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गणेश चतुर्थी पर इस मुहूर्त में घर लाएं गणपति, जानिए गणपति स्थापना और पूजा विधि

गणेश उत्सव का यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तिथि के दिन तक चलता है. 10 दिन तक चलने वाला यह उत्सव बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है. करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए यहां धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन सुख-समृद्धि के देवता भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था। इसी उपलक्ष्य में हर साल गणेश उत्सव मनाया जाता है। यह पर्व पूरे दस दिनों तक चलता है। गणेश उत्सव का यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तिथि के दिन तक चलता है। 10 दिन तक चलने वाला यह उत्सव बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है। इस दौरान घरों और बड़े-बड़े पूजा पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इस दिन शुभ मुहूर्त में ही बप्पा का स्वागत किया जाता है। ऐसे में यदि आप भी अपने घर में गणपति स्थापित करने जा रहे हैं शुभ मुहूर्त जरूर देख लें। चलिए जानते हैं गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त और विधि.. गणेश चतुर्थी तिथि 2023 इस साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 18 सितंबर 2023 को दोपहर 02 बजकर 9 मिनट पर हो रही है। इसका समापन 19 सितंबर 2023 को दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर होगा। उदया तिथि के आधार पर गणेश चतुर्थी 19 सितंबर को मनाई जाएगी। इसी दिन से 10 दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव की शुरुआत भी होगी। गणेश स्थापना की विधि गणपति की स्थापना करने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. स्नान करने के बाद साफ वस्त्र पहनें और इसके बाद अपने माथे पर तिलक लगाएं और पूर्व दिशा की ओर मुख कर आसन पर बैठ जाएं. आपका आसन बिल्कुल शुद्ध होना चाहिए. इसके बाद गणेश जी की प्रतिमा को किसी लकड़ी के पटरे या गेहूं, मूंग, ज्वार के ऊपर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें. गणपति की प्रतिमा के दाएं-बाएं रिद्धि-सिद्धि को भी स्थापित करें और साथ में एक-एक सुपारी रखें. गणेश चतुर्थी पूजा विधि गणेश चतुर्थी तिथि पर शुभ मुहूर्त को ध्यान में रखकर सबसे पहले अपने घर के उत्तर भाग, पूर्व भाग या पूर्वोत्तर भाग में गणेश जी की प्रतिमा रखें. पूजन सामग्री लेकर शुद्ध आसन पर बैठें. गणेश भगवान की प्रतिमा की पूर्व दिशा में कलश रखें और दक्षिण पूर्व में दीया जलाएं. अपने ऊपर जल छिड़कते हुए ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः मंत्र का जाप करें. भगवान गणेश को प्रणाम करें और तीन बार आचमन करें तथा माथे पर तिलक लगाएं. आसन के बाद गणेश जी को पंचामृत से स्नान कराएं. उन्हें वस्त्र, जनेऊ, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य और फल चढ़ाएं. गणेश जी की आरती करें और मनोकामना पूर्ति के लिए आशीर्वाद मांगे. 

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भगवान कृष्ण की किस पूजा से कटेंगे आपके कष्ट और पूरी होंगी मनोकामनाएं

