MYTHOLOGICAL STORIES

7 चमत्कारिक शिव मंदिर, जहां भगवान के दर्शन मात्र से होती है सारी मुरादें पूरी

भगवान शिव की किसी पर कृपा हो तो वह मनुष्य जीवन के सारे ही सांसारिक सुख भोगता है। इसलिए शिव जी की कृपा पाने के लिए मनुष्य को उनके कम से कम उनके सात मंदिरों का दर्शन जरूर करना चाहिए। मान्यता है कि यदि शिव जी के इन सात मंदिरों का दर्शन जीवन में मनुष्य कर ले तो उसके सभी पापकर्म नष्ट होते हैं और उसकी कामनाएं जरूर परी होती हैं। भगवान शिव बहुत ही भोले माने गए हैं और वह अपने भक्तों में भी वहीं भोलापन खोजते हैं। यही कारण है कि देश के इन 7 मंदिरों में कहते हैं कि मनुष्य यदि सच्चे और निश्चल भाव से शिवजी का दर्शन कर ले तो उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। अमरनाथ मंदिर जम्मू-कश्मीर में स्थित अमरनाथ मंदिर हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ स्थ्ज्ञल है और यहां दर्शन करना बहुत ही पुण्यदायी माना गया है। यह मंदिर एक गुफा के रूप स्थित है। पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिव लिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक बर्फ से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू बर्फ का शिवलिंग भी कहते हैं यह शिवलिंग लगभग 10 फुट ऊचा बनता है। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखो लोग यहां आते है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। मूल अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग अलग हिमखंड हैं। केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित केदारनाथ का मंदिर चार धाम यात्रा में गिना जाता है। यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनापथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है। ओंकारेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश के खंडवा स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों में ओमकारेश्वर मंदिर भी‌ प्रमुख शिव मंदिर में गिना जाता है। चार धाम यात्रा के बाद यहां ओमारेश्वर महादेव का दर्शन करना जरूरी होता है, तभी चार धाम यात्रा का पुण्य मिलता है। सोमनाथ मंदिर गुजरात  के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे सोमनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों से एक है। सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराणादि में उल्लेखित है। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम ‘सोमनाथ’ हो गया। त्रयंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्रयंबकेश्वर मंदिर हिंदुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। काले पत्थरों से बना ये मंदिर चमत्कारिक माना गया है। कहते हैं यहां शिव जी को कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। दक्षेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित कनखल में दक्षेश्वर मंदिर अपनी आस्था और चमत्कार के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर में जगह पर स्थित है। मान्यता है कि आज के दिन जो व्यक्ति दक्षेश्वर महादेव स्थित शिव लिंग का जलाभिषेक करता है, उसे अन्य स्थान पर जल चढ़ाने से कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है। अन्नामलाई मंदिर आदि अन्नामलाई मंदिर तिरुवन्नमलई सबसे पुराना मंदिर माना गया है। अरुणाचलेश्वर मंदिर का निर्माण को लगभग 2000 साल पुराना माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि आरंभ में यह मंदिर साधारण सी लकड़ी से बना था, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित थी। बाद में गोपुरम जोड़े गए और ईंटों व पत्थरों से एक मंदिर बनाने के लिए इस लकड़ी की संरचना को नीचे लाया गया था। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर कर वर्तमान स्वरूप 1200 सालों से अस्तित्व में है।

7 चमत्कारिक शिव मंदिर, जहां भगवान के दर्शन मात्र से होती है सारी मुरादें पूरी Read More »

भगवान हनुमान के 10 खास मंदिर, जहां है भक्तों की सबसे अधिक आस्था

 हनुमान मंदिर, इलाहबाद (उत्तर प्रदेश) इलाहबाद किले से सटा यह मंदिर लेटे हुए भगवान हनुमान की प्रतिमा वाला प्राचीन मंदिर है। इसमें हनुमान जी लेटी हुई मुद्रा में हैं। मूर्ति 20 फीट लम्बी है। जब बारीश में बाढ़ आती है तो मंदिर जलमग्न हो जाता है, तब मूर्ति को कहीं ओर ले जाकर सुरक्षित रखा जाता है।  हनुमानगढ़ी, अयोध्याअयोध्या भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है। हनुमानगढ़ी मंदिर प्रसिद्ध है। यह मंदिर राजद्वार के सामने ऊंचे टीले पर बना है। मंदिर के चारों ओर निवास साधु-संत रहते हैं। हनुमानगढ़ी के दक्षिण में सुग्रीव टीला व अंगद टीला नामक जगह हैं। मंदिर की स्थापना 300 साल पहले स्वामी अभयारामदासजी ने की थी। सालासर हनुमान मंदिर, सालासर(राजस्थान)यह मंदिर राजस्थान के चूरू जिले में है। गांव का नाम सालासर है, इसलिए सालासर बालाजी के नाम यह प्रसिद्ध है। यह प्रतिमा दाड़ी व मूंछ वाली है। यह एक किसान को खेत में मिली थी, जिसे सालासर में सोने के सिंहासन पर स्थापित किया गया है।  हनुमान धारा, चित्रकूटउत्तर प्रदेश में सीतापुर के पास यह हनुमान मंदिर है। यह पर्वतमाला के मध्य में है। हनुमान की मूर्ति के ठीक ऊपर दो कुंड हैं, जो हमेशा भरे रहते हैं। उनमें से पानी बहता रहता है। इस धारा का जल मूर्ति के ऊपर से बहता है। इसीलिए, इसे हनुमान धारा कहते हैं। भारत के प्रसिद्ध 9 श्रीकृष्ण मंदिर, किस्मत वालों को ही मिलते हैं दर्शन श्री संकटमोचन मंदिर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)यह मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में है। इस मंदिर के चारों ओर एक छोटा सा वन है। मंदिर के प्रांगण में भगवान हनुमान की दिव्य प्रतिमा है। ऐसी मान्यता है कि हनुमानजी की यह मूर्ति गोस्वामी तुलसीदासजी के तप एवं पुण्य से प्रकट हुई स्वयंभू मूर्ति है। भेट-द्वारका, गुजरातभेज-द्वारका से चार मील की दूरी पर मकरध्वज के साथ में भगवान हनुमान की मूर्ति स्थापित है। कहते हैं कि पहले मकरध्वज की मूर्ति छोटी थी परंतु अब दोनों मूर्तियां एक सी ऊंची हो गई हैं। मकरध्वज को हनुमान जी का पुत्र बताया गया है, जिसका जन्म हनुमानजी के पसीने द्वारा एक मछली से हुआ था।  बालाजी हनुमान मंदिर, मेहंदीपुर (राजस्थान)राजस्थान के दौसा जिले के पास दो पहाडिय़ों के बीच बसा हुआ मेहंदीपुर है। यह मंदिर जयपुर-बांदीकुई-बस मार्ग पर जयपुर से लगभग 65 किलोमीटर दूर है। यह मंदिर करीब 1 हजार साल पुराना है। यहां चट्टान में हनुमान की आकृति स्वयं उभर आई थी। इसे ही श्री हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है। डुल्या मारुति, पूना (महाराष्ट्र)पूना के गणेशपेठ में बना यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है। श्रीडुल्या मारुति का मंदिर संभवत: 350 वर्ष पुराना है। मूल रूप से डुल्या मारुति की मूर्ति एक काले पत्थर पर अंकित की गई है। इस मूर्ति की स्थापना श्रीसमर्थ रामदास स्वामी ने की थी।  श्री कष्टभंजन हनुमान मंदिर, सारंगपुर (गुजरात)अहमदाबाद-भावनगर के पास स्थित बोटाद जंक्शन से सारंगपुर 12 मील दूर है। महायोगिराज गोपालानंद स्वामी ने इस मूर्ति की प्रतिष्ठा की थी। जनश्रुति है कि प्रतिष्ठा के समय मूर्ति में भगवान हनुमान का आवेश हुआ और यह हिलने लगी। यह मंदिर स्वामीनारायण सम्प्रदाय का एकमात्र हनुमान मंदिर है।  हंपी, कर्नाटकबेल्लारी जिले के हंपी शहर में एक हनुमान मंदिर है। इन्हें यंत्रोद्धारक हनुमान कहा जाता है। यही क्षेत्र प्राचीन किष्किंधा नगरी है। संभवतः यहीं किसी समय वानरों का विशाल साम्राज्य स्थापित था। आज भी यहां अनेक गुफाएं हैं। 

