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Sankashti Chaturthi

Ganadhipa Sankashti Chaturthi 2025 Date And Time: गणाधिप संकष्टी चतुर्थी पूजा और समय….

Ganadhipa Sankashti Chaturthi 2025 Mein Kab Hai: संकष्टी चतुर्थी, जिसे संकटहर चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, भगवान गणेश को समर्पित एक हिंदू त्योहार है, जो हाथी के सिर वाले देवता हैं और जिन्हें बाधाओं को दूर करने वाले तथा ज्ञान और समृद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर महीने भगवान गणेश के सम्मान में एक अनुष्ठान होता है। इस अनुष्ठान में संकष्टी चतुर्थी के शुभ अवसर पर कमल की पंखुड़ियाँ, जिन्हें आमतौर पर “पीता” कहा जाता है, अर्पित की जाती हैं। जैसा कि इसके नाम से संकेत मिलता है, संकष्टी चतुर्थी Sankashti Chaturthi कृष्ण पक्ष में आती है, जो कि पूर्णिमा के बाद विशेष रूप से चौथे दिन चंद्रमा का क्षीण चरण होता है। इस दिन, लोग उपवास या व्रत रखते हैं। एक वर्ष के दौरान, भगवान गणेश को इन मासिक अवसरों में से प्रत्येक के दौरान एक अनूठे नाम से पूजा जाता है, जो कुल 13 उपवास दिनों के बराबर है। इनमें से बारह एक सामान्य वर्ष में मनाए जाते हैं, जबकि तेरहवां हिंदू कैलेंडर में हर चार साल में होने वाले अतिरिक्त महीने से जुड़ा है। इन मासिक उपवास दिनों में से प्रत्येक एक विशिष्ट कथा और उद्देश्य रखता है जो इसके पालन को रेखांकित करता है। Sankashti Chaturthi यह अभ्यास न केवल भक्तों और भगवान गणेश के बीच संबंध को मजबूत करता है बल्कि प्रत्येक महीने के व्रत के पीछे आध्यात्मिक महत्व की गहरी समझ भी प्रदान करता है । गणाधिप संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त: Ganadhipa Sankashti Chaturthi Subh Muhurat 8 नवंबर, 2025 (शनिवार) – गणाधिप संकष्टी चतुर्थी चतुर्थी तिथि का समय : 8 नवंबर को सुबह 07:32 बजे से 9 नवंबर को सुबह 04:25 बजे तक संकष्टी चतुर्थी पूजा के पारंपरिक अनुष्ठान और महत्व:Traditional rituals and significance of Sankashti Chaturthi Puja भगवान गणेश को समर्पित एक पूजनीय हिंदू पर्व, Sankashti Chaturthi संकष्टी चतुर्थी, कई आवश्यक अनुष्ठानों को समाहित करता है, जिनमें से प्रत्येक का गहरा प्रतीकात्मक महत्व है। ये अनुष्ठान न केवल भगवान के साथ एक मज़बूत संबंध स्थापित करते हैं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक नवीनीकरण का अवसर भी प्रदान करते हैं। दिन की शुरुआत जल्दी उठकर स्नान करके करें: सुबह जल्दी उठकर और स्नान करके दिन की शुरुआत करना केवल एक शारीरिक दिनचर्या नहीं है, बल्कि शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों रूप से स्वयं को शुद्ध करने का एक प्रतीकात्मक संकेत है। Sankashti Chaturthi यह अभ्यास भक्त के मन और शरीर को आगामी अनुष्ठानों में पवित्रता और भक्ति की उच्च भावना के साथ संलग्न होने के लिए तैयार करता है। पूजा क्षेत्र को अच्छी तरह से साफ करें: पूजा कक्ष और निर्धारित स्थान की स्वच्छता सुनिश्चित करना केवल एक सतही कार्य नहीं है। Sankashti Chaturthi यह बाहरी अशुद्धियों और विकर्षणों को दूर करने का प्रतीक है, जिससे भक्त आध्यात्मिक साधना के लिए अनुकूल एक पवित्र और केंद्रित वातावरण बना सकते हैं। भगवान गणेश की मूर्ति को श्रद्धापूर्वक स्थापित करें: भगवान गणेश की मूर्ति को लकड़ी के तख्ते पर स्थापित करना, देवता को उपयुक्त आसन प्रदान करने का एक तरीका है। यह संवाद के लिए एक दिव्य स्थान बनाने का प्रतीक है और भक्त द्वारा देवता की उपस्थिति का हार्दिक स्वागत दर्शाता है। शाम का अनुष्ठान प्रदर्शन: शाम के समय Sankashti Chaturthi संकष्टी पूजा का एक गहरा अर्थ होता है। शाम के समय की शांति आत्मनिरीक्षण और भक्ति का वातावरण बनाती है, जिससे भक्त पूरे मनोयोग से अनुष्ठानों में संलग्न हो पाते हैं। भगवान गणेश का अलंकरण: भगवान गणेश को पीले वस्त्र, सुगंधित पुष्प और दूर्वा से सुसज्जित करना भक्त के प्रेम और श्रद्धा का प्रतीक है। यह प्रक्रिया आध्यात्मिक अनुभव को दृष्टिगत रूप से बढ़ाती है और भक्ति का मूर्त रूप प्रस्तुत करती है। दुर्वा घास अर्पित करना: भगवान गणेश को दूर्वा घास भेंट करने का दोहरा महत्व है। Sankashti Chaturthi यह उनकी प्रिय जड़ी-बूटी होने के अलावा, भक्त द्वारा उनकी प्राथमिकताओं की समझ का प्रतीक है और भक्ति एवं समझ की अभिव्यक्ति का भी प्रतीक है। दीया जलाना और अर्पण करना: घी से जलते दीये से वातावरण को प्रकाशित करना और अगरबत्ती जलाना, प्रकाश और सुगंध के अर्पण का प्रतीक है, जो दोनों ही ज्ञान और शुद्ध हृदय के प्रतीक हैं। लड्डू , मोदक , केले और मीठा पान जैसी मिठाइयाँ अर्पित करना , ईश्वर को सर्वोत्तम अर्पण का प्रतीक है। आध्यात्मिक ऊर्जा का आह्वान: बिन्दायक कथा का पाठ, मंत्रोच्चार और भगवान गणेश की आरती करना केवल अनुष्ठान से अधिक हैं; ये आध्यात्मिक ऊर्जा का आह्वान करने और दिव्य उपस्थिति से जुड़ने के तरीके हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने का प्रतीक: व्रत तोड़ने से पहले चंद्रमा को अर्घ्य या जल अर्पित करना एक संक्रमण काल ​​का प्रतीक है और व्रत की अवधि पूरी होने का संकेत देता है। इसका प्रतीकात्मक महत्व है और यह दिव्य शक्तियों को स्वीकार करने का एक तरीका है। सात्विक भोजन का सेवन: पूजा के समापन पर सात्विक भोजन जैसे मखाने की खीर, समा के चावल की खिचड़ी और दूध से बने उत्पाद ग्रहण किए जाते हैं। ये भोजन शुद्ध, सरल और शरीर व मन को संतुलित रखने में सहायक माने जाते हैं। संकष्टी चतुर्थी का महत्व:Importance of Sankashti Chaturthi संकष्टी चतुर्थी व्रत के पवित्र समापन के रूप में, चतुर्थी तिथि चंद्रोदय देखने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। यह एक ऐसा अनुष्ठान है जिसका भक्त पूरी लगन से पालन करते हैं और चंद्रोदय के बाद ही अपना व्रत तोड़ते हैं। एक आम भ्रांति यह है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने से सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। यह इस व्रत के पालन के गहन आध्यात्मिक अर्थ पर ज़ोर देता है। संकष्टी चतुर्थी के पूरे चक्र में तेरह व्रत होते हैं, और प्रत्येक व्रत कथा की एक अनूठी कथा होती है। भक्तगण पूरे चक्र में प्रत्येक व्रत के लिए एक अलग कथा सुनाते हैं, और ये कथाएँ व्रत विधि का एक अनिवार्य अंग हैं। व्रत कथाओं में “आदिका” का एक विशेष स्थान है; भक्त इसे चार वर्षों में केवल एक बार ही पढ़ सकते हैं। यह संकष्टी चतुर्थी परंपरा में इस विशिष्ट कथा को और भी अधिक महत्व प्रदान करता है।

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Guru Nanak Jayanti

Guru Nanak Jayanti 2025 Date: गुरु नानक जयंती 2025 कब है? जानिए गुरुपर्व की सही डेट, शुभ तिथि और महत्व

