MYTHOLOGICAL STORIES

नवरात्र का चौथा दिनः इसलिए कुम्हड़े की बलि से प्रसन्न होती है मां कूष्मांडा

आज शारदीय नवरात्र का चौथा दिन है। इस दिन दुर्गा के नौ रुपों में से चतुर्थ रुप देवी कूष्मांडा की पूजा होती है। देवी कुष्मांडा को देवी भागवत् पुराण में आदिशक्ति के रुप में बताया गया है। इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है। यहां निवास करने की शक्ति और क्षमता सिर्फ देवी कूष्मांडा में ही है।इनके अंगों की कांति सूर्य के समान ही उज्जवल है। देवी कूष्मांडा के प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं। माता की आठ भुजाएं हैं इसलिए यह अष्टभुजा देवी भी कहलाती हैं। माता अपने हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत से भरा कलश, गदा, चक्र और जपमाला धारण करती हैं। मां कुष्मांडा का वाहन सिंह है। सृष्टि निर्माण के समय माता कूष्मांडा अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करती हैं इसिलए इनका नाम कूष्मांडा है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ भी कहते हैं। जो भक्त माता को कुम्हड़े की बलि प्रदान करते हैं माता उससे प्रसन्न होती है। देवीभाग्वत् पुराण में क्या कहा गया है देवी कूष्मांडा के बारे में देवी पुराण में बताया गया है कि सृष्टि के आरंभ से पहले अंधकार का साम्राज्य था। उस समय आदि शक्ति जगदम्बा देवी कूष्मांडा के रुप में वनस्पतियों एवं सृष्टि की रचना के लिए जरूरी चीजों को संभालकर सूर्य मण्डल के बीच में विराजमान थी। सृष्टि रचना का जब समय आया तब इन्होंने ही ब्रह्मा विष्णु एवं भगवान शिव की रचना की।इसके बाद सत्, रज और तम गुणों से तीन देवियों को उत्पन्न किया जो सरस्वती, लक्ष्मी और काली रूप में प्रकट हुई। सृष्टि चलाने में सहायता प्रदान करने के लिए आदि शक्ति ने ब्रह्मा जी को सरस्वती, विष्णु को लक्ष्मी एवं शिव को देवी काली सौंप दिया। आदि शक्ति की कृपा से ही ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता बने, विष्णु पालनकर्ता और शिव संहारकर्ता। नवरात्र में देवी कूष्मांडा की पूजा का रहस्य पुराणों में मौजूद कथा के अनुसार तारकासुर के आतंक से जगत को मुक्ति दिलाने के लिए यह जरुरी था कि भगवान शिव के पुत्र का जन्म हो। इसलिए भगवान शिव ने देवी पार्वती से विवाह किया।देवी पार्वती से जब देवों ने तारकासुर से मुक्ति के लिए प्रार्थना की तब माता ने अपने आदिशक्ति रुप को प्रकट किया और यह बताया कि जल्दी ही कुमार कार्तिकेय का जन्म होगा और वह तारकासुर का वध करेगा।मां का आदिशक्ति रुप देखकर देवताओं की शंका और चिंताओं का निदान हुआ। मां इस रुप में भक्तों को यह बताती है कि जो भी भक्त मां कूष्मांडा का ध्यान पूजन करता है उसकी सारी समस्याएं और कष्ट दूर हो जाते हैं। इसलिए नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होती है। कुष्मांडा माता को देवी दुर्गा का चौथा स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुष्मांडा माता का यह रूप देवी पार्वती के विवाह से लेकर कार्तिकेय की प्राप्ति के बीच का है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, कुष्मांडा माता ने अपने अंदर से ब्राह्मण की रचना की, जिसकी वजह से माता के इस स्वरूप का नाम कुष्मांडा पड़ा। नवरात्रि के चौथे दिन पूजा कैसे करें   नवरात्रि के चौथे दिन सुबह जल्दी उठकर कुष्मांडा माता की पूजा करें। माता की पूजा करने के लिए सबसे पहले हाथ में फूल ले और माता के मंत्र का जाप करें। पूजा में मां को लाल रंग का पुष्प, गुड़हल या गुलाब, सिंदूर, धूप, गंध, भोग चढ़ाए। सफेद कुम्हड़े( पेठे का फल) की बलि माता को अर्पित करें, इसके बाद माता को मालपुए, दही और हलवे का भोग लगाएं।  सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।। ध्यान वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम् ।। भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम् ।। पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम् ।। प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्। कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ।। कूष्मांडा देवी का ध्यान मंत्र वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥ भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥ पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्। कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

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द्वितीय नवरात्रि : माँ ब्रह्मचारिणी की पूजन विधि और पौराणिक कथा ?

