MYTHOLOGICAL STORIES

शिव का रहस्य

महाशिवपुराण जैसे अनेक ग्रंथ जहाँ हमें शिव सागर की गहराइयों में ले जाते हैं। वहीं भगवान शिव के अनगिनत रहस्यों से परिचित कराते है़। आज भगवान शिव के रहस्यों से आपको हम परिचित करायेंगे। पशुपति नाथ की अदभुत लीला को जानकर हर कोई भगवान महाकाल के चरणों में नतमस्तक हो जाता है़। क्योंकि तीनों लोकों के स्वामी भगवान गंगा धर वास्तव में बहुत महिमामयी हैं। जिनकी महिमा आज तक कोई जान न पाया। महादेव के त्रिशूल के वार से जहाँ दानव थर-थर काँपते थे। वहीं उनका तांडव नृत्य प्रलयंकारी है़ और उनके तीसरे नेत्र का खुलना तो पूरी सृष्टि के लिए विनाशकारी है़। अपना डमरू बजाकर सबको मंत्र मुग्ध करने वाले भोले बाबा आज भी  कैलाश पर्वत पर धूनी रमाये तपस्या में लीन हैं। कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के अवतरण की कथा यह शाश्वत सत्य है़ कि जो जन्म नहीं लेता उसकी मृत्यु भी नहीं होती। त्रिनेत्रधारी भगवान शिव एक ऐसे ही भगवान हैं, जो अनादिकाल से अस्तित्व में हैं और अनंतकाल तक रहेंगे। यदि शिव इस धरती पर नहीं आते तो पृथ्वी पर बड़ी उथल-पुथल हो जाती। ब्रम्हा जी और विष्णु जी के सृष्टि निर्माण की सारी योजना विफल हो जाती। भगवान शिव को धरती पर लाने के पीछे क्या उद्देश्य था ? हम उसकी चर्चा करेंगे। आखिर परम पिता परमेश्वर को भगवान शिव के रूप में प्रकट करने के पीछे ब्रम्हा जी और विष्णु भगवान की क्या मंशा थी। यह बड़ी रोचक कथा है़। भगवान शिव कब और कैसे इस धरती पर प्रकट हुये, यह पौराणिक घटना हर किसी को आश्चर्य चकित करने वाली है़। हिन्दू धर्म के तीन प्रमुख देवताओं में ब्रह्मा, विष्णु और महेश अर्थात भगवान शिव का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। जिसमें ब्रह्मा जी को सृजक, विष्णु जी को रक्षक और भगवान शिव को संहारक कहा जाता है। कहा जाता है कि इस सृष्टि की रचना से भी पहले सर्वप्रथम परमेश्वर विष्णु जी के रूप में प्रकट हुए फिर उनके नाभिकमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। योजना के अनुसार भगवान ब्रह्मा जी सृजन करते रहे और विष्णु जी संरक्षण प्रदान करते रहे। लेकिन एक दिन ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने विचार किया कि यदि इसी तरह हम दोनों सृष्टि के लिए सृजन और रक्षा का कार्य करते रहे और बीच-बीच में विनाश नहीं हुआ तो यह जगत (ब्रह्माण्ड) असंतुलित हो जायेगा। इस ब्रह्माण्ड का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए उन्हें अब ऐसे देव की आवश्यकता थी जो विनाशकारी देवता हों। तब ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु ने आपस मे मंत्रणा की और योजना के अनुसार कैलाश पर्वत पर जाकर परमपिता परमेश्वर की तपस्या में लीन हो गये। कैलाश पर्वत पर जाकर ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु ने प्रणव यानी ॐ मंत्र का जाप करना आरंभ कर दिया। वह मंत्र पूरे कैलाश पर्वत पर गूंजने लगा। ॐ मंत्र के प्रभाव से कैलाश पर्वत पर एक इन्द्रधनुषी रंग बिखर गया। जिसकी आभा बड़ी दिव्य थी। पढ़िए कथा आदि शंकराचार्य जी की कैलाश पर्वत पर ध्यान मुद्रा में बैठकर ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने लगभग 21 वर्षों तक ओम का उच्चारण किया। देखते ही देखते आसमान में घटायें  घिरने लगीं। बिजली कड़कने लगी। आकाशीय बिजली की आवाज इतनी तेज थी कि कैलाश पर्वत की जीव- जंतु वहाँ से भाग निकले। चारों तरफ एक भयभीत कर देने वाला वातावरण उत्पन्न हो गया था। अब तक जो  वहाँ इन्द्रधनुषी रंग बिखरा हुआ था। वह  गायब हो चुका था। उसका स्थान नील वर्ण ने ले लिया था। अब आकाश का नीला रंग था जिसमें एक चमकदार रौशनी छिटकी हुई थी। अब कैलाश पर्वत पर कोई नहीं था। केवल ब्रह्मा जी और विष्णु जी आश्चर्य से आकाश की तरफ देख रहे थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आज क्या होने वाला है। तभी आसमान में एक विशालकाय आकृति ने अपना रूप लेना आरंभ कर दिया। इस विशालकाय आकृति के केश इतने बड़े थे कि नभ में चारों तरफ अंधेरा छा गया, क्योंकि परमपिता परमेश्वर, देवों के देव महादेव के रूप में, ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के सामने प्रकट हो चुके थे। ब्रम्हा जी और भगवान विष्णु के मुख पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु की अपेक्षा के अनुकूल भगवान शिव की उत्पत्ति हो चुकी थी। लेकिन भगवान शिव के केशों के कारण चारों ओर अंधकार था। तब भगवान विष्णु ने चंद्रदेव को आदेश दिया कि भगवान शिव के मस्तक पर धारण हों जायें। चंद्रदेव भगवान विष्णु का आदेश पाकर शिव के मस्तक पर धारण हो गये, जिससे चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश हो गया। यह प्रकाश था एक अभूतपूर्व शक्ति का जिसकी सृष्टि के लिए नितांत आवश्यकता थी। इस प्रकार भगवान शिव की उत्पत्ति ॐ से हुई। देवी सती क्यों चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान शिव से हो ? देवी सती दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं। वह बहुत सुंदर और बुद्धिमान थीं। एक दिन उन्हें स्वप्न में कैलाश पर्वत दिखाई दिया। उस कैलाश पर्वत पर भगवान शिव विराजमान थे। उनका भव्य स्वरूप देखकर देवी सती उन पर मोहित हो गईं और उन्हें ही अपना स्वामी बनाने की बात सोंची। एक दिन देवी सती ने इस बात जिक्र अपने पिता दक्ष से किया। लेकिन उनके पिता को भगवान शंकर का फक्कड़ स्वरूप पसंद नहीं था। लेकिन सती न मानी। क्योंकि वह मन ही मन भगवान शिव को अपना वर मान चुकीं थीं। इसलिए देवी सती ने भगवान शिव की आराधना आरंभ कर दी। जब उनके पिता दक्ष प्रजापति को इस बात की जानकारी मिली तो वह अत्यंत क्रोधित हुये। उन्होंने अपनी बेटी सती को बहुत समझाने का प्रयास किया । लेकिन सती टस से मस न हुईं। वे रात- दिन भगवान शिव की तपस्या में लीन रहने लगीं। एक दिन जब सती भगवान शिव की पूजा में तल्लीन थीं। तब उनके पिता दक्ष प्रजापति ने सोंचा कि आज वह स्वयं उनकी तपस्या भंग कर देंगे। यह सोच कर वह उस स्थान पर पहुँचे जहाँ सती आराधना कर रहीं थीं। लेकिन उस स्थान पर पहुँच कर राजा दक्ष प्रजापति ने जो कुछ देखा तो आश्चर्य चकित रह गये। उन्होंने देखा कि उनकी बेटी सती जिस स्थान पर भगवान शिव के ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप

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पौराणिक रहस्य कथा

हमारे पौराणिक ग्रंथों को रचते समय विद्वान लेखकों ने ऐसे-ऐसे हैरतअंगेज रहस्यों का उल्लेख किया है़ कि जिसको जानने के बाद हर कोई आश्चर्य में पड़ जाता है़। तब सभी के मन में कौतूहल जन्म ले लेता है़ और हृदय में यही सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या ऐसा भी हो सकता है ? कहते हैं कि जब गोस्वामी तुलसीदास जी अपना ‘राम चरित मानस’ ग्रंथ लिखते- लिखते अरण्य कांड पर पहुँच गए थे। तब वह अरण्य कांड में सीता हरण वाले प्रसंग में पहुंचकर बड़े गंभीर सोच में पड़ गए। क्योंकि एक तरफ तो उन्हें अपना ग्रंथ पूरा करना था और दूसरी तरफ माता सीता की पवित्रता को गंगा की तरह निर्मल बनाये रखना था। अब वे अजीबोगरीब अनेक प्रकार के विचारों के जाल में उलझ गये। तब आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उस समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने विज्ञान का सहारा लिया। कहते हैं कि उन्होंने विज्ञान से जुड़ी हुईं तमाम पुस्तकों के पन्नों को पलट डाला। मानस मर्मज्ञ काव्या नंदन कहती हैं कि उन्होंने विज्ञान का विस्तार से अध्ययन ही नहीं किया बल्कि एक अनोखा शोध कार्य भी कर डाला। कहते हैं कि जिस रहस्य के बारे में लक्ष्मण जी को भी पता नहीं था, गोस्वामी तुलसी दास जी ने अपने ‘राम चरित मानस’ में विज्ञान के उस अनूठे रहस्य का सहारा लिया। निश्चय रूप से अरण्य कांड पढ़ते समय आपने यह दोहा अवश्य पढ़ा होगा कि लक्ष्मणहुँ यह मरम ना जाना । जा कुछ चरित रचा भगवाना ।। दरअसल गोस्वामी तुलसीदास जी इन दोनों पंक्तियों में रामचरितमानस के गूढ़ रहस्य को उजागर करना चाहते हैं। कहते हैं कि लक्ष्मण जी को भी उस रहस्य के बारे में जानकारी नहीं थी, जिस रहस्य की गाथा पहले ही विधाता लिख चुके थे। पुराणों में वर्णित है़ कि रामचरित मानस के अरण्य कांड में लंका पति रावण जब सीता जी का हरण करने आया तो उसकी यह पहली गलती नहीं थी बल्कि गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार यह उसका दूसरा दुस्साहस था। उसकी इस दूसरी गलती के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी लंकापति रावण की इस दुष्ट सोंच से छल पूर्वक निपटना चाहते थे, क्योंकि कहा जाता है़ कि इसी रावण ने एक बार ब्रह्म ऋषि कुश ध्वज की विद्वान पुत्री देवी वेदवती का भी शील भंग करने का प्रयास किया था, एवं उनके केशों को पकड़ कर घसीटा था। तब अपने अपमान से क्रोधित एवं दुखी होकर देवी वेदवती ने योगविद्या द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया था। कहते हैं कि स्वयं को अग्नि में समर्पित करते-करते वेदवती ने संकल्प ले लिया था कि वह एक न एक दिन इस दुष्ट रावण से उसके इस दुस्साहस का प्रतिशोध अवश्य लेगी। कहते हैं कि अपना मानव जीवन त्याग देने के पश्चात भी वेदवती जीवात्मा के रूप में अग्निदेव की शरण में रही, और लंकापति रावण से, अपने पति भगवान् विष्णु (वेदवती ने भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तप किया था एवं वे उन्हें मन ही मन अपना पति मान चुकी थी) द्वारा प्रतिशोध लेने के बाद ही मुक्ति प्राप्त की । लंकापति रावण जिस सीता जी को हरण करके ले गया वे सीता न होकर उनका क्लोन था गोस्वामी तुलसी दास जी के अनुसार अब वह समय आ चुका था जब रावण के बल को छल पूर्वक निपटा जाये। तब 14 वर्ष के वनवास के दौरान पंचवटी में सीताहरण के पूर्व अग्नि देव से प्रार्थना की गई वह लंकापति रावण को दण्ड देने के लिए सहायता करें। दरअसल अग्नि देव के पास अभी तक ब्रह्म ऋषि कुश ध्वज की पुत्री वेदवती की जीवात्मा समाहित थी। उस समय यह योजना बनायी गयी कि ब्रह्म ऋषि कुश ध्वज की पुत्री वेदवती की जीवात्मा को किसी तरह सीता जी के क्लोन में प्रविष्ट करा दिया जाये और असली सीता जी को कहीं छिपा दिया जाये। ताकि सीता जी 14 वर्ष के वनवास में सुरक्षित रह सकें और वनवास के पश्चात श्री राम के पास सकुशल पहुंचाया जा सके। पौराणिक रहस्य कथा, जिसे कम ही लोग जानते हैं कहते हैं कि तब ब्रह्मा जी ने सीता जी की उंगली से कोशिका लेकर सीता जी के सदृश्य ही एक पुतला तैयार कर दिया और योजना के अनुसार वेदवती की जीवात्मा को सीता जी के पुतले में प्रविष्ट करा दिया गया। इस प्रकार जब वन में पंचवटी कुटिया में श्री राम और श्री लक्ष्मण जी के जाने के बाद जो नारी अकेली आश्रम में रह गईं वह सीता जी न होकर उनकी क्लोन थी। क्योंकि असली सीता जी तो अग्नि देव के शरण में पहुंच गई थी । फिर विधाता को वेदवती द्वारा रावण से प्रतिशोध लेने के प्रण को पूरा जो कराना था। इसलिए उन्होंने रावण द्वारा सीता जी नहीं बल्कि उनके पुतले में स्थापित वेदवती की जीवात्मा का हरण करा दिया। उन वेदवती नामक देवी (जो स्वयं महामाया का ही अंश थीं) ने लंका पहुंचकर रावण के नाकों चने चबवा दिये। रावण क्यों भय खाता था सीता जी के पास जाने से  रामचरितमानस के कई प्रसंगों में सीता जी के क्लोन का रहस्य उजागर होता है। इस बात का तो पुराणों में स्पष्ट वर्णन भी किया गया है कि लंका पति रावण ने सीता जी को अपने महाद्वीप लंका में अशोक वाटिका में कैद करके रखा था । कहते हैं कि रावण जब भी सीता जी पर अत्याचार करने के लिए आगे कदम बढ़ाता था तो धरती में से एक अग्नि-ज्वार फूट पड़ता था, जिसमें भस्म हो जाने के भय से रावण वापस भाग जाता था । सीता जी के आस -पास अग्नि का पहरा होने का एक कारण यह भी बताया जाता है कि सीता जी के क्लोन मे रहने वाली देवी वेदवती की जीवात्मा के साथ सदैव अग्नि देव रहते थे। क्योंकि ब्रह्म ऋषि की पुत्री वेदवती, मृत्यु के पश्चात (जीवात्मा रूप में) उन्हीं अग्नि देव में समाहित थीं। कहते हैं कि एक बार दुष्ट रावण ने सीता जी को मार डालने का प्रयास किया । लेकिन उसी समय सीता जी के काया के अंदर उपस्थित विद्वान देवी वेदवती ने एक अमोघ महा मंत्र पढ़कर दुष्ट रावण की तरफ फेंका। जिसके कारण वह घास के तिनके के समान छिटक कर दूर जा गिरा। इसीलिए