Guru Nanak Jayanti Kab Hai: सिख धर्म के सबसे पवित्र पर्वों में से एक, गुरु नानक जयंती (या गुरुपर्व) का इंतजार हर श्रद्धालु को रहता है। यह दिन सिख धर्म के संस्थापक और सिखों के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व के रूप में अपार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व मानवता, समानता, और सच्चे जीवन का संदेश देने वाले गुरु नानक देव जी की जयंती के रूप में श्रद्धा, भक्ति और सेवा भाव से भरा होता है। यदि आप 2025 में यह शुभ पर्व मनाने की योजना बना रहे हैं, Guru Nanak Jayanti तो यहाँ तिथि, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उत्सव की पूरी जानकारी दी गई है। Guru Nanak Jayanti 2025 Date: गुरु नानक जयंती 2025 कब है? जानिए गुरुपर्व की सही डेट…. 1. गुरु नानक जयंती 2025 की सही तिथि (Guru Nanak Jayanti 2025 Date) गुरु नानक देव जी की जयंती हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। विवरण तिथि और वर्ष जन्म वर्षगांठ गुरु नानक जयंती (गुरुपर्व) 05 नवंबर 2025, बुधवार 556वीं हिंदू कैलेंडर तिथि कार्तिक पूर्णिमा – निष्कर्ष: इस साल गुरु नानक जयंती 5 नवंबर 2025, बुधवार को मनाई जाएगी। यह गुरु नानक देव जी की 556वीं जन्म वर्षगांठ होगी। 2. कौन थे गुरु नानक देव जी? (History of Guru Nanak Dev Ji) गुरु नानक Guru Nanak Jayanti देव जी सिख धर्म की नींव रखने वाले पहले गुरु थे, जिन्होंने अपने विचारों, करुणा और सादगी से मानवता को नया दिशा दी। जन्म स्थान और समय: गुरु नानक देव जी का जन्म सन् 1469 ई. में पंजाब के तलवंडी नामक स्थान पर हुआ था। यह स्थान अब पाकिस्तान में ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। माता-पिता: उनके पिता का नाम मेहता कालू चंद और माता का नाम माता तृप्ता था। शिक्षा और संदेश: बचपन से ही गुरु नानक देव जी आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। Guru Nanak Jayanti उन्होंने समाज में फैली जाति-पांति, अंधविश्वास और भेदभाव का कड़ा विरोध किया। उन्होंने समानता, प्रेम, सत्य और सेवा का संदेश दिया। उनका मानना था कि ईश्वर एक है और भक्ति, सच्चाई, और सेवा के मार्ग से ही परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। उदासी यात्राएं: उन्होंने अपने जीवनकाल में चार बड़ी धार्मिक यात्राएं कीं, जिन्हें उदासियाँ कहा गया। 3. गुरु नानक देव जी के प्रेरणादायक उपदेश (Inspiring Teachings) गुरु नानक देव जी ने हिंदू-मुस्लिम एकता, समानता, और सेवा का संदेश दिया। उनके उपदेश आज भी जीवन को सही दिशा देते हैं: मूल मंत्र: उनका प्रसिद्ध उपदेश है— “एक ओंकार सतनाम, करता पुरख, निर्भउ, निरवैर”। इसका अर्थ है: ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि का रचयिता है, वह निर्भय है, और सबके प्रति निरवैर (शत्रुता रहित) है। सर्व धर्म समभाव: उन्होंने यह संदेश दिया था कि “ना कोई हिन्दू, ना मुसलमान — सब इंसान हैं”। सच्ची सेवा: गुरु नानक जी ने सिखाया कि सच्ची पूजा केवल ईश्वर के नाम का स्मरण नहीं, बल्कि दूसरों की सेवा में निहित है। 4. गुरुपर्व कैसे मनाया जाता है? (How to Celebrate Guru Nanak Jayanti) सिख समुदाय गुरु नानक देव जी की जयंती को अपार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाता है। उत्सव की शुरुआत जयंती से कई दिन पहले हो जाती है: अखंड पाठ: जयंती से दो दिन पहले गुरुद्वारों में अखंड पाठ शुरू होता है, जिसमें गुरु ग्रंथ साहिब का लगातार 48 घंटे तक पाठ किया जाता है। प्रभात फेरियां और कीर्तन: सुबह के समय प्रभात फेरियां निकाली जाती हैं, Guru Nanak Jayanti जिनमें श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए नगर भ्रमण करते हैं। गुरुद्वारों की सजावट: इस दिन गुरुद्वारों को फूलों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है। लंगर सेवा: गुरुद्वारों में पूरे दिन लंगर चलता है। यह गुरु नानक जी के समानता और सेवा के संदेश का प्रतीक है, जहाँ हर धर्म और वर्ग के लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। उपदेशों का स्मरण: इस शुभ अवसर पर गुरुद्वारों में कीर्तन दरबार, अरदास और सत्संग का माहौल रहता है, और गुरु नानक जी के उपदेशों को याद किया जाता है।

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Kartik Purnima

Kartik Purnima 2025 Date And Time: कार्तिक पूर्णिमा 2025: सही तिथि, स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

Kartik Purnima 2025 Mein Kab Hai: हिंदू धर्म में कार्तिक पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। यह पावन पर्व हर माह के शुक्ल पक्ष की आखिरी तिथि पर मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना का विधान है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने और दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। Kartik Purnima यही वह विशेष दिन भी है जब देव दिवाली का पर्व मनाया जाता है। यदि आप 2025 में यह शुभ पर्व मनाने की योजना बना रहे हैं, तो यहाँ तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व की पूरी जानकारी दी गई है। सनातन परंपरा में कार्तिक मास में भगवान श्री लक्ष्मीनारायण की पूजा का बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व माना गया है. Kartik Purnima इसका महत्व तब और अधिक बढ़ जाता है, जब यह पूजा कार्तिक पूर्णिमा के दिन की जाती है. कार्तिक पूर्णिमा की सही तारीख, शुभ मुहूर्त और महत्व जानने के लिए पढ़ें ये लेख. Kartik Purnima 2025 Date And Time: कार्तिक पूर्णिमा 2025: सही तिथि…. 1. कार्तिक पूर्णिमा 2025 तिथि (Kartik Purnima 2025 Tithi) ज्योतिष पंचांग के अनुसार, इस साल कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को लेकर थोड़ी भ्रम की स्थिति है, लेकिन उदया तिथि के आधार पर, यह पर्व 5 नवंबर को मनाया जाएगा। विवरण तिथि और समय कार्तिक पूर्णिमा पर्व बुधवार, 05 नवंबर 2025 पूर्णिमा तिथि प्रारंभ 04 नवंबर 2025, प्रात:काल 10:36 बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त 05 नवंबर 2025, सायंकाल 06:48 बजे ध्यान दें: चूँकि Kartik Purnima पूर्णिमा की तिथि 05 नवंबर को सूर्योदय के समय (उदया तिथि) मौजूद रहेगी, इसलिए कार्तिक पूर्णिमा का पावन पर्व 05 नवंबर 2025 को मनाया जाएगा। 2. स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय समय कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान और दान को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। Kartik Purnima इस दिन गंगा स्नान (या किसी भी पवित्र नदी में स्नान) और अन्न-धन आदि चीजों का दान करने से साधक को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। स्नान-दान के लिए उत्तम मुहूर्त: प्रात:काल 04:51 बजे से लेकर 05:43 बजे तक रहेगा। चंद्रोदय समय (दिल्ली के लिए): 5:11 PM। विशेष संयोग: आपको यह जानकर खुशी होगी कि इस साल कार्तिक पूर्णिमा पर सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। 3. कार्तिक पूर्णिमा का धार्मिक महत्व और पूजा विधि कार्तिक पूर्णिमा हिंदू धर्म में क्यों इतनी महत्वपूर्ण है, इसके पीछे कई धार्मिक कारण और मान्यताएं हैं: 1. विष्णु और लक्ष्मी जी की पूजा: इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विशेष विधान है। मान्यता है कि श्रीहरि की उपासना करने से साधक को जीवन में सभी सुखों की प्राप्ति होती है और हर मनोकामना पूर्ण होती है। 2. मत्स्यावतार का प्रकट होना: पौराणिक कथाओं के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन शाम को भगवान श्रीहरि मत्स्यावतार के रूप में प्रकट हुए थे। 3. भक्ति का पुण्य: इस महीने में की गई भक्ति-आराधना का पुण्य कई जन्मों तक बना रहता है। इस महीने में किए गए दान, स्नान, यज्ञ, और उपासना से श्रद्धालु को शुभ फल प्राप्त होते हैं। 4. देव दिवाली: कार्तिक पूर्णिमा को देव दिवाली के रूप में भी मनाया जाता है। पूजा और मंत्र (Kartik Purnima Mantra) कार्तिक पूर्णिमा पर व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करने से सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। पूजा के दौरान मां लक्ष्मी के मंत्रों का जप और श्री सूक्त का पाठ करना बहुत ही शुभ माना जाता है। आप अपनी पूजा में इन महत्वपूर्ण मंत्रों का जप कर सकते हैं:     ◦ ॐ सों सोमाय नम:।     ◦ ॐ विष्णवे नमः।     ◦ ॐ कार्तिकेय नमः।     ◦ ॐ वृंदाय नमः।     ◦ ॐ केशवाय नमः। इस दिन व्रत, पूजा, भजन-कीर्तन, गंगा स्नान और सत्यनारायण जी की कथा का पाठ करने का विधान है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.) Gopashtami 2025 Date And Time: जानियें कब और कैसे करें गोपाष्टमी पर गौ-पूजा? पढ़ियें गोपाष्टमी की कथा एवं महत्व

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Vaikuntha Chaturdashi

Vaikuntha Chaturdashi 2025 Date And Time: कब है वैकुण्ठ चतुर्दशी? जानें तारीख, पूजा विधि, महत्व और मोक्ष दिलाने वाली कथा

