PUJA

Kalash Sthapna

Kalash Sthapna 2025: शुभ मुहूर्त और विधान जानें !

Kalash Sthapna, जिसे घटस्थापना भी कहा जाता है, नवरात्रि के नौ दिवसीय पर्व की शुरुआत का प्रतीक है। यह हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमें देवी दुर्गा की ऊर्जा का आह्वान किया जाता है और उनकी दिव्य कृपा प्राप्त की जाती है। यह पवित्र अनुष्ठान वैदिक परंपराओं और नियमों के अनुसार किया जाता है। यदि आप 2025 में कलश स्थापना की योजना बना रहे हैं, तो यहां इसका शुभ मुहूर्त, प्रक्रिया और महत्व की पूरी जानकारी दी गई है। कलश स्थापना का महत्व:Importance of establishing Kalash Kalash Sthapna एक पवित्र अनुष्ठान है जो घर या मंदिर में दिव्य ऊर्जा की स्थापना का प्रतीक है। यह कलश (पवित्र घड़ा) समृद्धि, पवित्रता और देवी की उपस्थिति का प्रतीक है। यह देवी दुर्गा की उपस्थिति को दर्शाता है और उनकी दिव्य शक्ति को आमंत्रित करता है। कलश सकारात्मक ऊर्जा को संचित करता है और वातावरण से नकारात्मकता को दूर करता है। यह नवरात्रि के दौरान भक्ति और पूजा का केंद्र बनता है। Method of Kalash Establishment (Step-by-Step Process):कलश स्थापना की विधि (स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया) Kalash Sthapna करते समय मन, हृदय और वातावरण की शुद्धता आवश्यक होती है। इस प्रक्रिया को ध्यानपूर्वक करें: 1. तैयारी और शुद्धिकरण 2. कलश का चयन और स्थापना 3. देवी का आह्वान (संकल्प और मंत्र) 4. आरती और प्रार्थना अर्पण करें 5. नवरात्रि के नौ दिनों तक पूजन What not to do during Kalash installation: कलश स्थापना के दौरान क्या न करें? निष्कर्ष Kalash Sthapna एक अत्यंत पवित्र और शुभ अनुष्ठान है, जो नवरात्रि की शुरुआत को दिव्यता और सकारात्मकता से भर देता है। सही विधि और शुभ मुहूर्त में इस अनुष्ठान को करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में समृद्धि, सुख और सुरक्षा मिलती है। कलश स्थापना 2025 के लिए पूरी तैयारी रखें और पूरी श्रद्धा से नवरात्रि मनाएं।

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Maa Chandraghanta

Maa Chandraghanta:मां चंद्रघंटा का मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

Maa Chandraghanta देवी पार्वती का विवाहित रूप हैं। भगवान शिव से विवाह के बाद देवी महागौरी ने अपने माथे को आधा चंद्र से सजाना शुरू किया और जिसके कारण देवी पार्वती को देवी चंद्रघंटा के नाम से जाना जाने लगा। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि शुक्र ग्रह देवी चंद्रघंटा द्वारा शासित है। देवी चंद्रघंटा बाघिन पर सवार हैं। वह अपने माथे पर अर्ध-गोलाकार चंद्रमा (चंद्र) पहनती है। उनके माथे पर अर्धचंद्र घंटी (घंटी) की तरह दिखता है और इसी वजह से उन्हें चंद्र-घण्टा के नाम से जाना जाता है। माँ को दस हाथों से चित्रित किया गया है। देवी चंद्रघंटा अपने चार बाएं हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार और कमंडल रखती हैं और पांचवें बाएं हाथ को वरद मुद्रा में रखती हैं। वह अपने चार दाहिने हाथों में कमल का फूल, तीर, धनुष और जप माला धारण करती है और पांचवें दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में रखती है। देवी पार्वती का यह रूप शांत और अपने भक्तों के कल्याण के लिए है। इस रूप में देवी चंद्रघंटा अपने सभी हथियारों के साथ युद्ध के लिए तैयार हैं। ऐसा माना जाता है कि उनके माथे पर चंद्र-घंटी की आवाज उनके भक्तों से सभी प्रकार की बुरी आत्माओं को दूर कर देती है। Maa Chandraghanta Mantra: मंत्र  ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥ Om Devi Chandraghantayai Namah॥ Maa Chandraghanta प्रार्थना  पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥ Pindaja Pravararudha Chandakopastrakairyuta।Prasadam Tanute Mahyam Chandraghanteti Vishruta॥ Maa Chandraghanta स्तुति  या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Maa Chandraghanta Rupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ Maa Chandraghanta ध्यान  वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥ Vande Vanchhitalabhaya Chandrardhakritashekharam।Simharudha Chandraghanta Yashasvinim॥Manipura Sthitam Tritiya Durga Trinetram।Khanga, Gada, Trishula, Chapashara, Padma Kamandalu Mala Varabhitakaram॥Patambara Paridhanam Mriduhasya Nanalankara Bhushitam।Manjira, Hara, Keyura, Kinkini, Ratnakundala Manditam॥Praphulla Vandana Bibadhara Kanta Kapolam Tugam Kucham।Kamaniyam Lavanyam Kshinakati Nitambanim॥ Maa Chandraghanta स्तोत्र  आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम्।धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम्।सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥ Apaduddharini Tvamhi Adya Shaktih Shubhparam।Animadi Siddhidatri Chandraghante Pranamamyaham॥Chandramukhi Ishta Datri Ishtam Mantra Swarupinim।Dhanadatri, Anandadatri Chandraghante Pranamamyaham॥Nanarupadharini Ichchhamayi Aishwaryadayinim।Saubhagyarogyadayini Chandraghante Pranamamyaham॥ Maa Chandraghanta कवच  रहस्यम् शृणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।श्री चन्द्रघण्टास्य कवचम् सर्वसिद्धिदायकम्॥बिना न्यासम् बिना विनियोगम् बिना शापोध्दा बिना होमम्।स्नानम् शौचादि नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिदाम॥कुशिष्याम् कुटिलाय वञ्चकाय निन्दकाय च।न दातव्यम् न दातव्यम् न दातव्यम् कदाचितम्॥ Rahasyam Shrinu Vakshyami Shaiveshi Kamalanane।Shri Chandraghantasya Kavacham Sarvasiddhidayakam॥Bina Nyasam Bina Viniyogam Bina Shapoddha Bina Homam।Snanam Shauchadi Nasti Shraddhamatrena Siddhidam॥Kushishyam Kutilaya Vanchakaya Nindakaya Cha।Na Datavyam Na Datavyam Na Datavyam Kadachitam॥ Maa Chandraghanta आरती  जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे काम॥चन्द्र समाज तू शीतल दाती। चन्द्र तेज किरणों में समाती॥मन की मालक मन भाती हो। चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो॥सुन्दर भाव को लाने वाली। हर संकट में बचाने वाली॥हर बुधवार को तुझे ध्याये। श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥मूर्ति चन्द्र आकार बनाए। शीश झुका कहे मन की बाता॥पूर्ण आस करो जगत दाता। कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥कर्नाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटू महारानी॥भक्त की रक्षा करो भवानी।

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Maa Chandraghanta

Navratri 3rd day Maa Chandraghanta puja vidhi aarti: नवरात्रि के तीसरे दिन होती है मां चंद्रघंटा की पूजा, नोट कर लें पूजन विधि और आरती

