MYTHOLOGICAL STORIES

Kartik Month 2024: Jay shree Krishna कार्तिक मास को क्यों कहते हैं दामोदर माह ?

कार्तिक मास को दामोदर माह इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस मास में भगवान श्री कृष्ण Jay shree Krishna की दामोदर लीला हुई थी। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, एक दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल में माखन चुराया। जब यशोदा मैया को पता चला तो उन्होंने श्री कृष्ण को रस्सी से ऊखल से बांध दिया। श्री कृष्ण की दामोदर लीला के कारण इस मास को दामोदर माह कहा जाता है। कार्तिक मास को दामोदर माह के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस मास में भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। भगवान श्री कृष्ण को विष्णु भगवान का अवतार माना जाता है यशोदा मां ने जब कान्हा को रस्सी से बांधा जैसा की हम सभी जानते हैं कि भगवान श्री कृष्ण को बचपन से ही माखन खाना बहुत पसंद था। जब भी वो यशोदा मैया से नजर बचाते सीधा माखन खाने के लिए मटकी में हाथ डाल देते थे। एक बार यशोदा मैया माखन बना कर रसोई घर से कुछ लेने चली गईं और श्री कृष्ण ने माखन की मटकी को ऊपर बंधा देख माखन खाने की एक तरकीब अपनाई। श्री कृष्ण उस समय बहुत छोटे थे और उनका हाथ ऊपर टंगी माखन की मटकी तक नहीं पहुंच पाया। तब उन्होनें माखन खाने के लिए पास में रखे ऊखल को रखा और उस पर चढ़ कर माखन की मटकी तोड़ माखन निकाल कर खाने लगे। इतने में मां यशोदा वहां पहुंची और उन्होनें देखा सारी मटकी टूटी पड़ी है। कान्हा की इस शेतानी पर मां यशोदा ने उन्हें उसी ऊखल से बांध दिया। श्री कृष्ण को यशोदा मां ने कमर पर रस्सी से कस कर उसी उखल से बांध दिया जिस पर वो चढ़ कर माखन की मटकी से माखन निकाल कर खा रहे थे। गोपेश्वर महादेव की लीला (Gopeshwar Mahadev Leela Katha) Jay shree Krishna श्री कृष्ण की ऊखल बंधन लीला नारद मुनी ने कुबेर के दोनों पुत्रों नलकुवर और मणीग्रीव को श्राप देकर वृक्ष बना दिया था। वो दोनों लोग श्राप पाने के बाद वर्षों से तपस्या कर रहे थे कि कब श्री कृष्ण जन्म लेंगे और कब उन्हें देवर्षी नारद के इस श्राप से मुक्ति मिलेगी। जब श्री कृष्ण ने द्वापरयुग में जन्म लिया और वह गोकुल आए और जब यशोदा मैया ने उन्हें ऊखल से जिस समय बांधा था। तब उन्हें इन दोनों श्रापित नलकुवर और मणीग्रीव को श्राप से मुक्त भी करना था। यह दोनों श्री कृष्ण (Jay shree Krishna) के नंदभवन के बाहर वृक्ष बन गए थे। जब श्री कृष्ण बाल रूप में ऊखल से बंधे हुए थे। तब पास में ये दोनों कुबरे के पुत्र एक श्रापित वृक्ष रूप में थे। श्री कृष्ण ने अपनी लीली से बंधे ऊखल को इन दोनों वृक्षों के बीच रखा और कस के ऊखल को आगे की और खींचा। जैसे ही श्री कृष्ण ने ऊखल को कस कर खींचा वह दोनों वृक्ष धड़ाम से गिरे और उसमें से दौ दिव्य पुरुष प्रकट होकर अपने असली रूप में पुनः आगए। उन्होनें श्री कृष्ण को होथ जोड़ कर प्रणाम किया और अपनी करनी की क्षमायाचना मांगी। श्री कृष्ण ने उन्हें क्षमा किया और वो दोनों फिर से अपने लोक चले गए। इस तरह यह लीला उखल बंधन लीला कहलाई और यह लीला कार्तिक मास में हुई थी। कार्तिक के महीने को दामोदर मास इसलिए कहते हैं श्रीमद्भागवत महापुराण में श्री कृष्ण की इस लाला को विस्तार से बताया गया है। जब दोनों वृक्ष गिरे तब यशोदा मैया श्री कृष्ण की चिंता करते हुए भागी चली आईं और उनके आंखो में आंसू आ गए थे। वह श्री कृष्ण से बोलीं लला अब में तुम्हें कभी भी सजा नहीं दूंगी और श्री कृष्ण अपनी बाल रूप की मंद मुस्कान लिए यशोदा मां के गले लग गए। दमोदर का अर्थ होता है पेट से किसी जीच को बांध देना श्री कृष्ण के ऊखल से बंधे होने के कारण उनका नाम दामोदर पड़ा और कार्तिक के महीने को दामोदर नाम से भी जाना जाने लगा। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। । Karmasu.in एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)  poranik katha jay shree ram jay shree krishna Pauranik Katha: जब देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को रुला दिया था, पढ़ें यह पौराणिक कथा Ram Katha:भगवान श्रीराम को रामचंद्र जी क्यों कहा जाता है ? जानिए संपूर्ण कथा  Jay shree Ram 2024:भगवान राम के वंशज, जो आज भी जिंदा हैं Jay Shree Ram:एक तोते की वजह से सीता को श्रीराम से रहना पड़ा था अलग, पढ़ें रामायण की अनोखी कहानी

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Pauranik Katha: जब देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को रुला दिया था, पढ़ें यह पौराणिक कथा