हिंदू धर्म में पूर्णावतार माने जाने वाले श्री कृष्ण की पूजा अत्यंत ही शुभ और शीघ्र फलदायी मानी गई है. कान्हा की पूजा का वो उपाय जिसे करते ही व्यक्ति जल्द ही पूरी होती है हर बड़ी मनोकामना, जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. हिंदू धर्म में भगवान श्री कृष्ण एक ऐसे देवता हैं, जिन्हें पूर्णावतार माना जाता है. भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति जीवन से जुड़े सभी दुखों और परेशानियों को पलक झपकते दूर करने वाली मानी गई है. जिस कृष्ण का नाम जपते ही इंसान के सभी कष्ट दूर और कामनाएं पूरी हो जाती हैं, उस बंशी बजैया की पूजा के लिए सनातन पंरपरा में कई उपाय बताए गये हैं. मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति कान्हा की पूजा में उनकी प्रिय चीजों को चढ़ाकर इन उपायों को करता है तो उस पर हर समय कृष्ण की कृपा बरसती है और उसे संंसार के सभी सुख प्राप्त होते हैं. हल षष्ठी व्रत पढ़ें पौराणिक एवं प्रचलित व्रत कथा सनातन परंपरा में किसी भी देवता की कृपा पाने और मनोकामना को पूरा करने के लिए उस देवता से जुड़े मंत्र का जप करने का विधान है. ऐसे में यदि आप भगवान श्री कृष्ण की पूजा करते हैं तो आपको उनकी पूजा में प्रतिदिन ‘ॐ श्रीकृष्णाय नम:’ मंत्र का पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ जप करना चाहिए. मान्यता है कि इस मंत्र का जप करते ही भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों को संकट से बचाने के लिए दौड़े चले आते हैं. कान्हा के इस मंत्र को जपने से उनके भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को बांसुरी बहुत ज्यादा प्रिय थी, जिसके कारण वे अक्सर अपनी बांसुरी को अपने साथ लिए रहते थे. यही कारण है कि उनके भक्त उन्हें बंसी बजैया के नाम से बुलाते हैं. हिंदू मान्यता के अनुसार यदि कोई व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण की पूजा में उनकी प्रिय बांसुरी चढ़ाता है तो वे शीघ्र ही प्रसन्न होकर उसके सारे दुख हर लेते हैं. भगवान श्रीकृष्ण को बांसुरी की तरह मोर और उसका पंख बहुत ज्यादा प्रिय था. ऐसे में यदि कोई व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण की पूजा में उन्हें विशेष रूप से मोर का पंख चढ़ाता है तो उसकी मनोकामना शीघ्र ही पूरी होती है. मान्यता है कि यदि किसी की कुंडली में कालसर्प दोष हो तो वह उससे जुड़े कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भगवान श्री कृष्ण की पूजा में चढ़ा मोरपंख अपने बिस्तर के नीचे रखकर सोए. मान्यता है कि इस उपाय को करने पर व्यक्ति को अपने जीवन में शीघ्र ही बड़ा बदलाव देखने को मिलता है. हिंदू मान्यता के अनुसार यदि किसी देवता को उसकी प्रिय चीज का भोग लगाया जाए तो वह शीघ्र ही प्रसन्न होकर साधक पर अपनी कृपा बरसाते हैं. ऐसे में यदि आप कान्हा की कृपा चाहते हैं तो आपको उनकी पूजा में उनके प्रिय भोग यानि मक्कखन, मिश्री, चरणामृत, लड्डू आदि के साथ तुलसी पत्र जरूर चढ़ाना चाहिए. यदि आपको अभी तक संतान सुख नहीं प्राप्त हो पाया है या फिर होने के बाद भी उसका सुख नहीं हासिल हो पा रहा है तो आपको भगवान श्रीकृष्ण की पूजा प्रतिदिन जरूर करनी चाहिए. मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति कान्हा की पूजा में संतान गोपाल मंत्र का पाठ करता है तो उसे संतान सुख अवश्य प्राप्त होता है. कान्‍हा की पूजा के उपाय हिंदू धर्म में भगवान श्री कृष्ण एक ऐसे देवता हैं, जिन्हें पूर्णावतार माना जाता है. भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति जीवन से जुड़े सभी दुखों और परेशानियों को पलक झपकते दूर करने वाली मानी गई है. जिस कृष्ण का नाम जपते ही इंसान के सभी कष्ट दूर और कामनाएं पूरी हो जाती हैं, उस बंशी बजैया की पूजा के लिए सनातन पंरपरा में कई उपाय बताए गये हैं. मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति कान्हा की पूजा में उनकी प्रिय चीजों को चढ़ाकर इन उपायों को करता है तो उस पर हर समय कृष्ण की कृपा बरसती है और उसे संंसार के सभी सुख प्राप्त होते हैं.

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30 अगस्त या 31 अगस्त को, रक्षाबंधन कब है? गलती से भद्रा के इस वक्त में ना बांधें राखी

