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Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025:जानिए कब खुलेंगे केदारनाथ धाम के कपाट और क्या हैं नियम, भक्‍त कर लीज‍िए जाने की तैयारी 

Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025:गढ़वाल हिमालय की मनमोहक पहाड़ियों में बसा केदारनाथ मंदिर छह महीने तक बंद रहने के बाद 2 मई, 2025 को श्रद्धालुओं के लिए अपने दरवाजे फिर से खोलने वाला है। यह मंदिर, सबसे पवित्र हिंदू तीर्थ स्थलों में से एक है, जो चार धाम यात्रा का हिस्सा है। हर साल हजारों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होने आते हैं। केदारनाथ 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में 11,968 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर साल में अप्रैल-मई से अक्टूबर-नवंबर के बीच लगभग छह से सात महीने तीर्थयात्रियों के लिए खुला रहता है और सीजन के दौरान सालाना लगभग 20 लाख तीर्थयात्री यहां आते हैं। अगर आप भी लंबे समय से केदारनाथ धाम जाने की योजना बना रहे हैं, तो कुछ जरूरी बातों के बारे में जान लीजिए। How are the doors of Kedarnath Dham opened:किस तरह खोले जाते हैं केदारनाथ धाम के कपाट  Kedarnath Dham Yatra:केदारनाथ धाम के कपाट खुलने का दिन तय किया जा चुका है. इसके पश्चात नियमानुसार कपाट खोले जाएंगे. कपाट खुलने से पूर्व 27 अप्रैल के दिन ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में भैरव पूजा का आयोजन किया जाएगा. इसके बाद बाबा केदार की डोली केदारनाथ धाम के लिए प्रस्थान करेगी. इसके बाद बाबा केदार की डोली को 28 अप्रैल गुप्तकाशी ले जाया जाएगा, यहां से 29 अप्रैल को फाटा और 30 अप्रैल को बाबा केदार की डोली गौरीकुंड पहुंचेगी. बाबा केदार की डोली 1 मई के दिन केदारनाथ पहुंच जाएगी और फिर अगले दिन 2 मई को सुबह 7 बजे केदारनाथ मंदिर के कपाट खोल दिए जाएंगे. Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 कब खुलेंगे केदारनाथ धाम के कपाट जब केदारनाथ धाम के द्वार खोले जाते हैं तो इस दौरान पूरा मंदिर प्रांगण में बाबा केदारनाथ का जयकारा लगाया जाता है और ठोल नगाड़ों की आवाज गूंजती है. इसके बाद भक्त बाबा केदारनाथ के दर्शन कर सकते हैं. Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 कपाट खुल जाने के बाद भक्त बाबा केदारनाथ की विधिवत पूजा करते हैं. यह पूजा शैव लिंगायत विधि से की जाती है. Devotees should prepare for Kedarnath Yatra in this way:केदारनाथ यात्रा के लिए भक्त इस तरह करें तैयारी  केदारनाथ यात्रा (Kedarnath Yatra) पर जाना चाहते हैं तो कुछ बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है. यात्रा पर जाने का अच्छा समय मई से जून और सितंबर से अक्टूबर के बीच माना जाता है.  मौसम के अनुसार ही कपड़े लेकर जाएं. अलग-अलग दिन पर अलग मौसम हो सकता है. Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 इसीलिए मौसम में बदलाव को ध्यान में रखकर ही कपड़े लेकर जाना सही रहेगा.  पैकिंग करते समय जरूरत की चीजें ध्यान से रखें. दवाइयां रखना ना भूलें. अगर किसी को कोई मेडिकल कंडीशन है तो उसे भी ध्यान में रखें. फर्स्ट एड का सामान भी लेकर जाएं.  यात्रा पर निकलने से पहले सभी जरूरी डॉक्यूमेंट्स को ध्यान से रखें. साथ ही अपनी आईडी वगैरह रख लें.  पहनने के लिए सही जूते लेकर जाएं, स्टाइलिश सैंडल्स या बूट्स चढ़ाई और लंबी यात्रा के लिए सही नहीं होते हैं.  पर्सनल हाइजीन की चीजें भी साथ लेकर चलें. यह ना सोचें कि आप लास्ट मिनट पर कुछ खरीद लेंगे. अपने साथ फ्लैशलाइट और हेडलैंप वगेरह लेकर जाएं.  ऑनलाइन पेमेंट पर पूरी तरह निर्भर होकर ना जाएं और अपने साथ कैश लेकर चलें.  Where to stay during Kedarnath Yatra :केदारनाथ यात्रा के दौरान कहां ठहरें? Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 अपनी केदारनाथ यात्रा के लिए, आप केदारनाथ में ही रुक सकते हैं, जहां गेस्ट हाउस, शयनगृह और आश्रम जैसी बेसिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, या आप गुप्तकाशी (Guptkashi) या सोनप्रयाग (Sonprayag) में अधिक आरामदायक अकोमोडेशन का ऑप्शन चुन सकते हैं, जहां से केदारनाथ तक आने-जाने का ऑप्शन भी उपलब्ध है। Don’t forget to register:रजिस्ट्रेशन करना न भूलें केदारनाथ यात्रा के लिए तीर्थयात्रियों को यात्रा शुरू करने से पहले रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी करनी होती है। आप आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से या ट्रैवल एजेंसियों की मदद से ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। बता दें, रजिस्ट्रेशन करने के लिए आधिकारिक वेबसाइट registrationandtouristcare.uk.gov.in पर जाकर आधार कार्ड के माध्यम से प्रक्रिया पूरी हो सकती है। How to prepare yourself for Kedarnath:केदारनाथ के लिए कैसे करें खुद को तैयार Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 केदारनाथ यात्रा में लगभग 16 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई शामिल है (यदि पैदल यात्रा कर रहे हैं)। ऐसे में खुद को शारीरिक रूप से तैयार रखना जरूरी है, क्योंकि यात्रा के दौरान पैदल चलना, हल्की ट्रैकिंग या सीढ़ियां चढ़ना शामिल है। Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 इसी के साथ अच्छे और मजबूत जूतों का चयन करना सबसे जरूरी है.

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Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri: महाशिवरात्रि: महासिद्धिदात्री का आध्यात्मिक महत्व

Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri:शास्त्र कहते हैं कि दुनिया में कई तरह के व्रत हैं, विभिन्न तीर्थ यात्राएँ, कई तरह के यज्ञ, विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ और जप आदि महाशिवरात्रि व्रत की बराबरी नहीं कर सकते। इसलिए सभी को अपने-अपने फायदे के लिए इस व्रत का पालन करना चाहिए। महाशिवरात्रि की पूजा करने का आशीर्वाद प्रदोषकाल के दौरान सबसे अच्छा माना जाता है। त्रयोदशी तिथि का अंत और चतुर्दशी तिथि की शुरुआत उनकी अंतिम अवधि है। किसी भी तिथि, वार, नक्षत्र, योग, कारण आदि और सुबह और शाम के सत्र को प्रदोषकाल कहा जाता है। वैसे तो हर महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को शिवरात्रि मनाई जाती है, लेकिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। भगवान शिव को प्रसन्न करने और अलग-अलग कामनाओं के लिए महाशिवरात्रि पर भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri:जानिए उपवास के पीछे की आध्यात्मिकता? महाशिवरात्रि व्रत अत्यंत शुभ और दिव्य है। इससे अनित्य भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस शिवरात्रि व्रत को व्रतराज के नाम से जाना जाता है। लोगों को इस व्रत का पालन सुबह से लेकर रात तक त्रयोदशी की रात तक करना चाहिए। भगवान शंकर की पूजा रात्रि के चार घंटे में करनी चाहिए। इस विधि से जागरण पूजा करने से तीन पुण्य कर्म एक साथ हो जाते हैं और भगवान शिव की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है। यह व्यक्ति को जन्म के पापों से मुक्त करता है। इस दुनिया में आनंद प्राप्त करके, एक व्यक्ति अंत में शिव की आयु प्राप्त करता है। जीवन भर इस विधि में आस्था के साथ व्रत रखने से आपको भगवान शिव की कृपा से मनोवांछित फल मिलता है। Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri जो लोग इस विधि से व्रत करने में असमर्थ हैं, वे रात की शुरुआत में और आधी रात को भगवान शिव की पूजा करके व्रत को पूरा कर सकते हैं। शिवरात्रि में पूरी रात जागने से आपको महान परिणाम मिलते हैं। Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri परमदयालु भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं और मनोवांछित वर देते हैं। महाशिवरात्रि को ‘महासिद्धिदात्री’ कहा जाता है क्योंकि यह पर्व आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक सिद्धियों को प्राप्त करने का विशेष अवसर माना जाता है। हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का प्रतीक है, जो सृष्टि की रचनात्मक और संहारक शक्तियों के संतुलन को दर्शाता है। इस दिन की रात्रि को विशेष रूप से शक्तिशाली माना जाता है, क्योंकि यह वह समय है जब शिव की कृपा और ऊर्जा अपने चरम पर होती है, जिससे भक्तों को साधना और तप के माध्यम से सिद्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था, जो शक्ति और शिव का एकीकरण दर्शाता है। यह एकीकरण भक्तों को यह संदेश देता है कि जीवन में संतुलन और सामंजस्य के साथ साधना करने से उच्चतम आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। इस रात्रि को ‘सिद्धिदात्री’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस समय की गई साधना, ध्यान, जप और उपवास से व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने और आत्मिक उन्नति प्राप्त करने में सक्षम हो सकता है। महाशिवरात्रि का महत्व योग और तंत्र साधना में भी विशेष है। इस दिन ग्रहों की स्थिति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा ऐसी होती है कि साधक के लिए ध्यान और तप का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri मान्यता है कि इस रात्रि में भगवान शिव का रुद्राभिषेक, मंत्र जप और शिवलिंग पूजा करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है। इसके अतिरिक्त, महाशिवरात्रि का संबंध माता सिद्धिदात्री से भी जोड़ा जाता है, जो नवदुर्गा का नौवां स्वरूप हैं। सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियों की दात्री हैं। इस दिन उनकी पूजा और शिव की आराधना से भक्तों को सिद्धियों की प्राप्ति होती है। इस प्रकार, महाशिवरात्रि न केवल शिव की भक्ति का पर्व है, बल्कि यह आध्यात्मिक साधना के लिए एक महान अवसर भी है, जो इसे ‘महासिद्धिदात्री’ की संज्ञा देता है।

