UTTAR PRADESH

इस्कॉन मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इस्कॉन की स्थापना भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में न्यूयॉर्क में की थी। इस्कॉन मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा शहर के वृंदावन में स्थित एक हिंदू मंदिर है। यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम को समर्पित है। इस्कॉन मंदिर का पूरा नाम इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) है। इस संस्था की स्थापना भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में न्यूयॉर्क में की थी। स्वामी प्रभुपाद जी ने ही वृंदावन में इस मंदिर बनाने का सपना देखा और उसे पूरा भी किया। मंदिर को कृष्ण बलराम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर का इतिहास इस्कॉन मंदिर:स्वामी प्रभुपाद भारत में कई जगहों पर इस्कॉन मंदिर बनवाना चाहते थे। 1975 में उन्होंने वृंदावन में यह मंदिर बनवाया था। ये भारत में इस्कॉन द्वारा निर्मित पहला मंदिर था। राम नवमी के मंदिर शुभ अवसर पर उन्होंने मंदिर का उद्घाटन किया और कृष्ण-बलराम, राधा-श्यामासुंदर, ललिता देवी, विशाखा देवी और गौरा-नितई के दिव्य देवताओं की स्थापना की। मंदिर उसी स्थान पर बना है जहां श्री कृष्ण और श्री बलराम ने अपना बचपन बिताया था। इस्कॉन मंदिर:का महत्व इस्कॉन मंदिर दुनिया भर के कृष्ण भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र है, क्योंकि यह शक्ति और भक्ति का प्रतीक है। मंदिर वृन्दावन में आकर भक्त श्री कृष्ण की भक्ति में डूब जाते हैं और अपने सारे कष्टों को भूल जाते हैं। मंदिर में पूजा की उच्च गुणवत्ता का पालन किया जाता है और कुछ प्रक्रियाओं को नित्य रूप से किया जाता है, जिसमें से कुछ हैं – 6 प्रकार की आरतियाँ, 6 प्रकार के भोग और इष्टदेव को चढ़ावा, पुजारियों द्वारा धार्मिक विधि-विधान के साथ इष्टदेवों की अनुशासित पूजा। मंदिर के जरिए इस्कॉन के अनुयायियों ने विश्व में गीता, हिंदू धर्म और संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया और प्रक्रिया सतत जारी है। इस्कॉन मंदिर की वास्तुकला मंदिर सफेद संगमरमर से निर्मित है और इस मंदिर की बनावट वृंदावन की प्रभावशाली मंदिरों में से एक है। ये जटिल नक्काशीदार दीवारों और गुंबदों, घुमावदार सीढ़ियों और मेहराबों के साथ विशेष कारीगरी का एक उदाहरण है। मंदिर परिसर में तीन मंदिर हैं; एक भगवान कृष्ण और उनके भाई भगवान बलराम को समर्पित, दूसरा श्री गौर – निताई (श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद) को समर्पित और तीसरा श्री श्यामसुंदर (भगवान कृष्ण और राधा रानी) को समर्पित। मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत मंदिर के केंद्रीय स्लैब में बाईं ओर नित्यानंद के साथ चैतन्य महाप्रभु और भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद और इस्कॉन मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत उनके आध्यात्मिक गुरु भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की मूर्तियां लगी हुई हैं। जैसे ही आप मंदिर के दरवाजे में प्रवेश करते हैं, काले और सफेद संगमरमर के चारखानेदार प्रांगण आपका ध्यान आकर्षित करते हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 04:00 AM – 12:45 PM श्रृंगार आरती का समय 07:15 AM – 07:25 AM भागवत कथा का समय 08:00 AM – 08:30 AM राज भोग आरती का समय 12:00 PM – 12:30 PM उत्थापन आरती का समय 04:00 PM – 04:30 PM शयन आरती का समय 08:00 PM – 08:15 PM मंगला आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM गुरु पूजा का समय 07:25 AM – 08:00 AM पुष्प आरती का समय 08:30 AM – 09:30 AM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:15 PM संध्या आरती का समय 06:30 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद इस्कॉन मंदिर में फूलों के साथ माखन, मिश्री, पेड़ा और बर्फी का भोग लगाया जाता है।

