BLOG

Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति आज, जानें पुण्य और महापुण्य काल का मुहूर्त और महत्व

Makar Sankranti 2025: मकर संक्राति पर सूर्यदेव दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं जिस कारण से इसे उत्तरायण पर्व भी कहते हैं। इसके अलावा मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति पर गंगा स्नान, सूर्यदेव की विशेष पूजा का विशेष महत्व होता है। Makar Sankranti 2025: आज मकर संक्रांति का पावन पर्व है। तीर्थराज प्रयागराज में मकर संक्रांति पर साधु-संत और गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग गंगा, यमुना, त्रिवेणी, नर्मदा और शिप्रा जैसी अन्य पवित्र नदियों में स्नान करके पुण्य लाभ की प्राप्ति करते हैं। हिंदू धर्म में मकर संक्रांति के त्योहार का विशेष महत्व होता है। प्रत्येक साल यह त्योहार पौष महीने में मनाया जाता है। लेकिन इस बार मकर संक्रांति पौष माह के खत्म होने के बाद मनाई जा रही है। हिंदू पंचांग के अनुसार इस सूर्य धनु राशि की अपनी यात्रा को विराम देकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। जिसे मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्राति पर सूर्यदेव दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं जिस कारण से इसे उत्तरायण पर्व भी कहते हैं। इसके अलावा मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति पर गंगा स्नान, सूर्यदेव की विशेष पूजा का विशेष महत्व होता है। इसके अलावा इस दिन दान करने का विशेष महत्व होता है। आइए जानते हैं मकर संक्रांति का महत्व, पूजा विधि और स्नान का शुभ मुहूर्त। मकर संक्रांति शुभ मुहूर्त (Makar Sankranti 2025 Shubh Muhurat)  उदयातिथि के अनुसार, मकर संक्रांति इस बार 14 जनवरी 2025 यानी आज ही मनाई जाएगी. आज सुबह सूर्य 8 बजकर 41 मिनट मकर राशि में प्रवेश करेंगे. हिंदू पंचांग के अनुसार, मकर संक्रांति पुण्य काल का समय आज सुबह 9 बजकर 03 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 46 मिनट तक रहेगा और महापुण्य काल का समय आज सुबह 9 बजकर 03 मिनट से लेकर सुबह 10 बजकर 48 मिनट तक रहेगा. दान करना शुभ Makar Sankranti dhan karna subh मकर संक्राति के पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायण भी कहा जाता है. इस दिन गंगा स्नान, व्रत, कथा, दान और भगवान सूर्यदेव की उपासना करने का विशेष महत्व है. इस दिन किया गया दान अक्षय फलदायी होता है. शनि देव के लिए प्रकाश का दान करना भी बहुत शुभ होता है. पंजाब, यूपी, बिहार और तमिलनाडु में ये नई फसल काटने का समय होता है. इसलिए किसान इस दिन को आभार दिवस के रूप में भी मनाते हैं. इस दिन तिल और गुड़ की बनी मिठाई बांटी जाती है. इसके अलावा मकर संक्रांति पर कहीं-कहीं पतंग उड़ाने की भी परंपरा है. मकर संक्रांति का महत्व  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं. चूंकि शनि मकर व कुंभ राशि का स्वामी है. लिहाजा यह पर्व पिता-पुत्र के अनोखे मिलन से भी जुड़ा है. एक अन्य कथा के अनुसार असुरों पर भगवान विष्णु की विजय के तौर पर भी मकर संक्रांति मनाई जाती है. बताया जाता है कि मकर संक्रांति के दिन ही भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का संहार कर उनके सिरों को काटकर मंदरा पर्वत पर गाड़ दिया था. तभी से भगवान विष्णु की इस जीत को मकर संक्रांति पर्व के तौर पर मनाया जाने लगा मकर संक्रांति पूजा विधि Makar Sankranti puja vidhi मकर संक्रांति का पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इस त्योहार के देशभर के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। मकर संक्रांति पर सूर्यदेव की विधि-विधान के साथ पूजा करने का महत्व होता है। मकर संक्रांति के दिन सुबह जल्दी उठकर घर के साफ-सफाई करने के बाद घर के पास किसी पवित्र नदी में स्नान करने जाएं और वहां पर स्नान करने के बाद सूर्य देव अर्घ्य दें। फिर सूर्यदेव से जुड़े मंत्रों का जाप करें और दान-दक्षिणा करें।   मकर संक्रांति पर प्रयागराज के त्रिवेणी में स्नान का महत्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश काल के समय जब सभी देवों के दिन का शुभारंभ होता है तो तीनों लोकों में प्रतिष्ठित गंगा, यमुना और सरस्वती के पावन संगमतट ‘त्रिवेणी’ पर साठ हजार तीर्थ और साठ करोड़ नदियाँ, सभी देवी-देवता, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर आदि तीर्थराज प्रयाग’ में एकत्रित होकर गंगा-यमुना-सरस्वती के पावन संगम तट पर स्नान, जप-तप और दान-पुण्य कर अपना जीवन धन्य करते हैं। तभी इसे तीर्थों का कुंभ भी कहा जाता है। 

Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति आज, जानें पुण्य और महापुण्य काल का मुहूर्त और महत्व Read More »

Mahakumbh 2025: महाकुंभ में कब-कब हैं शाही स्नान? नोट कर लें सभी 6 स्नानों की डेट और शुभ मुहूर्त