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What is Khatu Shyam Nishan Yatra:फाल्गुन महीने में करें खाटू बाबा की निशान यात्रा, दूर भागेगा हर एक संकट !

What is Khatu Shyam Nishan Yatra:खाटू बाबा की ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, उनके बारे में एक नारा प्रचलित है ‘हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा।’ अर्ताथ अगर आप अपने जीवन में हर उम्मीद हार चुके है, तो बाबा खाटू वाले ही आपको सहारा दे सकते है। उनकी कृपा से हारी हुई बाजी भी जीत सकते है। What is Khatu Shyam Nishan Yatra राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर की काफी मान्यता है। खाटू बाबा के भक्त उन्हें कलयुग का श्री कृष्ण बताते है। What is Khatu Shyam Nishan Yatra खाटू बाबा की ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, उनके बारे में एक नारा प्रचलित है ‘हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा।’ अर्ताथ अगर आप अपने जीवन में हर उम्मीद हार चुके है, तो बाबा खाटू वाले ही आपको सहारा दे सकते है। उनकी कृपा से हारी हुई बाजी भी जीत सकते है।  खाटू वाले श्याम बाबा के दर्शन करने न सिर्फ देश बल्कि विदेशों से भक्त पहुंचते है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, महाभारत के दौरान बर्बरीक नाम के योद्धा को श्री कृष्ण ने अपना नाम ‘खाटू श्याम’ दिया था, What is Khatu Shyam Nishan Yatra क्योंकि उसने भगवान द्वारा दी गई दिव्य दृष्टि से पूरा युद्ध दर्शन किया था। shri krishna barbarik श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा था कि, वह कलयुग में हारे का सहारा बनेंगे और उनके नाम खाटू श्याम से जानें जाएंगे। प्रतिवर्ष खाटू भक्त श्याम बाबा की निशान यात्रा निकालते हैं।  What is Khatu Shyam Nishan Yatra निशान यात्रा What is Khatu Shyam Nishan Yatra फाल्गुन मेले में निशान यात्रा का भी बहुत बड़ा महत्व है। निशान यात्रा एक तरह की पदयात्रा होती है जिसमे भक्त अपने हाथो में श्री श्याम ध्वज हाथ में उठाकर श्याम बाबा को चढाने खाटू श्याम जी मंदिर तक आते है। इसी श्री श्याम ध्वज को निशान कहा जाता है। मुख्यत यह यात्रा रींगस से खाटू श्याम जी मंदिर तक की जाती है जोकि 18 किमी की यात्रा है। राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर की काफी मान्यता है। खाटू बाबा के भक्त उन्हें कलयुग का श्री कृष्ण बताते है। खाटू बाबा की ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, उनके बारे में एक नारा प्रचलित है ‘हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा।’ अर्ताथ अगर आप अपने जीवन में हर उम्मीद हार चुके है, तो बाबा खाटू वाले ही आपको सहारा दे सकते है। What is Khatu Shyam Nishan Yatra उनकी कृपा से हारी हुई बाजी भी जीत सकते है।  खाटू वाले श्याम बाबा के दर्शन करने न सिर्फ देश बल्कि विदेशों से भक्त पहुंचते है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, महाभारत के दौरान बर्बरीक नाम के योद्धा को श्री कृष्ण ने अपना नाम ‘खाटू श्याम’ दिया था, What is Khatu Shyam Nishan Yatra क्योंकि उसने भगवान द्वारा दी गई दिव्य दृष्टि से पूरा युद्ध दर्शन किया था। श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा था कि, वह कलयुग में हारे का सहारा बनेंगे और उनके नाम खाटू श्याम से जानें जाएंगे। प्रतिवर्ष खाटू भक्त श्याम बाबा की निशान यात्रा निकालते हैं।  इस यात्रा के अंतर्गत भक्त अपनी श्रद्धा से अपने-अपने घर से भी शुरू करते हैं। What is Khatu Shyam Nishan Yatra ऐसा माना जाता है कि पैदल निशान यात्रा करके श्याम बाबा को निशान चढाने से बाबा शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना को पूर्ण करते हैं। श्याम बाबा को निशान क्यों चढ़ाते हैं? | श्याम बाबा को निशान अर्पण करने की महिमा: Why do we mark Shyam Baba? , Glory of offering Nishan to Shyam Baba: सनातन संस्कृति में ध्वज को विजय का प्रतीक माना जाता है। श्री श्याम बाबा के महाबलिदान शीश दान के लिए उन्हें निशान चढ़ाया जाता है। जिसमे उन्होंने धर्म की जीत के लिए दान में अपना शीश ही भगवान श्री कृष्ण को दे दिया था। निशान का स्वरूप: Format of mark निशान मुख्यतः केसरी, नीला, सफेद, लाल रंग का झंडा/ध्वज होता है। इन ध्वजाओं पर श्याम बाबा और भगवान श्री कृष्ण के जयकारे और दर्शन के फोटो होते है। कुछ निशानों पर नारियल एवं मोरपंखी भी लगी होती है। इसके सिरे पर एक रस्सी बंधी होती है जिससे यह निशान हवा में लहराता है। वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत अनेक भक्त अब सोने-चांदी के भी निशान श्याम बाबा को अर्पित करने लगे हैं। निशान यात्रा में ध्वज का रंग(Khatu Nishan Yatra Dhwaj Rang)  खाटू नरेश बाबा श्याम की निशान यात्रा में केसरिया, नीला, सफेद और लाल रंग का ध्वज इस्तेमाल होता है। इन ध्वज पर खाटू श्याम और भगवान श्री कृष्ण का चित्र बना होता है। साथ ही कई पताकाओं पर बाबा के जयकारे लिखे होते हैं और कई पर नारियल और मोरपंखी लगे होते है। 

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आखिर क्यों हुआ था भगवान विष्णु और माता सरस्वती का युद्ध? जानें इसके पीछे की कथा