नवरात्रि के द्वितीय दिवस माँ के ब्रह्मचारिणी स्वरुप की अर्चना की जाती है। माँ बह्मचारिणी माँ दुर्गा का अत्यंत शांत एवं तपस्वी स्वरुप है, माता के इस स्वरुप की आराधना से भक्तों का जीवन सफल हो जाता है। ब्रह्मचारिणी दो शब्दों का मिलान है- ‘ब्रह्म’ और ‘चारिणी’, ब्रह्म का अर्थ है तपस्या तथा चारिणी अर्थात आचरण करने वाली। माता भगवती के तपस्वी आचरण के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया है, देवी का यह स्वरुप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं भव्य है।  हिन्दू मान्यताओं के अनुसार देवी त्याग और तपस्या का प्रतिरूप हैं, उन्हें वेद-शास्त्र आदि की ज्ञाता भी माना जाता है। माता ब्रह्मचारिणी के वस्त्र धवल हैं तथा उनके दाएं हाथ में अष्टदल कमल एवं बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित है। उनका यह दिव्य स्वरुप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देता है, उनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार एवं संयम की वृद्धि होती है। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा प्राप्त होने से मनुष्य को जीवन में विजय प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा :- देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। एक हजार वर्ष इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को भी छोड़ने के कारण ही इनका नाम अपर्णा पड़ गया।कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की, यह आप से ही संभव थी। आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ, जल्द ही आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं।मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी व्रत कथानारदजी की सलाह पर उन्होंने कठोर तप किया, ताकि वे भगवान शिव को पति स्वरूप में प्राप्त कर सकें। कठोर तप के कारण उनका ब्रह्मचारिणी या तपश्चारिणी नाम पड़ा। भगवान शिव की आराधना के दौरान उन्होंने 1000 वर्ष तक केवल फल-फूल खाए तथा 100 वर्ष तक शाक खाकर जीवित रहीं। कठोर तप से उनका शरीर क्षीण हो गया। ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ पर ज्योति का ध्यान करें या उसी चक्र पर अर्ध चन्द्र का ध्यान करें। – मां ब्रह्मचारिणी के लिए “ऊं ऐं नमः” का जाप करें और फलाहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। भक्तों को मां ब्रह्मचारिणी को खुश करने के लिए इस मंत्र का जाप करना चाहिए। या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। अर्थ: हे मां! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है। स्तोत्र पाठ :- तपश्चारिणीत्वंहितापत्रयनिवारिणीम्।ब्रह्मरूपधराब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्घ्नवचक्त्रभेदनी त्वंहिनवऐश्वर्यप्रदायनीम्।धनदासुखदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्घ्शंकरप्रियात्वंहिभुक्ति-मुक्ति दायिनी।शान्तिदामानदा,ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्। कवचत्रिपुरा में हृदयेपातुललाटेपातुशंकरभामिनी।अर्पणासदापातुनेत्रोअर्धरोचकपोलोघ्पंचदशीकण्ठेपातुमध्यदेशेपातुमहेश्वरीघ्षोडशीसदापातुनाभोगृहोचपादयो।

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नवरात्रि के दूसरे दिन पढ़े मां ब्रह्मचारिणी की पौराणिक कथा

आज शारदीय नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा का दिन होता है। बता दें कि ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां का ये रूप अपने भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। शास्त्रों में ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानि तप का आचरण करने वाली बताया गया है। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं। चलिए जानते हैं इनका कथा के बारे में- मान्यता है कि पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।  कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।  कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है।

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तपस्या का फल

तपस्या का फल भगवान शंकर को पति के रूप में पाने हेतु माता-पार्वती कठोर तपस्या कर रही थी। उनकी तपस्या पूर्णता की ओर थी। एक समय वह भगवान के चिंतन में ध्यान मग्न बैठी थी। उसी समय उन्हें एक बालक के डुबने की चीख सुनाई दी। माता तुरंत उठकर वहां पहुंची। उन्होंने देखा एक मगरमच्छ बालक को पानी के भीतर खींच रहा है। बालक अपनी जान बचाने के लिए प्रयास कर रहा है, तथा मगरमच्छ उसे आहार बनाने का। करुणामयी मां को बालक पर दया आ गई। उन्होंने मगरमच्छ से निवेदन किया कि बालक को छोड़ दीजिए इसे आहार न बनाएं। मगरमच्छ बोला माता यह मेरा आहार है मुझे हर छठे दिन उदर पूर्ति हेतु जो पहले मिलता है, उसे मेरा आहार ब्रह्मा ने निश्चित किया है। माता ने फिर कहा आप इसे छोड़ दे इसके बदले मैं अपनी तपस्या का फल दुंगी। ग्राह ने कहा ठीक है। माता ने उसी समय संकल्प कर अपनी पूरी तपस्या का पुण्य फल उस ग्राह को दे दिया। ग्राह तपस्या के फल को प्राप्त कर सूर्य की भांति चमक उठा। उसकी बुद्धि भी शुद्ध हो गई। उसने कहां माता आप अपना पुण्य वापस ले लें। मैं इस बालक को यू हीं छोड़ दुंगा। माता ने मना कर दिया तथा बालक को गोद में लेकर ममतामयी माता दुलारने लगी। बालक को सुरक्षित लौटाकर, माता ने अपने स्थान पर वापस आकर तप शुरु कर दिया। भगवान शिव तुरंत ही वहां प्रकट हो गए, और बोले पार्वती अब तुम्हें तप करने की आवश्यकता नहीं है। हर प्राणी में मेरा ही वास है, तुमने उस ग्राह को तप का फल दिया वह मुझे ही प्राप्त हुआ। अत: तुम्हारा तप फल अनंत गुना हो गया। तुमने करुणावश द्रवित होकर किसी प्राणी की रक्षा की अत: मैं तुम पर प्रसन्न हूं तथा तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार करता हूं। कथा का सारंश यही है कि जो परहित की कामना करता है। उस पर परमात्मा की असीम कृपा होती है। जो व्यक्ति असहायों की सहायता, दयालु प्रेमी करुणाकारी होता है। ईश्वर उसको स्वीकार करते हैं। यह कथा शिवपुराण में उल्लेखित है।

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आखिर कहां-कहां जाता है व्यक्ति का पाप, पढ़ें यह पौराणिक कथा