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हनुमान जी की कथा-हनुमान

हनुमान जी की कथा-हनुमान वानरराज केसरी और अप्रतिम सुंदरी अंजना को शिव की कृपा से पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम अंजनेय था। अंजना को अपने पुत्र को छोड़कर वापस स्वर्ग जाना था। अंजनेय दुःखी थे। उन्होंने अपनी माँ से कहा, “माँ, तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूँगा? मैं क्या खाऊँगा?  अंजना ने प्यार से अपने पुत्र से कहा, “जब तुम्हें भूख लगेगी तब सूर्य की तरह लाल और पके फल तुम्हारा पोषण करेंगे।” अंजनेय ने सोचा, “सूर्य की तरह लाल और पका फल…? क्या सूर्य इतना पका फल है?” बालक अंजनेय ने सूर्य को खाने का सोचा। दैवीय बालक होने के कारण अंजनेय ने एक छलांग लगाई और सूर्य को पकड़ने के लिए उड़ने लगे।  सूर्य भगवान ने एक बंदर को अपनी ओर आता देखा। उसका आकार बढ़ता ही जा रहा था और सूर्य की तेज किरणों का उसपर कोई असर नहीं हो रहा था। सूर्य ने इन्द्र देव को सहायता के लिए पुकारा।  आसमान में अचानक काले बादल छा गए और सूर्य उसके पीछे छिप गए। इन्द्र अपने एरावत हाथी पर सवार होकर आए और उड़ते हुए बंदर से बोले, “ठहरो, कौन हो तुम? सूर्य को क्यों पकड़ना चाहते हो? अंजनेय ने कोई उत्तर नहीं दिया और अपना मुँह खोलकर सूर्य को निगल गए। संसार में अंधकार व्याप्त हो गया।  इन्द्र चिल्लाए, “नटखट बंदर, मैं तुम्हें सबक सिखाऊँगा।” यह कहकर उन्होंने अंजनेय के गाल पर वज्र प्रहार किया। सूर्य आज़ाद हो गए और अंजनेय का आकार छोटा होकर शरीर धरती पर गिर पड़ा। उनके गाल सूजकर दोगुने हो गए थे।  अंजनेय के अभिभावक, तथा जीवनदाता वायु देव ने छोटे बालक को अपने हाथों में उठाया और पाताल-लोक लेकर चले गए।  धरती वायुरहित हो गई। पशु-पक्षी- पौधे सबका दम घुटने लगा। सूर्य ने इन्द्रदेव से कहा, “हमें वायु देव से पृथ्वी पर आने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।” इन्द्र स्वयं पाताल लोक गए। वहाँ वायुदेव ने अंजनेय से उनका परिचय कराया। यह अंजना का पुत्र तथा शिव का अवतार… आपने इसे चोट कैसे पहुँचाई?”  क्षमाप्रार्थी इन्द्र ने कहा, “हे वायु देव, मेरी भूल की सजा पशु, मानव और पौधों को न दें। कृपया धरती पर वापस चलें।”  अपनी शक्ति से इन्द्र ने अंजनेय को ठीक कर दिया और आशीर्वाद देते हुए कहा, “तुम सदा जीवित रहोगे, तुम्हारी मृत्यु कभी नहीं होगी। मैंने तुम्हारे हनु (गाल) पर प्रहार किया था अतः अब से तुम साहसी हनुमान कहलाओगे।”  इस प्रकार अंजनेय हनुमान कहलाए। 

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भगवान शिव की कहानी-स्वयंभू और उनकी तीसरी आँख

