MANDIR

लक्ष्मीनारायण मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

इस मंदिर के चारो तरफ मौजूद प्राकृतिक हरियाली आनंद व शांति का अहसास कराती है। लक्ष्मीनारायण मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के मालवीय नगर क्षेत्र में स्थित यह मंदिर बिड़ला मंदिर नाम से प्रसिद्ध है। भोपाल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल इस मंदिर का निर्माण भारत के प्रमुख औद्योगिक बिड़ला परिवार ने कराया था। अरेरा पहाड़ियों पर बने इस मंदिर के पास एक झील है, जिसके कारण यह श्रद्धालुओं के लिए आस्था के साथ पर्यटन का भी केंद्र बनता जा रहा है। चारो तरफ प्राकृतिक हरियाली आनंद व शांति का अहसास कराती है। देशभर में लक्ष्मीनारायण मंदिर प्रसिद्धी है, भोपाल आने वाले श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन को जरूर जाते हैं। मंदिर का इतिहास भोपाल के लक्ष्मीनारायण मंदिर की स्थापना की कहानी काफी रोचक है। साल 1960 में बिड़ला परिवार ने मध्यप्रदेश में अपना उद्योग स्थापित करने की योजना बनाई। जिसके लिए उन्होंने प्रदेश सरकार से जमीन की मांग की। उस समय म.प्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ कैलाश नाथ काटजू थे। उन्होंने उद्योग के लिए जमीन देने के बदले बिड़ला परिवार के सामने भोपाल की अरेरा पहाड़ी पर भव्य लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण कराने की शर्त रखी। बिड़ला परिवार ने शर्त स्वीकार करते हुए 4 साल में साल 1964 में मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर बनने के बाद इसके उद्‍घाटन पर विष्णु महायज्ञ आयोजित किया गया था, जिसमें देश के बड़े विद्वानों व धर्म शास्त्रियों ने हिस्सा लिया था। लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास में ही एक संग्रहालय बना है, जिसमें प्रदेश के रायसेन, सेहोर, मंदसौर व सहदोल सहित अन्य जगहों से लाई गईं मूर्तियां रखी गई हैं। मंदिर का महत्व जन्माष्टमी पर मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के दर्शन-पूजन से हर मनोकामना पूरी होती है। भगवान विष्णु के साथ यह माता लक्ष्मी का भी एक विशेष मंदिर है। दीपावली पर लक्ष्मीनारायण मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना से मां लक्ष्मी की कृपा बरसती है। मंदिर की वास्तुकला अरेरा पहाड़ियों की चोटी पर करीब 7-8 एकड़ क्षेत्र में यह मंदिर बना है। मंदिर में प्रवेश के लिए अर्धमण्डप, महामण्डप, परिक्रमापथ व गर्भगृह है। मंदिर के अंदर संगमरमर पर की गई पौराणिक दृश्यों की नक्काशी काफी सुंदर व दर्शनीय है। दीवारों पर वेद, गीता, रामायण, महाभारत व पुराण आदि के श्लोक लिखे हैं। यह मंदिर देवी लक्ष्‍मी व उनके पति भगवान विष्‍णु को समर्पित है। इसमें भगवान शिव व मां जगदम्बा की प्रतिमा भी विराजमान है। मंदिर परिसर में हनुमानजी व शिवलिंग स्थापित हैं। मुख्य प्रवेश द्वार के सामने एक विशाल शंख है, जो श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:30 AM – 12:00 PM लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास बना संग्रहालय खुलने का समय 09:00 AM – 05:00 PM शाम को मन्दिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद लक्ष्मीनारायण मंदिर में नारियल, लईया, बताशा, मिश्री आदि का भोग लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त भक्त दूध से बने पेड़े का प्रसाद भी चढ़ाते हैं।

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पातालपुरी मंदिर:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