आज की पौराणिक कथा का सार है कि आखिर पाप कहां-कहां जाता है। इसी संदर्भ में एक बार एक ऋषि ने सोचा की लोग पाप धोने के लिए सभी लोग गंगा जाते हैं। ऐसे में सारे पार गंगा में ही समा जाते हैं। इस तरह तो गंगा भी पापी हो जाएगी। उस ऋषि ने यह जानने के लिए आखिर पाप जाता कहां है, तपस्या की। तपस्या करने के फलस्वरूप देवगण प्रकट हुए। तब ऋषि ने उनसे पूछा कि गंगा में जो पापा धोया जाता है वह कहां जाता है। तब भगवान ने कहा कि चलो गंगा जी से ही पूछते हैं इस बारे में। ऋषि और भगवान दोनों ने ही गंगा जी से पूछा कि हे गंगे! सब लोग तुम्हारे यहां पाप धोते हैं तो इसका मतलब क्या आप भी पापी हुईं? तब गंगा ने कहा कि मैं कैसे पापी हो गई। मैं तो सभी पाप लेकर समुद्र को अर्पित कर देती हूं। इसके बाद ऋषि और भगवान समुद्र के पास गए और उनसे पूछा कि हे सागर! गंगा सभी पाप आपको अर्पित कर देती है तो क्या ऐप आप पापी हो गए? तब समुद्र ने कहा कि वो कैसे पापी हुआ। वो सभी सभी पाप को भाप बनाकर बादल बना देता है। अब ऋषि और भगवान दोनों ही बाद के पास गए। उनसे पूछा कि हे बादल! समुद्र पापों को भाप बनाकर बादल बना देते हैं तो क्या आप पापी हुए? बादलों ने कहा, मैं कैसे पापी हुआ। मैं तो सभी पाप को वापस पानी बना देता हूं और धरती पर गिरा देता हूं। इससे ही अन्न उपजता है। इसे ही मानव खाता है। उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है उसी के आधार पर मानव की मानसिकता बनती है।यही कारण है कि कहा जाता है कि ‘जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मन।’ जिस वृत्ति से अन्न प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसा ही विचार मानव का बन जाता है। ऐसे में हमेशआ भोजन शांत रहकर ही ग्रहण करना चाहिए। अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन भी श्रम का होना चाहिए।

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राम नाम की महिमा

कबीर पुत्र कमाल की एक कथा हैं। एक बार राम नाम के प्रभाव से कमाल द्वारा एक कोढ़ी का कोढ़ दूर हो गया। कमाल समझने लगे कि रामनाम की महिमा मैं जान गया हूँ। कमाल के इस कार्य से किंतु कबीर जी प्रसन्न नहीं हुए। कबीरजी ने कमाल को तुलसीदास जी के पास भेजा।तुलसीदासजी ने तुलसी के पत्र पर रामनाम लिखकर वह तुलसी पत्र जल में डाला और उस जल से 500 कोढ़ियों को ठीक कर दिया। कमाल समझने लगा कि तुलसीपत्र पर एक बार रामनाम लिखकर उसके जल से 500 कोढ़ियों को ठीक किया जा सकता है, रामनाम की इतनी महिमा हैं। किंतु कबीर जी इससे भी संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने कमाल को भेजा संत सूरदास जी के पास। संत सूरदास जी ने गंगा में बहते हुए एक शव के कान में राम शब्द का केवल र कार कहा और शव जीवित हो गया। तब कमाल ने सोचा कि राम शब्द के र कार से मुर्दा जीवित हो सकता हैं। यह राम शब्द की महिमा हैं। तब कबीर जी ने कहाः यह भी नहीं। इतनी सी महिमा नहीं है राम शब्द की। भृकुटि विलास सृष्टि लय होई। जिसके भृकुटि विलास मात्र से प्रलय हो सकता है, उसके नाम की महिमा का वर्णन तुम क्या कर सकोगे? राम नाम महिमा में एक अन्य कथा:समुद्रतट पर एक व्यक्ति चिंतातुर बैठा था, इतने में उधर से विभीषण निकले। उन्होंने उस चिंतातुर व्यक्ति से पूछाः क्यों भाई! तुम किस बात की चिंता में पड़े हो? मुझे समुद्र के उस पार जाना हैं परंतु मेरें पास समुद्र पार करने का कोई साधन नहीं हैं। अब क्या करूँ मुझे इस बात की चिंता हैं। अरे भाई, इसमें इतने अधिक उदास क्यों होते हो? ऐसा कहकर विभीषण ने एक पत्ते पर एक नाम लिखा तथा उसकी धोती के पल्लू से बाँधते हुए कहाः इसमें मेनें तारक मंत्र बाँधा हैं। तू इश्वर पर श्रद्धा रखकर तनिक भी घबराये बिना पानी पर चलते आना। अवश्य पार लग जायेगा। विभीषण के वचनों पर विश्वास रखकर वह व्यक्ति समुद्र की ओर आगे बढ़ने लगा। वहं व्यक्ति सागर के सीने पर नाचता-नाचता पानी पर चलने लगा। वह व्यक्ति जब समुद्र के बीचमें आया तब उसके मन में संदेह हुआ कि विभीषण ने ऐसा कौन सा तारक मंत्र लिखकर मेरे पल्लू से बाँधा हैं कि मैं समुद्र पर सरलता से चल सकता हूँ। इस मुझे जरा देखना चाहिए। उस व्यक्ति ने अपने पल्लू में बँधा हुआ पत्ता खोला और पढ़ा तो उस पर दो अक्षर में केवल राम नाम लिखा हुआ था। राम नाम पढ़ते ही उसकी श्रद्धा तुरंत ही अश्रद्धा में बदल गयीः अरे ! यह कोई तारक मंत्र हैं ! यह तो सबसे सीधा सादा राम नाम हैं ! मन में इस प्रकार की अश्रद्धा उपजते ही वह व्यक्ति डूब कर मरगया। कथा सार: इस लिये विद्वानो ने कहां हैं श्रद्धा और विश्वास के मार्ग में संदेह नहीं करना चाहिए क्योकि अविश्वास एवं अश्रद्धा ऐसी विकट परिस्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं कि मंत्र जप से काफी ऊँचाई तक पहुँचा हुआ साधक भी विवेक के अभाव में संदेहरूपी षड्यंत्र का शिकार होकर अपना अति सरलता से पतन कर बैठता हैं। इस लिये साधारण मनुष्य को तो संदेह की आँच ही गिराने के लिए पर्याप्त हैं। हजारों-लाखों-करोडों मंत्रो की साधना जन्मों-जन्म की साधना अपने सदगुरु पर संदेह करने मात्र से नष्ट हो जाती है। तुलसीदास जी कहते हैं-राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अर्थात्: ब्रह्म ने ही परमार्थ के लिए राम रूप धारण किया था। रामनाम की औषधि खरी नियत से खाय।अंगरोग व्यापे नहीं महारोग मिट जाय ।।

