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Bhai Dooj 2023 Date: भाई दूज 2023 में कब? 14 या 15 नंवबर जानें भाई दूज ही सही डेट

Bhai Dooj 2023 Date: भाई दूज का पर्व भाई बहन के पवित्र रिश्ते है प्रतीक है. कार्तिक मास में मनाया जाने वाला ये पर्व दिवाली के दूसरे दिन आता है. आइये जानते हैं साल 2023 में किस दिन पड़ेगा भाई दूज. Bhai Dooj 2023 Date: भाई दूज का पर्व कार्तिक मास में दिवाली के बाद मनाया जाता है. कार्तिक मास में हिंदू धर्म में बहुत से त्योहार पड़ते हैं.करवाचौथ, धनतेरस, दिवाली, छठ पूजा आदि. इसी मास में भाई दूज का पर्व भी पड़ता है. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की  द्वितीया तिथि को मनाया जाता है. भाई दूज को यम द्वितीया भी कहा जाता है. साल 2023 में किस दिन मनाई जाएगा भाई दूज का पर्व आइये जानते हैं. भाई दूज भाई बहन का पवित्र त्योहार है. इस दिन बहने अपने भाईयों को टीका करती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती है. साल 2023 में भाई दूज 15 नंवबर के दिन मनाया जाएगा. Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त भाई दूज की सही डेट (When is Bhai Dooj in 2023?) इस लिहाज से आप दोनों ही दिन भाई दूज का पर्व मना सकते हैं. 14 नंवबर को दोपहर के बाद से आप टीका कर सकते हैं. ये पर्व भाई- बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है. इस दिन भाई अपने बहन के पास जाकर टीका करवाते हैं. 15 नवंबर 2023 को क्यों मनाई जाएगी भाई दूज?हिंदू धर्म में कोई भी त्योहार उदया तिथि पर ही मनाया जाता है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार भाई दूज का पर्व 15 नवंबर 2023 को मनाया जाएगा। इस दिन भाई को टीका करने के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 10 बजकर 45 मिनट से दोपहर 12 बजकर 05 मिनट तक है। तिलक करने की विधिपौराणिक मान्यता है कि इस दिन यम अपनी बहन यमुना के घर भोजन करने गए थे। ऐसे में भाईयों को अपनी बहन के ससुराल जाना चाहिए। वहीं कुंवारी लड़कियां घर पर ही भाई का तिलक करें। भाई दूज के दिन सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करते हुए पूजा अवश्य करनी चाहिए। वहीं भाई का तिलक करने के लिए पहले थाली तैयार करें उसमें रोली, अक्षत और गोला रखें तत्पश्चात भाई का तिलक करें और गोला भाई को दें। फिर प्रेमपूर्वक भाई को मनपसंद का भोजन करवाएं। उसके बाद भाई अपनी बहन से आशीर्वाद लें और उन्हें भेंट स्वरूप कुछ उपहार जरूर दें। भाई दूज का महत्व हिंदू धर्म में भाई दूज के पर्व को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि ये पर्व भाइयों और बहनों के बीच के प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। भाई दूज पर बहनें अपने भाई के माथे पर हल्दी और रोली का तिलक लगाती हैं। ऐसी मान्यता है कि यदि भाई बहन यमुना नदी के किनारे बैठकर भोजन करते हैं तो जीवन में समृद्धि आती है। कैसे करें भाई दूज पर पूजा ? (Kaise Karen Bhai Dooj Par Pooja)भाई दूज पर बहने अपने भाईयों को टीका लगाती है. टीका लगाने के बाद भाई की आरती उतारती हैं. ऐसा माना जाता है कि कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर यमुना जी ने यमराज को अपने घर पर टीका किया और भोजन कराया था और इसी पूजा के बाद यमराज को सुख की प्राप्ति हुई. तभी से भाई दूज मनाने की परंपरा चली आ रही है. इसीलिए इस दिन को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है.

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Dhanteras 2023: 10 या 11 नवंबर को, कब है धनतेरस? नोट कर लें सही डेट, पूजाविधि और खरीदारी का शुभ मुहूर्त