Vaikuntha Chaturdashi 2025 Mein Kab Hai: वैकुण्ठ चतुर्दशी सनातन धर्म के सबसे पुण्यदायी पर्वों में से एक है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस दिन का व्रत और पूजन करने वाले मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वह मरणोपरांत सीधे वैकुंठ धाम को चला जाता है। यह वह विशेष तिथि है जब भगवान विष्णु और भगवान शिव की एक साथ पूजा की जाती है, जिसे ‘हरिहर मिलन’ के नाम से भी जाना जाता है। आइए, जानते हैं 2025 में यह शुभ पर्व कब मनाया जाएगा और इसकी पूजा विधि क्या है। वैकुण्ठ चतुर्दशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त (Vaikuntha Chaturdashi 2025 Date and Muhurat) Vaikuntha Chaturdashi: वैकुण्ठ चतुर्दशी का व्रत प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को रखा जाता है। हिंदू धर्म में इस तिथि को बहुत पवित्र माना जाता है। विवरण (Detail) तिथि/समय (Date/Time) वैकुण्ठ चतुर्दशी व्रत 04 नवम्बर, 2025 (मंगलवार) चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ 04 नवम्बर 2025 को रात्रि 02 बजकर 05 मिनट पर चतुर्दशी तिथि समाप्त 04 नवम्बर 2025 को रात्रि 10 बजकर 36 मिनट पर निशिथकाल पूजा मुहूर्त (भगवान विष्णु की पूजा) रात्रि 11 बजकर 24 मिनट से लेकर रात्रि 12 बजकर 16 मिनट तक (कुल अवधि 52 मिनट) वैकुण्ठ चतुर्दशी का महत्व: क्यों है यह मोक्षदायी? वैकुण्ठ चतुर्दशी (Vaikuntha Chaturdashi) का महत्व पुराणों में विस्तार से बताया गया है। 1. वैकुंठ द्वार खुले: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम के द्वार खुले रहते हैं। जो भी मनुष्य इस दिन मृत्यु को प्राप्त होता है, वह सीधे वैकुंठ धाम को चला जाता है। 2. पाप शमन: इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने से साधक के सभी पापों का शमन (नाश) होता है। 3. कठिन तपस्या के समान फल: जिस वैकुंठ धाम की प्राप्ति के लिए ऋषि-मुनि अनेक वर्षों की कठोर तपस्या करते हैं, वह वैकुंठ धाम मनुष्य को इस व्रत और पूजन से बहुत ही सरलता से प्राप्त हो जाता है। यह भी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र की प्राप्ति हुई थी। वैकुण्ठ चतुर्दशी के व्रत एवं पूजन की विधि (Vrat and Puja Vidhi) वैकुण्ठ चतुर्दशी Vaikuntha Chaturdashi पर भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की पूजा करने का विधान है, लेकिन उनकी पूजा का समय अलग-अलग है: 1. भगवान विष्णु की पूजा विधि (निशिथकाल – मध्यरात्रि) भगवान विष्णु की पूजा निशिथकाल (मध्यरात्रि) में षोडशोपचार विधि से की जाती है: व्रत का संकल्प लेकर स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मध्यरात्रि में धूप-दीप जलाकर कलश की स्थापना करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेक करें। भगवान विष्णु को चंदन और कुमकुम का तिलक करें, Vaikuntha Chaturdashi अक्षत (चावल नहीं, बल्कि तिल या सफेद चंदन का उपयोग करें) और इत्र चढ़ाएं। भोग में पंच मेवा और मखाने की खीर अवश्य लगाएं। कमल के पुष्पों से पूजा: इस दिन भगवान विष्णु को विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करते हुए एक हजार कमल के पुष्प चढ़ाने चाहिए। यदि यह संभव न हो, तो कमल के पुष्प का एक जोड़ा अवश्य चढ़ाएं। इसके बाद विष्णुसहस्त्रनाम, पुरुष सूक्त और श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करें। आरती करके क्षमा माँगे। 2. भगवान शिव की पूजा विधि (प्रातःकाल – सूर्योदय) भगवान शिव की पूजा प्रात:काल (सूर्योदय के समय) की जाती है: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शिवालय जाकर “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हुए गाय के दूध, दही और गंगा जल से शिवलिंग का अभिषेक करें। भगवान शिव को बिल्वपत्र, आंकड़ा, धतूरा, पुष्प, मौसमी फल और भांग अर्पित करें। भोग में श्वेत मिठाई अवश्य अर्पित करें। रुद्राष्टक और शिवमहिम्नस्त्रोत का पाठ करें। इस दिन सप्तऋषि का पूजन भी किया जाता है, जिससे जातक की सभी समस्याओं का निवारण होता है। विशेष मंत्र: इस दिन ‘ॐ ह्रीं ओम हरिणाक्षाय नम: शिवाय’ मंत्र का कम से कम 108 बार जाप अवश्य करें, Vaikuntha Chaturdashi जिससे भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। विशेष उपाय और मान्यताएं तुलसी और बेलपत्र का आदान-प्रदान: यह एकमात्र दिन है जब भगवान शिव तुलसी पत्र स्वीकार करते हैं, और भगवान विष्णु की बेल पत्र और कमल के फूलों से पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि आज के दिन भगवान विष्णु को 3 बेल पत्र और भगवान शिव जी को तुलसी की पत्ती अर्पित करने से समस्त मनोकामना पूरी होती है। श्राद्ध और तर्पण: वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन पितरों का श्राद्ध और तर्पण करना उत्तम माना जाता है, Vaikuntha Chaturdashi जिससे उनकी आत्मा को शांति मिलती है। मणिकर्णिका स्नान: बनारस (वाराणसी) के मणिकर्णिका घाट पर सूर्योदय के समय स्नान करना अति शुभ (मणिकर्णिका स्नान) माना जाता है। इस दिन गंगा स्नान और शाम को दीपदान करना भी शुभ है। Vaikuntha Chaturdashi:वैकुण्ठ चतुर्दशी की कथा (सुदर्शन चक्र की प्राप्ति) एक पौराणिक कथा के अनुसार कार्तिक मास की चतुर्दशी के दिन, भगवान विष्णु ने काशी के मणिकर्णिका घाट पर स्नान किया और भगवान शिव को एक हजार कमल के पुष्प अर्पित करने का संकल्प लिया। पूजन के दौरान भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक कमल का फूल अदृश्य कर दिया। Vaikuntha Chaturdashi अपना संकल्प अधूरा रहता देखकर, भगवान विष्णु ने विचार किया कि उन्हें ‘कमलनयन’ (जिनके नयन कमल के समान हैं) कहा जाता है। यह विचार करके, उन्होंने अपना एक नेत्र भगवान शिव को चढ़ा दिया। भगवान विष्णु की इस असीम भक्ति से भगवान शिव अति प्रसन्न हुए, प्रकट होकर उन्हें सुदर्शन चक्र भेंट किया। भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि जो भी इस दिन उनकी और मेरी (शिव-विष्णु) पूजा करेगा, उसके सभी पापों का नाश हो जाएगा।

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Tulsi Vivah 2025

Tulsi Vivah 2025 Date And Time :कब है तुलसी विवाह? जानें-तिथि, पूजा विधि और कन्यादान के समान पुण्य का महत्व

