MYTHOLOGICAL STORIES

महाभारत की कहानी: अर्जुन और चिड़िया की आंख | Arjun Aur Chidiya Ki Aankh

यह द्वापरयुग के उन दिनों की बात है, जब पांचों पांडव और कौरव पुत्र, गुरु द्रोणाचार्य से अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उन दिनों पांडव धनुर्विद्या का ज्ञान प्राप्त कर रहे थे। एक दिन गुरु द्रोणाचार्य ने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया। परीक्षा के लिए गुरुदेव ने पांचों पांडव – युद्धिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के साथ-साथ कौरवों को भी जंगल में बुलाया और एक पेड़ के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया और कहा, “शिष्यों, आज आप सभी की परीक्षा का दिन है। आज इस बात की परीक्षा होगी कि मेरे द्वारा दी गई धनुर्विद्या से आप सभी ने कितना सीखा है।” इसके बाद, गुरु द्रोणाचार्य ने उस पेड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा, “वहां देखो, उस पेड़ पर एक नकली चिड़िया लटकी है। मैं चाहता हूं कि आप सभी एक-एक करके, उस मछली की आंख पर निशाना लगाएं और तीर सीधा आंख के बीचों-बीच, उसकी पुतली पर जाकर लगना चाहिए। क्या आप सभी समझ गए?” इस पर सभी ने सहमती में अपनी सिर हिला दिया। गुरु द्रोणाचार्य ने सबसे पहले युद्धिष्ठिर को आगे बुलाया और तीर कमान उसके हाथों में थमाते हुए उससे पूछा, “वत्स, तुम्हें इस समय क्या-क्या दिख रहा है?” इस पर युद्धिष्ठिर ने जवाब दिया, “गुरुदेव, आप, मेरे भाई, यह जंगल, पेड़, पेड़ पर बैठी चिड़िया व पत्ते आदि सब कुछ दिख रहा है।” यह सुनकर द्रोणाचार्य ने युद्धिष्ठिर के हाथ से तीर कमान ले लिया और कहा कि वह इस परीक्षा के लिए अभी तैयार नहीं है। इसके बाद, उन्होंने भीम को आगे बुलाया और उसके हाथों में तीर-कमान थमा दिया। फिर उन्होंने भीम से पूछा कि उसे क्या-क्या दिख रहा है। इस पर भीम ने जवाब दिया कि उसे भी गुरु द्रोणाचार्य, उसके भाई, पेड़, चिड़िया, धरती व आसमान सब कुछ दिख रहा है। गुरु द्रोणाचार्य ने उसके हाथों से भी धनुष-बाण वापस ले लिया और उसे अपने स्थान पर जा कर खड़े रहने को कह दिया। इस प्रकार गुरुदेव ने एक-एक करके नकुल, सहदेव और सभी कौरव पुत्रों को बुलाया और उनके हाथों में धनुष-बाण थमाते हुए, उनसे भी यही सवाल पूछा। उन सभी का जवाब भी कुछ इस प्रकार ही आया कि उन्हें गुरुदेव, भाई, जंगल, उसके आसपास की चीजें व पेड़ आदि दिख रहे हैं। इन जवाबों के बाद उन्होंने सभी को अपने-अपने स्थान पर वापस भेज दिया। आखिरी में अर्जुन की बारी आई। गुरुदेव ने उसे आगे बुलाया और धनुष-बाण उसके हाथों में दे दिया। फिर उन्होंने अर्जुन से पूछा, “वत्स बताओ कि तुम्हें क्या दिख रहा है?” अर्जुन ने कहा, “मुझे उस चिड़िया की आंख दिख रही है, गुरुदेव”। गुरुदेव ने पूछा, “और क्या दिख रहा है तुम्हें, अर्जुन?” “मुझे उस चिड़िया की आंख के अलावा कुछ नहीं दिख रहा, गुरुवर,” अर्जुन ने कहा। यह सुनकर कि अर्जुन चिड़िया की आंख के अलावा कुछ नहीं देख रहा, गुरु द्रोणाचार्य मुस्कुराए और कहा, “तुम इस परीक्षा के लिए तैयार हो। निशाना लगाओ, वत्स।” गुरु का आदेश मिलते ही अर्जुन ने चिड़िया की आंख पर तीर मारा और तीर सीधे उसके लक्ष्य पर जाकर लगा। कहानी से सीख बच्चों, अर्जुन और चिड़िया की आंख की इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सफलता प्राप्त करने के लिए हमारा ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर होना चाहिए।

महाभारत की कहानी: अर्जुन और चिड़िया की आंख | Arjun Aur Chidiya Ki Aankh Read More »