Maa Chandraghanta puja vidhi: चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है और इसका तीसरा दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप, मां चंद्रघंटा को समर्पित है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, मां चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और ममतामयी है, जो अपने भक्तों को सुख-समृद्धि और शांति प्रदान करता है। इस बार द्वितीया और तृतीया नवरात्रि व्रत एक ही दिन किए जाएंगे। Maa Chandraghanta: मां चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का एक अर्धचंद्र स्थित है, जिससे उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। यह नाम उनके दिव्य रूप को दर्शाता है, जिसमें एक अद्वितीय तेज और ममता समाहित है। उनका स्वरूप अत्यंत अलौकिक और भव्य माना जाता है। वे शांतिपूर्ण होने के साथ-साथ उनकी शक्ति भी अद्वितीय है, जो हर क्षेत्र में सफलता और समृद्धि प्रदान करती है। मां ने अपने भक्तों के दुखों को दूर करने के लिए हाथों में त्रिशूल, तलवार और गदा धारण कर रखे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता चंद्रघंटा को राक्षसों का वध करने वाली देवी भी कहा जाता है। पूजा का महत्व और लाभ नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की विशेष पूजा करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, जीवन में खुशहाली आती है और सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। पूजा के फलस्वरूप, लोग आपको अधिक सम्मान देने लगते हैं। मां चंद्रघंटा की पूजा से न केवल भौतिक सुख में वृद्धि होती है, बल्कि समाज में आपका प्रभाव भी बढ़ता है। उनकी आराधना से जीवन के सभी पहलुओं में सफलता प्राप्त होती है। Maa Chandraghanta puja vidhi: मां चंद्रघंटा की पूजा विधि मां चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए इन विधियों का पालन करें: 1. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें: सुबह जल्दी उठें और स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनें। 2. वस्त्र और फूल अर्पित करें: पूजा में मां को लाल और पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें। Maa Chandraghanta मां चंद्रघंटा को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए पूजा में पीले रंग के फूलों का प्रयोग करें। लाल और पीले गेंदे के फूल चढ़ाने का विशेष महत्व है, क्योंकि ये मां की ममता और शक्ति का प्रतीक हैं। 3. कुमकुम और अक्षत: इसके बाद मां को कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। 4. गंध, धूप, पुष्प: मां चंद्रघंटा को सिंदूर, अक्षत, गंध, धूप और पुष्प अर्पित करें। 5. भोग अर्पित करें: मां चंद्रघंटा Maa Chandraghanta को पीले रंग की मिठाई और दूध से बनी खीर का भोग अर्पित करें। खीर का भोग अर्पित करना सर्वोत्तम माना जाता है, और मां को विशेष रूप से केसर की खीर बहुत पसंद है। इसके अतिरिक्त, आप लौंग, इलायची, पंचमेवा और दूध से बनी मिठाइयां भी मां को भोग के रूप में अर्पित कर सकते हैं। भोग में मिसरी और पेड़े भी जरूर रखें। 6. मंत्र जाप करें: पूजा के दौरान मां के मंत्रों का जाप करें। मां की अराधना “ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः” का जप करके की जाती है। 7. दुर्गा सप्तशती और आरती: साथ ही दुर्गा सप्तशती और अंत में मां चंद्रघंटा की आरती का पाठ भी करें। नवरात्रि के हर दिन नियम से दुर्गा चालीसा और दुर्गा आरती करें। 8. सूर्योदय से पहले पूजा: विशेष रूप से, इस दिन सूर्योदय से पहले पूजा करनी चाहिए, क्योंकि इस समय मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इन सभी विधियों को विधिपूर्वक करने से मां चंद्रघंटा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। मां चंद्रघंटा का पूजा मंत्र: Maa Chandraghanta puja Mantra • पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।। • वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्। सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥ • मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्। रंग, गदा, त्रिशूल,चापचर,पदम् कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥ मां चंद्रघंटा की आरती:Maa Chandraghanta Arti जय मां चंद्रघंटा Maa Chandraghanta सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे सभी काम। चंद्र समान तुम शीतल दाती। चंद्र तेज किरणों में समाती। क्रोध को शांत करने वाली। मीठे बोल सिखाने वाली। मन की मालक मन भाती हो। चंद्र घंटा तुम वरदाती हो। सुंदर भाव को लाने वाली। हर संकट मे बचाने वाली। हर बुधवार जो तुझे ध्याये। श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं। मूर्ति चंद्र आकार बनाएं। सन्मुख घी की ज्योत जलाएं। शीश झुका कहे मन की बाता। पूर्ण आस करो जगदाता। कांची पुर स्थान तुम्हारा। करनाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटू महारानी। भक्त की रक्षा करो भवानी। इस प्रकार, चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा करके आप उनके आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि ला सकते हैं। Sindoor Tritiya 2025 Date And Time: सिंदूर तृतीया उत्सव 2025 तिथि, पूजा का समय, अनुष्ठान और महत्व

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Brahmacharini

Devi Brahmacharini Puja Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी की कैसे करें पूजा, पढ़ें मंत्र, विधि और प्रसाद

Devi Brahmacharini Puja Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार , संयम की वृद्धि होती है। जीवन की कठिन समय मे भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता है। देवी अपने साधकों की मलिनता, दुर्गणों व दोषों को खत्म करती है। देवी की कृपा से सर्वत्र सिद्धि तथा विजय की प्राप्ति होती है।  Maa Brahmacharini: मां ब्रह्मचारिणी  दूसरे नवरात्र में मां के Devi Brahmacharini ब्रह्मचारिणी एवं तपश्चारिणी रूप को पूजा जाता है। जो साधक मां के इस रूप की पूजा करते हैं उन्हें तप, त्याग, वैराग्य, संयम और सदाचार की प्राप्ति होती है और जीवन में वे जिस बात का संकल्प कर लेते हैं उसे पूरा करके ही रहते हैं।  क्या चढ़ाएं प्रसाद  मां भगवती को नवरात्र के दूसरे दिन चीनी का भोग लगाना चाहिए मां को शक्कर का भोग प्रिय है। ब्राह्मण को दान में भी चीनी ही देनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। इनकी उपासना करने से मनुष्य में तप, त्याग, सदाचार आदि की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। Devi Brahmacharini देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप ज्योर्तिमय है। ये मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से दूसरी शक्ति हैं। तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा इनके अन्य नाम हैं। इनकी पूजा करने से सभी काम पूरे होते हैं, Devi Brahmacharini Puja Vidhi रुकावटें दूर हो जाती हैं और विजय की प्राप्ति होती है। इसके अलावा हर तरह की परेशानियां भी खत्म होती हैं। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। Devi Brahmacharini Puja Vidh: ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा विधि देवी ब्रह्मचारिणी Devi Brahmacharini की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर Brahmacharini Puja Vidhi उनका ध्यान करें और  प्रार्थना करते हुए नीचे लिखा मंत्र बोलें। श्लोक दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु| देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा || ध्यान मंत्र वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्। जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥ गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम। धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥ परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन। पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ इसके बाद देवी को पंचामृत स्नान कराएं, फिर अलग-अलग तरह के फूल,अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें।  देवी को सफेद और सुगंधित फूल चढ़ाएं।  इसके अलावा कमल का फूल भी देवी मां को चढ़ाएं और इन मंत्रों से प्रार्थना करें। 1. या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। 2. दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।। इसके बाद देवी मां को प्रसाद चढ़ाएं और आचमन करवाएं। प्रसाद के बाद पान सुपारी भेंट करें और प्रदक्षिणा करें यानी 3 बार अपनी ही जगह खड़े होकर  घूमें। प्रदक्षिणा के बाद घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। इन सबके बाद क्षमा प्रार्थना करें और प्रसाद बांट दें। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। मां जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए। या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। अर्थ : हे मां! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं।

