Durva Ashtami

Durva Ashtami 2026 Date And Time : दुर्वा अष्टमी तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व और गणेश जी को क्यों प्रिय है दूर्वा….

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Durva Ashtami 2026 Date And Time : दुर्वा अष्टमी तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व और गणेश जी को क्यों प्रिय है दूर्वा….
KARMASU 13 September 2026 7 मिनट पढ़ें
FESTIVAL📅 13 September 2026⏱ 7 मिनट
इस लेख में
  1. दुर्वा अष्टमी 2026 की सही तिथि और पंचांगीय समय : Correct Date and Panchang Timing for Durva Ashtami 2026
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Durva Ashtami 2026 Mein Kab hai : भाद्रपद मास का शुक्ल पक्ष सनातन परंपरा में व्रतों और उत्सवों का एक अत्यंत पवित्र काल माना जाता है। इसी पावन अवधि में श्री गणेश की प्रिय दूर्वा (दूब) घास की पूजा का विशेष पर्व मनाया जाता है, जिसे हम दूर्वा अष्टमी के नाम से जानते हैं। वर्ष 2026 में दूर्वा अष्टमी Durva Ashtami का यह व्रत महिलाओं के लिए अपने बच्चों की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, दांपत्य जीवन में मधुरता और गृह-समृद्धि की कामना हेतु एक अद्भुत अवसर लेकर आ रहा है।

सनातन संस्कृति में वनस्पति पूजन का बहुत गहरा अर्थ है। दूर्वा जैसी साधारण सी दिखने वाली घास, जो हर मौसम में हरी-भरी रहती है और कट जाने पर भी दोबारा पनप उठती है, उसे इस दिन देवी-स्वरूप मानकर पूजा जाता है। हम Durva Ashtami 2026 की सही तिथि, पंचांगीय गणना, अनलासुर वध की पौराणिक कथा, दूर्वा घास का विशेष महात्म्य, चरण-दर-चरण पूजा विधि और राधा अष्टमी से इसके संबंध पर सविस्तार चर्चा करेंगे ।

दुर्वा अष्टमी 2026 की सही तिथि और पंचांगीय समय : Correct Date and Panchang Timing for Durva Ashtami 2026

वैदिक पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को यह पावन व्रत रखा जाता है। पंचांगीय गणना और उदया तिथि के नियमों के अनुसार

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पर्व की मुख्य तिथि: इस वर्ष Durva Ashtami 2026 का पावन पर्व 18 सितंबर 2026, दिन शुक्रवार को पूरे देश में श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा ।

अष्टमी तिथि का प्रारंभ: भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि का प्रारंभ 18 सितंबर 2026 को तड़के (12:00 AM) से हो जाएगा ।

अष्टमी तिथि का समापन: इस पावन तिथि का समापन 19 सितंबर 2026 को दोपहर 03 बजकर 27 मिनट (3:27 PM) पर होगा।

राधा अष्टमी और महालक्ष्मी व्रत का अद्भुत योग: 18 सितंबर के दिन ही राधा अष्टमी Durva Ashtami का उत्सव भी मनाया जाएगा और इसी दिन से 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत का प्रारंभ भी हो रहा है।

चूंकि धार्मिक अनुष्ठानों और व्रतों के लिए उदया तिथि का मान सर्वोपरि माना जाता है, इसलिए अधिकांश क्षेत्रों में Durva Ashtami 2026 का निर्जला या फलाहारी व्रत 18 सितंबर को ही रखा जाएगा ।

दूर्वा घास का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व : Religious and Scientific Significance of Durva Grass

दूर्वा (वैज्ञानिक नाम: Cynodon dactylon) जिसे आम भाषा में दूब कहा जाता है, उसे सनातन परंपरा में अमरता और पुनर्जीवन का प्रतीक माना गया है ।

अमरता और निरंतरता का प्रतीक: दूर्वा घास की यह विशेषता है कि भीषण गर्मी या सूखे में भी यह कभी पूरी तरह नष्ट नहीं होती। बारिश की एक बूँद पाते ही अपनी हर गाँठ से नई जड़ें निकालकर यह फिर से हरी-भरी हो जाती है। इसीलिए जब महिलाएं दूर्वा की पूजा करती हैं, तो वे अपने बच्चों और वंश के लिए दूर्वा जैसी ही अटूट, दीर्घ और समृद्ध आयु की प्रार्थना करती हैं ।

समुद्र मंथन और अमृत कणों का वास: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब देव और दानव अमृत कलश ले जा रहे थे, तब अमृत की कुछ दिव्य बूँदें धरती पर बिखरीं और दूर्वा घास पर आ गिरीं। Durva Ashtami तभी से दूर्वा में अमृत-तत्व का वास माना जाने लगा और इसे मांगलिक कार्यों जैसे विवाह, गृह-प्रवेश और कलश स्थापना में अनिवार्य कर दिया गया ।

पर्यावरण और प्रकृति प्रेम: व्यावहारिक दृष्टि से भी दूर्वा मिट्टी के कटाव को रोकती है और पशुओं के लिए पौष्टिक आहार प्रदान करती है। Durva Ashtami हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के इस सबसे सहनशील रूप को पूजा में सर्वोच्च स्थान देकर पर्यावरण संरक्षण का महान संदेश दिया था ।

    पौराणिक कथा: गणेश जी को क्यों चढ़ाई जाती है 21 दूर्वा : Mythological Story: Why are 21 blades of Durva grass offered to Lord Ganesha