महाभारत की कहानी: कर्ण के जन्म की कथा | Karn Ka Janam Kaise Hua

यह कहानी ऐसे योद्धा की जिसे लोग दानवीर कर्ण के नाम से जानते हैं। कर्ण पांडवों में सबसे बड़े थे और इस बात का पता सिर्फ माता कुंती को ही था। कर्ण का जन्म कुंती के विवाह से पहले ही हो गया था। इसलिए, लाेकलाज के डर से कुंती ने कर्ण को छोड़ दिया था, लेकिन कर्ण का जन्म कुंती के विवाह से पहले कैसे हो गया, इसके पीछे भी एक कहानी है। बात उस समय की है जब कुंती का विवाह नहीं हुआ था और वह सिर्फ राजकुमारी थीं। उसी दौरान ऋषि दुर्वासा पूरे एक वर्ष के लिए राजकुमारी कुंती के पिता के महल में अतिथि के रूप में ठहरे। कुंती ने एक वर्ष तक उनकी खूब सेवा की। राजकुमारी की सेवा से ऋषि दुर्वासा प्रसन्न हो गए और उन्होंने कुंती को वरदान दिया कि वो किसी भी देवता को बुलाकर उनसे संतान की प्राप्ती कर सकती हैं। एक दिन कुंती के मन में आया कि क्यों न वरदान की परीक्षा की जाए। ऐसा सोचकर उन्होंने सूर्य देव की प्रार्थना करके उन्हें बुला लिया। सूर्य देव के आने और वरदान के प्रभाव से कुंती विवाह के पूर्व ही गर्भवती हो गईं। कुछ समय बाद उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, जो सूर्य देव के समान ही प्रभावशाली था। साथ ही जन्म के समय से ही उस शिशु के शरीर पर कवच और कुंडल थे। कुंवारी अवस्था में पुत्र की प्राप्ति के कारण लोकलाज के डर से कुंती ने उसे एक डिब्बे में बंद करके नदी में बहा दिया। बक्सा एक सारथी और उसकी पत्नी को मिला, जिनकी कोई संतान नहीं थी। वो दोनों कर्ण के रूप में पुत्र को पाकर बहुत खुश और उसका लालन पालन करने लगे। यही सूर्य पुत्र आगे चलकर दानवीर कर्ण कहलाए और कई वर्षों बाद कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांचों पांडवों के सामने वह एक शक्तिशाली योद्धा के रूप में खड़े रहे।

महाभारत की कहानी: कर्ण के जन्म की कथा | Karn Ka Janam Kaise Hua Read More »

महाभारत की कहानी: भीम और हिडिंबा का विवाह | Bheem Hidimba Ka Vivah

द्वापर युग की बात है। यह बात हर कोई जानता था कि कौरव, पांडवों को हमेशा से अपना शत्रु मानते थे और कैसे भी करके उन्हें मारने की योजना बनाते रहते थे। एक बार जब पांचों पांडव और कुंती वार्णावर्त नगर में महादेव का मेला देखने गए, तब दुर्योधन ने उन्हें मारने की योजना बनाई। उसने पांडवों के विश्राम के लिए एक लाक्षागृह यानी लाख के महल का निर्माण करवाया। लाख ऐसी चीज है, जो जल्द आग पकड़ लेती है। रात को जब सभी विश्राम कर रहे थे, तभी महल में आग लगा दी गई। पांडवों को इस बात का पता पहले से ही चल गया था। इसलिए, उन्होंने महल के अंदर सुरंग बना दी थी और वो सभी उस सुरंग के रास्ते सुरक्षित बाहर निकल गए। वहां से निकलकर वो सभी जंगल में पहुंचे और रात गुजारने के लिए एक जगह रुक गए। भीम ने कहा कि आप सभी सो जाइए, मैं यहां पर पहरा देता हूं। उसी जंगल में एक हिडिंब नाम का राक्षस अपनी बहन हिडिंबा के साथ रहता था। वह इंसानों को खाकर अपनी भूख मिटाता था। उस रात राक्षस ने अपनी बहन हिडिंबा को कहा कि उसे भूख लग रही है। वह किसी इंसान को पकड़ कर लेकर आए। भाई की बात सुनकर हिडिंबा जंगल में यहां-वहां घूमकर किसी मनुष्य को ढूंढने लगी। तभी उसकी नजर भीम पर पड़ी और वह भीम पर मोहित हो गई। उसने मन में सोचा कि अगर मैं विवाह करूंगी, तो इस महापुरुष से ही करूंगी अन्यथा अपने प्राण त्याग दूंगी। यह विचार कर हिडिंबा सुंदर स्त्री का रूप बदल कर भीम के पास गई और विवाह का प्रस्ताव रखा। जब इस बात का पता उसके राक्षस भाई को चला, तो वह अपनी बहन को मारने के लिए दौड़ा। यह देखकर भीम ने राक्षस को रोका और दोनों में जोरदार लड़ाई हुई, जिसमें राक्षस मारा गया। शोर सुनकर कुंती और चारों भाई भी नींद से जाग गए। हिडिंबा ने फिर से भीम को विवाह करने का प्रस्ताव दिया, जिसे भीम ने ठुकरा दिया, लेकिन माता कुंती के समझाने पर हां कर दी। भीम और हिडिंबा का गंधर्व विवाह जंगल में संपन्न हुआ और कुछ समय बाद उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम घटोत्कच रखा गया।

महाभारत की कहानी: भीम और हिडिंबा का विवाह | Bheem Hidimba Ka Vivah Read More »