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Dream Interpretation

Krishna Janmashtami Puja Niyam: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की संपूर्ण पूजा विधि, सभी 16 चरणों के सरल वैदिक मंत्रों के साथ

Krishna Janmashtami Puja Vidhi Mantra In Hindi: कृष्ण जन्माष्टमी के दिन कई भक्त भगवान कृष्ण का षोडशोपचार पूजन करते हैं। ये पूजा सामान्य पूजा से थोड़ी बड़ी होती है। विशेषतौर पर वैष्णव संप्रदाय के लोग इस पूजा को करते हैं। यहां देखें जन्माष्टमी पूजा विधि एवं मंत्र। Krishna Janmashtami Puja Vidhi Mantra In Hindi: कृष्ण जन्माष्टमी का पावन त्योहार हिंदू धर्म के लोगों के लिए बेहद खास होता है। इस शुभ दिन पर लोग रात 12 बजे कृष्ण जी की विधि विधान पूजा करते हैं। इसके बाद उनकी आरती करके भोग लगाते हैं। यहां हम आपको जन्माष्टमी की षोडशोपचार पूजा के बारे में बताने जा रह हैं। जिसमें 16 चरण होते हैं और सभी चरणों में वैदिक मंत्रों होते हैं। यहां देखें कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि एवं मत्र। Krishna Janmashtami: ध्यानम् भगवान श्री कृष्ण का ध्यान पहले से अपने सम्मुख प्रतिष्ठित श्रीकृष्ण की नवीन प्रतिमा में करें। ॐ तमद्भुतं बालकम् अम्बुजेक्षणम्, चतुर्भुज शंख गदायुधायुदम् ।श्री वत्स लक्ष्मम् गल शोभि कौस्तुभं, पीतम्बरम् सान्द्र पयोद सौभगं ।।महार्ह वैदूर्य किरीटकुन्डल त्विशा परिष्वक्त सहस्रकुन्डलम् ।उद्धम कांचनगदा कङ्गणादिभिर् विरोचमानं वसुदेव ऐक्षत ।।ध्यायेत् चतुर्भुजं कृष्णं, शंख चक्र गदाधरम्।पीतम्बरधरं देवं माला कौस्तुभभूषितम् ।।ॐ श्री कृष्णाय नमः। ध्यानात् ध्यानम् समर्पयामि ।। आवाहनं भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करने के बाद नीचे लिखे मंत्र को पढ़ें और Krishna Janmashtami श्रीकृष्ण की प्रतिमा के सामने आवाहन मुद्रा दिखाकर, उनका आवाहन करें। ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।स भूमिं विश्वतो वृत्वा सुत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ।।आगच्छ देवदेवेश तेजोराशे जगत्पते ।क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुरसत्तमे ।।आवाहयामि देव त्वां वसुदेव कुलोद्भवम् ।प्रतिमायां सुवर्णादिनिर्मितायां यथाविधि ।।कृष्णम् च बलबनं च वसुदेवं च देवकीम् ।नन्दगोप यशोदाम् च सुभद्राम् तत्र पूजयेत् ।।आत्मा देवानां भुवनस्य गभों यथावशं चरति देवेषः ।घोषा इदस्य शण्विर न रूपं तस्मै वातायहविषा विधेम ।।श्री क्लीं कृष्णाय नमः, सपरिवार सहित, श्री बालकृष्णं आवाहयामि ।। आसनं भगवान श्री कृष्ण का आवाहन करने के बाद नीचे लिखे मंत्र को पढ़ कर उन्हें आसन के लिए पांच पुष्प अञ्जलि में लेकर अपने सामने छोड़ें। पुरुष एवेदगं सर्वम् यद्भुतं यच्छ भव्यम्।उतामृतत्वस्येशानः यदन्नेनातिरोहति ।।राजाधिराज राजेन्द्र बालकृष्ण महीपते।रत्न सिंहासनं तुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रभो।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। आसनं समर्पयामि।। पाद्य (चरण धोने के लिए जल) भगवान श्री कृष्ण को आसन प्रदान करने के बाद नीचे लिखे मंत्र को पढ़ते हुए पाद्य (चरण धोने के लिए जल) समर्पित करें। एतावानस्य महिमा अतो ज्यायागंश्च पूरुषः ।पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।अच्युतानन्द गोविन्द प्रणतार्ति विनाशन।पाहि मां पुन्डरीकाक्ष प्रसीद पुरुषोत्तम ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः । पादोयो पाचम् समर्पयामि।। अर्घ्य पाद्य समर्पण के बाद भगवान श्री कृष्ण को अर्घ्य (सिर के अभिषेक के लिए जल) समर्पित करें। त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवात्पुनः ।ततो विश्वङ्ग्यक्रामत् साशनानशने अभि ।।परिपूर्ण परानन्द नमो नमो कृष्णाय वेधसे।गृहाणार्ध्वम् मया दत्तम् कृष्णा विष्णोर्जनार्दन ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। अर्घ्यम् समर्पयामि ।। आचमनीयं (भगवान को जल अर्पित करें) निम्न लिखित मंत्र पढ़ते हुए आचमन के लिए Krishna Janmashtami श्रीकृष्ण को जल समर्पित करें। तस्माद्विराडजायत विराजो अधि पूरुषः।स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्ध‌मिमथो पुरः ।।नमः सत्याय शुद्धाय नित्याय ज्ञान रूपिणे ।गृहाणाचमनं कृष्ण सर्व लोकैक नायक ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। आचमनीयं समर्पयामि ।। पूजा के बाद भूल से भी न करें ये काम, वरना मिल सकते हैं विपरीत परिणाम स्नानं आचमन समर्पण के बाद ये मंत्र पढ़ते हुए Krishna Janmashtami श्रीकृष्ण को जल से स्नान कराएं। यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।वसन्तो अस्यासीदाज्यम् ग्रीष्म इध्मश्शरद्धविः ।।ब्रह्माण्डोदर मध्यस्थैस्तिथैश्च रघुनन्दन ।