एक बार भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी धरती का भ्रमण करने निकले। धरती पर भ्रमण करते हुए जब वे एक सुंदर बगीचे के पास पहुंचे तो देवी लक्ष्मी को वहां के फूल बहुत पसंद आए। उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि उन्हें एक फूल चाहिए। भगवान विष्णु ने उन्हें फूल लेने से मना किया क्योंकि यह बगीचा किसी दूसरे का था। उन्होंने कहा कि बिना अनुमति के किसी भी चीज को छूना अपराध है Pauranik Katha:  आज गुरुवार है। आज के दिन श्री हरि यानी भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। विष्णु जी से संबंधित कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक कथा आज हम आपके लिए लिए लाए हैं। इस कथा में यह बताया गया है कि आखिर ऐसा क्या हुआ था कि विष्णु जी को देवी लक्ष्मी ने रुला दिया था। तो आइए पढ़ते हैं यह कथा। श्री हरि एक बार धरती भ्रमण के लिए जा रहे थे। तब देवी लक्ष्मी ने उन्हें कहा कि वो भी उनके साथ चलना चाहती हैं। तब विष्णु जी ने कहा कि वो उनके साथ एक शर्त पर ही चल सकती हैं। लक्ष्मी जी ने शर्त पूछी तो विष्णु जी ने कहा कि धरती पर चाहें कोई भी स्थिति क्यों न आए उन्हें उत्तर दिशा की तरफ नहीं देखना है। लक्ष्मी जी ने शर्त मानी और श्री हरि के साथ चल दीं। Ram Katha:भगवान श्रीराम को रामचंद्र जी क्यों कहा जाता है ? जानिए संपूर्ण कथा जब दोनों धरती का भ्रमण कर रहे थे तब देवी की नजर उत्‍तर द‍िशा की तरफ पड़ी। वहीं इतनी ज्यादा हरियाली थी कि वो खुद को रोक न पाईं और बगीचें की तरफ चल दीं। वहां से उन्होंने एक फूल तोड़ा और विष्णु जी के पास आ गईं। विष्णु जी लक्ष्मी जो देखते ही रो पड़े। तब मां लक्ष्मी को विष्णु जी की शर्त याद आ गई। श्री हरि ने कहा कि बिना किसी से पूछे किसी भी चीज को छूना अपराध है। (Pauranik Katha)यह सुन देवी लक्ष्मी को एहसास हुआ कि उनसे गलती हो गई है। उन्होंने माफी मांगी। लेकिन श्री हरि ने कहा कि इसकी माफी को बगीचे का माली ही दे सकता है। विष्णु जी ने कहा कि लक्ष्मी जी को माली के घर दासी बनकर रहना होगा। लक्ष्मी जी ने यह सुन तुरंत ही गरीब औरत का वेस धारण किया और माली के घर चली गईं। कभी खेत में तो कभी घर में माली ने उनसे काम कराया। लेकिन जब माली को पता चला कि वो कोई और नहीं बल्कि मां लक्ष्मी हैं तो वो रो पड़ा। उसने कहा कि जो भी उसने किया उसके लिए उसे माफ कर दें। तब लक्ष्मी जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि जो भी हुआ वो नियति थी। इसमें किसी का कोई दोष नहीं है। Pauranik Katha लेकिन माली ने जिस तरह से लक्ष्मी जी को अपने घर का सदस्य समझा उन्होंने उसकी झोली आजीवन सुख-समृद्धि से भर दी। उन्होंने कहा कि अब जीवन में उसके परिवार को किसी भी तरह का दुख नहीं भोगना होगा। इसके बाद वो विष्णु लोक वापस चली गईं।

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Ram Katha:भगवान श्रीराम को रामचंद्र जी क्यों कहा जाता है ? जानिए संपूर्ण कथा

Ram Katha मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को सनातन संस्कृति का आधार माना जाता है। भगवान श्री राम, विष्णु जी के अवतार हैं। रामचरित मानस के अनुसार, भगवान श्री राम(Ram Katha) के शासन काल को राम राज्य कहा जाता है। भगवान श्री राम ने अपने जीवन काल में हमेशा एक न्यायप्रिय और प्रजाप्रिय राजा की तरह शासन किया। भगवान श्री राम ने हमेशा “रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई।” के आधार पर अपना कर्तव्य निभाया। इसी कारण अपने पिता राजा दशरथ के कहने पर राज धर्म और वचन के पालन के लिए भगवान श्री राम 14 वर्षों के वनवास पर भी गए। अपने जीवन काल में भगवान श्री राम ने अपने वचन और धर्म को हमेशा अपने स्वार्थ से ऊपर रखा। हम सभी भगवान श्री राम को सियावर, विष्णु अवतार, रघुनंदन, मर्यादा पुरुषोत्तम, भगवान राम और श्री रामचंद्र जी के नाम से जानते हैं। भगवान श्री राम के इन सभी नामों के पीछे कोई न कोई पौराणिक कथा अवश्य जुड़ी हुई है। हम जानेंगे कि भगवान श्री राम को रामचंद्र जी कहने के पीछे की कथा क्या है। Jay shree Ram 2024:भगवान राम के वंशज, जो आज भी जिंदा हैं Ayodhya:अयोध्या नगरी में हुआ श्री राम का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ श्री राम का जन्म, चैत्र मास की नवमी तिथि, मर्यादा पुरुषोत्तम, जन्में थे प्रभु श्री राम। अयोध्या नगरी में ऋषि वशिष्ठ के आश्रम में राजा दशरथ और रानी कौशल्या का विवाह हुआ था। राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने ऋषि वशिष्ठ से पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। यज्ञ के प्रभाव से राजा दशरथ को चार पुत्र हुए। सबसे बड़े पुत्र का नाम राम, दूसरे का लक्ष्मण, तीसरे का भरत और चौथे का शत्रुघ्न था। भगवान राम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इस दिन को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। भगवान राम का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था। अयोध्या नगरी को भगवान राम की जन्मभूमि माना जाता है। भगवान राम का जन्म एक ऐतिहासिक घटना है। भगवान राम विष्णु के अवतार थे। उन्होंने अपने जीवन काल में कई महान कार्य किए। उन्होंने रावण का वध करके माता सीता को मुक्त कराया। उन्होंने 14 वर्षों के वनवास में भी अपने धर्म और मर्यादा का पालन किया। भगवान राम एक आदर्श राजा थे। उनके शासन काल को रामराज्य कहा जाता है। Ram Katha :चंद्रमा को दिए वरदान के कारण कहलाए ‘रामचंद्र’ भगवान विष्णु के धरती पर श्री राम रूप में जन्म लेने के कारण स्वर्ग लोक के देवता बहुत प्रसन्न थे। इसी कारण जब अयोध्या नगरी में दशरथ के पुत्रों के जन्म का उत्सव मनाया गया तब भगवान सूर्य देव अस्त होना भूल गए और अयोध्या नगरी में रात नहीं हुई। रात ने भगवान विष्णु से कहा कि मुझे भी आपके राम रूप के दर्शन करने हैं, तब विष्णु जी ने सूर्यदेव से अस्त होने की प्रार्थना की। जब अयोध्या नगरी में रात हुई तब रात ने भगवान श्री राम (Ram Katha)से कहा कि सूर्य देव के कारण मुझे देरी से आपके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। भगवान श्री राम ने इस देरी के फलस्वरूप रात को वरदान दिया कि इस जन्म में उनका रंग रात के रंग की तरह ही रहेगा। इसके बाद चंद्रदेव ने भी भगवान श्री राम से कहा कि सूर्यदेव के कारण मुझे भी आपके दर्शन पाने में देरी हो गई। भगवान श्री राम ने चंद्रदेव को भी यह वरदान दिया कि चंद्रदेव का नाम भगवान राम के नाम के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा। इसी कारण आज भी संसार में भगवान श्री राम को रामचंद्र जी के नाम से जाना जाता है।

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 Jay shree Ram 2024:भगवान राम के वंशज, जो आज भी जिंदा हैं