महाभारत की कहानी: चक्रव्यूह में अभिमन्यु का वध | Mahabharat Abhimanyu Vadh

कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों के बीच 18 दिन तक घमासान युद्ध चला था। एक ओर धर्म के लिए लड़ने वाले पांडव थे, तो दूसरी ओर छल कपट और धोखा देने में माहिर कौरव। उन्होंने छल से युद्ध जीतने के लिए एक रणनीति बनाई। उनकी योजना थी कि वो अर्जुन को युद्ध में उलझाकर चारों भाइयों से दूर ले जाएंगे और फिर युधिष्ठिर को बंदी बनाकर युद्ध जीत लेंगे। अब युद्ध वाले दिन कौरव सेना की एक टुकड़ी अर्जुन से युद्ध करते हुए उन्हें रणभूमि से दूर ले गई। वहीं, गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह की रचना की, जबकि पांडवों में सिर्फ अर्जुन को पता था कि चक्रव्यूह को कैसे तोड़ना है। अर्जुन के दूर जाते ही गुरु द्रोणाचार्य ने पांडवों को ललकारते हुए कहा कि या तो युद्ध लड़ो या फिर हार मान लो। युद्ध के नियम के अनुसार युद्ध लड़ना जरूरी था। यदि युद्ध न करते तो भी हार जाते और युद्ध करते तो भी हार निश्चित थी। अब धर्मराज युधिष्ठिर को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करें और क्या न करें। उसी समय धर्मराज युधिष्ठिर के सामने एक युवक खड़ा हुआ और कहा, “काकाश्री, मुझे चक्रव्यूह को तोड़ने और युद्ध करने का आशीर्वाद दीजिए।” यह युवक कोई और नहीं, बल्कि अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु था। अभिमन्यु अभी मात्र 16 वर्ष का ही था, लेकिन सभी जानते थे कि वह युद्ध कौशल में अपने पिता के जैसा ही निपुण है। युधिष्ठिर ने अभिमन्यु को मना किया, लेकिन अभिमन्यु नहीं माना और उसने कहा, “मुझे चक्रव्यूह तोड़ना आता है। जब मैं अपनी मां के गर्भ में था, तो पिता ने मां को चक्रव्यूह तोड़ने का तरीका बताया था। बस तभी मैंने इसे सीख लिया था। मैं आगे रहूंगा और आप सब मेरे पीछे-पीछे आइए।” हार मानकर युधिष्ठिर ने अभिमन्यु की बात मान ली और सभी युद्ध के लिए तैयार हो गए। सबसे आगे अभिमन्यु था और बाकी सब उसके पीछे। अभिमन्यु को रणक्षेत्र में देखकर कौरव मजाक उड़ाने लगे कि यह छोटा बालक क्या युद्ध करेगा, लेकिन जब उन्होंने अभिमन्यु के युद्ध कौशल को देखा, तो उनके पसीने छूट गए। आगे बढ़ते हुए अभिमन्यु ने दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण काे मार गिराया और चक्रव्यूह में प्रवेश कर गया। उसके चक्रव्यूह में प्रवेश करते ही सिंधू के राजा जयद्रथ ने चक्रव्यूह का द्वार बंद कर दिया, ताकि चारों भाई चक्रव्यूह में प्रवेश न कर पाएं। अभिमन्यु आगे बढ़ता जा रहा था। उसने एक-एक करके सभी योद्धाओं काे हरा दिया, जिनमें स्वयं दुर्योधन, कर्ण और गुरु द्रोण भी शामिल थे। किसी को कोई उपाय समझ नहीं आ रहा था, तभी कौरवों के सभी महारथियों ने एकसाथ मिलकर अभिमन्यु पर हमला कर दिया। किसी ने उसका धनुष तोड़ दिया, तो किसी ने रथ। इसके बावजूद अभिमन्यु नहीं रुका। उसने रथ का पहिया उठाकर युद्ध करना शुरू कर दिया। बडे़-बड़े महारथियों के साथ वीर अभिमन्यु अकेला लड़ता रहा, लेकिन वह अकेला कब तक लड़ता। अंत में सभी ने मिलकर उसकी हत्या कर दी और अभिमन्यु वीर गति को प्राप्त हुआ। अभिमन्यु की मृत्यु के बाद अर्जुन ने प्रतिज्ञा ली कि वह अगले दिन युद्ध में जयद्रथ का वध कर देगा। आज शूरवीर अभिमन्यु का नाम कर्ण और अर्जुन से भी पहले सम्मान के साथ लिया जाता है।

महाभारत की कहानी: चक्रव्यूह में अभिमन्यु का वध | Mahabharat Abhimanyu Vadh Read More »

