August 15, 2025

पितृपक्ष 2025: गीता पाठ कराने से मिलती है पितरों को शांति, जानें 7 अद्भुत लाभ

पितृपक्ष हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण समय होता है, जब हम अपने पितरों (पूर्वजों) को याद करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। इस 16-दिन की अवधि में, लोग कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले। इन अनुष्ठानों में श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करवाना सबसे प्रभावी और पुण्यकारी माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गीता पाठ करवाना क्यों इतना महत्वपूर्ण है और इसके क्या-क्या लाभ हैं? यह ब्लॉग पोस्ट आपको बताएगा कि पितृपक्ष में गीता पाठ करवाने से आपके पितरों को कैसे शांति मिलती है और आपके जीवन में इसके क्या-क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। गीता पाठ का महत्व: पितृपक्ष में क्यों है खास? श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक सार है। इसमें भगवान कृष्ण ने अर्जुन को धर्म, कर्म, मोक्ष और जीवन के सत्य का उपदेश दिया है। जब किसी परिवार में पितृपक्ष के दौरान गीता का पाठ होता है, तो इसकी पवित्र ध्वनि और शिक्षाएँ न केवल घर के वातावरण को शुद्ध करती हैं, बल्कि पितरों की आत्मा को भी शांति प्रदान करती हैं। यह माना जाता है कि गीता पाठ से उत्पन्न होने वाली आध्यात्मिक ऊर्जा पितरों की आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाती है और उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने में मदद करती है। पितृपक्ष में गीता पाठ करवाने के 7 अद्भुत लाभ 1. पितरों को मिलती है शांति और मोक्ष: गीता पाठ का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह पितरों की आत्मा को परम शांति प्रदान करता है। माना जाता है कि इससे उनकी आत्मा को मोक्ष का मार्ग मिलता है, जिससे वे अपने अगले पड़ाव की ओर शांतिपूर्वक बढ़ पाते हैं। 2. पितृदोष से मिलती है मुक्ति: यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृदोष है, तो पितृपक्ष में गीता का पाठ करवाना इस दोष को शांत करने का एक शक्तिशाली उपाय है। यह दोष दूर होने पर जीवन में आने वाली बाधाएँ कम होती हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। 3. घर में आती है सकारात्मकता: जब घर में गीता का पाठ होता है, तो इसकी पवित्र ध्वनि और मंत्रों से एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और घर में सुख-शांति बनाए रखने में मदद करता है। 4. धन और वैभव की प्राप्ति: जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक पितृपक्ष में गीता का पाठ करवाता है, उसके जीवन में धन, वैभव और समृद्धि की वृद्धि होती है। यह परिवार को आर्थिक संकटों से बचाता है। 