स्नापयिश्याम्यहं भक्त्या त्वं गृहाण जनार्दना ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। मलापकर्श स्नानं समर्पयामि ।। वस्त्र स्नान कराने के बाद ये मंत्र पढ़ते हुए Krishna Janmashtami श्रीकृष्ण को मौली के रूप में वस्त्र समर्पित करें। ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः ।तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये।।ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।प्रादुर्भुनोऽस्मि राष्ट्रस्मिन्कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ।।तप्त कान्चन संकाशं पीताम्बरम् इदं हरे।सगृहाण जगन्नाथ बालकृष्ण नमोस्तुते।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। वस्त्रयुग्मं समर्पयामि ।। यज्ञोपवीत (जनेऊ) वस्त्र समर्पण के बाद ये मंत्र पढ़ें और श्रीकृष्ण को यज्ञोपवीत समर्पित करें। तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम् ।पशुगॅस्तागंश्चक्रे वायव्यान् आरण्यान् ग्राम्याश्चये ।।क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मी नाशयाम्यहम्।अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णदमे गृहात् ।।श्री बालकृष्ण देवेश श्रीधरानन्त राघव ।ब्रह्मसुत्रम्चोत्तरीयं गृहाण यदुनन्दन ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः । यज्ञोपवीतम् समर्पयामि ।। गंध (सुगंधित द्रव्य, इत्र चंदन आदि) Krishna Janmashtami ये मंत्र पढ़ते हुए श्रीकृष्ण को सुगन्धित द्रव्य समर्पित करें। तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे।छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् यजुस्तस्मादजायत ।।गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ।।कुम्कुमागरु कस्तूरि कर्पूरं चन्दनं तता।तुभ्यं दास्यामि राजेन्द्र श्री कृष्णा स्वीकुरु प्रभो।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः । गन्धम् समर्पयामि ।। आभरणं हस्तभूषण निम्नलिखित मंत्र पढ़ते हुए Krishna Janmashtami श्रीकृष्ण के श्रृंगार के लिए आभूषण समर्पित करें। गृहाण नानाभरणानि कृष्णाय निर्मितानि ।ललाट केठोत्तम कर्ण हस्त नितम्ब हस्तांगुलि भूषणानि ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। आभरणानि समर्पयामि ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। हस्तभूषणं समर्पयामि । नाना परिमल द्रव्य निम्न लिखित मंत्र पढ़ते हुए श्रीकृष्ण को विविध प्रकार के सुगन्धित द्रव्य समर्पित करें। ॐ अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं जयाया हेतिं परिबाधमानः ।हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्पुमान्पुमांसं परि पातु विश्वतः ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। Krishna Janmashtami नाना परिमल द्रव्यं समर्पयामि ।। पुष्प निम्न लिखित मंत्र पढ़ते हुए श्रीकृष्ण को पुष्प, तुलसी माला समर्पित करें। माल्यादीनि सुगन्धीनि, माल्यतादीनि वैप्रभो।मया हितानि पूजार्थम्, पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम् ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः । पुष्पाणि समर्पयामि ।। अंग पूजा निम्न लिखित मंत्र पढ़ते हुए भगवन कृष्ण के अंग-देवताओं का पूजन करना चाहिए। इसके लिए बाएं हाथ में चावल, पुष्प और चंदन लेकर प्रत्येक मन्त्र का उच्चारण करते हुए दाहिने हाथ से श्री कृष्ण की मूर्ति के पास छोड़ें। ॐ श्री कृष्णाय नमः। पादी पूजयामि ।।ॐ राजीवलोचनाय नमः । गुल्फौ पूजयामि ।।ॐ नरकान्तकाय नमः। जानुनी पूजयामि ।।ॐ वाचस्पतये नमः। जंघै पूजयामि।।ॐ विश्वरूपाय नमः । ऊरून् पूजयामि ।।ॐ बलभद्रानुजाय नमः। गुहां पूजयामि।। ॐ विश्वमूर्तये नमः। जघनं पूजयामि।।ॐ गोपीजन प्रियाय नमः। कटिं पूजयामि ।।ॐ परमात्मने नमः। उदरं पूजयामि।।ॐ श्रीकण्टाय नमः। हृदयं पूजयामि।।ॐ यज्ञिने नमः। पार्थी पूजयामि।।ॐ त्रिविक्रमाय नमः । पृष्ठदेहं पूजयामि।।ॐ पद्मनाभाय नमः । स्कन्धौ पूजयामि।।ॐ सर्वास्त्रधारिणे नमः। बाहुन् पूजयामि।।ॐ कमलानाथाय नमः । हस्तान् पूजयामि।। ॐ वासुदेवाय नमः । कण्ठं पूजयामि ।।ॐ सनातनाय नमः । वदनं पूजयामि ।।ॐ वसुदेवात्मजाय नमः । नासिकां पूजयामि ।।ॐ पुण्याय नमः । श्रोत्रे पूजयामि ।।ॐ श्रीशाय नमः । नेत्राणि पूजयामि ।।ॐ नन्दगोपप्रियाय नमः। भ्रवौ पूजयामि ।।ॐ देवकीनन्दनाय नमः। भ्रूमध्यं पूजयामि ।।ॐ शकटासुरमर्धनाय नमः । ललाटं पूजयामि ।।ॐ श्री कृष्णाय नमः । शिरः पूजयामि ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः सर्वांगाणि पूजयामि ।। धूपं निम्न लिखित मन्त्र पढ़ते हुए श्रीकृष्ण को धूप समर्पित करें। वनस्पत्युद्भवो दिव्यो गन्धाढ्यो गन्धवुत्तमः ।बालकृष्ण महिपालो धूपोयं प्रतिगृह्यताम् ।।यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।मुखं किमस्य कौ बाहू कावूरू