रक्षाबंधन के त्योहार की तिथि को लेकर लोगों में इस बार बहुत कंफ्यूजन है. लोग संशय में हैं कि रक्षाबंधन 30 अगस्त को मनाएं या 31 अगस्त को. आपको बता दें कि रक्षाबंधन इस दिन 30 और 31 अगस्त दोनों दिन मनेगा लेकिन भद्रा के साए की वजह से आपको शुभ मुहूर्त का खास ख्याल रखना होगा. 30 अगस्त को लगभग पूरे दिन ही भद्रा का साया रहेगा और 31 अगस्त को राखी बांधने का शुभ मुहूर्त सिर्फ सुबह कुछ देर तक ही है. रक्षाबंधन का मतलब रक्षा बंधन एक पारंपरिक हिंदू त्योहार है जो भाइयों और बहनों के बीच के बंधन का जश्न मनाता है. त्योहार का नाम संस्कृत शब्द ‘रक्षा’ से आया है जिसका अर्थ है- ‘सुरक्षा’ और ‘बंधन’ का अर्थ है- ‘बांधना’. रक्षा बंधन का इतिहास इस त्योहार का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व बहुत गहरा है. ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में, रानियां, और राजुकमारियां अपने गठबंधन और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में पड़ोसी राजाओं को राखी के धागे भेजती थीं. हालांकि रक्षा बंधन से जुड़ी कुछ लोकप्रिय कहानियां हैं: रक्षा बंधन से जुड़ी कहानियां 1. इंद्र और इंद्राणी: एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र को शक्तिशाली राक्षस राजा बाली के खिलाफ लड़ाई में हार का सामना करना पड़ रहा था. साची, जिसे इंद्र की पत्नी इंद्राणी भी कहा जाता है, ने इंद्र की रक्षा के लिए उनकी कलाई पर एक सुरक्षात्मक सूती धागा (राखी) बांधा था. शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पवित्र धागा दिया था. 2. कृष्ण और द्रौपदी: एक अन्य लोकप्रिय कथा महाकाव्य महाभारत से है. एक युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण की उंगली सुदर्शन चक्र से गलती से कट गई थी. यह देखकर पांचों पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने खून रोकने के लिए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया था. यह देखकर कृष्ण ने द्रौपदी को जरूरत पड़ने पर उनकी रक्षा करने और उनका समर्थन करने का वादा किया.  700 सालों बाद रक्षाबंधन पर दुर्लभ महायोग, भूलकर भी न करें ये गलतियां रक्षा बंधन 2023 शुभ मुहूर्त राखी बांधने का शुभ मुहूर्त – 30 अगस्त को रात्रि 09:01 बजे के बाद रक्षा बन्धन अनुष्ठान का समय 09:01 PM के बाद रक्षा बन्धन भद्रा अन्त समय  09:01 PM रक्षा बन्धन भद्रा पूँछ  05:30 PM से 06:31 PM रक्षा बन्धन भद्रा मुख 06:31 PM से 08:11 PM प्रदोष के बाद भद्रा समाप्त होने पर ही मुहूर्त मिलता है.   रक्षाबंधन (राखी) का महत्व रक्षा बंधन भारत और भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य हिस्सों में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार है. यह एक पारंपरिक हिंदू त्योहार है जो भाइयों और बहनों के बीच के रिश्ते का सम्मान करता है. “रक्षा बंधन” शब्द का अनुवाद “सुरक्षा का बंधन” या “सुरक्षा की गांठ” है. यहां रक्षा बंधन के कुछ प्रमुख महत्व हैं  1. बंधन को मजबूत करना: रक्षा बंधन भाइयों और बहनों के बीच प्यार के रिश्ते का जश्न मनाता है. इस दिन, बहनें प्यार, सुरक्षा और सद्भावना के प्रतीक के रूप में अपने भाइयों की कलाई पर “राखी” नामक एक पवित्र धागा बांधती हैं. यह प्यार के अटूट बंधन और भाइयों के अपनी बहनों की रक्षा करने के कर्तव्य का प्रतीक है. रक्षाबंधन का पौराणिक महत्व रक्षा के लिए बांधा जाने वाला धागा रक्षासूत्र है. माना जाता है कि राजसूय यज्ञ के समय में भगवान कृष्ण को द्रोपदी ने रक्षासूत्र के रूप में अपने आंचल का टुकड़ा बांधा था. इसके बाद बहनों द्वारा भाई को राखी बांधने की परंपरा शुरू हुई. साथ ही पहले के समय में ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को राखी बांधकर उनकी मंगलकामना की जाती है. इस दिन वेदपाठी ब्राह्मण यजुर्वेद का पाठ शुरू करते हैं. इसलिए रक्षाबंधन वाले दिन यानी श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा वाले दिन शिक्षा का आरंभ करना भी शुभ माना जाता है. भारत में अन्य धर्मों के बीच रक्षा बंधन का महत्व रक्षा बंधन भारत में मुख्य रूप से हिंदुओं के बीच मनाया जाने वाला एक पवित्र त्योहार है, लेकिन यह देश के विभिन्न धर्मों और समुदायों में भी महत्व रखता है. हालाँकि यह मुख्य रूप से हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है, लेकिन इसका प्रभाव अन्य धार्मिक समूहों तक फैल गया है, जिससे एकता और सद्भाव की भावना को बढ़ावा मिलता है. हिन्दू धर्म  रक्षा बंधन वैसे तो हिंदू धर्म के सबसे पवित्र त्योहार माना जाता है. यह मुख्य रूप से भाई-बहन के बीच के बंधन के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. बहनें अपने भाइयों की कलाई पर “राखी” नामक एक पवित्र धागा बांधती हैं, और भाई, बदले में, अपनी बहनों की रक्षा और समर्थन करने का वादा करते हैं. यह त्योहार भाई-बहन के बीच प्यार, देखभाल और आपसी सम्मान को दर्शाता है. जैन धर्म रक्षा बंधन जैनियों द्वारा भी मनाया जाता है. जैन अहिंसा में विश्वास करते हैं और राखी के पर्व को सभी जीवित प्राणियों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की याद के रूप में मनाते हैं. वे अपने दोस्तों और परिवार के सदस्यों की कलाई पर राखी बांधते हैं. सिख धर्म सिख रक्षाबंधन को “राखड़ी” के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं. सिख प्यार और सुरक्षा की निशानी के रूप में अपने प्रियजनों की कलाई पर राखी बांधते हैं. यह त्योहार निस्वार्थ सेवा, करुणा और भाईचारे के महत्व पर जोर देता है. बुद्ध धर्म रक्षा बंधन बौद्ध धर्म में व्यापक रूप से नहीं मनाया जाता है, लेकिन भारत के कुछ क्षेत्रों में बौद्धों के बीच इसके पालन के कुछ उदाहरण हैं. यह दोस्ती और सुरक्षा के बंधन का प्रतीक है, व्यक्तियों के बीच सद्भाव और भाईचारा को बढ़ावा देता है. रक्षा बंधन 2023 पूजा विधि 1. अपने आप को शुद्ध करो: पूजा शुरू करने से पहले पवित्रता के संकेत के रूप में स्नान करें और साफ कपड़े पहनें. 2. पूजा की थाली तैयार करें: एक थाली लें और उस पर राखी का धागा, अक्षत, कुमकुम (सिंदूर) या चंदन, मिठाई, दीया (दीपक) और अगरबत्ती जैसी सामग्री रखें.  3. प्रार्थना करें: सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान गणेश की पूजा करें और उनका आशीर्वाद लें. आप गणेश मंत्र या गणेश आरती भी कर सकते हैं. 4. तिलक लगाएं और आरती करें: अपने भाई के माथे पर तिलक लगाएं और आरती की थाली को दक्षिणावर्त दिशा में घुमाकर आरती करें. 5.