भगवान राम के वंशज आज भी भारत में मौजूद हैं। माना जाता है कि वर्तमान में जो सिसोदिया, कुशवाह (कच्छवाहा), मौर्य, शाक्य, बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) आदि जो राजपूत वंश हैं वो सभी प्रभु श्रीराम के वंशज हैं। देश में कोई भी रामनाम से अछूता रह ही नहीं पाता. राम हम सभी के जीवन में गहरे बैठे हैं. राम के राज्य और प्रशासन को प्रतिमान माना गया. श्रीराम (Jay shree Ram) रघु वंश के थे. इस वंश की जड़ें इक्ष्वाकु और विवस्वान (सूर्य) से जुड़ी रही हैं. राम के बाद लव और कुश ने इस वंश आगे बढ़ाया. अब राम के वंशज कहां हैं. क्या वो आज भी हैं. वो लोग कौन हैं, जो खुद को उनका वंशज मानते हैं. राम ने कुश को दक्षिण कौशल, कुशस्थली (कुशावती) और अयोध्या राज्य सौंपा तो लव को पंजाब. लव ने लाहौर को राजधानी बनाया. तक्षशिला में भरत पुत्र तक्ष और पुष्करावती (पेशावर) में पुष्कर को राज मिला. हिमाचल में लक्ष्मण पुत्रों का शासन था. मथुरा में शत्रुघ्‍न के पुत्र सुबाहु को दिया गया तो उनके दूसरे पुत्र शत्रुघाती का भेलसा (विदिशा) के सिंहासन पर बिठाया गया. Love se koun sa bansh chala लव से कौन सा वंश चलाराजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ, जिनमें बड़गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला. इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूतों, वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए. कुश से कुशवाह राजपूतों का वंश चला. Kush Bansh Se Koun Huye कुश वंश से कौन हुएकुश वंश से ही कुशवाह, मौर्य, सैनी, शाक्य संप्रदाय की स्थापना मानी जाती है. सूर्य वंश भी कुश से निकली शाखाओं से निकला. कुश की ही 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े. कुश महाभारतकाल के 2500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व हुए थे यानि आज से 6,500 से 7,000 वर्ष पहले. जो लोग खुद को शाक्यवंशी कहते हैं वे भी श्रीराम के वंशज हैं. सिसोदिया, कछवाह, बैसला, शाक्य राम के वंशजमाना जाता है वर्तमान में जो सिसोदिया, कुशवाह (कच्छवाहा), मौर्य, शाक्य, बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) आदि जो राजपूत वंश हैं वो सभी प्रभु श्रीराम के वंशज है. जयपुर राजघराना है राम का वंशजजयपुर राजघराना राम का वंशज है. जयपुर राजघराने की महारानी पद्मिनी और परिवार के लोग राम के पुत्र कुश के वंशज हैं. कुछ समय पहले महारानी पद्मिनी ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि उनके पति भवानी सिंह कुश के 307वें वंशज थे. तब जयपुर राजघराने ने पेश किया था सबूत अयोध्या में राम मंदिर को लेकर जब अदालत में सुनवाई चल रही थी, तब जयपुर राजघराने के पूर्व महाराजा भवानी सिंह की बेटी दीया कुमारी ने सार्वजनिक तौर पर कुछ सबूत पेश किये थे, जिससे जाहिर होता है कि ये राजपरिवार भगवान राम के बड़े बेटे कुश की वंशावली में आता है. वो कच्छवाहा या कुशवाहा वंश के वंशज हैं. पूर्व राजकुमारी और राजस्थान के राजसमंद से मौजूदा भाजपा सांसद दीयाकुमारी ने इसके कई सबूत भी दिए. उन्होंने एक पत्रावली दिखाई, जिसमें भगवान श्रीराम Jay Shree Ram के वंश के सभी पूर्वजों का नाम क्रमवार दर्ज हैं. इसी में 289वें वंशज के रूप में सवाई जयसिंह और 307वें वंशज के रूप में महाराजा भवानी सिंह का नाम लिखा है. Jay shree Ram कुश के नाम पर कुशवाहा या कच्छवाहा वंश कुशवाह (कछवाहा) वंश: यह वंश राजस्थान, हरियाणा, और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है। इन वंशों के अनुसार, भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज कुशवाहा वंश के संस्थापक राजा कुशवाह के वंशज हैं। इन वंशों के अलावा, भारत में कई अन्य वंश भी हैं जो स्वयं को भगवान राम के वंशज मानते हैं। हालांकि, इन वंशों के वंशावली साक्ष्यों की कमी के कारण उनके दावे को लेकर विवाद है। भगवान राम के वंशज आज भी हिंदू धर्म में पूजनीय हैं। इन वंशों के लोग अपने पूर्वजों के गौरव को बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं।

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Jay Shree Ram:एक तोते की वजह से सीता को श्रीराम से रहना पड़ा था अलग, पढ़ें रामायण की अनोखी कहानी

रामायण की एक लोकप्रिय कथा के अनुसार, एक तोते की वजह से सीता को श्रीराम(Jay Shree Ram) से अलग रहना पड़ा था। कथा के अनुसार, सीता एक बार अपने सखियों के साथ खेल रही थीं। तभी उन्होंने एक तोते और तोते की पत्नी को बातें करते हुए सुना। तोते की पत्नी कह रही थी कि अयोध्या के राजकुमार राम और सीता का विवाह होगा। सीता को यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने तोते से पूछा कि वह भविष्य के बारे में कैसे जानता है। तोते ने बताया कि वह महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहता है, जहां हर दिन राम और सीता के जीवन के बारे में बताया जाता है। रामायण में श्रीराम (Jay Shree Ram) और सीता के वियोग की कहानी सभी जानते हैं। वनवास से लौटने के बाद एक धोबी के कहने पर सीता को राम से अलग रहना पड़ा था। क्या आपको पता है कि ये सब एक तोते की वजह से हुआ था, जिसने सीता को अपने पति का वियोग झेलने का श्राप दिया था। पढ़ें रामायण की ये अनूठी कथा। सीता को तोते की बातें सुनकर बहुत अच्छा लगा। उन्होंने तोते और तोते की पत्नी को पकड़ लिया और उनसे और भी बातें सुनने लगीं। इस बीच, तोते के पति ने आकर सीता से कहा कि उनकी पत्नी गर्भवती है और वह उसे जाने दें। लेकिन सीता ने उसकी एक न सुनी। इस पर तोते के पति को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने सीता को श्राप दे दिया कि जिस तरह से उसने उनकी पत्नी को गर्भावस्था में अलग कर दिया है, उसी तरह से सीता को भी गर्भावस्था में अपने पति से अलग होना पड़ेगा। इतना कहकर तोते के पति ने प्राण त्याग दिए। Jay shree Ram:प्रभु श्रीराम के जन्म की पौराणिक कथा सीता को इस बात का बहुत दुख हुआ। उन्होंने तोते के पति से माफी मांगी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। श्राप का असर होने लगा और सीता को अपने पति से अलग होना पड़ा। 14 वर्षों के वनवास के बाद जब राम लौटे तो रावण द्वारा सीता का हरण हो चुका था। राम (Jay Shree Ram) ने सीता को दोषी ठहराया और उन्हें वनवास दे दिया। सीता वन में जाकर रहने लगीं और वहां उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। कुछ समय बाद, राम को पता चला कि सीता निर्दोष हैं। उन्होंने सीता को वापस ले लिया और अयोध्या में वापस आ गए। लेकिन सीता को अपने पति के साथ रहने में अब कोई खुशी नहीं थी। उन्होंने राम से कहा कि वह वन में ही रहना चाहती हैं। राम ने सीता की इच्छा का सम्मान किया और उन्हें वन में छोड़ दिया। इस प्रकार, एक तोते के श्राप की वजह से सीता को अपने पति से अलग रहना पड़ा। यह एक महत्वपूर्ण सबक है कि हमें कभी भी दूसरों के साथ बुरा व्यवहार नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसका बुरा असर हमें भी हो सकता है।

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Jay shree Ram:प्रभु श्रीराम के जन्म की पौराणिक कथा