Dhanteras Kab Hai 2023: हिन्दू धर्म दिवाली या दीपावली खुशियों का त्योहार हर साल की तरह इस साल 2023 में बड़े धूमधाम से मनाया जाएगा. दिवाली दीपों का त्योहार हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है. हर लोग इस दिन का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करते हैं. हर साल दिवाली के मौके पर दीपोत्सव का यह पर्व पूरे पांच दिनों तक मनाया जाता है. जिसकी शुरुआत धनतेरस से होती है. धनतेरस का पर्व छोटी दिवाली से एक दिन पहले मनाया जाता है. पंचांग के मुताबिक, धनतेरस का पर्व कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है. इस दिन धन्वंतरि देव, लक्ष्मी जी और कुबेर महाराज की पूजा-अर्चना की जाती है. साथ ही किसी भी वस्तु की खरीदारी के लिए यह दिन उत्तम माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि हर साल दिवाली के पर धनतेरस के दिन खरीदी गई चल-अचल संपत्ति में तेरह गुना बढ़ोतरी होती है. इसी वजह से लोग इस दिन बर्तनों की खरीदारी के अलावा सोने-चांदी की चीजें भी खरीदते हैं. ऐसे में चलिए जानते हैं इस साल धनतेरस कब है. पूजा की सही तिथि और शुभ मुहूर्त क्या है… Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त Dhanteras 2023:कब है धनतेरस? धनतेरस का पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनया जाता है. इस साल (Dhanteras 2023 )धनतेरस की तिथि 10 नवंबर को दोपहर 12:35 बजे से शुरू होगी और अगले दिन 11 नवंबर को दोपहर 01:57 बजे समाप्त होगी. बता दें कि धनतेरस के दिन प्रदोष काल में पूजा होती है, इसलिए धनतेरस 10 नवंबर को ही मनाई जाएगी. शुभ मुहूर्त की बात करें तो इस दिन धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 06:02 बजे से रात 08:00 बजे तक रहेगा. यानी पूजा के लिए आपके पास करीब 01 घंटा 58 मिनट तक का समय रहेगा. Dhanteras 2023 धनतेरस का शुभ मुहूर्त: हर साल कार्तिक माह कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, इस साल 10 नवंबर 2023 को दोपहर 12 बजकर 35 मिनच से धनतेरस की शुरुआत होगी और 11 नवंबर 2023 को दोपहर 1 बजकर 57 मिनट पर इसका समापन होगा। इसलिए उदया तिथि के अनुसार, इस बार 10 नवंबर को ही धनतेरस मनाया जाएगा। धनतेरस की खरीदारी का शुभ मुहूर्त: धनतेरस के दिन दोपहर 2 बजकर 35 मिनट से लेकर 11 नवंबर 2023 को सुबह 6 बजकर 40 मिनट तक खरीदारी का शुभ मुहूर्त बन रहा है। धनतेरस के मौके पर सोना-चांदी और बर्तन की खरीदारी बेहद शुभ माना जाता है। Dhanteras 2023 पूजा का शुभ मुहूर्त: पंचांग के अनुसार, धनतेरस में पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 45 मिनट से शुरू होकर 7 बजकर 42 मिनट पर समाप्त होगा। इस शुभ मुहूर्त में, लक्ष्मी, गणेश, कुबेर देवता और धन्वंतरि देव की पूजा-अराधना का बड़ा महत्व होता है। धनतेरस की पूजाविधि: धनतेरस के दिन पूजा के शुभ मुहूर्त में उत्तर दिशा में गणेश-लक्ष्मी, कुबेर देवता और धन्वंतरि देव की प्रतिमा स्थापित करें। अब मंदिर में दीपक जलाएं और विधिवत सभी देवी-देवताओं की पूजा करें। उन्हें धूप, दीप, फल, फूल, अक्षत, चंदन,इत्र, मिठाई समेत सभी पूजा सामग्री अर्पित करें। इसके बाद कुबरे देवता के मंत्र ऊँ ह्रीं कुबेराय नमः का जाप करें। धन्वंतरि स्तोत्र का पाठ करें। इसके साथ ही माता लक्ष्मी की मंत्रों का जाप करें और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए सभी देवी-देवताओं का ध्यान करें।

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Valmiki Jayanti 2023: कब है वाल्मिकी जयंती? नोट करें डेट और जानें इसका पौराणिक महत्व

Valmiki Jayanti 2023: सनातन धर्म में महर्षि वाल्मीकी को पहला कवि माना जाता है और उन्होंने ही हिंदूओं के महाकाव्य रामायण की रचना की थी. Valmiki Jayanti 2023: दुनिया की विभिन्न भाषाओं में जो उच्च कोटि के महाकाव्य हैं उनमें महर्षि वाल्मीकी द्वारा रचित रामायण का विशेष स्थान है. हिंदू धर्म में रामायण एक ऐसा ग्रंथ है जो कि लगभग हर घर में मिलेगा और इसका पूजन किया जाता है. कहते हैं कि रामायण का पाठ करने से व्यक्ति को पॉजिटिविटी मिलती है और जीवन में आ रही परेशानियों से बाहर आने में ​मदद मिलती है. इस ग्रंथ की रचना महर्षि वाल्मीकी ने की थी और इसलिए हिंदू धर्म में वाल्मीकी जयंती का खास महत्व माना गया है. इस जयंती को वाल्मीकी समाज सहित सभी वर्गों के लोग बड़ी धूमधाम से मनाते हैं. आइए जानते हैं इस साल कब है वाल्मीकी जयंती? वाल्मीकी जयंती 2023 कब है? हर साल आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि के दिन वाल्मीकी जयंती मनाई जाती है और इसी दिन शरद पूर्णिमा भी होती है. पंचांग के अनुसार इस साल आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि 28 अक्टूबर को सुबह 4 बजकर 17 पर शुरू होगी और 29 अक्टूबर को देर रात 1 बजकर 53 पर समाप्त होगी. उदयातिथि के अनुसार इस साल 28 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा के दिन वाल्मीकी जयंती मनाई जाएगी. थिरुवनमियूर में है महर्षि वाल्मीकि का मंदिर चेन्नई के थिरुवनमियूर में महर्षि वाल्मीकि मंदिर 1300 साल से भी ज्यादा पुराना एक मंदिर है। इसे मारकंडेश्वर मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर का निर्माण चोल शासनकाल के दौरान किया गया था। धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव की पूजा करने के लिए ऋषि वाल्मीकि मारकंडेश्वर मंदिर में पूजा की थी। बाद में इस जगह का नाम थिरुवाल्मिकियूर रखा गया, जो अब थिरुवनमियूर में बदल गया है। वाल्मीकी जयंती का महत्व महर्षि वाल्मीकी ने हिंदुओं को सबसे बड़े महाकाव्य रामायण की रचना की थी जो कि हर घर में रखा जाता है. वाल्मीकी जयंती के पर्व को बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है. इस दिन कई सामाजिक व धार्मिक आयो​जन किए जाते हैं. महर्षि वाल्मीकी के जन्म को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं. प्रचलित मान्यता के अनुसार वाल्मी​कि का जन्म महर्षि कश्यप और देवी अदिति के 9वें पुत्र और उनकी पत्नी चर्षिणी से हुआ था. कहा जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने ही दुनिया में सबसे पहले श्लोक ​की रचना की थी. वाल्मीकि जी को एक लेकर एक प्रचलित कहानी ये भी है ​कि जब भगवान राम ने माता सीता का त्याग किया था तो माता सीता ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ही निवास किया था. इसी आश्रम में ही उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया था. इसलिए लोगों के बीच वाल्मीकि जयंती का विशेष महत्व है. मान्यता है कि म​हर्षि वाल्मीकि के पास इतनी मजबूत ध्यान शक्ति थी कि वे एक बार ध्यान में लीन हो गए थे और उनके शरीर के ऊपर दीमन में घर बना लिया था और फिर भी उनका ध्यान भंग नहीं हुआ. महर्षि वाल्मीकि से जुड़ा इतिहास म​हर्षि वाल्मीकि को लेकर इतिहास में कई कहानियां प्रचलित हैं और पौराणिक कथाओं के अनुसार वाल्मीकि का नाम रत्नाकर था और वे एक डाकू थे. लेकिन बाद में जब उन्हें इस बात का ज्ञान हुआ कि वे गलत रास्ते पर हैं तब उन्होंने इस रास्ते को छोड़ धर्म का मार्ग अपनाया था. उन्हें देवर्षि नारद ने राम नाम का जप करने की सलाह दी थी. जिसके बाद वाल्मीकि जी राम नाम में लीन होकर एक तपस्वी बन गए. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ही ब्रह्मा जी ने उन्हें ज्ञान का भंडार दिया और फिर उन्होंने रामायण लिखी.