भगवान शिव की कहानी-स्वयंभू और उनकी तीसरी आँख हिन्दू धर्म में तीन प्रमुख देव हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश, जो त्रिदेव के नाम से जाने जाते हैं। इन त्रिदेवों में ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और महेश अर्थात् शिव विनाश करते हैं।  हजारों वर्ष पूर्व की स्वर्ग की यह बात है… एक बार ब्रह्मा और विष्णु वार्ता में लीन थे तभी ब्रह्मा ने कहा, “हे विष्णु! सृष्टि का निर्माता होने के कारण मुझे यह सोचकर ही अच्छा लगता है कि मैं आपसे श्रेष्ठ हूँ।”  विष्णु भगवान ने इसे न माना और चुटकी लेते हुए कहा, “ब्रह्मदेव! निश्चय ही आपने सृष्टि की रचना करी है पर उसके पालन की भी तो आवश्यकता है और वह मेरा कार्य है… अतः निश्चित रूप से मेरा कार्य बड़ा और उत्तरदायित्वपूर्ण हुआ न…”  ब्रह्मा को कुतूहल हुआ। उन्होंने पूछा, “विष्णुदेव! आपका तात्पर्य क्या है?” मधुर मुस्कान के साथ विष्णु भगवान ने कहा, “यही कि मैं आपसे श्रेष्ठ ही नहीं श्रेष्ठतर  ब्रह्मा विष्णु से सहमत न हुए। दोनों अपनी-अपनी महत्ता और प्रभुता का बखान करते रहे। उत्तेजना बढ़ने लगी। तभी अचानक एक विशालकाय स्तम्भ उनके समक्ष प्रकट हुआ जिसे देखकर दोनों अवाक रह गए।  ब्रह्मा ने कहा, “अरे! यह क्या है? यह कहाँ से आ गया?” “क्या पता? मैंने भी इसे पहले नहीं देखा है…” आश्चर्यचकित विष्णु ने कहा।  ध्यान से स्तम्भ को निहारते हुए विष्णु ने पुनः कहा, “ब्रह्मदेव! आपने ध्यान दिया क्या… इस स्तम्भ के आदि  और अंत का तो पता ही नहीं चल रहा है…”  “अरे हाँ! आदि और अंत के बिना स्तम्भ?” ब्रह्मा सोच में पड़ गए।  सुझाव देते हुए विष्णु ने कहा, “ठीक है, चलिए ढूँढते हैं… मैं पक्षी का रूप धारण करता हूँ और आप जानवर का रूप धरे… दोनों मिलकर अन्वेषण करते हैं।” ऐसा निर्णय कर विष्णु ने हंस का रूप धरा और स्तम्भ की ऊँचाई ढूँढने उड़ चले। ब्रह्मा ने वराह (सूअर) का रूप धरा और स्तम्भ की जड़ पृथ्वी खोदकर ढूँढने लगे। कई वर्ष व्यतीत हो गए पर उन्हें स्तम्भ की थाह न मिली। असफल होकर दोनों वापस लौट आए।  विष्णु भगवान ने कहा, “ब्रह्मदेव! कितनी आश्चर्यजनक बात है… यह स्तम्भ मीलों तक ऊपर गया हुआ है… मुझे तो इसका छोर नहीं मिला, क्या आप सफल हुए?”  “विष्णुदेव, यहाँ भी वही हाल है। यह तो कोई रहस्यमय स्तम्भ लगता है जिसके मूल का कोई पता ही नहीं है…” ब्रह्मदेव ने स्वीकारा।  ब्रह्मा और विष्णु वार्ता में लीन थे तभी उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से शिव भगवान को स्तम्भ से प्रकट होते देखा। दोनों अचंभित थे… यह स्तम्भ उनकी समझ से परे था। शिव भगवान को देखकर दोनों ने उनके ब्रह्माण्डीय विराट शक्ति का लोहा माना जो कि उन दोनों की शक्ति से कहीं अधिक थी।  संस्कृत में शिव भगवान को स्वयंभू कहा गया है जिसका अर्थ है ‘स्वयं प्रकट हुआ’।  इस प्रकार प्रकट हुए शिव जी के तीन नेत्र हैं, गले में सर्प लिपटा हुआ है, वे जटाधारी हैं जिस पर अर्धचंद्राकार चाँद शोभता है और वहीं से गंगा नदी का उद्गम है। वल्कल के रूप में बाघ की खाल पहन रखा है और सम्पूर्ण शरीर पर राख का लेप लगा रहता है।  सृष्टि की बुराइयों का अंत करने के कारण शिव को ‘विनाशक’कहा गया है। इन्हीं के द्धारा युगों का अंत होता है। शिव नटराज के रूप में ताण्डव करते हैं, उनके तृतीय नेत्र से निकली हुई अग्नि सृष्टि की बुराइयों का नाश कर देती है और फिर एक नए युग का प्रारम्भ होता है। 

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गंगा जन्म की कहानी

गंगा नदी के धरती पर अवतरण, उनके अस्तित्व और शिव जी के संबंध में कई कथाएँ हैं। उनमें से प्रसिद्ध कथा यह बताती है कि गंगा नदी का उद्गम देवी पार्वती के पसीने से हुआ था।  पिछली कथा में हमने पढ़ा कि किस प्रकार देवी पार्वती ने अपने हाथों से शिव भगवान की आँखें बंद कर दी थीं जिससे संसार में अंधकार छा गया था और शिव भगवान ने अपने तृतीय नेत्र से जग उजागर कर दिया था।  जब देवी पार्वती ने अचानक तृतीय नेत्र एवं उसके प्रकाश को देखा तो वह भयभीत हो उठीं। उन्होंने झट से शिवजी की आँखों से अपने हाथ हटा लिए। ताप और घबराहट के कारण उनके हाथों से पसीने की बूंदें निकलकर नीचे गिरने लगी और गंगा नदी में बदल गईं। आगे चलकर नदी की कई शाखाएँ हो गईं और सारी पृथ्वी जलमग्न होने लगी। यह देखकर ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र घबराए हुए शिव भगवान के पास गए और प्रार्थना करने लगे, “हे महादेव! यह धरती पर क्या हो रहा है? नदी तो सारी सृष्टि को जलमग्न कर रही है… इसे कैसे रोका जाए?”  देवों को सांत्वना देकर शिव भगवान ने पूरी नदी को सोखकर अपनी जटा में रख लिया। अब जल के अभाव में तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। फलतः सभी देव पुनः शिव भगवान से जाकर प्रार्थना करने लगे, “हे महादेव! सम्पूर्ण नदी आपकी जटाओं में समाहित है… तीनों लोकों के लिए जल की तो आवश्यकता है… कृपया जल देने की अनुकंपा करें…”  शिव भगवान ने कहा, “एवमस्तु!”  तत्पश्चात् उन्होंने गंगा के एक भाग को मुक्त किया। इस प्रकार वैकुण्ठ में गंगा विरजा नदी के रूप में, सत्यलोक में मानस तीर्थ तथा इन्द्रलोक में देवगंगा के रूप में आईं। गंगा नदी के धरती पर अवतरण तथा शिव भगवान ने कैसे उन्हें अपनी जटाओं में संभाला इस बारे में एक अन्य कथा भी है। भागवत पुराण की यह कथा गंगा को वामन अवतार से जोड़ती है। उसके अनुसार धरती मापते समय वामन के पैर का नाखून धरती में घुस गया और वहीं से गंगा नदी का उद्गम हुआ। तीनों लोकों से होती हुई गंगा बह्मलोक पहुँचीं। बाद में राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को मुक्ति दिलाने राजा भगीरथ गंगा को ब्रह्मलोक से शिवजी की जटाओं से होते हुए पृथ्वी पर लाए।

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नौवें दिन होती है मां सिद्धिदात्री की पूजा