भगवान विष्णु बसंत पंचमी का त्योहार हर वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन मनाया जाता है. वहीं, माता सरस्वती से जुड़ी कईं दिलचस्प कथाएं हैं जिनमें से एक है कि आखिर भगवान विष्णु और माता सरस्वती का युद्ध क्यों हुआ था. आइए जानते हैं इसके पीछे की कथा. जब अचानक यज्ञ के दौरान प्रकट हुईं सरस्वती एक बार ब्रह्मा जी एक यज्ञ कर रहे थे और उसमें भाग लेने के लिए देवता भी आए हुए थे. यज्ञ के बीच में अचानक माता सरस्वती की आवाज सुनाई दी. वह क्रोधित थीं और उनके क्रोध से खून बह रहा था. उनकी वीणा हथियार बन गई थी और उसने तीनों लोकों को हिला दिया था. सरस्वती ने ब्रह्मा जी से कहा कि उनका अपमान किया गया है और अब वह यज्ञ को नष्ट कर रही हैं क्योंकि ब्रह्मा जी ने ज्ञान के बजाय धन को चुना है. उसी समय उपस्थित विष्णु जी ने कहा, ‘जब तक मैं मौजूद हूं, तब तक तुम्हारी आवश्यकता नहीं है.’ सृजन की कला की मधुरता खोज ली गई है. तुम्हारा वर्तमान ज्ञान सागर ने खोज लिया है. तुम यज्ञ को संकट में डाल रहे हो और मैं जानता हूं कि इसका कोई औचित्य नहीं है. इस यज्ञ को नष्ट करने से पहले तुम्हें मेरा विनाश करना होगा. भगवान विष्णु माता सरस्वती को आया क्रोध यह देखकर माता सरस्वती ज्वालामुखी की तरह भड़क उठीं. उनके वस्त्र काले पड़ गए थे. उनका कमल भी काला हो रहा था. हंस काला होने लगा था. वह अपना ही रूप उलट रही थीं. सरस्वती और विष्णु एक-दूसरे के सामने आए तो ब्रह्मांड उनसे प्रार्थना करने लगा. देवता ने देवी को, पुरुष ने प्रकृति को चुनौती दी थी. ब्रह्मांड के दो भाग परस्पर युद्ध करने जा रहे थे. सरस्वती ने तुरंत माया-शक्ति को एक विशाल नारकीय अग्नि के रूप में प्रकट कर दिया. किंतु विष्णु जी ने उसे तत्काल बुझा दिया. फिर सरस्वती ने कपालिका शक्ति प्रकट की किंतु विष्णु जी ने उसे भी विफल कर दिया. इसके बाद देवी ने कई भयानक शक्तियों का आह्वान करते हुए कालिका शक्ति को उत्पन्न किया परंतु विष्णु जी के सामने वह शक्ति भी विफल हो गईं. देवी क्रोध से जल रही थीं और उनकी आंखें खून की तरह लाल थीं. भगवान विष्णु उनके केश खुले थे, हंस चिल्ला रहा था, कमल मुरझा चुका था. सबके देखते-देखते माता सरस्वती का रूप बदलने लगा. वह तरल हो रही थीं तथा उनका हिम-प्रतिमा जैसा शरीर पिघल रहा था. माता सरस्वती ने एक विशाल भंवर का रूप धारण कर लिया जिसने धरती में एक विशाल कुंड बना दिया और देवी उसे जल से लबालब भर रही थीं. माता सरस्वती नदी में हुई परिवर्तित फिर पार्वती ने पूछा, ‘यह क्या कर रही हैं?’ फिर ब्रह्मा जी ने उत्तर देते हुए कहा कि, ‘ सरस्वती नदी में परिवर्तित हो रही हैं क्योंकि वह यज्ञ को नष्ट नहीं पाई इसलिए अब इसे डुबाना चाहती हैं.’ वहां अब देवी नहीं थीं. केवल एक जलधारा थी जो क्रूरतापूर्वक यज्ञ-वेदी की ओर बढ़ रही थी. भूलोक की त्वचा को छील रही थी. पत्थरों को धूल में मिला रही थी. उसने क्रुद्ध रूप धारण कर लिया था मानो पृथ्वी की शिराओं में रक्त धधक रहा हो. उस धारा का प्रवाह इतना प्रचंड था कि लगा जैसे वह यज्ञ को रसातल में ले जाएंगी. विष्णु जी माता सरस्वती की ओर बढ़ने लगे. फिर मां लक्ष्मी ने पूछा, ‘क्या श्री हरि उसे शांत कर पाएंगे?’ हां में शिव ने सिर हिलाया, ‘जैसे मैंने गंगा को शांत किया था और जैसे काली को शांत किया था.’ विष्णु जी नदी के मार्ग में लेट गए. उन्होंने अनंत शयन की मुद्रा धारण कर ली किंतु उन्हें नींद नहीं आई. वे देख रहे थे कि जल-प्रवाह तेज हो रहा है. सरस्वती अपने तरल रूप में रोष के साथ आगे बढ़ रही थीं. धीरे धीरे और करीब आ गईं. माता सरस्वती ने बाढ़ का रूप धारण कर लिया था और वह निकट आ चुकी थी. उन्होंने लहर की तरह गरजना शुरू कर दिया. भगवान विष्णु वह तटों के ऊपर से छलकने लगी. भगवान विष्णु वह पहले से भी निकट थी. उसने धरती को जैसे चीर दिया था. भगवान विष्णु करीब से यह दृश्य देखकर मां लक्ष्मी घबरा गईं. देवता झेंप गए. फिर विष्णु जी से जरा-सी दूरी पर आकर नदी सहसा मुड़ गई और दाहिनी ओर बहने लगी. उसके प्रवाह से धरती में गड्ढा हो गया जिससे होते हुए वह पाताल लोक में चली गईं. वह ब्रह्मांड की आंतों में लुप्त हो गईं. देवताओं ने राहत की सांस ली. सब आश्चर्य से देख रहे थे और सरस्वती स्वयं को रिक्त कर रही थीं. देवी ने भगवान विष्णु के समक्ष समर्पण कर दिया था. ‘देवता ने फिर से देवी पर नियंत्रण पा ही लिया,’ पार्वती ने शिव की ओर देखकर कहा. शिव ने देवी पार्वती को पुष्प अर्पित किया और बोले, ‘देवी ने भी महिषासुर पर अंकुश लगाया था. देवी ने रक्तबीज को भी नियंत्रित किया था. एक देवता ने भी दूसरे देवता को नियंत्रित किया था जब मैंने शरभ के रूप में नृसिंह को शांत किया था. और श्रीहरि ने मेरे रुद्र तांडव को शांत किया था. भगवान विष्णु यह देवता या देवी की बात नहीं है, बल्कि यह संसार के लिए संकट बने विष का प्रतिकार करने की बात है. और विष का लिंग नहीं होता

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Maha Kumbh में रबड़ी वाले बाबा की अनोखी कहानी, हर दिन 130 लीटर दूध से बनती है रबड़ी, बांटने का तरीका है अलग

Rabri Wale Baba: देवगिरी महाराज ने बताया कि वे हर दिन लगभग 130 लीटर दूध की रबड़ी बनाते हैं और भक्ति में प्रसाद बांटते हैं. उन्होंने कहा कि वे भगवती महाकाली के उपासक हैं और देवी जी की कृपा से उन्हें यह सेवा करने की प्रेरणा मिली है. Maha Kumbh प्रयागराज महाकुंभ में पधारे साधु-संतों की अपनी अलग-अलग किस्से कहानियां हैं. तमाम बाबाओं की खुद की अलहदा पहचान हैं तो कई संन्यासियों की अपनी अलग खासियत है. कुछ इसी तरह की एक कहानी ‘रबड़ी बाबा’ की भी है. महाकुंभ में रबड़ी वाले बाबा  श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र  बने हैं तो वहीं सोशल मीडिया में भी छाए हुए हैं.       देवगिरी जी महाराज ने बताया कि वे हर दिन लगभग 130 लीटर दूध की रबड़ी बनाते हैं और भक्ति में प्रसाद बांटते हैं. उन्होंने कहा कि वे भगवती महाकाली के उपासक हैं और देवी जी की कृपा से उन्हें यह सेवा करने की प्रेरणा मिली है. देवगिरी जी महाराज ने बताया कि वे दूध और मध्यम शक्कर डालकर रबड़ी बनाते हैं. दरअसल, श्रद्धालुओं को डायबिटीज न हो, इसलिए चीनी की मात्रा कम रखते हैं. उन्होंने कहा कि उनका सिद्धांत है कि वे बैठकर रबड़ी खिलाते हैं, बांटते नहीं हैं. Maha Kumbh के इस अनुभव में रबड़ी का महत्व Maha Kumbh में जहां लाखों श्रद्धालु आते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, वहीं रबड़ी वाले बाबा की सेवा एक अलग ही अनुभव प्रदान करती है। उनके द्वारा बांटी गई रबड़ी केवल एक पारंपरिक मीठा व्यंजन नहीं बल्कि एक धार्मिक और आत्मिक सेवा बन चुकी है। श्रद्धालु इस प्रसाद को न केवल भक्ति से प्राप्त करते हैं, बल्कि यह उनके लिए एक आशीर्वाद जैसा होता है। Maha Kumbh रबड़ी का प्रसाद खाते समय लोग बाबा के साथ अपना आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और साथ ही उनकी भक्ति में भी वृद्धि होती है। यह सेवा देवी भगवती महाकाली की कृपा से संभव देवगिरी जी महाराज का मानना है कि रबड़ी एक तरह से भक्तों को मानसिक शांति और शक्ति देने का माध्यम है। वे इसे किसी प्रकार के साधारण भोजन की तरह नहीं मानते, बल्कि इसे एक दिव्य प्रसाद मानते हैं। रबड़ी बांटने का उनका तरीका बहुत ही संतुलित Maha Kumbh और सुव्यवस्थित है, जहां हर व्यक्ति को उचित समय और स्थान पर यह प्रसाद मिलती है। वे इसे न केवल अपनी सेवा बल्कि एक धार्मिक कर्तव्य के रूप में निभाते हैं। उनका मानना है कि यह सेवा देवी भगवती महाकाली की कृपा से संभव हो रही है, और वे उन्हें इस कार्य के लिए प्रेरित करती हैं। Maha Kumbh में रबड़ी वाले बाबा की सेवा का प्रभाव रबड़ी वाले बाबा की सेवा ने Maha Kumbh में आने वाले श्रद्धालुओं के बीच एक नई पहचान बनाई है। उनके प्रसाद की भव्यता और उनकी भक्ति ने लोगों को आकर्षित किया है। रबड़ी बनाने और उसे श्रद्धालुओं को देने का उनका तरीका उन्हें Maha Kumbh के महत्वपूर्ण आकर्षणों में से एक बना चुका है। Maha Kumbh जैसे बड़े आयोजन में बाबा की उपस्थिति ने यह साबित किया है कि धार्मिक आस्था और सेवा का कोई आकार नहीं होता; ये किसी भी रूप में हो सकती है और उसी रूप में श्रद्धा का प्रसार करती है। रबड़ी बांटने का तरीका रबड़ी वाले बाबा का मानना है कि रबड़ी केवल बांटी नहीं जानी चाहिए, बल्कि श्रद्धा और आस्था के साथ इसे खिलाना चाहिए। वे हर श्रद्धालु को बैठाकर रबड़ी खिलाते हैं और यही उनका सिद्धांत है। वे मानते हैं कि इस प्रक्रिया से श्रद्धालुओं को मानसिक और शारीरिक रूप से शांति मिलती है और उनकी भक्ति का भी संकल्प मजबूत होता है। उनका यह तरीका श्रद्धालुओं के बीच बहुत ही लोकप्रिय हो गया है, और लोग उनकी सेवा का आनंद लेने के लिए उनकी ओर खींचे चले आते हैं।  श्रद्धालुओं को एक विशेष तरह का प्रसाद श्री महंत देवगिरी जी महाराज का मानना है कि Maha Kumbh के पवित्र अवसर पर श्रद्धालुओं को एक विशेष तरह का प्रसाद देना चाहिए। इसी के तहत वे हर दिन करीब 130 लीटर दूध से रबड़ी तैयार करते हैं। Maha Kumbh वे बताते हैं कि रबड़ी बनाने का यह कार्य दिन-रात चलता रहता है, ताकि जितने भी श्रद्धालु आकर प्रसाद ग्रहण करें, उन्हें ताजे और स्वादिष्ट प्रसाद का अनुभव हो सके। 