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Karwa Chauth 2023 Date: इस दिन सुहागिन महिलाएं रखेंगी करवा चौथ का व्रत, जानें सही डेट, मुहूर्त और महत्व

Karwa Chauth 2023: हिंदू धर्म में करवा चौथ व्रत का विशेष महत्व है। इस व्रत को रखने से पति की आयु लंबी होती है। तो आइए जानते हैं इस बार विवाहित महिलाएं कब करवा चौथ का व्रत रखेंगी। सुहागिनों के सबसे बड़े पर्व में से एक करवा चौथ इस साल 1 नवंबर को मनाई जाएगी। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं दिनभर बिना अन्न और जल के उपवास रखती हैं और फिर रात में चांद को देखने के बाद ही अपना व्रत खोलती हैं। इस व्रत में चांद और करवा माता के साथ शिव परिवार की पूजा की जाती है। कहते हैं कि करवा चौथ व्रत को रखने से न केवल पति दीर्घायु होते हैं बल्कि दांपत्य जीवन में भी खुशहाली और मिठास बनी रहती है। करवा चौथ व्रत कथा: पतिव्रता करवा धोबिन की कथा! (Karwa Chauth Vrat Katha) करवा चौथ व्रत 2023 पूजा शुभ मुहूर्त कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आरंभ-  31 अक्टूबर को रात 9 बजकर 30 मिनट से  कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि समाप्त- 1 नवंबर 2023 को रात 9 बजकर 19 तक  करवा चौथ व्रत तिथि-  1 नवंबर 2023 करवा चौथ व्रत पूजा मुहूर्त- 1 नवंबर को शाम 5 बजकर 44 मिनट से 7 बजकर 02 मिनट तक करवा चौथ 2023 चंद्रोदय का समय- 1 नवंबर 2023 को  8 बजकर 26 मिनट पर करवा चौथ व्रत का महत्व करवा चौथ से जुड़ी मान्यताओं के मुताबिक, इस व्रत को रखने से महिलाओं को अखंड सौभाग्यवती का आशीर्वाद मिलता है। करवा चौथ के दिन उपवास रखने और विधि विधान से साथ पूजा करने से वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है। साथ ही पति-पत्नी का रिश्ता और अधिक अटूट हो जाता है।  करवा चौथ का व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है। व्रत रखने वाली महिलाएं रात में चांद को अर्घ्य देकर अपने पति के हाथ से पानी पीकर ही अपना व्रत खोलती हैं। 

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Karwa Chauth 2023: करवा चौथ कब है? सर्वार्थ सिद्धि योग में होगी चंद्रमा की पूजा, जानें मुहूर्त, अर्घ्य समय और पारण