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वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर:इस मंदिर को विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर बताया जाता है, जो अभी मथुरा के वृंदावन में अंडर कंस्ट्रक्शन है। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर, भारत के उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के वृन्दावन शहर का एक ऐतिहासिक मंदिर है। इस मंदिर को विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर बताया जाता है, जो अभी मथुरा के वृंदावन में अंडर कंस्ट्रक्शन है। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर परिसर करीब 26 एकड़ में फैला हुआ है और इसकी ऊंचाई 700 फीट है। इस मंदिर में वर्ष भर में आने वाले विभिन्न तरह के धार्मिक पर्वों और त्योहारों को मनाया जाएगा। आने वाले समय में यह मंदिर हिन्दूओं के लिए एक बहुत बड़ा दर्शनिक स्थान होगा। मंदिर का इतिहास वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का निर्माण कार्य 2014 में शुरू हुआ। इस मंदिर की नीव का पहला पत्थर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी द्वारा रखा गया था। वर्तमान समय में इस मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जिसके पुरे होने की संभावना 2024 से 2025 के बीच में है। इसका निर्माण कार्य पूरा होते ही यह मंदिर सभी श्री कृष्ण भक्तों के लिए खोल दिया जायेगा। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर की संरचना में आईआईटी दिल्ली के सिविल इंजीनियर डिपार्टमेंट के इंजिनियर लगे हुए हैं, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जिनके स्ट्रक्चरल कंसलटेंट संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के थोर्नटन टॉमसटी हैं। इस मंदिर के निर्माण के लिए मुख्य आर्केटेक्ट के रूप में गुरुग्राम की कंपनी InGenious Studio प्राइवेट लिमिटेड और नोएडा स्थित क्विंटेस्सेंस डिजाईन स्टूडियो काम कर रही है। मंदिर का महत्व वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का मुख्य आकर्षण एक कैप्सूल एलिवेटर होगा, जो आगंतुकों को शीर्ष पर ले जाएगा जहां से आप पुरे ब्रज मंडल के विहंगम दृश्य का आनंद ले सकेंगे। मंदिर के निर्माण की कुल लागत लगभग 300 करोड़ होगी, जिस कारण यह दुनिया का सबसे महंगा मंदिर बन जाएगा । वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर मंदिर परिसर के चारों ओर 12 वनों का नाम ब्रज मंडल के 12 उद्यानों के नाम पर रखा जाएगा, जो इस प्रकार हैं- महावन, वृंदावन, लोहावन, काम्यवन, कुमुदवन, तलवन, भांडीरावण, मधुवन, कुमुदवन, बहुलवन, बिल्ववन और भद्रवन। मंदिर की वास्तुकला वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का निर्माण आधुनिक डिजाइन के साथ एक पारंपरिक नागर शैली की वास्तुकला के अनुसार किया जा रहा है। यह मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा धार्मिक स्थल बनने जा रहा है, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जो लगभग 700 फीट ऊंचा और 213 मीटर लंबा होगा। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर परिसर लगभग 26 एकड़ भूमि के क्षेत्र में बनेगा। इस परिसर के चारों ओर हरे-भरे जंगल बनाए जा रहे हैं। इस जंगल को फल-फूल के वृक्षों, झरनों और छोटी-छोटी कृत्रिम पहाड़ियों से बनाया जायेगा, यहां पर श्री कृष्ण काल के वर्णन के अनुसार सब कुछ निर्मित किया जाएगा। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 12:00 PM दोपहर में मंदिर खुलने का समय 01:00 PM – 08:00 PM