महाभारत की कहानी: दानवीर कर्ण | Danveer Karan Ki Katha

महाभारत की कथा में कई महान चरित्रों का जिक्र है। उन्हीं में से एक थे दानवीर कर्ण। श्रीकृष्ण हमेशा कर्ण की दानवीरता की प्रशंसा करते थे। वहीं, अर्जुन और युधिष्ठिर भी दान-पुण्य करते रहते थे, लेकिन श्रीकृष्ण कभी उनकी प्रशंसा नहीं करते थे। एक दिन अर्जुन ने श्रीकृष्ण से इसका कारण पूछा। श्रीकृष्ण बोले, “समय आने पर वह यह साबित कर देंगे कि सबसे बड़ा दानवीर सूर्यपुत्र कर्ण है।” कुछ दिनों के बाद एक ब्राह्मण अर्जुन के महल में आया। उसने बताया कि पत्नी की मृत्यु हो गई है। उसके दाह संस्कार के लिए उन्हें चन्दन की लकड़ियों की जरूरत है। ब्राह्मण ने अर्जुन से चंदन की लकड़ी दान में मांगी। अर्जुन ने अपने मंत्री को आदेश दिया कि राजकोष से चन्दन की लकड़ियों का इंतजाम किया जाए, लेकिन उस दिन न तो राजकोष में चंदन की लकड़ियां मिली और न ही पूरे राज्य में। अर्जुन ने ब्राह्मण से कहा, “आप मुझे क्षमा करें, मैं आपके लिए चंदन की लकड़ी का इंतजाम नहीं कर सका।” श्रीकृष्ण इस पूरी घटना को देख रहे थे। उन्होंने ब्राह्मण से कहा, “आपको एक जगह चंदन की लकड़ियां जरूर मिलेगी, आप मेरे साथ चलिए।” श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भी अपने साथ ले लिया। श्रीकृष्ण और अर्जुन ने ब्राह्मण का वेश बनाया और उस ब्राह्मण के साथ कर्ण के दरबार में पहुंचे। वहां भी ब्राह्मण ने कर्ण से चंदन की लकड़ी दान में मांगी। कर्ण ने अपनी मंत्री से चंदन की लकड़ी का इंतजाम करने को कहा। थोड़े समय बाद कर्ण के मंत्री ने कहा कि पूरे राज्य में कहीं चंदन की लकड़ी नहीं मिली। इस पर कर्ण ने अपने मंत्री को आदेश दिया कि उसके महल में चंदन के खंभे हैं, उन्हें तोड़कर ब्राह्मण को दान दिया जाए। मंत्री ने ऐसा ही किया। ब्राह्मण चंदन की लकड़ी लेकर अपनी पत्नी के दाह संस्कार के लिए चला गया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, “देखो तुम्हारे महल के खंभों में भी चन्दन की लकड़ी लगी है, लेकिन तुमने ब्राह्मण को निराश किया। वहीं, कर्ण ने एक बार फिर अपनी दानवीरता का परिचय दिया।” कहानी से सीख दान वो नहीं जो समृद्ध स्थिति में किया जाता है, बल्कि असली दान वो है, जो अभाव होने पर भी किया जा सकता है।

महाभारत की कहानी: दानवीर कर्ण | Danveer Karan Ki Katha Read More »

महाभारत की कहानी: भीष्म पितामह के पांच चमत्कारी तीर

यह बात उस समय की है, जब कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध चल रहा था। पितामह भीष्म कौरवों की ओर से युद्ध लड़ रहे थे, लेकिन कौरवों के सबसे बड़े भाई दुर्योधन को लगता था कि भीष्म पितामह पांडवों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते हैं। दुर्योधन का मानना था कि पितामह भीष्म बहुत शक्तिशाली हैं और पांडवों को मारना उनके लिए बहुत आसान है। इसी सोच में डूबा दुर्योधन, भीष्म पितामह के पास पहुंचा। दुर्योधन ने पितामह से कहा कि आप पांडवों को मारना नहीं चाहते, इसीलिए आप किसी शक्तिशाली हथियार का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। दुर्योधन की बात सुनकर भीष्म बोले, “अगर तुम्हें ऐसा लगता है, तो मैं कल ही पांचों पांडवों को मार गिराऊंगा। मेरे पास पांच चमत्कारी तीर हैं, जिनका उपयोग मैं कल युद्ध में करूंगा।” भीष्म पितामह की बात सुनकर दुर्योधन बोला, “मुझे आप पर भरोसा नहीं है, इसलिए आप ये पांचों चमत्कारी तीर मुझे दे दीजिए। मैं इन्हें अपने कमरे में सुरक्षित रखूंगा।’ भीष्म ने वो पांचों तीर दुर्योधन को दे दिए। दूसरी ओर श्रीकृष्ण को इस बात का पता चल गया। उन्होंने अर्जुन को इस बात की जानकारी दी। अर्जुन यह सुनकर घबरा गया और सोचने लगा कि इस मुसीबत से कैसे बचा जाए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को याद दिलाया कि एक बार तुमने दुर्योधन को गंधर्वो से बचाया था, तब दुर्योधन ने तुमसे कहा था कि इस अहसान के बदले तुम भविष्य में मुझसे कुछ भी मांग सकते हो। यह सही समय है, तुम दुर्योधन से वो पांच चमत्कारिक तीर मांग लाओ। इसी तरह तुम्हारी और तुम्हारे भाइयों की जान बच सकती है। अर्जुन को श्रीकृष्ण की सलाह बिल्कुल सही लगी। उसे दुर्योधन का दिया वचन याद आ गया। ऐसा कहा जाता है कि उस समय सब अपने दिए गए वचन जरूर निभाते थे। वचन तोड़ना नियम के खिलाफ माना जाता था। अर्जुन ने जब दुर्योधन को उसका दिया वचन याद दिलाया और पांच तीर मांगे, तो दुर्योधन मना नहीं कर सका। दुर्योधन ने अपना वचन निभाया और वो तीर अर्जुन को दे दिए। इस तरह श्रीकृष्ण ने अपने भक्त पांडवों की रक्षा की।

महाभारत की कहानी: भीष्म पितामह के पांच चमत्कारी तीर Read More »