साथ ही मां सिद्धिदात्री की कृपा से महादेव का आधा शरीर देवी की हो गई थी और वह अर्धनारीश्वर कहलाए। नवरात्र के नौवें दिन इनकी पूजा के बाद ही नवरात्र का समापन माना जाता है। नवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा करने के लिए नवाहन का प्रसाद और नवरस युक्त भोजन और नौ प्रकार के फल फूल आदि का अर्पण करके नवरात्र का समापन करना चाहिए। मां दुर्गा के नौवें स्वरूप को सिद्धिदात्री के नाम से जाना जाता है, जिनकी चार भुजाएं हैं। इनका आसन कमल और वाहन सिंह है। दाहिने और नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा, बाई ओर से नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प है। भगवती के इस स्वरूप की ही हम नवरात्र के अंतिम दिन आराधना करते हैं। मां दुर्गा के इस रूप को शतावरी और नारायणी भी कहा जाता है। शतावरी और नारायणी दुर्गा के सभी प्रकारों की सिद्धियों को देने वाली मां की पूजा का आरंभ निम्न श्लोक से करना चाहिए देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:। अर्थात हे मां! सर्वत्र विराजमान और मां सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं। हे मां, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ। मां सिद्धिदात्री अंतिम ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवदुर्गाओं में मां सिद्धिदात्री अंतिम हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए मुश्किल नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

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आठवें दिन होती है मां महागौरी की पूजा, जानें पूजा विधि, मंत्र और कथा

महागौरी की कथामाता की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको गंगा में स्नान करने के लिए कहा। जिस समय माता पार्वती गंगा में स्नान करने गईं, तब देवी का एक स्वरूप श्याम वर्ण के साथ प्रकट हुईं, जो कौशिकी कहलाईं और एक स्वरूप उज्जवल चंद्र के समान प्रकट हुआ, जो महागौरी कहलाईं नवरात्रि के हर दिन माता के अलग रूप की पूजा की जाती है. आठवें दिन मां महागौरी का पूजन होता है. यहां जानिए मां महागौरी का आशीर्वाद पाने के लिए उनके पूजन की विधि, मंत्र और कथा. का आठवां दिन मां महागौरी को समर्पित होता है. महागौरी के तेज से ही सम्पूर्ण विश्व प्रकाशमान होता है. माता महागौरी के पूजन से सौभाग्य की प्राप्ति होती है और समस्त पापों का नाश होता है. कहा जाता है कि जब माता पार्वती ने महादेव को प्राप्त करने के लिए तपस्या किया, तो उनका रंग काफी काला हो गया था. महादेव ने जब उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया तो उनके रंग को फिर से गौर बना दिया. तब से माता को महागौरी भी कहा जाने लगा. माता महागौरी वृषभ की सवारी करती हैं, उनके चार हाथ हैं. उनके एक हाथ में त्रिशूल है, एक हाथ वरमुद्रा में है, एक हाथ अभय मुद्रा में है और एक हाथ में डमरू है. माता गौरी अपने भक्तों को बल, बुद्धि देने के साथ-साथ नकारात्मकता दूर करती है. जानिए मां महागौरी की पूजा विधि, मंत्र और कथा. महागौरी की पूजा विधि सुबह जल्दी स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें. इसके बाद कलश पूजन और गणपति समेत सभी देवी देवताओं का पूजन करने के बाद मां महागौरी की पूजा करें. माता को पंचामृत से स्नान कराएं. उन्हें गुड़हल का फूल चढ़ाएं. रोली, कुमकुम, अक्षत, सिंदूर, पान, सुपारी, धूप, दीप, पान, सुपारी, लौंग का जोड़ा, इलायची, बताशा आदि अर्पित करें. माता का शृंगार करके सफेद मिठाई का भोग लगाएं. इसके बाद माता के मंत्रों का जाप करें, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और कथा पढ़ें. इसके बाद आरती करके क्षमा याचना करें. इन मंत्रों का जाप करें 1. या देवी सर्वभूतेषु महागौरी रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: 2. श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बराधरा शुचि:, महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा. 3. ॐ देवी महागौर्यै नम: मां महागौरी की कथा पौराणिक कथा के मुताबिक पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के बाद मां पार्वती ने महादेव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था. इस दौरान माता हजारों वर्षों तक निराहार रहीं. तप के प्रभाव से माता का शरीर काला पड़ गया. जब महादेव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए तो उन्होंने मां पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया और माता के शरीर को गंगा के पवित्र जल से कांतिमय बना दिया. इसके बाद माता का रंग एकदम साफ हो गया. तब से माता को महागौरी के रूप में भी जाना जाने लगा. (यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)

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सातवें दिन होती है माता कालरात्रि की पूजा, पढ़ें विधि और व्रत कथा

इसे सुनेंभगवान शिव ने माता से अनुरोध किया। इसके बाद मां पार्वती ने स्वंय शक्ति व तेज से मां कालरात्रि को उत्पन्न किया। इसके बाद जब मां दुर्गा ने दैत्य रक्तबीज का अंत किया और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को मां कालरात्रि ने जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया। इस रूप में मां पार्वती कालरात्रि कहलाई। मां कालरात्रि की पूजा अर्चना करने से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. नवरात्र का सातवां दिन हैं. इस दिन शक्ति के रूप मां दुर्गा के सातवें स्वरूप माता कालरात्रि की पूजा की जाती है. मां कालरात्रि को काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, चंडी आदि नामों से भी जाना जाता है. मान्यता है कि मां कालरात्रि की पूजा अर्चना करने से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. साथ ही जीवन में आने वाली सभी बाधाएं भी दूर हो जाती हैं. ऐसे करें देवी की पूजा इस दिन भी सुबह जल्दी उठकर स्नान कर साफ कपड़े धारण करें. सबसे पहले गणपति बप्पा की अराधना करें.  फिर माता कालरात्रि की पूजा में अक्षत, धूप, रातरानी के पुष्प, गंध, रोली, चंदन का इस्तेमाल करते हुए उनका पूजन करें. मां को पान, सुपारी भेंट करें. घी या कपूर जलाकर मां कालरात्रि की आरती करें और कथा सुनें. देवी कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाएं देवी कालरात्रि का मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः या देवी सर्वभू‍तेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। मां की कथादेवी भागवत पुराण (Bhagwat puran) के अनुसार, मां कालरात्रि का शरीर अंधकार की तरह काला है, सिर के बाल बिखरे हुए हैं, गले में बिजली की तरह चमकने वाली एक माला है. मां के तीन नेत्र हैं जो ब्रह्मांड की तरह बिल्कुल गोल और विशाल हैं. मां की चार भुजाएं हैं जिसमें एक हाथ में उन्होंने तलवार, दूसरे में लौह अस्त्र, तीसरा हाथ अभय मुद्रा में और चौथा वरमुद्रा में है. मां कालरात्रि का वाहन गर्दभ है. ऐसी मान्यता है कि मां अपने इस स्वरूप में भक्तों को अकाल मृत्यु से बचाती हैं.  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, दुर्गासुर नामक राक्षस कैलाश पर्वत पर देवी पार्वती की अनुपस्थिति में हमला करने की कोशिश कर रहा था. उससे निपटने के लिए देवी पार्वती ने कालरात्रि को भेजा लेकिन वह राक्षस लगातार विशालकाय होता जा रहा था. तब देवी ने अपने आप को और भी अधिक शक्तिशाली बनाया और शस्त्रों से सुसज्जित हुईं. उसके बाद उन्होंने दुर्गासुर को मार गिराया. इसी कारण उन्हें दुर्गा कहा गया. मां कालरात्रि की आरती काल के मुंह से बचाने वाली दुष्ट संहारिणी नाम तुम्हारा महा चंडी तेरा अवतारा पृथ्वी और आकाश पर सारा महाकाली है तेरा पसारा खंडा खप्पर रखने वाली दुष्टों का लहू चखने वाली कलकत्ता स्थान तुम्हारा सब जगह देखूं तेरा नजारा सभी देवता सब नर नारी गावे स्तुति सभी तुम्हारी रक्तदंता और अन्नपूर्णा कृपा करे तो कोई भी दुःख ना ना कोई चिंता रहे ना बीमारी ना कोई गम ना संकट भारी उस पर कभी कष्ट ना आवे महाकाली मां जिसे बचावे तू भी ‘भक्त’ प्रेम से कह कालरात्रि मां तेरी जय