पातालपुरी मंदिर धरती के नीचे स्थित एक मंदिर है जो इसके नाम से पता चलता है। पातालपुरी मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज जिले में स्थित है। पातालपुरी मंदिर संगमनगरी के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। पातालपुरी मंदिर धरती के नीचे स्थित एक मंदिर है जो इसके नाम से पता चलता है। पातालपुरी मंदिर और अक्षय वट वृक्ष दोनों एक दूसरे के निकट स्थित है। अक्षय वट वृक्ष के बारे में यह कहा जाता है कि जब तक पूरी दुनिया है, तब तक अक्षय वट वृक्ष खड़ा रहेगा। मंदिर का इतिहास पातालपुरी मंदिर प्रयागराज के इलाहाबाद किले के तहखाने के अन्दर स्थित है। पातालपुरी मंदिर परिसर में छठवीं शताब्दी की मूर्तियां भी स्थापित है। इससे ये मंदिर कितना पुराना है इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। इलाहाबाद किला अकबर ने 1583 में बनवाया था। पातालपुरी मंदिर तक पहुंचने के लिए इलाहाबाद किले से एक सड़क बनाई गई है। मंदिर परिसर में अक्षय वट वृक्ष और सरस्वती कूप स्थित है। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि श्री राम, लक्ष्मण और सीता ने मंदिर का दौरा किया था। यहां वह स्थान भी मौजूद है जहां त्रेता युग में माता सीता ने अपने कंगन दान किए थे। इसी के साथ इस मंदिर का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के वृत्तांतों में भी मिलता है। Patalpuri mandir मंदिर का महत्व पातालपुरी मंदिर के परिसर में स्थित अक्षय वट वृक्ष के बारे में बताया जाता है कि यह पेड़ अमर है और जब तक दुनिया है तब तक यह पेड़ खड़ा रहेगा। ऐसा माना जाता है कि पातालपुरी मंदिर में भगवान राम और प्रहलाद आये थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री और लेखक ह्यूएन त्संग ने अपनी भारत की यात्रा के दौरान इस मंदिर का दौरा किया था। पातालपुरी के परिसर में सरस्वती कूप है। यह बहुत गहरा कुआँ है और इसे भरने के प्रयास विफल रहे हैं। ऐसा कहा जाता है कि इसका बारहमासी स्रोत दो पवित्र नदियों के संगम पर है। ऐसा माना जाता है कि इसी स्थान पर सरस्वती नदी लुप्त हो गई थी। भगवान अपने अर्धनारीश्वर रूप में विराजमान है, साथ ही तीर्थों के राजा प्रयाग की भी प्रतिमा है। यहां भगवान शनि को समर्पित एक अखंड ज्योति है, जो 12 महीने प्रज्वलित होती रहती है। मंदिर की वास्तुकला मंदिर इलाहाबाद किले के अंदर बने तहखाने नुमा स्थान पर बना हुआ है। इतिहासकार बताते हैं कि मुगलकाल में जब अकबर ने यहां किले का निर्माण करवाया था, तो पुराना मंदिर और ऐतिहासिक अक्षयवट वृक्ष पृथ्वी के धरातल से नीचे हो गए। अकबर के शासनकाल में बने इस किले में मुगल वास्तुकला की झलक देखने को मिलती है। पातालपुरी बड़े-बड़े खंभों पर खड़ा हुआ है। यहां पर एक लाइन से आपको देवी देवताओं के दर्शन करते हुए बाहर निकलने का मार्ग बना है। उसके बाद सीढ़ियां बनी हुई है। मंदिर में श्री राम जी, माता सीता जी, लक्ष्मण जी, भैरव बाबा समेत 43 देवी-देवताओं की मूर्तियां विराजमान है। मंदिर का समय पातालपुरी मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 06:30 PM सुबह आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM शाम की आरती का समय 06:00 PM – 06:30 PM मंदिर का प्रसाद पातालपुरी मंदिर में श्रद्धालु फल, मेवा, बेसन के लड्डू का भोग चढ़ाते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार ड्राई फ्रूट्स और दूध के पेड़े को भी मंदिर में चढ़ाते हैं।

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चौंसठ योगिनी मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

चौंसठ योगिनी मंदिर:यहां माताजी पिंड रूप में 64 देवियों के रूप में विराजमान हैं चौसठ योगिनी मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के ग्वालियर से 40 किलोमीटर में मुरैना जिले के मितावली गांव में है। यहां माताजी पिंड रूप में 64 देवियों के रूप में विराजमान हैं, जिनके अलग-अलग नाम भी है। चौसठ योगिनी मन्दिर एक प्रसिद्ध प्राचीन तांत्रिक मंदिर भी है, ऐसा इसलिए क्योंकि इसे तंत्र साधना और पूजा के लिए भी प्रमुख स्थान माना जाता है। चौंसठ योगिनी मंदिर एक जमाने में इस मंदिर को तांत्रिक विश्वविद्यालय कहा जाता था। चौंसठ योगिनी मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने चौसठ योगिनी मन्दिर को एक प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक घोषित किया है। मंदिर का इतिहास चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण सन् 1000 के आसपास कलीचुरी वंश ने करवाया था। चौसठ योगिनी मंदिर लगभग सौ फीट ऊँची एक अलग पहाड़ी के ऊपर खड़ा है। मंदिर वृत्ताकार यानी गोल आकार का है और बीच में एक अद्भुत नक्काशीदार मंदिर, जिसका रहस्य दिलचस्प है। कई जिज्ञासु आगंतुकों ने इस मंदिर की तुलना भारतीय संसद भवन से की है क्योंकि दोनों ही शैली में गोलाकार हैं। कई लोगों ने निष्कर्ष निकाला है कि यह मंदिर संसद भवन के पीछे का प्रेरणा स्त्रोत था। चौंसठ योगिनी मंदिर का महत्व चौंसठ योगिनी मंदिर:यहां आज भी रात में रुकने की इजाजत नहीं है, ना तो इंसानों को और ना ही पशु-पंक्षी को। – ऐसा कहा जाता है कि भारत का संसद भवन इसी योगिनी मंदिर की वास्तुकला से प्रेरित है। मंदिर की वास्तुकला चौसठ योगिनी मंदिर बाहरी रूप से 170 फीट की त्रिज्या के साथ आकार में गोलाकार है और इसके आंतरिक भाग के भीतर 64 छोटे कक्ष हैं। मुख्य केंद्रीय मंदिर में स्लैब के आवरण हैं जो एक बड़े भूमिगत भंडारण के लिए वर्षा जल को संचित करने के लिए उनमें छिद्र हैं। करीब 200 सीढ़ियां चढ़ने के बाद चौसठ योगिनी मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। चौसठ योगिनी मन्दिर 101 खंभों पर टिका हुआ है। मंदिर की संरचना इस प्रकार है कि ये कई भूकम्प के झटके झेलने के बाद भी सुरक्षित है। मंदिर का समय 04:00 AM – 06:00 PM मंदिर का प्रसाद चौसठ योगिनी मन्दिर तंत्र साधन के लिए जाना जाता है, यहां भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार शिव जी और देवी को प्रसाद चढ़ाते हैं और अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वरदान मांगते हैं।