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700 साल पुरानी है भूतनाथ मंदिर, मनोवांछित फल और भक्तों की मुरादे होती है पूरी

शिव भक्त शैलजा ने बताया कि उनकी बचपन से ही भगवान शिव पर गहरी आस्था रही है। उनकी शादी के काफी साल तक उनके घर औलाद पैदा नहीं हो रही थी और डॉक्टरों ने भी उन्हें बच्चा न होने की बात कही थी। उसके बाद 4 साल पहले भूतनाथ मंदिर में दर्शन के लिए आई थी तो वहां के पुजारी ने उन्हें आर्शिवाद देते हुए कहा कि अगली बार तू अपने बच्चे के साथ ही मंदिर में आओगी। 4 साल पहले उनका घर नन्हे बच्चे की किलकारी से गूंजा और वे अपने बच्चे के साथ लगातार मंदिर में शिवरात्री के अवसार पर दर्शन करने आई है। कुल्लू जिला में महा शिवरात्री के अवसर पर भगवान शिव के मंदिरों में हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रही। सोमवार को कुल्लू के बिजली महादेव मंदिर, भूतनाथ मंदिर, शिव मंदिर बजौरा, पिरड़ू थान मंदिर व ढालपूर स्थ्ति देवता वीरनाथ मंदिर सहित अन्य मंदिरों में सोमवार सुबह 4 बजे से भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने के लिए कतार में लगना शुरू हुए। स्थानीय निवासी अमित सूद ने बताया कि भूतनाथ मंदिर प्राचीन मंदिर है और ऐसी मान्यता है कि यहां पर पूजा अर्चना करने सभी की भक्तो कीं मनोकामना पूरी होती है। इस मंदिर में लोग हर दिन पूजा-अर्चना करते हैं और इसमें भगवान भोले नाथ के दर्शन होते हैं। यहां पर पूजा अर्चना करने से मनचाहा फल मिलता है। सपने में कमल देखना का मतलब क्या होता है राज मशान घाट का नाम कई वर्ष पहले पद्मावती मशान घाट नाम था वही स्थानीय लोगों की माने तो भूतनाथ मन्दिर के पास पहले कोई सड़क नही था और पूरे इलाक़े में चारो तरफ पानी ही पानी हुआ करता था और एक व्यक्ति प्रल्हाद नामक व्यक्ति रहता था जो जिसको सम्पति बहुत था और एक दिन उसकी बेटी पदमावति की पानी मे डूबने से मौत हो गई जिसके बाद उसको इसी घाट अंतिम संस्कार किया गया और कुछ दिन के बाद पद्मावती ने अपने पिता को स्वपन दिया और कहा कि आपके पास बहुत धन सम्पति है क्या करेंगे और इस इलाके मे पानी रहता है जिससे लोगो को परेशानी होती है आप यहाँ पर एक घाट का निर्माण कर दीजिए । जिसके बाद पिता प्रल्हाद ने यहां पर पद्मावती श्मशान घाट का निर्माण कराया था। कई वर्षों पहले भूतनाथ मन्दिर की रहस्यमय कहानी है कि यहां राज मशान घाट नाम पड़ने के बाद यहां पर रात में करीब 12 बजे रात में एक रहसम्य तरीके का आवाज घुंगरू ओर पायल की आवाज सुनाई पड़ती थी जो पूर्वजो का कहना है कि या रात में भूत प्रेत आकर अपना आवाज लोगो को सुनाते थे लेकिन किसी भी भक्त को परेशान नही किया करता था और लोगों ने बताया कि बाबा भूतनाथ मन्दिर में जो भी भक्त अपनी मन्नते लेकर आते है उनकी मनोकामना पूर्ण होती है भूतनाथ मंदिर में अपनी मन्नते लेकर आते है कई इलाके भक्त भागलपुर साहेबगंज स्थित टीलाकोठी स्थित भूतनाथ मन्दिर में रोजाना पूजा पाठ के लिए भी श्रद्धालुओं की आनाजाना लगा रहता है खास कर सावन माह के सोमवारी और शिवरात्री में मन्दिर में दूरदराज से भक्त आते है और अपनी मन्नते बाबा भूतनाथ के समक्ष रखते औऱ उनकी मनोकामना पूर्ण होती है । वहीं मंदिर के बारे में स्थानीय राहुल पचेरीवाला का कहना है कि बाबा भूतनाथ की महिमा निराली है। उनके यहां से कोई खाली हाथ नहीं लौटता है।भागलपुर जिले के साहेबगंज-चंपानगर रोड स्थित अति प्राचीन श्मशान घाट के किनारे इस शिवमंदिर का प्राचीन इतिहास 700 वर्ष पुराना है।इस मंदिर में मनोवांछित फल की कामना के लिए दूर दराज से श्रद्धालु बाबा के शरण में आते हैं।