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नवरात्रि के छठे दिन होती है मां कात्यायनी की पूजा, जानें देवी मां की आरती, मंत्र, भोग व कथा

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा करने का विधान है. कात्यायनी देवी दुर्गा जी का छठा अवतार हैं. शास्त्रों के अनुसार देवी ने कात्यायन ऋषि के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया, इस कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ गया. दिव्य रुपा कात्यायनी देवी का शरीर सोने के समाना चमकीला है. मां दुर्गा का छठवां रूप मां कात्यायनी है जो ज्वलंत स्वरूप को प्रदर्शित करती हैं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर मां कात्यायनी की पूजा विधि अनुसार की जाती है। कहा जाता है कि मां कात्यायनी की पूजा करने से शक्ति प्राप्त होती है। इतना ही नहीं मां कात्यायनी अपने भक्तों को सुख और समृद्धि का भी वरदान देती हैं। मां कात्यायनी की तेजोमय छवि की पूजा आराधना करने से सफलता और प्रसिद्धि भी मिलती है। जानकारों के मुताबिक, मां कात्यायनी का मंत्र अत्यंत प्रभावशाली और शक्तिशाली होता है। विधि अनुसार मां कात्यायनी की पूजा करने से वह प्रसन्न होती हैं। मां कात्यायनी की पूजा में लाल गुलाब अवश्य अर्पित करना चाहिए। अगर लाल गुलाब संभव ना हो तो भक्त कोई भी लाल फूल अर्पित कर सकते हैं।  अगर आप भी मां कात्यायनी की पूजा कर रहे हैं तो यहां जाने उनकी आरती, मंत्र, कथा और भोग। मां कात्यायनी आरती,  मां कात्यायनी की आरती जय जय अंबे, जय कात्यायनी।  जय जगमाता, जग की महारानी। बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वहां वरदाती नाम पुकारा।  कई नाम हैं, कई धाम हैं। यह स्थान भी तो सुखधाम है। हर मंदिर में जोत तुम्हारी। कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी। हर जगह उत्सव होते रहते। हर मंदिर में भक्त हैं कहते। कात्यायनी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की। झूठे मोह से छुड़ाने वाली। अपना नाम जपाने वाली। बृहस्पतिवार को पूजा करियो। ध्यान कात्यायनी का धरियो। हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी। जो भी मां को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे। मां कात्यायनी बीज मंत्र:क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नमः मां कात्यायनी के मंत्र:1. ॐ देवी कात्यायन्यै नमः।। 2. एत्तते वदनम साओमय्म लोचन त्रय भूषितम।पातु न: सर्वभितिभ्य, कात्यायनी नमोस्तुते।। मां कात्यायनी की कथा बहुत समय पहले महर्षि कात्यायन मां दुर्गा की तपस्या करते थे। उनकी तपस्या और श्रद्धा देखकर मां दुर्गा ने उन्हें यह वरदान दिया था कि वह उनकी पुत्री के रूप में उनके घर में जन्म लेंगी। मां दुर्गा ने जो वरदान दिया था वह पूरा हुआ और महर्षि कात्यायन के आश्रम में मां दुर्गा का जन्म हुआ। त्रिदेवों के तेज से देवी दुर्गा की उत्पत्ति हुई थी। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर मां दुर्गा ने ऋषि कात्यायन के घर में जन्म लिया था। जब देवी दुर्गा का जन्म हुआ था तब ऋषि ने मां दुर्गा की तीन दिनों तक पूजा की थी। इसी बीच महिषासुर राक्षस लोगों को अत्यधिक परेशान कर रहा था जिसका संहार मां कात्यायनी ने किया था।  मां कात्यायनी का भोग: मां कात्यायनी को लाल रंग बेहद प्रिय है और उन्हें प्रसन्न करने के लिए लाल गुलाब अवश्य चढ़ाना चाहिए। इसके साथ भोग लगाने के लिए मां कात्यायनी को शहद अर्पित करना चाहिए।

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पांचवें दिन होती है स्कंदमाता की पूजा, जानिए कथा, आरती, मंत्र और सभी संबंधित जानकारी