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Puja Path Tips

Puja Path Tips: पूजा के बाद भूल से भी न करें ये काम, वरना मिल सकते हैं विपरीत परिणाम

Puja Path Tips: अगर आप चाहते हैं कि आपकी पूजा सफल और फलदायी हो, तो इन बातों का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। आइए जानते हैं पूजा करने के बाद किन कार्यों को करने से परहेज करना चाहिए।  जब घर में पूजा होती है, तो वातावरण में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह समय न केवल आत्मिक शुद्धि के लिए, बल्कि मानसिक और शारीरिक संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। सभी नियमों के पालन करते हुए पूजा पाठ करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। लेकिन कई बार लोग अनजाने में पूजा के ठीक बाद कुछ ऐसे काम कर लेते हैं, Puja Path Tips जो इस ऊर्जा को प्रभावित कर सकते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपकी पूजा सफल और फलदायी हो, तो इन बातों का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। आइए जानते हैं पूजा करने के बाद किन कार्यों को करने से परहेज करना चाहिए।  Puja Path Tips:मंदिर की सही दिशा इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि आपका मंदिर वास्तु के अनुसार, सही दिशा में होना चाहिए, तभी आपको पूजा का पूर्ण फल मिल सकता है। वास्तु के अनुसार, मंदिर हमेशा घर की उत्तर-पूर्व या फिर पूर्व दिशा में होना चाहिए। Puja Path Tips इन दिशाओं का ध्यान न रखने पर वास्तु दोष उत्पन्न हो सकता है, जिस कारण पूजा-पाठ सफल नहीं होता। इस बात का जरूर रखें ध्यान हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, आप पूजा का पूर्ण फल तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब आप पूजा-पाठ के दौरान स्वच्छता और पवित्रता का पूर्ण रूप से ध्यान रखें, इसलिए हमेशा स्नान करने और सुथरे कपड़े कपड़े पहनने के बाद ही Puja Path Tips पूजा-पाठ आरंभ करें। इसी के साथ मन की स्वच्छता का भी ख्याल रखना जरूरी है। इस बात का खासतौर से ध्यान रखें कि भगवान की उपासना के दौरान आपके मन में बुरे ख्याल न आएं। किस समय करें पूजा हिंदू शास्त्रों में पूजा के लिए उत्तम समय भी बताया गया है, जो ब्रह्म मुहूर्त और सूर्यास्त का समय है। दोपहर का समय भगवान के विश्राम का समय माना जाता है, इसलिए इस दौरान पूजा-अर्चना न करें, वरना आपको इसका कोई फल नहीं मिलता। Puja Path Tips साथ ही आपका मंदिर ऐसे स्थान पर होना चाहिए, जहां आप शांति से बैठकर भगवान का ध्यान कर सकें और किसी तरह की बाधा उत्पन्न न हो। इन सभी बातों का ध्यान रखने पर आपको पूजा का पूर्ण फल मिल सकता है। कटु शब्द न बोलें पूजा के तुरंत बाद अगर आप किसी को अपशब्द कहते हैं या कोसते हैं, तो इसका नकारात्मक प्रभाव सामने आ सकता है। पूजा के दौरान और पूजा के बाद भी अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। मांस और मदिरा का सेवन पूजा के बाद शरीर और मन दोनों पवित्र अवस्था में होते हैं। Puja Path Tips ऐसे में मांस या शराब का सेवन करना आध्यात्मिक रूप से अनुचित माना जाता है। ऐसा करने से आपकी पूजा विफल हो सकती है। बाल और नाखून न काटें यह समय ऊर्जा से भरा होता है, ऐसे में बाल या नाखून काटना शुभ नहीं माना जाता। इससे सकारात्मक ऊर्जा में कमी आ सकती है। अपमान न करें पूजा के बाद यदि आप किसी का अपमान करते हैं या रूखा व्यवहार करते हैं, तो इससे पूजा का फल क्षीण हो सकता है। Puja Path Tips इसलिए आपको नम्रता बनाए रखनी है। साधु-संतों का निरादर न करें अगर पूजा के समय कोई संत या साधु आपके घर आता है, तो उनका आदर करना चाहिए है। उन्हें अनदेखा करना या दरवाजे से लौटा देना अशुभ माना जाता है। भोग ग्रहण न करें ईश्वर को अर्पित भोग को थोड़ी देर बाद ही श्रद्धा के साथ ग्रहण करना चाहिए। इसे तुरंत खाने से उसका आध्यात्मिक महत्व घट जाता है। नमक युक्त भोजन न करें मान्यता है कि पूजा के बाद नमक वाला खाना खाने से शरीर की ऊर्जात्मक अवस्था बिगड़ सकती है। इस समय हल्का और सात्त्विक भोजन ही खाना चाहिए। तुरंत पैर न धोएं पूजा के बाद कुछ समय तक उस ऊर्जा को अपने अंदर समाहित रहने दें। इसलिए कहा जाता है कि पूजा के तुरंत स्नान या पैर धोने  से बचना चाहिए। ऐसा करने से उसका प्रभाव कम हो सकता है।

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What Is The Right Way to worship :पूजा करने का सही तरीका क्या है?

What Is The Right Way to worship: अगर आप गलत विधि और नियमों के साथ worship पूजा करते हैं तो इसका बहुत बुरा परिणाम भुगतना पड़ता है। चलिए जानते हैं पूजा करने का सही तरीका क्या है, साथ ही जानिए पूजा खड़े होकर करनी चाहिए या बैठकर। Puja Vidhi Niyam in Hindi: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है। कहा जाता है कि इसमें इतनी शक्ति होती है कि ये सभी मनोकामना पूरी कर सकती है। वहीं वास्तु में भी इसको लेकर कई नियम बताए गए हैं जिनका पालन करना बेहद जरूरी होता है, तभी पूजा संपूर्ण मानी जाती है। हालांकि जाने-अनजाने में कुछ लोग पूजा के दौरान कई तरह की गलतियां कर बैठते हैं। जिसकी वजह से उन्हें पूजा का फल नहीं मिल पाता और पूजा अधूरी रह जाती है। ऐसे में अगर आप गलत विधि और नियमों के साथ पूजा करते हैं तो इसका बहुत बुरा परिणाम भुगतना पड़ता है। चलिए जानते हैं पूजा करने का सही तरीका क्या है, साथ ही जानिए पूजा खड़े होकर करनी चाहिए या बैठकर।  Puja Kaise Karni Chahiye: बैठकर या खड़े होकर, कैसे करें पूजा?  मान्यताओं के अनुसार, घर के मंदिर में कभी भी खड़े होकर worship पूजा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि खड़े होकर पूजा करना शुभ नहीं माना जाता है साथ ही कोई लाभ भी नहीं मिलता। इसलिए घर पर पूजा-पाठ के दौरान खड़े होकर पूजा न करें।  इस बात का भी ध्यान रखें कि जब भी आप पूजा-पाठ करें तो पहले फर्श पर आसन जरूर बिछाएं और इस पर बैठकर ही पूजा करें। इस बात का भी ध्यान रखें कि कभी भी बिना सिर ढके पूजा नहीं करनी चाहिए। स्त्री हो या पुरुष पूजा करते समय हमेशा सिर को ढक कर ही रखें।   What is the correct method of worship: क्या है पूजा करने की सही विधि?  वास्तु शास्त्र के अनुसार पूजा के दौरान अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए और अपने दाहिने ओर घंटी, धूप, दीप, अगरबत्ती आदि रखनी चाहिए। इस दिशा में मुख करके पूजा-अर्चना करना श्रेष्ठ माना जाता है। क्योंकि पूर्व दिशा शक्ति व शौर्य की प्रतीक है। इस दिशा में पूजा स्थल होने से घर में रहने वालों को शांति, सुकून, धन, प्रसन्नता और स्वास्थ लाभ मिलता है वास्तु शास्त्र के अनुसार, पूजा के दौरान अपनी बाईं ओर पूजन सामग्री जैसे फल फूल, जल का पात्र और शंख रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस तरह पूजा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। इस बात का भी ध्यान रखें कि worship पूजा करते समय अपने माथे पर तिलक जरूर लगाएं।  घर में पूजा स्थल हमेशा उत्तर-पूर्व दिशा में बनाना चाहिए। वास्तु में इस दिशा को शुभ माना जाता है। इस दिशा में पूजा स्थल होने से घर में रहने वालों को शांति, सुकून, धन, घर के भीतर पूजा घर बनवाते समय इस बात का भी ध्यान रखें कि इसके नीचे या ऊपर या फिर अगल-बगल शौचालय नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही भूलकर भी घर की सीढ़ी के नीचे पूजा घर नहीं बनाना चाहिए। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है।) 

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Shiv ki puja ke Niyam: सावन में शिवलिंग की पूजा कैसे करें? जान लें सही विधि, नियम और पूजा सामग्री