भगवान हनुमान के 10 खास मंदिर, जहां है भक्तों की सबसे अधिक आस्था Read More »

भारत के प्रसिद्ध 9 श्रीकृष्ण मंदिर, किस्मत वालों को ही मिलते हैं दर्शन

द्वारकाधीश मंदिर द्वारका, गुजरात यह गुजरात का सबसे फेमस कृष्ण मंदिर है इसे जगत मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर चार धाम यात्रा का भी मुख्य हिस्सा है। चारों धामों में से यह पश्चिमी धाम है। यह मंदिर गोमती क्रीक पर स्थित है और 43 मीटर की ऊंचाई पर मुख्य मंदिर बना है। इस मंदिर की यात्रा के बिना आपकी गुजरात में धार्मिक यात्रा पूरी नहीं मानी जाएगी। जन्माष्टमी के दौरान यहां बेहद उमंग भरा माहौल देखने को मिलता है। पूरा मंदिर अंदर और बाहर से खूबसूरत तरीके से सजाया जाता है। श्री बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन भगवान श्री कृष्ण ने अपने बचपन का समय वृंदवन में ही बिताया था। यह सबसे फेमस और प्राचीन मंदिर भी है। भगवान कृष्ण को बांके बिहारी भी कहा जाता है इसलिए उनके नाम पर ही इस मंदिर का नाम भी श्री बांके बिहारी रखा गया है। जन्माष्टमी के दिन मंगला आरती होने के बाद यहा श्रद्धालुओं के लिए रात 2 बजे ही मंदिर के दरवाजे खुल जाते हैं। मंगला आरती साल में केवल एक बार होती है। भगवान कृष्ण के जन्म के बाद यहां श्रद्धालुओं के बीच खिलौने, कपड़े और दूसरी चीजें बेची जाती हैं। द्वारकाधीश मंदिर, मथुरा यह मथुरा का दूसरा सबसे फेमस मंदिर है यहां पर भगवान कृष्ण की काले रंग की प्रतिमा की पूजा की जाती है। हालांकि यहां राधा की मूर्ति सफेद रंग है। प्राचीन मंदिर होने के कारण इसकी वास्तुकला भी भारत की प्रचीन वास्तुकला से प्रेरित है। यहां आकर आपको अलग ही सुकून का अहसास होगा। जन्माष्टमी का त्योहार यहां धूमधाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी के दौरान यहां का माहौल काफी शानदार होता है। श्रीकृष्ण मठ मंदिर, उडुपी यह कर्नाटक का सबसे फेमस पर्यटन स्थल भी है इस मंदिर की खासियत है कि यहां भगवान की पूजा खिड़की के नौ छिद्रो में से ही की जाती है। यह हर साल पर्यटक का तांता लगा रहता है लेकिन जन्माष्टमी के दिन यहां की रौनक देखते ही बनती है। पूरे मंदिर को फूलो और लाइट्स से सजाया जाता है। त्योहार के दिन यहां काफी भीड़ होती है और आपको दर्शन के लिए 3-4 घंटे तक इंतजार करना पड़ सकता है। जगन्नाथ पुरी, उड़ीसा उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्‍नाथ मंदिर में भगवान कृष्‍ण अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। जन्‍माष्‍टमी से अधिक रौनक यहां वार्षिक रथ यात्रा के दौरान होती है। यह रथ यात्रा धार्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें भाग लेने और भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने के लिए दुनिया भर से श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं। हर साल इस रथ यात्रा का आयोजन होता है। इसके लिए तीन विशाल रथ तैयार किए जाते हैं। सबसे आगे बलराम जी का रथ रहता है, फिर बहन सुभद्रा का रथ रहता है और उसके भी भगवान कृष्‍ण अपने रथ में सवार होकर चलते हैं। बेट द्वारका मंदिर, गुजरात गुजरात में द्वारिकाधीश के मंदिर के अलावा एक और फेमस मंदिर है बेट द्वारका। वैसे इसका नाम भेंट द्वारका है, लेकिन गुजराती में इसे बेट द्वारका कहा जाता है। भेंट का मतलब मुलाकात और उपहार भी होता है। इस नगरी का नाम इन्हीं दो बातों के कारण भेंट पड़ा। दरअसल ऐसी मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण की अपने मित्र सुदामा से भेंट हुई थी। इस मंदिर में कृष्‍ण और सुदामा की प्रतिमाओं की पूजा होती है। सुदामा जी जब अपने मित्र से भेंट करने यहां आए थे तो एक छोटी सी पोटली में चावल भी लाए थे। इन्‍हीं चावलों को खाकर भगवान कृष्‍ण ने अपने मित्र की दरिद्रता दूर कर दी थी। इसलिए यहां आज भी चावल दान करने की परंपरा है। ऐसी मान्‍यता है कि मंदिर में चावल दान देने से भक्‍त कई जन्मों तक गरीब नहीं होते। सांवलिया सेठ मंदिर, राजस्‍थान यह गिरिधर गोपालजी का फेमस मंदिर है। यहां वे व्‍यापारी भगवान को अपना बिजनस पार्टनर बनाने आते हैं, जिन्‍हें अपने व्‍यापार में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा होता है। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर है जिनका संबंध मीरा बाई से भी बताया जाता है। यहां मीरा के गिरिधर गोपाल को बिजनस पार्टनर होने के कारण श्रद्धालु सेठ जी नाम से भी पुकारते हैं और वह सांवलिया सेठ कहलाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सांवलिया सेठ ही मीरा बाई के वो गिरधर गोपाल हैं, जिनकी वह दिन रात पूजा किया करती थीं। गुरुवयूर मंदिर, केरल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिर से सत्‍ता में आने के बाद सबसे पहले यहां 8 जून कोदर्शन करने आए थे। केरल के इस प्राचीन मंदिर का संबंध गुजरात से माना जाता है। इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा होती है। इसके अलावा मंदिर में भगवान विष्णु के दस अवतारों को भी दर्शाया गया है। इस मंदिर को दक्षिण की द्वारका और भूलोक के बैकुंठ के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में दिन में दो बार भक्तों के लिए मुफ्त भोजन यानी भंडारे की व्यवस्था है। मंदिर में एकादशी का पर्व शिवेली का त्योहार बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है। गुरुवायूर मंदिर का नाम देवताओं के गुरु बृहस्पति, पवनदेव वायु और ऊर यानी पृथ्वी के नाम से मिलकर बना है। भालका तीर्थ, गुजरात सोमनाथ स्थित भालका तीर्थ वह स्थान है, जहां पेड़ के नीचे ध्यान मग्न बैठे श्रीकृष्ण को एक शिकारी ने हिरण के भ्रम से तीर मार दिया था। यही वह स्थान है, जहां से श्रीकृष्ण पृथ्वी छोड़कर स्वर्ग लोक चले गए। साथ ही इस स्थान को हीरान, कपिला और सरस्वती नदी का संगम कहा जाता है। यह मंदिर श्रीकृष्ण के साथ ही उस बरगद के पेड़ को समर्पित है, जिसके नीचे कान्हा बैठे थे।

