MYTHOLOGICAL STORIES

शनिदेव को क्यों चढ़ाया जाता है सरसों का तेल? पढ़ें यह पौराणिक कथा

आज शनिवार है। आज का दिन शनिदेव को समर्पित है। इन्हें कर्म फलदाता कहा गया है। क्योंकि शनिदेव लोगों को उनके कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्यक्ति के हर फल का हिसाब शनिदेव के पास ही होता है। आज शनिवार है। आज का दिन शनिदेव को समर्पित है। इन्हें कर्म फलदाता कहा गया है। क्योंकि शनिदेव लोगों को उनके कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, व्यक्ति के हर फल का हिसाब शनिदेव के पास ही होता है। शनिवार के दिन शनिदेव को सरसों का सरसों का तेल चढ़ाया जाता है। लेकिन ऐसा क्यों किया जाता है यह शायद हर किसी को नहीं पता होगा। जागरण अध्यात्म के इस लेख में हम आपको यह बता रहे हैं कि आखिर शनि देव को सरसों का तेल क्यों चढ़ाया जाता है। इसके पीछे कई कथाएं हैं जिनमें से पौराणिक कथा हम आपको बता रहे हैं। पहली धार्मिक कथा के अनुसार, सभ ग्रहों को रावण ने अपने बल से बंदी बना लिया था। इनमें शनिदेव भी शामिल थे। रावण अपने अहंकार में अधिक चूर था और इसी के चलते उसने शनिदेव को कारागार में उल्टा लटका दिया था। इसी दौरान माता सीता की खोज में हनुमान जी श्रीराम के दूत बनकर लंका पहुंचे थे। लेकिन रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगा दी और हनुमान जी ने उससे पूरी लंका जला दी। जब पूरी लंका जल गई तो सारे ग्रह भी मुक्त हो गए। लेकिन शनिदेव उल्टे ही लटके रहे। ऐसे में वो मुक्त नहीं हो पाए। वो काफी समय से उल्टा लटका थे इसी के चलते उनका शरीर बहुत दर्द कर रहा था। उन्हें असहनीय पीड़ा हो रही थी। शनिदेव को इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए हनुमान जी ने शनि देव के शरीर पर सरसों के तेल की मालिश की। मालिश से शनिदेव को दर्द से राहत मिल गई। फिर शनिदेव ने कहा कि जो भी सच्चे मन से उन्हें सरसों का तेल चढ़ाएगा उसकी सभी समस्याएं दूर हो जाएंगी। बस तभी से शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।

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शनि देव कैसे बने कर्मफल दाता? पढ़ें यह पौराणिक कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनि देव न्याय के देवता और कर्मफल दाता  हैं. जो जैसा कर्म करता है, उसे वे वैसा ही फल देते हैं. वे सबके साथ न्याय करते हैं, इसलिए न्याय के देवता हैं. लेकिन जब ये राहु के साथ युति करते हैं, तो दंडनायक की भूमिका में होते हैं. दुष्ट लोगों को उनके कर्मों के लिए दंड भी देते हैं. तभी तो राहु के प्रभाव में आकर उन्होंने अपने वाहन काकोल की मां को भस्म करने के लिए इंद्र देव को दंडित किया था. शनि देव प्रारंभ से ही ऐसे नहीं थे. अपने पिता सूर्य देव से बार बार अपमानित होने के कारण शनि देव कठोर हो गए. आखिर शनि देव कर्मफल दाता कैसे बनें? शिव कृपा से शनि देव बने श्रेष्ठ पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव जब अपनी पत्नी छाया के पास गए तो उनकी तेज से पत्नी ने आंखें बंद कर ली. कुछ समय बाद शनि देव का जन्म हुआ. माता छाया के आंखें बंद कर लेने के कारण वे श्यामवर्ण के हो गए. सूर्य देव उनके रंग को देखकर दुखी हो गए. उन्होंने अपनी पत्नी छाया से कहा कि शनि उनका पुत्र नहीं हो सकता है. इससे उनकी पत्नी बहुत दुखी हुईं और शनि देव यह देखकर क्रोधित हो गए.माता छाया के प्रति पिता सूर्य देव के व्यवहार से शनि देव काफी दुखी और क्रोधित रहते ​थे. उन्होंने शिव उपासना का प्रण लिया. उन्होंने हजारों वर्षों तक भगवान शिव की तपस्या की, जिससे उनका शरीर काला पड़ गया. शनि देव की कठोर तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा l तब शनि देव ने कहा कि उनके पिता सूर्य देव ने हमेशा उनकी माता छाया का अपमान किया है. वह चाहते हैं कि सूर्य देव का अभिमान टूट जाए. तब भगवान शिव ने कहा कि तुम सभी ग्रहों में श्रेष्ठ होगे. आज से तुम सभी लोगों को उनके कर्मों के आधार पर फल दोगे. तुम सबके साथ न्याय करोगे और न्याय के देवता होगे. भगवान शिव की कृपा से ही शनि देव कर्मफल दाता बनें और सभी ग्रहों में श्रेष्ठ हुए.

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रामायण की वास्तविकता के ये हैं 10 सबूत, सच्चाई जान रह जाएंगे हैरान