Shiv ki puja ke Niyam: सप्ताह का हर दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सोमवार के दिन भगवान शिव (Lord Shiv) की पूजा और व्रत करने का विधान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सोमवार के दिन भगवान महादेव की सच्चे मन से पूजा और व्रत करने से साधक को बिजनेस में सफलता मिलती है और धन का लाभ मिलता है। Sawan Mein Shivling Puja Kaise Kare: सावन का महीना देवों के देव महादेव को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए सबसे खास होता है. हिंदू कैलेंडर के मुताबिक सावन का महीना साल का पांचवां महीना होता है. धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों के अनुसार, यह महीना भगवान शिव को सबसे प्रिय माना गया है. सावन के महीने में भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा करने और जलाभिषेक करने का विशेष महत्व होता है. धार्मिक मान्यता है कि सावन के महीने में माता पार्वती ने कठोर तपस्या करते हुए भगवान शिव को पति के रूप में पाया था.  Lord Shiv Puja Vidhi: Shiv ki puja ke Niyam सोमवार का दिन भगवान शिव को प्रिय है। यही वजह है कि इस दिन भगवन भोलेनाथ की पूजा और व्रत करने का विधान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, Shiv ki puja ke Niyam सोमवार के दिन भगवान महादेव की सच्चे मन से पूजा-व्रत करने से साधक को बिजनेस में सफलता मिलती है और धन का लाभ मिलता है। Shiv ki puja ke Niyam ऐसा माना जाता है कि अगर भगवान शिव की पूजा विधिपूर्वक और अंत में आरती की जाए, तो ईश्वर प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा साधक पर सदैव बनी रहती है। आइए जानते हैं कि महादेव की पूजा किस तरह करना फलदायी होता है। Shiv ki puja ke Niyam:ऐसे करें पूजा सावन में शिवलिंग पूजा का महत्व (Sawan shiv puja significance) हिंदू कैलेंडर के अनुसार सावन को एक बेहद पूजनीय और पावन महीना माना जाता है जो विशेष रूप से भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित होता है. इस शुभ महीने के दौरान भक्त समृद्धि, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक विकास का आशीर्वाद पाने के लिए विभिन्न अनुष्ठान करते हैं. सावन में किए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों में से एक है शिवलिंग की पूजा. धार्मिक मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा का विशेष लाभ मिलते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है. शिव पुराण में सावन के दौरान शिवलिंग की पूजा का महत्व माना गया है क्योंकि सावन हिंदू चंद्र कैलेंडर का पांचवां महीना होता है. ऐसा माना जाता है कि इस महीने के दौरान, ब्रह्मांड शिव में दिव्य ऊर्जा भर जाती है, Shiv ki puja ke Niyam जिससे यह शिवलिंग की पूजा के लिए आदर्श समय बताया गया है. सावन चातुर्मास के दौरान पड़ता है और इस दौरान जगत पालनहार भगवान विष्णु सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव को सौंप देते हैं. इसी वजह से जो भी भक्त सावन में शिवलिंग की पूजा करता है, उसके जीवन की हर परेशानी दूर हो जाती है. घर में कौन से शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए? Which Shivalinga should be worshiped at home? सावन में घर में शिवलिंग की पूजा करें तो आपको घर में कौन सा शिवलिंग रखना चाहिए यह भी बेहद महत्वपूर्ण होता है. ज्योतिष के अनुसार, घर में पारद शिवलिंग रखना सबसे शुभ माना गया है. इसके अलावा आप स्फटिक का शिवलिंग भी घर में रख सकते हैं. अगर आप नर्मदा नदी के शिवलिंग की पूजा करते हैं तो यह सबसे ज्यादा शुभ होता है. Shiv ki puja ke Niyam शिवलिंग भगवान शंकर के निराकार रूप का प्रतिनिधित्व करता है और उनके अनंत स्वरूप का प्रतीक भी माना गया है, इसलिए कुछ विशेष प्रकार के शिवलिंग की ही पूजा घर में करने की सलाह दी जाती है. सावन शिवलिंग पूजा सामग्री (Sawan Shivling puja samagri) अगर आप घर में शिवलिंग की पूजा या अभिषेक करने करने जा रहे हैं, तो आपको कुछ खास सामग्रियों की जरूरत होती है. आइए इनके बारे में जानें – बेलपत्र, भांग, धतूरा, शमी के पत्ते, बिल्व पत्र, चंदन का लेप, आक के फूल, सफेद फूल, कमल, मौसमी फल, शहद, शक्कर, चीनी, गंगाजल, गाय का दूध, अगरबत्ती, कपूर, घी का दीपक, धूप, दीप, गंध, नैवेद्य, प्रसाद के लिए मिठाई, आचमन के लिए जल का पात्र. सावन में शिवलिंग की पूजा विधि (Sawan Shivling Puja vidhi) सावन में शिव पूजा के नियम (Sawan shivling puja niyam) 1. इन चीजों का करें त्याग- Shiv ki puja ke Niyam सावन के शुरू होते ही तामसिक चीजों जैसे मांस, शराब, नशीले पदार्थ, लहसुन, प्याज आदि का सेवन नहीं करना चाहिए. सावन में पूरे महीने सात्विक भोजन करना चाहिए. पूजा से पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनने चाहिए. 2. शिवलिंग पर ये चीजें न चढ़ाएं- महादेव की पूजा में तुलसी के पत्ते, हल्दी, केतकी का फूल, सिंदूर, शंख, नारियल आदि चीजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. ये सभी चीजें शिव पूजा में वर्जित मानी गई हैं. 3. इन दिनों पर व्रत रखना है शुभ- Shiv ki puja ke Niyam सावन के सोमवार, प्रदोष व्रत और शिवरात्रि के दिन व्रत रखकर भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए. ये तीनों ही दिन शिव जी की कृपा पाने के लिए सबसे विशेष माने गए हैं. 4. शिव जी मंत्रों का जाप करें- Shiv ki puja ke Niyam सावन में सामान्य पूजा के दौरान आप ओम नम: शिवाय मंत्र का जाप कर सकते हैं. आप शिव चालीसा पढ़कर भी भगवान शिव की आरती कर सकते हैं. आरती करने से पूजा की कमियां दूर हो जाती हैं. 5. शिवलिंग के आकार का रखें ध्यान- Shiv ki puja ke Niyam ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, घर में स्थापित किए जाने वाले शिवलिंग का आकार हमेशा छोटा ही होना चाहिए. घर में अंगूठे के आकार का शिवलिंग स्थापित करना सबसे उत्तम है. इसके अलावा शिवलिंग अकेले नहीं रखना चाहिए. उसके साथ में नंदी या शिव परिवार की फोटो जरूर रखें. 6. जलधारा युक्त शिवलिंग- Shiv ki puja ke Niyam शास्त्रों के मुताबिक, शिवलिंग से हमेशा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. उस ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करने के लिए ही शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाता है. शिवलिंग की ऊर्जा को शांत रखने के लिए जलधारा होना जरूरी है. 7. इस दिशा में रखें शिवलिंग

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Shabri Jayanti 2025: शबरी जयंती के दिन इस विधि से करें भगवान राम की पूजा, क्या है मान्यता?