भारत के प्रसिद्ध 9 श्रीकृष्ण मंदिर, किस्मत वालों को ही मिलते हैं दर्शन Read More »

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है 

पौराणिक कथाओं के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन माता पार्वती के पुत्र गणेश जी का जन्म हुआ था. इसलिए भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन हर साल गणेश चतुर्थी मनाई जाती है पूरे भारत वर्ष में गणेश चतुर्थी उत्सव दस दिनों तक उत्साह के साथ मनाया जाता है. लेकिन बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि,  गणेश चतुर्थी के पीछे छिपी कहानी क्या हैं और इसे दस दिनों तक क्यों मनाया जाता है? गणेश चतुर्थी की कहानी भारत त्योहारों का देश है. प्रतिदिन यहां कोई ना व्रत, पर्व या त्योहार होता है. दीपाेत्सव की तरह ही गणेश चतुर्थी भी भारतीयों का प्रमुख त्यौहार है. भारतीय हिन्दू महीनें में प्रत्येक चंद्र माह में दो चतुर्थी तिथियां होती हैं. पूर्णिमासी या कृष्ण पक्ष के दौरान पूर्णिमा को संकष्टी चतुर्थी के रूप में जाना जाता है. वहीं शुक्ल पक्ष के दौरान अमावस्या के बाद एक विनायक चतुर्थी के रूप में जाना जाता है. लेकिन आप में से ऐसे बहुत से लोग है जिन्हें इस बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी कि, क्यों गणेश चतुर्थी मनाया जाता है? जानना जरूरी है कि, गणेश चतुर्थी भगवान गणेश जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है. श्रीगणेश भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं. गणेश चतुर्थी वैसे तो भारत के कई राज्यों में मनाया जाता है, लेकिन भारत के महाराष्ट्र प्रांत में इसे वृहद स्तर पर बनाया जाता है. मुंबई के लोगों का इस त्यौहार का बेसब्री से इंतज़ार होता है. भारतीय पुराणों के अनुसार भगवान गणेश ज्ञान, समृद्धि और सौभाग्य के देवता है. भारतीय द्वारा कोई भी शुभ कार्य करने के पूर्व भगवान गणेश को पूजा जाता है. सरल शब्दों में कहा जाएं तो कार्य को विघ्न पूर्ण पूरा करने के लिए विघ्नहर्ता गणेश की पूजा करते है. भगवान गणेश को विनायक और विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है. गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि का दाता भी माना जाता है. इसलिए आज हम आपकों पोस्ट के जरिए आप लोगों की गणेश चतुर्थी क्या हैं इसे क्यों मनाया जाता है के विषय में विस्तार से जानकारी देने जा रही है. आशा करते हैं कि, आप लेख को शुरू से लेकर अंत तक पढ़ेंगे. तो फिर चलिए शुरू करते हैं. गणेश चतुर्थी  को विनायक चतुर्थी भी कहते हैं, यह असल में एक हिंदू त्योहार है. इस दौरान लोग भगवान श्री गणेश का पूजन करते है. गणेश चतुर्थी की शुरुआत वैदिक भजनों, प्रार्थनाओं और हिंदू ग्रंथों जैसे गणेश उपनिषद को पढ़कर कि जाती है. प्रार्थना के बाद गणेश जी को उनका पंसदीदा प्रसाद मोदक का भोग लगाकर आरती पूर्ण की जाती है. गणेश उत्सव के दौरान पंडालों में आकृर्षक विद्युत साज सज्जा की जाती है. इन दस दिनों के उत्सव में पूरा भारत गणेश जी की भक्ति से सराबोर रहता है. मुंबई के लाल बाग के राजा गणेश को पूरे विश्व में प्रसिद्धि हासिल है. लाल बाग के राजा को देखने के लिए विदेशी पर्यटक भी मुंबई पहुंचते है गणेश चतुर्थी क्यों मनाते हैं? हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य भगवान गणेश को माना जाता है. इन्हें विघ्गहर्ता इसलिए ही कहा जाता है, क्योंकि इनके नाम मात्र स्मरण से सभी कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जाते है. गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए लोग गणेश जन्मोत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है. करीब-करीब हर भारतीय घर में गणेश प्रतिमा की स्थापना की जाती है. दोनों समय भगवान की आरती की जाती है. भगवान के भोग के लिए प्रतिदिन नए-नए पकवान बनाए जाते है. हिंदू धर्म में गणेश जी की पूजा करना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. पौराणिक मान्यता है कि जो लोग पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी पूजा करते हैं, उन्हें खुशी, ज्ञान, धन और लंबी आयु प्राप्त होगी. और उनकी सभी मनोकामना पूरी होती है. गणेश चतुर्थी का महत्व भारतीय देवी-देवताओं के अवतार को लेकर कहानियां बेहद ही रोचक और शिक्षाप्रद होती है. ठीक उसी प्रकार भगवान श्री गणेश के जन्म की कहानी भी बेहद ही रोचक है. चलिए आज उसी के विषय में विस्तार में जानते हैं. एक पौराणिक कथा में उल्लेख मिलता है कि, भगवान शिव ने गणेश का सिर अपने त्रिशूल से अलग कर दिया था और फिर उसकी जगह हाथी का सिर लगाया गया था. क्या आप जानते कि हाथी का ही सिर क्यों लगाया गया. मनुष्य और हाथी के शरीर में काफी हद तक समानता हैं. हाथियों में बुद्धिमान प्रजातियों के वो सभी गुण पायें जाते हैं. जो किसी प्राइमेट में होती हैं. प्राइमेट स्‍तनपायी प्राणियों में सर्वोच्‍च श्रेणी के जीव होतें हैं. संरचना और जटिलता के आधार पर हाथी और मनुष्य के दिमाग में भी काफी समानता हैं. यही नहीं एक हाथी के कोर्टेक्स में उतने ही न्यूरोंस होते हैं जितने कि एक सामान्य मनुष्य के मस्तिष्ट में पाए जाते हैं, हाथियों में कई ऐसे व्यवहार भी पाए जाते हैं जो आम मनुष्य में भी पाए जाते हैं. जैसे दुखी होना, सीखना या किसी की मदद करना. हाथियों के दिमाग में मौजूद हिप्पोकैम्पस उतना ही विकसित हैं जितना एक मनुष्य का होता हैं. ये हिस्सा भावनाओं से संबंधित होता हैं. हाथी को भी एक साधारण मनुष्य की भांति मानसिक बीमारी हो सकती हैं. एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थी. तब उन्होंने द्वार पर पहरेदारी करने के लिए अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया. और उसमें प्राण डालकर एक सुन्दर बालक का रूप दे दिया. माता पार्वती, बालक को कहती हैं कि मै स्नान करने जा रही हु, तुम द्वार पर खड़े रहना और बिना मेरी आज्ञा के किसी को भी द्वार के अंदर मत आने देना. यह कहकर माता पार्वती, उस बालक को द्वार पर खड़ा करके स्नान करने चली जाती हैं. वह बालक द्वार पर पहरेदारी कर रहा होता है कि तभी वहां पर भगवान् शंकर जी आ जाते हैं और अंदर जैसे ही अंदर जाने वाले होते तो वह बालक उनको वहीँ रोक देता है. भगवान शंकर जी उस बालक को उनके रास्ते से हटने के लिए कहते हैं लेकिन वह बालक माता पार्वती की आज्ञा का पालन करते हुए, भगवान शंकर को अंदर प्रवेश करने से रोकता है. जिसके कारण भगवान शंकर क्रोधित हो जाते हैं और क्रोध में अपनी त्रिशूल