Karwa Chauth 2023 date: हिंदू कैलेंडर के अनुसार, करवा चौथ का व्रत हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है. उस दिन कार्तिक संकष्टी चतुर्थी होती है, जिसे वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी कहते हैं. करवा चौथ के दिन सुहागन महिलाएं और विवाह योग्य युवतियां अपने जीवनसाथी की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. इस व्रत में चंद्रमा की पूजा करना और अर्घ्य देना जरूरी है. इसके बिना करवा चौथ का व्रत पूरा नहीं होता है. करवा चौथ 2023 कब है?वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 31 अक्टूबर दिन मंगलवार को रात 09 बजकर 30 मिनट से प्रारंभ हो रही है. य​ह तिथि 01 नवंबर बुधवार को रात 09 बजकर 19 मिनट पर खत्म होगी. उदयातिथि और चतुर्थी के चंद्रोदय के आधार पर करवा चौथ व्रत 1 नवंबर बुधवार को रखा जाएगा. इस दिन व्रती को 13 घंटे 42 मिनट तक निर्जला व्रत रखना होगा. व्रत सुबह 06 बजकर 33 मिनट से रात 08 बजकर 15 मिनट तक होगा. करवा चौथ व्रत कथा | Karwa Chauth Vrat Katha In Hindi करवा चौथ 2023 का पूजा मुहूर्त क्या है?जो महिलाएं 01 नवंबर बुधवार को करवा चौथ का व्रत रखेंगी, उनको शाम में पूजा के लिए 1 घंटा 18 मिनट का शुभ समय प्राप्त होगा. करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 05 बजकर 36 मिनट से शाम 06 बजकर 54 मिनट तक है. करवा चौथ 2023 पर चंद्रमा पूजन और अर्घ्य का समय क्या है?करवा चौथ के दिन चंद्रोदय रात 08 बजकर 15 मिनट पर होगा. इस समय से आप चंद्रमा पूजन के साथ अर्घ्य दे सकते हैं. चंद्रमा को अर्घ्य देने पर व्रत पूरा होता है. करवा चौथ 2023 पारण समयकरवा चौथ व्रत का पारण चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद किया जाता है. पति के हाथों जल ​पीकर व्रत को पूरा करते हैं. 1 नवंबर को रात 08:15 बजे के बाद आप कभी भी पारण कर सकती हैं. तीन योग में है करवा चौथ 2023इस साल करवा चौथ पर 3 योग बन रहे हैं. इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 06:33 बजे से प्रारंभ हो रहा है, जो अगले दिन प्रात: 04:36 बजे तक रहेगा. सर्वार्थ सिद्धि को शुभ योग माना जाता हैं. इसमें किए गए कार्य सफल सिद्ध होते हैं. उस दिन प्रात:काल से दोपहर 02 बजकर 07 मिनट तक परिघ योग है, उसके बाद से ​शिव योग प्रारंभ होगा, जो अगले दिन तक रहेगा. करवा चौथ के दिन मृगशिरा नक्षत्र सुबह से लेकर अगले दिन 2 नंवबर को सुबह 04:36 बजे तक है.

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दशहरे पर पहले क्या करना चाहिए? दुर्गा विसर्जन या फिर भगवान राम की पूजा

दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है जो हर साल अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। यह त्योहार असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है। दशहरा के दो मुख्य धार्मिक कथाएं हैं। एक कथा के अनुसार, भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था, जो एक राक्षस राजा था जो लंका पर शासन करता था। दूसरी कथा के अनुसार, देवी दुर्गा ने इसी दिन महिषासुर, एक राक्षस को मार डाला था जो देवताओं और मनुष्यों पर अत्याचार कर रहा था। दुर्गा विसर्जन का शुभ मुहूर्त : 24 अक्टूबर 2023, मंगलवार को प्रात:काल 06:27 से 08:42 बजे के बीच दशहरे का विजय मुहूर्त : दोपहर 01:58 से 02:43 बजे के बीच दशहरा को मनाने के कई तरीके हैं। कुछ लोग देवी दुर्गा या भगवान राम की पूजा करते हैं। अन्य लोग रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों को जलाते हैं। दशहरा के दिन कई जगहों पर भव्य मेलों और समारोहों का आयोजन किया जाता है। दशहरा भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में भी मनाया जाता है। 2023 में, दशहरा 24 अक्टूबर को मनाया जाएगा। दशहरा के कुछ प्रमुख अनुष्ठान और समारोह इस प्रकार हैं: दशहरा एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है जो बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है। यह एक ऐसा दिन है जब लोग अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने और अच्छे के लिए काम करने का संकल्प लेते हैं।

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Dussehra 2023: इस साल दशहरा कब है? रावण दहन और शस्त्र पूजा का मुहूर्त क्या है? जान लें इसका महत्व