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तक्षकेश्वर नाथ:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

प्रयागराज में इस स्थल को “बड़ा शिवाला” के नाम से जाना जाता है। तक्षकेश्वर नाथ मंदिर, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज जिले में स्थित है। संगम नगरी में यमुना किनारे तक्षकेश्वर नाथ मंदिर विश्व का एकलौता तक्षक तीर्थ स्थल है। वर्तमान में यह स्थान प्रयागराज शहर के दक्षिणी क्षेत्र में दरियाबाद मुहल्ले में स्थित है। यह स्थल आदिकाल से संरक्षित है और यहां शेषनाग के अवशेष आज भी मौजूद है। यह यमुना तट पर विशाल घने जंगलों में स्थापित शिवलिंग था। हालांकि यहां अब जंगल का अस्तित्व खत्म हो गया है। प्रयागराज में इस स्थल को “बड़ा शिवाला” के नाम से जाना जाता है। मंदिर का इतिहास तक्षकेश्वर नाथ मंदिर का इतिहास 5,000 साल से भी ज्यादा पुराना है। तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग की प्राचीनता और पौराणिकता स्वयं पुराणों में दर्ज है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा परीक्षित को जब तक्षक नाग ने डसा था, तब उस घटना के प्रायश्चित में इन पांचों मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी और वरदान दिया गया था कि जो कोई भी इस मंदिर में जाकर दर्शन करेगा, उसके वंशजों को कभी सर्प की विष बाधा नहीं होगी। पुराणों की माने तो तक्षक संपूर्ण सर्पजाति के स्वामी हैं। आदिकाल से यह धर्म की राजधानी तीर्थराज प्रयाग में निवास कर रहे हैं। शास्त्रों में भी कहा गया है कि काल सर्पयोग शांति, राहु की महादशा, नागदोष एवं विष बाधा से मुक्ति का मुख्य स्थान तक्षकेश्वर नाथ प्रयाग ही है। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि दो दशक पहले तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में सावन के महीने में यहां सांपों का आना जाना अत्याधिक बढ़ जाता था। मान्यता है कि यहां शिवलिंग के दर्शन से कालसर्प दोषों से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में शिव जी के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं को और उनके वंशजों को सर्प विष बाधा से मुक्ति मिलती है। मंदिर की वास्तुकला प्रयागराज में तक्षकेश्वर नाथ मंदिर को नागर शैली में बनाया गया है। मंदिर में विशाल शिखर के साथ गुंबद भी बने हैं। तक्षकेश्वर महादेव के लिंग के चारों ओर तांबे का अर्घ्य बना है। परिसर में हनुमान जी, गणेश जी की मूर्ति है। 20 जनवरी 1992 को खुदाई के दौरान यहां खुदाई में पौराणिक काल के कुछ अवशेष प्राप्त हुये थे। कई पत्थर और प्राचीन मूर्तियां यहां मिलीं और उन पर पर बारीक नक्काशी मौजूदा मानव सभ्यता से भी प्राचीन बताई गई। पुरातत्व विभाग ने भी यहां पत्थरों का अवलोकन किया और अति प्राचीन सभ्यता की कृति होने के कारण आज भी उस पर शोध जारी है। मंदिर का समय सुबह तक्षकेश्वर नाथ मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 12:00 PM शाम को तक्षकेश्वर नाथ मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 10:00 PM मंदिर का प्रसाद तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में भक्त शिव जी फल, दूध, लड्डू का भोग चढ़ाते हैं। साथ ही भांग, दतुरा, बेलपत्र भी शिव जी को चढ़ाया जाता है।

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श्री वेणी माधव मंदिर प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