    भविष्य पुराण में भगवान श्री कृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के संवाद में इस पावन व्रत की उत्पत्ति की कथा मिलती है।

    प्राचीन काल में अनलासुर नाम का एक भयंकर राक्षस था, जिसके नेत्रों से अग्नि की ज्वालाएं निकलती थीं और वह ऋषियों तथा मनुष्यों को निगल जाता था । Durva Ashtami देवताओं की प्रार्थना पर भगवान गणेश ने अनलासुर का संहार करने के लिए उसे पूरा का पूरा निगल लिया ।

    लेकिन राक्षस के पेट में जाते ही गणेश जी के पेट में तीव्र जलन और दाह उत्पन्न होने लगा । भगवान विष्णु का कमल, चंद्र देव की चांदनी और शिव जी का शेषनाग भी गणेश जी के शरीर की जलन को शांत नहीं कर सका। तब ऋषियों और मुनियों ने गणेश जी के मस्तक पर 21 दूर्वा की कोमल पत्तियां (गांठें) रखीं । दूर्वा की ठंडक मिलते ही गणेश जी की पेट की जलन तुरंत शांत हो गई ।

    तब अति प्रसन्न होकर भगवान श्री गणेश ने यह वरदान दिया कि जो भी भक्त मुझे 21 दूर्वा की पत्तियां अर्पित करेगा, उस पर मेरी असीम कृपा रहेगी। इसी कारण Durva Ashtami 2026 के दिन गणेश जी को 21 दूर्वा या 3-3 पत्तियों वाले अष्ट-दूर्वा गुच्छे चढ़ाने का विशेष विधान है। 3 पत्तियों वाला दूर्वा दल ब्रह्मा, विष्णु और महेश (या शिव, शक्ति और गणेश) का संयुक्त स्वरूप माना जाता है।

    दुर्वा अष्टमी 2026 की चरण-दर-चरण पूजा विधि : Step-by-step worship ritual for Durva Ashtami 2026

    व्रत के दिन महिलाएं अत्यंत सात्विकता और नियम-निष्ठा से भगवान गणेश, गौरी और दूर्वा देवी का पूजन करती हैं:

    प्रातः स्नान और स्वच्छता: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें।

    पूजा स्थल की तैयारी: घर के मंदिर या एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान गणेश और माता पार्वती (गौरी) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

    दूर्वा संग्रह: बगीचे या स्वच्छ स्थान से ताजी, कोमल और बिना नोक टूटी हरी दूर्वा एकत्र करें। इसे पानी से धोकर 8 या 21 पत्तियों के छोटे-छोटे गुच्छों (अष्ट दूर्वा) में धागे से बांध लें।

    षोडशोपचार पूजन: गणेश-गौरी को जल, अक्षत, रोली, कुमकुम, हल्दी, सफेद व लाल पुष्प और फल (जैसे बेल, नींबू, अनार) अर्पित करें।

    दूर्वा अर्पण: दूर्वा को देवी-स्वरूप मानकर उस पर कुमकुम और हल्दी लगाएं तथा भगवान गणेश के मस्तक व चरणों में 21 दूर्वा अर्पित करें।

    कथा श्रवण और आरती: Durva Ashtami 2026 की पौराणिक व्रत कथा पढ़ें या सुनें। इसके बाद देसी घी के दीपक से गणेश जी और गौरी माता की आरती करें।

    प्रार्थना और दान: अंत में हाथ जोड़कर अपने बच्चों की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और गृह-शांति के लिए प्रार्थना करें। अपनी क्षमतानुसार जरूरतमंदों को दान दें।

      दुर्वा अष्टमी 2026 और राधा अष्टमी में क्या अंतर है : What is the difference between Durva Ashtami 2026 and Radha Ashtami ?

      चूंकि दूर्वा अष्टमी और राधा अष्टमी दोनों ही भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि को आती हैं, इसलिए कई लोगों के मन में संशय रहता है…

      राधा अष्टमी: यह श्री राधा रानी का जन्मोत्सव है, जो मुख्य रूप से ब्रज क्षेत्र, बरसाना, वृंदावन और वैष्णव संप्रदाय में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

      दूर्वा अष्टमी: यह व्रत मुख्य रूप से उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार), नेपाल और अन्य क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा दूर्वा घास, गणेश जी और गौरी जी का पूजन करके संतान की दीर्घायु हेतु रखा जाता है।

      तिथि एक ही होने के बावजूद दोनों व्रतों के आराध्य और उद्देश्य भिन्न हैं। कई परिवारों में दोनों व्रतों की पूजा एक साथ संपन्न की जाती है ।

      व्रत के नियम और सात्विक आहार : Rules of Fasting and Sattvic Diet

      अहिंसा का पालन: इस दिन हरी घास या दूर्वा को पैरों तले रौंदने या बेवजह काटने-मसलने से बचें।

      सात्विक आहार: व्रत रखने वाली महिलाएं पूजा के पश्चात शाम को एक बार सात्विक भोजन (जैसे दूध, फल, सूखे मेवे या सेंधा नमक का फलाहार) ग्रहण कर सकती हैं।

      स्वास्थ्य सुरक्षा: जो महिलाएं अस्वस्थ हैं, गर्भवती हैं या दवा ले रही हैं, वे निर्जला व्रत रखने के बजाय केवल पूजा-पाठ करके सात्विक आहार ले सकती….

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