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भीम क्यों जला देना चाहते थे युधिष्ठिर के दोनों हाथ?

भीम और युधिष्ठिर | महाभारत के प्रमुख पात्र भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव अपने बड़े भाई युधिष्ठिर का बहुत आदर करते थे। युधिष्ठिर जो आज्ञा देते, उनके भाई उसे किसी भी तरह पूरी करते थे। महाभारत में सभा पर्व में एक प्रसंग ऐसा भी आता है जब भीम युधिष्ठिर पर बहुत गुस्सा हो जाते हैं और सहदेव से अग्नि लाने को कहते हैं, जिससे वे युधिष्ठिर के दोनों हाथ जला सकें।आइए जानते है क्या है यह प्रसंग –जब युधिष्ठिर जुएं में द्रोपदी को हार जाते हैं तो द्रोपदी को भरी सभा में बुला कर उसका अपमान किया जाता है। यह देखकर भीम को बहुत गुस्सा आता हैं। भीम युधिष्ठिर से कहते हैं कि – आपने जुएं में जो धन हारा है, उससे मुझे क्रोध नहीं हैं, लेकिन द्रोपदी को आपने जो दांव पर लगाया है, यह बहुत ही गलत है। भीम कहते हैं कि – द्रोपदी अपमान करने के योग्य नहीं है, लेकिन आपके कारण ये दुष्ट कौरव उसे कष्ट दे रहे यहीं और भरी सभा में अपमानित कर रहे हैं। भीम युधिष्ठिर से कहते हैं कि द्रोपदी की इस दशा का कारण आप है। इसलिए मैं आपके दोनों हाथ जला डालूंगा। भीम सहदेव से आग लाने को कहते हैं। भीम की यह बात सुनकर अर्जुन उन्हें समझाते हैं और कहते हैं कि युधिष्ठिर ने क्षत्रिय धर्म के अनुसार ही जुआ खेला हैं। इसमें इनका कोई दोष नहीं हैं।अर्जुन की बात सुनकर भीम का क्रोध शांत हो गया और वे बोले कि ये बात मैं भी जानता हूं, नहीं तो मैं बलपूर्वक इनके दोनों हाथ अग्नि में जला डालता।

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आखिर जनक ने सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश दशरथ को आमंत्रण क्यों नहीं भेजा