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दक्ष महादेव हरिद्वार उत्तराखंड,भारत

इसे दक्षेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। दक्ष महादेव उत्तराखंड का हरिद्वार जिला भारत के 7 पवित्र स्थानों में से एक है। यहां की हर की पौड़ी को ब्रह्मकुंड कहा जाता है। गंगा आरती व कुंभ मेले के लिए विश्व प्रसिद्ध हरिद्वार में भगवान शिव के कई मंदिर हैं, लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां स्थापित शिवलिंग धरती लोक के साथ पाताल लोक में भी स्थित है। हम बात कर रहे हैं हरिद्वार के कनखल में स्थित दक्ष महादेव मंदिर की। इसे दक्षेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इसी मंदिर में माता सती ने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राणों की आहूति दे दी थी। दक्ष महादेव यहां स्थापित अनोखे शिवलिंग के दर्शन को दूर-दूर से लोग आते हैं। हरिद्वार के 5 पवित्र स्थलों की सूची में इस मंदिर का नाम शामिल है। दक्ष महादेव मंदिर का इतिहास कनखल में स्थित यह मंदिर हरिद्वार के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती के पिता राजा दक्ष ने कनखल में एक यज्ञ का आयोजन किया था। राजा ने इसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों व संतों को आमंत्रित किया, लेकिन अपने दामाद यानी महादेव को आमंत्रण नहीं भेजा, जिससे उनका बहुत अपमान हुआ। ​पति का यह अपमान देख माता सती बहुत दुखी हो गईं और उन्होंने अपने पिता द्वारा किए जा रहे यज्ञ में कूदकर आहूति दे दी। माता के प्राणों की आहूति देख महादेव क्रोधित हो गए और अपनी जटाओं से वीरभद्र को पैदा किया। भगवान ने वीरभद्र को आदेश दिया कि राजा दक्ष का सिर काटकर यज्ञ को ध्वस्त कर दो। कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु, ब्रह्मा व अन्य देवी-देवताओं ने महादेव को शांत कराने का प्रयास किया, लेकिन भगवान का क्रोध शांत नहीं हुआ। जिसके बाद सिर कटे राजा दक्ष ने प्रभु से क्षमा मांगी। महादेव ने माफी स्वीकार कर ली और दक्ष महादेव भगवान विष्णु, ब्रह्मा व देवी-देवताओं के आग्रह पर राजा दक्ष को बकरे का सिर लगाकर पुन: जीवित कर दिया। यही नहीं, राजा दक्ष के आग्रह पर भगवान शिव ने कहा कि कनखल दक्षेश्वर महादेव के नाम से जाना जाएगा। सावन के महीने में प्रभु यहीं वास करेंगे। 1810 ई में रानी धनकौर ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। दक्ष महादेव मंदिर का महत्व दक्ष मंदिर में शिवलिंग के दर्शन के बिना हरिद्वार की यात्रा अधूरी मानी जाती है। ऐसी मान्यता है कि सावन महीने में मंदिर में दक्षेश्वर महादेव के नाम से गंगाजल चढ़ाने पर हर मनोकामना पूरी होती है। इसके साथ ही वैवाहिक जोड़े यहां भगवान से जन्म जन्मांतर का आशीर्वाद लेने आते है। दक्ष महादेव मंदिर की वास्तुकला माता सती के प्राणों का गवाह है दक्षेश्वर मंदिर। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने दक्ष महादेव भगवान शिव और माता सती की एक बहुत बड़ी प्रतिमा है। भगवान ने माता के मृत शरीर को अपने हाथों में उठाया हुआ है, जोकि यज्ञ में दिए माता के प्राणों को दर्शाता है। मुख्य द्वारा के दोनों तरफ बड़े-बड़े शेरों की प्रतिमा लगी है। मंदिर में सबसे खास है यहां स्थापित शिवलिंग। दक्ष महादेव पूरे विश्व में यहां स्थापित एकमात्र ऐसा शिवलिंग है, जो आकाशमुखी नहीं बल्कि पातालमुखी है। यानी शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा जमीन के नीचे है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में सती कुंड, शिवलिंग व नंदी जी विराजमान हैं। मंदिर परिसर में गणेश जी, मां दुर्गा व अन्य देवी देवताओं के मंदिर भी बने हुए हैं। मंदिर के ठीक सामने गंगा की धारा बह रही है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM शाम की आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM सुबह की आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM मंदिर का प्रसाद महादेव के इस मंदिर में मुख्य रूप से बेलपत्र, दूध, केला, शहद, घी, फूल आर्पित किया जाता है

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नवग्रह मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