Mahakumbh 2025 Shahi Snan Kab Kab Hai: महाकुंभ दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव है जिसमें शाही स्नान का विशेष महत्व है. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, महाकुंभ में शाही स्नान करने वाले मोक्ष को प्राप्त करते हैं. ऐसे में अगर आप भी महाकुंभ मेंं जाने वाले हैं, तो शाही स्नान की तिथियां और स्नान का समय जान लें. Kumbh Mela 2025: पूरे 12 वर्षों बाद महाकुंभ मेला लगता है। यह सबसे बड़ा और प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान होता है। इस साल प्रयागराज की धरती पर महाकुंभ मेले का आयोजन हो रहा है। महाकुंभ का आंरभ 13 जनवरी 2025 से होगा। महाकुंभ में त्रिवेणी में स्नान करने के लिए देश-विदेश से तीर्थयात्री आएंगे। धार्मिक मान्यता है कि महाकुंभ में गंगा स्नान करने से व्यक्ति के सभी पाप मिट जाते हैं और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। यूं तो महाकुंभ में हर दिन स्नान करने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है लेकिन कुंभ में शाही स्नान का खास महत्व होता है। शाही स्नान के दिन स्नान करने के लिए लाखों- करोड़ों की संख्या में तीर्थयात्री जुटते हैं। तो आइए जानते हैं कि शाही स्नान कब-कब किया जाएगा।  Mahakumbh 2025 Shahi Snan Date: प्रयागराज में 13 जनवरी से महाकुंभ का आयोजन होने जा रहा है. ये महाकुंभ 45 दिनों तक चलेगा. वहीं महाकुंभ की समापन 26 फरवरी को महाशिवरात्रि पर होगा. इस महाकुंभ में साधु संतों के साथ-साथ बड़ी तादाद में श्रद्धालु त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाएंगे. इस महाकुंभ में कुल 6 शाही स्नान की तिथियां पड़ रही हैं. तो आइए पंचांग के अनुसार जानते हैं कि 6 शाही स्नान कब-कब हैं. साथ ही शाही स्नान का शुभ मुहूर्त क्या हैं? पहला शाही स्नान महाकुंभ में पहला शाही स्नान पौष पूर्णिमा पर होगा. पौष पूर्णिमा 13 जनवरी को पड़ रही है. इस दिन स्नान का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 27 मिनट पर शुरू होगा. ये मुहूर्त सुबह 6 बजकर 21 मिनट तक रहेगा. मकर संक्रांति का है स्नान महाकुंभ में दूसरा शाही स्नान मकर संक्रांति पर किया जाएगा. इस दिन स्नान का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 27 मिनट पर शुरू होगा. ये मुहूर्त सुबह 6 बजकर 21 मिनट तक रहेगा. इस दिन स्नान के साथ साथ दान करने की भी मान्यता है. हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन स्नान के बाद दान करने से पुण्यकारी फल प्राप्त होते हैं. मौनी अमावस्या का शाही स्नान महाकुंभ में तीसरा शाही स्नान मौनी अमावस्या का होगा. मौनी अमावस्या का स्नान सबसे बड़ा शाही स्नान होता है. ये शाही स्नान 29 जनवरी को किया जाएगा. मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज समेत अन्य तीर्थ स्थलों पर स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस दिन स्नान का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 25 मिनट पर शुरू होगा. सुबह 6 बजकर 18 मिनट पर ये मुहूर्त समाप्त हो जाएगा. बसंत पंचमी का शाही स्नान महाकुंभ में चौथा शाही स्नान बसंत पंचमी के दिन किया जाएगा. ये शाही स्नान 3 फरवरी को होगा. इस स्नान का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 23 पर शुरू होगा ये मुहूर्त 6 बजकर 16 मिनट तक रहेगा. माघी पूर्णिमा का शाही स्नान महाकुंभ का पांचवा शाही माघी पूर्णिमा पर किया जाएगा. ये शाही 12 फरवरी को होगा. सामान्य दिनों में भी माघी पूर्णिमा का स्नान महत्वपूर्ण होता है. इस दिन स्नान का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 19 मिनट पर शुरू होगा. ये मुहूर्त सुबह 6 बजकर 10 मिनट तक रहेगा. महाशिवरात्रि का शाही स्नान महाकुंभ का अंतिम शाही स्नान महाशिवरात्रि को किया जाएगा. ये शाही स्नान 26 फरवरी को होगा. इस दिन लोग व्रत रखेंगे और महादेव की पूजा करेंगे. इस दिन महाकुंभ का समापन भी होगा. इस दिन स्नान का ब्रह्म मुहूर्त 5 बजकर 9 मिनट पर शुरू होगा. ये मुहूर्त सुबह 5 बजकर 59 मिनट पर समाप्त होगा. (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। KARMASU.IN एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

Mahakumbh 2025: महाकुंभ में कब-कब हैं शाही स्नान? नोट कर लें सभी 6 स्नानों की डेट और शुभ मुहूर्त Read More »

Makar Sankranti 2025 Daan:मकर संक्रांति पर करें ये उपाय, भगवान सूर्य का मिलेगा आशीर्वाद

Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति का पर्व पौष माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है. हालांकि, मकर संक्रांति को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों जैसे लोहड़ी, उत्तरायण, खिचड़ी, टिहरी, पोंगल आदि कई नामों से जाना जाता है. इसी दिन से खरमास खत्म होता है और शुभ व मांगलिक कार्यों जैसे शादी, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश आदि की शुरुआत होती है.  Makar Sankranti 2025: सनातन धर्म में मकर संक्रांति तिथि का विशेष महत्व है। यह पर्व सूर्य देव के मकर राशि में गोचर करने की तिथि पर मनाया जाता है। इस दिन गंगा समेत पवित्र नदियों में स्नान-ध्यान कर सूर्य देव की पूजा की जाती है। साथ ही दान-पुण्य किया जाता है। सूर्य देव की उपासना करने से साधक को करियर में मनमुताबिक सफलता मिलती है। राशि अनुसार दान Rasi ke anusar kare dhan मेष राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन मूंगफली, गुड़ और शहद का दान करें। वृषभ राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन सफेद तिल और तिल के लड्डू का दान करें। मिथुन राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन साबुत मूंग और हरी सब्जियों का दान करें। कर्क राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन दूध, चावल और उड़द दाल का दान करें। सिंह राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन गेहूं, गुड़, चिक्की आदि चीजों का दान करें। कन्या राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन गन्ने और हरे रंग के कपड़े का दान करें। तुला राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन पोहा (चूड़ा), दही और तिल का दान करें। वृश्चिक राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन मूंगफली, शहद और चिक्की का दान करें। धनु राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन पीले रंग के कपड़े और लड्डू का दान करें। मकर राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन उड़द की दाल और काले तिल का दान करें। कुंभ राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन कंबल और चमड़े के चप्पल-जूते का दान करें। मीन राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन बेसन, चने की दाल और पके केले का दान करें। Makar Sankranti per kare ye upay मकर संक्रांति पर करें ये उपाय 1. मकर संक्रांति के दिन स्नान करने के पानी में काले तिल डालें. तिल के पानी से स्नान करना बेहद ही शुभ माना जाता है. साथ ही ऐसा करने वाले व्यक्ति को रोग से मुक्ति मिलती है. 2. मकर संक्रांति के दिन स्नान के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करें और सूर्य देव को चढ़ाए जाने वाले जल में तिल अवश्य डालें. ऐसा करने से इंसान की बंद किस्मत के दरवाजे खुलते हैं. 3. इस दिन कंबल, गर्म कपड़े, घी, दाल चावल की खिचड़ी और तिल का दान करने से गलती से भी हुए पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख समृद्धि आती है.  4. पितरों की शांति के लिए इस दिन उन्हें जल देते समय उसमें तिल अवश्य डालें. ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है. मकर संक्रांति पूजन विधि Makar Sankranti pujan vidhi इस दिन पूजा करने के लिए सूर्योदय से पहले उठकर साफ सफाई कर लें. इसके बाद यदि संभव हो तो आसपास किसी पवित्र नदी में स्नान करें. यदि ऐसा करना संभव न हो तो घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान करें. यदि आप व्रत रखना चाहते हैं तो इस दिन व्रत का संकल्प लें. इस दिन पीले वस्त्र पहनें क्योंकि इस दिन पीले वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है और फिर सूर्यदेव को अर्घ्य दें. इसके बाद सूर्य चालीसा पढ़ें और आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ जरूर करें.  अंत में आरती करें और गरीबों को दान करें क्योंकि इस दिन दान करने का विशेष महत्व है. Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति पर तिल के लड्डू क्यों बनाए जाते हैं, क्या है मान्यता? Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानें इसका पौराणिक महत्व Makar Sankranti 2025:मकर संक्रांति 2025 कब है 14 या 15 जनवरी, जानें, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Makar Sankranti 2025 Daan:मकर संक्रांति पर करें ये उपाय, भगवान सूर्य का मिलेगा आशीर्वाद Read More »

Ram Mandir Pran Pratishtha: राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की पहली वर्षगांठ की कैसी है तैयारी