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शनि देव को करना है प्रसन्न तो शनिवार के दिन करें इन मंत्रों का जाप, शनि होंगे शांत

शनि के प्रकोप और बुरी दृष्टि से हर व्यक्ति बचना चाहता है. ज्योतिष में एक तरफ जहां शनि ग्रह को क्रूर ग्रह के रूप में देखा जाता है, तो वहीं शनि देव न्यायप्रधान देवता भी कहलाते हैं. क्योंकि वे अपने भक्तों को उनके कर्मों के अनुसार ही शुभ और अशुभ फल देते हैं. जीवन में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहे इसके लिए शनिवार के दिन शनि देव की पूजा जरूर करनी चाहिए. कहा जाता है कि जिन भक्तों को शनि देव का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है वह रंग से भी राजा बन जाता है और उसके जीवन के सारे कष्ट व दुख दूर हो जाते हैं. शनि देव को प्रसन्न रखने के लिए कुछ विशेष मंत्रों के बारे में बताया गया है. इन मंत्रों का जाप शनिवार के दिन करने से कुंडली में शनि ग्रह शांत होते हैं और शनि की साढ़े साती व ढैया का प्रभाव कम होता है. साथ ही जो भक्त श्रद्धाभाव से इन मंत्रों का जाप करते हैं. शनि देव उन पर कृपा बरसाते हैं. घर में है शिवलिंग तो कैसे करें पूजा, जानें सही विधि और नियम प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित है। इसी तरह शनिवार का दिन न्याय के देव शनिदेव को समर्पित होता है। इस दिन शनि देव की पूजा अर्चना की जाती है। मान्यता है कि शनि देव जिन पर प्रसन्न होते हैं, उनके जीवन की सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं और जिनसे वे रुष्ट हो जाएं उनके जीवन में कोई काम सफल नहीं होते हैं। आचार्य पिंटू शास्त्री बताते हैं कि शनि देव को न्याय का देवता माना जाता है। मान्यता है कि मनुष्य के शुभ-अशुभ कर्मों का फल शनि देव प्रदान करते हैं। बुरे कर्म करने वालों को शनिदेव के क्रोध का सामना करना पड़ता है। वहीं, जो लोग परोपकारी होते हैं, शनि की कृपा से उनके जीवन से हर कष्ट का अंत हो जाता है। नौकरी और व्यापार पर चल रहे संकट भी दूर होते हैं। ऐसे में अगर आप भी शनि देव को खुश करना चाहते हैं तो हर शनि वार के दिन आपको कुछ खास मंत्र और उपाय करने चाहिए। 1. सेहत के लिए शनि मंत्र ध्वजिनी धामिनी चैव कंकाली कलहप्रिहा। कंकटी कलही चाउथ तुरंगी महिषी अजा।। शनैर्नामानि पत्नीनामेतानि संजपन् पुमान्। दुःखानि नाश्येन्नित्यं सौभाग्यमेधते सुखमं।। 2. तांत्रिक शनि मंत्र ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः। 3. ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।। 4. शनि महामंत्र ॐ निलान्जन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम। छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥ 5. शनि दोष निवारण मंत्र ऊँ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम। उर्वारुक मिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात।। 6. शनि का पौराणिक मंत्र ऊँ ह्रिं नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम। छाया मार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।। 7. शनि का वैदिक मंत्र ऊँ शन्नोदेवीर-भिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तुनः। 8. शनि गायत्री मंत्र ऊँ भगभवाय विद्महैं मृत्युरुपाय धीमहि तन्नो शनिः प्रचोद्यात्। ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।शंयोरभिश्रवन्तु नः।