सतयुग काल में धरती पर भगवान राम के होने की बात कही जाती है। इस पूरे घटनाक्रम का विवरण हिंदू ग्रंथ रामायण में देखने को मिलता है। इसमें रामायण से जुड़े कई ऐसे रहस्यों के बारे में बताया गया है, जो भगवान के धरती पर मौजूद होने का सबूत देते हैं। तो कौन-सी हैं वो बातें आइए जानते हैं। 1.भगवान राम के धरती पर होने का सबसे बड़ा सबूत रामसेतु का होना है। समुद्र के ऊपर श्रीलंका तक बने इस सेतु के बारे में रामायण में लिखा है गया है। इस पुल को पत्थर से बनाया था। 2.पुरातत्व विभाग के अनुसार 1,750,000 साल पहले श्रीलंका में सबसे पहले इंसानों के घर होने की बात सामने आई थी। राम सेतु भी उसी काल का है। 3.रावण की सेना से युद्ध के दौरान लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने पर हनुमान जी संजीवनी लेने द्रोणागिरी पर्वत गए थे। जड़ी बूटी की पहचान न होने पर वे पूरा पर्वत ले गए थे। युद्ध के बाद उन्होंने द्रोणागिरी को वापस अपनी जगह पहुंचा दिया। पर्वत पर आज भी वो निशान मौजूद हैं जहां से हनुमान जी ने उसे तोड़ा था। 4.श्रीलंका में जिस स्थान पर लक्ष्मण जी को संजीवनी दी गई थी वहां आज भी हिमालय की ऐसी दुर्लभ जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं जो दूसरे हिस्सों में नहीं मिलती है। 5.लंकापति रावण जब सीता का हरण कर ले गया था, तब उसने देवी सीता को अशोक वाटिका में रखा था। ये जगह आज भी लंका में मौजूद है। 6.रामायण के सुंदर कांड में बताया गया कि श्रीलंका की रखवाली के लिए रावण ने एक विशालकाय हाथी रखा था। हनुमान जी ने इसे धराशायी किया था। पुरातत्व विभाग को श्रीलंका में ऐसे हाथियों के अवशेष मिले हैं जिनका आकार आम हाथियों से बहुत ज़्यादा था। 7.हनुमान जी के लंका जलाने से रावण डर गया था। दोबारा हमले से बचने के लिए रावण ने सीता जी को अशोक वाटिका से हटा कर कोंडा कट्टू गाला में रखा था। यहां पुरातत्व विभाग को कई गुफ़ाएं मिली हैं जो रावण के महल तक जाती हैं। 8.रावण के मरने के बाद विभीषण को लंका का राजा बनाया गया था। उन्होंने अपना महल कालानियां में बनवाया था। यह एक नदी के किनारे बसा है। पुरातत्व विभाग को कैलानी नदी से उस महल के कुछ अवशेष मिले हैं। 9.रामायण ग्रंथ के अनुसार हनुमान जी ने लंका की सोने की नगरी जलाकर स्वाहा कर दी थी। तभी आज भी श्रीलंका में कुछ जगहों की मिट्टी बिल्कुल काली है। 10.रावण ने कोणेश्वरम मंदिर के पास गर्म पानी के कुएं बनवाए थे। ये कुएंजो आज भी वहां मौजूद हैं और इनसे गर्म पानी निकलता है।

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सत्यनारायण की कथा क्यों की जाती है, जानिए व्रत पूजा, महत्व और मंत्र

स्कंद पुराण के रेवाखंड में भगवान श्री सत्यनारायण की कथा का उल्लेख किया गया है। यह कथा सभी प्रकार के मनोरथ पूर्ण करने वाली, अनेक दृष्टि से अपनी उपयोगिता सिद्ध करती है। यह कथा समाज के सभी वर्गों को सत्यव्रत की शिक्षा देती है। भगवान श्री सत्यनारायण की व्रत कथा आस्थावान हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए जानी-मानी कथा है। संपूर्ण भारत में इस कथा के प्रेमी अनगिनत संख्या में हैं, जो इस कथा और व्रत का नियमित पालन व पारायण करते हैं। श्री सत्यनारायण व्रत गुरुवार को भी किया जाता है।  सत्यनारायण पूजा का महत्व सत्य को ईश्वर मानकर, निष्ठा के साथ समाज के किसी भी वर्ग का व्यक्ति यदि इस व्रत व कथा का श्रवण करता है, तो उसे इससे निश्चित ही मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि सत्यनारायण कथा कराने से हजारों साल तक किए गए यज्ञ के बराबर फल मिलता है। साथ ही सत्यनारायण कथा सुनने को भी सौभाग्य की बात माना गया है। आमतौर पर देखा जाता है किसी भी शुभ काम से पहले या मनोकामनाएं पूरी होने पर सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी जाती है।  श्री सत्यनारायण की व्रत की पौराणिक कथा  चिरकाल में एक बार जब भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में विश्राम कर रहे थे। उसी समय नारद जी वहां पधारे। नारद जी को देख भगवान श्री हरि विष्णु बोले- हे महर्षि आपके आने का प्रयोजन क्या है? तब नारद जी बोले- नारायण नारायण प्रभु! आप तो पालनहार हैं। सर्वज्ञाता हैं। प्रभु-मुझे ऐसी कोई सरल और छोटा-सा उपाय बताएं, जिसे करने से पृथ्वीवासियों का कल्याण हो। इस पर भगवान श्री हरि विष्णु बोले- हे देवर्षि! जो व्यक्ति सांसारिक सुखों को भोगना चाहता है और मरणोपरांत परलोक जाना चाहता है। उसे सत्यनारायण पूजा अवश्य करनी चाहिए। विष्णु जी द्वारा बताए गए व्रत का वृत्तांत व्यास मुनि जी द्वारा स्कंद पुराण में वर्णन करना। नैमिषारण्य तीर्थ में सुखदेव मुनि जी द्वारा ऋषियों को इस व्रत के बारे में बताना। सुखदेव मुनि जी ने कहा और इस सत्यनारायण कथा के व्रत में आगे जिन लोगों ने व्रत किया जैसे बूढ़ा लकड़हारा, धनवान सेठ, ग्वाला और लीलावती कलावती की कहानी इत्यादि और आज यही एक सत्यनारायण कथा का भाग बन चुका है। यही है सत्यनारायण कथा का उद्गम नारद जी और विष्णु जी का संवाद। भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को क्यों दिया था श्राप? पढ़ें यह पौराणिक कथा व्रत-पूजन कैसे करें इसके बाद नारद जी ने भगवान श्रीहरि विष्णु से व्रत विधि बताने का अनुरोध किया। तब भगवान श्रीहरि विष्णु जी बोले-  सत्यनारायण व्रत करने के लिए व्यक्ति को दिन भर उपवास रखना चाहिए।  श्री सत्यनारायण व्रत पूजनकर्ता को स्नान करके कोरे अथवा धुले हुए शुद्ध वस्त्र पहनें। माथे पर तिलक लगाएं और शुभ मुहूर्त में पूजन शुरू करें। इस हेतु शुभ आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके सत्यनारायण भगवान का पूजन करें।  इसके पश्चात्‌ सत्यनारायण व्रत कथा का वाचन अथवा श्रवण करें। संध्याकाल में किसी प्रकांड पंडित को बुलाकर सत्य नारायण की कथा श्रवण करवाना चाहिए।  भगवान को भोग में चरणामृत, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम, फल, फूल, पंचगव्य, सुपारी, दूर्वा आदि अर्पित करें। इससे सत्यनारायण देव प्रसन्न होते हैं।  सत्यनारायण व्रत पूर्णिमा के दिन करने का विशेष महत्व है, क्योंकि पूर्णिमा सत्यनारायण का प्रिय दिन है, इस दिन चंद्रमा पूर्ण कलाओं के साथ उदित होता है और पूर्ण चंद्र को अर्घ्य देने से व्यक्ति के जीवन में पूर्णता आती है।  पूर्णिमा के चंद्रमा को जल से अर्घ्य देना चाहिए।  घर का वातावरण शुद्ध करके चौकी पर कलश रखकर भगवान श्री विष्णु की मूर्ति या सत्यनारायण की फोटो रख कर पूजन करें। परिवारजनों को एकत्रित करके भजन, कीर्तन, नृत्य गान आदि करें। सबके साथ प्रसाद ग्रहण करें, तदोपरांत चंद्रमा को अर्घ्य दें। यही सत्यनारायण भगवान की कृपा पाने का मृत्यु लोक में सरल उपाय है। श्री सत्यनारायण मंत्र ‘ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः’ का 108 बार जाप करें।