Ram Mandir Pran Pratishtha:22 जनवरी 2024 को अयोध्या में रामलला मंदिर में विराजमान होंगे, श्री राम भगवान की प्राण प्रतिष्ठा होगी और फिर रामलला के भव्य दर्शन होंगे। राम मंदिर की गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम की रूपरेखा काफी आगे है। प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए 7 दिनों तक अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। अयोध्या में भगवान राम का पूरे विधि-विधान के साथ स्वागत किया जाएगा। प्राण प्रतिष्ठा उत्सव के लिए प्रायश्चित पूजा, कर्मकुटी पूजा, तीर्थ पूजा, जल यात्रा, जलाधिवास और गंधाधिवास, औषधिधिवास, केसराधिवास, घृताधिवास, धन्याधिवास, कर्कराधिवास, फलधिवास और पुष्पाधिवास, मध्याधिवास और शयाधिवास आदि नियमों का पालन किया जा रहा है। First Anniversary Of Ayodhya Ram Mandir: श्री राम जन्मभूमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा (First Anniversary of The Ayodhya Ram Mandir Prana Pratishtha) की पहली वर्षगांठ धूमधाम से मनाई जाएगी. राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र (Shri Ram Janmbhoomi Teerth) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से यह जानकारी दी. पोस्ट में बताया गया है कि अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि मंदिर (Shri Ram Janmabhoomi Mandir in Ayodhya) में श्री राम लला विग्रह (Shri Ram Lalla Vigraha) के प्राण प्रतिष्ठा की पहली वर्षगांठ 11 जनवरी 2025 को मनाई जाएगी. कैसा है प्लान? राम जन्मभूमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की पहली वर्षगांठ को प्रतिष्ठा द्वादशी (Pratishtha Dwadashi) के रूप में मनाया जाएगा. इस दिन मंदिर परिसर में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. यज्ञ मंडप में शुक्ल यजुर्वेद के मंत्रों के साथ अग्निहोत्र का आयोजन सुबह 8 से 11 बजे और फिर दोपहर 2 से 5 बजे तक किया जाएगा. इसके अलावा, 6 लाख श्री राम मंत्रों का जप और राम रक्षा स्तोत्र, हनुमान चालीसा सहित अन्य धार्मिक मंत्रों का उच्चारण भी किया जाएगा. मंदिर के भूतल पर 3 से 5 बजे तक राग सेवा 6-9 बजे तक बधाई गीत प्रस्तुत किए जाएंगे. इसके बाद, यात्री सुविधा केंद्र की पहली मंजिल पर रामचरितमानस का संगीतबद्ध पाठ होगा. अंगद टीला पर राम कथा (2 से साढ़े तीन बजे तक), रामचरितमानस पर प्रवचन (साढ़े तीन से 5 बजे तक), साढ़े पांच से साढ़े सात बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम और सुबह से श्री राम के प्रसाद का वितरण होगा. श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने सभी श्रद्धालुओं और भक्तों को इस ऐतिहासिक अवसर पर भाग लेने के लिए आमंत्रित किया है. यह दिन अयोध्या और भारत के लिए एक विशेष धार्मिक महत्व का दिन होगा, जिसमें भक्तगण श्री राम के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति को व्यक्त करेंगे. 22 जनवरी 2024 को अयोध्या राम मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा हुआ था. प्राण प्रतिष्ठा के लिए 84 सेकंड का शुभ मुहूर्त निकाला गया था. 22 जनवरी को 12 बजकर 29 मिनट 8 सेकंड से 12 बजकर 30 मिनट 32 सेकंड तक प्राण प्रतिष्ठा हुआ था. प्राण प्रतिष्ठा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, आरएसएस चीफ मोहन भागवत समेत कई दिग्गज शामिल हुए थे.

Ram Mandir Pran Pratishtha: राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की पहली वर्षगांठ की कैसी है तैयारी Read More »

Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानें इसका पौराणिक महत्व

Makar Sankranti 2025:सनातन धर्म में मकर संक्रांति का त्योहार अपने आप में बहुत खास माना जाता है। इस दिन भगवान सूर्य की पूजा होती है। इस साल यह पर्व 14 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन पूजा-पाठ और दान-पुण्य जैसे शुभ कार्य करने चाहिए। वहीं इस शुभ दिन (Makar Sankranti Rituals) पर खिचड़ी खाने का भी महत्व है तो आइए इस दिन से जुड़ी कुछ बातों को जानते हैं। Makar Sankranti 2025:खिचड़ी का दान भी जरूर करें आपको बता दें, खिचड़ी बेहद ही पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन है। इसका संबंध सूर्य और शनि से है। कहते हैं, इसे (Makar Sankranti significance) खाने से परिवार में खुशहाली आती है। वहीं, मकर संक्रांति पर दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इसलिए इस शुभ दिन पर खिचड़ी खाने के साथ-साथ दान भी करनी चाहिए, क्योंकि दान इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य माना गया है। Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति का त्योहार आने वाला है. इस बार 14 जनवरी 2025 को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा. जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है, तो इसे सूर्य का संक्रमण काल कहा जाता है. इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है. देश के कई हिस्सों में इसे खिचड़ी के नाम से भी मनाया जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत के समय भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपने शरीर का त्याग किया था और उसी दिन उनका श्राद्ध और तर्पण कर्म किया गया था. मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने और दान करने का विशेष महत्व माना जाता है.  खिचड़ी का महत्व (Significance of Khichadi) ज्योतिषाचार्य ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति की खिचड़ी चावल, काली दाल, हल्दी, मटर और हरी सब्जियों का विशेष महत्व है. खिचड़ी के चावल से चंद्रमा और शुक्र की शांति का महत्व है. काली दाल से शनि, राहू और केतु का महत्व है, हल्दी से बृहस्पति का संबंध है और हरी सब्जियों से बुध का संबंध है. वहीं जब खिचड़ी पकती है तो उसकी गर्माहट का संबंध मंगल और सूर्य देव से है. इस प्रकार लगभग सभी ग्रहों का संबंध खिचड़ी से है, इसलिए मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने और दान का महत्व अधिक होता है. खिचड़ी की पौराणिक कथा  ज्योतिषाचार्य ने बताया कि खिचड़ी से जुड़ी एक बाबा गोरखनाथ की कथा है. मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने की ऐसी भी मान्यता है कि खिलजी के आक्रमण के दौरान बाबा गोरखनाथ के योगी खाना नहीं बना पाते थे और भूखे रहने की वजह से हर ढलते दिन के साथ कमजोर हो रहे थे. योगियों की बिगड़ती हालत को देखते हुए बाबा ने अपने योगियों को चावल, दाल और सब्जियों को मिलाकर पकाने की सलाह दी. यह भोजन कम समय में तैयार हो जाता था और इससे योगियों को ऊर्जा भी मिलती थी. बाबा गोरखनाथ ने इस दाल, चावल और सब्जी से बने भोजन को खिचड़ी का नाम दिया. यही कारण है कि आज भी मकर संक्रांति के पर्व पर गोरखपुर में स्थित बाबा गोरखनाथ के मंदिर के पास खिचड़ी का मेला लगता है. इस दौरान बाबा को खासतौर पर खिचड़ी को भोग लगाया जाता है.  मकर संक्रांति शुभ मुहूर्त (Makar Sankranti 2025 Shubh Muhurat) उदयातिथि के अनुसार, मकर संक्रांति इस बार 14 जनवरी 2025 को ही मनाई जाएगी. इस दिन सूर्य सुबह 8 बजकर 41 मिनट मकर राशि में प्रवेश करेंगे. हिंदू पंचांग के अनुसार, मकर संक्रांति पुण्य काल का समय सुबह 9 बजकर 03 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 46 मिनट तक रहेगा और महापुण्य काल का समय सुबह 9 बजकर 03 मिनट से लेकर सुबह 10 बजकर 48 मिनट तक रहेगा.

Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानें इसका पौराणिक महत्व Read More »

PRAYAGRAJ MAHA KUMBH MELA 2025:महाकुंभ 2025 में नहीं जा पा रहे तो चिंता की बात नहीं, घर पर कीजिए उपाय और पाइये स्नान का पुण्य

PRAYAGRAJ MAHA KUMBH MELA 2025:महाकुंभ 2025, 13 जनवरी से 26 फरवरी तक प्रयागराज में आयोजित होगा. जो श्रद्धालु मेले में नहीं जा सकते, वे घर बैठे करें ये उपाय उत्तर प्रदेश (uttar pradesh) के प्रयागराज में एक बार फिर आस्था का मेला उमड़ने वाला है, जहाँ संगम तट पर 13 जनवरी, 2025 से महाकुंभ का भव्य आयोजन आरंभ होगा। वहाँ विशाल तंबू, नागा साधुओं की श्रृंखला, चिलम धारण करते बाबा और जटाओं से सज्जित संतों का दृश्य देखने को मिलेगा। सुरक्षा के लिए पुलिस की कड़ी व्यवस्था रहेगी। यह एक अनोखा धार्मिक उत्सव है, जहाँ देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु संगम में स्नान करने आते हैं। हालांकि, कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि यदि वे महाकुंभ में शामिल नहीं हो पाते, तो क्या पुण्य प्राप्त कर सकते हैं? क्या घर पर ही रहकर कुछ विशेष उपाय करके कुंभ स्नान का लाभ उठाया जा सकता है? 45 दिनों तक चलेगा महाकुंभ अनुपम महाराज ने बताया कि महाकुंभ का आयोजन पौष पूर्णिमा के स्नान से 13 जनवरी, 2025 को शुरू होगा और 26 फरवरी, 2025 को महाशिवरात्रि के अंतिम स्नान के साथ समाप्त होगा। इस तरह से यह महापर्व 45 दिनों तक चलेगा। उन्होंने कहा कि अगर आप महाकुंभ में भाग नहीं ले सकते, तो चिंता की कोई बात नहीं है। कुछ सरल उपायों से घर पर भी आप कुंभ स्नान का लाभ प्राप्त कर सकते हैं। घर पर ही करें पुण्य अर्जित: अनुपम महाराज ने कुछ ऐसे उपाय बताए हैं, जिन्हें अपनाकर घर पर भी महाकुंभ के पुण्य को प्राप्त किया जा सकता है कुंभ स्नान का महत्व: अनुपम महाराज ने बताया कि, कुंभ स्नान सिर्फ एक स्नान नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है. यह वह समय होता है, जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा चरम पर होती है, और पवित्र नदियों में स्नान करने से इन ऊर्जाओं का लाभ मिलता है. माना जाता है कि इस समय किए गए धार्मिक कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है. अस्वीकरण: इस लेख में निहित जानकारी ज्योतिषी/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित की गई हैं. पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. Mahakumbh 2025: आखिर कहां से आते हैं नागा साधु? रहस्य नहीं, अब जानिए हकीकत! Maha Kumbh Mela 2025 Niyam: महाकुम्भ में क्या करें, क्या न करें, जानें ये नियम ताकि आपसे जाने-अन्जाने कोई त्रुटि न हो Mahakumbh 2025: महाकुंभ क्यों लगता है? जानिए इसकी विशेषता और महत्व Mahakumbh 2025: क्या आप जानते हैं महाकुंभ, अर्ध कुंभ और पूर्ण कुंभ के बीच का अंतर Maha Kumbh 2025: महाकुंभ से घर में जरूर लाएं ये चीजें, बदल जाएगी किस्मत Maha Kumbh 2025: कब से शुरू हो रहा है महाकुंभ? जानें शाही स्थान की तिथियां और महत्व

PRAYAGRAJ MAHA KUMBH MELA 2025:महाकुंभ 2025 में नहीं जा पा रहे तो चिंता की बात नहीं, घर पर कीजिए उपाय और पाइये स्नान का पुण्य Read More »

Mahakumbh 2025: आखिर कहां से आते हैं नागा साधु? रहस्य नहीं, अब जानिए हकीकत!