Shabri Jayanti 2025 Date: हिंदू धर्म में शबरी जयंती का विशेष महत्व है. हर साल फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को शबरी जयंती मनाई जाती है. इस दिन भगवान श्री राम का पूजन करने से जीवन में खुशियों का आगमन होता है. हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन शबरी जयंती मनाई जाती है। यह भगवन के प्रति भक्त का प्रेम भावना का दिन है जिसे बड़े आनन्द उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम सहित माता शबरी की पूजा की जाती है। 2025 में 20 फरवरी को शबरी जयंती मनाई जाएगी। Shabri Jayanti 2025: माता शबरी के बारे में सबने सुना होगा. माता शबरी रामायण काल के महत्वपूर्ण पात्रों में से एक हैं. धर्म शास्त्रों में वर्णित है कि माता शबरी ने प्रभु श्री राम को झूठे बेर प्रेम से खिलाए थे. हिंदू धर्म में हर साल माता शबरी की जयंती मनाई जाती है. Shabri Jayanti 2025 हिंदू धर्म में माता शबरी की जयंती का विशेष महत्व है. इस दिन भगवान राम के साथ ही मां शबरी का भी पूजन किया जाता है. इस दिन पूजन से भगवान राम प्रसन्न होते हैं और कृपा करते हैं. kab hai Shabri Jayanti 2025:कब है शबरी जयंती ? Shabri Jayanti 2025:हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को शबरी जयंती मनाई जाती है. इस साल फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि 19 फरवरी को सुबह 7 बजकर 32 मिनट पर आरंभ होगी. वहीं इस तिथि का समापन 20 फरवरी को 9 बजकर 58 मिनट पर हो जाएगा. ऐसे में इस साल 20 फरवरी को शबरी जयंती मनाई जाएगी. इसी दिन इसका व्रत भी रखा जाएगा. Shabri Jayanti 2025 Per Shri Ram puja vidhi:शबरी जयंती पर श्री राम की पूजा विधि क्या है मान्यता मान्यताओं के अनुसार, इस दिन जो भी पूरे मन से भगवान राम का सेवा-सत्कार करता है उस पर प्रभु प्रसन्न होते हैं. इसी मान्यता के अधार पर इस दिन प्रभु राम और माता शबरी की पूजा की जाती है. मान्यता है कि शबरी जयंती के दिन ही शबरी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी. शबरी जयंती पर जो भी भगवान राम और मााता शबरी की पूजा करता है उस पर प्रभु की कृपा दृष्टि हमेशा बनी रहती है. Shabri Jayanti 2025 शबरी जयंती पर रामचरित मानस का पाठ किया जाता है. मान्यता है कि इससे शुभ फल मिलते हैं.  Famous Ram Mandir:भारत में भगवान श्रीराम के 5 प्रमुख मंदिर

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Basant Panchami 2025: बसंत पंचमी के दिन क्या करें और क्या नहीं

Basant Panchami 2025 Avoid These Mistakes: वसंत पंचमी  का दिन विशेष रूप से मां सरस्वती की पूजा के लिए समर्पित है। इस दिन लोग मां की विशेष रूप से पूजा और अर्चना करते हैं। वसंत पंचमी के दिन कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। आइए जानते हैं इस दिन ऐसे कौन से काम है जो करने चाहिए और ऐसे कौन से काम हैं जिन्हें करने से बचना चाहिए।  Basant panchamike din kya karna chahiye:बसंत पंचमी का त्योहार ज्ञान की देवी मां सरस्वती को समर्पित है। हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का त्योहार मनाते है। इस दिन संगीत की देवी मां सरस्वती की विधिवत पूजा की जाती है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने इस दिन चार हाथों वाली मां सरस्वती प्रकट की थी, जिनके एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में पुस्तक, तीसरे हाथ में माला और चौथे हाथ में वर मुद्रा हैं। जिस दिन मां सरस्वती प्रकट हुई थीं, उस दिन Basant Panchami 2025 बसंत पंचमी थी। इस साल बसंत पंचमी कुछ जगहों पर 2 फरवरी और कुछ जगहों पर 3 फरवरी को मनाई जाएगी। बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा करने के अलावा कुछ नियमों का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। जानें बसंत पंचमी के दिन क्या करें और क्या नहीं वसंत पंचमी 2025 तिथि Basant Panchami 2025 साल 2025 में माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 2 फरवरी, रविवार को आएगी। जब देशभर में वसंत पंचमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह दिन मां सरस्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। कहते हैं इस दिन माँ सरस्वती की पूजा करने से व्यक्ति को उनके आशीर्वाद से ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति होती है। पीले रंग का महत्व वसंत पंचमी Basant Panchami 2025 के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। अर्घ्य देने के बाद पीले वस्त्र पहनकर विधिपूर्वक माँ सरस्वती की पूजा करना लाभकारी होता है। इस पूजा में मां सरस्वती को पीले रंग के वस्त्र, भोग और पुष्प अर्पित करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। Basant Panchami 2025 Ke din kya kare बसंत पंचमी के दिन क्या करें- 1.बसंत पंचमी के दिन पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। अगर नदी में स्नान करना संभव नहीं है तो घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर नहा लें। 2. मां सरस्वती की विधिवत पूजा करनी चाहिए और मां को पीले रंग के पुष्प अर्पित करने चाहिए। 3. मां सरस्वती को पीले भोग अति है। इस दिन मां को पीली बूंदी, केसर हलवा और मालपुआ, खीर या मिठाई आदि का भोग लगाना चाहिए। 4. मां सरस्वती की पूजा के समय पेन, पेपर और बही खाता आदि करना चाहिए। 5. बसंत पंचमी के दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना चाहिए। बसंत पंचमी के दिन क्या न करें- Basant Panchami 2025 Ke Din kya kare Nhi kare 1. बसंत पंचमी के दिन वाद-विवाद से बचना चाहिए। किसी को भी अपशब्द नहीं कहने चाहिए। 2. इस दिन से बसंत ऋतु आरंभ होती है। इस दिन पेड़-पौधे या फिर फसल काटने की मनाही होती है। 3. बसंत पंचमी के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। तामसिक भोजन से दूरी रखनी चाहिए। 4. बसंत पंचमी के दिन स्नान आदि से पहले भोजन नहीं करना चाहिए। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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मकर संक्रांति पर पहला स्नान… कौन अखाड़ा पहले और कौन आखिर में लगाएगा डुबकी, टाइमिंग जानिए