श्री वेणी माधव मंदिर:वेणी माधव मंदिर की गिनती प्रयागराज के सबसे पुराने मंदिरों में की जाती है। श्री वेणी माधव मंदिर:जैसे काशी को भगवान भोलेनाथ की नगरी कहा जाता है, ठीक वैसे ही प्रयागराज को भगवान विष्णु की नगरी कहा जाता है। भगवान विष्णु को समर्पित वेणी माधव मंदिर प्रयागराज के दारागंज में निराला मार्ग पर स्थित है। वेणी माधव मंदिर लोकप्रिय रूप से वाणी माधव मंदिर के रूप में जाना जाता है और प्रयागराज के प्रयाग में 12 माधव मंदिरों में से एक है। वेणी माधव मंदिर में भगवान विष्णु के साथ-साथ देवी लक्ष्मी की भी पूजा अर्चना की जाती है। श्री वेणी माधव मंदिर:मंदिर का इतिहास वेणी माधव मंदिर 171 साल पुराना है। इतिहासकारों की माने तो इसका निर्माण श्रीमंत दौलत राव सिंधिया की पत्नी बैजा बाई साहब ने वर्ष 1835 में करवाया था। वेणी माधव मंदिर की गिनती प्रयागराज के सबसे पुराने मंदिरों में की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार बंगाल के प्रसिद्ध वैष्णवों के संत- चैतन्य महाप्रभु जी ने लंबे समय तक वेणी माधव मंदिर में तपस्या की थी। पद्म पुराण के अनुसार, यह प्रसिद्ध बंगाली गुरु प्रयाग के मुख्य देवता है। वह भगवान महा विष्णु और देवी लक्ष्मी के उत्साही भक्तों में से एक थे। वेणी माधव मंदिर प्रवेश द्वार के बायीं ओर लगे शिलालेख में उल्लेख है कि मंदिर का प्रबंधन सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट, ग्वालियर के पास है। श्री वेणी माधव मंदिर:मंदिर का महत्व वेणी माधव मंदिर के बारे में कहा जाता है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद प्रयाग में प्रथम यज्ञ किया था। पुराणों के अनुसार प्रयाग में सभी तीर्थों का उद्गम है। इस पावन नगरी के निर्माता भगवान श्री विष्णु स्वयं है और वह यहां भगवान श्री वेणी माधव मंदिर के रूप में विराजमान है। संगम स्नान के बाद भगवान श्री वेणी माधव जी के दर्शन करने से ही पूर्ण पुण्य प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता पुराणों एवं रामचरितमानस में वर्णित है। इस प्राचीनतम मंदिर के प्रांगण में चैतन्य महाप्रभु जी वेणी माधव जी के दर्शन करने हेतु संकीर्तन एवं नृत्य किया करते थे। श्री वेणी माधव मंदिर:मंदिर की वास्तुकला वेणी माधव मंदिर की वास्तुकला बहुत सुंदर है, जो विशिष्ट मराठी वास्तुकला की एक झलक देता है। मंदिर के ‘शिखर’ पर नक्काशी की गई है और इसके उच्चतम बिंदु को पीतल की संरचना से सजाया गया है जो सूरज की रोशनी में चमकता है। शिखर पर सिंधिया राजवंश का प्रतीक चिन्ह (दो नागों से घिरे सूर्य की भव्य आकृति) भी उकेरा गया है। श्री कृष्ण भगवान जी की मूर्ति यहां पर श्याम रंग की है, जो बहुत ही खूबसूरत लगती है। मंदिर के मुख्य द्वार पर काले रंग का बड़ा गेट लगा है। पत्थर की सीढ़ियां गर्भगृह तक ले जाती हैं जहां श्री वेणी, माधव और गरुण की मूर्तियां हैं। मूर्तियों के पास बैजा बाई की संगमरमर की मूर्ति भी रखी हुई है। प्रवेश द्वार के ठीक ऊपर स्वर्गीय माधव राव सिंधिया की दो तस्वीरें हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM सांयकाल आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM शाम में मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 10:00 PM मंदिर का प्रसाद वेणी माधव मंदिर में वेणी माधव जी को लड्डू का प्रसाद चढ़ाया जाता है। श्रद्धालु वेणी माधव जी को ड्राई फ्रूट्स, फल और पेड़े का भी भोग लगाते हैं।