Tulsi Vivah 2025 Date And Time: सनातन धर्म में तुलसी विवाह का पर्व अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह वह शुभ दिन है जब भगवान विष्णु अपनी चार महीने की योग निद्रा से जागते हैं, और इसी के साथ सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों (जैसे विवाह) की शुरुआत होती है। तुलसी को देवी महालक्ष्मी का स्वरूप और भगवान विष्णु की प्रिय ‘विष्णुप्रिय’ माना जाता है। Tulsi Vivah 2025 इस विशेष दिन पर भक्तजन तुलसी माता का विवाह शालीग्राम भगवान (जो भगवान विष्णु का विग्रह रूप हैं) के साथ कराते हैं। Tulsi Vivah 2025 Date And Time:आइए जानते हैं 2025 में तुलसी विवाह की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और विधि-विधान तुलसी विवाह 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त (Tulsi Vivah 2025 Shubh Muhurat) Tulsi Vivah 2025: तुलसी विवाह का पर्व हर साल कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। यह तिथि आमतौर पर देवउठनी एकादशी के ठीक अगले दिन या उसके बाद आती है। तुलसी विवाह 2025 की मुख्य जानकारी:Main information about Tulsi Vivah 2025 विवरण (Detail) तिथि/समय (Date/Time) तिथि कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि की शुरुआत 02 नवंबर 2025, सुबह 07 बजकर 31 मिनट पर तिथि का समापन 03 नवंबर 2025, सुबह 05 बजकर 07 मिनट पर तुलसी विवाह की तिथि 02 नवंबर 2025 (रविवार) शुभ मुहूर्त इस दिन कई शुभ योग बन रहे हैं जिनका उपयोग पूजा के लिए किया जा सकता है: अभिजित मुहूर्त: 11:42 ए एम से 12:26 पी एम विजय मुहूर्त: 01:55 पी एम से 02:39 पी एम गोधूलि मुहूर्त: 05:35 पी एम से 06:01 पी एम त्रिपुष्कर योग: 07:31 ए एम से 05:03 पी एम तुलसी विवाह की पूजा विधि (Tulsi Vivah 2025 Puja Rituals) तुलसी और शालिग्राम का विवाह पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न कराया जाता है। विधिवत पूजा विधि निम्नलिखित है: 1. मंडप की तैयारी: घर के आंगन, बालकनी या पूजा स्थल पर तुलसी के पौधे को स्थापित करें। तुलसी के चारों ओर सुंदर रंगोली बनाकर मंडप सजाएं। 2. शृंगार और स्थापना: तुलसी जी को चूड़ी, चुनरी, साड़ी और सभी शृंगार सामग्री अर्पित करें। शालिग्राम जी को तुलसी के पौधे के दाहिनी ओर स्थापित करें। 3. स्नान और तिलक: तुलसी माता और शालिग्राम भगवान को गंगाजल से स्नान कराएं। शालिग्राम जी को चंदन और तुलसी जी को रोली का तिलक लगाएं। 4. भोग: उन्हें फूल, भोग के रूप में मिठाई, गन्ने, सिंघाड़े और पंचामृत आदि चढ़ाएं। धूप और दीप जलाएं। 5. विशेष ध्यान: यह ध्यान रखें कि शालिग्राम जी पर चावल नहीं चढ़ाया जाता है। इसलिए, उनकी जगह तिल या सफेद चंदन चढ़ाएं। 6. विवाह संस्कार: विधिवत मंत्रोच्चार के साथ देवी तुलसी और शालिग्राम भगवान के सात फेरे कराए जाते हैं। 7. समापन: विवाह संपन्न होने के बाद आरती करें और प्रसाद सभी भक्तों में वितरित करें। तुलसी विवाह का धार्मिक महत्व (Significance of Tulsi Vivah) सनातन धर्म में तुलसी विवाह कराने का बहुत बड़ा धार्मिक महत्व है। कन्यादान का पुण्य: माना जाता है कि जो भक्त विधि-विधान से तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराता है, उसे कन्यादान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। सुख-समृद्धि: चूंकि तुलसी माता को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है, इसलिए इस दिन विवाह कराने से वैवाहिक जीवन में खुशहाली, प्यार और घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है। मनोकामना पूर्ति: यह पर्व जीवन के सभी कष्टों को दूर करता है, और अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर प्राप्त करने का आशीर्वाद मिलता है। तुलसी पूजन मंत्र:Tulsi worship mantra पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है: तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी। धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया।। लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्। तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया।। तुलसी के सामने दीपक प्रज्वलन की महिमा:Glory of lighting the lamp in front of Tulsi तुलसी के पौधे के पास शाम को दीपक जलाने से घर में सुख-समृद्धि आती है एवं नकारात्मक ऊर्जा का क्षय होता है। स्कन्द पुराण के अनुसार जिन घरों में तुलसी की पूजा की जाती है, उन घरों में यमदूत कभी प्रवेश नहीं करते हैं। तुलसी दल तोड़ने का मंत्र:Mantra to break Tulsi party तुलस्यमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिया ।चिनोमी केशवस्यार्थे वरदा भव शोभने ॥त्वदङ्गसम्भवैः पत्रैः पूजयामि यथा हरिम् ।तथा कुरु पवित्राङ्गि! कलौ मलविनाशिनि ॥

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Khatu Shyam Birthday

Khatu Shyam Birthday 2025 Date: बाबा खाटू श्याम का जन्मदिन 2025: तारीख, महत्व और ‘हारे का सहारा’ बनने की कहानी

Khatu Shyam Birthday 2025 Mein Kab Hai: क्या आप जानते हैं कि कलियुग में भक्तों के ‘हारे का सहारा’ कहे जाने वाले बाबा खाटू श्याम जी का जन्मदिन (अवतरण दिवस) कब मनाया जाता है? पूरे भारत में लाखों भक्त इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं। राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू नगरी का भव्य मंदिर इस दिन विशेष रूप से सजाया जाता है और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। आइए, जानते हैं बाबा श्याम के जन्मोत्सव की सही तारीख, उनका महत्व और महाभारत के बर्बरीक के श्याम बनने की अद्भुत कहानी। खाटू श्याम जी का जन्मदिन कब है? (Khatu Shyam Ji ka Janmdin Kab Hai 2025?) धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, Khatu Shyam Birthday बाबा खाटू श्याम जी का अवतरण दिवस हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। यह तिथि आमतौर पर देवउठनी एकादशी के दिन पड़ती है। Khatu Shyam Birthday 2025 Date: बाबा खाटू श्याम का जन्मदिन 2025 इस साल (2025 में), बाबा खाटू श्याम जी का जन्मोत्सव 1 नवंबर 2025, शनिवार को मनाया जाएगा। कुछ अन्य मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भी Khatu Shyam Birthday खाटू श्याम का जन्मदिन मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें ‘श्याम अवतार’ होने का वरदान दिया था। Who was Khatu Shyam ji Story of Barbarik of Mahabharata period:कौन थे खाटू श्याम जी? महाभारत काल के बर्बरीक की कहानी Khatu Shyam Birthday श्री खाटू श्याम जी का सीधा संबंध महाभारत काल से है। वह अत्यंत शक्तिशाली योद्धा बर्बरीक थे, जो पांडु पुत्र भीम और हिडिम्बा के बेटे घटोत्कच के पुत्र थे। इस प्रकार, बर्बरीक भीम के पौत्र थे। उनकी माता का नाम अहिलावती था। पौराणिक कथा के अनुसार, जब महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था, तब बर्बरीक ने अपनी माता अहिलावती से पूछा कि उन्हें किसका साथ देना चाहिए। माता ने उन्हें वचन दिया था, “जो हार रहा हो, तुम उसी का सहारा बनो”। बर्बरीक ने माता के वचन का पालन किया। भगवान श्रीकृष्ण युद्ध का परिणाम पहले से जानते थे। Khatu Shyam Birthday यदि बर्बरीक हारती हुई कौरव सेना का साथ देते, तो पांडवों की हार निश्चित थी। इसलिए, श्रीकृष्ण एक ब्राह्मण का वेश धारण करके बर्बरीक के पास गए और उनसे भिक्षा में उनका शीश (सिर) मांग लिया। शीश दान के महान बलिदान से प्रसन्न होकर, श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को यह वरदान दिया कि कलियुग में उन्हें भगवान कृष्ण के नाम यानी ‘श्याम’ से पूजा जाएगा, और वह प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे। जिस स्थान पर बर्बरीक का शीश रखा गया था (खाटू नगर, सीकर), वहां आज भी खाटू श्याम जी विराजते हैं। चूंकि बर्बरीक ने कहा था कि वह हमेशा हारने वाले का पक्ष लेंगे, इसलिए उन्हें ‘हारे का सहारा’ कहा जाता है। special treat on birthday:जन्मोत्सव पर लगने वाला विशेष भोग खाटू श्याम Khatu Shyam Birthday जन्मोत्सव के अवसर पर राजस्थान के मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना, भजन संध्या और प्रसाद वितरण के आयोजन होते हैं। माना जाता है कि बाबा श्याम को चूरमा और दूध के पेड़े का भोग अत्यंत प्रिय है। हजारों श्रद्धालु बाबा को यह विशेष भोग अर्पित करते हैं। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से पेड़े या चूरमे का भोग लगाकर प्रार्थना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। आप भी इस खास अवसर पर घर पर बने दूध के पेड़े या चूरमे का भोग लगाकर बाबा श्याम का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं! How did Barbarik become Khatu Shyam:बर्बरीक कैसे बने खाटू श्याम? चलिए अब जानते हैं कि कैसे महाभारत काल के Khatu Shyam Birthday बर्बरीक कलियुग में ‘सबके हारे का सहारा’ बन गए। दरअसल, खाटू श्याम जी भीम और हिडिंबा के बेट घटोत्कच के बेटे बर्बरीक हैं। इनका वर्णन महाभारत की कथा में कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध के दौरान मिलता है। बर्बरीक की माता का नाम अहिलावती था। बर्बरीक को महाभारत युद्ध में जाने की अनुमति मिली, तो उन्होंने अपनी से पूछा कि मैं युद्ध में किसका साथ दूं? तब अहिलावती ने कहा था, ‘जो हार रहा हो, तुम उसी का सहारा बनो।’ बर्बरीक ने माता के वचन का पालन किया। वहीं, श्रीकृष्ण युद्ध का अंत जानते थे। उन्होंने विचार किया किया कि अगर कौरवों को हारता देख बर्बरीक युद्ध में उनका साथ देने लगा देने लगा, तो पांडवों की हार निश्चित है। ऐसे में श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण बनकर भिक्षा में बर्बरीक से शीश का दान मांगा। तब बर्बरीक ने यह सोचा कि आखिर कोई ब्राह्मण मुझसे शीश क्यों मांगेगा? और उन्होंने ब्राह्मण से असली रूप के दर्शन देने की बात की। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने विराट रूप में दर्शन दिए। बर्बरीक ने अपना शीश प्रभु को दान कर दिया। बर्बरीक को अपने शीश का दान करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने यह आशीर्वाद दिया कि कलयुग में तुम्हें मेरे नाम से ही पूजा जाएगा और प्रसिद्धि मिलेगी। वहीं, राजस्थान में बाबा श्याम का भव्य मंदिर है, जो Khatu Shyam Birthday खाटू नगरी में बसा है। इस तरह वह खाटू श्याम के नाम से जाने जाते हैं। वहीं, युद्ध में पक्ष चुनने को कहा तो उन्होंने जवाब दिया “मैं हमेशा हारने वाले की तरफ रहूंगा।” इसलिए उन्हें ‘हारे का सहारा’ कहा जाता है।  ऐसा कहते हैं कि जिस स्थान पर बर्बरीक का शीश रखा गया। वहां आज भी खाटू श्याम जी विराजते हैं। कब है आंवला नवमी? जानें सही डेट, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और अक्षय फल देने वाली कथा

