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Kawad Yatra 2025 Start Date: साल 2025 में कब निकलेगी कांवड़ यात्रा, जानिए यहां महत्व और नियम

Kawad Yatra 2025: श्रावण माह में कांवड यात्रा भी निकलती है, जिसमें हरिद्वार से जल लाकर सावन शिवरात्रि के शुभ अवसर पर भक्त महादेव का अभिषेक करते हैं. Sawan month 2025 : पंचांग के अनुसार, साल 2025 में सावन माह की शुरुआत 11 जुलाई को रात 2 बजकर 6 मिनट से हो रही है और इसका समापन 9 अगस्त को होगा। इस बार सावन पूरे 30 दिनों का रहेगा। चूंकि सावन के पहले दिन से ही कांवड़ यात्रा आरंभ हो जाती है, इसलिए कांवड़ यात्रा 2025 की शुरुआत भी 11 जुलाई से मानी जाएगी। कांवड़ यात्रा सावन शिवरात्रि तक चलती है, जो इस बार अगस्त की शुरुआत में पड़ेगी। इस दौरान श्रद्धालु गंगा जल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। माना जाता है कि इस यात्रा से भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। कब से शुरू होगी कांवड़ यात्रा 2025 – When will Kawad Yatra 2025 start पंचांग के अनुसार, Kawad Yatra 2025 सावन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 11 जुलाई देर रात 02 बजकर 06 मिनट से होगी और समापन अगले दिन यानी 12 जुलाई को देर रात 02 बजकर 08 मिनट पर समापन होगा. ऐसे में सावन माह की शुरुआत 11 जुलाई से होगी. वहीं, इस माह का समापन 09 अगस्त को होगा. ऐसे में कांवड यात्रा की शुरूआत 11 जुलाई से शूरू हो जाएगी और सावन शिवरात्रि के दिन समाप्त. Kanwar Yatra 2025 Importance: सावन की सबसे बड़ी विशेषता Kawad Yatra 2025 कांवड़ यात्रा है, जिसमें भक्त हरिद्वार, गौमुख या गंगोत्री जैसे तीर्थस्थलों से गंगा जल लाकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। यह यात्रा शिवरात्रि तक चलती है और विशेषकर सावन शिवरात्रि के दिन जल चढ़ाने का अत्यंत पुण्यफल माना जाता है। कहा जाता है कि कांवड़ यात्रा की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी। Kawad Yatra 2025 आज यह यात्रा आस्था, श्रद्धा और निष्ठा का प्रतीक बन चुकी है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। Sawan Shivratri Kab Hai:सावन शिवरात्रि कब है? Kawad Yatra 2025 साल 2025 में सावन माह की शिवरात्रि 23 जुलाई को मनाई जाएगी। यह पर्व हर साल सावन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आता है। पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि की शुरुआत 23 जुलाई को सुबह 4 बजकर 39 मिनट से होगी और इसका समापन 24 जुलाई की रात 2 बजकर 28 मिनट पर होगा। इसलिए शिव भक्त 23 जुलाई को सावन शिवरात्रि का व्रत रखेंगे और दिनभर व्रत-पूजन कर रात को भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे। यह दिन भोलेनाथ को प्रसन्न करने और मनोकामनाएं पूर्ण कराने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इसीलिए 23 जुलाई से कांवड़ यात्रा आरम्भ होगी।  कांवड़ यात्रा के प्रकार :Types of Kanwar Yatra कांवड़ यात्रा चार अलग-अलग प्रकारों में की जाती है, जो भक्तों की आस्था, सामर्थ्य और नियमों के अनुसार होती है।  कांवड़ यात्रा के नियम:rules of kanwar yatra

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First Sawan Somwar 2025:सावन का पहला सोमवार कब है? जानिए व्रत की तारीखें और भगवान शिव की कृपा पाने का सही समय

First Sawan Somwar 2025: यदि आप भी भगवान शिव की कृपा पाना चाहते हैं तो सावन सोमवार का व्रत जरूर रखें। मान्यता है कि भोलेनाथ की भक्ति से जीवन का हर कष्ट दूर होता है और सुख-समृद्धि मिलती है। Sawan 2025:हिंदू धर्म में भगवान शिव को सृष्टि के संहारक और कल्याणकारी देव के रूप में पूजा जाता है। शिवभक्तों के लिए श्रावण मास अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। यह महीना पूरी तरह भगवान शिव को समर्पित होता है और माना जाता है कि इस दौरान शिवजी पृथ्वी पर निवास करते हैं। ऐसे में भक्तों की प्रार्थनाओं का प्रभाव भी शीघ्र दिखाई देता है। सोमवार भगवान शिव का वार है और सावन शिव का महीना, इसलिए इस महीने के सोमवार विशेष रूप से पूजनीय माने जाते हैं। इन सोमवारों को सावन सोमवारी कहा जाता है। इस दिन श्रद्धालु शिवजी का व्रत रखते हैं, उपवास करते हैं, शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा आदि अर्पित करते हैं और शिव चालीसा, रुद्राष्टक या महामृत्युंजय जाप का पाठ करते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं साल 2025 में सावन का महीना कब से शुरू हो रहा है और सावन का पहला सोमवार व्रत किस दिन रखा जाएगा।  Kab Se Suru Ho Raha Hai Sawan 2025;कब से शुरू हो रहा है सावन 2025 ? Sawan Somwar 2025 इस साल 2025 में सावन मास की शुरुआत 11 जुलाई 2025, शुक्रवार से हो रही है। द्रिक पंचांग के अनुसार यह महीना विशेष रूप से शुभ रहेगा क्योंकि इस बार सावन के दौरान किसी भी तिथि का क्षय (लोप) नहीं हो रहा है। इसका मतलब है कि भक्तों को पूरे 30 दिनों तक भगवान शिव की पूजा और उपासना का अवसर मिलेगा। सावन के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाना, रुद्राभिषेक करना, महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना और सोमवार के दिन व्रत रखना विशेष फलदायी माना जाता है। Sawan Month 2025 start date and End date: कब से शुरू हो रहा है सावन का महीना, जानें व्रत तिथि, पूजन विधि… First Sawan Somwar 2025:सावन का पहला सोमवार कब है? Sawan Somwar 2025 सावन के पहले सोमवार को प्रथम श्रावणी सोमवार कहा जाता है। हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है। शिव भक्त इस दिन उपवास रखते हैं और पूरे विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करते हैं। 2025 में सावन का पहला सोमवार 14 जुलाई 2025 को पड़ेगा। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से की गई पूजा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होती है और भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। सावन सोमवार की तिथियां:Sawan Monday dates पहला सोमवार- 14 जुलाई 2025दूसरा सोमवार- 21 जुलाई 2025तीसरा सोमवार- 28 जुलाई 2025चौथा सोमवार- 4 अगस्त 2025 पहले सावन सोमवार पर शुभ मुहूर्त:Auspicious time on first Monday of Sawan ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:16 से 5:04 बजे तकअभिजित मुहूर्त- दोपहर 11:59 बजे से 12:55 बजे तकअमृत काल- रात 11:21 बजे से 12:55 बजे तक, जुलाई 15पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय- दोपहर 11:38 बजे से 12:32 बजे तक ऐसी मान्यता है कि जो भक्त पूरे सावन मास के सभी Sawan Somwar 2025 सोमवारों का व्रत नहीं कर सकते, वे कम से कम पहले और अंतिम सोमवार का व्रत अवश्य करें। यह भी उतना ही पुण्यदायी होता है और शिव कृपा प्राप्त होती है। कब शुरू होगी कांवड़ यात्रा 2025?:When will Kanwar Yatra 2025 start? Sawan Somwar 2025 सावन महीने में शिव भक्तों द्वारा की जाने वाली कांवड़ यात्रा का भी खास महत्व है। इस यात्रा में भक्त पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा नदी से जल भरकर पैदल यात्रा करते हैं और उसे अपने नजदीकी या प्रसिद्ध शिव मंदिरों में अर्पित करते हैं। Sawan Somwar 2025 इस साल कांवड़ यात्रा की शुरुआत भी 11 जुलाई 2025 से ही हो रही है। सावन का महत्व:Importance of Sawan सावन मास को शिवभक्ति का महीना माना जाता है। मान्यता है कि इसी महीने में समुद्र मंथन हुआ था और भगवान शिव ने विषपान कर संसार की रक्षा की थी। तभी से इस माह में शिव की विशेष पूजा की जाती है। खासकर सोमवार का व्रत अविवाहित लड़कियों द्वारा अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए किया जाता है।