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है  Read More »

संकष्टी चतुर्थी व्रत की प्रामाणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार सभी देवी-देवताओं के ऊपर भारी संकट आ गया. जब वह खुद से उस संकट का समाधान नहीं निकाल पाए तो भगवान शिव के पास मदद मांगने के लिए गए. भगवान शिव ने गणेश जी और कार्तिकेय से संकट का समाधान करने के लिए कहा तो दोनों भाइयों ने कहा कि वे आसानी से इसका समाधान कर लेंगे हिन्दू धर्मशास्त्रों में माघ महीने का बहुत महत्व माना गया है। मान्यतानुसार माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी गणेश चतुर्थी भी कहते हैं। इस दिन तिल चतुर्थी का व्रत किया जाता है। यह व्रत घर-परिवार पर आ रही विपदा दूर करने में सक्षम है। इतना ही नहीं यह व्रत रुके मांगलिक कार्य संपन्न करवाता है तथा भगवान श्री गणेश जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति कराते हैं। संकष्टी चतुर्थी व्रत की पौराणिक गणेश कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेश जी भी बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर शिव जी ने कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुममें से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेश जी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा। भगवान शिव के मुख से यह वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। परंतु गणेश जी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सूझा।  गणेश जी अपने स्थान से उठें और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिव जी ने श्री गणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा। तब उन्होंने कहा- ‘माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं। यह सुनकर भगवान शिव ने गणेश जी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार शिव जी ने श्री गणेश को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे। इस व्रत से व्रतधारी के सभी तरह के दुख दूर होंगे और उसे जीवन के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। चारों तरफ से मनुष्य की ख्याति तथा सुख-समृद्धि बढ़ेगी तथा पुत्र-पौत्रादि, धन-ऐश्वर्य की कमी नहीं रहेगी। अत: यह चतुर्थी हर विपदा दूर करने वाली मानी जाती है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत की प्रामाणिक कथा Read More »

रोहिणी व्रत क्या होता है? कैसे किया जाता है? कौन कर सकता है?

जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। जैन समुदाय में रोहिणी व्रत 27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत किया जाता होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी व्रत का जैन समुदाय में खास महत्‍व है, क्योंकि यह व्रत आत्‍मा के विकारों को दूर कर कर्म बंध से छुटकारा दिलाने में सहायक है जब उदियातिथि अर्थात सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है, उस दिन रोहिणी व्रत किया जाता है। ये व्रत विशेष रूप से जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा किया जाता है। यह व्रत एक त्योहार की तरह माना गया है। इस दिन भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है। इस व्रत को नियमित 3, 5 या 7 वर्षों तक करने के बाद ही उद्यापन किया जा सकता है। जैन परिवारों की महिलाओं के लिए तो इस व्रत का पालन करना अति आवश्यक माना गया है। यह व्रत महिलाओं के लिए अधिक महत्वपूर्ण है। इस दिन महिलाएं प्रात: जल्दी उठकर स्नान करके पवित्र होकर पूजा करती हैं। इस दिन पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा के लिए वासुपूज्य भगवान की पांचरत्न, ताम्र या स्वर्ण प्रतिमा की स्थापना की जाती है। वैसे पुरुष भी ये व्रत कर सकते हैं। इस पूजा में जैन धर्म के लोग भगवान वासुपूज्य की पूजा करते हैं। महिलाएं अपने पति की लंबी आयु एवं स्वास्थ्य के लिए करती हैं। इस दिन गरीबों को दान देने का भी महत्व होता है। व्रत से जुड़ी खास बातें यह व्रत महिलाओं के लिए अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। जैन परिवारों की महिलाओं के लिए तो इस व्रत का पालन करना अति आवश्यक बताया गया है। इस दिन पूरे विधि-विधान से उनकी पूजा की जाती है। वैसे पुरुष भी ये व्रत कर सकते हैं। इस पूजा में जैन धर्म के लोग भगवान वासुपूज्य की पूजा करते हैं। महिलाएं अपने पति की लम्बी आयु एवं स्वास्थ्य के लिए करती हैं। इस दिन महिलाएं प्रात: जल्दी उठकर स्नान करके पवित्र होकर पूजा करती हैं। इस व्रत में भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है। पूजा के लिए वासुपूज्य भगवान की पांचरत्न, ताम्र या स्वर्ण प्रतिमा की स्थापना की जाती है। उनकी आराधना करके दो वस्त्रों, फूल, फल  और नैवेध्य का भोग लगाया जाता है। इस दिन गरीबों को दान देने का भी महत्व होता है।   रोहिणी व्रत कथा रोहिणी व्रत के संबंध में पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्‍मीपति के साथ राज करते थे। उनके 7 पुत्र एवं 1 रोहिणी नाम की पुत्री थी। एक बार राजा ने निमित्‍तज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? तो उन्‍होंने कहा कि हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ तेरी पुत्री का विवाह होगा। यह सुनकर राजा ने स्‍वयंवर का आयोजन किया जिसमें कन्‍या रोहिणी ने राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाली और उन दोनों का विवाह संपन्‍न हुआ। एक समय हस्तिनापुर नगर के वन में श्री चारण मुनिराज आए। राजा अपने प्रियजनों के साथ उनके दर्शन के लिए गया और प्रणाम करके धर्मोपदेश को ग्रहण किया। इसके पश्‍चात राजा ने मुनिराज से पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्‍यों है? तब गुरुवर ने कहा कि इसी नगर में वस्‍तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। उस धनमित्र की दुर्गंधा कन्‍या उत्पन्‍न हुई। धनमित्र को हमेशा चिंता रहती थी कि इस कन्‍या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लोभ देकर अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से उसका विवाह कर दिया, लेकिन अत्‍यंत दुर्गंध से पीडि़त होकर वह एक ही मास में उसे छोड़कर कहीं चला गया। इसी समय अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए नगर में आए, तो धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ वंदना करने गया और मुनिराज से पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्‍होंने बताया कि गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल राज्‍य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा, रानी सहित वनक्रीड़ा के लिए चले, सो मार्ग में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के लिए आहार व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली तो गई, परंतु क्रोधित होकर उसने मुनिराज को कड़वी तुम्‍बी का आहार दिया जिससे मुनिराज को अत्‍यंत वेदना हुई और तत्‍काल उन्‍होंने प्राण त्‍याग दिए। जब राजा को इस विषय में पता चला, तो उन्‍होंने रानी को नगर में बाहर निकाल दिया और इस पाप से रानी के शरीर में कोढ़ उत्‍पन्‍न हो गया। अत्‍यधिक वेदना व दु:ख को भोगते हुए वो रौद्र भावों से मरकर नर्क में गई। वहां अनंत दु:खों को भोगने के बाद पशु योनि में उत्‍पन्न और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्‍या हुई। यह पूर्ण वृत्तांत सुनकर धनमित्र ने पूछा- कोई व्रत-विधानादि धर्मकार्य बताइए जिससे कि यह पातक दूर हो। तब स्वामी ने कहा- सम्‍यग्दर्शन सहित रोहिणी व्रत पालन करो अर्थात प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन आए, उस दिन चारों प्रकार के आहार का त्‍याग करें और श्री जिन चैत्‍यालय में जाकर धर्मध्‍यान सहित 16 प्रहर व्‍यतीत करें अर्थात सामायिक, स्‍वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय बिताए और स्‍वशक्ति दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 मास तक करें। दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और आयु के अंत में संन्यास सहित मरण कर प्रथम स्‍वर्ग में देवी हुई। वहां से आकर तेरी परमप्रिया रानी हुई। इसके बाद राजा अशोक ने अपने भविष्य के बारे में पूछा, तो स्‍वामी बोले- भील होते हुए तूने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, सो तू मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर जन्म लिया, सो अत्‍यंत घृणित शरीर पाया, तब तूने मुनिराज के उपदेश से रोहिणी व्रत किया। फलस्‍वरूप स्वर्गों में उत्‍पन्‍न होते हुए यहां अशोक नामक राजा हुआ। इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहिणी, रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्‍वर्गादि सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्‍त हुए।

रोहिणी व्रत क्या होता है? कैसे किया जाता है? कौन कर सकता है? Read More »

गणेश जी की कथा

गणेश जी की कथा एक बार गणेश जी महाराज एक सेठ जी के खेत में से जा रहे थे तो उन्होंने बारह दाने अनाज के तोड़ लिए। फिर गणेश जी के मन में पछतावा हुआ कि मैंने तो सेठ जी के यहां चोरी कर ली ।  तो गणेश जी सेठ जी के बारह साल की नौकरी करने लग गए। एक दिन सेठानी  राख से हाथ धोने लगी तो  गणेश जी ने  सेठानी का हाथ  पकड़ कर मिट्टी से हाथ  धुला दिया। सेठानी सेठ जी से बोली कि  ऐसा क्या नौकर रखा है नौकर होकर उसने मेरा हाथ  पकड़ लिया। सेठ जी  ने गणेश को बुलाकर पूछा कि तुमने  सेठानी का हाथ क्यों पकड़ा।  तो गणेश जी ने बोला कि मैंने तो एक सीख की बात बताई है। राख से हाथ धोने से घर की लक्ष्मी  नाराज होकर घर से चली जाती है और  मिट्टी से हाथ धोने से आती है। सेठ जी ने सोचा कि गणेश  है तो  सच्चा । थोड़े दिनों बाद कुंभ का मेला आया। सेठ जी ने कहा गणेश सेठानी को कुंभ के मेले में स्नान कराके ले आओ ।  पति की लम्बी आयु प्राप्त करने के लिए रखें वट सावित्री व्रत सेठानी किनारे पर बैठकर सेठानी किनारे पर बैठकर नहा रही थी तो गणेश जी उनका हाथ पकड़कर आगे डुबकी  लगवा लाये। घर आकर सेठानी ने सेठ से कहा कि  गणेश ने तो मेरी इज्जत ही नहीं रखी और इतने सारे आदमियों के बीच में मुझे घसीट कर आगे पानी में ले गए। तब सेठ जी ने गणेश जी को पूछा कि ऐसा क्यों किया तो गणेश जी ने कहा कि  सेठानी किनारे बैठकर गंदे पानी से नहा रही थी । तो मैं आगे अच्छे पानी में  डुबकी लगवाकर ले आया। इससे अगले जन्म में  बहुत बड़े राजा और राजपाट मिलेगा। सेठ जी ने सोचा कि गणेश  है तो सच्चा। एक दिन घर में पूजा पाठ हो रही थी।  हवन हो रहा था।  सेठ जी ने गणेश  को कहा की जाओ सेठानी को बुलाकर ले आओ ।   सेठानी काली चुनरी ओढ़ गणेश सेठानी को बुलाने गया तो सेठानी काली चुनरी ओढ़ कर चलने लगी तो गणेश जी ने काली चुनरी फाड़ दी और कहा कि लाल चुनरी ओढ़ के चलो। सेठानी नाराज होकर सो गई सेठ जी ने आकर पूछा क्या बात है तो सेठ ने बोला कि गणेश ने मेरी चुनरी फाड़ दी। सेठ जी ने गणेश को बुलाकर बहुत डांटा और कहा तुम बहुत बदमाशी करते हो । तो गणेश जी ने कहा पूजा पाठ में काला वस्त्र नहीं पहनते हैं इसलिए मैंने लाल वस्त्र के लिए  कहा ।  काला वस्त्र पहनने से कोई भी  शुभ काम सफल नहीं होता है। फिर  सेठजी ने सोचा कि गणेश है तो समझदार । एक दिन   सेठजी पूजा करने लगे तो पंडित जी ने बोला की वो गणेश जी की मूर्ति लाना भूल गया। अब क्या करें ?तो गणेश जी ने बोला कि मेरे को ही मूर्ति बनाकर विराजमान कर लो ।  आपके सारे काम सफल हो जाएंगे। यह बात सुनकर सेठ जी को भी बहुत गुस्सा आया। और वो बोले कि तुम तो अब तक सेठानी से ही मजाक करते थे मेरे से भी करने लग गए । तो गणेश जी ने कहा मैं मजाक नहीं कर रहा हूं।  गणेश जी का रूप धारण  मैं सच बात कह रहा हूं। इतने में ही गणेश ने गणेश जी का रूप धारण कर लिया । और सेठ और सेठानी ने ही गणेश जी की पूजा की। पूजा खत्म होते ही गणेश जी अंतर्धान हो गए। सेठ सेठानी को बहुत धोखा हुआ और उन्होंने कहा कि हमारे पास तो गणेश जी रहते थे और हमने उनसे इतना काम कराया।