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भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को क्यों दिया था श्राप? पढ़ें यह पौराणिक कथा

लोग माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कई प्रकार के उपाय करते हैं. जिन पर माता लक्ष्मी की कृपा हो जाती है, वह धन धान्य से परिपूर्ण हो जाता है. हर कोई उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लेना चाहता है. कोई नहीं चाहता कि माता लक्ष्मी उससे नाराज हो जाएं. हालांकि एक बार भगवान विष्णु   माता लक्ष्मी से नाराज हो गए थे और उनको श्राप दे दिया था. आखिर ऐसा क्यों हुआ? पढ़ें यह पौराणिक कथा. जब माता लक्ष्मी को मिला श्राप एक समय की बात है माता लक्ष्मी एक सुंदर अश्व को देखने में इतनी ध्यानमग्न थीं, कि उन्होंने भगवान विष्णु की बातों पर ध्यान नहीं दिया. इससे क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने उनको पृथ्वी लोक पर अश्वी बनने का श्राप दे दिया. इससे माता लक्ष्मी दुखी हो गईं, तो भगवान विष्णु ने कहा कि आपको कुछ समय के लिए अश्व की योनी में रहना होगा. फिर आपको एक पुत्र होगा. उसके बाद ही उस योनी से मुक्ति मिलेगी. जब समय आया तो माता लक्ष्मी पृथ्वी पर अश्व की योनी में जीवन व्यतीत करने लगीं. उन्होंने काफी समय तक भगवान शिव की आराधना की. अपने तप से उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न किया. भगवान शिव ने कहा कि आपके पति भगवान विष्णु इस पूरे संसार के पालनहार हैं. एक स्त्री का पति ही उसका भगवान होता है. आपको केवल भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए. इस पर माता लक्ष्मी ने कहा कि आप में और श्रीहरि में कोई भेद नहीं हैं. बस दोनों का स्वरूप अलग अलग है. आप यह दुख दूर कीजिए ताकि वह अश्व की योनी से मुक्त हों. इस पर प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको आशीष दिया और भगवान विष्णु को पृथ्वी लोक पर जाने के बारे में अवगत कराने का वचन दिया. कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने अश्व रुप में अवतार लिया और माता लक्ष्मी के साथ अश्व योनी में समय व्यतीत किया. माता लक्ष्मी ने कुछ समय बाद एकवीर नामक पुत्र को जन्म दिया. उसके फलस्वरूप माता लक्ष्मी श्राप से मुक्त होकर वैकुंठ धाम चली गईं. एकवीर से हैहय वंश की उत्पत्ति हुई.

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 जनवरी से लेकर दिसंबर तक कब करा सकते हैं सत्यनारायण की कथा? जानिए तिथि और मुहूर्त