नवरात्रि में पांचवें दिन इस देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। कहते हैं कि इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम से अभिहित किया गया है। इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा होती की जाती है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजमान है। इन माता की चार भुजाएं हैं। माता ने अपने दो हाथ में कमल का फूल पकड़ा हुआ है। इनकी एक भुजा ऊपर की तरफ उठी हुई है। एक हाथ से अपने पुत्र स्कंद को पकड़ा हुआ है। सिंह इनका वाहन है। जानिए मां अम्बे के इस स्वरूप की कैसे करें पूजा, ये हैं मंत्र, आरती और कथा… स्कंदमाता की आरती जय तेरी हो अस्कंध मातापांचवा नाम तुम्हारा आतासब के मन की जानन हारीजग जननी सब की महतारीतेरी ज्योत जलाता रहू मैहरदम तुम्हे ध्याता रहू मैकई नामो से तुझे पुकारामुझे एक है तेरा सहाराकही पहाड़ो पर है डेराकई शेहरो मै तेरा बसेराहर मंदिर मै तेरे नजारेगुण गाये तेरे भगत प्यारेभगति अपनी मुझे दिला दोशक्ति मेरी बिगड़ी बना दोइन्दर आदी देवता मिल सारेकरे पुकार तुम्हारे द्वारेदुष्ट दत्य जब चढ़ कर आयेतुम ही खंडा हाथ उठायेदासो को सदा बचाने आई‘चमन’ की आस पुजाने आई स्कंदमाता की कथा पहाड़ों पर रहकर सांसारिक जीवों में नवचेतना का निर्माण करने वालीं स्कंदमाता। नवरात्रि में पांचवें दिन इस देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। कहते हैं कि इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम से अभिहित किया गया है। इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं। इस देवी की चार भुजाएं हैं। ये दाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं। नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बाईं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है। इनका वर्ण एकदम शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। सिंह इनका वाहन है। यह देवी विद्वानों और सेवकों को पैदा करने वाली शक्ति है। यानी चेतना का निर्माण करने वालीं। कहते हैं कालिदास द्वारा रचित रघुवंशम महाकाव्य और मेघदूत रचनाएं स्कंदमाता की कृपा से ही संभव हुईं। स्कंदमाता की पूजा से मिलता है ये वरदान जिन लोगों को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो, उन्हें मां के इस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। आदिशक्ति का यह स्वरूप संतान प्राप्ति की कामना पूर्ण करनेवाला माना गया है। स्कंदमाता की पूजा में कुमार कार्तिकेय का होना जरूरी होता है। स्कंदमाता को इन चीजों का लगाएं भोग… स्‍कंदमाता को भोग स्‍वरूप केला अर्पित करना चाहिए। मां को पीली वस्‍तुएं अति प्रिय होती हैं, इसलिए केसर डालकर खीर बनाएं और उसका भी भोग लगा सकते हैं। जो भक्त देवी स्कंद माता का भक्ति-भाव से पूजन करते हैं उसे देवी की कृपा प्राप्त होती है। देवी की कृपा से भक्त की मुराद पूरी होती है और घर में सुख, शांति एवं समृद्धि रहती है। मां के इस स्वरूप का ध्यान मंत्र यह है… सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।। या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। मां को प्रसन्न करने के लिए क्या करें? स्कंदमाता की पूजा में धनुष बाण अर्पित करने का विशेष महत्व है। इन्हें सुहाग का सामान अर्पित करना चाहिए। नवरात्र के पांचवें दिन लाल वस्‍त्र में सुहाग की सभी सामग्री लाल फूल और अक्षत के समेत मां को अर्पित करने से महिलाओं को सौभाग्‍य और संतान की प्राप्ति होती है।  स्कंदमाता से मिलता है ज्ञान का आशीर्वाद… मां की कृपा से बुद्धि का विकास होता है और ज्ञान का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मां की कृपा से पारिवारिक शांति की प्राप्ति होती है। मां की आराधना से शुभता की प्राप्ति होती है।    कैसे करें स्कंदमाता की पूजा –  नवरात्रि के पांचवें दिन सबसे पहले स्‍नान करें और स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें।– पूजा स्‍थान में चौकी पर स्‍कंदमाता की तस्‍वीर या प्रतिमा स्‍थापित करें।– प्रतिमा का गंगाजल से शुद्धिकरण करें।– अब एक कलश में पानी लेकर उसमें कुछ सिक्‍के डालें और उसे चौकी पर रखें।– इसके बाद स्‍कंदमाता को रोली-कुमकुम लगाएं और नैवेद्य अर्पित करें।– अब मां की आरती उतारें।– आरती के बाद घर के सभी लोगों को प्रसाद बांटें।– इस दिन आप श्‍वेत कपड़े पहनकर मां को केले का भोग लगाएं। मान्‍यता है क‍ि ऐसा करने से मां निरोगी रहने का आशीर्वाद देती हैं।    स्‍कंद माता का रूप… स्‍कंदमाता की चार भुजाएं हैं। दाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा से उन्‍होंने अपने पुत्र स्कंद को गोद में पकड़ा हुआ है। नीचे वाली भुजा में कमल का फूल है। बाईं तरफ ऊपर वाली भुजा वरदमुद्रा में है और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है। इनका वर्ण एकदम गौर है। ये कमल के आसन पर विराजमान हैं और इनकी सवारी शेर है।    स्कंदमाता का कवच… ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता।उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥   स्कंदमाता का इन मंत्रों से करें ध्यान… वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥  स्कंदमाता पूजा विधि (Skandamata Puja Vidhi) : नवरात्रि के पांचवें दिन की पूजा में श्वेत रंग का प्रयोग करें। इस दिन पूजा करने से बुध ग्रह से संबंधित दोष दूर होते हैं। इस दिन माता को केले का भोग लगाना चाहिए। स्कंदमाता की पूजा का श्रेष्ठ समय दिन का दूसरा पहर माना जाता है। इनकी पूजा में चंपा के फूलों का इस्तेमाल करना चाहिए। इन्हें हरे रंग की चूड़ियां चढ़ानी चाहिए। इनकी उपासना से बुद्धि प्राप्त होती है। नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता (skandamata) की पूजा होती है मां स्कंदमाता के मंत्र – सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।–

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देवी चंद्रघंटा की साधना से मिलता है यह लाभ, जगाएं अपने अंदर माता की शक्तियों को