यहां शनिदेव की प्रतिमा के साथ ढय्या शनि की भी प्रतिमा स्थापित है नवग्रह मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। क्षिप्रा नदी के त्रिवेणी घाट पर स्थित नवग्रह मंदिर नौ ग्रहों को समर्पित है। शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या के दिन यहां बड़ी भारी भीड़ लगती है। हाल के वर्षों में इस मंदिर का धार्मिक महत्व बहुत बढ़ गया है। यहां पर मुख्य शनिदेव की प्रतिमा के साथ-साथ ढय्या शनि की भी प्रतिमा भी स्थापित है। बताया जाता है कि विक्रम संवत का इतिहास भी इस मंदिर से जुड़ा हुआ है। मंदिर का इतिहास नवग्रह मंदिर के बारे में बताया जाता है कि लगभग दो हजार साल पहले इस मंदिर की स्थापना राजा विक्रमादित्य ने की थी। कहा जाता है कि विक्रमादित्य ने इस को मंदिर के बनाने के बाद ही विक्रम संवत की शुरुआत की थी। करीब 2075 साल पुराना यह देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां शनि महाराज की पूजा शिव स्वरूप में होती है। मंदिर की स्थापना महाराजा विक्रमादित्य ने की थी, उन्होंने ही विक्रम संवत (हिंदू पंचांग) शुरू किया था। अभी विक्रम संवत 2075 चल रहा है। यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना के लिए शनिदेव पर तेल चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि यहां साढ़ेसाती और ढय्या की शांति के लिए शनिदेव पर तेल चढ़ाया जाता है। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि नवग्रह मंदिर में जो भक्त सच्चे मन से शनिदेव की पूजा करता है, शनिदेव उसके सभी दुख दूर कर देते हैं।यह मंदिर नौ ग्रहों अर्थात् सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, राहु, केतु और शनि को समर्पित है। शनि अमावस्या के दिन यहां 5 क्विंटल से अधिक तेल शनिदेव पर चढ़ता है। बाद में इस तेल को निलाम किया जाता है। मंदिर की वास्तुकला नवग्रह मंदिर की वास्तुकला बहुत ही सुंदर है। मंदिर के सामने भव्य प्रवेश द्वार है। नवग्रह मंदिर के चारों तरफ उकेरे गए शिल्प नयनाभिराम हैं। नवग्रह मंदिर कई स्तंभों पर बना है। सभी स्तंभों पर देवी देवताओं को प्रदर्शित किया गया है। नवग्रह मंदिर में मुख्य शनिदेव की प्रतिमा के साथ-साथ ढय्या शनि की भी प्रतिमा भी स्थापित है। नवग्रह मंदिर में हर ग्रह का अपना गर्भ गृह है। नवग्रह की पूजा के लिए मंदिर में विशाल परिसर है, जहां श्रद्धालु ग्रहों की शांति के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद नवग्रह मंदिर में गुड और तिल का भोग लगाया जाता है। श्रद्धालु शनिदेव पर सरसों का तेल भी चढ़ाते हैं।

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इस्कॉन मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इस्कॉन की स्थापना भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में न्यूयॉर्क में की थी। इस्कॉन मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा शहर के वृंदावन में स्थित एक हिंदू मंदिर है। यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम को समर्पित है। इस्कॉन मंदिर का पूरा नाम इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) है। इस संस्था की स्थापना भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में न्यूयॉर्क में की थी। स्वामी प्रभुपाद जी ने ही वृंदावन में इस मंदिर बनाने का सपना देखा और उसे पूरा भी किया। मंदिर को कृष्ण बलराम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर का इतिहास इस्कॉन मंदिर:स्वामी प्रभुपाद भारत में कई जगहों पर इस्कॉन मंदिर बनवाना चाहते थे। 1975 में उन्होंने वृंदावन में यह मंदिर बनवाया था। ये भारत में इस्कॉन द्वारा निर्मित पहला मंदिर था। राम नवमी के मंदिर शुभ अवसर पर उन्होंने मंदिर का उद्घाटन किया और कृष्ण-बलराम, राधा-श्यामासुंदर, ललिता देवी, विशाखा देवी और गौरा-नितई के दिव्य देवताओं की स्थापना की। मंदिर उसी स्थान पर बना है जहां श्री कृष्ण और श्री बलराम ने अपना बचपन बिताया था। इस्कॉन मंदिर:का महत्व इस्कॉन मंदिर दुनिया भर के कृष्ण भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र है, क्योंकि यह शक्ति और भक्ति का प्रतीक है। मंदिर वृन्दावन में आकर भक्त श्री कृष्ण की भक्ति में डूब जाते हैं और अपने सारे कष्टों को भूल जाते हैं। मंदिर में पूजा की उच्च गुणवत्ता का पालन किया जाता है और कुछ प्रक्रियाओं को नित्य रूप से किया जाता है, जिसमें से कुछ हैं – 6 प्रकार की आरतियाँ, 6 प्रकार के भोग और इष्टदेव को चढ़ावा, पुजारियों द्वारा धार्मिक विधि-विधान के साथ इष्टदेवों की अनुशासित पूजा। मंदिर के जरिए इस्कॉन के अनुयायियों ने विश्व में गीता, हिंदू धर्म और संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया और प्रक्रिया सतत जारी है। इस्कॉन मंदिर की वास्तुकला मंदिर सफेद संगमरमर से निर्मित है और इस मंदिर की बनावट वृंदावन की प्रभावशाली मंदिरों में से एक है। ये जटिल नक्काशीदार दीवारों और गुंबदों, घुमावदार सीढ़ियों और मेहराबों के साथ विशेष कारीगरी का एक उदाहरण है। मंदिर परिसर में तीन मंदिर हैं; एक भगवान कृष्ण और उनके भाई भगवान बलराम को समर्पित, दूसरा श्री गौर – निताई (श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद) को समर्पित और तीसरा श्री श्यामसुंदर (भगवान कृष्ण और राधा रानी) को समर्पित। मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत मंदिर के केंद्रीय स्लैब में बाईं ओर नित्यानंद के साथ चैतन्य महाप्रभु और भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद और इस्कॉन मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत उनके आध्यात्मिक गुरु भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की मूर्तियां लगी हुई हैं। जैसे ही आप मंदिर के दरवाजे में प्रवेश करते हैं, काले और सफेद संगमरमर के चारखानेदार प्रांगण आपका ध्यान आकर्षित करते हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 04:00 AM – 12:45 PM श्रृंगार आरती का समय 07:15 AM – 07:25 AM भागवत कथा का समय 08:00 AM – 08:30 AM राज भोग आरती का समय 12:00 PM – 12:30 PM उत्थापन आरती का समय 04:00 PM – 04:30 PM शयन आरती का समय 08:00 PM – 08:15 PM मंगला आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM गुरु पूजा का समय 07:25 AM – 08:00 AM पुष्प आरती का समय 08:30 AM – 09:30 AM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:15 PM संध्या आरती का समय 06:30 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद इस्कॉन मंदिर में फूलों के साथ माखन, मिश्री, पेड़ा और बर्फी का भोग लगाया जाता है।