महाभारत की कहानी: राजा शिवी चक्रवर्ती | King Shibi Story In Hindi

बहुत समय पहले की बात है, उशीनगर नाम के एक राज्य में एक राजा राज किया करता था। उस राजा का नाम था शिवी। वह एक चक्रवर्ती सम्राट था और अपनी महानता और दयालुता के कारण प्रसिद्ध था। उसकी दया के बारे में ऐसा कहा जाता था कि उसके दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। वह हर किसी की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता। भले ही उसके लिए किसी भी तरह का बलिदान क्यों न देना पड़े। यही कारण था कि उसकी दयालुता के चर्चे पृथ्वी लोक से आगे बढ़कर स्वर्ग तक भी पहुंच गए। जब इस बात का पता देवों के राजा इंद्र को चला, तो उन्होंने मन बनाया कि वह राजा शिवी की परीक्षा स्वयं लेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि क्या वाकई में राजा शिवी इतने ही दयालु हैं या यह उनका महज एक ढोंग है। यह तय करने के लिए उन्होंने एक योजना बनाई और अग्नि देव को भी अपने साथ योजना में शामिल होने का निवेदन किया। राजा इंद्र की बात पर अग्नि देव भी राजा शिवी की परीक्षा लेने के लिए तैयार हो गए। फिर क्या था राजा इंद्र ने एक बाज का रूप धारण किया और अग्नि देव ने एक कबूतर का। दोनों राजा शिवी के दरबार की ओर चल दिए। अग्निदेव कबूतर के रूप में आगे गए और इंद्र बाज के रूप में इस प्रकार उनके पीछे चले कि मानों एक बाज कबूतर का शिकार करने के लिए उसके पीछे उड़ रहा हो। थोड़ी ही देर में अग्निदेव कबूतर के रूप में राजा शिवी के दरबार में पहुंचे और राजा शिवी की जांघ पर बैठ गए। उन्होंने राजा से कहा कि एक बाज उसका शिकार करने के लिए पीछे आ रहा है, वह उसकी जान बचा लें। कबूतर की यह बात सुनकर राजा ने कहा- ‘बिल्कुल भी चिंता न करो। मेरे होते हुए वह बाज तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं पाएगा। मैं तुम्हारी रक्षा करने का वचन देता हूं।’ राजा के वचन देते ही बाज के रूप में इंद्र देव भी शिवी के दरबार में पहुंच गए। उन्होंने राजा शिवी से कहा कि वह कबूतर मेरा शिकार है। उसे मारकर वह अपनी और अपने बच्चों की भूख मिटाएगा। बाज की बात पर राजा ने कहा- ‘मैंने इस कबूतर को वचन दिया है कि मैं इसके प्राणों की रक्षा करूंगा। इसलिए, मैं इसे तुम्हें नहीं दे सकता।’ राजा की यह बात सुनकर बाज बोला- ‘अगर आप इसे मुझे नहीं देंगे, तो मैं और मेरे बच्चे भोजन के अभाव में भूखे रह जाएंगे। इसलिए, इसे तो आपको देना ही होगा।’ बाज की यह बात सुन राजा शिवी थोड़ी देर सोच में पड़ गए और कुछ विचार करने लगे। कुछ देर विचार करने के बाद राजा शिवी ने बाज से कहा- ‘अगर मैं तुम्हें इस कबूतर के वजन के बराबर मांस दे दूं, तो तुम्हारी और तुम्हारे बच्चों की भूख मिट जाएगी। ऐसे में इस कबूतर के प्राण भी बच जाएंगे और मेरा वचन भी बना रहेगा।’ राजा कि इस बात पर बाज के रूप में आए इंद्र देव राजी हो गए, लेकिन उन्होंने राजा के सामने एक शर्त रख दी। बाज ने कहा- ‘महाराज मैं तैयार हूं, लेकिन आपको कबूतर के वजन का मांस अपने शरीर से देना होगा।’ बाज की यह बात सुनकर राजा ने सोचा कि कबूतर का वजन कितना होगा। अगर मैं अपने शरीर से ही इसके वजन के बराबर मांस दे देता हूं, तो इस कबूतर की जान बच जाएगी। यह सोचकर राजा ने अपने एक दरबारी को एक तराजू लाने का आदेश दिया। दरबार में तराजू लाया गया। राजा ने तराजू के एक पलड़े पर कबूतर को रखा और एक चाकू से अपनी जांघ से एक टुकड़ा काट कर तराजू के दूसरे पलड़े पर रख दिया, लेकिन तराजू तनिक भी नहीं हिला। यह देखकर राजा ने एक और टुकड़ा काटकर तराजू पर रखा। उसके बाद भी मांस का टुकड़ा कबूतर के वजन से काफी कम था। उन्होंने धीरे-धीरे कर अपने आधे शरीर के मांस को निकाल कर तराजू पर रख दिया, उसके बाद भी मांस का वजन कबूतर के वजन से कम ही रहा। यह देखकर राजा शिवी बहुत निराश हुए। उन्होंने निश्चय किया कि अब कुछ भी हो जाए, वह अपने वचन का मान रखते हुए कबूतर को बचाएंगे। यह सोचकर वह खुद ही तराजू के पलड़े पर बैठ गए और तराजू पर कबूतर का पलड़ा ऊपर आ गया। राजा ने बाज से कहा- ‘तुम मेरे पूरे शरीर का मांस ले लो और कबूतर को छोड़ दो।’ यह सुनकर इंद्र देव को राजा पर दया आ गई। इंद्र और अग्निदेव अपने असली रूप में आए और कहा- ‘राजा शिवी हम आपकी परीक्षा लेने आए थे और आप इस परीक्षा में सफल रहे। आप वाकई में बहुत ही दयालु और परोपकारी हैं। इस पृथ्वी पर आपकी बराबरी दूसरा और कोई नहीं कर सकता।’ इतना कहते हुए दोनों देव वहां से गायब हो गए। शिवी चक्रवर्ती की कहानी से सीख शिवी चक्रवर्ती की कहानी से सीख मिलती है कि इंसान को किसी भी हाल में दया और परोपकार का साथ नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि जिसमें दया और परोपकार वास करता है, भगवान भी सदैव उसकी मदद के लिए तैयार रहते हैं।