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घर में है शिवलिंग तो कैसे करें पूजा, जानें सही विधि और नियम

शुद्ध, पवित्र और स्वच्छ मन से पूजा करने पर भगवान शिव भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. लेकिन घर पर शिवलिंग की पूजा करने के कुछ नियम होते हैं, जिनका पालन करना जरूरी होता है. देवों के देव महादेव भगवान शिव को सनातन धर्म में पंचदेवों में एक माना गया है. अपने नाम की तरह ही भोलेबाबा अत्यंत भोले हैं और उनकी पूजा विधि भी बहुत सरल है. भोलेबाबा अपने भक्त द्वारा सच्चे मन से चढ़ाए गए एक लोटा शुद्ध जल और बेलपत्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं. विधि-विधान से करें पूजा यदि आपके पूजाघर में शिवलिंग है तो इस बात का ध्यान रखें कि नियमित रूप से और पूरे विधि-विधान से पूजा करें. यदि किसी कारण आप शिवलिंग की पूजा नहीं कर पा रहे हैं तो शिवलिंग को घर पर स्थापित नहीं करें. क्योंकि शिवलिंग की पूजा न होने पर भोलेनाथ रुष्ट हो जाते हैं. शिवलिंग में न चढ़ाएं ये चीजें शिवजी की पूजा में केतकी के फूल नहीं चढ़ाने चाहिए. इसके साथ ही शिवलिंग पर कभी भी तुलसी दल या तुलसी के पत्ते भी नहीं चढ़ाने चाहिए. शिवलिंग पर हल्दी-कुमकुम चढ़ाना भी वर्जित होता है. घर पर शिवलिंग का आकार  मंदिरों और शिवालयों में विशाल शिवलिंग होते हैं. लेकिन घर पर बहुत बड़े आकार का शिवलिंग स्थापित नहीं करना चाहिए. घर पर नियमित पूजा के लिए शिवलिंग का आकार आपके अंगूठे से बड़ा नहीं होना चाहिए. क्योंकि शिवलिंग संवेदनशील होती है. इसलिए पूजाघर में छोटे आकार का शिवलिंग रखना ही शुभ होता है. शिवलिंग की स्थापना के नियमों को जरूर जान लें 1. घर के मंदिर में शिवलिंग की यदि आप स्थापना करने जा रहे तो याद रखें कि शिवलिंग की लंबाई या  ऊंचाई अंगूठे के ऊपरी पोर से बड़ा न हो। यदि आपने घर में इससे बड़ा शिवलिंग रखा तो आपके लिए ये फलीभूत नहीं होगा। बड़ा शिवलिंग रखने का मतलब है कि शिवजी को आप अपने घर में तांडव करते हुए देखना चाहते हैं। 2. जब भी आप अपने घर में शिवलिंग की स्थापना करें, वह अकेले नहीं होने चाहिए। उनके साथ उनका पूरा परिवार होना चाहिए। शिवलिंग के साथ में माता गौरी और गणेश जी की भी प्रतिमा होनी चाहिए। अकेले शिवलिंग की पूजा आपको वैराग्य की ओर ले जा सकती है। 3. शिवलिंग की स्थापना कभी भी ऐसी जगह नहीं करें जहां कमरा बंद हो। शिवलिंग खुली जगह पर स्थापति होना चाहिए। शिवलिंग किसी कमरे के अंदर स्थापति नहीं करना चाहिए। ये हैं भगवान शिव के 108 नाम, जिनको पढ़ने या सुनने मात्र से होती है शिव कृपा 4. घर में शिवलिंग स्थापित है तो पूजा होनी चाहिए और तांबे के लोटे से जल चढ़ाना भी जरूरी है। शिवलिंग पर हमेशा जलधारा बहती रहनी चाहिए। 5. घर पर अगर शिवलिंग  की स्थापना की गई तो कभी भी घर बंद नहीं होना चाहिए। घर पर कोई न कोई जरूर होना चाहिए जो उनकी पूजा जरूर करें। 6. अगर आप शिव जी को अपने घर में याघर के किसी मंदिर में स्थापित कर रहें है तो साफ सफाई को विशेष ध्यान रहें क्योकि शिव जी को साफ सफाई बहुत पसंद है। 7. शिवलिंग पर कभी तुलसी अपर्ण नहीं करनी चाहिए। तुलसी मां के साथ भगवान शालिग्राम की स्थापना होती है। 8. शिवलिंग की स्थापना कोशिश करें कि घर में स्थापित करने से बचें। इसकी जगह आप शिवजी की तस्वीर घर में रखें।

