MYTHOLOGICAL STORIES

जाने रोहिणी व्रत कब है, व्रत कथा, व्रत के नियम और इसका महत्व

जैन समुदाय द्वारा किया जाने वाला रोहिणी व्रत पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध व्रत है। इसे देश के कोने कोने में मनाया जाता है। भगवान वासुपूज्य जी को रोहिणी व्रत समर्पित होता है। इस शुभ अवसर पर रोहिणी देवी के साथ साथ भगवान वासुपूज्य जी की विधिवत पूजा की जाती है। यह व्रत अन्य व्रतों से थोड़ा भिन्न होता है। इस व्रत को क्यों करना चाहिए  रोहिणी व्रत प्रत्येक माह आने वाला व्रत है और कई बार संयोग से एक माह में दो बार किया जाता है। यह व्रत लिंग विशिष्ट नहीं है, इसे कोई भी कर सकता है। महिलाओ द्वारा रोहिणी व्रत अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन को व्रत रखकर इसे त्योहार की भांति मनाया जाता है। प्राचीन काल से इसे त्योहार के रूप में जैन समुदाय द्वारा मनाया जाता आ रहा है।Rohini Vrat 2023   – इस व्रत के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। जिनमें से सबसे लोकप्रिय कथा के बारे में हम आपको आगे बताएंगे। इससे पहले यह जान लेते हैं कि रोहिणी व्रत वर्ष के किस समय किया जाता है। सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा जानिए 2023 में कब है रोहिणी व्रत  दिनांक  वार  पक्ष  तिथि  4 जनवरी 2023 बुधवार शुक्ल पक्ष त्रियोदशी 31 जनवरी 2023 मंगलवार शुक्ल पक्ष दशमी 27 फरवरी 2023 सोमवार शुक्ल पक्ष अष्टमी 27 मार्च  2023 सोमवार शुक्ल पक्ष षष्ठी 23 अप्रैल 2023 रविवार शुक्ल पक्ष तृतीया 21 मई  2023 रविवार शुक्ल पक्ष द्वितीय 17 जून 2023 शनिवार शुक्ल पक्ष चतुर्दशी 14 जुलाई 2023 शुक्रवार शुक्ल पक्ष द्वादशी 10 अगस्त 2023 गुरुवार कृष्ण पक्ष दशमी 7 सितम्बर 2023 गुरुवार कृष्ण पक्ष अष्टमी 4 अक्टूबर 2023 बुधवार कृष्ण पक्ष षष्ठी 31 अक्टूबर 2023 मंगलवार कृष्ण पक्ष तृतीया 28 नवंबर 2023 मंगलवार कृष्ण पक्ष प्रतिपदा 25 दिसम्बर 2023 सोमवार कृष्ण पक्ष चतुर्दशी रोहिणी व्रत कब होता है धार्मिक मान्ताओं के अनुसार नक्षत्रों की कुल संख्या 27 होती है। इन 27 नक्षत्रों में एक रोहिणी नक्षत्र होता है, जिसका संबंध इस व्रत से है। जब महीने में सूर्योदय के पश्चात रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है, उस समय इस व्रत को किया जाता है। एक वर्ष में कम से कम छह से सात बार यह व्रत आता है, और कई बार यह नक्षत्र माह में दो बार आ जाता है। रोहिणी व्रत के नियम  इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना बहुत आवश्यक होता है। माना जाता है तीन, पांच और सात साल निश्चित रूप से इस व्रत का पालन करना चाहिए। इस व्रत की उचित अवधि पांच वर्ष की मानी जाती है। जिन अनुयायियों द्वारा पांच वर्ष की अवधि तक व्रत का पालन करना संभव नहीं हो पाता। इसके लिए पांच माह का समय भी उत्तम माना गया है। रोहिणी व्रत को कितने समय तक करना इसका निर्णय स्वंय लिया जाता है। इस समय अवधि में व्रत करने का संकल्प लेने के पश्चात, इस व्रत का उद्यापन तभी किया जाता है, जब अवधि पूर्ण होे जाती है। इसलिए दृढ़ निश्चय के बाद ही संकल्प लेना चाहिए। व्रत का उद्यापन हो जाने के बाद गरीबों को भोजन कराना चाहिए और दान करना चाहिए। इसी के साथ साथ पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ वासुपूज्य की पूजा करनी चाहिए। भगवान वासुपूज्य जी के दर्शनों के साथ ही व्रत का उद्यापन उचित माना जाता है। इस दिन भगवान वासुपूज्य की ताम्र, पंचरत्न या स्वर्ण की मूर्ति की स्थापना की जाती है और पूरा दिन भगवान की आराधना करके स्थापित मूर्ति का पूजन किया जाता है। पूजा के पूर्ण हो जाने के बाद नैवेद्य, वस्त्र और पुष्प अर्पित करके फल और मिठाई का भोग लगाया जाता है। इस व्रत को करते समय मन में ईर्ष्या और द्वेष जैसे भावों को नहीं लाना चाहिए।

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रोहिणी व्रत का महत्व एवं पौराणिक कथा

पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्‍मीपति के साथ राज करते थे। उनके 7 पुत्र एवं 1 रोहिणी नाम की पुत्री थी। एक बार राजा ने निमित्‍तज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? तो उन्‍होंने कहा कि हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ तेरी पुत्री का विवाह होगा। यह सुनकर राजा ने स्‍वयंवर का आयोजन किया जिसमें कन्‍या रोहिणी ने राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाली और उन दोनों का विवाह संपन्‍न हुआ।  एक समय हस्तिनापुर नगर के वन में श्री चारण मुनिराज आए। राजा अपने प्रियजनों के साथ उनके दर्शन के लिए गया और प्रणाम करके धर्मोपदेश को ग्रहण किया। इसके पश्‍चात राजा ने मुनिराज से पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्‍यों है? तब गुरुवर ने कहा कि इसी नगर में वस्‍तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। उस धनमित्र की दुर्गंधा कन्‍या उत्पन्‍न हुई। धनमित्र को हमेशा चिंता रहती थी कि इस कन्‍या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लोभ देकर अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से उसका विवाह कर दिया, लेकिन अत्‍यंत दुर्गंध से पीडि़त होकर वह एक ही मास में उसे छोड़कर कहीं चला गया। इसी समय अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए नगर में आए, तो धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ वंदना करने गया और मुनिराज से पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्‍होंने बताया कि गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल राज्‍य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा, रानी सहित वनक्रीड़ा के लिए चले, सो मार्ग में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के लिए आहार व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली तो गई, परंतु क्रोधित होकर उसने मुनिराज को कड़वी तुम्‍बी का आहार दिया जिससे मुनिराज को अत्‍यंत वेदना हुई और तत्‍काल उन्‍होंने प्राण त्‍याग दिए। जब राजा को इस विषय में पता चला, तो उन्‍होंने रानी को नगर में बाहर निकाल दिया और इस पाप से रानी के शरीर में कोढ़ उत्‍पन्‍न हो गया। अत्‍यधिक वेदना व दु:ख को भोगते हुए वो रौद्र भावों से मरकर नर्क में गई। वहां अनंत दु:खों को भोगने के बाद पशु योनि में उत्‍पन्न और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्‍या हुई। यह पूर्ण वृत्तांत सुनकर धनमित्र ने पूछा- कोई व्रत-विधानादि धर्म कार्य बताइए जिससे कि यह पातक दूर हो।  तब स्वामी ने कहा- सम्‍यकदर्शन सहित रोहिणी व्रत पालन करो अर्थात प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन आए, उस दिन चारों प्रकार के आहार का त्‍याग करें और श्री जिन चैत्‍यालय में जाकर धर्मध्‍यान सहित 16 प्रहर व्‍यतीत करें अर्थात सामायिक, स्‍वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय बिताए और स्‍वशक्ति दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 मास तक करें। दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और आयु के अंत में संन्यास सहित मरण कर प्रथम स्‍वर्ग में देवी हुई। वहां से आकर तेरी परमप्रिया रानी हुई।  इसके बाद राजा अशोक ने अपने भविष्य के बारे में पूछा, तो स्‍वामी बोले- भील होते हुए तूने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, सो तू मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर जन्म लिया, सो अत्‍यंत घृणित शरीर पाया, तब तूने मुनिराज के उपदेश से रोहिणी व्रत किया। फलस्‍वरूप स्वर्गों में उत्‍पन्‍न होते हुए यहां अशोक नामक राजा हुआ। इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहिणी, रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्‍वर्गादि सुख पाने के उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। रोहिणी व्रत महत्व दिगंबर जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। 27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। महिलाओं के लिए यह व्रत अनिवार्य माना गया है। हालांकि इस व्रत को कोई भी कर सकता है। इस व्रत को पुरुष और महिलाएं दोनों कर सकते हैं। यह व्रत आत्‍मा के विकारों को दूर कर कर्म बंधन से छुटकारा दिलाने में सहायक है। इस व्रत में पूरे विधि विधान के सात भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है।  इस दिन जैन धर्म के अनुयायी वासुपूज्य स्वामी की पूजा और उपासना करके व्रत रखते है। इस दिन व्रत रखने से भगवान वासुपूज्य और माता रोहिणी के आशीर्वाद से घर से आर्थिक समस्या दूर होती हैं तथा उस घर में सदैव धन की देवी मां लक्ष्मी का वास होना, माना जाता है और ऋण मुक्त होने और आय बढ़ने का मार्ग मिल जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से पति की आयु लंबी हो जाती है और उनका स्वास्थ भी अच्छा रहता है। इससे ईर्ष्या, द्वेष, जैसे भाव भी दूर हो जाते हैं। घर में सुख, समृद्धि और धन-धान्य की निरंतर बढ़ोतरी होती है। इस व्रत का समापन उद्यापन के बाद ही किया जाता है।

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जब देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को रुला दिया था

आज गुरुवार है। आज के दिन श्री हरि यानी भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। विष्णु जी से संबंधित कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक कथा आज हम आपके लिए लिए लाए हैं। इस कथा में यह बताया गया है कि आखिर ऐसा क्या हुआ था कि विष्णु जी को देवी लक्ष्मी ने रुला दिया था पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री हरि एक बार धरती भ्रमण के लिए जा रहे थे। तब देवी लक्ष्मी ने उन्हें कहा कि वो भी उनके साथ चलना चाहती हैं। तब विष्णु जी ने कहा कि वो उनके साथ एक शर्त पर ही चल सकती हैं। लक्ष्मी जी ने शर्त पूछी तो विष्णु जी ने कहा कि धरती पर चाहें कोई भी स्थिति क्यों न आए उन्हें उत्तर दिशा की तरफ नहीं देखना है। लक्ष्मी जी ने शर्त मानी और श्री हरि के साथ चल दीं। जब दोनों धरती का भ्रमण कर रहे थे तब देवी की नजर उत्‍तर द‍िशा की तरफ पड़ी। वहीं इतनी ज्यादा हरियाली थी कि वो खुद को रोक न पाईं और बगीचें की तरफ चल दीं। वहां से उन्होंने एक फूल तोड़ा और विष्णु जी के पास आ गईं। विष्णु जी लक्ष्मी जो देखते ही रो पड़े। तब मां लक्ष्मी को विष्णु जी की शर्त याद आ गई। श्री हरि ने कहा कि बिना किसी से पूछे किसी भी चीज को छूना अपराध है। यह सुन देवी लक्ष्मी को एहसास हुआ कि उनसे गलती हो गई है। उन्होंने माफी मांगी। लेकिन श्री हरि ने कहा कि इसकी माफी को बगीचे का माली ही दे सकता है। विष्णु जी ने कहा कि लक्ष्मी जी को माली के घर दासी बनकर रहना होगा। लक्ष्मी जी ने यह सुन तुरंत ही गरीब औरत का वेस धारण किया और माली के घर चली गईं। कभी खेत में तो कभी घर में माली ने उनसे काम कराया। लेकिन जब माली को पता चला कि वो कोई और नहीं बल्कि मां लक्ष्मी हैं तो वो रो पड़ा। उसने कहा कि जो भी उसने किया उसके लिए उसे माफ कर दें। तब लक्ष्मी जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि जो भी हुआ वो नियति थी। इसमें किसी का कोई दोष नहीं है। लेकिन माली ने जिस तरह से लक्ष्मी जी को अपने घर का सदस्य समझा उन्होंने उसकी झोली आजीवन सुख-समृद्धि से भर दी। उन्होंने कहा कि अब जीवन में उसके परिवार को किसी भी तरह का दुख नहीं भोगना होगा। इसके बाद वो विष्णु लोक वापस चली गईं।