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जानिए भगवान विष्णु के 24 अवतारों के बारे में जिसमें से ये 10 अवतार बेहद खास हैं

धरती पर जब-जब अधर्म बढ़ा है, तब-तब भगवान विष्णु ने अवतार लिया है। इस तरह से देखा जाए तो उनके 24 बार अवतार लेने की बात कही गई है। उनमें से उनके कुछ ही अवतार जन-सामान्य के बीच लोकप्रिय हैं लेकिन पोषक होने के कारण भगवान विष्णु के सभी अवतारों ने हमेशा पृथ्वी और मानव-जाति का उद्धार किया है। तो, चलिए जानते हैं उनके सभी 24 अवतारों के बारे में और यह भी की उन अवतारों का उद्देश्य क्या था.. जानिए भगवान विष्णु के 24 अवतारों के बारे में जिसमें से ये 10 अवतार बेहद खास हैंभगवान विष्णु के 24 अवतार कौन से हैं, जानिए विस्तार से.. जानते हैं विष्णु जी के सभी 24 अवतारों के बारे में विस्तार से..​ अभी हाल ही में भगवान राम का अयोध्या में खूब धूमधाम से स्वागत हुआ है। भगवान राम विष्णु के उन अवतारों में से एक थे जिनकी खूबी रामराज्य और न्यायप्रियता थी। भगवान राम की ही तरह पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु के 24 अवतार हैं जिनमें से 23 अवतार अब तक हो चुके हैं और 24 वां अवतार ‘कल्कि अवतार’ के रूप में होना बाकी है। इन 24 अवतारों में से 10 अवतार विष्णु जी के मुख्य अवतार माने जाते है और लोगों के बीच लोकप्रिय हैं लेकिन इसके अतिरिकट बाकी जीतने 14 अवतार हैं, उसके बारे में लोगों को बहुत काम जानकारी है। तो, चलिए जानते हैं उनके सभी 24 अवतारों के बारे में विस्तार से.. 1- श्री सनकादि मुनिग्रंथों के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में लोक पितामह ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों से सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में अवतार लिया था।2- वराह अवतारजब दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया था, तब पृथ्वी और वेदों की रक्षा के लिए विष्णुजी ब्रह्माजी की नाक से वराह के रूप में प्रकट हुए थे।3- नारद अवतारपुराणों के अनुसार, देवर्षि नारद भी भगवान विष्णुजी के ही सभी अवतारों में से एक हैं जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र भी माने जाते हैं। नारद अवतार के माध्यम से भगवान विष्णु ने धरती पर अपना उपदेश देने के लिए अवतार लिया था। 4- नर-नारायणसृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु ने धर्म की स्थापना के लिए दो रूपों में अवतार लिया। उनके इस अवतार में उनके मस्तक पर जटा, हाथों में हंस, चरणों में चक्र एवं वक्षस्थल पर श्रीवत्स के चिन्ह थे। भगवान विष्णु ने नर-नारायण के रूप में यह अवतार लिया था।5- कपिल मुनिभगवान विष्णु का यह पांचवा अवतार था। कपिल मुनि हिंदू धर्म के एक महान संत थे जिन्होंने सांख्य दर्शन को विकसित किया था। भीष्म पितामह के शरीर त्याग के समय वेदज्ञ व्यास आदि ऋषियों के साथ भगवा कपिल भी वहां उपस्थित थे।6- दत्तात्रेय अवतारपुराणों के अनुसार, ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा, शंकरजी के अंश से दुर्वासा और विष्णुजी के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।7- यज्ञभगवान विष्णु के ‘यज्ञ’ अवतार का जन्म स्वायम्भुव मन्वन्तर में हुआ था।8- भगवान ऋषभदेवयह भगवान विष्णु का आठवें अवतार थे जो ऋषभदेव महाराज नाभि और मेरुदेवी के पुत्र थे 9- आदिराज पृथुभगवान विष्णु के एक अवतार का नाम आदिराज पृथु है। आदिराज पृथु इक्ष्वाकु वंश के राजा थे और उनका शासन स्वर्ग से लेकर समुद्र तक फैला हुआ था।10- मत्स्य अवतारपुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए यह अवतार लिया था और बाद में उन्होंने राजा सत्यव्रत को तत्वज्ञान का उपदेश भी दिया, जो मत्स्यपुराण नाम से प्रसिद्ध है।11- कूर्म अवतारभगवान विष्णु के कूर्म अथवा कच्छप (कछुए) अवतार ने समुद्र मंथन में सहायता की थी।12- भगवान धन्वन्तरिसमुद्र मंथन में भगवान विष्णु के यह अवतार धन्वन्तरि के रूप में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इन्हें औषधियों का स्वामी भी माना गया है।13- मोहिनी अवतारसमुद्र मंथन के दौरान ही असुरों को रिझाने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया था। 14- भगवान नृसिंहभगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था जो अपने ही पुत्र प्रह्लाद को मारने वाले थे।15- वामन अवतारराजा बलि के अत्याचारों से सबको बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था जिसमें उन्होनें बलि से मिले 3 पग में मिलने वाले जमीन के वचन में से महज दो पग में ही तीनों लोक नाप लिया था और तीसरा पग उसके सिर पर रखकर उसका घमंड थोड़ा था।16- हयग्रीव अवतारहयग्रीव अवतार में भगवान विष्णु की गर्दन और मुख घोड़े के समान थी। उनके इस अवतार ने मधु-कैटभ का वध कर वेद पुन: भगवान ब्रह्माजी को सौंप दिया था।17- श्रीहरि अवतारगजेंद्र (हाथी) की स्तुति सुनकर भगवान श्रीहरि प्रकट हुए और उन्होंने अपने चक्र से मगरमच्छ का वध कर दिया जिसके कारण गजेन्द्र के प्राण संकट में थे। 18- परशुराम अवतारपरशुराम भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक हैं जिन्होंने महाभारत और रामायण दोनों कालों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।19- महर्षि वेदव्यासभगवान व्यास भगवान विष्णु के कलावतार थे। इन्होंने ही महाभारत ग्रंथ की रचना भी की।20- हंस अवतारभगवान विष्णु, महाहंस के रूप में प्रकट हुए थे और उन्होंने सनकादि मुनियों के संदेह का निवारण किया। इसके बाद सभी ने भगवान हंस की पूजा की।21- श्रीराम अवतारत्रेतायुग में अयोद्धा नगरी में भगवान राम का अवतार हुआ जिन्होंने रावण का वद्ध किया था। उनका यह अवतार एक न्यायपूर्ण राजा और बुराई के ऊपर अच्छाई की जीत के रूप में पर प्रसिद्ध है। 22- कृष्ण अवतारद्वापरयुग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण का अवतार लिया और कंस का नाश किया था। महाभारत के युद्ध में वो अर्जुन के सारथी बने थे और दुनिया को गीता का ज्ञान भी दिया।23- बुद्ध अवतारबौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध को भी भगवान विष्णु का ही अवतार माना जाता है।24- कल्कि अवतारपुराणों के अनुसार, कलियुग में भगवान विष्णु कल्कि रूप में अवतार लेंगे। कल्कि अवतार कलियुग व सतयुग के संधिकाल में होगा। यह अवतार 64 कलाओं से युक्त होगा। कल्कि देवदत्त नामक घोड़े पर सवार होकर संसार से पापियों का विनाश करेंगे और धर्म की पुन:स्थापना करेंगे।