 राजा जनक के शासनकाल में एक व्यक्ति का विवाह हुआ। जब वह पहली बार सज-सँवरकर ससुराल के लिए चला, तो रास्ते में चलते-चलते एक जगह उसको दलदल मिला, जिसमें एक गाय फँसी हुई थी, जो लगभग मरने के कगार पर थी। उसने विचार किया कि गाय तो कुछ देर में मरने वाली ही है तथा कीचड़ में जाने पर मेरे कपड़े तथा जूते खराब हो जाएँगे, अतः उसने गाय के ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ गया। जैसे ही वह आगे बढ़ा गाय ने तुरन्त दम तोड़ दिया तथा शाप दिया कि जिसके लिए तू जा रहा है, उसे देख नहीं पाएगा, यदि देखेगा तो वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी। वह व्यक्ति अपार दुविधा में फँस गया और गौ-शाप से मुक्त होने का विचार करने लगा। ससुराल पहुँचकर वह दरवाजे के बाहर घर की ओर पीठ करके बैठ गया और यह विचार कर कि यदि पत्नी पर नजर पड़ी, तो अनिष्ट नहीं हो जाए। परिवार के अन्य सदस्यों ने घर के अन्दर चलने का काफी अनुरोध किया, किन्तु वह नहीं गया और न ही रास्ते में घटित घटना के बारे में किसी को बताया। उसकी पत्नी को जब पता चला, तो उसने कहा कि चलो, मैं ही चलकर उन्हें घर के अन्दर लाती हूँ। पत्नी ने जब उससे कहा कि आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हो, तो भी चुप रहा। काफी अनुरोध करने के उपरान्त उसने रास्ते का सारा वृतान्त कह सुनाया। पत्नी ने कहा कि मैं भी पतिव्रता स्त्री हूँ। ऐसा कैसे हो सकता है? आप मेरी ओर अवश्य देखो। पत्नी की ओर देखते ही उसकी आँखों की रोशनी चली गई और वह गाय के शापवश पत्नी को नहीं देख सका। पत्नी पति को साथ लेकर राजा जनक के दरबार में गई और सारा कह सुनाया। राजा जनक ने राज्य के सभी विद्वानों को सभा में बुलाकर समस्या बताई और गौ-शाप से निवृत्ति का सटीक उपाय पूछा। सभी विद्वानों ने आपस में मन्त्रणा करके एक उपाय सुझाया कि, यदि कोई पतिव्रता स्त्री छलनी मेम गंगाजल लाकर उस जल के छींटे इस व्यक्ति की दोनों आँखों पर लगाए, तो गौ-शाप से मुक्ति मिल जाएगी और इसकी आँखों की रोशनी पुनः लौट सकती है। राजा ने पहले अपने महल के अन्दर की रानियों सहित सभी स्त्रियों से पूछा, तो राजा को सभी के पतिव्रता होने में संदेह की सूचना मिली। अब तो राजा जनक चिन्तित हो गए। तब उन्होंने आस-पास के सभी राजाओं को सूचना भेजी कि उनके राज्य में यदि कोई पतिव्रता स्त्री है, तो उसे सम्मान सहित राजा जनक के दरबार में भेजा जाए। जब यह सूचना राजा दशरथ (अयोध्या नरेश) को मिली, तो उसने पहले अपनी सभी रानियों से पूछा। प्रत्येक रानी का यही उत्तर था कि राजमहल तो क्या आप राज्य की किसी भी महिला यहाँ तक कि झाडू लगाने वाली, जो कि उस समय अपने कार्यों के कारण सबसे निम्न श्रेणि की मानी जाती थी, से भी पूछेंगे, तो उसे भी पतिव्रता पाएँगे। राजा दशरथ को इस समय अपने राज्य की महिलाओं पर आश्चर्य हुआ और उसने राज्य की सबसे निम्न मानी जाने वाली सफाई वाली को बुला भेजा और उसके पतिव्रता होने के बारे में पूछा। उस महिला ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी। तब राजा ने यह दिखाने कर लिए कि अयोध्या का राज्य सबसे उत्तम है, उस महिला को ही राज-सम्मान के साथ जनकपुर को भेज दिया। राजा जनक ने उस महिला का पूर्ण राजसी ठाठ-बाट से सम्मान किया और उसे समस्या बताई। महिला ने कार्य करने की स्वीकृति दे दी। महिला छलनी लेकर गंगा किनारे गई और प्रार्थना की कि, ‘हे गंगा माता! यदि मैं पूर्ण पतिव्रता हूँ, तो गंगाजल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरनी चाहिए।’ प्रार्थना करके उसने गंगाजल को छलनी में पूरा भर लिया और पाया कि जल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरी। तब उसने यह सोचकर कि यह पवित्र गंगाजल कहीं रास्ते में छलककर नीचे नहीं गिर जाए, उसने थोड़ा-सा गंगाजल नदी में ही गिरा दिया और पानी से भरी छलनी को लेकर राजदरबार में चली आयी। राजा और दरबार में उपस्थित सभी नर-नारी यह दृश्य देक आश्चर्यचकित रह गए तथा उस महिला को ही उस व्यक्ति की आँखों पर छींटे मारने का अनुरोध किया और पूर्ण राजसम्मान देकर काफी पारितोषिक दिया। जब उस महिला ने अपने राज्य को वापस जाने की अनुमति माँगी, तो राजा जनक ने अनुमति देते हुए जिज्ञाशावश उस महिला से उसकी जाति के बारे में पूछा। महिला द्वारा बताए जाने पर, राजा आश्चर्यचकित रह गए।सीता स्वयंवर के समय यह विचार कर कि जिस राज्य की सफाई करने वाली इतनी पतिव्रता हो सकती है, तो उसका पति कितना शक्तिशाली होगा? यदि राजा दशरथ ने उसी प्रकार के किसी व्यक्ति को स्वयंवर में भेज दिया, तो वह तो धनुष को आसानी से संधान कर सकेगा और कहीं राजकुमारी किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति को न वर ले, अयोध्या नरेश को राजा जनक ने निमन्त्रण नहीं भेजा, किन्तु विधाता की लेखनी को कौन मिटा सकता है? अयोध्या के राजकुमार वन में विचरण करते हुए अपने गुरु के साथ जनकपुर पहुँच ही गए और धनुष तोड़कर राजकुमार राम ने सीता को वर लिया।

आखिर जनक ने सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश दशरथ को आमंत्रण क्यों नहीं भेजा Read More »