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सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा

प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या को उत्तर भार‍‍त की सुहागिनों द्वारा तथा ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को दक्षिण भार‍त की सुहागिन महिलाओं द्वारा वट सावित्री व्रत का पर्व मनाया जाता है। कहा जाता है कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु व डालियों व पत्तियों में भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। इस व्रत में महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं, सती सावित्री की कथा सुनने व वाचन करने से सौभाग्यवती महिलाओं की अखंड सौभाग्य की कामना पूरी होती है। सावित्री और सत्यवान की कथा पौराणिक, प्रामाणिक एवं प्रचलित वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार सावित्री के पति अल्पायु थे, उसी समय देव ऋषि नारद आए और सावित्री से कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है। आप कोई दूसरा वर मांग लें। पर सावित्री ने कहा- मैं एक हिन्दू नारी हूं, पति को एक ही बार चुनती हूं। इसी समय सत्यवान के सिर में अत्यधिक पीड़ा होने लगी। सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति के सिर को रख उसे लेटा दिया। उसी समय सावित्री ने देखा अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है। सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं। उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है। अब तुम वापस लौट जाओ। उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है। सावित्री के मुख से यह उत्तर सुन कर यमराज बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री को वर मांगने को कहा और बोले- मैं तुम्हें तीन वर देता हूं। बोलो तुम कौन-कौन से तीन वर लोगी।  तब सावित्री ने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी, ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा एवं अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा। सावित्री के यह तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा- तथास्तु! ऐसा ही होगा। ‍सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौट आई। जहां सत्यवान मृत पड़ा था। सत्यवान के मृत शरीर में फिर से संचार हुआ। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया।  तभी से वट सावित्री अमावस्या और वट सावित्री पूर्णिमा के दिन वट वृक्ष का पूजन-अर्चन करने का विधान है। यह व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है। चौथा दिन आने पर जब सत्यवान ने लकड़ी, फूल और फल लाने के लिए जंगल की ओर प्रस्थान किया तब सावित्री भी सास-ससुर से आज्ञा लेकर दुखी मन से पति के साथ उस भयंकर जंगल में गयी। नारदजी के वचनों का ध्यान करके मन में भीषण कष्ट रहने पर भी उसने अपने इस भय को पति के सामने उजागर नहीं होने दिया।पति का मन बहलाने के लिए वह झूठ-मुठ उस वन के वृक्षों और पशु-पक्षियों के बारे में पूछताछ करती रही। शूरवीर सत्यवान उस भयंकर वन में विशाल वृक्षों, पक्षियों एवं पशुओं के दल को दिखला-दिखला कर थकी हुई एवं कमल के समान विशाल नेत्रोंवाली राजकुमारी सावित्री को आश्वासन देता रहा। इस प्रकार से कुछ समय बीतने पर सत्यवान ने कहा – ” सावित्री ! मैं फलों को एकत्र कर चूका और तुम फूलों को एकत्र कर चुकी, लेकिन अभी ईंधन के लिए लकड़ी का कोई प्रबंध नहीं हुआ, अतः तुम इस वट वृक्ष की छाया में बैठकर क्षणभर प्रतीक्षा करते हुए विश्राम करो। “ सावित्री बोली – ” कान्त ! जैसा आप कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगी, लेकिन आप मेरे आँखों के सामने से दूर न जाएँ, क्योंकि मैं इस घने जंगल में डर रही हूँ। “ सावित्री के ऐसा कहने पर सत्यवान उसके सामने ही कुछ दूरी पर लकड़ी काटने लगे।

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कालाष्टमी की प्रामाणिक और पौराणिक कथा

हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार हिन्दू कैलेंडर में हर माह आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि मासिक कालाष्टमी पर्व के रूप में मनाई जाती है। यह अष्टमी भगवान भैरव को समर्पित है तथा इसे काला अष्‍टमी भी कहा जाता है। यह तिथि भगवान भैरव से असीम शक्ति प्राप्त करने का समय मानी जाती है अत: इस दिन पूजा और व्रत करने का विशेष महत्व है। कालाष्टमी की एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार की बात है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीनों में श्रेष्ठता की लड़ाई चली। इस बात पर बहस बढ़ गई, तो सभी देवताओं को बुलाकर बैठक की गई। सबसे यही पूछा गया कि श्रेष्ठ कौन है? सभी ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए और उत्तर खोजा लेकिन उस बात का समर्थन शिवजी और विष्णु ने तो किया, परंतु ब्रह्माजी ने शिवजी को अपशब्द कह दिए। इस बात पर शिवजी को क्रोध आ गया और शिवजी ने अपना अपमान समझा। कालाष्टमी की एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार की बात है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीनों में श्रेष्ठता की लड़ाई चली। इस बात पर बहस बढ़ गई, तो सभी देवताओं को बुलाकर बैठक की गई। सबसे यही पूछा गया कि श्रेष्ठ कौन है? सभी ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए और उत्तर खोजा लेकिन उस बात का समर्थन शिवजी और विष्णु ने तो किया, परंतु ब्रह्माजी ने शिवजी को अपशब्द कह दिए। इस बात पर शिवजी को क्रोध आ गया और शिवजी ने अपना अपमान समझा। भैरव ने क्रोध में ब्रह्माजी के 5 मुखों में से 1 मुख को काट दिया, तब से ब्रह्माजी के पास 4 मुख ही हैं। इस प्रकार ब्रह्माजी के सिर को काटने के कारण भैरवजी पर ब्रह्महत्या का पाप आ गया। ब्रह्माजी ने भैरव बाबा से माफी मांगी तब जाकर शिवजी अपने असली रूप में आए। भैरव बाबा को उनके पापों के कारण दंड मिला इसीलिए भैरव को कई दिनों तक भिखारी की तरह रहना पड़ा। इस प्रकार कई वर्षों बाद वाराणसी में इनका दंड समाप्त होता है। इसका एक नाम ‘दंडपाणी’ पड़ा था।