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चिंतामन गणेश मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

चिंतामन गणेश मंदिर:यहाँ गणेशजी 3 रूपों में विराजमान हैं चिंतामन गणेश मंदिर भारत के मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में स्थित है। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर से करीब 6 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम जवास्या में भगवान गणेश जी का यह प्राचीनतम मंदिर बना हुआ है। चिंतामन गणेश मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही हमें गौरीसुत गणेश की तीन प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। यहां पार्वतीनंदन तीन रूपों में विराजमान हैं। पहला चिंतामन, दूसरा इच्छामन और तीसरा सिद्धिविनायक। चिंतामन गणेश मंदिर में चैत्र माह के हर बुधवार को मेला लगता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चिंतामन गणेश माता सीता द्वारा स्थापित षट् विनायकों में से एक हैं। मंदिर का इतिहास चिंतामन गणेश मंदिर में चिंतामन गणेश जी की स्थापना भगवान श्री राम व माता सीता ने वनवास के दौरान की थी। इच्छामन और सिद्धिविनायक गणेश जी की स्थापना लक्ष्मण जी और सीता माता ने की थी। ऐसा कहा जाता है कि जो भक्त चैत्र माह के बुधवार के दिन चिंतामण गणेश मंदिर में पूजा-अर्चना करते है। भगवान गणेश उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। साथ ही उसे सभी प्रकार की चिंताओं से मुक्त भी कर देते हैं। मंदिर में स्थित चिंतामन गणेश भक्तों को चिंता से मुक्ति, सिद्धिविनायक स्वरूप सिद्धि प्रदान करते हैं और इच्छामन गणेश इच्छा की पूर्ति करते हैं। मंदिर का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहाँ के किसान चैत्र माह में रबी की फसल पकने के बाद सबसे पहले भगवान चिंतामन गणेश को अपनी फसल अर्पित करते हैं। उसके बाद ही बाजार मे बेचने जाते हैं। ऐसा करने से भगवान चिंतामन गणेश किसानों के कार्य में आने वाली हर बाधा को समाप्त कर देते हैं। इस मंदिर में श्रद्धालु यहां मन्नत का धागा भी बांधते हैं और उल्टा स्वस्तिक भी बनाते हैं। मंदिर की वास्तुकला चिंतामन गणेश मंदिर 9वीं शताब्दी से 13वीं के मध्य यानी परमारकालीन का माना जाता है। इस मंदिर के शिखर पर गुंबदों के साथ सिंह भी विराजमान है। इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत् 155 में महाराजा विक्रमादित्य द्वारा श्रीयंत्र के अनुरूप करवाया गया था। उसके बाद इसका जीर्णोद्धार पेशवाकाल में कराया गया। वहीं वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार अहिल्याबाई होलकर के शासनकाल में हुआ। मंदिर में स्थापित श्रीगणेश जी की मूर्ति खड़ी हुई है।जो जमीन के अंदर आधी धंसी है, जिसकी वजह से आधी मूर्ति के दर्शन होते हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 09:30 PM भोग आरती आरती का समय 12:00 PM – 12:30 PM चौथी आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM पहली आरती का समय 08:00 AM – 09:00 AM तीसरी आरती का समय 04:00 PM – 04:30 PM पांचवीं आरती का समय 09:00 PM – 09:30 PM मंदिर का प्रसाद चिंतामन गणेश मंदिर में भक्त शुद्ध घी और मेवे से बने लड्‌डू का भोग लगाते हैं। गणेशजी के इस मंदिर में भक्तों द्वारा मन्नत के लिए दूध, दही, चावल और नारियल में से किसी एक वस्तु को चढ़ाया जाता है। मकर संक्रांति पर महिलाएं इस दिन व्रत के बाद चिंतामन गणेश को तिल के बने व्‍यंजनों का भोग लगाती हैं।