Mahakumbh Amrit Snan Akhada Snan Timing: महाकुंभ 2025 का आगाज पौष पूर्णिमा पर शाही स्नान के साथ हो गया। इस महाकुंभ में छह शाही स्नान हैं। इसमें से तीन अमृत स्नान होंगे। पहला अमृत स्नान मकर संक्रांति के मौके पर मंगलवार 14 जनवरी को होगा। इसके अलावा मौनी अमावस्या पर 29 जनवरी और बसंत पंचमी पर 3 फरवरी अन्य दो अमृत स्नान होंगे। प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज prayagraj में भक्तों का सैलाब संगम तट पर उमड़ पड़ा है। पौष पूर्णिमा के मौके पर पहला शाही स्नान पर्व का आयोजन हुआ। सुबह से लोगों की भीड़ संगम तट पर उमड़ पड़ी। एक करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने पहले शाही स्नान के दौरान संगम में डुबकी लगाई। पौष पूर्णिमा के साथ ही ही संगम तट पर 45 दिनों के कल्पवास की शुरुआत हो गई है। इसको लेकर देश-दुनिया से लोग संगम नगरी पहुंचे हैं। वहीं, सभी 13 अखाड़ों का डेरा संगम तट पर जम गया है। महाकुंभ के सबसे बड़े आकर्षण अखाड़ों के अमृत स्नान का कार्यक्रम मंगलवार सुबह से होगा। प्रयागराज मेला प्राधिकरण की ओर से अखाड़ों के अमृत स्नान का समय और क्रम जारी कर दिया है। अमृत स्नान पर्व पर सबसे पहले महानिर्वाणी और अटल अखाड़े के संत-महंत और महामंडलेश्वर अमृत स्नान करेंगे। परंपरागत तरीके से सबसे पहले सातों संन्यासी, इसके बाद तीनों वैरागी और सबसे अंत में तीनों उदासीन अखाड़ों का अमृत स्नान होगा। रविवार को इस संबंध में अखाड़ों से चर्चा और विमर्श के बाद अमृत स्नान पर्व की समय सीमा का निर्धारण किया गया है। अमृत स्नान के लिए अखाड़ों के संत सुबह 5:15 बजे से अपने अखाड़ों से निकलना शुरू होंगे। 30 मिनट से एक घंटे का समय मेला प्राधिकरण की ओर से अमृत स्नान के दौरान अखाड़ों को 30 मिनट से एक घंटे का समय आवंटित किया गया है। अखाड़ों के स्नान के दौरान सड़कों को खाली रखा जाएगा। इसको लेकर प्रशासनिक तैयारियां पहले से पूरी कराई जा चुकी हैं। सबसे पहले श्री पंचायत अखाड़ा महानिर्वाणी एवं श्री शंभू पंचायती अटल अखाड़ा के संत स्नान के लिए निकलेंगे। सबसे आखिर में निर्मल अखाड़े के संत पुण्य संगम की डुबकी लगाएंगे। अखाड़ों के अमृत स्नान की समय सारिणी अखाड़ों का नाम शिविर से प्रस्थान घाट पर आगमन स्नान का समय घाट से प्रस्थान श्री पंचायत अखाड़ा महानिर्वाणी एवंश्री शंभू पंचायती अटल अखाड़ा 5:15 बजे 6:15 बजे 40 मिनट 6:55 बजे श्री तपोनिधि पंचायती श्री निरंजनी अखाड़ाएवं श्री पंचायती अखाड़ा आनंद 6:05 बजे 7:05 बजे 40 मिनट 7:45 बजे श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा, श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ाएवं श्री पंच अग्नि अखाड़ा 7:00 बजे 8:00 बजे 40 मिनट 8:40 बजे अखिल भारतीय श्री पंच निर्मोही अखाड़ा 9:40 बजे 10:40 बजे 30 मिनट 11:10 बजे अखिल भारतीय श्री पंच दिगंबर अनी अखाड़ा 10:20 बजे 11:20 बजे 50 मिनट 12:10 बजे अखिल भारतीय श्री पंच निर्वाणी अखाड़ा 11:20 बजे 12:20 बजे 30 मिनट 12:50 बजे श्री पंचायती नया उदासीन अखाड़ा 12:15 बजे 13:15 बजे 55 मिनट 14:10 बजे श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन निर्वाण 13:20 बजे 14:20 बजे 60 मिनट 15:20बजे श्री पंचायत निर्मल अखाड़ा 14:40 बजे 15:40 बजे 40 मिनट 16:20 बजे अखाड़ों के संत सुबह 5.15 बजे से बैंडबाजा, डीजे के साथ रथों पर सवार होकर स्नान के लिए निकलेंगे। अमृत स्नान के लिए निकलने वाली यात्रा में संतों के शिष्य और अनुयायी चंवर, छत्र, दंड लिए पुष्पवर्षा करते हुए साथ-साथ चलेंगे। कुंभ मेलाधिकारी विजय किरन आनंद ने अखाड़ों से अनुरोध किया है कि उनके साथ स्नान के लिए जाने वाले खालसों, महामंडलेश्वरों, आचार्य महामंडलेश्वर की संख्या मेला प्रशासन को भेज गई सूची के अनुसार ही सीमित रखें। अखाड़ों के लिए रूट मैप जारी अमृत स्नान के साथ जाने वाले रथों एवं वाहनों की संख्या मेला पुलिस की ओर से जारी पास के अनुसार रखी जाएगी। त्रिवेणी मार्ग सेक्टर-20 से पीपा पुल संख्या-6 त्रिवेणी दक्षिणी और पीपा पुल संख्या-7 त्रिवेणी मध्य के जरिए गंगा पार कर संगम क्षेत्र (सेक्टर-3) में अमृत स्नान के लिए अखाड़ों का आगमन होगा। त्रिवेणी मार्ग और अखाड़ा मार्ग क्रॉसिंग से बाएं मुड़कर निर्धारित संगम घाट पर स्नान की व्यवस्था की गई है। संगम क्षेत्र में अखाड़ों के वाहनों के लिए पार्किंग की व्यवस्था भी की गई है। संगम में स्नान के बाद अखाड़ों के संत और अनुयायी सेक्टर तीन अखाड़ा वापसी मार्ग से दाहिने मुड़कर पीपा पुल संख्या-3 महावीर दक्षिण और पीपा पुल संख्या-4 महावीर उत्तरी से गंगा पार कर सेक्टर-20 में प्रवेश करेंगे। पीपा पुल से महावीर मार्ग, महावीर संगम लोवर और उसके बाद महावीर संगम लोवर मार्ग क्रॉसिंग से बाएं (उत्तर मुड़कर) अखाड़ा वापसी मार्ग से होकर अपने-अपने शिविर में जाएंगे। संन्यासी अखाड़े काली मार्ग से होकर अपने शिविर में प्रवेश करेंगे।

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Magha Kalashtami Vrat:माघ कालाष्टमी व्रत कब है

Magha Kalashtami Vrat:कालाष्टमी प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाला एक हिंदू त्यौहार है जोकि भगवान शिव के ही एक रौद्र रूप भगवान भैरव को समर्पित है। प्रत्येक माह में आने के कारण यह त्यौहार एक वर्ष में कुल 12 बार, तथा अधिक मास की स्थिति में 13 बार मनाया जाता है। काल भैरव को पूजे जाने के कारण इसे काल भैरव अष्टमी अथवा भैरव अष्टमी भी कहा जाता है। मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष को आने वाली मास में पड़ने वाली कालाष्टमी सबसे अधिक प्रसिद्ध है जिसे कालभैरव जयंती के नाम से जाना जाता है। कालाष्टमी के रविवार अथवा मंगलवार के दिन पड़ने पर इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि साप्ताह के ये दिन भी भगवान भैरव को समर्पित माने जाते हैं। कालाष्टमी व्रत कब है? – Kalashtami Vrat Kab Hai मंगलवार, 21 जनवरी 2025माघ कृष्ण अष्टमी : 21 जनवरी 12:39 PM – 22 जनवरी 3:18 PM साल 2025 में माघ महीने में कालाष्टमी 21 जनवरी को है. कालाष्टमी, हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है. इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप भैरव की पूजा की जाती है. कालाष्टमी को भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. कालाष्टमी के दिन भगवान काल भैरव की पूजा करने से जीवन से सभी संकट दूर हो जाते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं. कालाष्टमी पर भोग में हलवा, खीर, गुलगुले, जलेबी, फल आदि शामिल किए जाते हैं. भगवान काल भैरव को पान, सुपारी, लौंग, इलायची, मुखवास आदि चीज़ें भी चढ़ाई जाती हैं. Rinharta Ganesh Stotra:ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र: कर्ज से मुक्ति पाने का चमत्कारी उपाय Shri Ganesh Shendur Laal Chadhayo Aarti:श्री गणेश – शेंदुर लाल चढ़ायो आरती गणेश शुभ लाभ मंत्र (Ganesha Shubh Labh Mantra) Sapne Me Shivling Dekhna: सपने में शिवलिंग की पूजा करने का मतलब…? Maha Shivratri:2025 में महाशिवरात्रि कब है? नोट कर लें डेट और पूजा-विधि

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