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जानें कब है कालाष्टमी, यहां जानें शुभ मुहूर्त व हिंदू धर्म में इसका पौराणिक महत्व

भगवान शंकर को भोलेनाथ भी कहा जाता है क्योंकि उनका स्वभाव बहुत ही भोला है लेकिन जब शिव को क्रोध आता है तो सृष्टि तितर-बितर हो जाती है. पौराणिक काल में शिव जी के क्रोध से भगवान काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी. हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी का दिन कालभैरव को समर्पित है. इसे कालाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. मान्यता है कि जो इस दिन सच्चे मन से शिव के रोद्र रूप काल भैरव की उपासना करता है बाबा भैरव उसके तमाम कष्ट, परेशानियां हर लेते हैं और हर पल उसकी सुरक्षा करते हैं. शनि और राहु की बाधाओं से मुक्ति के लिए भगवान भैरव की पूजा अचूक होती है. आइए जानते हैं चैत्र माह की कालाष्टमी कब है, पूजा का मुहूर्त और उपाय. चैत्र कालाष्टमी 2023 मुहूर्त चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 14 मार्च 2023 को रात 08 बजकर 22 मिनट पर शुरू होगी. अष्टमी तिथि का समापन 15 मार्च 2023 को शाम 06 बजकर 45 मिनट पर होगा. धार्मिक मूल ग्रन्थ के अनुसार जिस दिन अष्टमी तिथि रात्रि के दौरान प्रबल होती है उस दिन व्रतराज कालाष्टमी का व्रत किया जाना चाहिए. भगवान काल भैरव की ऐसे करें पूजा कालाष्टमी भगवान शिव के भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन भक्त सूर्योदय से पहले उठकर जल्दी स्नान करते हैं। वे काल भैरव का आशीर्वाद लेने और अपने पापों के लिए क्षमा मांगने के लिए उनकी विशेष पूजा करते हैं। शाम को सभी श्रद्धालु भगवान काल भैरव के मंदिर भी जाते हैं और वहां विशेष पूजा अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि कालाष्टमी भगवान शिव का रौद्र रूप है। उनका जन्म भगवान ब्रह्मा के क्रोध को समाप्त करने के लिए हुआ था। कालाष्टमी पर सुबह के समय पूर्वजों की विशेष पूजा के साथ अनुष्ठान भी किया जाता है। कष्टों से मुक्ति के लिए कालाष्टमी पर ऐसे करें पूजा अगर जीवन में भयंकर परेशानी से जूझ रहे हैं, कोई उपाय समझ न आ रहा हो तो इस दिन काले कुत्ते को मीठी रोटी खिलाएं. मान्यता है इससे तमाम कष्टों से मुक्ति मिलती है. वहीं कालाष्टमी के दिन से  रात्रि के समय भगवान भैरव की प्रतिमा के आगे सरसों के तेल का दीपक जलाएं, अगर मंदिर जाना संभव नहीं है तो शिवलिंग के समक्ष ये उपाय करें, फिर कालभैरवाष्टक का पाठ करें. इससे शत्रु और शनि बाधा दूर होती है. ध्यान रहेकाल भैरव की पूजा किसी का अहित करने के लिए न करें, वरना इसके बुरे परिणाम झेलने पड़ सकते हैं. साथ ही इस दिन इस दिन किसी भी कुत्ते, गाय, आदि जानवर के साथ गलत व्यवहार और हिंसक व्यवहार ना करें. कालाष्टमी का महत्व कालाष्टमी का माहात्म्य ‘आदित्य पुराण’ में बताया गया है। हिंदी में ‘काल’ शब्द का अर्थ ‘समय’ है जबकि ‘भैरव’ का अर्थ ‘शिव का प्रकट होना’ है। इसलिए काल भैरव को ‘समय का देवता’ भी कहा जाता है और भगवान शिव के अनुयायी पूरी भक्ति के साथ उनकी पूजा करते हैं।पौराणिक किंवदंतियों के अनुसार, एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच बहस के दौरान भगवान शिव ब्रह्मा जी की एक टिप्पणी पर नाराज हो गए इसके बाद उन्होंने ‘महाकालेश्वर’ का रूप धारण किया और भगवान ब्रह्मा के 5वें सिर को काट दिया। तभी से देवता और मनुष्य भगवान शिव के इस रूप को ‘काल भैरव’ के रूप में पूजते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो लोग कालाष्टमी पर भगवान शिव की पूजा करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

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कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा कार्तिक मास संकष्टी गणेश चतुर्थी की कहानी