महाभारत की कहानी: राजा शिवी चक्रवर्ती | King Shibi Story In Hindi Read More »

महाभारत की कहानी: भक्त ध्रुव की कथा | Dhruv Ki Kahani

एक बार की बात है, राजा उत्तानपाद थे और उनकी दो रानियां थीं। एक रानी का नाम सुनीति और दूसरी रानी का नाम सुरुचि था। सुनीति बड़ी रानी और सुरुचि छोटी रानी थी। रानी सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव और रानी सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम था। राजा उत्तानपाद का रूझान छोटी रानी सुरुचि के तरफ ज्यादा था, क्योंकि वो दिखने में काफी सुंदर थीं, लेकिन रानी सुरुचि अपनी सुंदरता पर काफी घमंड करती थीं। वहीं, बड़ी रानी सुनीति का स्वभाव सुरुचि से बिल्कुल अलग था। रानी सुनीति काफी शांत और समझदार स्वभाव की थीं। राजा का सुरुचि के तरफ अधिक प्रेम देखते हुए रानी सुनीति दुखी रहती थीं। इसलिए, वह अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त भगवान की पूजा-अर्चना करते हुए बिताती थीं। एक दिन सुनीति के पुत्र ध्रुव अचानक अपने पिता राजा उत्तानपाद के गोद में जाकर बैठ गए। वह अपने पिता के गोद में बैठकर खेल ही रहे थे कि वहां छोटी रानी सुरुचि पहुंच गईं। राजा के गोद में ध्रुव को बैठे देखकर रानी सुरुचि को गुस्सा आ गया। रानी ने ध्रुव को राजा के गोद से नीचे उतारते हुए कहा, ‘तुम राजा के गोद में नहीं बैठ सकते हो, राजा की गोद और सिहांसन पर सिर्फ मेरे पुत्र उत्तम का अधिकार है।’ यह सुनकर ध्रुव को बहुत बुरा लगा। ध्रुव वहां से रोते हुए अपनी मां के पास चला गया। ध्रुव को रोता देख मां काफी चिंतित हो गई और ध्रुव से उसके रोने का कारण पूछा। ध्रुव ने रोते हुए सारी बात बताई। ध्रुव की बात सुनकर मां के आंखों में भी आंसू आ गए। ध्रुव को चुप कराते हुए सुनीति ने कहा, ‘भगवान् की आराधना में बहुत शक्ति है। अगर सच्चे मन से आराधना की जाए, तो भगवान से तुम्हें पिता की गोद और सिंहासन दोनों मिल सकते हैं।’ मां की बात सुनकर ध्रुव ने निर्णय कर लिया कि वह सच्चे मन से भगवान की आराधना करेंगे। ध्रुव अपने महल से भगवान की प्रार्थना करने जगलों की तरफ निकल पड़े। उन्हें रास्ते में ऋषि नारद मिले। छोटे-से ध्रुव को जंगलों की तरफ जाता देख नारद ने उन्हें रोका। नारद ने उनसे पूछा, ‘तुम जंगलों की तरफ क्यों जा रहे हो?’ ध्रुव ने उन्हें बताया कि वो भगवान का ध्यान करने जा रहे हैं। ध्रुव की बात सुनकर नारद ने उन्हें समझाकर राजमहल वापस भेजने की कोशिश की, लेकिन ध्रुव ने उनकी एक न सुनी। ध्रुव के निर्णय के कारण नारद ने ध्रुव को ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करने को कहा। इसके बाद ध्रुव जंगल में जाकर इस मंत्र का जाप करने लगे। उधर नारद ने महाराज उत्तानपाद को ध्रुव के बारे में बताया। बेटे के बारे में सुनकर महाराज का मन चिंतित हो गया। वह ध्रुव को वापस लाना चाहते थे, लेकिन नारद ने कहा ध्रुव प्रार्थना में डूब गया है और अब वह वापस नहीं आएगा। उधर ध्रुव कठोर तपस्या में लगे रहें। कई दिन और महीने गुजर गए, लेकिन ध्रुव प्रार्थना करते रहे। इस बीच ध्रुव की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान हरि ध्रुव के सामने प्रकट हुए। भगवान हरि ने ध्रुव को वरदान देते हुए कहा, ‘तुम्हारी तपस्या से हम बहुत प्रसन्न है, तुम्हें राज सुख मिलेगा। साथ ही तुम्हारा नाम और तुम्हारी भक्ति हमेशा के लिए जानी जाएगी।’ यह कहकर भगवान ने ध्रुव को राजमहल की तरफ भेज दिया। भगवान के दर्शन पाकर ध्रुव भी बहुत खुश हुए और उन्हें प्रणाम कर महल की तरफ चले गए। बेटे को महल वापस आते देख राजा खुश हो गए और उनको अपना पूरा राज्य सौंप दिया। भगवान हरि के वरदान से भक्त ध्रुव का नाम अमर हो गया और आज भी उन्हें आसमान में सबसे ज्यादा चमकने वाले तारे ‘ध्रुव तारे’ के नाम से याद किया जाता है। कहानी से सीख इस कहानी से यही सीख मिलती है कि अगर धैर्य और सच्चे मन से कोई प्रार्थना करे, तो उसकी इच्छा जरूरी पूरी होती है।