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Harsha Richhariya: महाकुंभ में पॉपुलर होने से लेकर मैदान छोड़ने के संकल्प तक, सुंदर ‘साध्वी’ ने क्या-क्या कहा

Viral Sadhvi Harsha Richhariya Update: सोशल मीडिया सेंसेशन बन चुकीं वायरल साध्वी हर्षा रिछारिया ने महाकुंभ से वापस लौट जाने का ऐलान किया है. उन्होंने रोते हुए एक वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया है. आखिर क्यों यह ‘साध्वी’ महाकुंभ से पहले ही वापस लौट रही हैं. कहां से बवाल शुरू हुआ और क्या है पूरी कहानी चलिए जानते हैं आसान भाषा में… Viral Sadhvi In Mahakumbh: प्रयागराज महाकुंभ में अपनी खूबसूरती को लेकर वायरल हो रही साध्वी हर्षा रिछारिया ने कुंभ छोड़ने का ऐलान कर दिया है. लेकिन इस दौरान उन्होंने ट्रोलरों पर गंभीर आरोप लगा दिया है. Viral Sadhvi In Mahakumbh: महाकुंभ में पवित्र स्नान करने प्रयागराज Prayagrag पहुंची वायरल साध्वी हर्षा रिछारिया फूट-फूटकर रोने लगी. उन्होंने महाकुंभ छोड़ देने का ऐलान कर दिया है. रोते हुए हर्षा ने ट्रोलरों पर गंभीर आरोप लगा दिया. उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वो रोते हुई दिख रही हैं. रोते हुए हर्षा ने कहा, “शर्म आनी चाहिए एक लड़की जो धर्म से जुड़ने के लिए यहां आई थी, धर्म को जानने आई थी, सनातन संस्कृति को जानने यहां आई थी. आपने उसे इस लायक भी नहीं छोड़ा, जो पूरे कुंभ में रूक पाए. वो कुंभ जो हमारे जीवन में एक बार आएगा. आपने वो कुंभ एक इंसान से छीन लिया. जिसने भी ऐसा किया है, उसे पाप लगेगा.” रथ पर बैठने से विवाद निरंजनी अखाड़े के छावनी प्रवेश के दौरान एक रथ पर संतों के साथ हर्षा रिछारिया के बैठने को लेकर विवाद पैदा हो गया. काली सेना के प्रमुख स्वामी आनंद स्वरूप ने इस पर आपत्ति जताई है. उन्होंने फेसबुक Fecbook पर लिखा है, “महाकुंभ मेले Mahakumbh Mela में निरंजनी अखाड़े के छावनी में अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी जी महाराज से भोजन प्रसाद पर चर्चा हुई. मैंने कहा कि यह कुंभ अखाड़ों को मॉडल दिखाने के लिए नहीं आयोजित है, यह कुंभ जप, तप और ज्ञान की गंगा के लिए है. इसलिए इस कुकृत्य पर आप कार्रवाई कीजिए.” जैसे मैंने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया’ वायरल साध्वी ने कहा, ‘कुछ लोगों ने मुझे धर्म से जुड़ने का मौका नहीं दिया. इस कॉटेज में रहते हुए मुझे ऐसा लग रहा है कि मैंने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया है. जबकि मेरी कोई गलती नहीं है, लेकिन फिर भी मुझे टारगेट किया जा रहा है. तो मैं पहले यहां पूरे महाकुंभ में रहने आई थी, लेकिन अब मैं यहां नहीं रह पाऊंगी. 24 घंटे इस रूम को देखना पड़ रहा है, इससे तो अच्छा है कि मैं यहां से चली जाऊं.’ किन लोगों ने जताई आपत्ति दरअसल, जब हर्षा का रथ पर बैठने वाला वीडियो सामने आया तो कई संत से लेकर अन्य लोग उन्हें ट्रोल करने लगे. हर्षा आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री कैलाशनंदगिरी जी महाराज की शिष्या हैं. वह महाकुंभ में निरंजनी अखाड़े से जुड़ी हैं. सबसे पहले ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि महाकुंभ में इस तरह की परंपरा शुरू करना पूरी तरह गलत है. यह विकृत मानसिकता का नतीजा है. महाकुंभ में चेहरे की सुंदरता नहीं बल्कि हृदय की सुंदरता देख जाना चाहिए था. उन्होंने कहा कि जो अभी यह नहीं तय कर पाया है कि संन्यास की दीक्षा लेनी है या शादी करनी है, उसे संत महात्माओं के शाही रथ पर जगह दिया जाना उचित नहीं है. श्रद्धालु के तौर पर शामिल होती तब भी ठीक था, लेकिन भगवा कपड़े में शाही रथ पर बिठाना पूरी तरह गलत है. इसके बाद शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप महाराज ने कहा कि यह बिल्कुल भी उचित नहीं है. इससे समाज में गलत संदेश फैलता है. काली सेना के प्रमुख स्वामी आनंद स्वरूप ने उनके आचरण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कुंभ का आयोजन ज्ञान और आध्यात्मिकता फैलाने के लिए किया जाता है. कहा- इसे मॉडलों द्वारा प्रचार कार्यक्रम के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. महंत रवींद्र पुरी ने किया बचाव हालांकि, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने इस मुद्दे को ज्यादा तवज्जो न देते हुए कहा कि भगवा कपड़े पहनना कोई अपराध नहीं है और युवती ने निरंजनी अखाड़े के एक महामंडलेश्वर से मंत्र दीक्षा ली थी. उन्होंने हर्षा का बचाव किया और कहा- रिछारिया को लेकर कहा कि वह निरंजनी अखाड़े के एक महामंडलेश्वर से दीक्षा लेने आई थीं. वह एक मॉडल हैं और सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं. उन्होंने रामनामी कपड़ा पहना हुआ था. हमारी परंपरा है कि जब भी सनातन का कोई कार्यक्रम होता है, तो हमारे युवा भगवा कपड़े पहनते हैं. यह कोई अपराध नहीं है. ‘गुरु की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं’ हर्षा को सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर जमकर ट्रोल किया जाने लगा. जिसके बाद हर्षा ने आखिरकार कुंभ से वापस जाने का ऐलान कर दिया है. उन्होंने कहा कि मैं अगले 3 दिन में महाकुंभ से उत्तराखंड जा रही हूं. क्योंकि बात अब मेरे गुरु तक आ गई है. मैं अपने गुरु की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकती हूं. मैं एक्टर और एंकर रह चुकी हूं, लेकिन मुझे मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है, जो गलत है.

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Mahakumbh and Kumbh mela:महाकुंभ और कुंभ मेला: जानें प्रमुख अंतर