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Pushkar Mela 2025

Pushkar Mela 2025 Date And Time: जानें कब से शुरू होगा विश्व प्रसिद्ध पुष्कर मेला? तिथि, महत्व और मुख्य आकर्षण

Pushkar Mela 2025 Mein Kab Hai: अजमेर जिले के पुष्कर में आयोजित होने वाला अंतर्राष्ट्रीय पुष्कर मेला 2025 (Pushkar Mela 2025) न केवल अपनी धार्मिक पवित्रता के लिए, बल्कि करोड़ों के पशुओं के व्यापार और राजस्थानी संस्कृति के अद्भुत संगम के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। यह मेला राजस्थान की लोक संस्कृति, परंपरा और अध्यात्म का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है, जहाँ सरोवर के घाटों से लेकर रेतीले मैदानों तक देशी-विदेशी पर्यटकों का सैलाब उमड़ता है। आइए जानते हैं कि 2025 में यह ऐतिहासिक मेला कब शुरू हो रहा है, इसका क्या महत्व है, और इस बार कौन से मुख्य कार्यक्रम आकर्षण का केंद्र रहेंगे। पुष्कर मेला 2025: मुख्य तिथियां और अवधि:Pushkar Mela 2025: Key dates and duration पुष्कर मेले को दो भागों में बांटा जाता है: प्रशासनिक/सांस्कृतिक मेला और धार्मिक मेला। 1. प्रशासनिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अवधि मेले की औपचारिक शुरुआत 22 अक्टूबर को पशु मेला कार्यालय की स्थापना के साथ हो गई थी। जिला प्रशासन, पशुपालन विभाग और पर्यटन विभाग की देखरेख में आयोजित यह मेला इस बार 30 अक्टूबर से 5 नवंबर 2025 तक चलेगा। ध्वजारोहण और सांस्कृतिक शुरुआत: 30 अक्टूबर को मेला स्टेडियम में ध्वजारोहण समारोह होगा, Pushkar Mela 2025 जिसके साथ सांस्कृतिक और खेलकूद गतिविधियों की शुरुआत हो जाएगी। इसी दिन से “वॉइस ऑफ पुष्कर” जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होंगे। 2. धार्मिक मेले की तिथियां (पुष्कर स्नान) पुष्कर मेला धार्मिक रूप से देवउठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। इस दौरान तीर्थयात्री पुष्कर झील में पवित्र स्नान करते हैं। धार्मिक मेला शुरू: 2 नवंबर को कार्तिक एकादशी स्नान के साथ धार्मिक मेले की शुरुआत होगी। धार्मिक मेला इस बार 4 दिनों का रहेगा। समापन और महास्नान: 5 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा पर सरोवर में होने वाले पारंपरिक महास्नान (Mahasnan) के साथ मेले का समापन होगा। महत्वपूर्ण तिथियां: पुष्कर मेले की आधिकारिक तिथियां शनिवार, 1 नवंबर 2025 से बुधवार, 5 नवंबर 2025 तक हैं। पुष्कर मेले का धार्मिक महत्व (Pushkar Snan Ka Mahatva) पुष्कर मेले को तीर्थराज मुचुकुन्द के नाम से भी जाना जाता है और इसका बहुत धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि पुष्कर स्नान के बिना चारधाम यात्रा भी अधूरी रहती है। पौराणिक कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने कार्तिक माह की एकादशी से पूर्णिमा तक 5 दिनों के लिए पुष्कर में एक महान यज्ञ किया था। इस यज्ञकाल के दौरान, 33 करोड़ देवी-देवता भी पृथ्वी पर मौजूद थे। इन्हीं मान्यताओं के चलते कार्तिक मास की एकादशी से पूर्णिमा तक 5 दिनों का पुष्कर में विशेष महत्व होता है। Pushkar Mela 2025 इन पाँच दिनों को भीष्म पंचक के नाम से भी जाना जाता है। अक्षय पुण्य की प्राप्ति: यह वर्ष का सबसे शुभ समय होता है। Pushkar Mela 2025 ऐसा माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति पूर्णिमा (5 नवंबर 2025) के दिन पवित्र पुष्कर सरोवर में स्नान करता है, तो उसे विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और वह अक्षय पुण्य अर्जित करता है। पशु मेला: कारोबार और व्यापार की धमक (Pashu Mela) पुष्कर मेला Pushkar Mela 2025 दुनिया के सबसे बड़े पशु मेलों में से एक है। यह मुख्य रूप से ऊंटों (Camels) और घोड़ों (अश्ववंश) की खरीद-फरोख्त के लिए प्रसिद्ध है। 2024 के व्यापारिक आंकड़े: वर्ष 2024 में कुल 8,366 पशु पुष्कर मेले में पहुंचे थे। Pushkar Mela 2025 इनमें ऊंटों और घोड़ों की मुख्य रूप से खरीद-फरोख्त हुई थी। कुल व्यापार 11 करोड़ 5 लाख 83 हजार रुपए का दर्ज किया गया था। सबसे महंगी बिक्री में, पंजाबी नुकरी नस्ल की एक घोड़ी 4 लाख 30 हजार रुपए में खरीदी गई थी। 2025 की उम्मीदें: पशुपालन विभाग को उम्मीद है कि इस Pushkar Mela 2025 वर्ष पशुओं की आवक पिछले वर्ष की तुलना में अधिक होगी। पशुपालक भी यह उम्मीद जता रहे हैं Pushkar Mela 2025 कि इस बार ऊंटों और घोड़ों की बिक्री का कारोबार पिछले वर्ष की तुलना में कम से कम 20 प्रतिशत अधिक रहेगा। ऊंटों की संख्या में गिरावट के कारण: बीते कुछ वर्षों में ऊंटों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। इसके मुख्य कारण सीमित व्यापारिक मांग, परिवहन पर प्रतिबंध और लंपी और ग्लैंडर जैसे पशु रोग रहे हैं। इस बार के मुख्य सांस्कृतिक आकर्षण:Main cultural attractions of this time पुष्कर मेले में इस बार कला और संस्कृति का एक अनूठा संगम देखने को मिल रहा है: 51 फीट ऊंची वीर तेजाजी की सैंड आर्ट मशहूर सैंड आर्टिस्ट अजय रावत ने पुष्कर के रेतीले धोरों में लोकदेवता वीर तेजाजी महाराज की एक भव्य सैंड आर्ट (Sand Art) तैयार की है। विशाल कलाकृति: यह कलाकृति लगभग 51 फीट ऊंची है। निर्माण: इसे बनाने में अजय रावत ने करीब एक लाख टन बालू मिट्टी और 22 टैंकर पानी का उपयोग किया। संदेश: इस कलाकृति के माध्यम से वीर तेजाजी महाराज के साहस, बलिदान और गौ-रक्षा (Cow Protection) के संदेश को जीवंत रूप में प्रदर्शित किया गया है। विदेशी पर्यटक इस भव्य कलाकृति को देखकर मंत्रमुग्ध हो रहे हैं और इसे “Unbelievable India!” या “सैंड वंडर ऑफ पुष्कर” कहकर संबोधित कर रहे हैं। अन्य कार्यक्रम: मेले में 2 से 4 नवंबर तक विकास और गीर प्रदर्शनी के साथ-साथ पशु प्रतियोगिताएं, लोक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी होंगी। पशु प्रतियोगिताओं में सफेद चिट्टी का आयोजन 30 अक्टूबर और रवन्ना काटा 31 अक्टूबर को होगा। Devuthani Ekadashi 2025 Date And Time: कब जागेंगे भगवान विष्णु? नोट करें सही डेट, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि सुरक्षा व्यवस्था और पर्यटन पर असर मेले की सुरक्षा व्यवस्था के लिए अजमेर पुलिस प्रशासन ने व्यापक तैयारियाँ की हैं। भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगभग दो हज़ार पुलिसकर्मी तैनात रहेंगे। मेले क्षेत्र में 100 से अधिक सीसीटीवी कैमरों से निरंतर नजर रखी जाएगी। Pushkar Mela 2025 सरोवर क्षेत्र में सुरक्षा के लिए एसडीआरएफ टीम और गौताख़ोर भी तैनात रहेंगे। हालांकि, इस बार विदेशी पर्यटकों की रफ्तार सुस्त दिखाई दे रही है, और बुकिंग में 20 से 25 प्रतिशत कमरे खाली हैं। फिर भी, घरेलू पर्यटक संख्या ने स्थिरता बनाए रखी है और यह मेला अभी भी देशी सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। पुष्कर मेला 2025 राजस्थान की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ा रहा है, जहां व्यापार, धर्म और संस्कृति एक

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Amla Navami 2025

Amla Navami 2025 Date And Time: कब है आंवला नवमी? जानें सही डेट, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और अक्षय फल देने वाली कथा