महाभारत की कहानी: भक्त ध्रुव की कथा | Dhruv Ki Kahani Read More »

रामायण की कहानी: भगवान राम ने दिया हनुमान को मृत्यु दंड

हनुमान जी को भगवान राम का सबसे प्रिय भक्त माना जाता है। हनुमान जी भगवान राम से बहुत प्रेम करते थे। जब श्री राम अयोध्या के राजा बने तब हनुमान जी दिन रात उनकी सेवा में लगे रहते। एक दिन की बात है श्री राम जी के दरबार में एक सभा चल रही थी। उस सभा में सभी वरिष्ठ गुरु और देवतागण मौजूद थे। चर्चा का विषय था कि राम ज्यादा शक्तिशाली हैं या राम का नाम। सब लोग राम को अधिक शक्तिशाली बता रहे थे और नारद मुनि का कहना था कि राम नाम में ज्यादा ताकत है। नारद मुनि की बात कोई सुन ही नहीं रहा था। हनुमान जी इस चर्चा के दौरान चुपचाप बैठे हुए थे। जब सभा खत्म हुई, तो नारद मुनि ने हनुमान जी से कहा कि ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर वो सब ऋषि मुनियों को नमस्कार करें। हनुमान जी ने पूछा, “ऋषि विश्वामित्र को नमस्कार क्यों न करूं?” नारद मुनि ने जवाब दिया, “वो पहले राजा हुआ करते थे, इसलिए उन्हें ऋषियों में मत गिनो।” नारद जी कहने पर हनुमान जी ने ऐसा ही किया। हनुमान जी सबको नमस्कार कर चुके थे और उन्होंने विश्वामित्र को नमस्कार नहीं किया। इस बात पर ऋषि विश्वामित्र क्रोधित हो गए और उन्होंने राम से कहा कि इस गलती के लिए हनुमान को मौत की सजा दें। श्री राम अपने गुरु विश्वामित्र का आदेश नहीं टाल सकते थे, इसलिए उन्होंने हनुमान को मारने का निश्चय कर लिया। हनुमान जी ने नारद मुनि से इस संकट का समाधान पूछा। नारद ने कहा, “आप बेफिक्र होकर राम नाम का जाप करना शुरू करें।” हनुमान जी ने ऐसा ही किया। वो आराम से बैठकर राम नाम का जाप करने लगे। श्रीराम ने उन पर अपना धनुष बाण तान दिया। साधारण तीर हनुमान जी का बाल भी बांका न कर सके। जब हनुमान जी पर श्री राम के तीरों का कोई असर नहीं हुआ तो उन्होंने ब्रह्माण्ड के सबसे शक्तिशाली शस्त्र ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया, लेकिन राम नाम जपते हुए हनुमान पर ब्रह्मास्त्र का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा। बात को बढ़ता देख नारद मुनि ने ऋषि विश्वामित्र से हनुमान जी को क्षमा करने को कहा। तब जाकर विश्वामित्र ने हनुमान जी को क्षमा किया।

रामायण की कहानी: भगवान राम ने दिया हनुमान को मृत्यु दंड Read More »

रामायण की कहानी: लक्ष्मण जी नहीं सोए 14 साल

रामचंद्र जी को जब उनके पिता दशरथ राजपाट सौंपने वाले थे, तभी उनकी दूसरी पत्नी कैकेयी को उनकी दासी मथंरा ने खूब भड़काया। मंथरा ने कहा कि राजा तो आपके बेटे भरत को बनना चाहिए। इसके बाद कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वर मांगे, पहला भरत को गद्दी मिलनी चाहिए और दूसरा राम को 14 वर्ष तक वन में रहना होगा। राजा दशरथ को अपनी पत्नी के वर पूरे करने पड़े। जब रामचंद्र जी वनवास के लिए अयोध्या से निकले, तब लक्ष्मण जी ने भी उनके साथ जाने की इच्छा जाहिर की। लक्ष्मण के वन जाने की बात सुनकर उनकी पत्नी उर्मिला भी साथ जाने की जिद करने लगती है। तब लक्ष्मण अपनी पत्नी उर्मिला को समझाते हैं कि वह अपने बड़े भाई और मां समान भाभी सीता की सेवा करने के लिए जा रहे हैं। अगर तुम वनवास में साथ चलोगी, तो मैं ठीक तरह से सेवा नहीं कर पाऊंगा। लक्ष्मण के सेवा भाव को देखकर उर्मिला साथ जाने की जिद छोड़ देती है और महल में ही रुक जाती है। वन में पहुंचकर लक्ष्मण, भगवान राम और सीता के लिए एक कुटिया बनाते हैं। जब राम और सीता कुटिया में विश्राम करते थे, तब लक्ष्मण बाहर पहरेदारी करते थे। वनवास के पहले दिन जब लक्ष्मण पहरेदारी कर रहे थे, तब उनके सामने निद्रा देवी प्रकट हुईं। लक्ष्मण ने निद्रा देवी से वरदान मांगा कि वह 14 साल तक निद्रा मुक्त रहना चाहते हैं। निद्रा देवी ने कहा कि तुम्हारे हिस्से की नींद किसी और को लेनी होगी। लक्ष्मण कहते हैं कि उनके हिस्से की नींद उनकी पत्नी को दे दें। इस कारण लक्ष्मण 14 साल तक नहीं सोए और उनकी पत्नी उर्मिला लगातार 14 वर्ष तक सोती रही। 14 वर्ष बाद जब भगवान राम और माता सीता के साथ जब लक्ष्मण अयोध्या वापस आए, तब नींद की अवस्था में रामचंद्र जी के राजतिलक समारोह में उर्मिला भी उपस्थित थी। यह देख लक्ष्मण को हंसी आती है। जब लक्ष्मण से हंसी की वजह पूछी गई, तो उन्होंने निद्रा देवी के वरदान के बारे में सब कुछ बताया। लक्ष्मण ने कहा कि जब मैं उबासी लूंगा, तब उर्मिला की नींद खुलेगी। लक्ष्मण जी की इस बात को सुनकर सभा में मौजूद सभी हंस पड़े। सभी को हंसते देख उर्मिला लज्जावश समारोह से उठकर बाहर चली जाती हैं।