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वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर:इस मंदिर को विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर बताया जाता है, जो अभी मथुरा के वृंदावन में अंडर कंस्ट्रक्शन है। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर, भारत के उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के वृन्दावन शहर का एक ऐतिहासिक मंदिर है। इस मंदिर को विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर बताया जाता है, जो अभी मथुरा के वृंदावन में अंडर कंस्ट्रक्शन है। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर परिसर करीब 26 एकड़ में फैला हुआ है और इसकी ऊंचाई 700 फीट है। इस मंदिर में वर्ष भर में आने वाले विभिन्न तरह के धार्मिक पर्वों और त्योहारों को मनाया जाएगा। आने वाले समय में यह मंदिर हिन्दूओं के लिए एक बहुत बड़ा दर्शनिक स्थान होगा। मंदिर का इतिहास वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का निर्माण कार्य 2014 में शुरू हुआ। इस मंदिर की नीव का पहला पत्थर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी द्वारा रखा गया था। वर्तमान समय में इस मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जिसके पुरे होने की संभावना 2024 से 2025 के बीच में है। इसका निर्माण कार्य पूरा होते ही यह मंदिर सभी श्री कृष्ण भक्तों के लिए खोल दिया जायेगा। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर की संरचना में आईआईटी दिल्ली के सिविल इंजीनियर डिपार्टमेंट के इंजिनियर लगे हुए हैं, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जिनके स्ट्रक्चरल कंसलटेंट संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के थोर्नटन टॉमसटी हैं। इस मंदिर के निर्माण के लिए मुख्य आर्केटेक्ट के रूप में गुरुग्राम की कंपनी InGenious Studio प्राइवेट लिमिटेड और नोएडा स्थित क्विंटेस्सेंस डिजाईन स्टूडियो काम कर रही है। मंदिर का महत्व वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का मुख्य आकर्षण एक कैप्सूल एलिवेटर होगा, जो आगंतुकों को शीर्ष पर ले जाएगा जहां से आप पुरे ब्रज मंडल के विहंगम दृश्य का आनंद ले सकेंगे। मंदिर के निर्माण की कुल लागत लगभग 300 करोड़ होगी, जिस कारण यह दुनिया का सबसे महंगा मंदिर बन जाएगा । वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर मंदिर परिसर के चारों ओर 12 वनों का नाम ब्रज मंडल के 12 उद्यानों के नाम पर रखा जाएगा, जो इस प्रकार हैं- महावन, वृंदावन, लोहावन, काम्यवन, कुमुदवन, तलवन, भांडीरावण, मधुवन, कुमुदवन, बहुलवन, बिल्ववन और भद्रवन। मंदिर की वास्तुकला वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का निर्माण आधुनिक डिजाइन के साथ एक पारंपरिक नागर शैली की वास्तुकला के अनुसार किया जा रहा है। यह मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा धार्मिक स्थल बनने जा रहा है, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जो लगभग 700 फीट ऊंचा और 213 मीटर लंबा होगा। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर परिसर लगभग 26 एकड़ भूमि के क्षेत्र में बनेगा। इस परिसर के चारों ओर हरे-भरे जंगल बनाए जा रहे हैं। इस जंगल को फल-फूल के वृक्षों, झरनों और छोटी-छोटी कृत्रिम पहाड़ियों से बनाया जायेगा, यहां पर श्री कृष्ण काल के वर्णन के अनुसार सब कुछ निर्मित किया जाएगा। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 12:00 PM दोपहर में मंदिर खुलने का समय 01:00 PM – 08:00 PM

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हर की पौड़ी:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

‘हर की पौड़ी’ या ब्रह्मकुंड के एक पत्थर में श्रीहरि के पदचिह्न स्थापित है। उत्तराखंड के शहर हरिद्वार में स्थित हर की पौड़ी एक अत्यंत प्रतिष्ठित और पवित्र स्थल है। इस स्थान का हिंदू पौराणिक कथाओं में अत्यधिक धार्मिक महत्व है। ‘हर की पौरी’ नाम का सामान्य अर्थ है “भगवान श्री हरि विष्णु के चरण” । इसे पवित्र गंगा नदी के तट पर सबसे पवित्र स्नान घाटों में से एक माना जाता है। इस धार्मिक स्थल को वह बिंदु भी माना जाता है जहां पवित्र गंगा पहाड़ों से निकलकर मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। प्राचीन वैदिक काल के अनुसार, माना जाता है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों ही हर की पौरी आये थे। जिस कारण यह स्थान अत्यधिक पवित्र स्थान के रूप में परिवर्तित हो गया है। मंदिर का इतिहास किंवदंतियों के अनुसार, बताया जाता है कि हर की पौड़ी का निर्माण पहली शताब्दी ईसा पूर्व में राजा विक्रमादित्य द्वारा किया गया था। राजा विक्रमादित्य ने इस घाट को अपने भाई भतृहरि की श्रद्धांजलि के रूप में निर्मित करवाया था। क्योंकि भतृहरि पवित्र गंगा के तट पर ध्यान करते थे। हर की पौड़ी की सीढ़ियों पर कई मंदिर बनाए गए जिनका निर्माण 19वीं सदी में हुआ। 1938 में, घाटों का प्रारंभिक विस्तार किया गया, जिसे उत्तर प्रदेश के आगरा के जमींदार पंडित हरज्ञान सिंह कटारा द्वारा बनवाया गया था। इसके बाद, 1986 में, घाटों का नवीनीकरण भी हुआ। ऐसा भी बताया जाता है कि हर की पौड़ी पर राजा श्वेत ने भगवान् ब्रह्मा की तपस्या की थी। उनकी तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा जी ने वरदान मांगने को कहा। इस पर राजा ने इच्छा रखी कि इस स्थान को भगवान के नाम से जाना जाए। तब से हर की पौड़ी को ‘ब्रह्म कुण्ड’ भी कहा जाता है। मंदिर का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मन्थन होने के बाद अमृत के लिए देव और दानव झगड़ रहे थे तब उनसे बचाकर धन्वंतरी अमृत ले जा रहे थे तो अमृत की कुछ बूँदें पृथ्वी पर गिर गई और वह जगहें धार्मिक स्थान बन गए। हरिद्वार में भी अमृत की बूँदे गिरी थीं वह स्थान हर की पौड़ी था। ऐसा माना जाता है कि यहाँ पर स्नान करने से मोक्ष प्राप्त होता है। यहाँ से ही भक्त जल भरकर अपने घर ले जाते हैं जिसे गंगा जल कहते हैं। मंदिर की वास्तुकला हर की पौड़ी एक बहुत ही सुन्दर घाट है। जो गंगा नदी के तट पर बना हुआ है। यहाँ पर भक्त गंगा स्नान के लिए आते हैं। घाट के पास ही बहुत छोटे छोटे मंदिर बने हुए हैं। हर की पौड़ी के घाट पर ही प्रसिद्ध ” ब्रह्म कुंड” बना हुआ है। इस घाट के एक पत्थर की दीवार पर एक बड़ा पदचिह्न है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह भगवान विष्णु के चरण है। बहुचर्चित शाम की गंगा आरती भी यहां आयोजित की जाती है, जो दुनिया भर से हजारों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है। घाट के थोड़ी थोड़ी दूरी पर नारंगी और सफ़ेद रंग के जीवन रक्षक टावर भी लगाए गए है। जो कि निगरानी के लिए है। ताकि गंगा के तेज बहाव में कोई श्रद्धालु बह न जाएँ। मंदिर का समय गर्मियों के दौरान सुबह की आरती का समय 05:30 AM – 06:30 AM सर्दियों के दौरान सुबह की आरती का समय 06:30 AM – 07:30 AM गर्मियों के दौरान शाम की आरती का समय 06:30 PM – 07:30 PM सर्दियों के दौरान शाम की आरती का समय। गंगा आरती में उपस्थित रहने के लिए आपको आरती से कम से कम आधे घंटे पहले पहुंचना चाहिए। ताकि आप सरलता से आरती के दर्शन कर सकें। 05:30 PM – 06:30 PM