Amla Navami 2025 Kab Hai:हिंदू धर्म में कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी (Amla Navami) का पर्व मनाया जाता है। इसे अक्षय नवमी (Akshay Navami) या अनला नवमी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस दिन किए गए शुभ कार्य और पूजा का फल ‘अक्षय’ यानी कभी न खत्म होने वाला होता है। माना जाता है कि यह दिन अक्षय तृतीया के समान ही अत्यंत महत्वपूर्ण है।Amla Navami 2025 इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। आइए जानते हैं 2025 में आंवला नवमी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा की विधि क्या है। Amla Navami 2025 Subh Muhurat: आंवला नवमी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त (Amla Navami 2025 Date and Time) Amla Navami 2025: आंवला नवमी का पर्व देवउठनी एकादशी से ठीक दो दिन पहले मनाया जाता है। आंवला नवमी 2025 कब है? इस वर्ष आंवला नवमी 31 अक्टूबर 2025, शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी। नवमी तिथि का समय: नवमी तिथि प्रारम्भ: 30 अक्टूबर 2025 को 10:06 AM बजे। नवमी तिथि समाप्त: 31 अक्टूबर 2025 को 10:03 AM बजे। अक्षय नवमी पूर्वाह्न शुभ मुहूर्त: अक्षय नवमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 06:36 AM से 10:03 AM तक रहेगा। (कुछ स्रोतों के अनुसार यह मुहूर्त सुबह 06:32 AM से 10:03 AM तक है)। आंवला नवमी का महत्व (Amla Navami Ka Mahatva) यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत में अधिकता से मनाया जाता है। Amla Navami 2025 इस दिन गौसेवा, दान, पूजा और भक्ति जैसे शुभ कार्य करने का विशेष महत्व है। 1. अक्षय पुण्य की प्राप्ति: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आंवला नवमी की पूजा संपन्न करने पर भक्तों को अक्षय फल की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि इस दिन किए गए पुण्य कर्म का फल अनंत गुना मिलता है, जो कई जन्मों तक प्राप्त होता रहता है (जन्म-जन्मान्तर तक खत्म नहीं होते हैं)। 2. बच्चों की खुशहाली: इस पूजा का पालन महिलाएँ अपने बच्चों के खुशहाल जीवन और उन्हें अच्छी तरह से करने के लिए करती हैं। 3. पितरों का तर्पण और दान: अक्षय नवमी के दिन पितरों के निमित्त अन्न, वस्त्र और कंबल का दान करना चाहिए। इस दिन आंवले के वृक्ष के पास पितरों का तर्पण करना भी अत्यंत शुभ माना गया है। 4. वृंदावन परिक्रमा: अक्षय नवमी के शुभ अवसर पर मथुरा-वृन्दावन की परिक्रमा का भी खास महत्व माना जाता है। Amla Navami 2025 श्रद्धालु अक्षय पुण्य अर्जित करने के लिए परिक्रमा करते हैं। Devuthani Ekadashi 2025 Date And Time: कब जागेंगे भगवान विष्णु? नोट करें सही डेट, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आंवला नवमी पूजा विधि (Amla Navami Puja Vidhi) आंवला नवमी के दिन पवित्र वृक्ष की पूजा और सेवा की जाती है। 1. स्नान और तैयारी: अक्षय नवमी के दिन भक्तों को पवित्र नदी या सरोवर में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। 2. वृक्ष की सफाई और पूजा: इसके बाद अपने पास स्थित किसी भी Amla Navami 2025 आंवले के पेड़ के पास जाएं और उस स्थान पर सफाई करें। फिर हल्दी, चावल, कुमकुम या सिंदूर से वृक्ष की पूजा करें। 3. जल, दूध और धागा: आंवले के पेड़ के नीचे पूर्व दिशा में खड़े होकर जल और दूध चढ़ाएं। पूजा के बाद पेड़ के चारों ओर रुई (कपास) लपेटें। 4. परिक्रमा और आरती: वृक्ष की सात बार परिक्रमा करें और आंवले की आरती उतारें। 5. भोग और कामना: पूजा में खीर, पूरी और मिष्ठान का भोग लगाएं। अंत में, परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें। 6. वृक्ष के नीचे भोजन: इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन पकाना और उसे ग्रहण करना अत्यंत शुभ और पुण्यदायक माना गया है। पूजा के बाद प्रसाद बाँटना चाहिए। आंवला नवमी व्रत कथा (Amla Navami Vrat Katha) आंवला नवमी Amla Navami 2025 के दिन आंवले के पेड़ के नीचे भोजन करने की परंपरा देवी लक्ष्मी और भगवान शिव-विष्णु से जुड़ी एक पौराणिक कथा से शुरू हुई: पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवी लक्ष्मी पृथ्वी का भ्रमण करने आईं। पृथ्वी पर भ्रमण करते समय उनके मन में यह इच्छा हुई कि वह भगवान विष्णु और शिव की एक साथ पूजा करें। लक्ष्मी माता ने विचार किया कि विष्णु और शिव को एक साथ कैसे पूजा जा सकता है? तब उन्हें यह महसूस हुआ कि तुलसी (जो भगवान विष्णु को प्रिय है) और बेल (जो भगवान शिव को प्रिय है) की गुणवत्ता एक साथ आंवले के पेड़ में ही पाई जाती है। माता लक्ष्मी ने आंवले के पेड़ को भगवान विष्णु और शिव जी का प्रतीक मानकर, उसकी विधि-विधान से पूजा की। देवी की पूजा से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु और शिव दोनों प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के पेड़ के नीचे भोजन तैयार किया और उसे श्री विष्णु और भगवान शिव को परोसा। इसके बाद उन्होंने उसी भोजन को प्रसाद के रूप में स्वयं ग्रहण किया। कहते हैं कि जिस दिन यह घटना हुई थी, वह कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

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Gopashtami 2025

Gopashtami 2025 Date And Time: जानियें कब और कैसे करें गोपाष्टमी पर गौ-पूजा? पढ़ियें गोपाष्टमी की कथा एवं महत्व

Gopashtami 2025 Kab Hai: गोपाष्टमी (Gopashtami) का पर्व हिंदू धर्म में गायों के प्रति सम्मान और गोसेवा को समर्पित है। इस पवित्र दिन गोसेवा और गौपूजन करने से सीधे भगवान श्री कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आइए जानते हैं कि Gopashtami 2025 गोपाष्टमी 2025 कब मनाई जाएगी, इसकी पूजा विधि क्या है और इससे जुड़ी पौराणिक कथाएँ क्या हैं। Gopashtami 2025 Tithi or Subh Muhurat: गोपाष्टमी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त गोपाष्टमी Gopashtami 2025 का त्योहार हर साल कार्तिक मास की शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। यह मुख्य रूप से मथुरा, वृंदावन और ब्रज के अन्य क्षेत्रों में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। गोपाष्टमी 2025 कब है? इस वर्ष गोपाष्टमी (Gopashtami 2025 ) का पर्व 30 अक्टूबर, 2025 बृहस्पतिवार के दिन मनाया जायेगा। अष्टमी तिथि का समय: हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक शुक्ल अष्टमी तिथि की शुरुआत 29 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 23 मिनट से होगी। जबकि, इस तिथि का समापन 30 अक्टूबर 2025 को सुबह 10 बजकर 06 मिनट पर होगी। दृक पंचांग के अनुसार, पर्व 30 अक्टूबर को मनाया जाएगा। गोप अष्टमी की पूजा विधि (Gop Ashtami Ki Puja Vidhi) गोपाष्टमी के दिन गौ-पूजा (Gau Puja) और भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है। 1. सज्जा और स्नान: गोपाष्टमी के दिन सुबह उठकर स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद गाय एवं उसके बछड़े को नहला कर साफ-सुथरा करें। फिर उनके पैरों में घुंघरू बांधे और आभूषण पहनाकर उन्हें सजायें। 2. तिलक और वस्त्र: गाय और बछड़े को रोली-चावल से तिलक करें। उन्हें वस्त्र अर्पित करने के लिये उनके सींग पर चुनरी बांधे। 3. भोग और आरती: पूजन में गुड़, हरा चारा, गेहूं, फल, जल और धूप-दीप अर्पित करें। गाय और बछड़े को हरा चारा, गुड़ व जलेबी आदि खिलायें। फिर धूप-दीप से उनकी आरती उतारें। पूजा के समय “गोमाता की जय” और “गोपाल गोविंद” का नाम जपें। 4. परिक्रमा और प्रणाम: तत्पश्चात्‌ गौमाता के चरण छूयें और उनकी परिक्रमा करें। 5. गौ-चारण: गाय को बाहर चराने के लिये लेकर जाये। 6. संध्या का प्रणाम: जब संध्या के समय गायें वापस आयें तब उसे साष्टांग दण्ड़वत्‌ होकर प्रणाम करें। गाय के चरणों की धूल से तिलक करें। 7. ग्वालों का सम्मान: गोपाष्टमी के दिन ग्वालों का तिलक करके उन्हें दान-दक्षिणा दी जाती है। 8. मंदिर और दान: गोपाष्टमी पर मंदिरों में अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। 9. गौशाला सेवा: जिनके घरों में गाय ना हो, वे गौशाला में जाकर गायों को भोजन कराएं और उनकी सेवा-पूजा करें। उनके निमित्त दान-पुण्य करें। गौसेवा से जुड़ी वस्तुएं जैसे चारा, पात्र या वस्त्र दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। गौसेवा और गौपूजन का महत्व (Gau Seva Ka Mahatva) हिंदु धर्म में गाय की सेवा करने का बहुत महत्व है। Gopashtami 2025 ऐसा माना जाता है कि गाय के अंदर सभी देवी-देवताओं का वास होता है। Gopashtami 2025 स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने गायों की सेवा और पूजा की थी और सभी को गोसेवा के लिये प्रेरित किया था। गौसेवा के मुख्य लाभ इस प्रकार हैं: जातक को महान पुण्य प्राप्त होता है। जीवन के सभी दुख-संतापो का नाश हो जाता है। शरीर निरोगी रहता है। घर-परिवार में सुख-शांति का वास होता है। गौमाता को ताजा हरा चारा और गुड़ खिलाने से धन-समृद्धि में वृद्धि होती है। जातक को श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। पापों का नाश होता है और परिवार में सौभाग्य बढ़ता है। मृत्यु के पश्चात सद्गति प्राप्त होती है। गोपाष्टमी से जुड़ी पौराणिक कथाएँ (Gopashtami Ki Katha) गोपाष्टमी पर्व से जुड़ी दो मुख्य पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं: Devuthani Ekadashi 2025 Date And Time: कब जागेंगे भगवान विष्णु? नोट करें सही डेट, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि 1. श्रीकृष्ण का गौ-चारण:Cow grazing of shri krishna पौराणिक कथा Gopashtami 2025 के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण की आयु मात्र छ: वर्ष की हुई, तो उन्होंने माता यशोदा से गायों को चराने के लिए वन जाने का हठ किया। माता यशोदा के कहने पर नंद बाबा गौ-चारण का शुभ मुहूर्त जानने के लिए ऋषि शांडिल्य के पास गए। ऋषि शांडिल्य ने बताया कि उस दिन (कार्तिक मास की शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि) के अतिरिक्त कोई अन्य शुभ मुहूर्त नहीं निकल रहा है। नंद बाबा ने यह बात माता यशोदा को बताई। तब मैया यशोदा ने श्री कृष्ण का श्रृंगार किया और पूजा करा कर उन्हें गायों को चराने के लिये वन भेजा। जब मैया यशोदा ने श्रीकृष्ण से चरण पादुका पहनने के लिये कहा, तो उन्होंने मना कर दिया और कहा कि मेरी गायों ने चरण पादुका नहीं पहन रखी। भगवान श्री कृष्ण बिना पैरों कें कुछ पहने, नंगे पैर ही गायों को चराने वन जाया करते थे। भगवान श्री कृष्ण को इसी कारण गोपाल के नाम से भी पुकारा जाता है। 2. इंद्र देव का अभिमान भंग:Indra Dev’s pride broken गोपाष्टमी (Gopashtami 2025 ) से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा देवराज इंद्र से संबंधित है। जब भगवान श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र देव की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिये प्रेरित किया, तब देवराज इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रजक्षेत्र में मूसलाधार बारिश का आदेश दिया। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाकर पूरे सात दिनों तक ब्रजवासियों की रक्षा की। कहते हैं कि गोपाष्टमी के दिन ही देवराज इंद्र भगवान ने प्रकट होकर श्री कृष्ण से अपनी पराजय स्वीकार की और क्षमा मांगी थी। इसी दिन भगवान ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली से उतार कर वापस अपने स्थान पर स्थापित किया था। अन्य कथा: एक अन्य कथा के अनुसार, गोपाष्टमी (Gopashtami 2025) के दिन राधा जी ने ग्वाले का रूप लिया था ताकि वह श्री कृष्ण के साथ गायों को चराने के लिये वन जा सकें, क्योंकि लड़की होने के कारण उन्हें वन जाने की अनुमति नहीं थी।