रामायण की कहानी: लक्ष्मण जी नहीं सोए 14 साल Read More »

रामायण की कहानी: कुंभकरण की नींद

रामायण में रावण के भाई कुम्भकरण की भूमिका भी अद्भुत है। वो अपने विशाल शरीर और अपनी भूख से ज्यादा अपनी गहरी नींद के लिए जाना जाता था। माना जाता है कि राक्षस वंश का होने के बावजूद कुम्भकरण बुद्धिमान और बहादुर था। उसकी ताकत से देवराज इंद्र भी ईर्ष्या करते थे। एक बार रावण, कुम्भकरण और विभीषण एक साथ ब्रह्मदेव की तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने के लिए कहा। वहीं, दूसरी ओर इंद्र को डर था कि कुम्भकरण वरदान में कहीं स्वर्ग का सिंहासन न मांग लें। इस बात से डरकर, इंद्र ने मां सरस्वती से कुम्भकरण के वरदान के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की। मां सरस्वती ने कुम्भकरण की जीभ बांध दी, जिससे कुम्भकरण के मुख से इंद्रासन की जगह निंद्रासन निकल गया। इससे पहले कि कुम्भकरण को अपनी गलती का अहसास होता, ब्रह्मा तथास्तु बोल चुके थे। रावण सब कुछ समझ गया था, उसने ब्रह्मा से उनके दिए हुए वरदान को वापस लेने के लिये कहा। ब्रह्मा ने एक शर्त के साथ उस वरदान को वापस लिया कि कुम्भकरण 6 माह सोएगा और 6 माह तक जागता रहेगा। इस बात को रावण ने मान लिया। कहा जाता है कि जब राम-रावण का युद्ध हो रहा था, तब कुम्भकरण सो रहा था। उसे जगाने की कोशिश की गई, बहुत प्रयास करने के बाद ही वो नींद से जागा था।

रामायण की कहानी: कुंभकरण की नींद Read More »

सावन का पहला व्रत, जानें क्यों होता है सावन में दाढ़ी व बाल कटवाना वर्जित?

भगवान शिव का सबसे प्रिय सावन हिंदू पंचांग के अनुसार 14 जुलाई गुरुवार से शुरू होने वाला है। सावन का त्योहार 12 अगस्त तक रहेगा। इस साल सावन में चार सोमवार पड़ेंगे। पहला सोमवार का व्रत 18 जुलाई को रखा जाएगा। सावन का त्यौहार शिव भक्तों के लिए सबसे खास होता है। सावन के महीने में शिव भक्त भगवान शिव की भक्ति में लीन हो जाते हैं। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में भगवान शिव की विधि विधान से पूजा करने पर भगवान शिव हर मनोकामना पूरी करते हैं। सावन के सोमवार में कुछ लोग पूरा सावन व्रत भी रखते हैं। ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो करना वर्जित माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन कार्यों को करने से भगवान शिव नाराज हो जाते हैं। आइए जातने हैं आखिर क्यों इन कार्यों को करना सावन के महीने में वर्जित माना जाता है। दाढ़ी व बाल काटना माना जाता है अशुभ हिंदू शास्त्रों के अनुसार सावन के महीने में बाल काटना व दाढ़ी बनाना वर्जित माना जाता है। अगर आप सावन का व्रत रख रहे हैं तो नियमित रूप से शिवजी के मंदिर जाकर पूजा पाठ करें और सावन के महीने में बाल काटने व दाढ़ी बनाने से बचें। इसके अलावा सावन के महीने में नाखून काटना व शरीर पर तेल मालिश करना भी वर्जित बताया गया है। माना जाता है कि ऐसा करने से ग्रह दोष लगता है और सावन में रखा गया व्रत भी फलदाई नहीं होता है। सब पर नहीं होता यह नियम लागू हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि सावन का महीना धार्मिक कार्य के लिए महत्वपूर्ण है। इस महीने में बहुत से लोग कावड़ चढ़ाने जाते हैं। बहुत से धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं, इसलिए अनुष्ठान तथा कावड़ का कार्य जब तक पूरा नहीं होता तब तक लोग दाढ़ी बाल नहीं कटवाते हैं और ना ही नाखून काटते हैं। ज्योतिष के अनुसार दाढ़ी और बाल काटने का नियम सभी पर लागू नहीं होता है। यह स्वैच्छिक है अनिवार्य नहीं।

सावन का पहला व्रत, जानें क्यों होता है सावन में दाढ़ी व बाल कटवाना वर्जित? Read More »