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Ambubachi Mela 2025 date & time:कामख्या देवी में इस दिन से लगने वाला है तांत्रिक शक्तियों का मेला

Ambubachi Mela:कामाख्या देवी मंदिर में जल्द ही अम्बुबाची मेला लगने वाला है। इस दौरान मां कामाख्या देवी मंदिर के कपाट बंद रहेंगे, क्योंकि माना जाता है कि पृथ्वी माता रजस्वला होती हैं। देशभर से तांत्रिक और श्रद्धालु इस मेले में शामिल होने आते हैं। आइए जानते हैं अम्बुबाची मेला की खास बातें और मेला कब से शुरु हो रहा है। कामाख्या देवी मंदिर में 4 दिवसीय मेले का आयोजन होने जा रहा है। देशभर से हजारों की संख्या में लोग इस मेले में शामिल होते हैं। कामाक्या देवी मंदिर 51 शक्तिपीठ में से एक है। कामाख्या देवी मंदिर में जिस मेले का आयोजन किया जाता है इसका नाम अम्बुबाची मेला है। आइए जानते हैं इस साल कब से लगने जा रहा है अम्बुबाची मेला और इस मेले की क्या खास बातें हैं। Ambubachi Mela 2025 date & time Ambubachi Mela अंबुबाची मेला असम के कामाख्या मंदिर में हर साल आयोजित होने वाला एक वार्षिक हिंदू मेला है। हिंदू महीने “आषाढ़” के सातवें से दसवें दिन तक अम्बुबाची की अवधि के दौरान, मंदिर के दरवाजे सभी के लिए बंद कर दिए जाते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देवी कामाख्या मासिक धर्म के वार्षिक चक्र से गुजरती हैं। अम्बुबाची मेला 22 जून से आरंभ होने जा रहा है और 26 जून तक यह मेला चलेगा।  यह Ambubachi Mela मेला देवी कामाख्या के मासिक धर्म चक्र को दर्शाता है, जो पृथ्वी की उर्वरता और स्त्री शक्ति का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान देवी को आराम और विश्राम की जरूरत होती है अर्थात यह भी मान्यता है कि इस दौरान देवी अपनी रचनात्मक शक्ति से पृथ्वी को धन्य करती हैं, जिससे भूमि उपजाऊ हो जाती है इसलिए मंदिर के अंदर सभी पूजा-अर्चना बंद कर दी जाती है और मंदिर के आसपास के गांवों में लोग भी कुछ दिनों के लिए नियमित गतिविधियों से दूर रहते हैं। Ambubachi Mela 2025 date & time : आईये जानते हैं अम्बुबाची मेले के विशेषताएं मंदिर के गर्भ ग्रह को तीन दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है और इस दौरान कोई पूजा-अर्चना नहीं होती है।भक्तों को देवी के मासिक धर्म का प्रतीक लाल रंग का कपड़ा प्रसाद के रूप में दिया जाता है।यह मेला देवी कामाख्या के मासिक धर्म के दौरान पृथ्वी की उर्वरता और नारी शक्ति को समर्पित है। Ambubachi Mela 2025 date & time Ambubachi Mela अम्बुबाची मेला 22 जून से आरंभ होने जा रहा है और 26 जून तक यह मेला चलेगा। तीन दिनों तक मंदिर में कोई पूजा या दर्शन नहीं किया जाता है। चौथे दिन, जब मां को ‘शुद्धि स्नान’ कराकर विश्राम समाप्त होता है, तब मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोले जाते हैं और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। Ambubachi Mela 2025 date & time इस दौरान यहां देश और विदेश से आए तांत्रिक गुप्त साधना करते हैं। इस मेले को अमेटी या तांत्रिक प्रजनन उत्सव के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह भारत के पूर्वी भागों में प्रचलित तांत्रिक शक्ति पंथ से निकटता से जुड़ा हुआ है । यहाँ तक कि कुछ तांत्रिक बाबा भी इन चार दिनों के दौरान ही सार्वजनिक रूप से दिखाई देते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि जब देवी सती का शरीर को सूदर्शन चक्र से भगवान विष्णु ने भागों में बांटा था, तब उनका योनि भाग यहीं गिरा था, इसलिए यह स्थान प्रजनन शक्ति और उर्वरता का प्रतीक है। इस मेले की खास बात यह भी है कि इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में देवी के पास रखे गए सफेद कपड़ा रखा जाता है रजस्वला होने के बाद जब यह कपड़ा लाल हो जाते हैं, जो भक्तों को प्रसाद के रूप में यह वस्त्र दिया जाता है। Ambubachi Mela 2025 date & time मान्यता है अनुसार, यह वस्त्र भक्तों को सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत प्रदान करता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस वस्त्र के प्रभाव से संतानहीन महिलाओं को संतान की प्राप्ति भी होती है। हालांकि, यह वस्त्र हर किसी को नहीं मिल पाता है बल्कि कुछ ही लोगों को यह वस्त्र मिलता है। अम्बुबाची मेला की खास बातें:Special features of Ambubachi fair इस दौरान यहां देश और विदेश से आए तांत्रिक गुप्त साधना करते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि जब देवी सती का शरीर को सूदर्शन चक्र से भगवान विष्णु ने भागों में बांटा था, तब उनका योनि भाग यहीं गिरा था, इसलिए यह स्थान प्रजनन शक्ति और उर्वरता का प्रतीक है। इस मेले की खास बात यह भी है कि इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में देवी के पास रखे गए सफेद कपड़ा रखा जाता है रजस्वला होने के बाद जब यह कपड़ा लाल हो जाते हैं, जो भक्तों को प्रसाद के रूप में यह वस्त्र दिया जाता है। मान्यता है अनुसार, यह वस्त्र भक्तों को सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत प्रदान करता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस वस्त्र के प्रभाव से संतानहीन महिलाओं को संतान की प्राप्ति भी होती है। हालांकि, यह वस्त्र हर किसी को नहीं मिल पाता है बल्कि कुछ ही लोगों को यह वस्त्र मिलता है।

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Radha Rani Ke 28 Name:राधा रानी के 28 नाम और उनके अर्थ | जाप से होती है हर मनोकामना की पूर्ति