5. मानसिक और शारीरिक शांति: गीता के उपदेश हमें जीवन के उतार-चढ़ावों को स्वीकार करने की शक्ति देते हैं। इसका पाठ सुनने से मन को शांति मिलती है, तनाव कम होता है और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है। 6. पारिवारिक संबंधों में सुधार: जब परिवार के सदस्य मिलकर इस पुण्य कार्य में भाग लेते हैं, तो उनके आपसी संबंध मजबूत होते हैं। यह एक साथ आने और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना को बढ़ाता है। 7. धर्म और आध्यात्मिकता का विकास: गीता का पाठ करवाने से व्यक्ति में धर्म और आध्यात्मिकता के प्रति रुचि बढ़ती है। यह हमें सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाता है और हमें एक बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करता है। निष्कर्ष पितृपक्ष में गीता का पाठ करवाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करने का एक तरीका है। यह एक ऐसा कार्य है, जिससे पितरों की आत्मा को तो शांति मिलती ही है, साथ ही परिवार के सदस्यों को भी ढेरों लाभ प्राप्त होते हैं। यदि आप इस पितृपक्ष में अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए गीता पाठ करवाना चाहते हैं, तो आप Karmasu वेबसाइट के माध्यम से आसानी से ऑनलाइन बुकिंग कर सकते हैं। +919129388891

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कृतिका नक्षत्र में 16 अगस्त को मनाई जाएगी जन्माष्टमी है – रामदेव मिश्र शास्त्री

🌸 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌸 जन्माष्टमी—भगवान श्रीकृष्ण के प्रकट होने का पावन दिन—हर वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, धर्म, नीति, संगीत और संस्कृति का अद्भुत संगम है। इस वर्ष जन्माष्टमी 16 अगस्त को मनाई जाएगी। 15 अगस्त की रात 12:58 बजे अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी और 16 अगस्त रात 10:30 बजे तक रहेगी। सूर्योदय पर अष्टमी होने के कारण व्रत 16 अगस्त को होगा। रोहिणी मतावलंबियों के लिए 17 अगस्त का व्रत मान्य है। कथा के अनुसार, अत्याचारी कंस को आकाशवाणी से पता चला कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसका अंत करेगी। उसने देवकी-वासुदेव को कारागार में बंद कर उनकी सात संतानों का वध कर दिया।लेकिन आठवीं संतान के जन्म की रात अद्भुत चमत्कार हुआ—पहरेदार सो गए, बेड़ियाँ खुल गईं और द्वार अपने आप खुल गए। वासुदेव जी शिशु कृष्ण को टोकरी में रखकर यमुना पार गोकुल पहुँचे और नंद-यशोदा को सौंप आए। गोकुल में कृष्ण ने बाल लीलाएँ करते हुए असुरों का नाश किया और बड़े होकर कंस का वध कर धर्म की स्थापना की। संदेश: श्रीकृष्ण का जन्म अन्याय, अधर्म और अत्याचार के अंत का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प आवश्यक है। जय श्रीकृष्ण#जन्माष्टमी #ShriKrishnaJanmashtami #जयश्रीकृष्ण #HareKrishna #Bhakti #KrishnaBhakti #HinduFestival #Karmasu