महाभारत से जुड़े कुछ रोचक किस्से

महाभारत युद्ध में भीम ने दुर्योधन के छोटे भाई दु:शासन का वध किया था। इसके बाद भीम ने छाती फाड़कर उसका खून भी पीया था। ये बात तो सभी जानते हैं, लेकिन इस घटना से जुड़ी कुछ बातें ऐसी भी हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको महाभारत से जुड़ी कुछ ऐसी ही रोचक बातें बता रहे हैं- भीम के दांतों से आगे नहीं गया दु:शासन का खूनमहाभारत के अनुसार, युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव जब धृतराष्ट्र व गांधारी से मिलने गए। गांधारी दुर्योधन के अन्याय पूर्वक किए गए वध से बहुत गुस्से में थीं। भीम ने गांधारी को समझाया कि- यदि मैं अधर्मपूर्वक दुर्योधन को नहीं मारता तो वह मेरा वध कर देता। गांधारी ने कहा कि- तुमने दु:शासन का खून पिया, क्या वह सही था? तब भीम ने कहा कि- जब दु:शासन ने द्रौपदी के बाल पकड़ थे, उसी समय मैंने ऐसी प्रतिज्ञा की थी। यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं करता तो क्षत्रिय धर्म का पालन नहीं कर पाता। लेकिन दु:शासन का खून मेरे दांतों से आगे नहीं गया। काले हो गए थे युधिष्ठिर के नाखूनभीम के बाद युधिष्ठिर गांधारी से बात करने के लिए आगे आए। गांधारी उस सिय में क्रोध में थीं। जैसे ही गांधारी की नजर पट्टी से होकर युधिष्ठिर के पैरों के नाखूनों पर पड़ी, वह काले हो गए। यह देख अर्जुन श्रीकृष्ण के पीछे छिप गए और नकुल, सहदेव भी इधर-उधर हो गए। थोड़ी देर बाद जब गांधारी का क्रोध शांत हो गया, तब पांडवों ने उनसे आशीर्वाद लिया। भीम की हत्या करना चाहते थे धृतराष्ट्रगांधारी से मिलने के बाद पांडव धृतराष्ट्र से मिलने गए। दुर्योधन की मृत्यु को याद कर धृतराष्ट्र भीम का वध करना चाहते थे। श्रीकृष्ण ये बात ताड़ गए और उन्होंने धृतराष्ट्र से गले मिलने के लिए भीम की लोहे की प्रतिमा आगे कर दी। धृतराष्ट्र ने उस लोहे की प्रतिमा को ही भीम समझकर अपनी भुजाओं के बल से तोड़ डाला। उन्हें लगा कि भीम की मृत्यु हो चुकी है। यह सोच कर वे दु:खी हुए। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि धृतराष्ट्र का क्रोध शांत हो गया है, तो उन्होंने कहा कि भीम जीवित है। आपने भीम की प्रतिमा को नष्ट किया है। यह जानकर धृतराष्ट्र को संतोष हुआ। भीम कहते थे धृतराष्ट्र को भला-बुरायुधिष्ठिर के राजा बनने के बाद अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी हमेशा धृतराष्ट्र व गांधारी की सेवा में लगे रहते थे, लेकिन भीम हमेशा धृतराष्ट्र को भला-बुरा कहता रहता था। इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी को पांडवों के साथ रहते-रहते 15 साल गुजर गए। एक दिन भीम ने धृतराष्ट्र व गांधारी के सामने कुछ ऐसी बातें कह दी, जिसे सुनकर उन्हें बहुत दुख हुआ। तब धृतराष्ट्र ने वानप्रस्थ आश्रम (वन में रहना) में जाने का निर्णय लिया। गांधारी ने भी धृतराष्ट्र के साथ वन जाने में सहमति दे दी। धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर, संजय व कुंती भी वन चली गईं। ऐसे हुई विदुरजी की मृत्युधृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती व विदुर वन में रहते हुए कठोर तप कर रहे थे। तब एक दिन युधिष्ठिर सभी पांडवों के साथ उनसे मिलने पहुंचे। धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती के साथ जब युधिष्ठिर ने विदुर को नहीं देखा तो धृतराष्ट्र से उनके बारे में पूछा। धृतराष्ट्र ने बताया कि वे कठोर तप कर रहे हैं। तभी विदुर उसी ओर आते हुए दिखाई दिए, लेकिन आश्रम में इतने सारे लोगों को देखकर विदुरजी पुन: लौट गए। युधिष्ठिर उनसे मिलने के लिए पीछे-पीछे दौड़े। तब वन में एक पेड़ के नीचे उन्हें विदुरजी खड़े हुए दिखाई दिए। उसी समय विदुरजी के शरीर से प्राण निकले और युधिष्ठिर में समा गए। (क्योंकि महात्मा विदुर व युधिष्ठिर धर्मराज (यमराज) के अंश से पैदा हुए थे।) एक रात के लिए जीवित हुए थे सभी योद्धाजब युधिष्ठिर धृतराष्ट्र से मिलने वन में गए, उसी समय आश्रम में महर्षि भी वेदव्यास आ गए। उन्होंने कहा कि- युद्ध में मारे गए जितने भी वीर हैं, उन्हें आज रात तुम सभी देख पाओगे। महर्षि सभी को गंगा तट पर ले गए। रात होने पर महर्षि वेदव्यास ने सभी मृत योद्धाओं का आवाहन किया। थोड़ी ही देर में भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रौपदी के पांचों पुत्र, आदि वीर जल से बाहर निकल आए। अपने मृत परिजनों को देख सभी के मन में हर्ष छा गया। सुबह होने पर वे पुन: अपने लोक में लौट गए। इस प्रकार वह अद्भुत रात समाप्त हुई। कैसे हुई धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती की मृत्यु?महाभारत के अनुसार, युद्ध के बाद धृतराष्ट्र व गांधारी पांडवों के साथ 15 साल तक रहे। इसके बाद वे कुंती, विदुर व संजय के साथ वन में तपस्या करने चले गए। एक दिन जब वे गंगा स्नान कर आश्रम आ रहे थे, तभी वन में भयंकर आग लग गई। दुर्बलता के कारण धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती भागने में असमर्थ थे। इसलिए उन्होंने उसी अग्नि में प्राण त्यागने का विचार किया और वहीं एकाग्रचित्त होकर बैठ गए। इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती ने अपने प्राणों का त्याग कर दिया।

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भीम, हनुमान और पुरुषमृगा हनुमान ने भीम को क्यों दिए अपने तीन बाल