प्रभु श्रीराम Ram का जन्म त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के घर हुआ था। महाराज दशरथ अयोध्या के महान राजा थे, लेकिन उन्हें कोई पुत्र नहीं था। वे पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाना चाहते थे। उन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ जी से सलाह ली और यज्ञ का आयोजन किया महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ आरंभ करने की ठानी। महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया गया। महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिये बुलावा भेज दिया। निश्‍चित समय आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा अपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि को लेकर यज्ञ मण्डप में पधारे। इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया। सम्पूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने तथा समिधा की सुगन्ध से महकने लगा। समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद चरा(खीर) को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया। Shree Ram Bhagwan Story:भगवान राम के बारे में सुनी-अनसुनी 10 कथाएं यज्ञ के समापन पर, ब्रह्मा जी ने दशरथ को चार पुत्र प्राप्त होने का वरदान दिया। इसके बाद, कौशल्या ने चैत्र शुक्ल नवमी के दिन राम, कैकेयी ने भरत, सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ सम्पूर्ण राज्य में आनन्द मनाया जाने लगा। महाराज के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में गन्धर्व गान करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवता अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे। महाराज ने उन्मुक्त हस्त से राजद्वार पर आए भाट, चारण तथा आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी। पुरस्कार में प्रजा-जनों को धन-धान्य तथा दरबारियों को रत्न, आभूषण प्रदान किए गए। चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ के द्वारा किया गया तथा उनके नाम रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गए। आयु बढ़ने के साथ ही साथ रामचन्द्र (Ram) गुणों में भी अपने भाइयों से आगे बढ़ने तथा प्रजा में अत्यंत लोकप्रिय होने लगे। उनमें अत्यन्त विलक्षण प्रतिभा थी जिसके परिणामस्वरू अल्प काल में ही वे समस्त विषयों में पारंगत हो गए। उन्हें सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने तथा हाथी, घोड़े एवं सभी प्रकार के वाहनों की सवारी में उन्हें असाधारण निपुणता प्राप्त हो गई। वे निरन्तर माता-पिता और गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे। उनका अनुसरण शेष तीन भाई भी करते थे। गुरुजनों के प्रति जितनी श्रद्धा भक्ति इन चारों भाइयों में थी उतना ही उनमें परस्पर प्रेम और सौहार्द भी था। महाराज दशरथ का हृदय अपने चारों पुत्रों को देख कर गर्व और आनन्द से भर उठता था। Ram jay shree ram

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Ayodhya:अयोध्या का पौराणिक महत्व: सप्तपुरियों में से एक है अयोध्या, जानिए किसने बसाई यह नगरी

अयोध्या (Ayodhya)का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह माना जाता है कि भगवान राम (ram bhagwan) का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। रामायण, हिंदू धर्म का एक प्रमुख महाकाव्य, अयोध्या में भगवान राम ram की कहानी को बताता है। राम मंदिर के शिलान्यास का हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए बहुत महत्व है। यह एक ऐतिहासिक क्षण होगा, जो हिंदू धर्म के लिए एक नए युग की शुरुआत को चिह्नित करेगा। Ayodhya अयोध्या के धार्मिक महत्व अयोध्या भारत के सबसे प्राचीन और पवित्र शहरों में से एक है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह भगवान राम, हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक का जन्मस्थान है। अयोध्या को सप्तपुरियों में से एक माना जाता है, जो सात पवित्र शहर हैं। ये शहर मोक्ष का मार्ग प्रदान करते हैं। अयोध्या में कई महत्वपूर्ण मंदिर और धार्मिक स्थल हैं। इनमें से कुछ सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में राम जन्मभूमि मंदिर, हनुमानगढ़ी मंदिर और लक्ष्मण मंदिर शामिल हैं। Ayodhya अयोध्या की स्थापना किसने की ?रामायण के अनुसार सरयू नदी के किनारे बसा अयोध्या Ayodhya नगर सूर्य पुत्र वैवस्वत मनु के द्वारा स्थापना की गई थी। वैवस्वत मनु का जन्म लगभग 6673 ईसा पूर्व में हुआ था। मनु ब्रह्रााजी के पौत्र कश्यप की संतान थे। बाद में मनु के 10 पुत्र हुए जिनमें- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध थे। इक्ष्वाकु कुल में कई प्रतापी राजा, मुनि और भगवान हुए है। इक्ष्वाकु कुल में भगवान राम का जन्म हुआ था। Ayodhya अयोध्या की स्थापना कैसे हुई ?  स्कंद पुराण के अनुसार जिस तरह से काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है उसी प्रकार अयोध्या भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र पर विराजमान है। पौराणिक कथा के अनुसार मनु ने ब्रह्रााजी से अपने लिए एक नगर के निर्माण की बात को लेकर उनके पास पहुंचे तब ब्रह्रााजी जी उन्हें भगवान विष्णु के पास भेजा। तब भगवान विष्णु ने मनु के लिए साकेतधाम का चयन किया। Shree Ram Bhagwan Story:भगवान राम के बारे में सुनी-अनसुनी 10 कथाएं साकेतधाम के चयन के बाद ब्रह्रााजी और मनु के साथ विष्णुजी ने देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा को भेज दिया। विष्णु जी ने महर्षि वशिष्ठ को भी भेजा। वशिष्ठ मुनि ने सरयू नदी के किनारे लीला भूमि का चयन किया। भूमि चयन के बाद देवशिल्पी नगर के निर्माण की प्रकिया आरंभ की। रामायण में अयोध्या (Ayodhya) का जिक्र कौशल जनपद के रूप में भी किया गया। भगवान राम ram bhagwan के जन्म के समय इस नगर का नाम अवध के रूप जाना जाता था। अयोध्या (Ayodhya) का एक नाम साकेत भी है। अयोध्या के अलावा कपिलवस्तु, वैशाली, मिथिला और कौशल में इक्ष्वाकु वंश के शासकों ने राजपाठ चलाया।   सप्तपुरी हिंदू धर्म में सात पवित्र शहरों को संदर्भित करता है। इन शहरों को मोक्ष प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। सप्तपुरियों का उल्लेख कई हिंदू ग्रंथों में मिलता है, जिनमें ऋग्वेद, पुराण और रामायण शामिल हैं। सभी प्राचीन सप्तपुरियां और उनका महत्वमथुरामथुरा यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था। श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार थे। मथुरा का काफी धार्मिक महत्व है।उज्जैनउज्जैन को उज्जयिनी और अवंतिका के नाम से भी जाना जाता है। यह नगर शिप्रा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहां पर ज्योतिर्लिंग महाकालेश्व स्थित है और प्रत्येक 12 वर्ष में कुंभ लगता है।काशीहिंदू धर्म में काशी का विशेष महत्व है। यह भगवान शिव की नगरी है। यह गंगा नदी के किनारे पर बसा है। यह सप्तपुरियों में से एक है। भोले भंडारी की इस नगरी में काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग स्थित है।हरिद्वारहरिद्वार भी एक प्रमुख धार्मिक नगरी है। हरिद्वार भी सप्तपुरियों में एक है। यह पर भी प्रयाग की भांति कुंभ मेला लगता है।द्वारिका धामद्वारिका धाम गुजरात में स्थित है। यह भगवान श्रीकृष्ण का धाम है। यह नगर समुद्र के किनारे स्थित है। द्वारिका धाम भी सप्तपुरियों में एक है।कांचीपुरमकांचीपुरम का संबंध देवी पार्वती से है। यह वेगवदी नदी के किनारे बसा हुआ है। कांचीपुरम में बहुत ही धार्मिक स्थल और मंदिर है। यह भी सप्तपुरियों में से एक है।Ayodhya अयोध्या अयोध्या भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है। यह धार्मिक नगर सरयू नदी के किनारे बसा हुआ है। अयोध्या नगरी की स्थापना राजा मनु ने किया।

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Vishvamitr:विश्वामित्र ने अपने ही पुत्रों को चांडाल बनने का श्राप क्यों दिया, उनसे कौनसी भूल हुई ?

इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। हमें अपने स्वार्थ को दूसरों के ऊपर नहीं रखना चाहिए। दूसरों की मदद करने से हमें पुण्य प्राप्त होता है और हमारा जीवन सफल होता है। विश्वामित्र Vishvamitr के पुत्रों ने अपने स्वार्थ के कारण शुनःशेप की मदद करने से इंकार कर दिया। इससे उन्हें बुरा परिणाम भुगतना पड़ा। उन्हें कुत्ते का मांस खाने वाली मुष्टिक आदि जातियों में जन्म लेकर पूरे एक हजार वर्षां तक इस पृथ्वी पर रहना पड़ा। ऋचीक मुनि के मझले पुत्र ने खुद को राजा अम्बरीष को यज्ञ बलि के पुरुष के रूप में बेच दिया। महायशस्वी राजा अम्बरीष शुनःशेप को साथ लेकर दोपहर के समय पुष्कर तीर्थ में आये और वहाँ विश्राम करने लगे। जब वे विश्राम करने लगे, उस समय महायशस्वी शुनःशेप ज्येष्ठ पुष्कर में आकर ऋषियों के साथ तपस्या करते हुए अपने मामा विश्वामित्र से मिला। वह अत्यन्त आतुर एवं दीन हो रहा था। उसके मुख पर विषाद छा गया था। वह भूख-प्यास और परिश्रम से दीन हो मुनि की गोद में गिर पड़ा। उसने कहा, न मेरे माता हैं, न पिता, फिर भाई-बन्धु कहाँ से हो सकते हैं? आप ही मेरी रक्षा करें। आप सबके रक्षक तथा अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति कराने वाले हैं। ये राजा अम्बरीष कृतार्थ हो जायँ और मैं भी विकार रहित दीर्घायु होकर सर्वोत्तम तपस्या करके स्वर्गलोक प्राप्त कर लूँ, कोई ऐसी कृपा आप करिये। जैसे पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है, उसी प्रकार आप मुझे इस पापमूलक विपत्ति से बचाइये। शुनःशेप की वह बात सुनकर महातपस्वी विश्वामित्र Vishvamitr ने उसे सांत्वना दी और अपने पुत्रों से इस प्रकार के वचन कहे। प्राचीन मंदिर Ayodhya शुभ की अभिलाषा रखने वाले पिता जिस पारलौकिक हित के उद्देश्य से पुत्रों को जन्म देते हैं, उसकी पूर्ति का यह समय आ गया है। यह बालक मुनि कुमार मुझसे अपनी रक्षा चाहता है, तुम लोग अपना जीवनमात्र देकर इसका प्रिय करो। तुम सब-के-सब पुण्यात्मा और धर्मपरायण हो, अतः राजा के यज्ञ में पशु बनकर अग्निदेव को तृप्ति प्रदान करो। इससे शुनःशेप सनाथ होगा, राजा का यज्ञ भी बिना किसी विघ्न-बाधा के पूर्ण हो जायगा, देवता भी तृप्त होंगे और तुम्हारे द्वारा मेरी आज्ञा का पालन भी हो जायगा। विश्वामित्र मुनि का वह वचन सुनकर उनके मधुच्छन्द आदि पुत्र अभिमान और अवहेलनापूर्वक वचन कहने लगे। आप अपने बहुत-से पुत्रों को त्यागकर दूसरे के एक पुत्र की रक्षा कैसे करते हैं? जैसे पवित्र भोजन में कुत्ते का मांस पड़ जाय तो वह अग्राह्य हो जाता है, उसी प्रकार जहाँ अपने पुत्रों की रक्षा आवश्यक हो, वहाँ दूसरे के पुत्र की रक्षा के कार्य को हम अकर्त्तव्य के रूप में देखते है। अपने पुत्रों का ऐसा वचन सुनकर विश्वामित्र (Vishvamitr)क्रोध से लाल हो गए और उन्हें शाप दिया कि मेरी आज्ञा का उल्लङ्घन करके जो यह दारुण एवं रोमाञ्चकारी बात तुमने मुँह से निकाली है, इस अपराध के कारण तुम सब लोग भी वसिष्ठ के पुत्रों की भाँति कुत्ते का मांस खाने वाली मुष्टिक आदि जातियों में जन्म लेकर पूरे एक हजार वर्षां तक इस पृथ्वी पर रहोगे।

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Ayodhya:अयोध्‍या में राम मंदिर बनने और अंतिम बार तोड़े जाने तक का इतिहास