Radha Rani Ke 28 Name :राधा रानी, हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण की प्रेमिका और शक्ति के रूप में पूजित हैं। उनकी भक्ति, कृष्ण भक्ति का एक महत्वपूर्ण आयाम है। राधा रानी के 28 नाम, उनके विभिन्न गुणों और रूपों का वर्णन करते हैं। Radha Rani Ke 28 Name इन नामों का जाप, भक्तों के लिए एक आध्यात्मिक यात्रा का साधन है। यह लेख, राधा रानी के इन 28 नामों का अर्थ और उनके विस्तृत विश्लेषण पर केंद्रित होगा। Radha Rani Ke 28 Name राधा रानी के 28 नाम, मात्र नाम नहीं हैं, बल्कि वे उनके स्वरूप, शक्ति और कृपा के प्रतीक हैं। इन नामों का जाप, भक्तों को राधा रानी के करीब लाता है और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। Radha Rani Ke 28 Name मान्यता है कि इन नामों का जाप करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। Radha Rani Ke 28 Name:28 नामों का विस्तृत विश्लेषण Radha Rani Ke 28 Name राधा रानी के 28 नामों का अर्थ और उनका विस्तृत विश्लेषण निम्नलिखित है: प्रत्येक नाम का विस्तृत विश्लेषण

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History of Lord Vishnu:भगवान विष्णु का इतिहास जानें

History of Lord Vishnu:पौराणिक कथाओं के अनुसार त्रिदेव यानी ब्रह्मा विष्णु महेश देवताओं में सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं। संसार के निर्माण, संचालन और संहार का कार्य इन तीनों के ही हाथ में है। इन त्रिदेवों में भगवान विष्णु पालनकर्ता के रूप में संसार को चलाते हैं। History of Lord Vishnu लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के संचालन कर्ता श्रीहरि विष्णु जी की उत्पत्ति कैसे हुई? इस संदर्भ में , शिवपुराण की कथा प्रचलित हैं।  History of Lord Vishnu:शिव पुराण में उल्लेख है कि विष्णु जी की उत्पत्ति भगवान शंकर जी की इच्छा से हुई है। शिव जी ने एक बार अपने मनोभाव प्रकट करते हुए पार्वती से कहा कि मैं सृष्टि का पालन करने में सक्षम एक ऐसे श्रेष्ठतम साधक की रचना करना चाहता हूं जो संसार का संचालन कर सकें। शिव जी की इच्छानुसार आदिशक्ति ने कमल नयन, चतुर्भुजी और कौस्तुकमणि से सुशोभित विष्णु जी को अवतरित किया। History of Lord Vishnu सर्वत्र व्याप्त होने में सक्षमता के कारण उनका नाम विष्णु हुआ़। History of Lord Vishnu अवतरित होने के तुरंत बाद भगवान शिव ने उन्हें तप के लिए भेजा। चिरकाल तक तपस्या करने के बाद भगवान श्रीहरि विष्णु जी ने अपने तपोबल से जल की उत्पत्ति कर जीवन सृजन किया। भगवान विष्णु की सवारी गरुड़ है। इनके एक हाथ में कौमोदकी गदा, दूसरे हाथ में पाञ्चजन्य शंख, तीसरे हाथ में सुदर्शन चक्र और चौथे हाथ में कमल है। History of Lord Vishnu:भगवान विष्णु का इतिहास History of the Forms of Gods & Goddesses Lord Vishnu:विष्णु रूप में उन्होंने ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी से विवाह किया। माता लक्ष्मी की माता का नाम ख्याति था। विष्णु और लक्ष्मी के करीब 18 पुत्र थे।  आनन्द: कर्दम: श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुत:। ऋषय श्रिय: पुत्राश्च मयि श्रीर्देवी देवता।।- (ऋग्वेद 4/5/6) नाम : विष्‍णु वर्णन : हाथ में शंख, गदा, चक्र, कमल पत्नी : लक्ष्मी पुत्र : आनंद, कर्दम, श्रीद, चिक्लीत शस्त्र : सुदर्शन चक्र वाहन : गरूड़ विष्णु पार्षद : जय, विजय विष्णु संदेशवाहक : नारद निवास : क्षीरसागर (हिन्द महासागर) ग्रंथ : विष्णु ‍पुराण, भागवत पुराण, वराह पुराण, मत्स्य पुराण, कुर्म पुराण। मंत्र : ॐ विष्णु नम:, ॐ नमो नारायण, हरि ॐ विष्णु के प्रकट अवतार :Manifest incarnations of Vishnu 1. हंसावतार : सनकादि मुनियों के दार्शनिक प्रश्नों का समाधान करने के लिए विष्‍णु ने हंसावतार धारण किया था। History of Lord Vishnu उन्होंने मुनियों को वैदिक ज्ञान बताकर दीक्षा प्रदान की थी। हंस रूप विष्णु ने ही शांत नामक दैत्य का वध किया था 2 . आदि वराह अवतार : विष्णु ने कश्यप के पुत्र हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह रूप धरा था। 3. नृसिंह अवतार : विष्णु ने कश्यप के पुत्र हिरण्यकशिपु का नृसिंह रूप धारण कर वध किया था। 4. मोहिनी अवतार : उन्होंने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों से अमृत कलश को बचाकर देवताओं को दे दिया था। 5. जलंधर : विष्णु ने शिव पुत्र जलंधर का रूप धारण करके वृंदा का सतीत्व खंडित किया था। 6. मोहिनी अवतार : विष्णु ने भस्मासुर को मारने के लिए एक बार फिर उन्होंने मोहिनी रूप धारण किया। 7. कच्छप अवतार : समुद्र मंथन के दौरान जब धरती डोल रही थी, तब उन्होंने कच्छप रूप धारण किया। 8. धन्वंतरि : समुद्र मंथन के दौरान अंत में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे History of Lord Vishnu विष्णु जिन्हें भगवान धन्वंतरि कहा गया। भगवान के इस देव रूप ने आयुर्वेद, वेद, आरोग्य, वनस्पति आदि की शिक्षा दी। उनके बाद राजा धन्व के पुत्र धन्वंतरि हुए जिनके केतुमान नामक पुत्र थे। केतुमान के पुत्र का नाम भीमरथ था। भीमरथ के पुत्र का नाम दिवीदास था। दिवीदास का संवरण था जिसने सुदास से युद्ध लड़ा था। 9. हयग्रीव अवतार : विष्णु ने हयग्रीव नामक सोमकासुर को मारने के लिए हयग्रीव का ही रूप धारण किया। 10. मत्स्य अवतार : प्रलयकाल के दौरान मत्स्य रूप धारण कर राजा वैवस्वत मनु को नाव बनाकर सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कहा। 11. गजेन्द्रोधारावतार : हाथी (इंद्रद्युम्न) को मगरमच्छ (हुहू) से बचाने के लिए गजेन्द्रोधारावतार धरण किया। 12. स्वायंभुव मनु के दो पुत्र प्रियवत और उत्तानपाद में से उत्तानपाद के पु‍त्र ध्रुव को विष्णु ने वरदान दिया था। विष्णु के जन्मावतार 1. सनकादि अवतार : विष्णु ने ब्रह्मा के पुत्रों सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार के रूप में जन्म लेकर वेद ज्ञान का प्रकाश फैलाया। 2. नर-नारायण : धर्म की पत्नी रुचि के गर्भ से भगवान विष्णु ने नर और नारायण नामक दो ऋषियों के रूप में जन्म लिया। वे जन्म से तपोमूर्ति थे अतः जन्म लेते ही बदरीवन में तपस्या करने के लिए चले गए। उनकी तपस्या से ही संसार में सुख और शांति का विस्तार होता है। 3. वामनावतार : कश्यप-अदिति के 12 पुत्रों में से एक त्रिविक्रम को भगवान विष्णु का अवतार माना गया जिन्होंने असुर राज बाली से तीन पग में धरती दान में ले ली थी। उन्हें वामन भी कहा गया। 4. परशुराम अवतार : क्रूर राजाओं से समाज को बचाने के लिए और समाज में फिर से वैदिक व्यवस्था लागू करने के लिए विष्णु ने जमदग्नि-रेणुका के पुत्र के रूप में जन्म लिया, जो आगे चलकर परशुराम कहलाए। 5. व्यास अवतार : परशुराम के बाद वेद व्यास के रूप में भगवान ने अवतार लेकर वैदिक ज्ञान का उद्धार किया। (ये वे वेद व्यास नहीं हैं, जो कृष्ण के काल में हुए थे) 5. रामावतार : रावण का वध करने के लिए दशरथ-कौशल्या के पुत्र के रूप में विष्णु ने जन्म लिया। 6. कृष्णावतार : वासुदेव-देवकी के यहां विष्णु ने कृष्ण के रूप में जन्म लेकर दुनिया को गीता का ज्ञान दिया। History of Lord Vishnu:भगवान विष्णु ने ही नृसिंह अवतार लेकर एक और जहां अपने भक्त प्रहलाद को बचाया था वहीं क्रूर हिरण्यकश्यपु से प्रजा को मुक्ति दिलाई थी। उसी तरह वराह अवतार लेकर उन्होंने महाभयंकर हिरण्याक्ष का वध करके देव, मानव और अन्य सभी को भयमुक्त किया था। उन्होंने ही महाबलि और मायावी राजा बलि से देवताओं की रक्षा की थी। History of Lord Vishnu:श्री विष्णु के 24 अवतार : जब-जब पृथ्वी पर कोई संकट आता है तो भगवान अवतार लेकर उस संकट को दूर करते हैं। भगवान विष्णु ने अब तक 23