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Shri Krishnacharitra Manjari: श्रीकृष्णचारित्रमञ्जरी

Shri Krishnacharitra Manjari: श्रीकृष्णचारित्रमञ्जरी विष्णुर्ब्रह्मादिदेवैः क्षितिभरहरणे प्रार्थितः प्रादुरासीद् देवक्यां नन्दनन्दी शिशुवधविहितां पूतनां यो जघान ।उत्थानौत्सुक्यकाले रथचरणगतं चासुरं पादघातै- श्चक्रावर्तं च मात्रा गुरुरिति निहितो भूतले सोऽवतान्माम् ॥ १॥ यो मातुर्जृम्भमाणो जगदिदमखिलं दर्शयन्नङ्करूढो गर्गेणाचीर्णनामा कृतरुचिरमहाबाललीलो वयस्यैः ।गोपीगेहेषु भाण्डस्थितमुरुदयया क्षीरदध्यादि मुष्णन् मृन्ना भक्षीति मातुः स्ववदनगजगद्भासयन् भासतां मे ॥ २॥ दध्नोमत्रस्य भङ्गादुपगमितरुषा नन्दपत्न्याऽथ बद्धः कृच्छ्रेणोलूखले यो धनपतितनयौ मोचयामास शापात् ।नन्दाद्यैः प्राप्य वृन्दावनमिह रमयन् वेणुनादादिभिर्यो वत्सान्पान्वत्सरूपं क्रतुभुगरिमथो पोथयन्सोऽवतान्माम् ॥ ३॥ रक्षन् वत्सान्वयस्यैर्बकमभिनदथो तिग्मतुण्डे गृहीत्वा प्रीतिं कर्तुं सखीनां खरमपि बलतो घातयन् कालियाहिम् ।उन्मथ्योद्वास्य कृष्णामतिविमलजलां यो व्यधाद्दाववह्निं सुप्तानावृत्य गोष्ठे स्थितमपिबदसौ दुष्टवृक्षच्चिदव्यात् ॥ ४॥ दुर्गारण्यप्रवेशाच्च्युतनिजसरणीन् गोगणानाह्वयद्यो दावाग्निं तत्र पीत्वा समपुषदनुगान् गोपकानाविषिण्णान् ।गोभिर्गोपैः परितः सरिदुदकतटस्थोपले भोज्यमन्नं भुक्त्वा वेणोर्निनादाद्व्रजगतवनिताचित्तहारी स माऽव्यात् ॥ ५॥ कृष्णोऽस्माकं पतिः स्यादिति कृततपसां मज्जने गोपिकानां नग्नानां वस्त्रदाता द्विजवरवनितानीतमन्नं समश्नन् ।श्रान्तैर्गोपैः समं यो बलमथनबलावाहृतेऽस्मिन् सवृष्टौ प्रोद्ध्रुत्याहार्यवर्यं निजजनमखिलं पालयन् पात्वसौ माम् ॥ ६॥ गोविन्दाख्योऽथ तातं जलपतिहृतमानीय लोकं स्वकीयं यः कालिन्द्या निशायामरमयदमलज्योत्स्नया दीपितायाम् ।नन्दादीनां प्रदर्श्य व्रजगतवनितागानकृष्टार्तचित्ताः चार्वङ्गीर्नर्मवाक्यैः स्तनभरनमिताः प्रीणयन् प्रीयतां नः ॥ ७॥ अन्तर्धत्ते स्म तासां मदहरणकृते त्वेकया क्रीडमानः स्वस्कन्धारोहणाद्यैः पुनरपि विहितो गर्वशान्त्यै मृगाक्ष्याः ।खिन्नानां गोपिकानां बहुविधनुतिभिर्यो वहन् प्रीतिमाविः- प्राप्तो रासोत्सवेन न्यरमयदबलाः प्रीयतां मे हरिः सः ॥ ८॥ हत्वा यः शङ्खचूडं मणिमथ समदादग्रजायार्तगोपी- गीतानेकस्वलीलो हतवृषभमहापूर्वदेवोऽमरेड्यः ।केशिप्राणापहारी सुरमुनिवदनप्रार्थिताशेषकृत्यो हत्वा पुत्रं मयस्य स्वजनमपिहितं मोचयन् मोक्षदः स्यात् ॥ ९॥ अक्रूराकारितो यान् व्रजयुवतिजनान्सान्त्वयित्वाऽभितप्तान् स्वं रूपं मज्जतेऽस्मै विलसितमहिगं दर्शयंस्तेन वन्द्यः ।यो गत्वा कंसधानीं हृतरजकशिराश्चारुवेषः सुदाम्नः प्रीतिं कुर्वंस्त्रिवक्रां व्यतनुत रुचिरां पौरमह्योऽवतात्सः ॥ १०॥ शार्वं भङ्क्त्वा धनुर्यो बलमपि धनुषो रक्षकं कुञ्जरं तं मल्लांश्चाणूरपूर्वानपि सहसहजो मर्दयन्स्तुङ्गमञ्चात् ।भोजेशं पातयित्वा व्यसुमकृत निजान् नन्दयन् प्राप्य गर्गात् द्वैजं संस्कारमाप्तो गुरुमथ विदिताशेषविद्योऽवतान्नः ॥ ११॥ दत्वा पुत्रं प्रवक्त्रे प्रतिगतमधुरः सान्त्वयन्नुद्धवास्या- द्गोष्टस्थान् नन्दपूर्वानरमयदबलां प्रीतिकृद्यः शुभस्य ।अक्रूरस्याथ तेन प्रतिविदितपृथापुत्रकृत्यो जरायाः सूनुं निर्भिन्नसेनं व्यतनुत बहुशो विद्रुतं नः स पायात् ॥ १२॥ पुर्या निर्गत्य रामादथ सहमुसली प्राप्य कृष्णोऽभ्यनुज्ञां गोमन्तं चापि मौलिं खगपतिविहितां वासुदेवं सृगालम् ।हत्वा शत्रुं च पुर्यामधिजलधि पुरीं निर्मितां बन्धुवर्गान् नित्ये यः सोऽवतान्नः प्रमथितयवनो मौचुकुन्दाक्षिवह्नेः ॥ १३॥ राज्ञा संस्तूयमानो हतयवनबलो भीतवन्मागधेशा- द्गोमन्तं प्राप्य भूयो जितमगधपतिर्जातशान्ताग्निशैलः ।आगत्य द्वारकां यो हृदिकसुतगिरा ज्ञातकौन्तेयकृत्यः पश्यत्स्वादाय भैष्मीं नृषु युधि जितावान्भूभृतः प्रीयतां नः ॥ १४॥ वैरूप्यं रुक्मिणो योऽकृत मणिसहितं जाम्बवद्देहजातां सत्यां तेनैव युक्तामपि परिजगृहे हस्तिनं कुल्यहेतोः ।यातो व्यस्यात्र सत्याशुचमथ समगाद्द्वारकां सत्ययेतो द्रष्टुं पार्थान्सकृष्णान्द्रुपदपुरमगाद्विद्धलक्ष्यान्स पायात् ॥ १५॥ कृष्णः प्राप्याथ सत्राजिदहितवधकृद्यः श्वफल्कस्य सूनौ रत्नं सन्दर्श्य रामं व्यधित गतरूषं द्रष्टुकामः प्रतस्थे ।इन्द्रप्रस्थस्थस्थपार्थानथ सहविजयो यामुनं तीरमायन् कालिन्दीं तत्र लब्ध्वा यमसुतपुरकृत् पातु मां द्वारकास्थः ॥ १६॥ यो जह्ने मित्रविन्दामथ दृढवृषभान् सप्त बध्वाऽपि नीलां भद्रां मद्रेशपुत्रीमपि परिजगृहे शक्र विज्ञापितार्थः ।तार्क्ष्यरूढः सभार्यो हिमगिरिशिखरे भौमदुर्गं समेत्य छित्वा दुर्गाणि कृन्त्वा मुरगलमरिणा देवतेड्यः स माऽव्यात् ॥ १७॥ त्रिंशत्पञ्चावधीद्यः सचिववरसुतान् भूमिजेनातिघोरं युद्धं कृत्वा गजाद्यैररिहृतशिरसं तं व्यधाद्भूस्तुतोऽथ ।कृत्वा राज्येऽस्य सूनुं वरयुवतिजनान् भूरिशश्चारुवेषान् प्रापय्य द्वारकां सोऽकृत मुदमदितेः कुण्डलाभ्यामवेन्माम् ॥ १८॥ इन्द्राराध्योऽमरेन्द्रप्रियतममगमाहृत्य देवान् विजित्य प्राप्याथ द्वारकां यः सुतमतिरुचिरं रुक्मिणीशः प्रपेदे ।भ्रातृव्यं पौण्ड्रकाख्यं पुररुधमतनोत् कृत्तशीर्षं तदीया- पत्योत्पन्नां च कृत्यां रथचरणरुचा कालयन् कामधुक् स्यात् ॥ १९॥ कृष्णः सूर्योपरागे निजयुवतिगणैर्भार्गवं क्षेत्रमाप्त- स्तत्रायातान् स्वबन्धून् मुनिगणमपि सन्तोष्य यज्ञं स्वपित्रा ।