गणेश जी की कथा Read More »

प्रदोष व्रत से जुडी पौराणिक कथा

ऋषि शांडिल्य ने विधवा ब्राह्मणी को धर्म बुद्ध गुप्त की माता की मृत्यु के बारे में भी बताया. जब विधवा ब्राह्मणी को यह सभी बातें पता चली तो वह बहुत दुखी हुई. सब ऋषि शांडिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत के बारे में बताया. शांडिल्य ऋषि की आज्ञा का पालन करते हुए विधवा ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने प्रदोष व्रत करना आरंभ किया स्कंद पुराण में हिंदू धार्मिक तथ्यों के अनुसार प्रदोष व्रत का उल्लेख किया गया है. स्कंद पुराण में बताया गया है कि हर महीने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी के दिन शाम के समय को प्रदोष व्रत कहा जाता है. प्रदोष व्रत शिव जी को प्रसन्न करने और अपनी मनोकामना को पूरा करने के लिए किया जाता है.  पुराने समय में एक बहुत ही गरीब विधवा ब्राह्मणी थी. जीवन यापन करने के लिए वह विधवा ब्राम्हणी अपने पुत्र को साथ लेकर सुबह सुबह भिक्षा लेने निकल जाती थी और शाम होने पर अपने घर वापस आती थी .एक दिन जब वह विधवा ब्राह्मणी भिक्षा लेकर घर वापस आ रही थी तो उसे एक नदी के समीप एक खूबसूरत बालक बैठा दिखाई दिया पर वह विधवा ब्राह्मणी उस बालक को नहीं पहचानती थी. वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार धर्म गुप्त था. धर्म गुप्त को शत्रुओं ने युद्ध में हराकर उसे उसके राज्य से बाहर निकाल दिया था. एक युद्ध में धर्म गुप्त के शत्रुओं ने धर्म गुप्त के पिता की हत्या करके उसका राज्य छीन लिया. पिता की मृत्यु से धर्म गुप्त की माता को आघात लगा और उनकी भी मृत्यु हो गई. तब धर्म गुप्त अपना राज्य छोड़ कर एक नदी के किनारे उदास बैठा था. ब्राह्मणी को उस बालक पर दया आ गई और वह धर्म गुप्त को अपने घर ले गई और उसका पालन पोषण करने लगी. विधवा ब्राह्मणी धर्म गुप्त से अपने पुत्र के समान प्रेम करती थी. राजकुमार धर्म गुप्त भी उस विधवा ब्राह्मणी के साथ रहकर खुश थे. कुछ समय के बाद वह विधवा ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ मंदिर में दर्शन करने गई. मंदिर में उन्हें ऋषि शांडिल्य मिले. ऋषि शांडिल्य एक बहुत ही महान ऋषि थे. जिन्हें सभी कोई मानते थे. जब ऋषि शांडिल्य ने धर्म गुप्त को देखा तब उन्होंने विधवा ब्राह्मणी को बताया कि यह बालक विदर्भ देश के राजा का पुत्र धर्म गुप्त है. इसके पिता युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए हैं. ऋषि शांडिल्य ने विधवा ब्राह्मणी को धर्म बुद्ध गुप्त की माता की मृत्यु के बारे में भी बताया. जब विधवा ब्राह्मणी को यह सभी बातें पता चली तो वह बहुत दुखी हुई. सब ऋषि शांडिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत के बारे में बताया. शांडिल्य ऋषि की आज्ञा का पालन करते हुए विधवा ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने प्रदोष व्रत करना आरंभ किया. तीनों  ऋषि शांडिल्य द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते हुए व्रत करने लगे पर उन्हें व्रत के फल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. कुछ समय व्यतीत होने के बाद एक दिन वह दोनों बालक जंगल में घूम रहे थे. तब उन्होंने वहां पर कुछ गंधर्व कन्याओं को घूमते हुए देखा. ब्राह्मणी का बालक अपने घर वापस आ गया पर राजकुमार धर्म गुप्त वहीं ठहर गए. धर्म गुप्त  गंधर्व कन्या  अंशुमती  की ओर आकर्षित हो गए और उससे बात करने लगे. बात करते-करते गंधर्व कन्या और राजकुमार दोनों को एक दूसरे से प्रेम हो गया. तब धर्म गुप्त अंशुमती  से विवाह करने के लिए उसके पिता से मिलने गए. जब अंशुमती  के पिता को यह पता चला कि यह बालक विदर्भ देश का राजकुमार है तो उन्होंने भगवान शिव की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह धर्म गुप्त से कर दिया. अंशुमती  से विवाह होने के बाद राजकुमार चंद्रगुप्त की किस्मत के सितारे वापस पलटने लगे. राजकुमार धर्म गुप्त ने बहुत संघर्ष करके फिर से अपने गंधर्व सेना का निर्माण किया और विदर्भ देश पर आक्रमण करके विजय हासिल की. कुछ समय व्यतीत होने के बाद धर्म गुप्त को यह पता चला कि उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया है वह विधवा ब्राम्हणी और राजकुमार के प्रदोष करने का फल है. उनके प्रदोष व्रत करने से शिव जी ने प्रसन्न होकर उनके जीवन की सभी कठिनाइयों को दूर किया है.