सत्यनारायण की कथा आमतौर पर सुबह और शाम दोनों समय की जाती है। लेकिन शाम के समय कथा करना काफी शुभ माना जाता है। क्योंकि कई बार पंचांग के अनुसार तिथि सुबह ही समाप्त हो जाती है। ऐसे में नए मास की शुरुआत में सत्यनारायण की कथा कराने के बजाय शाम के समय करना अच्छा होता है। 2023 पंचांग के अनुसार हर मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन भगवान विष्णु के अवतार सत्यनारायण की पूजा और कथा करने का विधान है। इस साल में हर मास में सत्यनारायण कथा करने के शुभ मुहूर्त बन रहे हैं। हिंदू धर्म में भगवान सत्यनारायण का विशेष महत्व है। भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों में से एक भगवान सत्यनारायण माना जाता है। इस रूप में भगवान को सत्य का अवतार माना गया है। सत्यनारायण पूजा सदियों से ऐसे ही चली आ रही है। परिवार में सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए सत्यनारायण कथा की जाती है। पंचांग के अनुसार, सत्यनारायण की कथा किसी भी मास की शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि को जाती है। जानिए साल 2023 में कब-कब करना सकते हैं सत्यनारायण की कथा। सत्यनारायण की कथा आमतौर पर सुबह और शाम दोनों समय की जाती है। लेकिन शाम के समय कथा करना काफी शुभ माना जाता है। क्योंकि कई बार पंचांग के अनुसार तिथि सुबह ही समाप्त हो जाती है। ऐसे में नए मास की शुरुआत में सत्यनारायण की कथा कराने के बजाय शाम के समय करना अच्छा होता है। साल 2023 में सत्यनारायण पूजा-व्रत के लिए तिथि और मुहूर्त की सूची 6 जनवरी 2023, शुक्रवार- पौष पूर्णिमा प्रारंभ – 6 जनवरी को सुबह 02 बजकर 14 मिनट से समाप्त – 7 जनवरी सुबह 04 बजकर 37 मिनट तक 5 फरवरी 2023 रविवार- माघ पूर्णिमा प्रारंभ – 4 फरवरी को रात 09 बजकर 29 मिनट से शुरू समाप्त – 5 फरवरी को रात 11 बजकर 58 मिनट तक 7 मार्च 2023 मंगलवार- फाल्गुन पूर्णिमा प्रारंभ – 6 मार्च को शाम 04 बजकर 17 मिनट से शुरू समाप्त -7 मार्च को शाम 06 बजकर 09 मिनट तक 5 अप्रैल 2023 बुधवार- चैत्र पूर्णिमा प्रारंभ – 5 अप्रैल को सुबह 09 बजकर 19 मिनट से समाप्त – 6 अप्रैल को सुबह 10 बजकर 04 मिनट तक 5 मई 2023 शुक्रवार- वैशाख पूर्णिमा प्रारंभ – 04 मई को रात 11 बजकर 44 मिनट से समाप्त – 5 मई को रात 11 बजकर 03 मिनट तक 3 जून 2023 शनिवार- ज्येष्ठ पूर्णिमा प्रारंभ – 3 जून को को रात 11 बजकर 16 मिनट से शुरू समाप्त – 4 जून को रात 09 बजकर 11 मिनट तक 3 जुलाई 2023 सोमवार- आषाढ़ पूर्णिमा प्रारंभ – 2 जुलाई को रात 08 बजकर 21 मिनट से शुरू समाप्त – 3 जुलाई को शाम 05 बजकर 08 मिनट पर समाप्त 1 अगस्त 2023, मंगलवार – श्रावण पूर्णिमा प्रारंभ – 1 अगस्त को सुबह 3 बजकर 51 मिनट से समाप्त – 2 जुलाई को सुबह 12 बजकर 1 मिनट तक 30 अगस्त 2023 बुधवार- श्रावण पूर्णिमा प्रारंभ – 30 अगस्त को रात 10 बजकर 58 मिनट से शुरू समाप्त – 31 अगस्त को सुबह 07 बजकर 05 मिनट में समाप्त 29 सितंबर 2023 शुक्रवार- भाद्रपद पूर्णिमा प्रारंभ – 28 सितंबर को शाम 06 बजकर 49 मिनट पर शुरू समाप्त – 29 सितंबर को दोपहर 03 बजकर 26 मिनट तक 28 अक्टूबर 2023 शनिवार- अश्विन पूर्णिमा प्रारंभ – 28 अक्टूबर को सुबह 04 बजकर 17 मिनट तक समाप्त – 29 अक्टूबर को सुबह 01 बजकर 53 मिनट तक 27 नवंबर 2023 सोमवार- कार्तिक पूर्णिमा प्रारंभ – 26 नवंबर को दोपहर 03 बजकर 53 मिनट से समाप्त – 27 नवंबर को दोपहर 02 बजकर 45 मिनट तक 26 दिसंबर 2023 मंगलवार, मार्गशीर्ष पूर्णिमा प्रारंभ – 26 दिसंबर को सुबह 05 बजकर 46 मिनट से शुरू समाप्त – 27 दिसंबर को सुबह 06 बजकर 02 मिनट तक

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वैष्णो देवी गुफा मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथा

वैष्णो देवी का विश्व प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में कटरा नगर के समीप की पहाड़ियों पर स्थित है। इन पहाड़ियों को त्रिकुटा पहाड़ी कहते हैं। यहीं पर लगभग 5,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है मातारानी का मंदिर। यह भारत में तिरूमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थ स्थल है। मंदिर परिचय त्रिकुटा की पहाड़ियों पर स्थित एक गुफा में माता वैष्णो देवी की स्वयंभू तीन मूर्तियां हैं। देवी काली (दाएं), सरस्वती (बाएं) और लक्ष्मी (मध्य), पिण्डी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों पिण्डियों के सम्मि‍लित रूप को वैष्णो देवी माता कहा जाता है। इस स्थान को माता का भवन कहा जाता है। पवित्र गुफा की लंबाई 98 फीट है। इस गुफा में एक बड़ा चबूतरा बना हुआ है। इस चबूतरे पर माता का आसन है जहां देवी त्रिकुटा अपनी माताओं के साथ विराजमान रहती हैं। भवन वह स्थान है जहां माता ने भैरवनाथ का वध किया था। प्राचीन गुफा के समक्ष भैरो का शरीर मौजूद है और उसका सिर उड़कर तीन किलोमीटर दूर भैरो घाटी में चला गया और शरीर यहां रह गया। जिस स्थान पर सिर गिरा, आज उस स्थान को ‘भैरोनाथ के मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। कटरा से ही वैष्णो देवी की पैदल चढ़ाई शुरू होती है जो भवन तक करीब 13 किलोमीटर और भैरो मंदिर तक 14.5 किलोमीटर है। मंदिर की पौराणिक कथा मंदिर के संबंध में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। एक बार त्रिकुटा की पहाड़ी पर एक सुंदर कन्या को देखकर भैरवनाथ उससे पकड़ने के लिए दौड़े। तब वह कन्या वायु रूप में बदलकर त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ चलीं। भैरवनाथ भी उनके पीछे भागे। माना जाता है कि तभी मां की रक्षा के लिए वहां पवनपुत्र हनुमान पहुंच गए। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए। फिर वहीं एक गुफा में गुफा में प्रवेश कर माता ने नौ माह तक तपस्या की। हनुमानजी ने पहरा दिया। फिर भैरव नाथ वहां आ धमके। उस दौरान एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है, इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्द्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्द्धकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। अंत में गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया और भैरवनाथ वापस जाने का कह कर फिर से गुफा में चली गईं, लेकिन भैरवनाथ नहीं माना और गुफा में प्रवेश करने लगा। यह देखकर माता की गुफा कर पहरा दे रहे हनुमानजी ने उसे युद्ध के लिए ललकार और दोनों का युद्ध हुआ। युद्ध का कोई अंत नहीं देखकर माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का वध कर दिया। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने मां से क्षमादान की भीख मांगी। माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी। तब उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त, मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। मंदिर की कथा उपरोक्त कथा को वैष्णो देवी के भक्त श्रीधर से जोड़कर भी देखा जाता है। 700 वर्ष से भी अधिक समय पहले कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वे नि:संतान और गरीब थे। लेकिन वे सोचा करते थे कि एक दिन वे माता का भंडारा रखेंगे। एक दिन श्रीधर ने आस-पास के सभी गांव वालों को प्रसाद ग्रहण करने का न्योता दिया और भंडारे वाले दिन श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बनाकर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सके। जितने लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं थी क्योंकि मेहमान बहुत ज्यादा थे। वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर की वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे। वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी मां से ही आस थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए, दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे, श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी-सी कुटिया में आसानी से बैठ गए। श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा की इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उसने एक छोटी लड़की को झोपडी से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था। वह भगवान की कृपा से आई थी, वह सभी को स्वादिष्ट भोजन परोस रही थी, भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था। भंडारे के बाद, श्रीधर उस छोटी लड़ी वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, पर वैष्णवी गायब हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया उसमें स्पष्ट हुआ कि वह मां वैष्णोदेवी थी। माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया। श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े और कुछ दिनों बाद उन्हें वह गुफा मिल गई। तभी से वहां पर माता के दर्शन के लिए श्रद्धालु जाने लगे। 