Mahakumbh 2025: नागा साधुओं की रहस्यमयी दुनिया को लेकर हर किसी के मन में उत्सुकता रहती है। आज हम आपको नागा साधुओं के कुछ रहस्यों के बारे में अपने इस लेख में जानकारी देंगे। Kumbh Mela 2025: महाकुंभ का मेला इस साल प्रयागराज में लगने वाला है। यहां सबसे पहले 13 जनवरी के दिन नागा साधुओं के द्वारा शाही स्नान किया जाएगा। बड़ी संख्या में नागा साधु कुंभ मेले में आते हैं। हालांकि, बाकी समय ये एकांतवास करते हैं, हिमालय की दुर्गम चोटियों पर ये दुनिया से अलग रहकर गुप्त तरीके से योग-ध्यान और साधना करते हैं। लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि, इन्हें महाकुंभ का पता कैसे लग जाता है, और कैसे महाकुंभ के दौरान बड़ी संख्या में नागा साधु पवित्र घाटों पर पहुंच जाते हैं। नागा साधुओं की दुनिया से जुड़े कुछ ऐसे ही रहस्यों के बारे में आज हम आपको अपने इस लेख में जानकारी देने वाले हैं।  Mahakumbh 2025: नागा परंपरा (Naga Sadhu) की पूरी दुनिया रहस्यों से भरी हुई है. कुंभ के आते ही नागा जंगलों से निकल आते हैं. घोड़े, हाथी पर सवार होकर जुलूस निकालते हुए कुंभ की ओर कूच करने लगते हैं. न सिर्फ आते हैं बल्कि लौटते वक्त अपने साथ तमाम नए नागा साधुओं को भी ले जाते हैं. महाकुंभ में आने वाले नागा साधु (Naga Sadhu) जंगलों में रहते हैं. यह वह धारणा है जो सबसे आम तौर पर प्रचलित है. लेकिन सवाल यह है कि वे कौन-से जंगल हैं, जहां ये साधु वास्तव में निवास करते हैं? इन दो क्षेत्रों में रहते हैं नागा साधु नागा साधु मुख्यतः देश के दो क्षेत्रों में रहते हैं. पहला, केदारखंड, जो केदारनाथ के आसपास के जंगलों में स्थित है. यह क्षेत्र उत्तराखंड के गढ़वाल इलाके में आता है. दूसरा क्षेत्र नर्मदा नदी के किनारे फैले जंगल हैं, जिन्हें नर्मदाखंड कहा जाता है. ये जंगल मुख्यतः महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश में फैले हुए हैं. हिमालय या ऊंचे पहाड़ की गुफाओं में निवास करते हैं नागा नागा साधु किसी न किसी अखाड़े, आश्रम या मंदिर से जुड़े होते हैं. अखाड़े, आश्रम या मंदिर में रहने वाले नागा साधु “नागाओं के समूह” में रहते हैं, लेकिन इनमें से कुछ तप के लिए हिमालय या किसी ऊंचे पहाड़ की गुफाओं में निवास करते हैं. इनमें से कई अखाड़ा के नागा साधु पैदल भ्रमण कर भिक्षाटन करते हुए धुनी रमाते हैं. बहुत रहस्मयी होता है नागा साधुओं का जीवन नागा साधुओं का जीवन बहुत रहस्मयी होता है. कुंभ के बाद वह कहीं गायब हो जाते हैं. कहा जाता है कि नागा साधु जंगल के रास्ते से देर रात में यात्रा करते हैं. इसलिए ये किसी को नजर नहीं आते हैं. नागा साधु समय-समय पर अपनी जगह बदलते रहते हैं. इस कारण इनकी सही स्थिति का पता लगाना बहुत मुश्किल होता है. ये लोग गुप्त स्थान पर रहकर ही तपस्या करते हैं. Mahakumbh : कैसे बनते हैं नागा साधु? नागा साधु बनने की प्रक्रिया बहुत कठिन होती है. यदि कोई नागा साधु बनाना चाहता तो उसकी प्रक्रिया महाकुंभ के दौरान ही शुरु होती है. इसके लिए उन्हें ब्रह्मचर्य की परीक्षा देनी पड़ती है. इसमें 6 महीने से लेकर 12 साल तक का समय लग जाता है. जिसके बाद महापुरुष का दर्जा मिलता है और फिर 5 गुरु भगवान शिव, भगवान विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश निर्धारित किए जाते हैं. जिसके बाद नागाओं के बाल कटवाए जाते है. कुंभ के दौरान इन लोगों को गंगा नंदी में 108 डुबकियां भी लगानी पड़ती हैं. खुद को मृत घोषित कर खुद करते हैं पिंड दान महाकुंभ में ही तमाम सामान्य व्यक्ति जीते जी अपने आप को मृत घोषित करते हैं, फिर खुद और परिवार का पिंड दान करके गंगा किनारे सारे कपड़ों को त्याग करके बाकियों के साथ जंगल की ओर चल देते हैं. बिना पिंड दान के नागा साधु बनेंगे ही नहीं. चाहे पिता जीवत हो या मरा हो, इसके अलावा नागा साधु बनने से पहले व्यक्ति के सात पीड़ी का पिंड दान होता है. इसके अलावा व्यक्ति के शरीर का भी पिंड दान होता है, ऐसा इसलिए कि नागा साधुओं का मनाना है कि उनके मरने के बाद उनका पिंड दान कौन करेगा. पिंड दान के बाद ही साधु को नागा की दीक्षा दी जाती है. Mahakumbh : नागा का अर्थ ‘नागा’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है, जिसका अर्थ पहाड़ होता है और इस पर रहने वाले लोग ‘पहाड़ी’ या ‘नागा संन्यासी’ कहलाते हैं. कच्छारी भाषा में ‘नागा’ से तात्पर्य ‘एक युवा बहादुर सैनिक’ से भी है. ‘नागा’ का अर्थ बिना वस्त्रों के रहने वाले साधु भी है. Mahakumbh : नागा साधुओं का इतिहास Mahakumbh : बताया जाता है कि आदिगुरु शंकराचार्य ने 8वीं सदी में सनातन धर्म की स्थापना के लिए देश के चार कोनों पर चार पीठों की स्थापना की. गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ, द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मठ पीठ. इन पीठों, मठों-मन्दिरों और सनातन धर्म की रक्षा के लिए आदिगुरु ने सशस्त्र शाखाओं के रूप में अखाड़ों की स्थापना की शुरूआत की. इन्हीं अखाड़ों के सैनिकों को धर्म रक्षक या नागा कहा जाता था. (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। KARMASU.IN एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

Mahakumbh 2025: आखिर कहां से आते हैं नागा साधु? रहस्य नहीं, अब जानिए हकीकत! Read More »

Maha Kumbh Mela 2025 Niyam: महाकुम्भ में क्या करें, क्या न करें, जानें ये नियम ताकि आपसे जाने-अन्जाने कोई त्रुटि न हो

Maha Kumbh Mela 2025 कुम्भ मेले में व्यक्ति पुण्य कमाने के उद्देश्य से संगम स्नान, दान, ध्यान करता है, इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि जाने-अन्जाने में ऐसा कोई भी कार्य न करें, जिससे पाप अर्जन हो। कुम्भ मेले kumbh mela में व्यक्ति पुण्य कमाने के उद्देश्य से संगम स्नान, दान, ध्यान करता है, इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि जाने-अन्जाने में ऐसा कोई भी कार्य न करें, जिससे पाप अर्जन हो।

Maha Kumbh Mela 2025 Niyam: महाकुम्भ में क्या करें, क्या न करें, जानें ये नियम ताकि आपसे जाने-अन्जाने कोई त्रुटि न हो Read More »