2023 mein kab hai dussehra: दशहरा का त्योहार हर साल शारदीय नवरात्रि की दशमी​ ति​थि यानि आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है. दशहरा को विजयादशमी भी कहते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम ने रावण का वध किया था, उसके उपलक्ष्य में दशहरा मनाते हैं. हर साल इस दिन रावण और कुंभकर्ण के पुतले का दहन होता है. वहीं मां दुर्गा ने महिषासुर का वध नवरात्रि की दशमी​ ति​थि को किया था, इ​सलिए हर साल इस तिथि को विजयादशमी का उत्सव मनाते हैं. दशहरा के दिन शस्त्र पूजा भी करते हैं.  दशहरा 2023 तिथि आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 23 अक्टूबर के दिन शाम को 5:44 मिनट से शुरू होगी और 24 अक्टूबर को दोपहर 3:14 मिनट पर समाप्त होगी. उदयातिथि के अनुसार दशहरा 24 अक्टूबर 2023 को मनाया जाएगा. दशहरा 2023 शस्त्र पूजा का शुभ समय दशहरा के दिन शस्त्र पूजा विजय मुहूर्त में करने का विधान है. इस आधार पर 24 अक्टूबर को दशहरा पर शस्त्र पूजा का शुभ समय दोपहर 01 बजकर 58 मिनट से दोपहर 02 बजकर 43 मिनट तक है. इस दिन आपको शस्त्र पूजा के लिए 45 मिनट का समय मिलेगा. दशहरा 2023 रावण दहन का मुहूर्त हर साल दशहरा के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतलों का दहन किया जाता है. इस साल 24 अक्टूबर को दशहरा पर रावण दहन का मुहूर्त सूर्यास्त से लेकर ढाई घंटे तक होगा. रावण का दहन प्रदोष काल में करने का विधान है. प्रदोष काल सूर्यास्त से लेकर ढाई घंटे तक माना जाता है. दशहरा पर सूर्यास्त शाम 05:43 बजे होगा. 2 शुभ योग में है दशहरा 2023इस साल दशहरा पर रवि योग और वृद्धि योग बने हैं. रवि योग सुबह 06 बजकर 27 मिनट से दोपहर 03 बजकर 38 मिनट तक रहेगा. उसके बाद शाम 06 बजकर 38 मिनट से 25 अक्टूबर को सुबह 06 बजकर 28 मिनट तक रवि योग रहेगा. दशहरा पर वृद्धि योग दोपहर 03 बजकर 40 मिनट से प्रारंभ होगा और पूरी रात रहेगा. दशहरा पर दुर्गा विसर्जनशारदीय नवरात्रि के समय में पश्चिम बंगाल, बिहार समेत देश के कई हिस्सों में दुर्गा पूजा की धूम रहती है. लोग मां दुर्गा की मूर्तियां स्थापित करके पूजा करते हैं. दशहरा यानि विजयादशमी वाले दिन मां दुर्गा का विसर्जन किया जाता है. उस दिन मां दुर्गा पृथ्वी लोक से विदा होकर अपने ससुराल जाती हैं.

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Lalita Panchami 2023 Date: कब है ललिता पंचमी? जानें देवी ललिता की पूजा करने का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Lalita Panchami 2023 Kab hai: ललिता पंचमी का व्रत हर साल अश्विन माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पंचमी तिथि को रखा जाता है. इस दिन पूरे मन से व्रत रखने और पूजा करने से देवी ललिता अपने भक्तों को रोग दोष से मुक्त होने का आशीर्वाद देती हैं. शारदीय नवरात्र के पांचवे दिन जब माता स्कन्दमाता की पूजा अर्चना की जाती है तब माता सती के देवी ललिता स्वरूप की भी पूजा की जाती है. इस पर्व को देश के अलग अलग राज्यों में मनाया जाता है लेकिन इसे गुजरात और महाराष्ट्र में मनाने की परंपरा अधिक है. आइए जानते हैं ललिता पंचमी के दिन पूजा का मुहूर्त क्या होने वाला है और इसका महत्व क्या है.  Lalita Panchami 2023: शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन ललिता पंचमी मनाई जाती है। दस महाविद्याओं में से एक माता ललिता है। उन्हें देवी ललिता के अलावा राजराजेश्वरी, षोडशी, लीलावती, लीलामती, और महा त्रिपुर सुंदरी भी कहते हैं। दस महाविद्याओं में वह सबसे महत्वपूर्ण देवी है और मां पार्वती के तांत्रिक रूप में पूजी जाती है। यहां हम ललिता पंचमी 2023 की तिथि, समय, महत्व और अनुष्ठान के बारे में जानकारी दे रहे है Lalita Panchami 2023 Date | ललिता पंचमी 2023 तिथि हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष अश्विन महीने के दौरान शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इस साल यह गुरूवार, 19 अक्टूबर 2023 (Lalita Panchami 2023 Date) के दिन पड़ेगा। इस दिन भक्त देवी पार्वती के इस स्वरुप के सम्मान में उपवास करते हैं, जिसे “उपंग ललिता व्रत” भी कहा जाता है। Lalita Panchami 2023 Timings | ललिता पंचमी 2023 समय पंचमी तिथि प्रारंभ: 19 अक्टूबर को प्रातः 01:12 बजेपंचमी तिथि समापन : 20 अक्टूबर को रात्रि 12:32 बजे तक Significance of Lalita Panchami | ललिता पंचमी का महत्व • ‘कालिका पुराण’ सहित अनेक ग्रंथों में ललिता पंचमी के धार्मिक महत्व के बारे में बताया गया है। इन शास्त्रों में देवी ललिता की पूजा बहुत महत्वपूर्ण और विशेष बताया जाता है। • भारत के दक्षिणी हिस्से में क्षेत्र में देवी ललिता को देवी चंडी का ही स्वरुप माना जाता है। इस दिन भक्त श्रद्धापूर्वक देवी का पूजन पूजा करते हैं और उनके लिए दिनभर उपवास रखते है। मान्यता है कि, इस दिन देवी के दर्शन से जीवन के कष्टों और परेशानियों से छुटकारा पाया जा सकता है। • किंवदंतियों के अनुसार इस शुभ दिन पर देवी ललिता ने राक्षस भंडासुर का संहार करने के लिए धरती पर प्रकट हुई थीं। इसलिए ललिता पंचमी (Significance of Lalita Panchami) को देवी ललिता की ‘जयंती’ के रूप में मनाया जाता है। देवी ललिता देवी दुर्गा का अवतार हैं और ‘पंच महाभूतों’ (पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल और आकाश) से जुड़ी है। Benefits of Lalita Panchami Fast | ललिता पंचमी पर व्रत के लाभ ललिता पंचमी 2023 के दिन ‘उपंग ललिता व्रत’ रखना अत्याधिक फलदायक (Lalita Panchami Fast benefits) माना जाता है। मान्यता है कि विधि विधान से ललिता पंचमी का व्रत करने से देवी ललिता के साथ ही दसों महाविद्याओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। पुराणों के अनुसार यह व्रत भक्तों के जीवन में सुख, धन, समृद्धि और शांति को आकर्षित करता है। माता ललिता को सभी सुखों की दाता माना जाता है। इसलिए सभी इच्छाओं की पूर्ति के लिए ललिता पंचमी 2023 के अवसर पर उपंग ललिता व्रत अवश्य करना चाहिए। सच्चे मन से देवी की पूजा करने से जीवन में आने वाली सभी परेशानियों और दुःखों से छुटकारा मिलता है। ललिता पंचमी की पूजा विधि (Lalita Panchami Puja Vidhi) माता ललिता को समर्पित इस व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान सम्पन्न कर लेना चाहिए और फिर मंदिर जाकर ललिता पंचमी व्रत के लिए संकल्प करना चाहिए. सबसे पहले आपको भगवान श्री गणेश, भगवान शिव के साथ माता पार्वती की पूजा करनी चाहिए. इसके बाद माता अशोक सुन्दरी की पूजा करनी चाहिए. सुख-समृद्धि का आशीर्वाद पाने के लिए माता ललिता की प्रतिमा के आगे शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए और फिर माता ललिता सहस्रावली का पाठ करना चाहिए. पूजा के समय ध्यान रखना चाहिए कि मुख उत्तर की ओर न रहे.