योऽनुष्ठाप्याप्य नैजं पुरमथ वदिताऽनेकतत्त्वानि पित्रे मातुः पुत्रान् प्रदर्श्याकृत हितमहितं मेऽपनुद्यात् स ईशः ॥ २०॥ रुक्मिण्या नर्मवाक्यैररमत बहुभिः स्त्रीजनैर्योऽथ पुत्रा- नेकैकस्यां प्रपेदे दश दश रुचिरान् पौत्रकानप्यनेकान् ।पौत्रस्योद्वाहकाले भृशकुपितबलाद्रुक्मिणं घातयित्वा नन्दन् योषिद्गणेन प्रतिगृहमबलाप्रीतिकारी गतिर्मे ॥ २१॥ नानारत्नप्रदीप्तासमविभवयुतद्व्यष्टसाहस्रकान्ता- गेहेष्वश्नन् शयानः क्व च जपमगृयादीनि कुर्वन् क्वचिच्च ।दीव्यन्नक्षैर्ब्रुवाणः प्रवचनमपरैर्मन्त्रयन्नेवमादि- व्यापरान्नादरस्य प्रतिसदमहो दर्शयन् नः स पायात् ॥ २२॥ प्रातर्ध्यायन् प्रसन्नः कृतनिजविहितः सत्सभां प्राप्य कृष्णो दूतं राज्ञां प्रतोष्यामरमुनिविदिताशेषकृत्यः प्रयासीत् ।शक्रप्रस्थं चमूभिर्बहुविभवयुतं बन्धुभिर्मानितोऽयं भीमेनापात्य बार्हद्रथमथ नृपतीन् मोचयन्मे प्रसीदेत् ॥ २३॥ पुत्रं राज्येऽस्य कृत्वा हृतशिरसमथो चेदिराजं विधाय प्रोद्यन्तं राजसूयं यमसुतविहितं संस्थितं यो विधाय ।शक्रप्रस्थात् प्रयातो निजनगरमसौ साल्वभग्नं समीक्ष्य क्रुद्धो घन्नब्धिगं तं शिववरबलिनं यान् पुरं पातु नित्यम् ॥ २४॥ विप्रादाकर्ण्य धर्मं वनगतमनुजैः सान्त्वयित्वैत्य सर्वा- नभ्येत्य द्वारकां यो नृगमथ कुजनिं दिव्यरूपं चकार ।गत्वा वैदेहगेहं कतिपयदिवसांस्तत्र नीत्वाऽतिभक्तौ सन्तोष्य द्वारकां यान् बहुबलसमतोऽयन्नुपप्लाव्यमव्यात् ॥ २५॥ दौत्यं कुर्वन्ननन्ता निजरुचिरतनूर्दर्शयन् दिव्यदृष्टे- र्गीतातत्त्वोपदेशाद्रणमुखविजयस्याचरन् सारथित्वम् ।नीत्वा कैलासमेनं पशुपतिमुखतो दापयित्वाऽस्त्रमस्मै भीमेनापात्य दुष्टं क्षितिपतिमकरोद्धर्मराजं तमीडे ॥ २६॥ प्राप्तः स्थानं यदूनां प्रियसखमकृतावाप्तकामं कुचेलं कुर्वन् कर्माश्वमेधं निजभवनमथो दर्शयित्वाऽर्जुनाय ।पुत्रान् विप्राय दत्वा सहसहजमसौ दन्तवक्रं निपात्य प्राप्याथ द्वारकां स्वां समवतु विहरन्नुद्धवायोक्ततत्त्वः ॥ २७॥ रक्षन् लोकान् समस्तान् निजजननयनान्दकारी निरस्ता- वद्यः सौख्यैकमूर्तिः सुरतरुकुसुमैः कीर्यमाणोऽमरेन्द्रैः ।सिद्धैर्गन्धर्वपूर्वैर्जयजयवचनैः स्तूयमानोऽत्र कृष्णः स्त्रीभिः पुत्रैश्च पौत्रैः स जयति भगवान् सर्वसम्पत्समृद्धः ॥ २८॥ इति श्रीकृष्णचारित्रमञ्जरी लेशतः कृता ।राघवेन्द्रेण यतिना भूयात् कृष्णप्रसाददा ॥ २९॥ श्रीराघवेन्द्रतीर्थश्रीचरणविरचिता श्रीकृष्णचारित्रमञ्जरीभारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।

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Shri Krishnacharitra Manjari: श्रीकृष्णचारित्रमञ्जरी