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कामिका एकादशी व्रत कथा व्रत विधि महत्व

श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम कामिका एकादशी है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से हर बिगड़े काम बनते हैं। व्रत करने से उपासकों के साथ-साथ उनके पित्रों के कष्ट भी दूर हो जाते हैं और उपासकों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। संसार सागर तथा पापों में फँसे हुए मनुष्यों को इनसे मुक्ति के लिये कामिका एकादशी का व्रत करना चाहिये। कामिका एकादशी के उपवास से भी पाप नष्ट हो जाते हैं, संसार में इससे अधिक पापों को नष्ट करने वाला कोई और उपाय नहीं है। कामिका एकादशी व्रत कथा एक नगर में एक ठाकुर और एक ब्राह्मण रहते थे। दोनों की एक दूसरे से बनती नहीं थी। आपसी झगड़े के कारण ठाकुर ने ब्राह्मण को मार डाला। इस पर नाराज ब्राह्मणों ने ठाकुर के घर खाना खाने से मना कर दिया। ठाकुर अकेला पड़ गया और वह खुद को दोषी मानने लगा। ठाकुर को अपनी गलती महसूस हुई और उसने एक मुनी से अपने पापों का निवारण करने का तरीका पूछा। इस पर, मुनी ने उन्हें कामिका एकादशी का उपवास करने के लिए कहा। निर्जला एकादशी व्रत की पूजा में जरुर शामिल करें ये 4 खास चीज, इनके बिना अधूरी है विष्णु पूजा ठाकुर ने ऐसा ही किया। ठाकुर ने व्रत करना शुरू कर दिया। एक दिन कामिका एकादशी के दिन जब ठाकुर भगवान की मूर्ति के निकट सोते हुए एक सपना देखा, भगवान ने उसे बताया, “ठाकुर, सभी पापों को हटा दिया गया है और अब आप ब्राह्मण हटिया के पाप से मुक्त हैं”।इसलिए, इस एकादशी को आध्यात्मिक साधकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह चेतना से सभी नकारात्मकता को नष्ट करता है और मन और हृदय को दिव्य प्रकाश से भर देता है। कामिका एकादशी व्रत विधि एकादशी के दिन स्नानादि से पवित्र होने के पश्चात संकल्प करके श्री विष्णु के विग्रह की पूजन करना चाहिए। भगवान विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत आदि नाना पदार्थ निवेदित करके, आठों प्रहर निर्जल रहकर विष्णु जी के नाम का स्मरण एवं कीर्तन करना चाहिए। एकादशी व्रत में ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा का बड़ा ही महत्व है अत: ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात ही भोजना ग्रहण करें। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी के दिन किया जाता है। अतः द्वादशी के दिन घर पर ब्राह्मण को बुलाएं और उन्हें खाना खिलाएं और सामर्थ्य अनुसार उन्हें दान दक्षिणा दें। उसके बाद स्वयंं पारण करें। ध्यान रहे कि पारण के समय के दौरान ही पारण किया जाना चाहिए। अगर ब्राह्मण को घर बुलाकर भोजन कराने का सामर्थ्य नहीं है तो आप एक व्यक्ति के भोजन के बराबर अनाज किसी गरीब को या मंदिर में दान कर दें। यह भी आपको उतना ही फल प्रदान करेगा। इस प्रकार जो कामिका एकादशी का व्रत रखता है उसकी कामनाएं पूर्ण होती हैं। कामिका एकादशी व्रत के नियम एकादशी व्रत का तीन दिन का नियम होता है। यानी दशमी, एकादश और द्वादशी को कामिका एकादशी के नियमों का पालन होता है। इन तीन दिनों के दौरान जातकों को चावल नहीं खाने चाहिए। इसके साथ ही लहसुन, प्याज और मसुर की दाल का सेवन वर्जित है। मांस और मदिरा का सेवन भूल कर भी नहीं करना चाहिए। दशमी के दिन एक समय भोजन ग्रहण करना चाहिए और सूर्यास्त के बाद कुछ भी नहीं खाना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात: काल उठकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए। एकादशी की रात को जागरण करना चाहिए। एकादशी के दिन जागरण करना भी व्रत का ही हिस्सा है। द्वादशी के दिन पूजा कर पंडित को यथाशक्ति दान देना चाहिए और उसके बाद पारण करना चाहिए। एकादशी के दिन दातुन नहीं करना चाहिए। अपनी उंगली से ही दांत साफ करें। क्योंकि एकादशी के दिन पेड़ पौधों को तोड़ते नहीं है। इस दिन किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। कामिका एकादशी महत्व इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। कामिका एकादशी के उपवास में शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु का पूजन होता है। जो मनुष्य इस एकादशी को धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन्हें गंगा स्नान के फल से भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है। सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण में केदार और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है, वह पुण्य कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करने से प्राप्त हो जाता है। आभूषणों से युक्त बछड़ा सहित गौदान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह फल कामिका एकादशी के उपवास से मिल जाता है। जो उत्तम द्विज श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का उपवास करते हैं तथा भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, उनसे सभी देव, नाग, किन्नर, पितृ आदि की पूजा हो जाती है, इसलिये पाप से डरने वाले व्यक्तियों को विधि-विधान सहित इस उपवास को करना चाहिये। संसार सागर तथा पापों में फँसे हुए मनुष्यों को इनसे मुक्ति के लिये कामिका एकादशी का व्रत करना चाहिये। कामिका एकादशी के उपवास से भी पाप नष्ट हो जाते हैं, संसार में इससे अधिक पापों को नष्ट करने वाला कोई और उपाय नहीं है। इस कामिका एकादशी की रात्रि को जो मनुष्य जागरण करते हैं और दीप-दान करते हैं, उनके पुण्यों को लिखने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं।