प्राचीन भारतीय महाकाव्य, रामायण के अनुसार, भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। हिंदू धर्म में राम Ram एक प्रमुख देवता हैं और अयोध्या उनके जन्मस्थान के रूप में पवित्र स्थान है। इतिहासकारों के अनुसार कौशल प्रदेश की प्राचीन राजधानी अवध को कालांतर में अयोध्या और बौद्धकाल में साकेत कहा जाने लगा। अयोध्या (Ayodhya) मूल रूप से मंदिरों का शहर था। हालांकि यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़े मंदिरों के अवशेष देखे जा सकते हैं। जैन मत के अनुसार यहां आदिनाथ सहित 5 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। बौद्ध मत के अनुसार यहां भगवान बुद्ध ने कुछ माह विहार किया था। प्राचीन मंदिर Ayodhya अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कब हुआ, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। हालांकि, माना जाता है कि यह मंदिर कम से कम 12वीं शताब्दी में मौजूद था। इस मंदिर का उल्लेख 11वीं शताब्दी के एक जैन ग्रंथ में भी मिलता है। अयोध्या को भगवान श्रीराम Shree ram के पूर्वज विवस्वान (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु ने बसाया था, तभी से इस नगरी पर सूर्यवंशी राजाओं का राज महाभारतकाल तक रहा। यहीं पर प्रभु श्रीराम का दशरथ के महल में जन्म हुआ था। महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण में जन्मभूमि की शोभा एवं महत्ता की तुलना दूसरे इन्द्रलोक से की है। धन-धान्य व रत्नों से भरी हुई अयोध्या नगरी की अतुलनीय छटा एवं गगनचुंबी इमारतों के अयोध्या नगरी में होने का वर्णन भी वाल्मीकि रामायण में मिलता है। कहते हैं कि भगवान श्रीराम के जल समाधि लेने के पश्चात अयोध्या Ayodhya कुछ काल के लिए उजाड़-सी हो गई थी, लेकिन उनकी जन्मभूमि पर बना महल वैसे का वैसा ही था। भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने एक बार पुन: राजधानी अयोध्या का पुनर्निर्माण कराया। इस निर्माण के बाद सूर्यवंश की अगली 44 पीढ़ियों तक इसका अस्तित्व आखिरी राजा, महाराजा बृहद्बल तक अपने चरम पर रहा। कौशलराज बृहद्बल की मृत्यु महाभारत युद्ध में अभिमन्यु के हाथों हुई थी। महाभारत के युद्ध के बाद अयोध्या उजड़-सी हो गई, मगर श्रीराम जन्मभूमि का अस्तित्व फिर भी बना रहा। Shree Ram Bhagwan Story:भगवान राम के बारे में सुनी-अनसुनी 10 कथाएं लगभग 100 वर्ष पूर्व उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने अयोध्या में राम मंदिर Ram mandir का निर्माण करवाया था। इस मंदिर का निर्माण का उल्लेख कई ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है, जिनमें कालिदास की रघुवंशम्, बाणभट्ट की हर्षचरितम् और दंडी की दशकुमारचरितम् शामिल हैं। कालिदास की रघुवंशम् में उल्लेख मिलता है कि विक्रमादित्य ने अयोध्या (Ayodhya )में राम जन्मभूमि पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर में 84 स्तंभ थे और इसकी ऊंचाई 100 फीट थी। मंदिर के गर्भगृह में भगवान राम की एक विशाल प्रतिमा स्थापित थी। विक्रमादित्य के बाद के राजाओं ने समय-समय पर इस मंदिर की देख-रेख की। उन्हीं में से एक शुंग वंश के प्रथम शासक पुष्यमित्र शुंग ने भी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। पुष्यमित्र का एक शिलालेख अयोध्या से प्राप्त हुआ था जिसमें उसे सेनापति कहा गया है तथा उसके द्वारा दो अश्वमेध यज्ञों के किए जाने का वर्णन है। अनेक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि गुप्तवंशीय चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय और तत्पश्चात काफी समय तक अयोध्या गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी। गुप्तकालीन महाकवि कालिदास ने अयोध्या का रघुवंश में कई बार उल्लेख किया है। इतिहासकारों के अनुसार 600 ईसा पूर्व अयोध्या में एक महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र था। इस स्थान को अंतरराष्ट्रीय पहचान 5वीं शताब्दी में ईसा पूर्व के दौरान तब मिली जबकि यह एक प्रमुख बौद्ध केंद्र के रूप में विकसित हुआ। तब इसका नाम साकेत था। कहते हैं कि चीनी भिक्षु फा-हियान ने यहां देखा कि कई बौद्ध मठों का रिकॉर्ड रखा गया है। यहां पर 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री हेनत्सांग आया था। उसके अनुसार यहां 20 बौद्ध मंदिर थे तथा 3,000 भिक्षु रहते थे और यहां हिन्दुओं का एक प्रमुख और भव्य मंदिर भी था, जहां रोज हजारों की संख्या में लोग दर्शन करने आते थे। बाबर द्वारा Ayodhya मंदिर का विध्वंस इसके बाद ईसा की 11वीं शताब्दी में कन्नौज नरेश जयचंद आया तो उसने मंदिर पर सम्राट विक्रमादित्य के प्रशस्ति शिलालेख को उखाड़कर अपना नाम लिखवा दिया। पानीपत के युद्ध के बाद जयचंद का भी अंत हो गया। इसके बाद भारतवर्ष पर आक्रांताओं का आक्रमण और बढ़ गया। आक्रमणकारियों ने काशी, मथुरा के साथ ही अयोध्या में भी लूटपाट की और पुजारियों की हत्या कर मूर्तियां तोड़ने का क्रम जारी रखा। लेकिन 14वीं सदी तक वे अयोध्या में राम मंदिर को तोड़ने में सफल नहीं हो पाए। विभिन्न आक्रमणों के बाद भी सभी झंझावातों को झेलते हुए श्रीराम की जन्मभूमि पर बना भव्य मंदिर 14वीं शताब्दी तक बचा रहा। कहते हैं कि सिकंदर लोदी के शासनकाल के दौरान यहां मंदिर मौजूद था। 14वीं शताब्दी में हिन्दुस्तान पर मुगलों का अधिकार हो गया और उसके बाद ही राम जन्मभूमि एवं अयोध्या को नष्ट करने के लिए कई अभियान चलाए गए। अंतत: 1527-28 में इस भव्य मंदिर को तोड़ दिया गया और उसकी जगह बाबरी ढांचा खड़ा किया गया। कहते हैं कि मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के एक सेनापति ने बिहार अभियान के समय अयोध्या में श्रीराम के जन्मस्थान पर स्थित प्राचीन और भव्य मंदिर को तोड़कर एक मस्जिद बनवाई थी, जो 1992 तक विद्यमान रही। विक्रमादित्य द्वारा निर्मित Ayodhya राम मंदिर की विशेषताएं बाबरनामा के अनुसार 1528 में अयोध्या Ayodhya पड़ाव के दौरान बाबर ने मस्जिद निर्माण का आदेश दिया था। अयोध्या में बनाई गई मस्जिद में खुदे दो संदेशों से इसका संकेत भी मिलता है। इसमें एक खासतौर से उल्लेखनीय है। इसका सार है, ‘जन्नत तक जिसके न्याय के चर्चे हैं, ऐसे महान शासक बाबर के आदेश पर दयालु मीर बकी ने फरिश्तों की इस जगह को मुकम्मल रूप दिया।’ हालांकि यह भी कहा जाता है कि अकबर और जहांगीर के शासनकाल में हिन्दुओं को यह भूमि एक चबूतरे के रूप से सौंप दी गई थी लेकिन क्रूर शासक औरंगजेब ने अपने पूर्वज बाबर के सपने को पूरा करते हुए यहां भव्य मस्जिद का निर्माण कर उसका नाम बाबरी मस्जिद रख दिया था।

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Shree Ram Bhagwan Story:भगवान राम के बारे में सुनी-अनसुनी 10 कथाएं