एक बार पांडवों के पास नारद मुनि आए और उन्होंने युधिष्ठर से कहा की स्वर्ग में आपके पिता पांडु दुखी हैं। कारण पूछने पर उन्होंने कहा की पांडु अपने जीते जी राजसूय यज्ञ करना चाहते थे जो न कर सके ऐसे में आपको ऐसा कर उनकी आत्मा को शांति पहुंचना चाहिए।तब पांडवो ने राजसूय यज्ञ आयोजित किया, आयोजन को भव्य बनाने के लिए युधिष्ठर ने यज्ञ में भगवान शिव के परम भक्त ऋषि पुरुष मृगा को आमंत्रित करने का फैसला किया। ऋषि पुरुष मृगा जन्म से ही अपने नाम के जैसे थे। उनका आधा शरीर पुरुष का था और पैर मृग के समान थे। उन्हें ढूंढने और बुलाने का जिम्मा भीम को सौंपा गया। जब भीम, पुरुषमृगा की खोज में निकलने लगे तो श्री कृष्ण ने भीम को चेताया की यदि तुम पुरुषमृगा की गति का मुकाबला नहीं कर पाए तो वो तुम्हें मार देगा। इस बात से भयभीत भीम, पुरुषमृगा की खोज में हिमालय की ओर चल दिए। जंगल से गुजरते वक़्त उन्हें हनुमान जी मिले। हनुमान जी ने भीम से उसके चिंतित होने का कारण पूछा। भीम ने हनुमान को पूरी कहानी बताई। हनुमान ने कहा यह सच है कि पुरुषमृगा की गति बहुत तेज है और उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। उसकी गति मंद करने का एक ही उपाय है। चूँकि वो शिवजी का परम भक्त है इसलिए यदि हम उसके रास्ते में शिवलिंग बना दे तो वो उनकी पूजा करने अवश्य रुकेगा। हनुमान ने ऐसा कहकर भीम को अपने 3 केश* दिए और कहा की जब भी लगे कि पुरुषमृगा तुम्हें पकड़ने वाले है तो तुम एक बाल वहां गिरा देना। यह एक बाल 1000 शिवलिंगों में परिवर्तित हो जाएगा। पुरुषमृगा अपने स्वाभाव अनुसार हर शिवलिंग की पूजा करेंगे और तुम आगे निकल जाना। उसके बाद भीम आज्ञा लेकर आगे बढ़े. कुछ दूर जाकर ही भीम को पुरुष मृगा मिल गए जो को भगवान महादेव की स्तुति कर रहे थे। भीम ने उन्हें प्रणाम किया और अपने आने का कारण बताया, इस पर ऋषि ने सशर्त जाने के लिए हां कर दी। शर्त ये थी की भीम को उनसे पहले हस्तिनापुर पहुंचाना था और अगर वो ऐसा न कर सके तो ऋषि पुरुष मृगा भीम को खा जाएंगे. भीम ने भाई की इच्छा को ध्यान में रखते हुए हां कर दी और हस्तिनापुर की तरफ पुरे बल से दौड़ पड़े। काफी दौड़ने के बाद भीम ने भागते भागते ही पलट कर देखा की पुरुषमृगा पीछे आ रहे है या नहीं, तो चौंक गए की पुरुषमृगा उसे बस पकड़ने वाले ही हैं। तभी भीम को हनुमान के बाल याद आए और उनमे से एक को गिरा दिया, गिरा हुआ बाल हज़ार शिवलिंगो में बदल गया। शिव के परमभक्त होने के नाते पुरुषुमृगा हर शिवलिंग को प्रणाम करने लगे और भीम भागता रहा। ऐसा भीम ने तीन बार किया और जब वो हस्तिनापुर के द्वार में घुसने ही वाला था तो पुरुषमृगा ने भीम को पकड़ लिया, हालांकि भीम ने छलांग लगाई थी पर उसके पैर दरवाजे के बाहर ही रह गए। इस पर पुरुषमृगा ने भीम को खाना चाहा, इसी दौरान कृष्णा और युधिष्ठर द्वार पर पहुंच गए। दोनों को देख कर भीम ने भी बहस शुरू कर दी, तब युधिष्ठर से पुरुषमृगा ने न्याय करने को कहा। तब युधिष्ठर ने कहा की भीम के पांव द्वार के बाहर रह गए थे। इसलिए आप सिर्फ भीम के पैर ही खाने के हक़दार है, युधिष्ठर के न्याय से पुरुषमृगा प्रसन्न हुए और भीम को बक्श दिया। उन्होंने राजसूय यज्ञ में भाग लिया और सबको आशीर्वाद भी दिया।(*कई जगह ऐसा भी वर्णित है कि हनुमना ने भीम को हज़ारों बालो का एक गुच्छा दिया था और हर बाल नीचे गिराने पर एक शिवलिंग में बदल गया था। )

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जब श्रीकृष्ण के परम भक्त नरसी मेहता ने धन के लिए गिरवी रखा मूंछ का बाल