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आस्था का केंद्र ही नहीं धरोहर भी है गोला का शिव मंदिर

गोला गोकर्णनाथ। छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध गोला गोकर्णनाथ के पौराणिक शिव मंदिर के महात्म्य और प्रसंग पुराणों और लोक कथाओं में मिलते हैं। यह पूरे तराई क्षेत्र का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। यह मंदिर प्रदेश की अनमोल धरोहर तो है ही, यहां होने वाले धार्मिक आयोजन और मेले सांस्कृतिक विरासत भी हैं। मान्यता है कि भगवान शंकर ने यहां मृग रूप में विचरण किया था। वराह पुराण में वर्णन है कि भगवान शंकर वैराग्य उत्पन्न होने पर यहां के वन क्षेत्र में भ्रमण करने आए और रमणीक स्थल देखकर यही रम गए। ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र को चिंता हुई और वह उन्हें ढूंढने के लिए निकले तो इस वन प्रांत में विशाल मृग को सोते देखकर समझ गए कि यही शिव हैं। वे जैसे ही उनके निकट गए तो आहट पाकर मृग भागने लगा। कथा के अनुसार देवताओं ने उनका पीछा कर उनके सींग पकड़ लिए तो सींग तीन टुकड़ों में विभक्त हो गया। सींग का मूल भगवान विष्णु ने यहां स्थापित किया, जो गोकर्ण नाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सींग का दूसरा टुकड़ा ब्रह्मा जी ने बिहार के श्रंगवेश्वर में स्थापित किया। तीसरा टुकड़ा देवराज इंद्र अपने साथ ले गए, जिसे उन्होंने अमरावती में स्थापित किया।यहां के महत्व का वर्णन शिव पुराण वामन, पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में भी मिलता है। पौराणिक शिव मंदिर से जुड़ी एक किवदंती भी लोक मान्यता का रूप ले चुकी है कि भगवान शिव लंकापति रावण की तपस्या से प्रसन्न हुए और रावण भगवान शिव को अपने साथ लंका ले जाने लगा। भगवान शिव ने शर्त रखी कि उन्हें रास्ते में कहीं भी रखा, तो वह उस स्थान से नहीं जाएंगे। छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है गोला गोकर्णनाथ, सावन में जरूर करें दर्शन शर्त के अनुसार रावण भगवान शिव को लेकर लंका के लिए चला। जब रावण गोला गोकर्णनाथ के पास पहुंचा तो उसे लघुशंका का आभास हुआ। रावण एक चरवाहे को इस हिदायत के साथ शिवलिंग देकर लघुशंका के लिए चला गया कि वह शिवलिंग भूमि पर नहीं रखेगा। काफी देर तक वापस ना आने पर चरवाहे ने भगवान शिवलिंग को भूमि पर रख दिया।वापस लौटे रावण ने शिवलिंग उठाने की कोशिश की मगर नहीं उठा सका। इस पर गुस्से में अपने अंगूठे से शिवलिंग को भूमि में दबा दिया। मान्यता है कि गोला के पौराणिक शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग में रावण के अंगूठे का निशान आज भी मौजूद है।भूतल से नौ फिट की गहराई में स्थापित है शिवलिंग – पौराणिक शिव मंदिर परिसर में प्रवेश द्वार सहित चारों दिशा में द्वार हैं। वहीं, मंदिर के तीन द्वार हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग भूतल से नौ फीट की गहराई में है। शिवभक्त दंडवत करके ही दर्शन पाते हैं। पौराणिक शिव मंदिर के निकट गोकर्ण तीर्थ 5300 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में है। जिसका 2016 में आवास विकास योजना के तहत एक करोड़ 10 लाख रुपए की लागत से जीर्णोद्धार कराया गया था। वहीं वर्ष 2014 में शिव सेवार्थ समिति द्वारा शिव भक्तों के सहयोग से तीर्थ के मध्य विशालकाय भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कराई थी।डेढ़ शताब्दी पहले जूना अखाड़ा के नागा साधु करते थे मंदिर की देखभाल – पौराणिक शिव मंदिर कमेटी अध्यक्ष जनार्दन गिरी ने बताया कि करीब डेढ़ सदी पहले जूना अखाड़ा के नागा पंथ शिव मंदिर की देखरेख करता था, जो हाथियों पर आसीन होकर यहां आते थे। जूना अखाड़ा के नागा पंथ ने ही गोस्वामी समाज को मंदिर की देखरेख का जिम्मा दिया था।मंदिर निर्माण सर्वप्रथम किसने कराया, इसके प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हालांकि, पूर्वज बताते थे कि यहां एक गोल गुंबद का छोटा मंदिर हुआ करता था। जिसे शिव भक्तों ने जीर्णोद्धार करा कर भव्य रुप दिया। वर्तमान में शिव मंदिर का जो स्वरूप है उसका जीर्णोद्धार बरेली के शिवभक्त परिवार के डॉ. संजय अग्रवाल. डा.ॅ रेनू अग्रवाल, डॉ. हिमांशु अग्रवाल, डॉ. प्रियंका अग्रवाल ने कराया है।

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छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है गोला गोकर्णनाथ, सावन में जरूर करें दर्शन