 Famous Ram Mandir:भारत में भगवान श्रीराम के 5 प्रमुख मंदिर

Famous Ram Mandir:भगवान राम राजा दशरथ और अयोध्या की रानी कौशल्या के पुत्र थे। इन्हें भगवान विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है। पूरे भारत में भगवान राम को समर्पित कई मंदिर हैं, उनमें से कुछ नीचे सूचीबद्ध हैं। आइए एक नजर डालें। राम भारत की आत्मा हैं, ऐसे में अपना शासन स्थापित करने व सनातनियों को कमजोर या नीचा दिखाने के लिए मध्यकाल में आक्रांताओं ने प्रभु श्रीराम और हनुमानजी से जुड़े मंदिर और स्मारकों को ढूंढ-ढूंढकर उनका अस्तित्व मिटाया। Famous Ram Mandir अयोध्या भगवान राम का जन्मस्थान है और उन्हें पुरुषोत्तम के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है सर्वश्रेष्ठ पुरुष या सर्वोच्च पुरुष (व्यक्तित्व)। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, श्री राम “सत्य, नैतिकता, आदर्श पुत्र, आदर्श पति और सबसे बढ़कर आदर्श राजा के अवतार हैं।” भगवान राम का जन्म त्रेता युग में हुआ था और उन्हें मानव रूप में पूजे जाने वाले सबसे पुराने देवता के रूप में भी जाने जाते हैं। पूरे भारत में भगवान राम को समर्पित विभिन्न मंदिर हैं, उनमें से कुछ नीचे सूचीबद्ध हैं। आइए एक नजर डालते हैं। Famous Ram Mandir:भारत में भगवान राम मंदिरों की सूची 1- अयोध्या में राम Ram Mandir, Ayodhya राम के एक ऐतिहासिक महापुरुष होने के पर्याप्त प्रमाण हैं। शोध के अनुसार पता चलता है कि भगवान राम का जन्म आज से करीब 7128 वर्ष पूर्व अर्थात 5114 ईस्वी पूर्व को उत्तरप्रदेश के अयोध्या नगर में हुआ था।अयोध्या हिन्दुओं के प्राचीन और 7 पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। सरयू नदी के तट पर बसे इस नगर को रामायण के अनुसार मनु ने बसाया था। मध्यकाल में राम जन्मस्थान पर बने भव्य मंदिर को आक्रांता बाबर ने तोड़कर वहां एक मस्जिद स्थापित कर दी जिस पर विवाद रहा। अयोध्या के दर्शनीय स्थल : अयोध्या घाटों और मंदिरों की प्रसिद्ध नगरी है। सरयू नदी यहां से होकर बहती है। सरयू नदी के किनारे 14 प्रमुख घाट हैं। इनमें गुप्तद्वार घाट, कैकेयी घाट, कौशल्या घाट, पापमोचन घाट, लक्ष्मण घाट आदि विशेष हैं। 2- राजा राम मंदिर, ओरछा, मध्यप्रदेश Ram Raja Temple, Orchha:- श्री राम राजा सरकार का महत्व आपको अयोध्या के बाद ओरछा में दिखाई देता है यहां लोग भगवान राम को अपना राजा मानते है यहां पर राम हर धर्म के राजा हैं। दूर-दूर से लोग इस स्थल पर राम राजा के दर्शन करने आते है इस मन्दिर का इतिहास शुरू होता है मधुकर शाह जी के कार्यकाल स,े जो की यहां के महाराजा थे और कृष्ण भक्त थे और महारानी जो कि ग्वालियर जिले से थी वो एक राम भक्त थी, महारानी का नाम कुंवर गणेश था। एक दिन मधुकर शाह और कुंवर गणेश बातें कर रहे थे और बातों की बातों में दोनों अपने अपने ईष्ट देव को लेकर झगड़ा करने लगे और महाराजा मधुकर शाह ने महारानी से बोल दिया कि यदि वो एक सच्ची राम भक्त है, Famous Ram Mandir तो जाएं अयोध्या और रामजी को यहां ओरछा ले आएं। अब महारानी जी ने भी यह बात मान ली और बोली की या तो अब मैं अपने ईष्ट प्रभु राम को अयोध्या से ओरछा लाऊंगी या फिर अयोध्या में ही अपने प्राण त्याग दूंगी। फिर महारानी कुंवर गणेश आ गई अयोध्या और सरयू नदी के किनारे शुरू कर दो अपने प्रभु राम जी की पूजा 7 दिन हो चुके थे ( कही कही 21 दिन बताया जाता है ) महारानी जी को श्रीराम ने दर्शन नहीं दिए अब महारानी जी हताश होकर अपने प्राण त्यागने का निर्णय लेती है और सरयू में छलांग लगा देती है। तभी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एक बालक के रूप में वहां आ जाते हैं ( कुछ लोगों का कहना हैं की सरयू में जब महारानी से छलांग लगाईं थी तो जलधारा में ही भगवान राम महारानी की गोद में बैठ गए थे )।अब महारानी बालक रूप में आये श्रीराम से ओरछा चलने का निवेदन करती हं,ै श्रीराम मान भी जाते हैं लेकिन तीन शर्तो के साथ अब महारानी कुंवर गणेश भगवान राम से उनकी शर्तें पूछती हैं, ये थीं शर्तें… पहली शर्त : जहां हम जा रहे हैं, वहां के सिर्फ हम ही राजा होंगे कोई दूसरा नहीं।दूसरी शर्त : अयोध्या से ओरछा तक आपके साथ हम पैदल जाएंगे वो भी पुण्य नक्षत्र में।तीसरी शर्त : यदि हम कहीं पर भी बैठ गए तो वहां से उठेंगे नहीं। महारानी कुंवर गणेश ने श्रीराम की तीनो शर्तें मान ली, फिर Famous Ram Mandir श्रीराम एक मूर्ति के रूप में महारानी की गोद में बैठ गए और महारानी पैदल ही ओरछा की तरफ चल दी और 8 महीने 28 दिन में वो ओरछा आ गई थी, यहां यह भी कहा जाता है महारनी के ओरछा पहुचने से पहले महाराजा मधुकर शाह को सपना आया था कि महारानी भगवान राम को लेकर आ रही है। तो मधुकर शाह ने भगवान राम के लिए मन्दिर बनवाना शुरू कर दिया जिसे चतुर्भुज मन्दिर कहते हैं। लेकिन यह चतुर्भुज मन्दिर पूर्णता पर पहुंच पाता, उससे पहले ही महारानी कुंवर गणेश जी श्रीराम को लेकर ओरछा आ गई और श्रीराम को अपने महल की रसोई घर में थोड़े समय के लिए स्थापित कर दिया। Famous Ram Mandir फिर जब चतुर्भुज मंदिर बन गया तब उस मूर्ति को रसोई घर से उठाकर, इसे चतुर्भुज मंदिर में स्थापित किया जाना था, लेकिन श्रीराम की वह मूर्ति वहां से उठी ही नहीं। Famous Ram Mandir इसी को सभी ने भगवान राम का चमत्कार माना और उसी महल को मंदिर बना दिया इसी महलनुमा मंदिर में आज आपको श्री राम राजा दर्शन देते हैं, इस मंदिर को ही श्री राम राजा मन्दिर कहा जाता है। 3- त्रिप्रायर नदी के किनारे स्थित त्रिप्रायर श्रीराम मंदिर Famous Ram Mandir :- केरल का कोडुन्गल्लुर का प्रमुख धार्मिक स्थान है। यह त्रिप्रायर में स्थित है, जो कोडुन्गल्लुर शहर से लगभग 15 किलोमीटर और त्रिशूर से 25 किलोमीटर दूर स्थित है। भगवान विष्णु के 7वें अवतार भगवान श्रीराम की इस मंदिर में पूजा की जाती है। इस मंदिर के बारे में कई लोकोक्तियां प्रचलित हैं। माना जाता है कि इस मंदिर में स्थापित मूर्ति यहां के स्थानीय मुखिया को समुद्र तट पर मिली थी। इस मूर्ति में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव के तत्व हैं अतः इसकी

 Famous Ram Mandir:भारत में भगवान श्रीराम के 5 प्रमुख मंदिर Read More »