प्रदोष व्रत से जुडी पौराणिक कथा Read More »

सावन सोमवार व्रत कथा : सावन सोमवार की यह है व्रत कथा, जरूर पढ़ें पूरी होगी मनचाही मुराद

अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है

सावन सोमवार व्रत कथा : सावन सोमवार की यह है व्रत कथा, जरूर पढ़ें पूरी होगी मनचाही मुराद Read More »

ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर कहां है? मंदिर से जुड़ी कथा

वेद और पुराणों की मानें तो हिंदू धर्म में हमारे 33 कोटि देवी-देवता हैं जिन्हें कुछ लोग 33 करोड़ मानते हैं तो कुछ कोटि को प्रकार. संख्या चाहे जो हो इनमें त्रिमूर्ति यानी 3 देवताओं को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है. ब्रह्मा विष्णु और महेश यानी भगवान शिव ब्रह्मदेव को संसार का रचनाकार माना जाता है, विष्णु को पालनहार और महेश यानी शिव को संहारक. लेकिन हैरानी की बात है कि जिन्होंने सृष्टि की रचना की, उसका निर्माण किया उनकी संसार में पूजा नहीं की जाती ब्रह्मा जी का मंदिर कहां है? भारत के राजस्थान राज्य के अजमेर ज़िले के पवित्र स्थल पुष्कर में ब्रह्मा जी का मंदिर बना हुआ है. इस मन्दिर में जगत पिता ब्रह्मा जी की मूर्ति को स्थापित किया गया है. इस मंदिर का निर्माण लगभग 14वी शताब्दी में हुआ था जो कि लगभग 700 वर्ष पुराना है. यह मन्दिर संगमरमर के पत्थरों से बना है. ब्रह्मा जी के इस मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है. कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही यह यज्ञ किया था. यही कारण है कि हर साल अक्टूबर, नवंबर के बीच पड़ने वाले कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर में मेला लगता है. मंदिर से जुड़ी कथा भगवान ब्रह्मा इस संसार के पालनहार है. फिर भी उनका सिर्फ एक ही मंदिर है. ऐसा इसलिए है क्योंकि कहा जाता है कि ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री में ब्रह्मा जी को श्राप दिया था. सावित्री ने अपने पति ब्रह्मा को ऐसा श्राप क्यों दिया था. इसका उल्लेख पद्म पुराण में मिलता है. कहा जाता है कि धरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने बहुत उत्पात मचाया हुआ था. उसके बढ़ते अत्याचारों को देख ब्रह्मा जी ने उसका वध कर दिया था. परंतु जब उस राक्षक का बध किया था तब वध करते समय ब्रह्मा जी के हाथों से तीन जगहों पर कमाल का फूल गिरा.जिसके कारण इन तीन जगहों पर तीन झीलें बन गई. वहीं कहा जाता हैं कि इसी घटना के बाद इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ा गया. संसार की भलाई के लिए ब्रह्मा जी ने यज्ञ करने का फैसला किया. ब्रह्मा जी यज्ञ करने के लिए पुष्कर आए परंतु उनकी पत्नी सावित्री जी ठीक समय पर नहीं पहुंच पाई. इस यज्ञ को पूरा करने के लिए उनकी पत्नी का होना जरुरी था. पर सावित्री जी के यज्ञ में नहीं पहुंच पाने के कारण ब्रह्मा जी ने गुर्जर समुदाय की एक कन्या गायत्री के साथ विवाह कर यज्ञ को शुरू किया. जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत तभी उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंच गई और ब्रह्मा जी के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गई. उनहोंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद भी उनकी कभी भी पूजा नहीं होगी. सावित्री का यह रूप को देख सभी देवता डर गए और सावित्री जी से अपना श्राप वापस लेने की विनती करने लगे. लेकिन उन्होंने किसी की न सुनी और जब उनका गुस्सा शांत हुआ तब सावित्री जी ने कहा कि इस धरती पर केवल सिर्फ पुष्कर में ही आपकी पूजा होगी. कहते हैं कि भगवान भगवान विष्णु जी ने भी ब्रह्मा जी की मदद की थी लेकिन देवी सरस्वती ने विष्णु जी को श्राप दे दिया कि उन्हें पत्नी से अलग होने का कष्ट सहना पड़ेगा. इसी कारण भगवान विष्णु ने राम में 14 साल के वनवास के दौरान उन्हें पत्नी सीता से अलग रहना पड़ा था. आशा करते है कि यह लेख ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर कहां है?

ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर कहां है? मंदिर से जुड़ी कथा Read More »

 जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत

भगवान शिव को कालों के काल महाकाल हैं। साक्षात् मृत्यु में भी उनका सामना करने का साहस नहीं है। वे मृत्युंजय हैं, अविनाशी हैं, आदि हैं, अनंत हैं। भगवान शिव इतने भोले हैं कि वे अपने भक्त की पुकार पर दौड़े चले आते हैं। उसे मनचाहा वरदान देते हैं और उसके मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। आज हम आपको लिंगपुराण की एक कथा के बारे में बताते हैं, जिसमें काल को भगवान शिव ने प्राण दान दिया और अपने भक्त के विश्वास को टूटने नहीं दिया।  भगवान शिव के परमभक्त श्वेतमुनि पर्वत पर एकांत में अपने आराध्य का ध्यान करते और उनकी पूजा करते थे। वे कहते थे कि मृत्यु उनका क्या कर सकती है? उन्होंने तो साक्षात् महाकाल की शरण ली हुई है। उनके आश्रम में शांति और आत्मविश्वास की पवित्रता झलकती थी। उनके तप के बल से आश्रम दिव्यमान था। श्वेतमुनि अपने जीवन काल के अंतिम पड़ाव पर थे। वे मृत्यु से निडर होकर रुद्र अध्याय का पाठ कर रहे थे। उनके जीवन ​का अंतिम श्वास चल रहा था। अचानक वे चौंक पड़े, उनके समक्ष एक विकराल आकृति खड़ी थी। पूरा शरीर काला था और उसने काले वस्त्र धारण कर रखे थे। श्वेतमुनि ने अपने आश्रम के शिव लिंग को करुणामय होकर देखा और ओम नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण किया। उन्होंने शिव लिंग को स्पर्श किया और उस विकराल आकृति से पूछा कि तुमने इस पवित्र आश्रम को अपवित्र करने की हिम्मत कैसे की? इस आश्रम को तो भगवान शिव की कृपा से अभय का आशीष प्राप्त है। उन्होंने दोबारा शिव लिंग को स्पर्श किया। विकराल आकृति वाले काल ने अपना परिचय देते हुए ​​कहा कि अब आप पृथ्वी पर नहीं रह सकते हैं। आपको यमलोक चलना है। इस पर श्वेतमुनि ने शिवलिंग को अपने हाथों से कसकर पकड़ लिया और कहा कि तुमने शिव की भक्ति को चुनौती दी है, क्या तुम्हें नहीं पता है कि भगवान शिव तो स्वयं ही काल के भी काल महाकाल हैं। इस पर काल ने कहा कि शिवलिंग शक्तिविहीन है, निश्चेतन है, पत्थर में महादेव की कल्पना एक भूल है। काल ने श्वेतमुनि को पाश में बांध लिया। जाने रोहिणी व्रत कब है, व्रत कथा, व्रत के नियम और इसका महत्व मुनि ने कहा कि ये तुम्हारी भूल है। महादेव तो कण कण में व्याप्त हैं। विश्वास के साथ उनका आवाहन करने पर वे अपने भक्त की रक्षा करने आते हैं। तभी भगवान शिव माता पार्वती के साथ वहां प्रकट हो गए। उन्होंने काल को चेताते हुए कहा कि ठहरो! श्वेतमुनि का बात सत्य है। उनका प्रकट होना विश्वास के ही अधीन है। भगवान शिव को देखकर काल प्राणहीन समान हो गया। वह शक्तिहीन हो गया। श्वेतमुनि भगवान शिव की स्तुति करने लगे। इस महादेव ने कहा कि आपकी लिंग उपासना धन्य है। विश्वास की विजय होती है। नंदी के निवेदन करने पर महाकाल शिव ने काल को प्राण दान दे दिया और वे वहां से अंतर्धान हो गए।

 जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत Read More »

जाने रोहिणी व्रत कब है, व्रत कथा, व्रत के नियम और इसका महत्व

जैन समुदाय द्वारा किया जाने वाला रोहिणी व्रत पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध व्रत है। इसे देश के कोने कोने में मनाया जाता है। भगवान वासुपूज्य जी को रोहिणी व्रत समर्पित होता है। इस शुभ अवसर पर रोहिणी देवी के साथ साथ भगवान वासुपूज्य जी की विधिवत पूजा की जाती है। यह व्रत अन्य व्रतों से थोड़ा भिन्न होता है। इस व्रत को क्यों करना चाहिए  रोहिणी व्रत प्रत्येक माह आने वाला व्रत है और कई बार संयोग से एक माह में दो बार किया जाता है। यह व्रत लिंग विशिष्ट नहीं है, इसे कोई भी कर सकता है। महिलाओ द्वारा रोहिणी व्रत अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन को व्रत रखकर इसे त्योहार की भांति मनाया जाता है। प्राचीन काल से इसे त्योहार के रूप में जैन समुदाय द्वारा मनाया जाता आ रहा है।Rohini Vrat 2023   – इस व्रत के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। जिनमें से सबसे लोकप्रिय कथा के बारे में हम आपको आगे बताएंगे। इससे पहले यह जान लेते हैं कि रोहिणी व्रत वर्ष के किस समय किया जाता है। सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा जानिए 2023 में कब है रोहिणी व्रत  दिनांक  वार  पक्ष  तिथि  4 जनवरी 2023 बुधवार शुक्ल पक्ष त्रियोदशी 31 जनवरी 2023 मंगलवार शुक्ल पक्ष दशमी 27 फरवरी 2023 सोमवार शुक्ल पक्ष अष्टमी 27 मार्च  2023 सोमवार शुक्ल पक्ष षष्ठी 23 अप्रैल 2023 रविवार शुक्ल पक्ष तृतीया 21 मई  2023 रविवार शुक्ल पक्ष द्वितीय 17 जून 2023 शनिवार शुक्ल पक्ष चतुर्दशी 14 जुलाई 2023 शुक्रवार शुक्ल पक्ष द्वादशी 10 अगस्त 2023 गुरुवार कृष्ण पक्ष दशमी 7 सितम्बर 2023 गुरुवार कृष्ण पक्ष अष्टमी 4 अक्टूबर 2023 बुधवार कृष्ण पक्ष षष्ठी 31 अक्टूबर 2023 मंगलवार कृष्ण पक्ष तृतीया 28 नवंबर 2023 मंगलवार कृष्ण पक्ष प्रतिपदा 25 दिसम्बर 2023 सोमवार कृष्ण पक्ष चतुर्दशी रोहिणी व्रत कब होता है धार्मिक मान्ताओं के अनुसार नक्षत्रों की कुल संख्या 27 होती है। इन 27 नक्षत्रों में एक रोहिणी नक्षत्र होता है, जिसका संबंध इस व्रत से है। जब महीने में सूर्योदय के पश्चात रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है, उस समय इस व्रत को किया जाता है। एक वर्ष में कम से कम छह से सात बार यह व्रत आता है, और कई बार यह नक्षत्र माह में दो बार आ जाता है। रोहिणी व्रत के नियम  इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना बहुत आवश्यक होता है। माना जाता है तीन, पांच और सात साल निश्चित रूप से इस व्रत का पालन करना चाहिए। इस व्रत की उचित अवधि पांच वर्ष की मानी जाती है। जिन अनुयायियों द्वारा पांच वर्ष की अवधि तक व्रत का पालन करना संभव नहीं हो पाता। इसके लिए पांच माह का समय भी उत्तम माना गया है। रोहिणी व्रत को कितने समय तक करना इसका निर्णय स्वंय लिया जाता है। इस समय अवधि में व्रत करने का संकल्प लेने के पश्चात, इस व्रत का उद्यापन तभी किया जाता है, जब अवधि पूर्ण होे जाती है। इसलिए दृढ़ निश्चय के बाद ही संकल्प लेना चाहिए। व्रत का उद्यापन हो जाने के बाद गरीबों को भोजन कराना चाहिए और दान करना चाहिए। इसी के साथ साथ पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ वासुपूज्य की पूजा करनी चाहिए। भगवान वासुपूज्य जी के दर्शनों के साथ ही व्रत का उद्यापन उचित माना जाता है। इस दिन भगवान वासुपूज्य की ताम्र, पंचरत्न या स्वर्ण की मूर्ति की स्थापना की जाती है और पूरा दिन भगवान की आराधना करके स्थापित मूर्ति का पूजन किया जाता है। पूजा के पूर्ण हो जाने के बाद नैवेद्य, वस्त्र और पुष्प अर्पित करके फल और मिठाई का भोग लगाया जाता है। इस व्रत को करते समय मन में ईर्ष्या और द्वेष जैसे भावों को नहीं लाना चाहिए।

जाने रोहिणी व्रत कब है, व्रत कथा, व्रत के नियम और इसका महत्व Read More »