Mahakumbh and Kumbh mela महाकुंभ बनाम कुंभ: हालांकि दोनों त्योहारों का गहरा धार्मिक महत्व और खगोलीय संबंध है, लेकिन कुछ प्रमुख अंतर हैं जो उन्हें अलग करते हैं भारत की आध्यात्मिक विरासत ऐसे अनुष्ठानों और उत्सवों में डूबी हुई है, जिनमें भक्ति, संस्कृति और समुदाय का मिश्रण है। इसकी सबसे प्रमुख परंपराओं में कुंभ मेला और महाकुंभ मेला शामिल हैं, ये दो आयोजन दुनिया भर से लाखों तीर्थयात्रियों को आकर्षित करते हैं। जबकि दोनों त्योहारों का गहरा धार्मिक महत्व और खगोलीय संबंध है, लेकिन कुछ मुख्य अंतर उन्हें अलग करते हैं। What is Kumbh Mela कुंभ मेला क्या है? के जे सोमैया धर्म अध्ययन संस्थान की एसोसिएट प्रोफेसर और प्रभारी निदेशक डॉ पल्लवी जांभले के अनुसार, कुंभ मेला हर चार साल में मनाया जाने वाला एक सामूहिक हिंदू तीर्थयात्रा है, जो भारत में चार पवित्र स्थानों के बीच घूमता है: प्रयागराज Prayagraj (इलाहाबाद): गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती नदियों का संगम।हरिद्वार Haridwar : गंगा के किनारे।उज्जैन Ujjain : शिप्रा नदी के किनारे।नासिक Nashik : गोदावरी नदी पर।मेले का समय बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा के विशिष्ट ग्रहों के संरेखण द्वारा निर्धारित होता है। इस अवधि के दौरान, यह माना जाता है कि इन स्थानों पर नदियाँ दिव्य अमृत से भर जाती हैं, जिससे तीर्थयात्रियों को अपने पापों को धोने और मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने का मौका मिलता है। What is Kumbh Mela महाकुंभ मेला क्या है? महाकुंभ मेला MahaKumbh Mela, जिसे अक्सर “भव्य कुंभ” कहा जाता है, प्रयागराज में नियमित कुंभ के समान ही हर 12 साल में होता है। 2025 में होने वाला महाकुंभ विशेष रूप से खास है क्योंकि यह 144 वर्षों में एक बार होने वाले खगोलीय विन्यासों के साथ संरेखित होता है, जो इसे भक्तों और आध्यात्मिक साधकों के लिए एक असाधारण आयोजन बनाता है। प्रोफेसर जांभले ने कहा कि यह अनूठा संगम आगामी महाकुंभ को असाधारण रूप से शक्तिशाली, शुभ और पवित्र बनाता है। नियमित कुंभ मेले के विपरीत, महाकुंभ भक्तों, साधुओं और आध्यात्मिक नेताओं की एक बड़ी भीड़ को आकर्षित करता है, जो इसे पृथ्वी पर सबसे बड़ी मानव सभाओं में से एक बनाता है। Mahakumbh v/s Kumbh mela:कुंभ या महाकुंभ का मुख्य अनुष्ठान स्नान (अनुष्ठान स्नान) है, जो शुद्धिकरण या शुद्धिकरण का प्रतीक है। प्रोफेसर जम्भाले के अनुसार, यह कार्य मुक्ति प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना जाता है। महाकुंभ, विशेष रूप से, ईश्वर के साथ एक ब्रह्मांडीय-स्तरीय संबंध प्रदान करने वाला माना जाता है, जो इसे आध्यात्मिक नवीनीकरण के लिए एक असाधारण अवसर बनाता है। ये आयोजन इतने खास क्यों हैं?खगोलीय संरेखणदोनों त्यौहार “समुद्र मंथन” (समुद्र मंथन) की पौराणिक कहानी पर आधारित हैं, जहाँ देवताओं और राक्षसों ने अमृत कलश (कुंभ) के लिए युद्ध किया था। माना जाता है कि इस अमृत की बूँदें चार पवित्र स्थलों पर गिरी थीं, जो उनकी पवित्रता को दर्शाती हैं।आध्यात्मिक शुद्धिमेले के दौरान नदियों में स्नान करना एक आध्यात्मिक कार्य माना जाता है जो आत्मा को शुद्ध करता है, नकारात्मक कर्मों को दूर करता है और मुक्ति का मार्ग खोलता है।वैश्विक मान्यताकुंभ और महाकुंभ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं; वे सांस्कृतिक और सामाजिक घटनाएँ हैं जो भारतीय विरासत की जीवंतता को प्रदर्शित करती हैं। यूनेस्को ने कुंभ मेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी है।

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Maha Kumbh Mela 2025 :महाकुंभ मेला 2025 अखाड़े कितने महत्वपूर्ण हैं और वे अमृत स्नान कैसे कराते हैं? जानिए

Maha Kumbh Mela 2025:अमृत ​​स्नान के दौरान अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर का रथ समूह का नेतृत्व करता है। उनके पीछे महामंडलेश्वर (दशनामी संप्रदाय में हिंदू साधुओं को दी जाने वाली उपाधि), श्री महंत, महंत, कोतवाल और थानापति तथा अखाड़ों के अन्य पदाधिकारी अपने पद और स्थिति के अनुसार क्रम से चलते हैं। महाकुंभ 2025 में मंगलवार को मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर पहला ‘अमृत स्नान‘ हुआ, जब महानिर्वाणी पंचवटी के साधुओं ने त्रिवेणी संगम – गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम पर पवित्र अमृत स्नान किया। कुल 13 वैद्यवै हैं, जिनमें तीन वैयक्तिक नाम शामिल हैं- संती (शैव), बैरागी (कृष्णव) और नाथ। शैव अखाड़ों में शामिल हैं – महानिर्वाणी, अटल, निरंजनी, आनंद, भैरव, आह्वान और अग्नि; वैरागी अखाड़े – निर्मोही, दिगंबर अनी और निर्वाणी अनी, दो उदासीन अखाड़े (नया और बड़ा) और निर्मला अखाड़ा। आइए अखाड़ों, उनकी संगठनात्मक संरचना, ऐतिहासिक महत्व और कुंभ मेले के दौरान प्रमुख भूमिकाओं को समझें। अखाड़े कुंभ मेले के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ वे आवश्यक अनुष्ठान करते हैं और ‘अमृत स्नान’ जैसे पवित्र आयोजन में योगदान देते हैं। सदियों से, अखाड़ों ने हिंदू परंपराओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और मंदिरों और पवित्र स्थलों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 8वीं शताब्दी से, विभिन्न ‘अखाड़ों’ के साधु (भिक्षु) अमृत स्नान करने के लिए प्रयागराज में एकत्रित होते थे। 9वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक, यह अखाड़े ही थे, जिन्होंने महीने भर चलने वाले कुंभ उत्सव का आयोजन किया और अमृत स्नान आदेश तय किया, जो बाद में विवाद का विषय बन गया। लेकिन अब अमृत स्नान आदेश को संस्थागत बना दिया गया है, हालाँकि अखाड़ों का अभी भी ऊपरी हाथ है। अखाड़ों की संगठनात्मक संरचनाअखाड़ों का नेतृत्व आम तौर पर एक महंत या आचार्य करते हैं, जो आध्यात्मिक और प्रशासनिक दोनों जिम्मेदारियों की देखरेख करते हैं। एक अखाड़े के भीतर, महामंडलेश्वर (उच्च श्रेणी के भिक्षु) सहित विभिन्न भूमिकाएँ और पद होते हैं, जिनके पास महत्वपूर्ण प्रभाव और अधिकार होते हैं। इन अखाड़ों में प्रशिक्षण कठोर होता है, जिसमें आध्यात्मिक अभ्यास, ध्यान, शास्त्रों का अध्ययन और पारंपरिक भारतीय कुश्ती और मार्शल आर्ट जैसे शारीरिक व्यायाम शामिल होते हैं। इन संस्थानों में अपनाए जाने वाले अनुशासन से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की महारत हासिल होती है, जिसका उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना होता है। हिंदू धर्म में अखाड़ों का महत्व Maha Kumbh Mela:अखाड़ों का हिंदू धर्म में कई कारणों से बहुत महत्व है परंपरा का संरक्षण: अखाड़े प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं, अनुष्ठानों और शिक्षाओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे पवित्र ग्रंथों, भजनों और प्रथाओं के ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बनाए रखते हैं और प्रसारित करते हैं। आध्यात्मिक प्रशिक्षण: ये संस्थान आध्यात्मिक साधकों को गहन प्रशिक्षण से गुजरने, अनुशासन, भक्ति और आत्म-साक्षात्कार को बढ़ावा देने के लिए एक संरचित वातावरण प्रदान करते हैं। सदस्यों द्वारा अपनाई गई कठोर जीवनशैली का उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना है। सांस्कृतिक संरक्षक: अखाड़े प्रमुख धार्मिक आयोजनों, त्योहारों और तीर्थयात्राओं में भाग लेकर हिंदू समाज के सांस्कृतिक ताने-बाने में योगदान देते हैं। कुंभ मेले जैसे आयोजनों में उनकी उपस्थिति सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नेताओं के रूप में उनकी भूमिका को रेखांकित करती है। मार्शल विरासत: ऐतिहासिक रूप से, अखाड़े मार्शल प्रशिक्षण से जुड़े रहे हैं, जो अपने सदस्यों को आस्था की रक्षा करने और पवित्र स्थलों की रक्षा करने के लिए तैयार करते हैं। यह मार्शल विरासत अभी भी कुछ अखाड़ों में स्पष्ट है, विशेष रूप से नागा साधुओं में – जो अपने योद्धा जैसी उपस्थिति के लिए जाने जाते हैं। सामाजिक प्रभाव: अखाड़े सामाजिक और धर्मार्थ गतिविधियों में भी संलग्न हैं, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और ज़रूरतमंदों को सहायता प्रदान करते हैं। महत्वपूर्ण अखाड़े और महाकुंभ में उनकी भूमिका ‘अमृत स्नान’ में 13 अखाड़े (हिंदू मठवासी आदेश) भाग लेते हैं, जिनमें से प्रत्येक अपने अनुष्ठान स्नान के लिए एक पारंपरिक क्रम और निर्दिष्ट समय का पालन करता है। यह आयोजन सावधानीपूर्वक आयोजित किया जाता है, जिसमें प्रशासन स्थापित रीति-रिवाजों का सुचारू रूप से पालन सुनिश्चित करने के लिए कार्यक्रमों का समन्वय करता है। महाकुंभ में कुछ प्रमुख अखाड़ों और उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को नीचे सूचीबद्ध किया गया है। जूना अखाड़ा: यह 13 अखाड़ों में सबसे बड़ा है। जूना अखाड़ा आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शैव धर्म के दशनामी संप्रदाय का पालन करता है, और वे भगवान दत्तात्रेय की पूजा करते हैं। किन्नर अखाड़ा (ट्रांसजेंडर अखाड़ा) भी जूना अखाड़े का हिस्सा है। जूना अखाड़े के अनुयायी मुख्य रूप से शैव हैं, जो भगवान शिव को समर्पित हैं, और उनमें कई नागा शामिल हैं। जूना अखाड़ा कुंभ Maha Kumbh मेले में एक प्रमुख भूमिका निभाता है, जहाँ इसके साधु (पवित्र पुरुष) अपनी तपस्या और तप के लिए जाने जाते हैं। अखाड़े में आध्यात्मिक और मार्शल प्रशिक्षण की समृद्ध परंपरा है, जो अपने सदस्यों को आस्था की रक्षा करने और सनातन धर्म के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए तैयार करती है। इसके प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद हैं। निरंजनी अखाड़ा: दूसरे सबसे बड़े अखाड़े के रूप में, श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा की स्थापना 904 ईस्वी में गुजरात में हुई थी। इस संस्था के भक्त मुख्य रूप से कार्तिकेय की पूजा करते हैं। यह कई उच्च शिक्षित सदस्यों का घर है, जिनमें डॉक्टरेट और स्नातकोत्तर डिग्री वाले व्यक्ति शामिल हैं, जो आध्यात्मिक और शैक्षणिक दोनों तरह की गतिविधियों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। इसके प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर कैलाशानंदजी महाराज हैं। महानिर्वाणी अखाड़ा (प्रयागराज): श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े में, मुख्य देवता ऋषि कपिलमुनि हैं, जो अपने गहन ज्ञान और आध्यात्मिक शिक्षाओं के लिए पूजनीय हैं। भक्त भैरव प्रकाश भला और सूर्य प्रकाश भला जैसे पवित्र प्रतीकों की भी पूजा करते हैं, जो दिव्य सुरक्षा और ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस अखाड़े की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत और प्रतीकात्मक प्रथाएँ धार्मिक समुदाय के भीतर इसकी प्रतिष्ठित स्थिति में योगदान करती हैं। इसके प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद हैं। किन्नर अखाड़ा: ट्रांसजेंडर अखाड़ा एक अनूठा और समावेशी आध्यात्मिक समुदाय है जो कुंभ मेले की पवित्र सभाओं और अनुष्ठानों में भाग लेता है। जबकि पारंपरिक अखाड़ों में मुख्य रूप से पुरुष होते हैं, किन्नर अखाड़ा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी भक्ति और आध्यात्मिकता व्यक्त करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।