Maha Kumbh 2025: महाकुंभ से घर में जरूर लाएं ये चीजें, बदल जाएगी किस्मत

Maha Kumbh 2025:सनातन धर्म में पौष पूर्णिमा को बेहद शुभ माना जा रहा है क्योंकि पौष पूर्णिमा यानी 13 जनवरी (Kab Se Hai Mahakumbh 2025) से महाकुंभ की शुरुआत हो रही है। वहीं इस मेले का समापन 26 फरवरी को होगा। धार्मिक मान्यता है कि महाकुंभ (Mahakumbh 2025) से शुभ चीजों को घर लाने से जातक की किस्मत सकती है और जीवन खुशहाल रहेगा। सनातन धर्म में किसी खास तिथि पर पवित्र नदियों में स्नान करना जीवन के लिए बेहद शुभ माना जाता है, लेकिन महाकुंभ के शाही स्नान की तिथियों पर स्नान करने से जातक को सभी तरह के पापों से छुटकारा मिलता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस बार उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाकुंभ (Mahakumbh 2025 Significance) का आयोजन हो रहा है। इस मेले की शुरुआत के लिए साधु-संत बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। ऐसी मान्यता है कि Maha Kumbh 2025 महाकुंभ से शुभ चीजों को घर लाने से घर और परिवार में सदैव सुख-शांति बनी रहती है और सभी तरह की समस्या से छुटकारा मिलता है। अगर आप महाकुंभ जाने का प्लान बना रहे हैं, तो इस आर्टिकल में बताई गई चीजों को घर जरूर लेकर आएं, जिससे आपका जीवन होगा होगा और सफलता के मार्ग खुलेंगे। Things to Bring From Maha Kumbh: महाकुंभ का आयोजन बड़े स्तर पर किया जाता है। इस बार महाकुंभ की शुरुआत 13 जनवरी से हो रही है। वहीं, इसका समापन 26 फरवरी को होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, Maha Kumbh 2025 महाकुंभ में स्नान करने से जातक को मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन के सभी पापों से छुटकारा मिलता है। इसके अलावा विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। यदि कोई व्यक्ति महाकुंभ के शाही स्नान के दिन स्नान करता है, तो उसे सभी प्रकार के पापों से छुटकारा मिलता है, उनसे छुटकारा मिलता है।  ऐसा माना जाता है कि यदि आप महाकुंभ Maha Kumbh 2025 से शुभ चीजें लाते हैं, तो आपके घर और परिवार में हमेशा शांति और खुशी बनी रहेगी और आप सभी प्रकार की समस्याओं से मुक्त हो जाएंगे। महाकुंभ के दौरान कुछ खास चीजें लेकर आना परिवार में समृद्धि, शांति और किस्मत को चमकाने का कारण बन सकता है। आइए जानते हैं उन चीजों के बारे में जो महाकुंभ से घर लानी चाहिए।  Maha Kumbh 2025 Ganga jal:गंगा जल महाकुंभ से गंगा Maha Kumbh 2025 जल लेकर घर में रखना शुभ होता है। गंगा जल को पवित्र माना जाता है और यह घर में शांति और सकारात्मक ऊर्जा लाने का माध्यम माना जाता है। इसे घर के पूजा स्थान पर रखें, इससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और परिवार से कलह का दूर होती है। संगम की मिट्टी sangam ki mitti संगम की पवित्र मिट्टी को भी घर में रखना बहुत शुभ माना जाता है। इसे घर के मुख्य द्वार या पूजा स्थल पर रखें, इससे घर में आने वाली नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मकता का प्रवाह होता है। तुलसी के पत्ते Tulsi ke patte महाकुंभ में तुलसी के पत्ते का भी खास महत्व होता है। इन्हें घर में रखना परिवार के लिए सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत बनता है। तुलसी को घर में रखने से शांति का वातावरण बनता है और दरिद्रता दूर होती है। शिवलिंग या पारस पत्थर Shivling ya Parash pattar शिवलिंग या पारस पत्थर को Maha Kumbh 2025 महाकुंभ से लेकर आना भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इसे घर में पूजा स्थल पर रखना विशेष लाभकारी होता है, जिससे घर में समृद्धि आती है और जीवन में खुशियां बढ़ती हैं। इन पवित्र और शुभ वस्त्रों को महाकुंभ से घर लाने से न सिर्फ परिवार में शांति रहती है, बल्कि यह घर में खुशहाली और समृद्धि आती है।  परिवार में बनी रहेगी सुख-शांति इसके अलावा महाकुंभ से पूजा के फूलों (Flowers Importance) को भी घर ला सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि महाकुंभ की पूजा के फूलों को घर लाने से परिवार में सुख-शांति हमेशा बनी रहेगी और जीवन में आ रहे दुख एवं संकट दूर होंगे। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN उत्तरदायी नहीं है।  Mahakumbh 2025: महाकुंभ क्यों लगता है? जानिए इसकी विशेषता और महत्व Mahakumbh 2025: क्या आप जानते हैं महाकुंभ, अर्ध कुंभ और पूर्ण कुंभ के बीच का अंतर Maha Kumbh 2025: कब से शुरू हो रहा है महाकुंभ? जानें शाही स्थान की तिथियां और महत्व

Maha Kumbh 2025: महाकुंभ से घर में जरूर लाएं ये चीजें, बदल जाएगी किस्मत Read More »

Maha Kumbh 2025: कब से शुरू हो रहा है महाकुंभ? जानें शाही स्थान की तिथियां और महत्व

Maha Kumbh 2025: महाकुंभ का आयोजन 12 साल बाद होता है जहां पर श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं।  महाकुंभ का आयोजन चार तीर्थ स्थानों पर ही किया जाता है। साल 2025 में महाकुंभ का आयोजन प्रयागराज में किया जाएगा।  Maha Kumbh 2025 Date: हिन्दू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण उत्सव महाकुंभ Maha Kumbh अगले साल यानि साल 2025 में लगने जा रहा है। महाकुंभ का आयोजन 12 साल बाद होता है जहां पर श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं।  महाकुंभ का आयोजन चार तीर्थ स्थानों पर ही किया जाता है। इसका आयोजन प्रयागराज के संगम , हरिद्वार में गंगा नदी, उज्जैन में शिप्रा नदी, और नासिक में गोदावरी नदी पर किया जाता है।  धार्मिक मान्यता है कि महाकुंभ के दौरान पवित्र नदी में डुबकी लगाने से व्यक्ति को हर तरह के रोग-दोष और पापों से मुक्ति मिलती है। आइए जानते हैं साल 2025 में कब से कब तक लगेगा महाकुंभ और कहां लगेगा महाकुंभ का मेला। Maha Kumbh 2025:कहां लगेगा महाकुंभ?  साल 2025 में महाकुंभ का आयोजन प्रयागराज में किया जाएगा। आपको बता दें महाकुंभ 12 साल में एक बार लगता है।  Maha Kumbh 2025 kab se kab tak lagega:कब से कब तक लगेगा महाकुंभ ? हिन्दू पंचांग के अनुसार पौष पूर्णिमा के दिन Maha Kumbh महाकुंभ आरंभ होगा और महाशिवरात्रि के साथ ही यह समाप्त होगा। साल 2025 में महाकुंभ 13 जनवरी से आरंभ होगा और 26 फरवरी 2025 को समाप्त होगा। यह महाकुंभ पूरे 45 दिन तक रहेगा।  12 साल की अंतराल में ही क्यों लगता है महाकुंभ अब बात आती है कि Maha Kumbh महाकुंभ का पावन मेला हर बार 12 साल के अंतराल में ही क्यों लगता है, इसके पीछे कई धार्मिक मान्यता हैं. कहा जाता है कि कुंभ की उत्पत्ति समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है, जब देवता और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तब जो अमृत निकला इस अमृत को पीने के लिए दोनों पक्षों में युद्ध हुआ, जो 12 दिनों तक चला. कहते हैं कि यह 12 दिन पृथ्वी पर 12 साल के बराबर थे, इसलिए कुंभ का मेला 12 सालों में लगता है. एक अन्य मान्यता के अनुसार, अमृत के छींटे 12 स्थान पर गिरे थे, जिनमें से चार पृथ्वी पर थे, इन चार स्थानों पर ही कुंभ का मेला लगता है. कई ज्योतिषियों का मानना है कि बृहस्पति ग्रह 12 साल में 12 राशियों का चक्कर लगाता है, इसलिए कुंभ मेले का आयोजन उस समय होता है जब बृहस्पति ग्रह किसी विशेष राशि में होता है. महाकुंभ 2025 शाही स्नान की तिथियां  13 जनवरी 2025- पौष पूर्णिमा स्नान 14 जनवरी 2025- मकर संक्रांति स्नान 29 जनवरी 2025- मौनी अमावस्या स्नान 03 फरवरी 2025- बसंत पंचमी स्नान 12 फरवरी 2025- माघी पूर्णिमा स्नान 26 फरवरी 2025- महाशिवरात्रि स्नान  महाकुंभ लगाने के लिए कैसा होता स्थान का चयन? महाकुंभ लगने का निर्णय देवताओं के गुरु बृहस्पति और ग्रहों के राज्य सूर्य की स्थिति के हिसाब से किया जाता है। आइए जानते हैं किस स्थान पर मेला लगेगा इसका निर्णय कैसे होता है।  हरिद्वार- जब देवगुरु बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्यदेव मेष राशि में होते हैं तब हरिद्वार में महाकुंभ का आयोजन किया जाता है।  उज्जैन- जब सूर्यदेव मेष राशि में और गुरु ग्रह सिंह राशि में होते हैं कुंभ मेले का आयोजन उज्जैन में किया जाता है।  नासिक- जब गुरु गृह और सूर्य देव दोनों ही सिंह राशि में विराजमान रहते हैं तो महाकुंभ मेले का आयोजन स्थल नासिक होता है।  प्रयागराज- जब गुरु ग्रह बृहस्पति वृषभ राशि में और ग्रहों के राजा मकर राशि में होते हैं तो महाकुंभ का आयोजन प्रयागराज में किया जाता है।  डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN उत्तरदायी नहीं है।  Mahakumbh 2025: महाकुंभ क्यों लगता है? जानिए इसकी विशेषता और महत्व Mahakumbh 2025: क्या आप जानते हैं महाकुंभ, अर्ध कुंभ और पूर्ण कुंभ के बीच का अंतर