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मंगलनाथ में भात पूजा- ONLINE PUJA

जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं। मांगलिक कुंडली वालों को विवाह के पूर्व मंगलनाथ में भात पूजा करने की सलाह दी जाती है। भात पूजा : भात अर्थात चावल। चावल से शिवलिंगरूपी मंगलदेव की पूजा की जाती है। जो मांगलिक हैं उन्हें विवाह पूर्व भात पूजा अवश्य करना चाहिए।  मंगलदेव की उत्पत्ति धरती माता से हुई थी। मंगलदेव का जन्म मध्यप्रदेश के अवंतिका अर्थात उज्जैन में हुआ था। जहां उनका जन्म हुआ था उसे मंगलनाथ स्थान कहते हैं। इस स्थान पर विश्व का एकमात्र मंगल ग्रह का मंदिर है। कहते हैं कि इस स्थान नर ही मंगल ग्रह की सीधी किरने धरती पर आती है। आप हमारे उच्च कोटि के विद्वान् ब्राम्हणो के द्वारा पूजा का आयोजन ऑनलाइन व् ऑफलाइन के माध्यम से करवा सकते हैं मंगल भात पूजा किसके द्वारा करवाई जानी चाहिए ?मंगल भात पूजा पूरी तरह से आपके जीवन से जुडी हुयी है इसलिए इस पूजा को विशिस्ट, सात्विक और विद्वान ब्राह्मण द्वारा गंभीरता पूर्वक करवानी चाहिए, पंडित श्री रमाकांत चौबे जी को इस पूजा का महत्त्व और विधि भली भांति से ज्ञात है और अभी तक इनके द्वारा की गयी पूजा गयी पूजा भगवान शिव की कृपा से सदैव सफल हुयी है। मंगल भात पूजा क्यों करवानी चाहिएकुछ व्यक्ति ऐसे होते है जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है उसी को ज्योतिष की भाषा में मंगल दोष कहते है, मंगल दोष कुंडली के किसी भी घर में स्थित अशुभ मंगल के द्वारा बनाए जाने वाले दोष को कहते हैं, जो कुंडली में अपनी स्थिति और बल के चलते जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं उत्पन्न कर सकता है, तो वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंगलनाथ मंदिर में पूजा-पाठ अवश्य करवाए, जैसा की उज्जैन को पुराणों में मंगल की जननी कहा जाता है इस लिए मंगल दोष को निवारण के लिए मंगल भात पूजा को उज्जैन में ही करवाने से अभीस्ट पुण्य एवं फल प्राप्त होता है. मंगल भात पूजा किसको करवानी चाहिए ?वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी जातक के जन्म चक्र के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें घर में मंगल हो तो ऐसी स्थिति में पैदा हुआ जातक मांगलिक कहा जाता है अथवा इसी को मंगल दोष भी कहते है. यह स्थिति विवाह के लिए अत्यंत अशुभ मानी जाती है, ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि में एक मांगलिक को दूसरे मांगलिक से ही विवाह करना चाहिए. अर्थात यदि वर और वधु दोनों ही मांगलिक होते है तो दोनों के मंगल दोष एक दूसरे से के योग से समाप्त हो जाते है. किन्तु अगर ऐसा किसी कारण से ज्ञात नहीं हो पाता है, और किसी एक की कुंडली में मंगल दोष हो तो मंगल भात पूजा अवस्य करवा लेनी चाहिए. मंगल दोष एक ऐसी विचित्र स्थिति है, जो जिस किसी भी जातक की कुंडली में बन जाये तो उसे बड़ी ही अजीबोगरीब परिस्थिति का सामना करना पड़ता है जैसे संबंधो में तनाव व बिखराव, घर में कोई अनहोनी व अप्रिय घटना, कार्य में बेवजह बाधा और असुविधा तथा किसी भी प्रकार की क्षति और दंपत्ति की असामायिक मृत्यु का कारण मांगलिक दोष को माना जाता है. मूल रूप से मंगल की प्रकृति के अनुसार ऐसा ग्रह योग हानिकारक प्रभाव दिखाता है, आपको वैदिक पूजा-प्रक्रिया के द्वारा इसकी भीषणता को नियंत्रित करने के लिए उज्जैन के मंगलनाथ मंदिर में यह पूजा करवानी चाहिए। क्या मिलते हैं लाभ : 1. मंगलदोष निवारण के लिए विवाह पूर्व भात पूजा के अलावा पीपल विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह आदि के उपाय भी बताए जाते हैं। इन उपायों से वैधव्य योग समाप्त हो जाता है।  2. मंगल यंत्र पूजन का भी एक उपाय है परंतु यह विशेष परिस्थिति में किया जाता है। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि के समय ही मंगल यंत्र पूजन का विधान है। भात पूजा के समय भी यह कार्य किया जा सकता है। इससे दाम्पत्य जीवन में सुख की प्राप्ति होती है और संतान सुख मिलता है। 3. गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हो तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है। भात पूजा करने से सभी का दोष निवारण हो जाता है। GET IN TOUCH 9129388891