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है । कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला व्रत, कार्तिक संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कहलाता है। इसे करवा चतुर्थी भी कहते हैं । इस दिन ‘पिंग’ गणेश की पूजा की जाती है । सौभाग्यवती स्त्रियाँ इस दिन अपने पति के लम्बी उम्र के लिये व्रत रखती है। गणेश जी को करवा अर्पित करती हैं। यह व्रत स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्य प्रदान करती है। इस व्रत से मनुष्य को सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। भविष्य पुराण में कहा गया है कि जब मन संकटों से घिरा महसूस करे, तो गणेश चतुर्थी का व्रत करें । इससे कष्ट दूर होते हैं और धर्म, अर्थ, मोक्ष, विद्या, धन व आरोग्य की प्राप्ति होती है । कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा पार्वती जी कहती है कि हे भाग्यशाली! लम्बोदर! भाषणकर्ताओं में श्रेष्ठ! कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को किस नाम वाले गणेश जी की पूजा किस भांति करनी चाहिए। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि अपनी माता की बात सुनकर गणेश जी ने कहा कि कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का नाम संकटा है। उस दिन पिंग नामक गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। पूजन पूर्वोक्त विधि से करना उचित हैं। भोजन एक बार करना चाहिए। व्रत और पूजन के बाद ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं मौन होकर भोजन करना चाहिए। मैं इस व्रत का महात्म्य कह रहा हूँ, सावधानी पूर्वक श्रवण कीजिये। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को घी और उड़द मिलाकर हवन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को सर्वसिद्धि प्राप्त होती हैं। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि वृत्रासुर दैत्य ने त्रिभुवन को जीत करके सम्पूर्ण देवों को परतंत्र कर दिया। उसने देवताओं को उनके लोकों से निष्काषित कर दिया। परिणामस्वरूप देवता लोग दसों दिशाओं में भाग गए। तब सभी देव इंद्र के नेतृत्व में भगवान विष्णु के शरणागत हुए। देवों की बात सुनकर विष्णु ने कहा कि समुद्री द्वीप में बसने के कारण वे निरापद होकर बलशाली हो गए हैं। पितामह ब्रह्मा जी से किसी देवों के द्वारा न मरने का उन्होंने वर प्राप्त कर लिया हैं। अतः आप लोग अगस्त्य मुनि को प्रसन्न करे। वे मुनि समुद्र को पी जाएंगे। तब दैत्य लोग अपने पिता के पास चले जाएंगे। आप लोग सुख पूर्वक स्वर्ग में निवास करने लगेंगे। अतः आप लोगों का कार्य अगस्त्य मुनि की सहायता से पूरा होगा। ऐसा सुनकर सब देवगण अगस्त्य मुनि के आश्रम में गये और स्तुति के द्वारा उन्हें प्रसन्न किया। मुनि ने प्रसन्न होकर कहा कि हे देवताओं! डरने की कोई बात नहीं हैं, आप लोगों को मनोरथ अवशय ही पूरा होगा। मुनि की बात से सब देवता अपने अपने लोक को चले गए। इधर मुनि को चिंता हुई कि एक लाख योजन इस विशाल समुद्र को मैं कैसे पी सकूंगा? तब गणेश जी का स्मरण करके संकट चतुर्थी के उत्तम व्रत को विधिपूर्वक संपन्न किया। तीन महीने तक व्रत करने के बाद गणेश जी उन पर प्रसन्न हुए। उसी व्रत के प्रभाव से अगस्त्य जी ने समुद्र को सहज ही पान करके सूखा डाला। गणेश जी की इस बात से पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न हुई। कृष्ण जी कहते है कि हे महाराज युधिष्ठिर! आप भी चतुर्थी का व्रत कीजिये। इसके करने से आप शीघ्र ही सब शत्रुओं को जीतकर अपना राज्य पा जायेंगे। श्रीकृष्ण के आदेशानुसार युधिष्ठिर ने गणेश जी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उन्होंने शत्रुओं को जीतकर अखंड राज्य प्राप्त कर लिया। कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजन विधि  प्रात: काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हो स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। श्री गणेश जी का पूजन पंचोपचार (धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, फूल) विधि से करें। इसके बाद हाथ में जल तथा दूर्वा लेकर मन-ही-मन श्री गणेश का ध्यान करते हुये व्रत का संकल्प करें। संध्या होने पर दुबारा स्नान कर स्वच्छ हो जायें। श्री गणेश जी के सामने सभी पूजन सामग्री के साथ बैठ जायें। विधि-विधान से गणेश जी का पूजन करें। वस्त्र अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में लड्डू अर्पित करें। चंद्रमा के उदय होने पर चंद्रमा की पूजा कर अर्घ्य अर्पण करें। उसके बाद गणेश चतुर्थी की कथा सुने अथवा सुनाये। घी और उड़द मिला कर हवन करें। तत्पश्चात् गणेश जी की आरती करें। व्रत और पूजन के बाद ब्राह्मण को भोजन करा कर खुद मौन रह कर भोजन करें। स्त्रियाँ चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात् अपने पति की आरती और पूजा करें।

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8 मई को पड़ रही संकष्टी चतुर्थी, क्या है इसका महत्व, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त