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बाँके बिहारी मंदिर वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इस मंदिर की गिनती प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिरों में की जाती है। उत्तर प्रदेश मथुरा जिले के वृंदावन में बिहारीपुरा में बाँके बिहारी मंदिर है। इस मंदिर की गिनती भी प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिरों में की जाती है। बाँके बिहारी भगवान् श्री कृष्ण का ही एक रूप है। जो बहुत ही अद्भुत है। बाँके बिहारी मंदिर विश्व में प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त इस मंदिर के दर्शन करते है उनका जीवन सफल हो जाता है। मंदिर का इतिहास इस मंदिर के इतिहास के पीछे भी एक कहानी है। बाँके बिहारी मंदिर की कहानी कुछ इस प्रकार है। बाँके बिहारी मंदिर का निर्माण 1864 में स्वामी हरिदास ने करवाया था। स्वामी हरिदास भगवान कृष्ण और राधा जी के परम भक्त थे। उनके भक्ति और समर्पण के आगे भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी को निधिवन में साक्षात् प्रकट होना पड़ा। इस दिव्य जोड़े की सुंदरता और आकर्षण का तेज इतना था की एक साधारण मनुष्य इसे सहन नहीं कर सकता था। इसलिए स्वामी हरिदास ने भगवान को सहज रूप में प्रकट होने का अनुरोध किया। उनका अनुरोध स्वीकार कर भगवान बांके बिहारी जी और राधारानी एकीकृत होकर एक काली आकर्षक मूर्ति में विलीन हो गए। इस प्रतिमा की आज भी पूजा होती है। स्वामी हरिदास जी के अनुयायियों ने 1921 में बाके बिहारी मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। बाँके बिहारी मंदिर वृंदावन:मंदिर का महत्व इस मंदिर की ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त बाके बिहारी जी के दर्शन करता है वह उन्ही का हो कर रह जाता है। जो भी व्यक्ति बांके बिहारी की मूर्ति की एक झलक लेता है वह सब सुध बुध भूलकर उन्ही में रम जाता है। बांके बिहारी जी की पूजा करने से सभी संकटों का नाश होता है। बांके का अर्थ है तीन कोणों पर मुड़ा हुआ, यह एक तरह से बांसुरी बजाते भगवान कृष्ण की एक मुद्रा ही है। बांसुरी बजाने के समय भगवान श्री कृष्ण का दाहिना घुटना बाएं घुटने के समीप मुड़ा हुआ रहता था और दायां हाथ बांसुरी को थामने हेतु मुड़ा रहता था। इस कारण श्री कृष्ण का सिर भी हल्का सा एक तरफ झुका रहता था। उनके द्वारा इस तरह किये जाने के कारण उनका नाम बांके बिहारी पड़ा। बाँके बिहारी मंदिर वृंदावन:मंदिर की वास्तुकला बांके बिहारी मंदिर की वास्तुकला राजस्थानी वास्तुकला से प्रेरित है। इस मंदिर के मेहराब और स्तम्भ बहुत ही अट्रेक्टिव है। बांके बिहारी जी की काले पत्थर से निर्मित प्रतिमा बहुत ही आकर्षक है। इसे देखकर सभी मंत्र मुग्ध हो जाते है। इस प्रतिमा में राधा और कृष्ण का एकी कारण है। मंदिर का समय गर्मियों में बांके बिहारी मंदिर खुलने का समय 07:45 AM – 12:00 PM राजभोग आरती का समय 11:55 AM – 12:00 PM शयन आरती का समय 09:25 PM – 09:30 PM सर्दियों में बांके बिहारी मंदिर शाम को खुलने का समय 04:30 PM – 08:30 PM राज भोग का समय 11:00 AM – 11:30 AM गर्मियीं में बांके बिहारी मंदिर शाम को खुलने का समय 05:30 PM – 09:30 PM सर्दियों में बांके बिहारी मंदिर खुलने का समय 08:45 AM – 01:00 PM मंदिर का प्रसाद बांके बिहारी मंदिर में भगवान को माखन- मिश्री, चंदन, गुलाब जल और केसर का भोग लगाया जाता है। साथ ही फूल भी चढ़ाये जाते है।

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प्रेम मंदिर वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

