदू सत्कार समिति के संयुक्त सचिव के मुताबिक 1932 से समिति ने मंदिर का संचालन अपने हाथों में लिया और साल-दर-साल मंदिर का विस्तार व प्रचार होता गया।

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