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Bhai Dooj 2023 : भाई दूज 2023 में कब है, यहां देखें भैया दूज की तारीख और समय

इस वर्ष कार्तिक माह में दीपावली के बाद शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 14 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 36 मिनट से 15 नवंबर को 1 बजकर 47 मिनट तक है. उदया तिथि के अनुसार भाई दूज 14 नवंबर को मनाई जाएगी. हिंदू कैलेंडर में कार्तिक मास खास माना जाता है। इस मास में दिवाली, छठ पूजा जैसे त्योहार व पर्व आते हैं। इसी महीने में भाई दूज भी मनाया जाता है। भाई दूज को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इसका एक और नाम यम द्वितीया भी है। इसी दिन चित्रगुप्त पूजा भी होती है। यहां देखें भाई दूज 2023 में कब है, भाई दूज 2023 की डेट और कब है भाई दूज तथा तिलक का शुभ मुहूर्त इस वर्ष कार्तिक माह में दीपावली के बाद शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 14 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 36 मिनट से 15 नवंबर को 1 बजकर 47 मिनट तक है. उदया तिथि के अनुसार भाई दूज 14 नवंबर को मनाई जाएगी. कैसे मनाया जाता है भाई दूज  भाई दूज के दिन बहनें भाई को तिलक लगाती हैं. तिलक लगाते समय भाई का मुख उत्तर या उत्तर पश्चिम दिशा में होना चाहिए. इस दिन रोली की जगह अष्टगंध से भाई को तिलक करना चाहिए. बहनों को शाम को दक्षिण मुखी दीप जलाना चाहिए. इसे भाई के लिए शुभ माना जाता है. इस दिन कमल की पूजा और नदी स्नान विशेष रूप से यमुना स्नान का भी विधान है. बनाएं भाई दूज स्पेशल लड्‌डू भाई दूज के दिन प्यारे भाई का मुंह मीठा करने के लिए बाजार से मिठाई लाने के बजाए घर में भाई दूज स्पेशल लड्‌डू बनाएं. सामग्री- विधि Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा … Bhai Dooj कैसे मनाया जाता है इस दिन बहनें अपने भाइयों को पीढ़े पर बैठाकर उनको तिलक लगाती हैं और उनकी आरती करती हैं। फिर उनको उनकी पसंद का खाना बनाकर खिलाती हैं। भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक शुक्ल द्वितीया को ही यमुना जी ने यमराज को अपने घर पर सत्कारपूर्वक भोजन कराया था। इस पूजा व विधि से यमलोक के राज्य को सुख प्राप्ति हुई थी। मान्यता है कि तभी से इस त्योहार को मनाने की परंपरा चल रही है। Bhai Dooj Names in Hindi भाई दूज को यम द्वितीया, भाऊ बीज, भातृ द्वितीया, भाई द्वितीया और भातरु द्वितीया भी कहा जाता है। दिवाली के पांच दिन के पर्व भाई दूज पर आकर खत्म होते हैं। इसी दिन चित्रगुप्त भगवान की पूजा भी की जाती है।

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Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त