55 एकड़ के विशाल क्षेत्रफल में बने प्रेम मंदिर पूरे विश्वभर में प्रसिद्ध है। प्रेम मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले के समीप वृंदावन में स्थित है। जगद्गुरु श्री कृपालु महाराज जी की संस्था जगद्गुरु कृपालु परिषत द्वारा भगवान श्री कृष्ण और राधा के इस भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया गया है। 54 एकड़ के विशाल क्षेत्रफल में बना प्रेम मंदिर पूरे विश्वभर में प्रसिद्ध है। प्रेम मंदिर में राधा-कृष्ण की भव्य मूर्ति की स्थापना के साथ सीता-राम जी प्रतिमा की स्थापित की गई है। प्रेम मंदिर में देश के लोगों के अलावा विदेशों से भी कई लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। होली और दीवाली पर तो यहां का नजारा और भव्य हो जाता है। मंदिर का इतिहास जगद्गुरु श्री कृपालु महाराज जी ने प्रेम मंदिर की नींव जनवरी 2001 में रखी थी। मंदिर पूरे एक हजार मजदूरों द्वारा 11 सालों में बनकर तैयार किया गया। इसका उद्घाटन समारोह 15 फरवरो 2012 को किया गया था। फिर 17 फरवरी को इसे भक्तों के लिए खोल दिया गया था। मंदिर संगमरमर के पत्थरों से बना है, जो कि इटली से मंगवाए गए थे। इसको बनाने में राजस्थान और उत्तर प्रदेश के 1,000 शिल्पकारों को लगाया गया था। मंदिर की सतरंगी रोशनी भी भक्तों को बेहद आकर्षित करती है। मंदिर का महत्व प्रेम मंदिर की एक खासियत ये भी है कि आपको ये दिन में एकदम सफेद दिखाई देगा और शाम के समय रोशनी के बीच मंदिर का रंग कुछ अलग ही नजर दिखाई देता है। प्रेम मंदिर एक आध्यात्मिक मंदिर है। इसमें रखी राधा कृष्ण की मूर्ति के दर्शन मात्र से भक्तों को अत्यंत शुकून और शांति मिलती है। प्रेम मंदिर राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का प्रतीक है। इसमें भगवान कृष्ण की लीलाएं जैसे की गोवर्धन लीला, कालिया नाग लीला, झूलन लीला जैसी अनेक लीलाओं की झांकियां सजाई गई है। मंदिर की वास्तुकला प्रेम मंदिर के निर्माण में इटालियन संगमरमर का उपयोग किया गया है। दो मंजिला सफेद रंग के प्रेम मंदिर को एक ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है, जो 128 फीट चौड़ा और 125 फीट ऊंचा और 190 फीट लंबा है। मंदिर में सत्संग के लिए एक विशाल भवन का निर्माण किया गया है, जिसमें एक साथ 25000 हजार लोग बैठ सकते हैं। प्रेम मंदिर की दीवारें 3.25 फीट मोटी हैं और इटालियन संगमरमर से बनी हैं। इस मंदिर के द्वार चारों दिशाओं में खुलते है। विशाल शिखर, स्वर्ण कलश और ध्वज का वजन सहने के लिए गर्भगृह की दीवारें 8 फीट मोटी हैं। प्रेम मंदिर में 94 कलामंडित स्तम्भ हैं, जो मंदिर की खूबसूरती में चार-चांद लगा रहे हैं। मंदिर के गर्भगृह के बाहर और अन्दर प्राचीन भारतीय वास्तुशिल्प की उत्कृष्ट पच्चीकारी और नक्काशी की गयी है। संगमरमर की शिलाओं पर राधा गोविन्द गीत सरल भाषा में लिखे गये हैं। मंदिर परिसर में गोवर्धन पर्वत की सजीव झाँकी बनायी गयी है। प्रेम मंदिर खुलने का समय 05:30 AM – 12:00 PM सुबह भोग का समय 06:30 AM – 07:00 AM सुबह भोग का समय 11:30 AM – 12:00 PM शाम दर्शन और आरती का समय 04:30 PM – 05:30 PM शाम परिक्रमा का समय 07:00 PM – 08:00 PM सुबह की आरती और परिक्रमा का समय 05:30 AM – 06:30 AM सुबह दर्शन और आरती का समय 08:30 AM – 11:30 AM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:30 PM – 08:30 PM शाम भोग का समय 05:30 PM – 06:00 PM शाम की आरती का समय 08:10 PM – 08:30 PM मंदिर का प्रसाद प्रेम मंदिर में फूलों के साथ माखन, मिश्री, पेड़ा और बर्फी का भोग लगाया जाता है। श्री मंदिर ने श्रध्दालुओ, पंडितों, और मंदिरों को जोड़कर भारत में धार्मिक सेवाओं को लोगों तक पहुँचाया है। 50 से अधिक प्रसिद्ध मंदिरों के साथ साझेदारी करके, हम विशेषज्ञ पंडितों द्वारा की गई विशेष पूजा और चढ़ावा सेवाएँ प्रदान करते हैं और पूर्ण की गई पूजा विधि का वीडियो शेयर करते हैं।

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