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कांच मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

कांच मंदिर:जैन समाज के कांच मंदिर में सभी धर्मों और समाज के लोग दर्शन करने आते हैं। कांच मंदिर:भारत के मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में कांच मंदिर स्थित है। ना केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी मशहूर है। 102 साल पुराने इस मंदिर का पूरा इंटीरियर कांच से किया गया है यानी छत से लेकर, खंभे, दरवाज़े, खिड़कियां, झूमर सबकुछ कांच का बना हुआ है। जैन समाज के कांच मंदिर में सभी धर्मों और समाज के लोग दर्शन करने आते हैं। साथ ही के बेहतरीन बनावट के दर्शन के साथ इसकी खूबसूरती को निहारते ही रह जाते हैं। मंदिर का इतिहास बनाने की शुरुआत करीब 1913 में इंदौर के सर सेठ हुकुमचंद ने की थी। श्री विक्रम सवंत 1978 मिति आषाढ़ सुदी 7 सोमवार सन 1921 में इसमें मूर्ति स्थापना कि गई । कांच मन्दिर बनाने वाले सर सेठ हुकुमचंद ने अपना निजी मन्दिर बनाए जाने के उद्देश्य से इसे बनवाया था, लेकिन ये सभी लोगों के लिए खुला था। सेठ हुकुमचंद ने कांच मंदिर को बनवाने में करीब 1 लाख 62 हज़ार रुपये खर्च करीब 250 कारीगरों से बनवाया था। पूरे मंदिर में बनाई गई अद्भुत कलाकृतियों में जैन धर्म के विषय में बताया गया है। मंदिर का महत्व कांच मंदिर को छत से लेकर ज़मीन तक पूरा कांच का बनाया गया है। इसमें जैन समाज के सभी गुरु और मुनियों की कलाकॄति के साथ धर्म के विषय में भी खूबसूरत नक्काशी की गई है। कांच मंदिर में स्थापित भगवान शांतिनाथ के काली संगरमरमर की मूर्ति राजस्थान से गई थीं। इस मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो पाई इसलिए इसे चेतालय कहा जाता है। में रखा सोने का रथ और पालकी महावीर जयंती पर निकाला जाता था। मंदिर की वास्तुकला कांच मंदिर में श्री चंद्रप्रभा भगवान एवं बाईं और आदिनाथ भगवान विराजे है। शांतिनाथ भगवान कि मूर्ति काले पत्थर कि बनी है, जिसे जयपुर में बनवाया गया, जिसमें अन्दर सारा कार्य कांच का किया हुआ है। यह कांच बेल्जियम से मंगाया गया था व खम्भे लाल पत्थर के है इसका दरवाजा लकड़ी का बना हुआ है। उस पर चाँदी कि परत लगाई गई है। इस मंदिर में कि गयी कारीगरी देखते ही बनती है यहाँ पर कारीगरी और कांच कि नक्काशी ईरान और जयपुर के कारीगरों द्वारा कि गई है | इस मंदिर में कि गयी कांच कि नक्काशी और कारीगरी के कारण यहाँ 3D प्रभाव आता है। मंदिर की की इमारत में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं है बल्कि चूने से पत्थर की जुड़ाई की गई है। इसका आर्किटेक्ट खुद सेठ हुकुमचंद ने किया था। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 10:00 AM – 05:00 PM

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तक्षकेश्वर नाथ:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