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Secrets of Mahadev:क्या आप जानते हैं शिव से जुड़े ये 7 गुप्त रहस्य ?

Secrets of Mahadev:शिव पुराण में भगवान शिव को देवों का देव अर्थात महादेव कहा गया है। भगवान शिव को सृष्टि का संहारक भी कहा जाता है लेकिन संहारक का अर्थ यहां केवल सृष्टि के अंत से नहीं है बल्कि सृजन की प्रक्रिया से है। जब-जब पाप धरती पर हावी हो जाता है और मनुष्यता का अंत होने लग जाता है, तो धरा को नवजीवन की आवश्यता होती है, ऐसे में धरती के सृजन के लिए भगवान शिव संहारक की भूमिका निभाते हुए सृष्टि का संहार करते हैं। Secrets of Mahadev:इसके बाद ब्रह्मा धरा का सृजन करते हैं और फिर भगवान विष्णु जगत के पालनहार की भूमिका निभाते हैं। बात करें, भगवान शिव के जीवन की,तो महादेव के बारे में कहा जाता है कि शिव समस्त मोह-माया से दूर रहकर भी संसार से प्रेम करते हैं। कुछ पौराणिक कहानियों में महादेव को निर्मोही भी कहा गया है। आइए, जानते हैं भगवान शिव के जीवन के 7 अद्भुत रहस्य, जो आपको कलियुग के कई सवालों के जवाब देकर आपको जीवन को समझने में मदद करेंगे। इन रहस्यों में जीवन के ऐसे उत्तर छुपे हैं, जो जीवन के प्रति आपको एक उम्मीद भी देंगे। Secrets of Mahadev:शिव से जुड़े ये 7 गुप्त रहस्य? 1. Shiv Ji Ki Kitni Wife Thi:कितनी थीं शिव की पत्नियां? यह रहस्य की बात है कि भगवान शंकर का विवाह सर्वप्रथम प्रजापति दक्ष की पुत्री सती से हुआ फिर जब वे यज्ञकुंड में कूदकर भस्म हो गईं, तब उन्होंने दूसरा जन्म लिया और हिमवान की पुत्री पार्वती कहलाईं। कहते हैं कि गंगा, काली और उमा भी शिव की पत्नियां थीं। 2. कितने हैं शिव के पुत्र:How many sons does Shiva have? भगवान शिव ने पार्वती से विवाह करने के बाद कार्तिकेय नाम का एक पुत्र प्राप्त किया। Secrets of Mahadev गणेश तो माता पार्वती के उबटन से बने थे। सुकेश नामक एक अनाथ बालक को उन्होंने पाला था। जलंधर शिव के तेज से उत्पन्न हुआ था। अय्यप्पा शिव और मोहिनी के संयोग से जन्मे थे। भूमा उनके ललाट के पसीने की बूंद से जन्मे थे। अंधक और खुजा नामक 2 पुत्र और थे जिसके बारे में ज्यादा उल्लेख नहीं मिलता है। 3. शिव के कितने शिष्य:How many disciples does Shiva have? शिव के प्रमुख 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे। Secrets of Mahadev शिव के शिष्यों में वशिष्ठ और अगस्त्य मुनि का नाम भी लिया जाता है। 4. क्या शिव ही बुद्ध थे Was Shiva the Buddha? बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर। 5. क्या शिव और शंकर एक ही हैं Are Shiv and Shankar the same? कुछ पुराणों के अनुसार भगवान शंकर को शिव इसलिए कहते हैं कि वे निराकार शिव के समान हैं। निराकार शिव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के 2 नाम बताते हैं। असल में दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर 2 अलग-अलग सत्ताएं हैं। माना जाता है कि महेश (नंदी) और महाकाल, भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं। 6. हर काल में शिव:Shiva in every era भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं। Secrets of Mahadev वे सतयुग में समुद्र मंथन के समय भी थे और त्रेता में राम के समय भी। द्वापर युग की महाभारत काल में भी शिव थे और कलिकाल में विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण के अनुसार राजा हर्षवर्धन को भगवान शिव ने मरुभूमि पर दर्शन दिए थे। 7. वनवासी और आदिवासियों के देवता:God of forest dwellers and tribals? भारत की असुर, दानव, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, आदिवासी और सभी वनवासियों के आराध्य देव शिव ही हैं। Secrets of Mahadev शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है। सभी दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव धर्म से जुड़े हुए हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की ही परंपरा से ही माने जाते हैं।

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Sawan Month 2025 start date and End date: कब से शुरू हो रहा है सावन का महीना, जानें व्रत तिथि, पूजन विधि…