Maha Kumbh Mela 2025 :महाकुंभ मेला 2025 अखाड़े कितने महत्वपूर्ण हैं और वे अमृत स्नान कैसे कराते हैं? जानिए Read More »

Mahakumbh 2025 Shahi Snan Date: देश का सबसे बड़ा धार्मिक मेला महाकुंभ आज से शुरू, जानें स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और सही नियम

Mahakumbh 2025 Shahi Snan Shubh Muhurat: प्रयागराज में महाकुंभ की शुरुआत के साथ पहला शाही स्नान किया जाएगा. इस मेले में देश विदेश से भारी संख्या में लोग शमिल होने वाले हैं. आइए जानते हैं महाकुंभ के पहले शाही स्नान के शुभ मुहूर्त और नियम के बारे में. Mahakumbh 2025: प्रयागराज में आज से महाकुंभ की शुरुआत हो गई है. हिंदू धर्म में प्रयागराज में आयोजित होने वाले महाकुंभ का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण है. यहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों का संगम होता है, जिसे ‘त्रिवेणी संगम’ कहा जाता है. महाकुंभ का आयोजन भारत में चार जगहों प्रयागराज, नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में होता है. इन पवित्र स्थलों पर होने वाले महापर्व का साधु-संतों और श्रद्धालुओं को बेसब्री से इंतजार होता है. कहते हैं कि महाकुंभ में त्रिवेणी घाट पर स्नान करने से व्यक्ति को जीवन के समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है, जिससे आत्मा और शरीर दोनों ही शुद्ध हो जाता है. इसके साथ ही बता दें कि हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शाही स्नान का नाम बदलकर अमृत स्नान और नगर प्रवेश कर दिया है. पहले शाही स्नान का शुभ मुहूर्त| Mahakumbh 2025 Shahi Snan Shubh muhurat महाकुंभ का पहला स्नान पौष पूर्णिमा तिथि को होगा. वैदिक पंचांग के अनुसार, पौष माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत सोमवार, 13 जनवरी को सुबह 5 बजकर 3 मिनट पर होगी. वहीं तिथि का समापन 14 जनवरी को रात 3 बजकर 56 मिनट पर होगा. वहीं शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं- ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 5 बजकर 27 मिनट से लेकर 6 बजकर 21 मिनट तक रहेगा. विजय मुहूर्त- दोपहर 2 बजकर 15 मिनट से लेकर 2 बजकर 57 मिनट तक रहेगा गोधूलि मुहूर्त- शाम 5 बजकर 42 से लेकर 6 बजकर 09 तक रहेगा निशिता मुहूर्त- रात 12 बजकर 03 से लेकर 12 बजकर 57 तक रहेगा शाही स्नान की अन्य तिथियां |Mahakumbh 2025 Shahi Snan Dates प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ मे आज पहला शाही स्नान होगा. इसके बाद अन्य शाही स्नान की तिथियां कुछ इस प्रकार हैं- शाही स्नान का नियम |Mahakumbh 2025 Shahi Snan Niyam महाकुंभ में शाही स्नान के कुछ खास नियमों का पालन किया जाता है. महाकुंभ में सबसे पहले नागा साधु स्नान करते हैं. नागा साधुओं को स्नान करने की प्राथमिकता सदियों से चली आ रही है. इसके पीछे एक धार्मिक मान्यता है. इसके अलावा गृहस्थ जीवन जीने वाले लोगों के लिए महाकुंभ में स्नान के नियम कुछ अलग हैं. गृहस्थ लोगों नागा साधुओं बाद ही संगम में स्नान करना चाहिए. स्नान करते समय 5 डुबकी जरूर लगाएं, तभी स्नान पूरा माना जाता है. स्नान के समय साबुन या शैंपू का इस्तेमाल न करें. क्योंकि इसे पवित्र जल को अशुद्ध करने वाला माना जाता है. यहां जरूर करें दर्शन महाकुंभ में शाही स्नान-दान के बाद बड़े हनुमान और नागवासुकि का दर्शन जरूर करना चाहिए. मान्यता है कि शाही स्नान के बाद इन दोनों में से किसी एक मंदिर के दर्शन करने से महाकुंभ की धार्मिक यात्रा अधूरी मानी जाती है. महाकुंभ पर 144 साल बनेगा ये शुभ संयोग इस बार का महाकुंभ बहुत खास है क्योंकि ज्योतिष की मानें तो 144 साल बाद ऐसा संयोग बन रहा है। समुद्र मंथन के समय सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति की जो स्थिति थी, वही इस बार भी बन रही है। इसके साथ ही इस बार रवि योग और भद्रावास योग भी बन रहे हैं। इन योगों में पूजा-पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है। Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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साध्वी कैसे बनती हैं? – वेदों के प्रमाण सहित विस्तृत जानकारी