भगवान विष्णु के अवतार श्री राम का नाम कौन नहीं जानता है। रामायण महाकाव्य के रचयिता महर्षि वाल्मीकि ने अपने ग्रंथ में लिखा है कि भगवान श्री राम में वैदिक सनातन धर्म की आत्मा कहे जाने वाले सभी गुण विद्यमान है।  Shree Ram भगवान श्री राम का जीवन परिचय त्रेतायुग में जन्में भगवान श्री राम (Shree Ram )अयोध्या के सूर्यवंशी महाराज दशरथ और कौसल्या के पुत्र थे। उनका जन्म राम नवमी के दिन हुआ था। भगवान श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। उनके जीवन में अनेक कठिनाइयाँ आईं, लेकिन उन्होंने सभी कठिनाइयों का सामना कर अपने कर्तव्यों का पालन किया। भगवान राम का विवाह मिथिला नरेश राजा जनक की पुत्री सीता के साथ हुआ था। लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला, शत्रुध्न की पत्नी श्रुतकीर्ति और भरत की पत्नी मांडवी थी। विवाह के पश्चात् भगवान राम को राजा दशरथ ने रानी कैकयी के कहने पर 14 वर्ष के लिए वनवास पर भेज दिया था क्योंकि एक वचन के अनुसार कैकेयी राजा दशरथ से कुछ भी मांग सकती थी तो रानी कैकेयी ने दासी मंदोदरी के उकसाने पर भरत को अयोध्या का राजा बनाने और राम को वनवास देने की इच्छा जताई और पिता की आज्ञा का पालन करके भगवान राम सीता और लक्ष्मण के साथ वन की ओर चले गए। Shree Ram भगवान श्री राम का महत्त्व भगवान श्री राम का महत्त्व भारतीय संस्कृति में अत्यधिक है। वे भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं और हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं। उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है “मर्यादाओं के सर्वोच्च व्यक्ति”। भगवान श्री राम Shree Ram का जीवन एक आदर्श जीवन है। उन्होंने अपने जीवन में हमेशा सत्य, न्याय और कर्तव्य का पालन किया। वे एक आदर्श पति, पुत्र, भाई और राजा थे। उनके जीवन से हमें अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं, जो हमारे जीवन को बेहतर बनाने में मददगार होती हैं। भगवान श्री राम के बारे में महर्षि वाल्मीकि द्वारा अनेक कथाएं लिखी गई हैं। वाल्मीकि के अलावा प्रसिद्ध महाकवि तुलसीदास ने भी श्री राम के महत्व को लोगों को समझाया है। भगवान राम ने कई ऐसे महान कार्य किए हैं जिसने हिन्दू धर्म को एक गौरवमयी इतिहास प्रदान किया है। भगवान विष्णु ने राम बनकर असुरों का संहार करने के लिए पृथ्वी पर जन्म लिया। भगवान श्री राम ने मातृ−पितृ भक्ति के चलते अपने पिता राजा दशरथ के एक आदेश पर 14 वर्ष तक वनवास काटा। नैतिकता, वीरता, कर्तव्यपरायणता के जो उदाहरण भगवान राम ने प्रस्तुत किए वह बाद में मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक बन गए। Shree Ram एक कुशल और प्रजा हितकारी राजा थे राम भगवान श्री राम Shree Ram को एक कुशल और प्रजा हितकारी राजा माना जाता है। उनके शासनकाल में अयोध्या में सुख, शांति और समृद्धि कायम रही। भगवान श्री राम के शासनकाल में अयोध्या एक आदर्श राज्य था। वहां सभी लोग सुखी और समृद्ध थे। सभी लोग भगवान श्री राम के शासन से प्रसन्न थे। आदिवासियों के भगवान श्री राम Shree Ram वनवास के दौरान भगवान श्री राम Shree Ram ने देश के सभी आदिवासियों और दलितों को संगठित करने का कार्य किया और उनको जीवन जीने की शिक्षा दी। उन्होंने देश के सभी संतों और उनके आश्रमों को राक्षसों, दैत्यों के आतंक से बचाया था। अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान भगवान राम ने भारत की सभी जातियों और संप्रदायों को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया। चित्रकूट में रहकर भी उन्होंने धर्म और कर्म की शिक्षा दीक्षा ली। भगवान राम ने भारत भर में भ्रमण कर भारतीय आदिवासी, जनजाति, पहाड़ी और समुद्री लोगों के बीच सत्य, प्रेम, मर्यादा और सेवा का संदेश फैलाया और यही कारण था कि राम का जब रावण से युद्ध हुआ तो सभी तरह की अनार्य जातियों ने राम का साथ दिया। Shree Ram भगवान राम की वापसी भगवान राम की वापसी एक ऐतिहासिक घटना है, जो हिंदू धर्म में बहुत महत्व रखती है। भगवान राम, भगवान विष्णु के सातवें अवतार थे। उन्होंने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उन्होंने सभी कठिनाइयों का सामना कर अपने कर्तव्यों का पालन किया। भगवान राम की वापसी की कथा रामायण महाकाव्य में वर्णित है। रामायण के अनुसार, भगवान राम ने 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद लंका के राजा रावण का वध किया और माता सीता को मुक्त कराया। रावण के वध के बाद भगवान राम अयोध्या लौटे। भगवान श्री राम कहते है कि पृथ्वी लोक एक ऐसा लोक है जहां जो भी आता है उसे एक दिन वापस लौटना ही होता है। ठीक इसी तरह श्री राम भी अपना मानवीय रूप त्याग कर अपने वास्तविक स्वरूप विष्णु का रूप धारण कर बैकुंठ धाम की ओर चले गए। Shree Ram भगवान राम के बारे में सुने-अनसुने 10 किस्से 1. वनवास के समय भगवान राम 27 साल के थे।2. लव और कुश राम तथा सीता के दो जुड़वां बेटे थे।3. राम-रावण युद्ध के समय इंद्र देवता ने भगवान श्री राम के लिए दिव्य रथ भेजा था।4. भगवान श्री राम ने पृथ्वी पर 10 हजार से भी अधिक वर्षों तक राज किया।5. भगवान राम का जन्म चैत्र नवमी में हुआ था जिसको भारतवर्ष में रामनवमी के रूप में मनाया जाता है।6. भगवान राम ने रावण को मारने के बाद रावण के ही छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया था।7. गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी अहिल्या को पत्थर बनने का श्राप दिया था और इस श्राप से भगवान राम ने ही उन्हें मुक्ति दिलाई थी।8. अरण्य नाम के एक राजा ने रावण को श्राप दिया था कि मेरे वंश से उत्पन्न युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा और भगवान राम इन्ही के वंश में जन्मे थे।9. माता सीता को रावण की कैद से आजाद कराने के लिए रास्ते में पड़े समुद्र को पार करने के लिए भगवान राम ने एकादशी का व्रत किया था।10. वनवास वापसी के बाद भगवान राम के अयोध्या वापसी की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीप जलाए थे तब से दिवाली का त्योहार मनाया जाता है।

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भगवती तुलसी की कथा । Bhagwati Tulsi Ki Katha In Hindi

तुलसी की कथा Tulsi Ki Katha तुलसी की कथा बहुत ही प्राचीन है। हिन्दू धर्म में तुलसी को पवित्रता, शुद्धता और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना जाता है। तुलसी को भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में पूजा जाता है। तुलसी की कथा Tulsi Ki Katha कई रूपों में मिलती है। एक कथा के अनुसार, तुलसी एक सुंदर और गुणवान राजकुमारी थीं, जिनका नाम वृंदा था। वह दैत्यराज कालनेमी की पुत्री थीं। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। उन्होंने भगवान विष्णु को अपना पति पाने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वह उनके पति बनेंगे। लेकिन, भगवान विष्णु ने उन्हें यह भी कहा कि उन्हें एक दैत्य का रूप धारण करना होगा। वृंदा ने भगवान विष्णु के आदेश का पालन किया और उन्होंने शंखचूड़ नाम के दैत्य का रूप धारण किया। शंखचूड़ एक महान योद्धा था। उसने अपने बल और पराक्रम से सभी देवताओं को पराजित कर दिया। देवताओं ने भगवान शिव से मदद मांगी। भगवान शिव ने शंखचूड़ को मारने के लिए भगवान विष्णु को भेजा। भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण किया और शंखचूड़ से युद्ध किया। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। अंत में, भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का वध कर दिया। वृंदा को अपने पति के वध का बहुत दुख हुआ। उन्होंने भगवान विष्णु से क्षमा मांगी। भगवान विष्णु ने वृंदा को क्षमा कर दिया और उन्हें अपने पति के रूप में प्राप्त किया। तुलसी की एक और कथा के अनुसार, तुलसी एक वनवासी कन्या थीं। वह भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। उन्होंने भगवान विष्णु को अपना पति पाने के लिए कठोर तपस्या की। Poranik Katha:पौराणिक काल के 24 चर्चित श्रापों की कहानी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वह उनके पति बनेंगे। लेकिन, भगवान विष्णु ने उन्हें यह भी कहा कि उन्हें एक पौधे का रूप धारण करना होगा। तुलसी ने भगवान विष्णु के आदेश का पालन किया और वह तुलसी के पौधे का रूप धारण कर लीं। तुलसी के पौधे की सुगंध और पवित्रता से सभी देवता प्रसन्न हुए। उन्होंने तुलसी के पौधे को भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में स्वीकार किया। तुलसी की कथाओं में, उन्हें हमेशा एक पवित्र और भक्त महिला के रूप में चित्रित किया गया है। वह भगवान विष्णु की कृपा से एक पौधे का रूप धारण कर लीं, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी भक्ति नहीं छोड़ी। तुलसी को हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है। उन्हें घरों में लगाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। तुलसी के पत्तों को प्रसाद के रूप में भी खाया जाता है। तुलसी को “हरिप्रिया” भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है “भगवान विष्णु की प्रिय”। वह भगवान विष्णु की आराधना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। Tulsi Ki Katha तुलसी की कथा का सार तुलसी की कथा में, वृंदा को एक आदर्श पत्नी और भक्त के रूप में चित्रित किया गया है। वह अपने पति की भक्ति में इतनी तल्लीन थी कि उसने भगवान विष्णु के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया, यहां तक ​​कि अपना पति भी। तुलसी की कथा (Tulsi Ki Katha) हमें यह भी सिखाती है कि भगवान विष्णु भक्तों के प्रति बहुत दयालु हैं। उन्होंने वृंदा की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपना पति बना लिया। तुलसी की कथा Tulsi Ki Katha हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण है। यह कथा हमें भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए भक्ति और समर्पण के महत्व को सिखाती है।