Sawan Month 2025 start date:भगवान शिव की अराधना का सबसे पवित्र महीना सावन हिंदू धर्म के लोगों के लिए बेहद खास होता है। इस दौरान भक्त सावन सोमवार व्रत रखते हैं। चलिए आपको बताते हैं 2025 में सावन महीना कब से शुरू हो रहा है। Sawan 2025 Date (सावन कब से शुरू है 2025): सावन के महीने को श्रावण मास के नाम से भी जानते हैं। इस महीने में भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है। हिंदू पंचांग अनुसार ये साल का पांचवां महीना होता है। जो जुलाई-अगस्त में पड़ता है। इस दौरान सावन सोमवार व्रत रखने का विशेष महत्व होता है। सावन के महीने में हर साल लाखों श्रद्धालु ज्योर्तिलिंग के दर्शन के लिए जाते हैं। इस महीने में भक्त कांवड़ यात्रा भी निकालते हैं। चलिए आपको बताते हैं इस साल यानी 2025 में सावन कब से लग रहा है। Sawan Puja Rituals: सावन का महीना पूरी तरह भगवान शिव को समर्पित होता है, जिसे शिवभक्त पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं। इस दौरान भक्त रोज़ाना भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं, लेकिन सावन के सोमवार का विशेष महत्व होता है। इस दिन शिव भक्त उपवास रखते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि अर्पित कर जलाभिषेक करते हैं। माना जाता है कि सावन सोमवार का व्रत करने से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न होते हैं और भक्त की हर इच्छा पूरी करते हैं। Sawan Month 2025 start date:सनातन परंपरा के अनुसार, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और इस अवधि में सृष्टि का संचालन भगवान शिव संभालते हैं। यह समय ‘चातुर्मास’ कहलाता है, जो पूरी तरह धर्म, तप, व्रत और संयम का प्रतीक है। ऐसे में सावन का महीना आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद खास माना जाता है। भगवान शिव की आराधना से जीवन की समस्याएं दूर होती हैं और सुख-शांति की प्राप्ति होती है। अब भक्तों को इंतज़ार है सावन के शुभारंभ की तारीख का, जब वे पूरे भक्ति भाव से भोलेनाथ की आराधना में जुट सकें। Sawan Month 2025 start date and End date:कब से शुरू हो रहा है सावन का महीना  Sawan Month 2025 start date वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष सावन का महीना 11 जुलाई 2025 से शुरू होगा। इससे पहले 10 जुलाई को आषाढ़ पूर्णिमा है, जो 10 जुलाई की रात 1:36 बजे से शुरू होकर 11 जुलाई की रात 2:06 बजे तक रहेगी।  सनातन परंपरा में उदया तिथि को मान्यता दी जाती है, इसी कारण श्रावण मास की प्रतिपदा तिथि 11 जुलाई की रात 11:07 मिनट से आरम्भ होकर 12 जुलाई की रात 2:08 मिनट तक रहेगी। और इसीलिए 11 जुलाई से सावन माह की शुरुआत मानी जाएगी। सावन माह पर योग:Yoga on the month of Sawan Sawan Month 2025 start date इस बार सावन के पहले ही दिन एक विशेष योग बन रहा है, जिसे शिववास योग कहा जाता है। इस शुभ संयोग में भगवान शिव माता पार्वती के साथ कैलाश पर्वत पर विराजमान रहेंगे। Sawan Month 2025 start date मान्यता है कि इस योग में शिवजी की पूजा और जलाभिषेक करने से साधक को सौभाग्य, सुख-समृद्धि और मनचाहा वरदान प्राप्त होता है। सावन के सोमवार व्रत की तिथियां :Dates of Monday fast of Sawan 14 जुलाई – पहला सोमवार व्रत21 जुलाई – दूसरा सोमवार व्रत28 जुलाई – तीसरा सोमवार व्रत04 अगस्त – चौथा और अंतिम सोमवार व्रतइसके बाद 09 अगस्त को सावन पूर्णिमा के साथ यह पावन महीना समाप्त होगा। Sawan Month 2025 start date इसी दिन रक्षाबंधन का त्योहार भी मनाया जाएगा।  पूजा विधि Puja vidhi सावन माह का धार्मिक लाभ : Religious benefits of Sawan month Sawan Month 2025 start date सावन माह हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है और यह विशेष रूप से भगवान शिव की उपासना का समय होता है। इस माह में शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि चढ़ाने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और पापों का नाश होता है। सावन सोमवार का व्रत रखने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और दांपत्य जीवन सुखमय बनता है। इस समय ध्यान, जप, व्रत और दान करने से आत्मिक शुद्धि होती है और पूर्व जन्मों के पाप भी नष्ट होते हैं। यह माह व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।

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33 koti gods names list:33 करोड़ नहीं 33 प्रकार के हैं देवता, जानिए कौन-कौन शामिल हैं 33 कोटि देवताओं में

33 koti gods:एक मान्यता प्रचलित है कि हिन्दू धर्म में कुल 33 करोड़ देवी-देवता माने हैं, जबकि ये बात सही नहीं है। हिन्दु धर्म में 33 करोड़ नहीं 33 कोटि यानी 33 प्रकार के देवता हैं। जानिए इस मान्यता से जुड़ी खास बातें… हिन्दू धर्मग्रंथों में 33 करोड़ नहीं, बल्कि 33 कोटि देवताओं का जिक्र है। यहां कोटि शब्द का अर्थ करोड़ नहीं, बल्कि प्रकार या श्रेणी है। संस्कृत शब्द कोटि के दो अर्थ हैं — करोड़ और प्रकार। इसी वजह से शब्द का गलत अनुवाद करके लोगों ने यह समझ लिया कि हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवता हैं। हिंदू ग्रंथो में 33 कोटि देवी देवता का जिक्र है. कोटि शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका सही अर्थ “प्रकार” है 33 koti gods यानी की हिंदू धर्म में 33 प्रकार के देवी देवता होते हैं. जबकि कोटि शब्द को कहीं कहीं करोड़ भी कहा जाता है इसी वजह से हिंदू धर्म में ये भ्रांति फैली कि हिंदू धर्म में 33 कोटि यानी 33 करोड़ देवी देवता होते हैं. सनातन धर्म इस संसार का सबसे प्राचीन धर्म माना जाता है, जिसमें अनेकों देवी देवताओं की पूजा की जाती है. 33 koti gods अनेकों त्यौहार और धार्मिक मान्यताओं का पालन किया जाता है. सनातन धर्म में कुल कितने देवी देवता हैं, ये प्रश्न हमेशा लोगों की जिज्ञासा रहा है.क्योंकि सनातन धर्म को लेकर लोगों में कुछ भ्रांतियां फैली हुई हैं. जिनमें से सबसे बड़ी भ्रांति है कि 33 koti gods हिंदू धर्म में 33 करोड़ देवी -देवता हैं. आज के समय में भी ज्यादातर लोगों का यही मानना है कि हिंदुओं के 33 करोड़ देवी- देवता होते हैं. आइए जानते हैं, क्या वाकई में हिंदुओ के 33 करोड़ देवी देवता होते हैं? सनातन धर्म का प्राचीन इतिहास रहा है, ये कितना पुराना है या कब से अस्तित्व में आया कोई नहीं जानता.इसी तरह संस्कृत भी बहुत पुरानी भाषा मानी जाती है यही हमारे वेदों की भाषा है, सनातन धर्म में पहले संस्कृत भाषा ही प्रचलन में थी इसका प्रमाण हमारे वेद और उपनिषद हैं जो कि संस्कृत में लिखे गए हैं. हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ गीता और रामायण भी संस्कृत में ही लिखे गए थे. बाद में हिंदी भाषा अस्तित्व में आई और दुनिया भर में फैले हिन्दुओं ने इसे अपनी भाषा के रूप में अपनाया और संस्कृत जिसे बड़े स्तर पर हिंदू लोगों ने अपनाया तभी से धीरे धीरे संस्कृत भाषा पीछे छूटती रही और लोग संस्कृत भूलते गए. इसी वजह से हिंदू धर्म के सभी पवित्र ग्रंथों का संस्कृत भाषा से हिंदी भाषा में अनुवाद किया जाने लगा. क्या है कोटि का अर्थ?:What is the meaning of Koti? कोटि के संस्कृत में दो अर्थ होते हैं – 33 koti gods एक करोड़ और दूसरा सर्वोच्च लेकिन आम बोलचाल की भाषा में कोटि शब्द को करोड़ के रूप में देखा गया, जिससे यह माना जाने लगा कि हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की संख्या 33 करोड़ है. हालांकि यहां कोटि का अर्थ सर्वोच्च है। ऐसे में चलिए जानते हैं कि 33 कोटि देवी-देवता कौन-से हैं। 33 koti gods names list:ग्रंथों में 33 देवताओं के बारे में लिखा है। ये 33 देवता अलग-अलग कोटियों या श्रेणियों में बताए हैं- 33 koti gods:मान्यताओं के अनुसार 33 कोटि देवताओं में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, इंद्र और प्रजापति आते हैं. कहीं कहीं इसमें इंद्र व प्रजापति की जगह दो अश्विनी कुमारों को शामिल किया गया है. ये हैं 33 कोटि देवी-देवता:These are 33 crore Gods and Goddesses 8 वासु – 1. आप 2. ध्रुव 3. सोम 4. धर 5. अनिल 6. अनल 7. प्रत्यूष 8. प्रभाष 11 रुद्र: 1.मनु 2.मन्यु 3.शिव 4.महत 5.ऋतुध्वज 6.महिनस 7.उम्रतेरस 8.काल 9.वामदेव 10.भव 11.धृत-ध्वज 12.आदित्य : 1. अंशुमान 2. अर्यमन 3. इंद्र 4. त्वष्टा 5. धातु 6. पर्जन्य 7. पूषा 8. भग 9. मित्र 10. वरुण 11. वैवस्वत 12. विष्णु इंद्र प्रजापति (इंद्र और प्रजापति या अश्विनी कुमार):Indra and Prajapati or Ashwini Kumar) इंद्र देवताओं के राजा माने जाते हैं, जो मेघ, वर्षा और युद्ध के देवता हैं। प्रजापति ब्रह्मा का एक रूप माने जाते हैं, जो सृष्टि के रचयिता हैं। कई शास्त्रों में इनके स्थान पर अश्विनी कुमारों को 33 कोटि देवताओं में शामिल किया गया है। ये दोनों जुड़वां देवता हैं और आयुर्वेद से जुड़े हैं।