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कालसर्प दोष निवारण पूजा

कालसर्प दोष निवारण पूजा – ONLINE KARMASU

व्यक्ति के कर्म या उसके द्वारा किए गए कुछ पिछले कर्मों के परिणामस्वरूप कालसर्प योग दोष कुंडली में होना माना जाता है। इसके अलावा, यदि व्यक्ति ने अपने वर्तमान या पिछले जीवन में सांप को नुकसान पहुंचाया हो तो भी काल सर्प योग दोष की निर्मिति होती है। हमारे मृत पूर्वजों की आत्माए नाराज होने से भी यह दोष कुंडली में पाया जाता है। संस्कृत में काल सर्प दोष द्वारा कई सारे निहितार्थ सुझाए गए है। यह अक्सर कहा जाता है कि अगर काल सर्प दोष निवारण पूजा नहीं की गयी तो, संबंधित व्यक्ति के कार्य को प्रभावित करेगा और सबसे कठिन बना देगा। शिप्रा किनारे नृसिंह घाट पर बना विश्व का एकमात्र पारदेश्वर मंदिर अपने आपमें अनूठा है। महाकाल और हरसिद्धि मंदिर के समीप बने इस मंदिर में ढाई टन वजनी पारद शिवलिंग स्थापित है, जिसके दर्शन मात्र से ही समस्त पाप नष्ट होते हैं यहाँ आप हमारे विद्वान पंडितों के द्वारा घर बैठे अपने नाम गोत्र के साथ या आप यहाँ स्वयं जाकर हमारे माध्यम से कालसर्प दोष निवारण पूजा करवा सकते हैं कालसर्प दोष कुंडली में होने के लक्षण: यदि किसी व्यक्ति को पता नहीं की वे यह दोष से पीड़ित है या नहीं, या वो अनिश्चित है, तो निचे दिए गए कई लक्षण से कुंडली में स्थित काल सर्प योग के बारे में पता चल सकता है: यह भी कहा जाता है कि, कुछ लोगों को एयरोफोबिया ( अँधेरे से डर) भी होता है। किसी की भी कुंडली में इस प्रकार के योग को ठीक करने के लिए, विशेषज्ञ या पंडितजी से काल सर्प योग शांति पूजा करना आवश्यक है। GET IN TOUCH 9129388891

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