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Poranik Katha:पौराणिक काल के 24 चर्चित श्रापों की कहानी

सनातन पौराणिक ग्रंथों में अनेक श्रापों का वर्णन मिलता है। हर श्राप के पीछे कोई न कोई कहानी जरूर मिलती है। आज हम आपको 24 ऐसे ही प्रसिद्ध श्राप और उनके पीछे की कथा बताएँगे। इस बात से क्रोधित होकर तारा ने राम को श्राप दिया कि वह अपनी पत्नी सीता को खो देंगे। इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि अगले जन्म में उनकी मृत्यु वालि के हाथों होगी। 1- युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप Poranik Katha महाभारत के शांति पर्व के अनुसार, युद्ध समाप्त होने के बाद जब कुंती ने युधिष्ठिर को बताया कि कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था, तो पांडवों को बहुत दुख हुआ। तब युधिष्ठिर ने विधि-विधान पूर्वक कर्ण का भी अंतिम संस्कार किया। माता कुंती ने जब पांडवों को कर्ण के जन्म का रहस्य बताया, तो शोक में आकर युधिष्ठिर ने संपूर्ण स्त्री जाति को श्राप दिया कि “आज से कोई भी स्त्री गुप्त बात छिपा कर नहीं रख सकेगी।” Bagwan Shiv :क्यों आए भगवान शिव, महाकाली के पैरों के नीचे ? 2- ऋषि किंदम का राजा पांडु को श्राप महाभारत के अनुसार एक बार राजा पांडु शिकार खेलने वन में गए। उन्होंने वहां हिरण के जोड़े को मैथुन करते देखा और उन पर बाण चला दिया। वास्तव में वो हिरण व हिरणी ऋषि किंदम व उनकी पत्नी थी। तब ऋषि किंदम ने राजा पांडु को श्राप दिया कि जब भी आप किसी स्त्री से मिलन करेंगे। उसी समय आपकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के चलते जब राजा पांडु अपनी पत्नी माद्री के साथ मिलन कर रहे थे, उसी समय उनकी मृत्यु हो गई। 3- माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप माण्डव्य ऋषि एक महान तपस्वी और ऋषि थे। वे अपने ज्ञान और कर्म के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार, वे एक जंगल में तपस्या कर रहे थे। तभी, एक राजा अपनी सेना के साथ जंगल से गुजर रहा था। राजा ने देखा कि माण्डव्य ऋषि एक पेड़ के नीचे ध्यान में बैठे हैं। राजा ने सोचा कि यह पेड़ उसके महल के लिए बहुत अच्छा होगा। इसलिए, उसने अपने सैनिकों को पेड़ को काटने का आदेश दिया। माण्डव्य ऋषि ने पेड़ पर ध्यान नहीं दिया। सैनिकों ने पेड़ काटना शुरू कर दिया। माण्डव्य ऋषि ने जब यह देखा तो उन्होंने क्रोध से भरकर यमराज को श्राप दे दिया कि वे अगले जन्म में एक दासी के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। यमराज ने माण्डव्य ऋषि से माफी मांगी और कहा कि वे अनजाने में ऐसा कर बैठे हैं। माण्डव्य ऋषि ने अपना श्राप वापस ले लिया, लेकिन उन्होंने यमराज को एक शर्त रखी कि वे अगले जन्म में शूद्र योनि में जन्म लेंगे। यमराज ने इस शर्त को मान लिया और अगले जन्म में उन्हें विदुर के रूप में जन्म हुआ। विदुर एक महान ज्ञानी और राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने पांडवों की बहुत सहायता की। माण्डव्य ऋषि का श्राप एक महत्वपूर्ण सबक देता है। यह बताता है कि हमें किसी भी व्यक्ति को बिना सोचे-समझे दंड नहीं देना चाहिए। हमे हमेशा यह सोचना चाहिए कि उस व्यक्ति ने क्या गलती की है और उसका क्या कारण है। 4- नंदी का रावण को श्राप वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदी जी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदी जी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा। 5- कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप महाभारत के अनुसार ऋषि कश्यप की कद्रू व विनता नाम की दो पत्नियां थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूछ काली है। कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी जनमजेय के सर्प यज्ञ मंं भस्म हो जाओगे। 6- उर्वशी का अर्जुन को श्राप महाभारत के युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए, तो वहां उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गई। यह देख अर्जुन ने उन्हें अपनी माता के समान बताया। यह सुनकर क्रोधित उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया कि तुम नपुंसक की भांति बात कर रहे हो। इसलिए तुम नपुंसक हो जाओगे, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। यह बात जब अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो उन्होंने कहा कि अज्ञातवास के दौरान यह श्राप तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा। 7- तुलसी का भगवान विष्णु को श्राप शिवपुराण के अनुसार शंखचूड़ नाम का एक राक्षस था। उसकी पत्नी का नाम तुलसी था। तुलसी पतिव्रता थी, जिसके कारण देवता भी शंखचूड़ का वध करने में असमर्थ थे। देवताओं के उद्धार के लिए भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी का शील भंग कर दिया। तब भगवान शंकर ने शंखचूड़ का वध कर दिया। यह बात जब तुलसी को पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दिया। इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु की पूजा शालीग्राम शिला के रूप में की जाती है। 8- श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप पाण्डवों के स्वर्गारोहण के बाद अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने शासन किया। उसके राज्य में सभी सुखी और संपन्न थे। एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलते-खेलते बहुत दूर निकल गए। तब उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए, जो मौन अवस्था में थे। राजा परीक्षित ने उनसे बात करनी चाहिए, लेकिन ध्यान में होने के कारण ऋषि ने कोई जबाव नहीं दिया। ये देखकर परीक्षित बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने एक मरा हुआ सांप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। यह बात जब शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी को पता चली, तो उन्होंने श्राप दिया कि आज से सात दिन बात तक्षक

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