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History Of Kedarnath Temple:नर-नारायण और पांडवों से जुड़ा है केदारनाथ का इतिहास, आदिगुरु शंकराचार्य ने कराया था मंदिर का जिर्णोद्धार

History Of Kedarnath Temple:शिव जी का पांचवां ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड में है। इसका नाम है केदारनाथ। ये मंदिर उत्तराखंड के चारधामों में भी शामिल है। शिव जी के इस धाम का इतिहास भगवान विष्णु के अवतार नर-नारायण, पांडव और आदिगुरु शंकराचार्य से जुड़ा है। ये मंदिर हिमालय क्षेत्र में है, इस वजह से शीत ऋतु के समय करीब 6 महीने बंद रहता है और ग्रीष्म ऋतु के समय भक्तों के लिए खोला जाता है। जानिए पांचवें ज्योतिर्लिंग से जुड़ी खास बातें… History Of Kedarnath Temple:नर-नारायण के तप से प्रसन्न होकर प्रकट हुए थे शिव जी पांडवों से जुड़ी है केदारनाथ की मान्यता:The belief of Kedarnath is related to Pandavas. History Of Kedarnath महाभारत के समय यानी द्वापर युग में केदार क्षेत्र में शिव जी ने पांडवों को बेल रूप में दर्शन दिए थे। वर्तमान मंदिर का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य ने 8वीं-9वीं सदी में करवाया था। ये मंदिर उत्तराखंड के चार धामों में से एक है। मंदिर समुद्र तल से करीब 3,583 मीटर की ऊंचाई पर है। ये मंदिर हिमालय क्षेत्र में है, इस कारण शीत ऋतु के दिनों में बंद रहता है। गुरु शंकराचार्य ने कराया था मंदिर का जिर्णोद्धार:Guru Shankaracharya had renovated the temple मान्यता है कि ये केदारनाथ धाम में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। स्वयंभू शिवलिंग का अर्थ है जो स्वयं प्रकट हुआ है। History Of Kedarnath केदारनाथ मंदिर का निर्माण पांडव राजा जनमेजय ने करवाया था। बाद में आदि गुरु शंकराचार्य ने इस मंदिर का जिर्णोद्धार करवाया। मंदिर से जुड़ी अन्य खास बातें:Other special things related to the temple केदारनाथ मंदिर में सोना लगाने का इतिहास:History of applying gold in Kedarnath temple केदारनाथ मंदिर में सोना लगाने के इतिहास का जिक्र नहीं मिलता है. हालांकि ऐसा दावा किया जाता है कि History Of Kedarnath केदारनाथ मंदिर के निर्माण के बाद से 12 वीं शताब्दी तक यहां सोना-चांदी लगाया जाता था, इसके बाद यह प्रथा खत्म हो गई. पिछले साल जब यहां सोने की परत चढ़ाने काम काम शुरू हुआ था उससे पहले यहां दीवारों पर चांदी की परत चढ़ी थी. जब सोने की परत का काम शुरू हुआ तो पुजारियों ने विरोध किया था. उस वक्त केदार सभा के पूर्व अध्यक्ष महेश बगवाड़ी ने कहा था कि मंदिर की दीवारों पर सोना चढ़ाना हिंदू मान्यताओं और परंपराओं के अनुरूप है. उस वक्त BKTC के चेयरमैन अजेंद्र अजय ने भी कहा था कि यह सामान्य प्रक्रिया है, पहले छत लकड़ी से बनती थी, फिर पत्थर से बनी, इसके बाद तांबें की प्लेंटे आईं. उन्होंने विरोध को साजिश बताया था. महाभारत में है केदारनाथ का जिक्र:Kedarnath is mentioned in Mahabharata History Of Kedarnath केदारनाथ का इतिहास बेहद पुराना है, महाभारत में भी इसका जिक्र मिलता है, ऐसा दावा किया जाता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था. इसके पीछे यहां एक किवदंती भी है, ऐसा कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद गौत्र बंधुओं की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए पांडव भगवान शंकर के पास केदारघाटी गए. भोलेनाथ ने पांडवों को दर्शन न देने के लिए भैंसे का रूप रख लिया और जानवरों के बीच छिप गए. उन्हें ढूंढने के लिए भीम ने विशाल रूप रखकर घाटी के दोनों ओर पैर जमा लिए. जब भगवान शंकर पहचान लिए गए तो वह धरती में समाने लगे, तभी भीम ने उनका पृष्ठ भाग पकड़ लिया. इसके बाद भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर पांडवों को दर्शन दिए. History Of Kedarnath केदारनाथ मंदिर में भगवान भोलेनाथ के इसी पृष्ठ भाग का पूजन होता है.

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Shani Dev Bhog:नाराज शनि को करना है प्रसन्न,तो लगाएं इन चीजों का भोग ,मिलेंगे कई शुभ परिणाम