सनातन धर्म में भगवान गणेश को सभी देवी देवताओं में सबसे पहले पूजा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य के पहले भगवान गणेश को पूजने से उस कार्य में सफलता जरूर प्राप्त होती है. 8 मई 2023 को संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है. इस दिन को विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है. संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा की जाती है. इस दिन भक्त व्रत भी रखते हैं. एकदंत संकष्टी चतुर्थी का शुभ मुहूर्त गणपति का पूजा का शुभ फल प्रदान करने वाला एकदंत संकष्टी चतुर्थी व्रत इस साल 08 मई 2023 को मनाया जाएगा.पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 08 मई 2023 को शाम को 06:18 बजे से प्रारंभ होकर 09 मई 2023 को शाम के समय 04:08 बजे तक रहेगी. पंचांग के अनुसार एकदंत संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा रात्रि 10:04 बजे होगा. संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व एकदंत संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व होता है. इस दिन गणेश भगवान की पूजा करने से जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं. अपनी सभी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए इस दिन व्रत रखने का भी विधान है. एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत सुख-सौभाग्य दिलाता है.यदि आप संतान प्राप्ति का सुख भोगना चाहते हैं तो भी इस दिन विधि-विधान से गणेश भगवान की पूजा करें. जो भी व्यक्ति श्रद्धा भाव से संकष्टि चतुर्थी का व्रत रखता है उसकी हर एक मनोकामना भगवान गणेश पूरी करते हैं. इसके अलावा भगवान गणेश जीवन भर उनके हर विघ्न को हर लेते हैं. संकष्टी चतुर्थी की तिथि संकष्टी चतुर्थी जेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है. जिसकी शुरुआत 8 मई 2023 को शाम 6:18 से हो रही है इसका समापन अगले दिन यानी 9 मई 2023 शाम 4:08 पर होगा. संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार व्रत 8 मई को रखा जाएगा. संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि संकष्टी चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त हो जाएं. स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान गणेश की पूजा करते समय व्रत रखने का संकल्प लें.अब एक लकड़ी के पति पर भगवान गणेश की प्रतिमा रखकर उन्हें हल्दी का तिलक लगाएं. उनके समक्ष दूर्वा, फूल माला, लड्डू और फल अर्पित करें.अब भगवान गणेश के समीप घी का दीपक जलाएं.भगवान गणेश की विधि विधान से पूजा करने के बाद उन्हें घी से बने मोतीचूर के लड्डू या मोदक का भोग लगाकर अपनी गलती के लिए क्षमा याचना करें.

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तुलसी और विष्णु की कहानी

सावर्णि मुनि की पुत्री तुलसी अपूर्व सुंदरी थी। उनकी इच्छा थी कि उनका विवाह भगवान नारायण के साथ हो। इसके लिए उन्होंने नारायण पर्वत की घाटी में स्थित बदरीवन में घोर तपस्या की। दीर्घ काल तक तपस्या के उपरांत ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर दर्शन दिया और वर मांगने को कहा। तुलसी ने कहा- “सृष्टिकर्ता ब्रह्मदेव ! आप अन्तर्यामी है। सबके मन की बात जानते है, फिर भी मैं अपनी इच्छा बताती हूं। मैं चाहती हूं कि भगवान श्री नारायण मुझे पति रूप में मिले।” ब्रह्मा ने कहा-“तुम्हारा अभीष्ट तुम्हें अवश्य मिलेगा। अपने पूर्व जन्म में किसी अपराध के कारण तुम्हें शाप मिला है। इसी प्रकार भगवान श्री नारायण के एक पार्षद को भी दानव-कुल में जन्म लेने का शाप मिला है। दानव कुल में जन्म ने के बाद भी उसमे नारायण का अंश विद्यमान रहेगा। इसलिए इस जन्म में पूर्व जन्म के पाप के शमन के लिए सम्पूर्ण नारायण तो नहीं, नारायण के अंश से युक्त दानव-कुल जन्मे उस शापग्रस्त पार्षद से तुम्हारा विवाह होगा। शाप-मुक्त होने पर भगवान श्री नारायण सदा सर्वदा के लिए तुम्हारे पति हो जायेंगे।” तुलसी ने ब्रह्मा के इस वर को स्वीकार किया, क्योंकि मानव-कुल में जन्म के कारण उसे मायावी भोग तो भोगना ही था। तुलसी बदरीवन में ही रहने लगी। नारायण का वह पार्षद दानव कुल में शंखचूड़ के नाम से पैदा हुआ था। कुछ दिनों के बाद वह भ्रमण करता हुआ बदरीवन में आया। यहां तुलसी को देखते ही वह उस पर मुग्ध हो गया। तुलसी के सामने उसने अपने साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। इतने में ही वहां