दिवाली का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। इस दिन भगवान राम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण 14 साल के वनवास के बाद आए थे। इस साल दिवाली के लिए आपको थोड़ा लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। आइए जानते हैं साल 2023 में कब है दिवाली का पर्व। दीपावली या दिवाली रोशनी का त्योहार है और साल के सबसे ज्यादा मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है। जैसा कि रामायण में बताया गया है, इस दिन है जब भगवान राम, देवी सीता और भगवान लक्ष्मण 14 साल वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। दिवाली का पर्व धनतेरस से शुरू होता है और भाई दूज तक रहता है। आइए जानते हैं इस साल कब है दिवाली का त्योहार। दिवाली का शुभ मुहूर्तपंचांग के अनुसार, दिवाली का त्योहार हर साल कार्तिक मास के 15वें दिन अमावस्या को मनाई जाएगी। इस साल दिवाली का पर्व देशभर में 12 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा का भी विशेष महत्व है। 12 नवंबर को अमावस्या तिथि का आरंभ 12 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 45 मिनट से प्रारंभ होगी और 13 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 57 मिनट पर समाप्त होगी। दिवाली 2023 लक्ष्मी पूजा मुहूर्त लक्ष्मी पूजा (प्रदोष काल समय) – शाम 05.39 – रात 07.35 (12 नवंबर 2023) वृषभ काल – शाम 05:39 – रात 07:35 लक्ष्मी पूजा (निशिता काल समय) – 12 नवंबर 2023, रात 11:39- 13 नवंबर 2023, प्रात: 12:32 सिंह लग्न – प्रात: 12:10 – प्रात: 02:27 (13 नवंबर 2023) जानें दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का महत्वदिवाली के दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है।। मान्यताओं के अनुसार, जब मुहूर्त में लक्ष्मी जी का पूजन किया जाता है तो लक्ष्मी जी वहां ठहर जाती हैं। इसलिए लक्ष्मी पूजा के लिए यह सबसे उत्तम समय माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जिस व्यक्ति के पास ज्ञान होता है इसके पास धन भी रहता है। इसलिए भगवान गणेश की पूजा की जाती है। साथ ही ऐसा कहा जाता है कि अमावस्या तिथि के दिन अगर माता लक्ष्मी किसी पर प्रसन्न हो जाती है तो उसे आरोग्य की प्राप्ति होती है। दिवाली 2023 पांच दिन का दीपोत्सव  दिवाली का त्योहार पांच दिन तक मनाया जाता है, इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है, दूसरे दिन नरक चतुर्दशी, तीसरे दिन दिवाली, चौथे दिन गोवर्धन पूजा और पांचवे दिन भाई दूज का त्योहार मनाया जाता है. हर दिन का अपना अलग महत्व है. पांच दिन तक घर-आंगन में दीप जलाए जाते हैं और खुशियां मनाई जाती है. दिवाली क्यों मनाई जाती है दिवाली का त्योहार अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक है. धर्म ग्रंथों के अनुसार दिवाली के दिन श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद और 14 साल का वनवास पूरा कर माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे. अयोध्या नरेश के श्रीराम के स्वागत के लिए इस दिन अयोध्या नगरी सहित पूरे भारत में दीप जलाए गए थे. इसी दिन से हर साल कार्तिक अमावस्या पर दिवाली मनाई जाने लगी. इस दिन घरों को रोशन कर मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है और सुख, समृद्धि, धन की कामना करते हैं.

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Vishwakarma Jayanti 2023 Date:  कब है विश्वकर्मा जयंती, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त

भगवान विश्वकर्मा को प्राचीन काल का सबसे पहला इंजीनियर कहा जाता है। उन्होंने भगवान शिव के त्रिशूल से लेकर कई और भी चीजों का निर्माण किया था। आइए जानते हैं इस साल कब है विश्वकर्मा जयंती और पूजा के लिए शुभ मुहूर्त कब से कब तक रहेगा। विश्वकर्मा की जयंती हर साल कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है।। भगवान विश्वकर्मा ने ही भगवान शिव की त्रिशूल, लंका महल, द्वारका और देवताओं के अस्त्र और शस्त्र का निर्माण किया था। आइए जानते हैं इस साल कब मनाई जाएगी भगवान विश्वकर्मा की जयंती। करवा चौथ व्रत कथा | Karwa Chauth Vrat Katha In Hindi कब मनाई जाएगी विश्वकर्मा जयंती विश्वकर्मा जयंती 17 सितंबर 2023 को मनाई जाएगी। इसी के साथ पूजा के लिए सुबह 7 बजकर 50 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 26 मिनट तक का शुभ मुहूर्त है। विश्वकर्मा पूजा महत्व ऋषियों-मुनियों ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ विश्वकर्मा जी की पूजा आराधना का प्रावधान है। विश्वकर्मा जी को ही प्राचीन काल का पहला इंजीनियर माना जाता है। इस दिन औद्योगिक क्षेत्रों से जुड़े उपकर औजार, की पूजा की करने से कार्य में कुशलता आती है। साथ ही आपके कारोबार में बढ़ोतरी होती है। इतना ही नहीं आपके घर में धन धान्य और सुख समृद्धि का आगमन होता है। विश्वकर्मा ने की थी पुष्पक विमान की रचना विश्वकर्मा पुराण के अनुसार, नारायण ने सर्वप्रथम ब्रह्माजी और फिर विश्वकर्मा जी की रचना की थी। ब्रह्माजी के दिशा निर्देश के अनुसार, ही उन्होंने पुष्पक विमान की रचना की थी। इन सबके अलावा भगवान विश्वकर्मा को वास्तु शास्त्र का ज्ञान, यंत्र का निर्माण, विमान विद्या आदि के बारे में भी कई जानकारी प्राप्त हैं। विश्वकर्मा पूजन विधि विश्वकर्मा जयंती के दिन प्रतिमा को विराजित करके पूजा की जाती है। जिस व्यक्ति के प्रतिष्ठान में पूजा होनी है, वह प्रात:काल स्नान आदि करने के बाद अपनी पत्नी के साथ पूजन करें। हाथ में फूल, चावल लेकर भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए घर और प्रतिष्ठान में फूल व चावल छिड़कने चाहिए। इसके बाद पूजन कराने वाले व्यक्ति को पत्नी के साथ यज्ञ में आहुति देनी चाहिए। पूजा करते समय दीप, धूप, पुष्प, गंध, सुपारी आदि का प्रयोग करना चाहिए। पूजन से अगले दिन प्रतिमा का विसर्जन करने का विधान है।  पूजन के मंत्र भगवान विश्वकर्मा की पूजा में ‘ॐ आधार शक्तपे नम: और ॐ कूमयि नम:’, ‘ॐ अनन्तम नम:’, ‘पृथिव्यै नम:’ मंत्र का जप करना चाहिए। जप के लिए रुद्राक्ष की माला होना चाहिए।  जप शुरू करने से पहले ग्यारह सौ, इक्कीस सौ, इक्यावन सौ या ग्यारह हजार जप का संकल्प लें। चूंकि इस दिन प्रतिष्ठान में छुट्टी रहती है तो आप किसी पुरोहित से भी जप संपन्न करा सकते हैं।