सावन का पवित्र माह चल रहा है और इस समय भक्त भगवान शिव के दर्शन करने लिए शिवनगरी जाते हैं। कोई कांवड़ यात्रा में शामिल होकर तो कोई अन्य माध्यमों से भोलेनाथ का आर्शीवाद लेने के लिए उनकी शरण में जाता है। यूपी के लखीमपुरी खीरी जिले की गोला तहसील में भी छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव की नगरी गोला गोकर्णनाथ है, जहां पर दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। गोला के गोकर्णनाथ के बारे में कहा जाता है कि सतयुग में लंका का राजा रावण भगवान शिव को यहां लाया था। नवरात्रि में मां दुर्गा के इन 8 मंदिरों में आप भी दर्शन करने पहुंचें, मुरादे होंगी पूरी गोला गोकर्णनाथ के बारे में प्राचीन कथा जैसा की प्राचीन कथाओं में बताया गया है कि लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की। रावण की तपस्या से खुश होकर भगवान ने उससे वरदान मांगने को कहा तो रावण ने कहा कि वह उन्हें अपने साथ लंका ले जाना चाहता है। यह सुनकर सभी देवता परेशान हो गए और ब्रह्माजी के पास गए और कहा कि अगर शिव रावण के साथ लंका चले तो सृष्टि का कार्य कैसे होगा? इसके बाद ब्रह्माजी ने भगवान शिव को सोच समझकर वरदान देने के लिए कहा। इस पर शिवजी ने रावण से कहा कि यदि तुम मुझे लंका ले जाना चाहते हो तो ले चलो लेकिन मेरी एक शर्त रहेगी। भगवान शिव ने रावण से कहा कि जहां भी मुझे भूमि स्पर्श हो जाएगी, मैं वही स्थापित हो जाउंगा। इस बात पर रावण सहमत हो गया। भगवान ने एक शिवलिंग का रूप धारण कर लिया। इसके बाद रावण शिवलिंग को लेकर जा रहा था। इसी दौरान भगवान शिव ने रावण को लघुशंका की इच्छा जगा दी। काफी समय तक बर्दाश्त करने के बाद रावण ने एक चरवाहे को शिवलिंग पकड़ाकर लघुशंका करने लगा। इसी समय भगवान ने अपना वजन बढ़ा दिया और इससे चरवाहे ने रावण को आवाज लगाकर कहा कि वह अब इस शिवलिंग को उठाए नहीं रह सकता है। रावण लघुशंका करने में व्यस्त होने के कारण सुन नहीं पाया। इधर चरवाहे ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। जब रावण वापस आया और वह चरवाहे का मारने के लिए दौड़ा तो चरवाहे कुएं में गिर गया। इसके बाद रावण ने शिवलिंग को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह असफल रहा। इससे क्रोधित होकर रावण ने अंगुठे से शिवलिंग को जोर से दबा दिया, आज भी शिवलिंग पर रावण के अंगुठे का निशान है। रावण निराश होकर वापस लंका चला गया। इसके बाद भगवान शिव ने चरवाहे की आत्मा को बुलाकर कहा कि आज के बाद लोग तुम्हें भूतनाथ के नाम से जानेंगे और मेरे दर्शन के बाद तुम्हारे दर्शन करने पर भक्तों को विशेष पूण्यलाभ मिलेगा। इसके बाद से श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने के लिए गोला के गोकर्णनाथ आते हैं। सावन के महीने में भगवान शिव दर्शनों को आने वाले लाखों भक्त शिवलिंग के दर्शनों के बाद बाबा भूतनाथ के भी दर्शन अवश्य करते हैं। लखीमपुर खीरी जिले की गोला तहसील में स्थित गोकर्णनाथ लखीमपुर और शाहजहांपुर के रूट पर है। लखीमपुर से मंदिर की दूरी 35 किलोमीटर है। गोला के लिए बस और ट्रेन आसानी से उपलब्ध हैं।

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भगवान श्री राम जी के 9 सबसे प्रसिद्ध मंदिर

1. त्रिप्रायर श्री राम मंदिर, केरल 2. कालाराम मंदिर, नासिक 3. सीता रामचंद्रस्वामी मंदिर, तेलंगाना 4. राम राजा मंदिर, मध्य प्रदेश 5. कनक भवन मंदिर, अयोध्या 6. श्री राम तीर्थ मंदिर, अमृतसर 7. कोंडांडा रामास्वामी मंदिर, चिकमंगलूर 8. रामास्वामी मंदिर, तमिलनाडु 9. रघुनाथ मंदिर, जम्मू देश में मौजूद अन्य राम मंदिरों की जानकारी शायद ही हर किसी को हो। बता दें कि भारत में कई राम मंदिर विद्यमान हैं।  1. त्रिप्रायर श्री राम मंदिर, केरल यह मंदिर केरल के त्रिशूर जिले में स्थित है। यहां स्थापित मूर्ति के पीछे बहुत ही आकर्षक कहानी है। कहा जाता है कि यहां स्थापित मूर्ति का इस्तेमाल भगवान कृष्ण द्वारा किया जाता था। यह मूर्ति समुद्र में डूबी हुई थी और केरेला के चेट्टुवा क्षेत्र के एक मछुआरे द्वारा स्थापित की गई थी। इसके बाद शासक वक्कायिल कैमल ने उस मूर्ति को त्रिपयार मंदिर में स्थापित किया। यह मंदरि बेहद ही खुबसूरत है। मान्यता है कि जो भक्त यहां दर्शन करता है वो अपने आसपास की सभी बुरी आत्माओं से मुक्त हो जाता है। प्रसिद्ध 10 गणेश मंदिर, जहां जाने से होती हैं मुरादें पूर्ण 2. कालाराम मंदिर, नासिक: कालाराम मंदिर महाराष्ट्र के नासिक के पंचवटी क्षेत्र में स्थित है। इसका शाब्दिक अर्थ काला राम है। यहां पर भगवान राम की 2 फीट ऊंची काली प्रतिमा स्थापित है। माता सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां भी स्थापित हैं। ऐसा माना जाता है कि 14 वर्ष के वनवास के लिए जब श्री राम, माता सीत और लक्ष्मण आए थे तब 10वे वर्ष बाद वह पंचवटी में गोदावरी नदी के किनारे रहे थे। इस मंदिर का निर्माण सरदार रंगारू ओढेकर ने किया था। इन्होंने एक सपना देखा था कि गोदावरी नदी में राम की एक काली मूर्ति है। इस मूर्ति को इन्होंने अगले ही दिन निकाला और कालाराम मंदिर की स्थापना की। 3. सीता रामचंद्रस्वामी मंदिर, तेलंगाना: यह मंदिर तेलंगाना के भद्राद्री कोठागुडेम जिले के भद्राचलम में स्थित है। यह मंदिर वहां खड़ा है जहां श्री राम ने लंका से माता सीता को वापस लाने के लिए गोदावरी नदी को पार किया था। मंदिर के अंदर भगवान राम की धनुष और बाण के साथ त्रिभंगा के रुख में मूर्ति स्थापित है। देवी सीता हाथ में कमल लेकर उनके बगल में खड़ी हैं। 4. राम राजा मंदिर, मध्य प्रदेश: यह मंदिर मध्य प्रदेश के ओरछा में स्थित है। राम राजा मंदिर भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां श्री राम को भगवान के रूप में नहीं बल्कि राजा के रूप में पूजा जाता है। यहां हर दिन गार्ड ऑफ ऑनर किया जाता है। श्री राम को शस्त्र सलामी दी जाती है। 5. कनक भवन मंदिर, अयोध्या: राम जन्मभूमि यानी अयोध्या भगवान राम का जन्म स्थान है। यहां पर स्थित कनक भवन मंदिर, अयोध्या में सबसे अच्छे राम मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर के नाम के पीछे भी एक कहानी है। इसका नाम सोने के आभूषणों और राम और सीता की मूर्तियों के स्वर्ण सिंहासन के कारण रखा गया है। इस मंदिर को इस तरह बनाया गया है कि इसकी मुख्य दीवार पूर्व दिशा की तरफ है। जब भी सूर्योदय होता है तो उसकी दीवारें तेजस्वी दिखती हैं। 6. श्री राम तीर्थ मंदिर, अमृतसर: यह मंदिर अमृतसर, पंजाब में स्थित है। जब लंका से आने के बाद माता सीत को राम जी ने त्याग दिया था तब उन्हें ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में आश्रय मिला था। माना जाता है कि यह मंदिर उसी स्थान पर बना है। यही वह जगह है जहां माता सीता ने जुड़वां बच्चों लव और कुश को जन्म दिया था। 7. कोंडांडा रामास्वामी मंदिर, चिकमंगलूर: यह मंदिर कर्नाटक के चिक्कमगलुरु जिले में स्थित है। हिरामगलूर में, परशुराम ने भगवान राम से अपनी शादी के दृश्य दिखाने का अनुरोध किया। इसी के चलते कोंडंडा में रमास्वामी की मूर्तियां हिंदू विवाह समारोहों की परंपराओं के अनुसार ही स्थित हैं। यह भारत का एकमात्र मंदिर है जहां माता सीता राम और लक्ष्मण के दाहिनी ओर खड़ी दिखाई देंगी। 8. रामास्वामी मंदिर, तमिलनाडु: रामास्वामी मंदिर तमिलनाडु में स्थित है। रामास्वामी मंदिर को दक्षिणी भारत का अयोध्या कहा जाता है। यह एकमात्र मंदिर है जहां भरत और शत्रुघ्न के साथ राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर परिसर में अलवर सन्नथी, श्रीनिवास सननाथी और गोपालन सन्नथी तीन अन्य मंदिर भी स्थित हैं। 9. रघुनाथ मंदिर, जम्मू: यह मंदिर जम्मू में स्थित है। यह बेहद प्रसिद्ध मंदिर है। रघुनाथ मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा लगभग सात अन्य मंदिर हैं जहां हिंदू धर्म के अन्य देवताओं को पूजा जाता है। रघुनाथ मंदिर की वास्तुकला में मुगल शैली की वास्तुकला का एक टिंट देखा जा सकता है।