Shri Krishnacharitra Manjari: श्रीकृष्णचारित्रमञ्जरी विष्णुर्ब्रह्मादिदेवैः क्षितिभरहरणे प्रार्थितः प्रादुरासीद् देवक्यां नन्दनन्दी शिशुवधविहितां पूतनां यो जघान ।उत्थानौत्सुक्यकाले रथचरणगतं चासुरं पादघातै- श्चक्रावर्तं च मात्रा गुरुरिति निहितो भूतले सोऽवतान्माम् ॥ १॥ यो मातुर्जृम्भमाणो जगदिदमखिलं दर्शयन्नङ्करूढो गर्गेणाचीर्णनामा कृतरुचिरमहाबाललीलो वयस्यैः ।गोपीगेहेषु भाण्डस्थितमुरुदयया क्षीरदध्यादि मुष्णन् मृन्ना भक्षीति मातुः स्ववदनगजगद्भासयन् भासतां मे ॥ २॥ दध्नोमत्रस्य भङ्गादुपगमितरुषा नन्दपत्न्याऽथ बद्धः कृच्छ्रेणोलूखले यो धनपतितनयौ मोचयामास शापात् ।नन्दाद्यैः प्राप्य वृन्दावनमिह रमयन् वेणुनादादिभिर्यो वत्सान्पान्वत्सरूपं क्रतुभुगरिमथो पोथयन्सोऽवतान्माम् ॥ ३॥ रक्षन् वत्सान्वयस्यैर्बकमभिनदथो तिग्मतुण्डे गृहीत्वा प्रीतिं कर्तुं सखीनां खरमपि बलतो घातयन् कालियाहिम् ।उन्मथ्योद्वास्य कृष्णामतिविमलजलां यो व्यधाद्दाववह्निं सुप्तानावृत्य गोष्ठे स्थितमपिबदसौ दुष्टवृक्षच्चिदव्यात् ॥ ४॥ दुर्गारण्यप्रवेशाच्च्युतनिजसरणीन् गोगणानाह्वयद्यो दावाग्निं तत्र पीत्वा समपुषदनुगान् गोपकानाविषिण्णान् ।गोभिर्गोपैः परितः सरिदुदकतटस्थोपले भोज्यमन्नं भुक्त्वा वेणोर्निनादाद्व्रजगतवनिताचित्तहारी स माऽव्यात् ॥ ५॥ कृष्णोऽस्माकं पतिः स्यादिति कृततपसां मज्जने गोपिकानां नग्नानां वस्त्रदाता द्विजवरवनितानीतमन्नं समश्नन् ।श्रान्तैर्गोपैः समं यो बलमथनबलावाहृतेऽस्मिन् सवृष्टौ प्रोद्ध्रुत्याहार्यवर्यं निजजनमखिलं पालयन् पात्वसौ माम् ॥ ६॥ गोविन्दाख्योऽथ तातं जलपतिहृतमानीय लोकं स्वकीयं यः कालिन्द्या निशायामरमयदमलज्योत्स्नया दीपितायाम् ।नन्दादीनां प्रदर्श्य व्रजगतवनितागानकृष्टार्तचित्ताः चार्वङ्गीर्नर्मवाक्यैः स्तनभरनमिताः प्रीणयन् प्रीयतां नः ॥ ७॥ अन्तर्धत्ते स्म तासां मदहरणकृते त्वेकया क्रीडमानः स्वस्कन्धारोहणाद्यैः पुनरपि विहितो गर्वशान्त्यै मृगाक्ष्याः ।खिन्नानां गोपिकानां बहुविधनुतिभिर्यो वहन् प्रीतिमाविः- प्राप्तो रासोत्सवेन न्यरमयदबलाः प्रीयतां मे हरिः सः ॥ ८॥ हत्वा यः शङ्खचूडं मणिमथ समदादग्रजायार्तगोपी- गीतानेकस्वलीलो हतवृषभमहापूर्वदेवोऽमरेड्यः ।केशिप्राणापहारी सुरमुनिवदनप्रार्थिताशेषकृत्यो हत्वा पुत्रं मयस्य स्वजनमपिहितं मोचयन् मोक्षदः स्यात् ॥ ९॥ अक्रूराकारितो यान् व्रजयुवतिजनान्सान्त्वयित्वाऽभितप्तान् स्वं रूपं मज्जतेऽस्मै विलसितमहिगं दर्शयंस्तेन वन्द्यः ।यो गत्वा कंसधानीं हृतरजकशिराश्चारुवेषः सुदाम्नः प्रीतिं कुर्वंस्त्रिवक्रां व्यतनुत रुचिरां पौरमह्योऽवतात्सः ॥ १०॥ शार्वं भङ्क्त्वा धनुर्यो बलमपि धनुषो रक्षकं कुञ्जरं तं मल्लांश्चाणूरपूर्वानपि सहसहजो मर्दयन्स्तुङ्गमञ्चात् ।भोजेशं पातयित्वा व्यसुमकृत निजान् नन्दयन् प्राप्य गर्गात् द्वैजं संस्कारमाप्तो गुरुमथ विदिताशेषविद्योऽवतान्नः ॥ ११॥ दत्वा पुत्रं प्रवक्त्रे प्रतिगतमधुरः सान्त्वयन्नुद्धवास्या- द्गोष्टस्थान् नन्दपूर्वानरमयदबलां प्रीतिकृद्यः शुभस्य ।अक्रूरस्याथ तेन प्रतिविदितपृथापुत्रकृत्यो जरायाः सूनुं निर्भिन्नसेनं व्यतनुत बहुशो विद्रुतं नः स पायात् ॥ १२॥ पुर्या निर्गत्य रामादथ सहमुसली प्राप्य कृष्णोऽभ्यनुज्ञां गोमन्तं चापि मौलिं खगपतिविहितां वासुदेवं सृगालम् ।हत्वा शत्रुं च पुर्यामधिजलधि पुरीं निर्मितां बन्धुवर्गान् नित्ये यः सोऽवतान्नः प्रमथितयवनो मौचुकुन्दाक्षिवह्नेः ॥ १३॥ राज्ञा संस्तूयमानो हतयवनबलो भीतवन्मागधेशा- द्गोमन्तं प्राप्य भूयो जितमगधपतिर्जातशान्ताग्निशैलः ।आगत्य द्वारकां यो हृदिकसुतगिरा ज्ञातकौन्तेयकृत्यः पश्यत्स्वादाय भैष्मीं नृषु युधि जितावान्भूभृतः प्रीयतां नः ॥ १४॥ वैरूप्यं रुक्मिणो योऽकृत मणिसहितं जाम्बवद्देहजातां सत्यां तेनैव युक्तामपि परिजगृहे हस्तिनं कुल्यहेतोः ।यातो व्यस्यात्र सत्याशुचमथ समगाद्द्वारकां सत्ययेतो द्रष्टुं पार्थान्सकृष्णान्द्रुपदपुरमगाद्विद्धलक्ष्यान्स पायात् ॥ १५॥ कृष्णः प्राप्याथ सत्राजिदहितवधकृद्यः श्वफल्कस्य सूनौ रत्नं सन्दर्श्य रामं व्यधित गतरूषं द्रष्टुकामः प्रतस्थे ।इन्द्रप्रस्थस्थस्थपार्थानथ सहविजयो यामुनं तीरमायन् कालिन्दीं तत्र लब्ध्वा यमसुतपुरकृत् पातु मां द्वारकास्थः ॥ १६॥ यो जह्ने मित्रविन्दामथ दृढवृषभान् सप्त बध्वाऽपि नीलां भद्रां मद्रेशपुत्रीमपि परिजगृहे शक्र विज्ञापितार्थः ।तार्क्ष्यरूढः सभार्यो हिमगिरिशिखरे भौमदुर्गं समेत्य छित्वा दुर्गाणि कृन्त्वा मुरगलमरिणा देवतेड्यः स माऽव्यात् ॥ १७॥ त्रिंशत्पञ्चावधीद्यः सचिववरसुतान् भूमिजेनातिघोरं युद्धं कृत्वा गजाद्यैररिहृतशिरसं तं व्यधाद्भूस्तुतोऽथ ।कृत्वा राज्येऽस्य सूनुं वरयुवतिजनान् भूरिशश्चारुवेषान् प्रापय्य द्वारकां सोऽकृत मुदमदितेः कुण्डलाभ्यामवेन्माम् ॥ १८॥ इन्द्राराध्योऽमरेन्द्रप्रियतममगमाहृत्य देवान् विजित्य प्राप्याथ द्वारकां यः सुतमतिरुचिरं रुक्मिणीशः प्रपेदे ।भ्रातृव्यं पौण्ड्रकाख्यं पुररुधमतनोत् कृत्तशीर्षं तदीया- पत्योत्पन्नां च कृत्यां रथचरणरुचा कालयन् कामधुक् स्यात् ॥ १९॥ कृष्णः सूर्योपरागे निजयुवतिगणैर्भार्गवं क्षेत्रमाप्त- स्तत्रायातान् स्वबन्धून् मुनिगणमपि सन्तोष्य यज्ञं स्वपित्रा ।योऽनुष्ठाप्याप्य नैजं पुरमथ वदिताऽनेकतत्त्वानि पित्रे मातुः पुत्रान् प्रदर्श्याकृत हितमहितं मेऽपनुद्यात् स ईशः ॥ २०॥ रुक्मिण्या नर्मवाक्यैररमत बहुभिः स्त्रीजनैर्योऽथ पुत्रा- नेकैकस्यां प्रपेदे दश दश रुचिरान् पौत्रकानप्यनेकान् ।पौत्रस्योद्वाहकाले भृशकुपितबलाद्रुक्मिणं घातयित्वा नन्दन् योषिद्गणेन प्रतिगृहमबलाप्रीतिकारी गतिर्मे ॥ २१॥ नानारत्नप्रदीप्तासमविभवयुतद्व्यष्टसाहस्रकान्ता- गेहेष्वश्नन् शयानः क्व च जपमगृयादीनि कुर्वन् क्वचिच्च ।