Shani Dev Bhog: शनि देव को प्रसन्न कर उनकी कृपा पाने के कई उपाय ज्योतिष में बताए गए हैं, जिससे शुभ परिणाम मिलते हैं. शनि देव की पूजा में उनकी प्रिय चीजों का भोग लगाने से भी भगवान शनि प्रसन्न होते हैं. Shani Dev Bhog: हिंदू धर्म में सभी देवी-देवताओं की पूजा के कुछ विशेष नियम होते हैं. विधि और नियमपूर्वक पूजा करने से ही देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और पूजा-पाठ का शुभ फल प्राप्त होता है. पूजा-पाठ से जुड़े कई नियमों में एक है ‘भोग’. पूजा के दौरान भगवान को उनकी प्रिय चीजों का भोग जरूर लगाना चाहिए. पूजा में भोग लगाने को जरूरी प्रकिया माना जाता है. साथ ही भोग लगाते समय नियमों का पालन भी करना चाहिए. बात करें शनि देव की तो, शनि देव को प्रसन्न करने के भी कई उपाय बताए गए हैं. माना जाता है कि शनिवार के दिन भगवान शनि की पूजा करने और उनकी पसंदीदा चीजों का भोग लगाने से शनि देव प्रसन्न होते हैं और शनि के अशुभ प्रभाव भी कम होते हैं. आइये जानते हैं शनि देव की पूजा में किन चीजों का भोग लगाना चाहिए. शनि देव के प्रिय भोग (Shani Dev ke Bhog) शनि देव को कुछ विशेष चीजों का भोग लगाया जाता है. शनि देव Shani Dev Bhog की पूजा करते समय भोग में आप गुड़, काली उड़द दाल की खिचड़ी, काले तिल से बनी चीजें, मीठी पुड़ी, गुलाब जामुन आदि चीजों का भोग लगा सकते हैं. लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि भोग शुद्ध और सात्विक हो. इन चीजों का भोग लगाने से शनि देव प्रसन्न होते हैं. साथ ही कुंडली से शनि दोष, साढ़ेसाती, ढैय्या या महादशा का प्रभाव भी कम होता है. इन बातों का रखें ध्यान (Shani Dev Puja Niyam) न खरीदें ये चीजें शनिवार के दिन सरसों का तेल खरीदने से बचना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस दिन तेल खरीदने से इंसान को जीवन में कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा लोहे का सामान खरीदने से भी बचें। न करें ये कामशनिवार का दिन शनिदेव का प्रिय होता है। इस दिन कुछ बातों का अवश्य ध्यान रखें। Shani Dev Bhog शनिवार को बाल काटना, नाखून काटना, बाल धोना भी वर्जित है।इन मंत्रों का करें जापशनि गायत्री मंत्रओम भगभवाय विद्महैं मृत्युरुपाय धीमहि तन्नो शनिः प्रचोद्यात्शनि आह्वान मंत्रनीलाम्बरः शूलधरः किरीटी गृध्रस्थित स्त्रस्करो धनुष्टमान् |चतुर्भुजः सूर्य सुतः प्रशान्तः सदास्तु मह्यां वरदोल्पगामी || शनि देव को भोग लगाने के मंत्र (Shani Dev Bhog Mantra) Shani Dev Bhog शनि देव को भोग लगाने के बाद बाद काली तुलसी की माला से ऊँ शं शनैश्चराय नम: मंत्र का 108 बार जाप करें. इसके बाद तिल या सरसों के तेल का दीप जलाएं और शनि देव की आरती करें- शनि देव आरती (Shani Dev Aarti in Hindi) जय-जय श्रीशनिदेव भक्तन हितकारी।सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी ।। जय-जय ।।श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी ।नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी ।। जय-जय ।।क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी ।मुक्तन की माला गले शोभित बलिहार ।। जय-जय ।।मोदक मिष्ठान पान चढ़त है सुपारी ।लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी ।। जय-जय ।।देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी ।विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ।। जय-जय ।।

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Mata Lakshmi Ko Prasann Karne Ke Mantra:मां लक्ष्‍मी को प्रसन्न करने के लिए इन मंत्रों का करें जाप, सुख और सौभाग्य में होगी वृद्धि

Mata Lakshmi Ko Prasann Karne Ke Mantra:मां लक्ष्मी को धन की देवी कहा जाता है. इसलिए लक्ष्मी जी की पूजा करने से आर्थिक संकट दूर होता है और धन का लाभ होता है. लक्ष्मी की पूजा करने के साथ मंत्रों का उच्चारण करने से धन लाभ होने के साथ ही सुख-समृद्धि का वास होता है. कई बार कड़ी मेहनत के बाद भी पैसों की बरकत नहीं होती है, जिस कारण जीवन में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है. लिहाजा मां लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए. मां लक्ष्मी को धन की देवी कहा जाता है, Mata Lakshmi Ko Prasann Karne Ke Mantra इसलिए लक्ष्मी जी की पूजा करने से आर्थिक संकट दूर होता है और धन का लाभ होता है. शुक्रवार को धन की देवी मां लक्ष्मी का दिन माना जाता है. इस दिन लक्ष्मी की पूजा करने के साथ मंत्रों का उच्चारण करने से धन लाभ होने के साथ ही सुख-समृद्धि का वास होता है. Mata Lakshmi Ko Prasann Karne Ke Mantra आइये जानते हैं मां लक्ष्मी के प्रभावी मंत्र (Maa Laxmi Mantra). Mata Lakshmi Ko Prasann Karne Ke Mantra:मां लक्ष्मी के प्रभावी मंत्र Chanting mantra according to zodiac sign:राशि अनुसार मंत्र जप मेष राशि के जातक मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु ‘ॐ सरस्वत्यै नमः’ मंत्र का जप करें। वृषभ राशि के जातक मनचाहा वरदान पाने के लिए ‘ॐ भैरव्यै नमः’ मंत्र का जप करें। मिथुन राशि के जातक कारोबार में सफलता के लिए ‘ॐ त्रिपुरायै नमः’ मंत्र का जप करें। कर्क राशि के जातक तनाव से मुक्ति पाने के लिए ‘ॐ नादिन्यै नमः’ मंत्र का जप करें। सिंह राशि के जातक करियर में सफल होने के लिए ‘ॐ हंसायै नमः’ मंत्र का जप करें। कन्या राशि के जातक बिजनेस में दोगुना लाभ के लिए ‘ॐ महाकाल्यै नमः’ मंत्र का जप करें। तुला राशि के जातक Mata Lakshmi Ko Prasann Karne Ke Mantra सौभाग्य में वृद्धि पाने के लिए ‘ॐ काल्यै नमः’ मंत्र का जप करें। वृश्चिक राशि के जातक आर्थिक तंगी दूर करने हेतु ‘ॐ कामदायै नमः’ मंत्र का जप करें। Mata Lakshmi Ko Prasann Karne Ke Mantra धनु राशि के जातक मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए ‘ॐ देव्यै नमः’ मंत्र का जप करें। मकर राशि के जातक शनि बाधा दूर करने के लिए ‘ॐ दाक्षायण्यै नमः’ मंत्र का जप करें। कुंभ राशि के जातक निवेश में लाभ कमाने के लिए ‘ॐ देवमात्रे नमः’ मंत्र का जप करें। मीन राशि के जातक शुक्रवार के दिन पूजा के समय ‘ॐ परायै नमः’ मंत्र का जप करें। Mantras of Goddess Lakshmi:मां लक्ष्मी के मंत्र 1. या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी। या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥ या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी। सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥ 2. ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रिभुवन महालक्ष्म्यै अस्मांक दारिद्र्य नाशय प्रचुर धन देहि देहि क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ । 3. ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ ।। 4. ॐ सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो, धन धान्यः सुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॐ ।। ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥ 5. ॐ ह्रीं क्ष्रौं श्रीं लक्ष्मी नृसिंहाय नमः । ॐ क्लीन क्ष्रौं श्रीं लक्ष्मी देव्यै नमः ।। 6. ॐ ह्री श्रीं क्रीं श्रीं क्रीं क्लीं श्रीं महालक्ष्मी मम गृहे धनं पूरय पूरय चिंतायै दूरय दूरय स्वाहा । 7. ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ॐ ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्री ॐ। 8. ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥ 9. ऊँ हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम ।। 10. ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नम: Lakshmi Narayan Namah:लक्ष्मी नारायण नम:सुखी दांपत्य के लिए मां देवी लक्ष्मी के इस मंत्र का जाप करना चाहिए. या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी।या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी।सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥ Mata Lakshmi Ko Prasann Karne Ke Mantra सभी संकटों से मुक्ति के लिए इस मंत्र का जाप करना शुभ होता है. Mata Lakshmi Ko Prasann Karne Ke Mantra इससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है.