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श्री गंगा दशहरा कब है? क्या है इस दिन का महत्व?

प्रतिवर्ष वैशाख माह में गंगा सप्तमी और ज्येष्‍ठ माह में गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। दोनों पर्वों का ही अलग-अलग महत्व है। कहा जाता हैं कि गंगा सप्तमी के दिन मां गंगा भगवान शिव जी की जटाओं में उतरी थीं तथा इसके बाद गंगा दशहरा को धरती पर उनका अवतरण हुआ था। वर्ष 2023 में गंगा दशहरा पर्व दिन मंगलवार, 30 मई 2023 को मनाया जाएगा। इस बार हस्त नक्षत्र में तथा व्यतीपात योग में गंगा दशहरा पर्व मनाया जाएगा।  गंगा दशहरा महत्व शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को दशहरा कहते हैं। इसमें स्नान, दान और व्रत का विशेष महत्व होता है। इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए यह महापुण्यकारी पर्व माना जाता है। श्री गंगा दशहरा पर्व हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इन अवसरों पर गंगा नदी में डुबकी लगाने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस पर्व के लिए गंगा मंदिरों सहित अन्य मंदिरों पर भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। गंगाजल को सबसे अधिक पवित्र माना जाता है, जिसका उपयोग पूजा-पाठ में सबसे अधिक किया जाता है।  पुराणों के अनुसार गंगा दशहरा हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। गंगा दशहरा वो समय होता है जब मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था जबकि गंगा जयंती (गंगा सप्तमी) वह दिन होता है जब गंगा का पुनः धरती पर अवतरण हुआ था। गंगा दशहरा के दिन सभी गंगा मंदिरों में भगवान भोलेनाथ का अभिषेक किया जाता है तथा मोक्षदायिनी गंगा का पूजन-अर्चना किया जाता है। मान्यतानुसार गंगा पूजन एवं स्नान से रिद्धि-सिद्धि, यश-सम्मान तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। गंगा दशहरा पर्व कब है, जानिए पूजा का शुभ समय  गंगा दशहरा 30 मई 2023 मंगलवार को  गंगा अवतरण पूजा समय ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि का प्रारंभ- सोमवार, 29 मई 2023 को 11.49 ए एम से,  ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि का समापन- मंगलवार, 30 मई 2023 को 01.07 पी एम पर।  हस्त नक्षत्र का प्रारंभ- 30 मई 2023 को 04.29 ए एम से,  हस्त नक्षत्र की समाप्ति- 31 मई 2023 को 06.00 ए एम पर। व्यतीपात योग का प्रारंभ- 30 मई 2023 को 08.55 पी एम से,  व्यतीपात योग का समापन- 31 मई 2023 को 08.15 पी एम पर।  30 मई दिन का चौघड़िया चर- 08.51 ए एम से 10.35 ए एम लाभ- 10.35 ए एम से 12.19 पी एम अमृत- 12.19 पी एम से 02.02 पी एम शुभ- 03.46 पी एम से 05.30 पी एम रात्रि का चौघड़िया लाभ- 08.30 पी एम से 09.46 पी एम शुभ- 11.02 पी एम से 31 मई को 12.19 ए एम तक।  अमृत- 12.19 ए एम से 31 मई को 01.35 ए एम तक। चर- 01.35 ए एम से 31 मई को 02.51 ए एम तक।

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