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Bhai Dooj

Bhai Dooj 2025 Puja Niyam: भाई दूज पर भूलकर भी ना करें यह गलती! वरना ठहर सकती है सुख-समृद्धि की राह

Bhai Dooj 2025 Subh Muhurat: भाई दूज या यम द्वितीया, दीपावली के दो दिन बाद मनाया जाने वाला पवित्र पर्व है। इस दिन बहन अपने भाई की दीर्घायु और समृद्धि की कामना करते हुए स्नेहपूर्वक भोजन कराती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यमुना ने इसी दिन यमराज को भोजन कराया था, जिससे यह तिथि तीनों लोकों में यम द्वितीया के नाम से प्रसिद्ध हुई। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला पावन पर्व भाई दूज, जिसे यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के स्नेह, प्रेम और आत्मीय संबंध का प्रतीक है। Bhai Dooj यह पर्व दीपावली के दो दिन बाद आता है और इसका धार्मिक तथा पौराणिक दोनों ही दृष्टियों से गहरा महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि पर यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर आमंत्रित किया और स्नेहपूर्वक भोजन कराया था। यमराज ने अपनी बहन के स्नेह और सत्कार से प्रसन्न होकर इस तिथि को सभी जीवों के कल्याण का दिन घोषित किया। उस दिन नरक में रहने वाले जीवों को भी यातनाओं से मुक्ति मिली और वे पापमुक्त होकर संतोषपूर्वक जीवन जीने लगे। तभी से यह तिथि तीनों लोकों में यम द्वितीया के नाम से प्रसिद्ध हुई। धार्मिक परंपरा के अनुसार, जिस दिन यमुना ने यमराज को भोजन कराया था, उसी दिन जो भाई अपनी बहन के हाथ से भोजन करता है, उसे उत्तम भोजन के साथ-साथ धन, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह दिन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भाई-बहन के पवित्र स्नेह का उत्सव है, जिसमें बहन अपने भाई की दीर्घायु और खुशहाली की कामना करती है। समझदार लोगों को इस तिथि को अपने घर मुख्य भोजन नहीं करना चाहिए। इस दिन बहन अपने भाई को शुभ आसन पर बैठाकर उसके हाथ-पैर धुलाती है, तिलक लगाती है Bhai Dooj और स्नेहपूर्वक भोजन कराती है। पारंपरिक रूप से इस भोजन में दाल-भात, पूरी, कढ़ी, चूरमा, सीरा, घेवर, जलेबी या खीर जैसे व्यंजन शामिल होते हैं। भाई भी बहन को वस्त्र, आभूषण या उपहार देकर उसके स्नेह का आदर करता है और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है। सगी बहन के अभाव में व्यक्ति अपनी चचेरी, ममेरी या किसी प्रिय मित्र की बहन के घर जाकर यह अनुष्ठान कर सकता है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि इस दिन बहन के हाथ से भोजन ग्रहण करना न केवल पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ करता है, Bhai Dooj बल्कि जीवन में सौभाग्य, दीर्घायु और समृद्धि भी लाता है। Bhai Dooj भाई दूज केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि भारतीय समाज की उस परंपरा का प्रतीक है जो रिश्तों में प्रेम, आदर और कर्तव्यबोध को सर्वोपरि मानती है। यह पर्व हर वर्ष हमें यह स्मरण कराता है कि स्नेह और परिवार का बंधन जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। Bhai Dooj 2025 Puja Niyam:भाई दूज के दिन भूलकर भी ये न करें गलतियां 1. तिलक की दिशा का ध्यान रखें भाई को तिलक लगाते समय दिशा का ध्यान रखना बहुत जरूरी है. कहा जाता है Bhai Dooj कि गलत दिशा में मुख करके तिलक लगाने से पूजा का संपूर्ण फल नहीं मिलता. धार्मिक मान्यता के अनुसार, तिलक लगाते समय भाई का मुख उत्तर-पूर्व दिशा की ओर और बहन का मुख दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए. 2. तिलक की थाली तिलक के लिए इस्तेमाल की जाने वाली थाली खंडित, प्लास्टिक या काले रंग की नहीं होनी चाहिए. 3. तिलक का मुहूर्त तिलक लगाते समय मुहूर्त का ध्यान रखना आवश्यक है. राहुकाल और भद्राकाल के समय तिलक लगाना शुभ नहीं माना जाता. 4. खान-पान में परहेज इस दिन तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन, मांस और मछली आदि का सेवन नहीं करना चाहिए. 5. बहनों को क्या न दें उपहार में इस दिन बहनों को उपहार के रूप में नुकीली चीजें या जूते-चप्पल नहीं देने चाहिए. छठ पूजा नहाय-खाए से उषा अर्घ्य तक, जानें 4 दिनों के शुभ मुहूर्त और महत्व

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Govardhan Puja

Govardhan Puja 2025 Niyam: गोवर्धन पूजा के दिन क्या करें और क्या नहीं? जानें शुभ मुहूर्त और अन्नकूट के नियम