साध्वी बनने का अर्थ है अपने जीवन को धर्म, तपस्या और अध्यात्म के मार्ग पर समर्पित करना। भारतीय संस्कृति और वेदों में साध्वी बनने की प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है, जिसमें संकल्प, दीक्षा, ब्रह्मचर्य पालन और संन्यास ग्रहण जैसी आवश्यक विधियाँ शामिल हैं। आइए, इस विषय पर विस्तार से चर्चा करें। 1. साध्वी बनने का संकल्प (Sankalp) साध्वी बनने के लिए सबसे पहले संकल्प लिया जाता है। यह संकल्प एक दृढ़ निश्चय होता है कि व्यक्ति अपने जीवन को तपस्या और सेवा में समर्पित करेगा। वेदिक प्रमाण: यजुर्वेद 40.1 में उल्लेख है – “ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।” इसका अर्थ है कि पूरे जगत में ईश्वर का वास है, और त्याग का मार्ग अपनाकर ईश्वर की सेवा में जीवन समर्पित करना चाहिए। 2. दीक्षा (Diksha) दीक्षा का अर्थ है गुरु द्वारा दिए गए धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन को स्वीकार करना। साध्वी बनने के लिए दीक्षा अनिवार्य है, जिसमें गुरु व्यक्ति को साध्वी जीवन के नियम और अनुशासन सिखाते हैं। वेदिक प्रमाण: तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है, “शिक्षा और दीक्षा के द्वारा ही व्यक्ति अपने जीवन का उद्देश्य प्राप्त करता है।” यह प्रक्रिया साध्वी बनने के मार्ग में महत्वपूर्ण होती है। 3. ब्रह्मचर्य पालन (Brahmacharya Palan) साध्वी बनने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक होता है। इसका मतलब है कि व्यक्ति शारीरिक और मानसिक शुद्धता का पालन करता है, जिसमें सांसारिक इच्छाओं से दूर रहना शामिल है। वेदिक प्रमाण: मनुस्मृति 6.1-2 में उल्लेख है, “ब्रह्मचर्येण तपसा…” इसका अर्थ है कि ब्रह्मचर्य और तपस्या के माध्यम से ही व्यक्ति साध्वी जीवन को प्राप्त करता है। 4. संन्यास ग्रहण (Sannyas Grahan) साध्वी बनने की अंतिम और महत्वपूर्ण प्रक्रिया है संन्यास ग्रहण करना। इसमें व्यक्ति संसार के बंधनों से मुक्त होकर पूरी तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है। वेदिक प्रमाण: भगवद गीता 6.1 में कहा गया है, “अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः”। इसका अर्थ है कि जो बिना फल की इच्छा के कर्म करता है, वही सच्चा सन्यासी है। 5. धार्मिक अनुष्ठान और सेवा (Dharmik Anushthan aur Seva) साध्वी बनने के बाद व्यक्ति को धार्मिक अनुष्ठानों और समाज सेवा में संलग्न रहना होता है। यह सेवा समाज के कल्याण के लिए होती है और इसके माध्यम से व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है। वेदिक प्रमाण: ऋग्वेद 10.117.6 में कहा गया है, “न स धनं विन्दते यस्त्यजि: सन्”। इसका अर्थ है कि जो दूसरों की सेवा करता है, वही सच्चा धन प्राप्त करता है। निष्कर्ष साध्वी बनने की प्रक्रिया एक गहन तपस्या और समर्पण का कार्य है। वेदों में बताए गए मार्ग का अनुसरण कर व्यक्ति अपने जीवन को धर्म, तपस्या और सेवा के माध्यम से सार्थक बना सकता है। यह मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन इसका आध्यात्मिक लाभ अनंत है। यदि आप साध्वी बनने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहते हैं, तो इन वेदिक सिद्धांतों और प्रक्रियाओं का पालन अवश्य करें।

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मकर संक्रांति पर पहला स्नान… कौन अखाड़ा पहले और कौन आखिर में लगाएगा डुबकी, टाइमिंग जानिए

Mahakumbh Amrit Snan Akhada Snan Timing: महाकुंभ 2025 का आगाज पौष पूर्णिमा पर शाही स्नान के साथ हो गया। इस महाकुंभ में छह शाही स्नान हैं। इसमें से तीन अमृत स्नान होंगे। पहला अमृत स्नान मकर संक्रांति के मौके पर मंगलवार 14 जनवरी को होगा। इसके अलावा मौनी अमावस्या पर 29 जनवरी और बसंत पंचमी पर 3 फरवरी अन्य दो अमृत स्नान होंगे। प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज prayagraj में भक्तों का सैलाब संगम तट पर उमड़ पड़ा है। पौष पूर्णिमा के मौके पर पहला शाही स्नान पर्व का आयोजन हुआ। सुबह से लोगों की भीड़ संगम तट पर उमड़ पड़ी। एक करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने पहले शाही स्नान के दौरान संगम में डुबकी लगाई। पौष पूर्णिमा के साथ ही ही संगम तट पर 45 दिनों के कल्पवास की शुरुआत हो गई है। इसको लेकर देश-दुनिया से लोग संगम नगरी पहुंचे हैं। वहीं, सभी 13 अखाड़ों का डेरा संगम तट पर जम गया है। महाकुंभ के सबसे बड़े आकर्षण अखाड़ों के अमृत स्नान का कार्यक्रम मंगलवार सुबह से होगा। प्रयागराज मेला प्राधिकरण की ओर से अखाड़ों के अमृत स्नान का समय और क्रम जारी कर दिया है। अमृत स्नान पर्व पर सबसे पहले महानिर्वाणी और अटल अखाड़े के संत-महंत और महामंडलेश्वर अमृत स्नान करेंगे। परंपरागत तरीके से सबसे पहले सातों संन्यासी, इसके बाद तीनों वैरागी और सबसे अंत में तीनों उदासीन अखाड़ों का अमृत स्नान होगा। रविवार को इस संबंध में अखाड़ों से चर्चा और विमर्श के बाद अमृत स्नान पर्व की समय सीमा का निर्धारण किया गया है। अमृत स्नान के लिए अखाड़ों के संत सुबह 5:15 बजे से अपने अखाड़ों से निकलना शुरू होंगे। 30 मिनट से एक घंटे का समय मेला प्राधिकरण की ओर से अमृत स्नान के दौरान अखाड़ों को 30 मिनट से एक घंटे का समय आवंटित किया गया है। अखाड़ों के स्नान के दौरान सड़कों को खाली रखा जाएगा। इसको लेकर प्रशासनिक तैयारियां पहले से पूरी कराई जा चुकी हैं। सबसे पहले श्री पंचायत अखाड़ा महानिर्वाणी एवं श्री शंभू पंचायती अटल अखाड़ा के संत स्नान के लिए निकलेंगे। सबसे आखिर में निर्मल अखाड़े के संत पुण्य संगम की डुबकी लगाएंगे। अखाड़ों के अमृत स्नान की समय सारिणी अखाड़ों का नाम शिविर से प्रस्थान घाट पर आगमन स्नान का समय घाट से प्रस्थान श्री पंचायत अखाड़ा महानिर्वाणी एवंश्री शंभू पंचायती अटल अखाड़ा 5:15 बजे 6:15 बजे 40 मिनट 6:55 बजे श्री तपोनिधि पंचायती श्री निरंजनी अखाड़ाएवं श्री पंचायती अखाड़ा आनंद 6:05 बजे 7:05 बजे 40 मिनट 7:45 बजे श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा, श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ाएवं श्री पंच अग्नि अखाड़ा 7:00 बजे 8:00 बजे 40 मिनट 8:40 बजे अखिल भारतीय श्री पंच निर्मोही अखाड़ा 9:40 बजे 10:40 बजे 30 मिनट 11:10 बजे अखिल भारतीय श्री पंच दिगंबर अनी अखाड़ा 10:20 बजे 11:20 बजे 50 मिनट 12:10 बजे अखिल भारतीय श्री पंच निर्वाणी अखाड़ा 11:20 बजे 12:20 बजे 30 मिनट 12:50 बजे श्री पंचायती नया उदासीन अखाड़ा 12:15 बजे 13:15 बजे 55 मिनट 14:10 बजे श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन निर्वाण 13:20 बजे 14:20 बजे 60 मिनट 15:20बजे श्री पंचायत निर्मल अखाड़ा 14:40 बजे 15:40 बजे 40 मिनट 16:20 बजे अखाड़ों के संत सुबह 5.15 बजे से बैंडबाजा, डीजे के साथ रथों पर सवार होकर स्नान के लिए निकलेंगे। अमृत स्नान के लिए निकलने वाली यात्रा में संतों के शिष्य और अनुयायी चंवर, छत्र, दंड लिए पुष्पवर्षा करते हुए साथ-साथ चलेंगे। कुंभ मेलाधिकारी विजय किरन आनंद ने अखाड़ों से अनुरोध किया है कि उनके साथ स्नान के लिए जाने वाले खालसों, महामंडलेश्वरों, आचार्य महामंडलेश्वर की संख्या मेला प्रशासन को भेज गई सूची के अनुसार ही सीमित रखें। अखाड़ों के लिए रूट मैप जारी अमृत स्नान के साथ जाने वाले रथों एवं वाहनों की संख्या मेला पुलिस की ओर से जारी पास के अनुसार रखी जाएगी। त्रिवेणी मार्ग सेक्टर-20 से पीपा पुल संख्या-6 त्रिवेणी दक्षिणी और पीपा पुल संख्या-7 त्रिवेणी मध्य के जरिए गंगा पार कर संगम क्षेत्र (सेक्टर-3) में अमृत स्नान के लिए अखाड़ों का आगमन होगा। त्रिवेणी मार्ग और अखाड़ा मार्ग क्रॉसिंग से बाएं मुड़कर निर्धारित संगम घाट पर स्नान की व्यवस्था की गई है। संगम क्षेत्र में अखाड़ों के वाहनों के लिए पार्किंग की व्यवस्था भी की गई है। संगम में स्नान के बाद अखाड़ों के संत और अनुयायी सेक्टर तीन अखाड़ा वापसी मार्ग से दाहिने मुड़कर पीपा पुल संख्या-3 महावीर दक्षिण और पीपा पुल संख्या-4 महावीर उत्तरी से गंगा पार कर सेक्टर-20 में प्रवेश करेंगे। पीपा पुल से महावीर मार्ग, महावीर संगम लोवर और उसके बाद महावीर संगम लोवर मार्ग क्रॉसिंग से बाएं (उत्तर मुड़कर) अखाड़ा वापसी मार्ग से होकर अपने-अपने शिविर में जाएंगे। संन्यासी अखाड़े काली मार्ग से होकर अपने शिविर में प्रवेश करेंगे।

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