Maha Kumbh 2025: कब से शुरू हो रहा है महाकुंभ? जानें शाही स्थान की तिथियां और महत्व Read More »

Mahakumbh 2025: महाकुंभ क्यों लगता है? जानिए इसकी विशेषता और महत्व

Mahakumbh 2025: महाकुंभ 13 जनवरी से आरंभ हो रहा है और 26 फरवरी 2025 को इसका समापन होगा। यानी यह कुंभ मेला पूरे 45 दिनों तक चलेगा। Mahakumbh 2025: 12 साल के बाद भारत का सबसे बड़ा महाकुंभ एक बार फिर लगने वाला है, जो इस बार प्रयागराज, उत्तर प्रदेश (Prayagraj, UP) में लगने वाला है. बता दें कि भारतीय संस्कृति में कुंभ मेला का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है, जो हर 12 साल में एक विशेष स्थान पर आयोजित किया जाता है, जिसमें चार प्रमुख स्थान प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक शामिल है. कहते हैं कि महाकुंभ के मेले में स्नान (Mahakumbh Snan) करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और साधकों के सभी पाप खत्म हो जाते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि महाकुंभ हर 12 साल के अंतराल में ही क्यों लगता है और इसके पीछे की मान्यता और महत्व (Mahakumbh significance) क्या है? तो चलिए आज आपकी इस कंफ्यूजन को दूर करते हैं और आपको बताते हैं कि 12 साल के अंतराल में ही महाकुंभ क्यों लगता है. Mahakumbh 2025: कुंभ का आयोजन भारत के चार पवित्र स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में हर 12 साल के अंतराल पर होता है। यह विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। 2025 में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन किया जाएगा, जिसमें लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम में स्नान करेंगे। इसे लेकर सरकार ने व्यापक तैयारियां शुरू की हैं। इसमें अत्याधुनिक तकनीक, सुरक्षा और सुविधाओं का ध्यान रखा जाएगा ताकि श्रद्धालुओं के लिए यह अनुभव सहज और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध हो।  Mahakumbh 2025: क्या आप जानते हैं महाकुंभ, अर्ध कुंभ और पूर्ण कुंभ के बीच का अंतर कुंभ न केवल धार्मिक पर्व है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और एकता का प्रतीक है। 2025 का कुंभ आने वाले समय में नई पीढ़ी के लिए धर्म और संस्कृति के महत्व को समझाने का एक महत्वपूर्ण अवसर बनेगा। यह महाकुंभ 13 जनवरी से आरंभ हो रहा है और 26 फरवरी 2025 को इसका समापन होगा। यानी यह कुंभ मेला पूरे 45 दिनों तक चलेगा। ग्रह-नक्षत्रों की चाल से महाकुंभ का संबंध महाकुंभ 2025 जो प्रयागराज में शुरू होने जा रहा है उसका आधार है जब देवगुरु बृहस्पति वृषभ राशि में और सूर्य मकर राशि में होते हैं, तो महाकुंभ प्रयागराज में आयोजित होता है। 2025 में यही स्थिति होने के कारण कुंभ प्रयागराज में आयोजित किया जा रहा है। प्रत्येक बारह वर्ष बाद जब बृहस्पति वृष राशि में आते हैं तो वृष राशि के बृहस्पति की उपस्थिति में कुम्भ महापर्व आयोजित होता है, इससे पहले 2013 में कुंभ का संयोग बना था। अमृत कलश की रक्षा के समय जिन-जिन राशियों पर जो-जो ग्रह गोचर कर रहे थे, कलश की रक्षा करने वाले वही चन्द्र, सूर्य, गुरु आदि ग्रह जब उसी अवस्था में संचरण करते हैं, उस समय कुंभ पर्व का योग बनता है। यानि जब फिर से वैसे-वैसे संयोग ग्रहों के योग के रूप में बनते हैं, तभी कुंभ महापर्व का आयोजन होता है। धर्मशास्त्रों में वर्णन आता है। मकरे च दिवानाथे वृषराशिगते गुरौ। प्रयागे कुम्भयोगौ वै माघमासे विधुक्षये। महत्व और पौराणिक कथा कुंभ का उल्लेख समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है। अमृत कलश को लेकर देवताओं और असुरों में संघर्ष हुआ। अमृत की बूंदें चार स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक पर गिरीं। इन्हीं स्थानों पर कुंभ का आयोजन होता है। मोक्ष की प्राप्तिमान्यता है कि महाकुंभ के दौरान संगम में स्नान करने से आत्मा के बंधनों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष प्राप्त होता है।आध्यात्मिक जागरूकतामहाकुंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं है यह समाज को आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।संस्कृति और परंपराओं का संरक्षणयह आयोजन भारतीय संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं का जीवंत प्रतीक है।वैज्ञानिक दृष्टिकोणमहाकुंभ के दौरान गंगाजल में औषधीय गुण बढ़ जाते हैं। इसका वैज्ञानिक अध्ययन भी किया गया है, जो इस पर्व की महिमा को और बढ़ाता है। Mahakumbh 2025: क्या आप जानते हैं महाकुंभ, अर्ध कुंभ और पूर्ण कुंभ के बीच का अंतर

Mahakumbh 2025: महाकुंभ क्यों लगता है? जानिए इसकी विशेषता और महत्व Read More »