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2023 गणेश उत्सव के दस दिनों में लगाएं इन 10 चीजों का भोग, बप्पा पूरी करेंगे आपकी हर मनोकामना

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन सुख-समृद्धि के देवता भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था। इसी उपलक्ष्य में हर साल गणेश उत्सव मनाया जाता है। यह पर्व पूरे दस दिनों तक चलता है। गणेश उत्सव का यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तिथि के दिन तक चलता है। इस साल गणेश उत्सव की शुरुआत 19 सितंबर को हो रही है। वहीं इसका समापन 28 सितंबर 2023 को अनंत चतुर्थी वाले दिन होगा। गणेश उत्सव के इन 10 दिनों में गणपति बप्पा को 10 अलग-अलग चीजों का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इन दिनों भगवान गणेश को उनकी प्रिय चीजों का भोग लगाने से गणपति बप्पा अति प्रसन्न होते हैं। आइए जानते हैं गणेश उत्सव के दौरान बप्पा को कौन से भोग लगाने चाहिए….. गणेश चतुर्थी पर इस मुहूर्त में घर लाएं गणपति, जानिए गणपति स्थापना और पूजा विधि गणेश उत्सव पर गणपति बप्पा को  अर्पित करने योग्य चीजें पहला दिन उन्हें मोदक बहुत प्रिय है, इसलिए गणेश उत्सव के पहले दिन मोदक चढ़ाने से भी उन्हें अत्यंत प्रसन्नता होती है। दूसरा दिन  गणेश जी को मोतीचूर के लड्डू भी बहुत प्रिय हैं. ऐसे में गणेश उत्सव के दूसरे दिन भगवान गणेश को मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाना सर्वोत्तम होता है। तीसरा दिन  विघ्नहर्ता गणेश को बेसन के लड्डू भी पसंद हैं. इसलिए गणेश उत्सव के तीसरे दिन लड्डुओं का भोग लगाने की सलाह दी जाती है। दिन 4  भगवान गणेश को केले का भोग लगाना सर्वोत्तम प्रसादों में से एक है। इसलिए गणेश उत्सव के चौथे दिन प्रसाद में केले का फल जरूर शामिल करें। दिन 5  धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश जी को मखाने की खीर भी बहुत पसंद है. इसलिए पांचवें दिन बप्पा को प्रसाद के रूप में मखाना खीर का भोग अवश्य लगाएं। दिन 6  हिंदू धर्म में, नारियल का उपयोग अक्सर पूजा के दौरान किया जाता है और अधिकांश पूजा थालियों, यज्ञ, हवन आदि पर देखा जाता है। नारियल को प्रसाद के रूप में भी वितरित और खाया जाता है। ऐसे में छठे दिन बप्पा को नारियल का भोग लगा सकते हैं. दिन 7  पूजा के दौरान गुड़ का भोग लगाना भी बहुत शुभ माना जाता है. यह एक पारंपरिक प्रसाद है जो भगवान गणेश को बहुत प्रिय है। इसलिए सातवें दिन बप्पा को घी और गुड़ का भोग लगाना अच्छा विचार है। दिन 8 ऐसा कहा जाता है कि भगवान गणेश को मोदक और लड्डू बहुत पसंद हैं. इसलिए आठवें दिन मोतीचूर और बेसन का भोग लगाने के अलावा आप मावा के लड्डू का भी भोग लगा सकते हैं. दिन 9 दूध से बनी कलाकंद और खोपरपाक जैसी स्वादिष्ट मिठाइयाँ भी गौरी पुत्र गणेश को बहुत प्रिय हैं। ऐसे में नौवें दिन भगवान गणेश को दूध और घी से बनी मिठाई का भोग लगाना बहुत शुभ होता है। दिन 10 – हिंदू धर्म में 56 भोग का बहुत महत्व है. ऐसे में गणेशोत्सव के दसवें यानी आखिरी दिन बप्पा को 56 भोग लगाना चाहिए।

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