ब्रह्मा जी आ गए और तुलसी से कहा-“तुलसी ! शंखचूड़ को देखो, कैसा देवोपम इसका स्वरूप है। दानव कुल में जन्म लेने के बाद भी लगता है जैसे इसके शरीर में नारायण का वास हो। तुम प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लो।” तुलसी को भी लगा कि उसकी तपस्या पूर्ण हुई। उसे इच्छित फल मिला है। शंखचूड़ के साथ उसका गांधर्व-विवाह हो गया और वह शंखचूड़ के साथ उसके महल में पत्नी बनकर आ गई। शंखचूड़ ने अपनी परम सुंदरी सती साध्वी पत्नी तुलसी के साथ बहुत दिनों तक राज्य किया। उसने अपने राज्य का इतना विस्तार किया कि देवलोक तक उसके अधिकार में आ गया। स्वर्ग का सुख भोगने वाले देवताओं की दशा भिखारियों जैसे हो गई। शंखचूड़ किसी को कष्ट नहीं देता था, पर अधिकार और राज्य छिन जाने से सारे देवता मिलकर ब्रह्मा,विष्णु और शिव की सभा में गए तथा अपनी विपत्ति सुनाई। ब्रह्मा जी ने कहा-“तुलसी परम साध्वी है। उसका विवाह शंखचूड़ से मैंने ही कराया था। शंखचूड़ को तब तक नहीं हराया या मारा जा सकता है जब तक तुलसी को न छला जाए।” विष्णु ने कहा -“शंखचूड़ पूर्व जन्म में मेरा पार्षद था। शाप के कारण उसे दैत्यकुल में जन्म लेना पड़ा। इस जन्म में भी मेरा अंश उसमे व्याप्त है। साथ ही तुलसी के पतिव्रत-धर्म से वह अजेय है।” फिर देवताओं की सहमति से भगवान शिव ने शंखचूड़ के पास सन्देश भेजा कि या तो वह देवताओं का राज्य लौटा दे, या फिर उनसे युद्ध करे। शंखचूड़ शंकर के पास पहुंचा। उसने कहा-“देवाधिदेव ! आपके लिए देवताओं का पक्ष लेना उचित नहीं है। राज्य बढ़ाना हर राजा का कर्तव्य है। मैं किसी को दुखी नहीं कर रहा हूं। देवताओं से कहिए वे मेरी प्रजा होकर रहे। मैंने आपका भी कोई अपकार नहीं किया है। हमारा आपका युद्ध शोभा नहीं देता। अगर आप हार गए तो बड़ी लज्जा की बात होगी। मैं हार गया तो आपकी कीर्ति बहुत अधिक नहीं बढ़ेगी।” भगवान शंकर हंसे। वे तो सब रहस्य समझते थे। तुलसी और शंखचूड़ के पूर्व-जन्म के शाप की अवधि लगभग पूरी हो चुकी थी। बोले- “इसमें कीर्ति और लज्जा की बात नहीं। तुम देवों का राज्य लौटाकर उन्हें उनके पद पर प्रतिष्ठित होने दो। युद्ध से बचने का यही एक उपाय है। ” शंखचूड़ ने कहा-“मैंने युद्ध के बल से देवलोक जीता है। कोई उसे युद्ध के द्वारा ही वापस ले सकता है। यह मेरा अंतिम उत्तर है। मैं जा रहा हूं।” ऐसा कहकर शंखचूड़ चला गया। उसने अपनी पत्नी तुलसी को सारी बात बताई और कहा-“कर्म-भोग सब काल-सूत्र में बंधा है। जीवन में हर्ष, शोक, भय, सुख-दुःख, मंगल-अमंगल काल के अधीन है। हम तो केवल निमित्त है। सम्भव है, भगवान शिव देवों का पक्ष लेकर मुझसे युद्ध करे। तुम चिंता मत करना। तुम्हारा सती तेज मेरी रक्षा करेगा।” दूसरे दिन भगवान शंकर के नेतृत्व में देवताओं ने युद्ध छेड़ दिया। शंखचूड़ ने भीषण वाणों की वर्षा कर उनका वेग रोका। उसके प्रहार से देवता डगमगाने लगे। उसने दानवी शक्ति का प्रयोग कर मायावी युद्ध आरम्भ किया। युद्ध स्थल पर वह किसी को दिखाई नहीं देता था, पर उसके अस्त्र-शस्त्र प्रहार कर देवों को घायल कर रहे थे। देवगण अपने अस्त्र चलाएं तो किस पर चलाएं, क्योंकि कोई शत्रु सामने था ही नहीं। कई दिनों तक इस तरह भयंकर युद्ध चला। शंखचूड़ पराजित नहीं हुआ। तब शिव ने विष्णु से कहा-“विष्णु ! कुछ उपाय करो, अन्यथा मेरा तो सारा यश मिट्टी में मिल जाएगा।” विष्णु ने सोचा-‘बल से तो शंखचूड़ को हराया नहीं जा सकता, इसलिए छल का सहारा लेना होगा। उन्होंने तुरन्त अपना स्वरूप शंखचूड़ जैसा बनाया और अस्त्र-शस्त्र से सज्जित हो तुलसी के पास आए, बोले-“प्रिये ! मैं युद्ध जीत गया। सारे देवता भगवान शंकर समेत हार गए। इस ख़ुशी में आओ मैं तुम्हे अंक से लगा लूं।” पति को प्रत्यक्ष खड़ा देख तथा विजय का समाचार सुन वह दौड़कर मायावी शंखचूड़ के गले से लिपट गई। इस प्रकार पति-पत्नी दोनों ने आलिंगन हो खूब ख़ुशी मनाई। पर-पुरुष के साथ इस प्रकार के व्यवहार से उसका सती-तेज नष्ट हो गया। उसका सती-तेज जो शंखचूड़ की कवच के रूप में रक्षा कर रहा था, वह कवच नष्ट हो गया। शंखचूड़ शक्तिहीन हो गया, यह जानते ही भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से प्रहार किया। त्रिशूल के लगते ही शंखचूड़ जलकर भस्म हो गया। शंखचूड़ के मरने को जानकर विष्णु अपने असली स्वरूप में आ गए। सामने अपने पति शंखचूड़ के स्थान पर भगवान विष्णु को खड़ा देख तुलसी बहुत विस्मित हुई। उसको पता लग गया कि स्वयं नारायण ने उसके साथ छल किया है।