Govardhan Puja 2025: गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट पूजा भी कहते हैं, यह पर्व दीपावली के ठीक अगले दिन बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह शुभ दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के लिए समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह त्योहार भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ब्रजवासियों को देवराज इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाने की महान लीला का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन पूजा-पाठ करने से जीवन में शुभता का आगमन होता है। इस लेख में, हम आपको बताएंगे कि गोवर्धन पूजा 2025 कब मनाई जाएगी, शुभ मुहूर्त क्या है, और इस दिन आपको किन नियमों का पालन करना चाहिए। गोवर्धन पूजा 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त (Govardhan Puja 2025 Muhurat) हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल गोवर्धन पूजा 22 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी। विवरण समय/तिथि गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja 2025) 22 अक्टूबर 2025 प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 21 अक्टूबर शाम 5:54 बजे प्रतिपदा तिथि का समापन 22 अक्टूबर शाम 8:16 बजे गोवर्धन पूजा मुहूर्त (Govardhan Puja Muhurat) सुबह 06 बजकर 26 मिनट से 08 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। (कुछ स्रोतों के अनुसार: सुबह 6:30 बजे से 8:47 बजे तक) Govardhan Puja 2025 Niyam: गोवर्धन पूजा के दिन क्या करें और क्या नहीं…… गोवर्धन पूजा के दिन क्या करें? (Govardhan Puja 2025 Par Kya Karen?) धर्म शास्त्रों में गोवर्धन पूजा के दिन कुछ विशेष अनुष्ठान करने का महत्व बताया गया है। इन कार्यों को करने से भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन महाराज का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 1. गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाएँ: घर के आंगन या मुख्य द्वार पर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनानी चाहिए। 2. श्रीकृष्ण की स्थापना: इस आकृति के मध्य में भगवान कृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें। 3. अन्नकूट और छप्पन भोग: इस दिन 56 भोग या अन्नकूट तैयार करना चाहिए। 4. भोग अर्पित करें: इस भोग को भगवान श्रीकृष्ण तथा गोवर्धन महाराज को श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। 5. खास भोग सामग्री: अन्नकूट में कढ़ी-चावल, बाजरा, और माखन-मिश्री को ज़रूर शामिल करना चाहिए। 6. गौ पूजा का महत्व: इस दिन गाय की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसे में, गाय को स्नान कराकर, तिलक लगाएं और फूल-माला पहनाएं। 7. हरा चारा खिलाएँ: गाय को हरा चारा खिलाना चाहिए। 8. सात्विक भोजन: इस दिन सात्विक भोजन ही करना चाहिए। 9. सात बार परिक्रमा: गोवर्धन पर्वत की बनाई गई आकृति की सात बार परिक्रमा करें। 10. मंत्र जाप: परिक्रमा करते समय वैदिक मंत्रों का जाप करना चाहिए। 11. वास्तविक परिक्रमा: यदि संभव हो पाए, तो गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा भी करनी चाहिए। 12. मंदिर दर्शन: इस दिन भगवान कृष्ण के मंदिर में दर्शन के लिए ज़रूर जाएं। 13. शुभ वस्त्र: शुभ कार्यों में लाल, पीला, नारंगी जैसे रंग के कपड़े पहनना चाहिए। गोवर्धन पूजा के दिन क्या नहीं करें? (Govardhan Puja 2025 Par Kya Na Karen?) पूजा-अर्चना के साथ-साथ, गोवर्धन पूजा के दिन कुछ कार्यों को करने से बचना चाहिए ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। 1. तुलसी के पत्ते न तोड़ें: गोवर्धन पूजा के दिन और इससे पहले आने वाली अमावस्या को तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। 2. तामसिक भोजन से बचें: इस दिन घर में मांस, मदिरा या अन्य तामसिक भोजन नहीं बनाना चाहिए। साथ ही, ऐसे भोजन का सेवन करना भी वर्जित है। 3. वस्त्रों का ध्यान: पूजा के समय काले या नीले रंग के वस्त्र पहनने से बचना चाहिए। 4. द्वार बंद न रखें: इस दिन घर का मुख्य द्वार या खिड़की लंबे समय तक बंद नहीं रखनी चाहिए। 5. पेड़-पौधे न काटें: इस दिन किसी भी पेड़-पौधे को नहीं काटना चाहिए, क्योंकि यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है। इन चीजों के बिना अधूरा है छठ व्रत, जानें पूजा सामग्री और सही नियम

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Diwali

Diwali Par Kya Kare Hindi: दीपावली पर क्या करें, सुबह से लेकर रात तक की 25 जरूरी बातें

Diwali:अभी कार्तिक मास चल रहा है और इस महीने में धनतेरस, दीपावली, देवउठनी एकादशी और देव दीपावली जैसे व्रत-पर्व मनाए जाते हैं। दीपावली पर घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने की कामना से देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस साल दीपोत्सव 5 नहीं, 6 दिनों का है, क्योंकि कार्तिक मास की अमावस्या 20-21 अक्टूबर को दो दिन है। 20 तारीख की शाम को कार्तिक अमावस्या रहेगी, इसलिए इसी दिन दीपावली मनाई जाएगी। दीपोत्सव के दिनों में पूजा-पाठ के साथ ही परंपरागत 5 शुभ काम जरूर करना चाहिए। Diwali इन कामों की वजह से घर में सकारात्मकता और पवित्रता बनी रहती है। त्योहारों के दिनों में घर का वातावरण प्रसन्नता देने वाला और सुखद बना रहेगा। जानिए दीपावली पर कौन-कौन शुभ काम कर सकते हैं… ब्रह्म पुराण के अनुसार दिवाली Diwali पर अर्धरात्रि के समय महालक्ष्मीजी सद्ग्रहस्थों के घरों में विचरण करती हैं। इस दिन घर-बाहर को साफ-सुथरा कर सजाया-संवारा जाता है। दीपावली Diwali मनाने से श्री लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर स्थायी रूप से सद्गृहस्थ के घर निवास करती हैं। दीपावली धनतेरस, नरक चतुर्दशी तथा महालक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा और भाईदूज-इन 5 पर्वों का मिलन है। मंगल पर्व दीपावली के दिन सुबह से लेकर रात तक क्या करें कि महालक्ष्मी का घर में स्थायी निवास हो जाए.. आइए जानें विस्तार से…. Diwali Par Kya Kare Hindi:दीपावली के पूजन की संपूर्ण विधियां दी गई हैं। फिर भी संक्षेप में 25 बिंदुओं से जानें कि क्या करें इस दिन ….  1. प्रातः स्नानादि से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2 . अब निम्न संकल्प से दिनभर उपवास रहें-  मम सर्वापच्छांतिपूर्वकदीर्घायुष्यबलपुष्टिनैरुज्यादि-सकलशुभफल प्राप्त्यर्थं गजतुरगरथराज्यैश्वर्यादिसकलसम्पदामुत्तरोत्तराभिवृद्ध्‌यर्थं इंद्रकुबेरसहितश्रीलक्ष्मीपूजनं करिष्ये।  3.दिन में पकवान बनाएं या घर सजाएं। बड़ों का आशीर्वाद लें।  4 . सायंकाल पुनः स्नान करें। 5 . लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारी में घर की सफाई करके दीवार को चूने अथवा गेरू से पोतकर लक्ष्मीजी का चित्र बनाएं। (लक्ष्मीजी का चित्र भी लगाया जा सकता है।) 6 . भोजन में स्वादिष्ट व्यंजन, कदली फल, पापड़ तथा अनेक प्रकार की मिठाइयां बनाएं। 7 .लक्ष्मीजी के चित्र के सामने एक चौकी रखकर उस पर मौली बांधें। 8. इस पर गणेशजी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें। 9 . फिर गणेशजी को तिलक कर पूजा करें। 10. अब चौकी पर छः चौमुखे व 26 छोटे दीपक रखें। 11.इनमें तेल-बत्ती डालकर जलाएं। 12. फिर जल, मौली, चावल, फल, गुड़, अबीर, गुलाल, धूप आदि से विधिवत पूजन करें। 13. पूजा के बाद एक-एक दीपक घर के कोनों में जलाकर रखें। 14. एक छोटा तथा एक चौमुखा दीपक रखकर निम्न मंत्र से लक्ष्मीजी का पूजन करें-  दिवाली की संपूर्ण पूजा विधि मंत्र सहित, ऐसे करें दिवाली पर लक्ष्मी पूजन नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात॥  साथ ही निम्न मंत्र से इंद्र का ध्यान करें-  ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तमा इंद्राय ते नमः॥ पश्चात निम्न मंत्र से कुबेर का ध्यान करें-  धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च। भवंतु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादिसम्पदः॥ 15. इस पूजन के पश्चात तिजोरी में गणेशजी तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति रखकर विधिवत पूजा करें। 16. तत्पश्चात इच्छानुसार घर की बहू-बेटियों को रुपए दें। 17. लक्ष्मी पूजन रात के बारह बजे करने का विशेष महत्व है। 18. इसके लिए एक पाट पर लाल कपड़ा Diwali बिछाकर उस पर एक जोड़ी लक्ष्मी तथा गणेशजी की मूर्ति रखें। 19. समीप ही एक सौ रुपए, सवा सेर चावल, गुड़, चार केले, मूली, हरी ग्वार की फली तथा पांच लड्डू रखकर लक्ष्मी-गणेश का पूजन करें। 20 उन्हें लड्डुओं से भोग लगाएं। 21. दीपकों का काजल सभी स्त्री-पुरुष आंखों में लगाएं। 22. फिर रात्रि जागरण कर गोपाल सहस्रनाम पाठ करें।  23. व्यावसायिक प्रतिष्ठान, गद्दी की भी विधिपूर्वक पूजा करें। 24. रात को बारह बजे दीपावली पूजन के उपरान्त चूने या गेरू में रुई भिगोकर चक्की, चूल्हा, सिल तथा छाज (सूप) पर तिलक करें। 25. दूसरे दिन प्रातःकाल चार बजे उठकर पुराने छाज में कूड़ा रखकर Diwali उसे दूर फेंकने के लिए ले जाते समय कहें ‘लक्ष्मी-लक्ष्मी आओ, दरिद्र-दरिद्र जाओ’।

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