माता का तीसरा स्वरूपनवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन मां चंद्रघंटा को दूध का भोग चढ़ाएं और उसे जरूरतमंद को दान कर देना चाहिए। ऐसा करने से धन-वैभव और ऐशवर्य की प्राप्ति होती है। नवरात्रि की तृतीय देवी चन्द्रघंटा मणिपुर चक्र पर विराज कर मानव सृष्टि से भय का उन्मूलन कर साहस और ऊर्जा का संचार करती है। यह शक्ति तृतीय चक्र पर विराज कर ब्रह्माण्ड से दसों प्राणों को संतुलित करती है और महाआकर्षण प्रदान करती है। मानव शरीर में चन्द्रघण्टा के जागृत न होने से कैंसर, मधुमेह, उच्चरक्तचाप और ख़राब पाचन की समस्या का जन्म होता है। माता चंद्रघंटा को अपने अंदर जागृत करने के लिए इस ध्यान मंत्र का नियमित जप करना चाहिए। पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥ हमारे मणिपुर चक्र अर्थात् नाभि चक्र पर विराजने वाली वाली ऊर्जा चंद्रघंटा जीवन के ढेरों सुगंधों और ब्रम्हाण्डिय ध्वनियों के संग अपने हाथों में धारण किए हुए कमल के रूप में कीचड़ में भी पवित्रता व स्निग्धता तथा अनेक लक्ष्य के साथ भी एकजुटता की द्योतक हैं। यह भय से मुक्त करके अभय प्रदान करती है। नवरात्रि के तीसरे दिन पूजित चंद्रघण्टा के ललाट पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र स्थापित है इसलिए इस शक्ति को चंद्रघंटा के नाम से जाना जाता है। मणिपुर चक्र देह में चक्र व्यवस्था का तृतीय चक्र है। जो नाभि के पीछे केंद्रित है। यह देह का आग्नेय केंद्र या मार्तण्ड केंद्र भी कहलाता है क्योंकि इसका आधार तत्व रोहिताश्व अर्थात् अग्नि है। देह में चंद्रघण्टा के प्रतिपादन कर मणिपुर चक्र के बोध से स्वाधिष्ठान चक्र की निषेधात्मक प्रवृत्तियां उड़न छू हो जाती हैं। चंद्रघण्टा के स्पंदन से मनुष्य में स्पष्ट और उचित निर्णय की क्षमता पूर्ण चमक व धमक के साथ प्रकट होती है और व्यक्ति में बौद्धिक क्षमता का विकास, स्वयं पर विश्वास व ज्ञान के प्रकाश का संचार होता है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति में उत्तम गुणों के साथ अंतर्मन में आनंद का अप्रतिम संचार होने लगता है और मानव किसी महामानव सा अपना ही नहीं सबका बेड़ा पार करने की क्षमता से ओत-प्रोत हो जाता है। यह चक्र स्फूर्ति का केन्द्र है। चंद्रघण्टा के अंतर्मन में जागृत होते ही जीवन से भय का नाश होने लगता है।अगर देह में चंद्रघंटा जागृत न हों तो अग्नाशय और पाचक तंत्र की प्रक्रिया प्रभावित होती है और पाचन बिगड़ जाता है, परिसंचारी रोग, मधुमेह और रक्तचाप में असंतुलन जैसे कई विकार तकलीफ देने लगते हैं। नाभि चक्र के बाधित होने से ही व्यक्ति को भय और अवसाद का अनुभव होता है। भयभीत होने पर नाभि के आसपास हलचल और गुड़गुड़ को आप स्पष्ट रूप से महसूस कर सकते हैं। नाभि चक्र का प्रतीक रंग पीला प्रतिनिधि मेष यानी मेढ़ा और प्रतीक चिह्न शीर्ष बिंदु वाला त्रिभुज है। दस पंखुडिय़ों वाला यह चक्र दस प्राणों को यथा प्राण, व्यान, अपान, समान, उदान, कूर्म, क्रीकल, शेषनाग, देवदत्त व धनंजय को प्रतिबिम्बित करती है। इसका मंत्र है रं। चंद्रघण्टा के जागृत होने से व्यक्ति अनिद्रा और चिंता से निर्मुक्त होकर आनंद, ज्ञान, बौद्धिकता, साफ़गोई और अपने सटीक फ़ैसले से जग जीत लेता है।

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नवरात्र का चौथा दिनः इसलिए कुम्हड़े की बलि से प्रसन्न होती है मां कूष्मांडा

आज शारदीय नवरात्र का चौथा दिन है। इस दिन दुर्गा के नौ रुपों में से चतुर्थ रुप देवी कूष्मांडा की पूजा होती है। देवी कुष्मांडा को देवी भागवत् पुराण में आदिशक्ति के रुप में बताया गया है। इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है। यहां निवास करने की शक्ति और क्षमता सिर्फ देवी कूष्मांडा में ही है।इनके अंगों की कांति सूर्य के समान ही उज्जवल है। देवी कूष्मांडा के प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं। माता की आठ भुजाएं हैं इसलिए यह अष्टभुजा देवी भी कहलाती हैं। माता अपने हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत से भरा कलश, गदा, चक्र और जपमाला धारण करती हैं। मां कुष्मांडा का वाहन सिंह है। सृष्टि निर्माण के समय माता कूष्मांडा अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करती हैं इसिलए इनका नाम कूष्मांडा है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ भी कहते हैं। जो भक्त माता को कुम्हड़े की बलि प्रदान करते हैं माता उससे प्रसन्न होती है। देवीभाग्वत् पुराण में क्या कहा गया है देवी कूष्मांडा के बारे में देवी पुराण में बताया गया है कि सृष्टि के आरंभ से पहले अंधकार का साम्राज्य था। उस समय आदि शक्ति जगदम्बा देवी कूष्मांडा के रुप में वनस्पतियों एवं सृष्टि की रचना के लिए जरूरी चीजों को संभालकर सूर्य मण्डल के बीच में विराजमान थी। सृष्टि रचना का जब समय आया तब इन्होंने ही ब्रह्मा विष्णु एवं भगवान शिव की रचना की।इसके बाद सत्, रज और तम गुणों से तीन देवियों को उत्पन्न किया जो सरस्वती, लक्ष्मी और काली रूप में प्रकट हुई। सृष्टि चलाने में सहायता प्रदान करने के लिए आदि शक्ति ने ब्रह्मा जी को सरस्वती, विष्णु को लक्ष्मी एवं शिव को देवी काली सौंप दिया। आदि शक्ति की कृपा से ही ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता बने, विष्णु पालनकर्ता और शिव संहारकर्ता। नवरात्र में देवी कूष्मांडा की पूजा का रहस्य पुराणों में मौजूद कथा के अनुसार तारकासुर के आतंक से जगत को मुक्ति दिलाने के लिए यह जरुरी था कि भगवान शिव के पुत्र का जन्म हो। इसलिए भगवान शिव ने देवी पार्वती से विवाह किया।देवी पार्वती से जब देवों ने तारकासुर से मुक्ति के लिए प्रार्थना की तब माता ने अपने आदिशक्ति रुप को प्रकट किया और यह बताया कि जल्दी ही कुमार कार्तिकेय का जन्म होगा और वह तारकासुर का वध करेगा।मां का आदिशक्ति रुप देखकर देवताओं की शंका और चिंताओं का निदान हुआ। मां इस रुप में भक्तों को यह बताती है कि जो भी भक्त मां कूष्मांडा का ध्यान पूजन करता है उसकी सारी समस्याएं और कष्ट दूर हो जाते हैं। इसलिए नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होती है। कुष्मांडा माता को देवी दुर्गा का चौथा स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुष्मांडा माता का यह रूप देवी पार्वती के विवाह से लेकर कार्तिकेय की प्राप्ति के बीच का है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, कुष्मांडा माता ने अपने अंदर से ब्राह्मण की रचना की, जिसकी वजह से माता के इस स्वरूप का नाम कुष्मांडा पड़ा। नवरात्रि के चौथे दिन पूजा कैसे करें   नवरात्रि के चौथे दिन सुबह जल्दी उठकर कुष्मांडा माता की पूजा करें। माता की पूजा करने के लिए सबसे पहले हाथ में फूल ले और माता के मंत्र का जाप करें। पूजा में मां को लाल रंग का पुष्प, गुड़हल या गुलाब, सिंदूर, धूप, गंध, भोग चढ़ाए। सफेद कुम्हड़े( पेठे का फल) की बलि माता को अर्पित करें, इसके बाद माता को मालपुए, दही और हलवे का भोग लगाएं।  सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।। ध्यान वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम् ।। भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम् ।। पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम् ।। प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्। कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ।। कूष्मांडा देवी का ध्यान मंत्र वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥ भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥ पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्। कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

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