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Kedarnath Dham Kese Jaye:केदारनाथ जाने का बना रहे हैं प्लान, तो यहां जानिये खर्चा, समय और रास्ते के बारे में

Kedarnath Dham Kese Jaye : हर साल लाखों श्रद्धालु (Delhi) दिल्ली के रास्ते केदारनाथ धाम की यात्रा करते हैं। अगर आप केदारनाथ जा रहे हैं, तो इसके आसपास और भी खूबसूरत जगहें हैं, जो घूमने के लिए बहुत अच्छी हैं। Kedarnath Yatra Route map:भगवान शिव को समर्पित और 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक केदारनाथ पवित्र स्थल है। यह मंदिर बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच स्थित है। समुद्र तल से 3585 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारानाथ मंदिर उत्तराखंड (Kedarnath Temple Uttarakhand) में चार धाम और पंच केदार का एक हिस्सा है। हर साल लाखों श्रद्धालु दिल्ली के रास्ते केदारनाथ धाम की यात्रा करते हैं। खूबसूरत मंदाकिनी नदी मंदिर के पास बहती है। बर्फ से ढंकी चोटियां इस जगह के आकर्षण को बढ़ा देती हैं। आश्चर्य की बात है कि यह मंदिर अप्रैल के अंत और मई के पहले सप्ताह में खुलता है और अक्टूबर के अंत और नवंबर के पहले सप्ताह में बंद हो जाता है। मंदिर के भीतर एक नुकीली सी चट्टान की पूजा भगवान शिव के रूप में की जाती है। Kedarnath Dham Kese Jaye अगर आप केदारनाथ जा रहे हैं, तो इसके आसपास और भी खूबसूरत जगहें हैं, Kedarnath Dham Kese Jaye जो घूमने के लिए बहुत अच्छी हैं। तो आइए जानते हैं केदारनाथ की यात्रा से जुड़ी कुछ जरूरी बातें और आसपास घूमने वाली जगहों के बारे में। Kedarnath Dham Yatra Route Map: भगवान शिव को समर्पित और 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक केदारनाथ पवित्र स्थल है। यह मंदिर बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच स्थित है। समुद्र तल से 3585 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारानाथ मंदिर उत्तराखंड (Kedarnath Temple Uttarakhand) में चार धाम और पंच केदार का एक हिस्सा है। Kedarnath Dham Kese Jaye हर साल लाखों श्रद्धालु दिल्ली के रास्ते केदारनाथ धाम की यात्रा करते हैं। खूबसूरत मंदाकिनी नदी मंदिर के पास बहती है। बर्फ से ढंकी चोटियां इस जगह के आकर्षण को बढ़ा देती हैं। केदारनाथ का रूट – Kedarnath Route केदारनाथ की यात्रा 5 रातें 6 दिन की होती है। पहला दिन – दिल्ली से हरिद्धार (230 किमी) या 6 घंटे – दिल्ली से ट्रेन या फ्लाइट से हरिद्वार जा सकते हैं और फिर होटल में चेकइन कर सकते हैं। Ganga गंगा आरती के लिए शाम को हर की पौड़ी जाएं और फिर अपने होटल में डिनर और नाइट स्टे करें। दूसरे दिन – हरिद्वार से रूद्रप्रयाग (165 किमी) या 6 घंटे –सुबह सीधे जोशीमठ के लिए निकलें। यहां रास्ते में देवप्रयाग और रूद्रप्रयाग के होटल में ठहरें। तीसरा दिन – रूद्रप्रयाग से केदारनाथ (75 किमी ) 3 घंटे 14 किमी ट्रेक – गौरीकुंड के लिए सुबह पैदल, टट्टू , डोली से आप गौरकुंड के लिए ट्रेक शुरू कर सकते हैं। शाम की आरती के लिए केदारनाथ जाएं और फिर यहीं पर नाइट स्टे करें। दिन 4 – केदारनाथ से रूद्रप्रयाग – (75 किमी) 3 घंटे – सुबह केदारनाथ जी के दर्शन करें और फिर गौरीकुंड की यात्रा करें। बाद में वापस रूद्रप्रयाग जाएं और होटल में नाइट स्टे करें। दिन 5- रूद्रप्रयाग से हरिद्वार- 160 किमी 5 घंटे – हरिद्वार के लिए निकलें। रास्ते में ऋषिकेश में दर्शनीय स्थल की यात्रा कर सकते हैं। इसके बाद हरिद्वार पहुंचे और यहीं पर नाइट स्टे करें। दिन 6- हरिद्वार से दिल्ली 230 किमी 6 घंटे – सुबह आप हरिद्वार के स्थानीय स्थलों की यात्रा कर दिल्ली ऐयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हो सकते हैं। How much does it cost to visit Kedarnath Dham? केदारनाथ धाम के दर्शन में कितना लगता है खर्च? दिल्ली से देहरादून तक आप 300 से 1000 रूपए में आसानी से पहुंच सकते हैं. देहरादून से गौरीकुंड के लिए बस करने पर आपको करीब 500 का टिकट लगेगा. दिल्ली से गौरीकुंड के लिए सीधे बस सेवा भी मिलती है Kedarnath Dham Kese Jaye जिसका किराया 500 से 1000 के बीच होता है. अगर हेली सेवा ले रहे हैं Kedarnath Dham Kese Jaye तो प्रति व्यक्ति सिरसी से 5498 रुपये राउंड ट्रिप, फाटा से केदारनाथ धाम का टिकट 5500 रुपये और गुप्तकाशी से 7740 रुपये का टिकट मिलेगा. हेलीकॉप्टर सेवा कई लोगों के बजट से बाहर होती है, तो ऐसे में आप गौरीकुंड से केदारनाथ धाम जाने के लिए पालकी या फिर घोड़े भी बुक कर सकते हैं. केदारनाथ के पास घूमने की जगहें – Places to visit around Kedarnath गांधी सरोवर Gandhi Sarovar – केदारनाथ और कीर्ति स्तंभ चोटी की तलहटी पर समुद्र तल से 3900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गांधी सरोवर को चोराबाड़ी ताल के नाम से भी जाना जाता है। यह केदारनाथ मंदिर से 3 किमी के ट्रैकिंग डिस्टेंस पर स्थित है। सोनप्रयाग Sonprayag – मंदाकिनी और बासुकी दो पवित्र नदियों के संगम पर स्थित सोनप्रयाग केदारनाथ धाम के रास्ते में एक धर्मिक स्थल है। तीर्थयात्री मंदिर की यात्रा शुरू करने से पहले नदी में डुबकी लगाते हैं। गौरीकुंड मंदिर Gaurikund Temple – केदारनाथ यात्रा के बाद आप गौरीकुंड मंदिर जा सकते हैं। यह मंदिर देवी पार्वती को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां देवी पार्वर्ती ने भगवान शिव का दिल जीतने के लिए तपस्या की थी। Kedarnath Dham Kese Jaye गौरीकुंड में गर्म पानी के झरने हैं, जहां तीर्थीयात्री स्नान कर सकते हैं। वासकुी ताल Vasaku Tal – केदारनाथ से 5 किमी की दूरी पर स्थित वासुकी ताल समुद्र तल से 4,135 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह झील अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। वासुकी ताल ट्रैक आप चौखंभा चोटी के दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। कैसे जाएं केदारनाथ – How To reach Kedarnath Delhi to Kedarnath by train दिल्ली से केदारनाथ ट्रेन से – अगर आप ट्रेन से केदारनाथ जाने की सोच रहे हैं, तो ट्रेन की सुविधा सिर्फ हरिद्वार तक है। आपको दिल्ली से हरिद्वार के लिए ट्रेन लेनी होगी। Kedarnath Dham Kese Jaye हरिद्वार से सड़क के रास्ते या फिर हेलीकॉप्टर से केदारनाथ जाना होगा। Delhi to Kedarnath by flight फ्लाइट से दिल्ली से केदारनाथ – आप फ्लाइट से केदारनाथ जाना चाहते हैं, तो देहरादून में जॉली ग्रेट एयरपोर्ट है। यह केदारनाथ से लगभग 239 किमी दूर है। देहरादून से केदारानाथ जाने के लिए बस और टैक्सी की सुविधा भी उपलब्ध हैँ। Delhi to Kedranath by road सड़क के रास्ते

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