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ब्राह्मण पुत्र होने के बाद भी परशुराम में क्यों थे क्षत्रियों के गुण

 यह तो हम सभी जानते है की भगवान परशुराम एक ब्राह्मण थे। लेकिन आचरण उनका क्षत्रियों जैसा था।ब्राह्मण पुत्र होते हुए भी परशुराम में क्षत्रियों के गुण क्यों थे, इसका जवाब जानने के लिए पढ़ते है यह पौराणिक प्रसंग  इसलिए परशुराम में थे क्षत्रियों के गुण महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना। किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा। तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था।

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कब है चैत्र कालाष्टमी व्रत? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और उपाय

हिंदी कैलेंडर के अनुसार साल का दूसरा माह यानि वैशाख का महीना शुरू हो गया है. इस माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन कालाष्टमी व्रत रखा जाता है. इस व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है और इस दिन काल भैरव का पूजन किया जाता है. काल भैरव को रुद्रावतार कहा जाता है और तंत्र-मंत्र का देवता माना जाता है. कहते हैं कि इनका पूजन करने से व्यक्ति को सिद्धि प्राप्त होती है और कई प्रकार के भय भी दूर होते हैं. कालाष्टमी के दिन लोग व्रत-उपवास रखते हैं और विधि-विधान के साथ काल भैरव का पूजन करते हैं. आइए जानते हैं इस बार कब है कालाष्टमी व्रत और शुभ मुहूर्त. कालाष्टमी व्रत 2023 कब है? हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन कालाष्टमी व्रत रखा जाता है. इस बार यह तिथि 13 अप्रैल को सुबह 3 बजकर 44 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन 14 अप्रैल को 1 बजकर 34 मिनट पर होगा. काल भैरव का पूजन निशिता मुहूर्त में किया जाता है और अष्टमी तिथि में निशिता मुहूर्त 13 अप्रैल को है. इसलिए 13 अप्रैल को कालाष्टमी व्रत रखा जाएगा. कालाष्टमी व्रत 2023 शुभ मुहूर्त कालाष्टमी व्रत के दिन निशिता मुहूर्त में पूजन किया जाता है. निशिता मुहूर्त 13 अ्रप्रैल को रात 11 बजकर 59 मिनट से लेकर रात 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा. काल भैरव की पूजा के लिए यह शुभ मुहूर्त हैं. इसके अलावा आप दिन में किसी भी समय कालाष्टमी पूजन कर सकते हैं. कालाष्टमी व्रत का महत्व काल भैरव को भगवान शिव का रौद्र रूप माना जाता है.वह समस्त पापों और रोगों का नाश करने वाले हैं.हिंदू शास्त्रों के अनुसार कालाष्टमी के दिन श्रद्धापूर्वक वर्त रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है.इस दिन व्रत रखकर कुंडली में मौजूद राहु के दोष से भी मुक्ति मिलती है कालाष्टमी पूजा विधि इस दिन भैरव चालीसा का पाठ करना चाहिए. कालाष्टमी के पावन दिन पर कुत्ते को भोजन कराना चाहिए. ऐसा करने से भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं और सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं भैरव बाबा का वाहन कुत्ता होता हैं इसलिए इस दिन कुत्ते को भोजन कराने से विशेष फल की प्राप्ति भक्तों को होती हैं.

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चंद्र ग्रहण आज लगने वाले हैं, जानें किन राशियों को रहना होगा सावधान, किसे होगा फायदा

साल का पहला चंद्र ग्रहण 05 मई 2023 को लगने जा रहा है. यह उपछाया चंद्र ग्रहण तुला राशि में स्वाति नक्षत्र में आरंभ होगा और अंत विशाखा नक्षत्र में होगा. चंद्र ग्रहण की शुरुआत रात 08 बजकर 45 मिनट पर होगी और समाप्ति देर रात 01 बजे होगी. चंद्र ग्रहण का सूतक काल 9 घंटे पहले शुरु हो जाता है लेकिन भारत में ग्रहण दिखाई नहीं देगा इसलिए यहां सूतक भी मान्य नहीं रहेगा.  चंद्र ग्रहण पर 12 साल बाद मेष राशि में सूर्य, बुध, गुरु और राहु का चतुर्ग्रही योग बन रहा है जिससे कई राशियों के किस्मत के द्वार खुलने वाले हैं, लेकिन कुछ राशियों पर चंद्र ग्रहण का अशुभ असर भी देखने को मिलेगा, इन्हें सावधान रहने की जरुरत है. सिंह राशि सिंह राशि वालों के लिए साल का पहला चंद्र ग्रहण शुभ फलदायी होने वाला है. आपकी नए योजनाएं फलीभूत होंगी. धन लाभ के योग बन रहे हैं. जिस काम को करने की ठानेंगे उसमें सफलता प्राप्त होगी. नौकरी और कारोबार में उन्नति का मौका मिलेगा. सामाजिक तौर पर मान-सम्मान में वृद्धि होगी. धनु राशि चंद्र ग्रहण धनु राशि से ग्याहवें घर में लगेगा. ऐसे में इनको धन संपत्ति का लाभ मिलेगा. नौकरीपेशा लोगों को प्रमोशन और आय में बढ़ोत्तरी के प्रबल योग हैं. संतान पक्ष को कार्यों में शिक्षा के क्षेत्र में सफलता मिलेगी. बिजनेस में उन्नति का ग्राफ आसमान छूएगा. मिथुन राशि मिथुन राशि वालों  के लिए चंद्र ग्रहण आर्थिक तौर पर लाभदायक रहेगा. पैसों की परेशानी दूर होगी. आर्थिक स्थिति में मजबूती आएगी.  रूका हुआ धन आपको मिल सकता है. लंबे समय से जॉब की तलाश कर रहे लोग कामयाब होंगे. अच्छी नौकरी के ऑफर आ सकते हैं. मकर राशि  मकर राशि वालों के लिए चंद्र ग्रहण कारोबार और नौकरी के लिहाज से अनुकूल रहेगा. कार्यस्थल पर काम का प्रेशर रहेगा लेकिन ये आपको फायदा पहुंचाएगा. मान-सम्मान में बढ़ोत्तरी होगी और भौतिक सुख का लाभ ले पाएंगे. चंद्र ग्रहण इन राशियों के लिए रहेगा अशुभ मेष राशि मेष राशि के जीवन में चंद्र ग्रहण के अशुभ असर देखने को मिलेंगे. धन के मामले में कोई भी निर्णय पर पहुंचने से पहले सलाह -मश्विरा कर लें. 15 दिन तक पैसों के लेन-देन से बचें. मानसिक तौर पर कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. मन की चंचलता के कारण स्वभाव में चिड़चिड़ापन आएगा, ऐसे में विवाद की स्थिति से बचें नहीं तो बनते काम बिगड़ जाएंगे. वृषभ राशि  वृषभ राशि वालें चंद्र ग्रहण वाले दिन वाणी पर कंट्रोल रखें, छोटी-छोटी बात पर बहस हो सकती है ऐसे में परिवार के साथ तनातनी के आसार हैं. मन को शांत रखने के लिए इस दिन मंत्रों का जाप करें. कर्क राशि चंद्र ग्रहण से कर्क राशि वालों की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है, स्वास्थ को लेकर लापरवाही न बरतें नहीं तो ये लंबे समय तक नुकसान पहुंचाएगी. नौकरीपेशा लोगों के काम में अड़चने आ सकती है, इससे परेशान न हो. बुद्धि का उपयोग करें. साल 2023 का दूसरा चंद्र ग्रहण कब साल 2023 का दूसरा चंद्र ग्रहण 28 अक्टूबर 2023 को आंशिक चंद्र ग्रहण लगेगा, जिसका असर भारत पर भी पड़ेगा.

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