भगवान श्रीकृष्ण के महान भक्तों में नरसी मेहता का नाम जरूर लिया जाता है। उनकी भक्ति के साथ ही दानी स्वभाव के कारण भी वे बहुत प्रसिद्ध हैं। नरसीजी ने भगवान कृष्ण की भक्ति में अपना सबकुछ दान कर दिया था। मान्यता है कि इस महान भक्त के वश में होकर ही कृष्ण ने नानी बाई का मायरा भरा था। इसकी कथा तो आप सभी लोग जानते होंगे, हम आप सभी को यहाँ नरसी मेहता की एक दूसरी रोचक कथा बता रहे हैं।इस कथा के अनुसार, नरसीजी अपना सबकुछ दान करने के बाद जब साधु-संतों के साथ तीर्थयात्रा कर रहे थे तो उनकी मुलाकात कुछ याचकों से हुई। वे उनसे धन, भोजन और जीवन के लिए जरूरी चीजें मांगने लगे। चूंकि भक्त नरसी अपना सर्वस्व दान कर ही चुके थे, इसलिए वे धन देने में समर्थ नहीं थे। आखिरकार उन्हें एक उपाय सूझा। वे एक साहूकार के पास गए और अपनी मूंछ का एक बाल उसके पास गिरवी रख आए। उस जमाने में मूंछ के बाल को भी प्रतिष्ठा और सत्यनिष्ठा का प्रतीक समझा जाता था।साहूकार ने उन्हें मूंछ के बाल के बदले कर्ज दे दिया। नरसीजी ने वह पूरा धन याचकों को दे दिया। इस घटना को जब एक व्यक्ति ने देखा तो उसे लालच हो गया। वह भी इसी तरीके से धन पाना चाहता था। मौका देखकर वह उसी साहूकार के पास गया और बोला- मुझे भी मूंछ के बाल के बदले उतना ही धन दे दीजिए जितना कि आपने नरसी को दिया था। साहूकार ने सहमति जता दी। उसने मूंछ का बाल मांगा। व्यक्ति ने मूंछ का बाल दिया, लेकिन साहूकार संतुष्ट नहीं हुआ। उसने कहा- ये बाल सीधा नहीं है, इसमें अमुक कमी है। कोई दूसरा दीजिए।धन के लोभ में वह व्यक्ति मूंछ के बाल उखाड़कर देता रहा और साहूकार कमियां निकालता रहा। आखिर उस व्यक्ति ने पूछा- मुझे मूंछ का बाल तोड़ने में जो दर्द हो रहा है, उसका आपको अंदाजा भी नहीं है। मेरी आंखों में आंसू आ गए हैं।साहूकार ने कहा- मित्र, तुम्हारी मूंछ का बाल इस योग्य ही नहीं कि मैं उसे गिरवी रखकर एक फूटी कौड़ी भी दे दूं। मैंने नरसी को भी इसी तरह परखा था, परंतु उसने अपनी तकलीफ की परवाह नहीं की। उसके लिए तो याचकों का अभाव ही सबसे बड़ा दर्द था। इसलिए मैंने उसके मूंछ के बाल के बदले धन दे दिया। जिसमें दीन-दुखी के लिए इतना समर्पण हो, उसे मानव ही नहीं ईश्वर भी इंकार नहीं कर सकता।

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पद्म पुराण की कथा | जानिए क्यों स्वयं श्रीराम ने तोड़ दिया था रामसेतु

वाल्मीकि रामायण के अनुसार लंका पर चढ़ाई करते समय भगवान श्रीराम के कहने पर वानरों और भालुओं ने रामसेतु का निर्माण किया था, ये बात हम सभी जानते हैं। लेकिन जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही तोड़ दिया था, ये बात बहुत कम लोग जानते हैं। इससे जुड़ी कथा का वर्णन पद्म पुराण के सृष्टि खंड में मिलता है। श्रीराम इसलिए गए थे लंकापद्म पुराण के अनुसार, अयोध्या का राजा बनने के बाद एक दिन भगवान श्रीराम को विभीषण का विचार आया। उन्होंने सोचा कि- रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं, उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है। जब श्रीराम ये सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए। भरत के पूछने पर श्रीराम उन्हें पूरी बात बताई। ऐसा विचार मन में आने पर श्रीराम लंका जाने की सोचते हैं। भरत भी उनके साथ जाने को तैयार हो जाते हैं। अयोध्या की रक्षा का भार लक्ष्मण को सौंपकर श्रीराम व भरत पुष्पक विमान पर सवार होकर लंका जाते हैं। जब श्रीराम से मिले सुग्रीव और विभीषणजब श्रीराम व भरत पुष्पक विमान से लंका जा रहे होते हैं, रास्ते में किष्किंधा नगरी आती है। श्रीराम व भरत थोड़ी देर वहां ठहरते हैं और सुग्रीव से अन्य वानरों से भी मिलते हैं। जब सुग्रीव को पता चलता है कि श्रीराम व भरत विभीषण से मिलने लंका जा रहे हैं, तो वे उनके साथ हो जाते हैं। रास्ते में श्रीराम भरत को वह पुल दिखाते हैं, जो वानरों व भालुओं ने समुद्र पर बनाया था। जब विभीषण को पता चलता है कि श्रीराम, भरत व सुग्रीव लंका आ रहे हैं तो वे पूरे नगर को सजाने के लिए कहते हैं। विभीषण श्रीराम, भरत व सुग्रीव से मिलकर बहुत प्रसन्न होते हैं। श्रीराम ने इसलिए तोड़ा था सेतुश्रीराम तीन दिन तक लंका में ठहरते हैं और विभीषण को धर्म-अधर्म का ज्ञान देते हैं और कहते हैं कि तुम हमेशा धर्म पूर्वक इस नगर पर राज्य करना। जब श्रीराम पुन: अयोध्या जाने के लिए पुष्पक विमान पर बैठते हैं तो विभीषण उनसे कहता है कि- श्रीराम आपने जैसा मुझसे कहा है, ठीक उसी तरह मैं धर्म पूर्वक राज्य करूंगा। लेकिन इस सेतु (पुल) के मार्ग से जब मानव यहां आकर मुझे सताएंगे, उस स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए। विभीषण के ऐसा कहने पर श्रीराम ने अपने बाणों से उस सेतु के दो टुकड़े कर दिए। फिर तीन भाग करके बीच का हिस्सा भी अपने बाणों से तोड़ दिया। इस तरह स्वयं श्रीराम ने ही रामसेतु तोड़ा था।

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