प्रयागराज में इस स्थल को “बड़ा शिवाला” के नाम से जाना जाता है। तक्षकेश्वर नाथ मंदिर, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज जिले में स्थित है। संगम नगरी में यमुना किनारे तक्षकेश्वर नाथ मंदिर विश्व का एकलौता तक्षक तीर्थ स्थल है। वर्तमान में यह स्थान प्रयागराज शहर के दक्षिणी क्षेत्र में दरियाबाद मुहल्ले में स्थित है। यह स्थल आदिकाल से संरक्षित है और यहां शेषनाग के अवशेष आज भी मौजूद है। यह यमुना तट पर विशाल घने जंगलों में स्थापित शिवलिंग था। हालांकि यहां अब जंगल का अस्तित्व खत्म हो गया है। प्रयागराज में इस स्थल को “बड़ा शिवाला” के नाम से जाना जाता है। मंदिर का इतिहास तक्षकेश्वर नाथ मंदिर का इतिहास 5,000 साल से भी ज्यादा पुराना है। तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग की प्राचीनता और पौराणिकता स्वयं पुराणों में दर्ज है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा परीक्षित को जब तक्षक नाग ने डसा था, तब उस घटना के प्रायश्चित में इन पांचों मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी और वरदान दिया गया था कि जो कोई भी इस मंदिर में जाकर दर्शन करेगा, उसके वंशजों को कभी सर्प की विष बाधा नहीं होगी। पुराणों की माने तो तक्षक संपूर्ण सर्पजाति के स्वामी हैं। आदिकाल से यह धर्म की राजधानी तीर्थराज प्रयाग में निवास कर रहे हैं। शास्त्रों में भी कहा गया है कि काल सर्पयोग शांति, राहु की महादशा, नागदोष एवं विष बाधा से मुक्ति का मुख्य स्थान तक्षकेश्वर नाथ प्रयाग ही है। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि दो दशक पहले तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में सावन के महीने में यहां सांपों का आना जाना अत्याधिक बढ़ जाता था। मान्यता है कि यहां शिवलिंग के दर्शन से कालसर्प दोषों से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में शिव जी के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं को और उनके वंशजों को सर्प विष बाधा से मुक्ति मिलती है। मंदिर की वास्तुकला प्रयागराज में तक्षकेश्वर नाथ मंदिर को नागर शैली में बनाया गया है। मंदिर में विशाल शिखर के साथ गुंबद भी बने हैं। तक्षकेश्वर महादेव के लिंग के चारों ओर तांबे का अर्घ्य बना है। परिसर में हनुमान जी, गणेश जी की मूर्ति है। 20 जनवरी 1992 को खुदाई के दौरान यहां खुदाई में पौराणिक काल के कुछ अवशेष प्राप्त हुये थे। कई पत्थर और प्राचीन मूर्तियां यहां मिलीं और उन पर पर बारीक नक्काशी मौजूदा मानव सभ्यता से भी प्राचीन बताई गई। पुरातत्व विभाग ने भी यहां पत्थरों का अवलोकन किया और अति प्राचीन सभ्यता की कृति होने के कारण आज भी उस पर शोध जारी है। मंदिर का समय सुबह तक्षकेश्वर नाथ मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 12:00 PM शाम को तक्षकेश्वर नाथ मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 10:00 PM मंदिर का प्रसाद तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में भक्त शिव जी फल, दूध, लड्डू का भोग चढ़ाते हैं। साथ ही भांग, दतुरा, बेलपत्र भी शिव जी को चढ़ाया जाता है।

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श्री कालभैरव मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

कालभैरव को शहर की रक्षा के लिए किया गया नियुक्त कालभैरव मंदिर भगवान का मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। क्षिप्रा नदी के किनारे भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थित इस मंदिर का इतिहास करीब 6,000 वर्ष पुराना बताया जाता है। काल भैरव को उज्जैन शहर का संरक्षक भी कहा जाता है और यह मंदिर इन्हीं को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान कालभैरव के वैष्णव स्वरूप की पूजा की जाती है। श्री कालभैरव मंदिर का इतिहास उज्जैन के काल भैरव मंदिर को राजा भद्रसेन ने बनवाया था, जिसका जिक्र स्कन्द पुराण के अवन्ती खंड में भी किया गया है। परमार शासनकाल (9वीं से 13वीं शताब्दी) के दौरान की शिवजी, माँ पार्वती, भगवान विष्णु और गणेश जी की प्रतिमाएं इसी जगह से मिली है। वहीं राजा भोज के समय इस मंदिर का पुनर्निर्माण भी करवाया गया था। श्री कालभैरव मंदिर का महत्व उज्जैन के राजा महाकाल ने ही कालभैरव को शहर की रक्षा के लिए नियुक्त किया है। इसी वजह से कालभैरव को शहर का कोतवाल भी कहा जाता है। भैरव बाबा के इस मंदिर में उनको मदिरा चढ़ाई जाती है, लेकिन मदिरा जाती कहां है ये रहस्य आज रहस्य बनके ही रह गया है। कालभैरव की इस प्रतिमा को मदिरा पीते हुए देखने के लिए यहां हजारों श्रद्धालु हर रोज पहुंचते हैं। इस मंदिर में भगवान कालभैरव की प्रतिमा सिंधिया पगड़ी पहने हुए दिखाई देती है। यह पगड़ी बाबा भैरवनाथ के लिए ग्वालियर के सिंधिया परिवार की ओर से आती है। यह प्रथा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। श्री कालभैरव मंदिर की वास्तुकला उज्जैन के काल भैरव मंदिर का निर्माण मराठा स्थापत्य शैली के अनुसार किया है, मंदिर की दीवारों में मालवा शैली में बने शानदार चित्रों के अवशेष अभी भी देखने को मिलते हैं। वहीं मंदिर के गर्भ गृह में भगवान काल भैरव की मूर्ति एक चट्टान के रूप में विराजमान है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 10:00 PM सायंकाल आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM सुबह की आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM मंदिर का प्रसाद उज्जैन के इस कालभैरव बाबा को मदिरा का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा भक्त यहाँ पर मावे और बेसन के लड्डू का भी भोग लगाते हैं।

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