दीव्यन्नक्षैर्ब्रुवाणः प्रवचनमपरैर्मन्त्रयन्नेवमादि- व्यापरान्नादरस्य प्रतिसदमहो दर्शयन् नः स पायात् ॥ २२॥ प्रातर्ध्यायन् प्रसन्नः कृतनिजविहितः सत्सभां प्राप्य कृष्णो दूतं राज्ञां प्रतोष्यामरमुनिविदिताशेषकृत्यः प्रयासीत् ।शक्रप्रस्थं चमूभिर्बहुविभवयुतं बन्धुभिर्मानितोऽयं भीमेनापात्य बार्हद्रथमथ नृपतीन् मोचयन्मे प्रसीदेत् ॥ २३॥ पुत्रं राज्येऽस्य कृत्वा हृतशिरसमथो चेदिराजं विधाय प्रोद्यन्तं राजसूयं यमसुतविहितं संस्थितं यो विधाय ।शक्रप्रस्थात् प्रयातो निजनगरमसौ साल्वभग्नं समीक्ष्य क्रुद्धो घन्नब्धिगं तं शिववरबलिनं यान् पुरं पातु नित्यम् ॥ २४॥ विप्रादाकर्ण्य धर्मं वनगतमनुजैः सान्त्वयित्वैत्य सर्वा- नभ्येत्य द्वारकां यो नृगमथ कुजनिं दिव्यरूपं चकार ।गत्वा वैदेहगेहं कतिपयदिवसांस्तत्र नीत्वाऽतिभक्तौ सन्तोष्य द्वारकां यान् बहुबलसमतोऽयन्नुपप्लाव्यमव्यात् ॥ २५॥ दौत्यं कुर्वन्ननन्ता निजरुचिरतनूर्दर्शयन् दिव्यदृष्टे- र्गीतातत्त्वोपदेशाद्रणमुखविजयस्याचरन् सारथित्वम् ।नीत्वा कैलासमेनं पशुपतिमुखतो दापयित्वाऽस्त्रमस्मै भीमेनापात्य दुष्टं क्षितिपतिमकरोद्धर्मराजं तमीडे ॥ २६॥ प्राप्तः स्थानं यदूनां प्रियसखमकृतावाप्तकामं कुचेलं कुर्वन् कर्माश्वमेधं निजभवनमथो दर्शयित्वाऽर्जुनाय ।पुत्रान् विप्राय दत्वा सहसहजमसौ दन्तवक्रं निपात्य प्राप्याथ द्वारकां स्वां समवतु विहरन्नुद्धवायोक्ततत्त्वः ॥ २७॥ रक्षन् लोकान् समस्तान् निजजननयनान्दकारी निरस्ता- वद्यः सौख्यैकमूर्तिः सुरतरुकुसुमैः कीर्यमाणोऽमरेन्द्रैः ।सिद्धैर्गन्धर्वपूर्वैर्जयजयवचनैः स्तूयमानोऽत्र कृष्णः स्त्रीभिः पुत्रैश्च पौत्रैः स जयति भगवान् सर्वसम्पत्समृद्धः ॥ २८॥ इति श्रीकृष्णचारित्रमञ्जरी लेशतः कृता ।राघवेन्द्रेण यतिना भूयात् कृष्णप्रसाददा ॥ २९॥ श्रीराघवेन्द्रतीर्थश्रीचरणविरचिता श्रीकृष्णचारित्रमञ्जरीभारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।

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Krishna Chandra Ashtakam: कृष्णचन्द्राष्टकम्

Krishna Chandra Ashtakam: कृष्णचन्द्राष्टकम् Krishna Chandra: अम्बुदाञ्जनेन्द्रनीलनिन्दिकान्तिडम्बरः कुङ्कुमोद्यदर्कविद्युदंशुदिव्यदम्बरः ।श्रीमदङ्गचर्चितेन्दुपीतनाक्तचन्दनः स्वाङ्घ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्रनन्दनः ॥ १॥ गण्डताण्डवातिपण्डिताण्डजेशकुण्डल- श्चन्द्रपद्मषण्डगर्वखण्डनस्यमण्डलः ।बल्लवीषु वर्धितात्मगूढभावबन्धनः स्वाङ्घ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्रनन्दनः ॥ २॥ नित्यनव्यरूपवेषहर्दकेलिचेष्टितः केलिनर्मसार्मदायिमित्रवृन्दवेष्टितः ।स्वीयकेलिकाननांशुनिर्जितेन्द्रनन्दनः स्वाङ्घ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्रनन्दनः ॥ ३॥ प्रेमहेममण्डितात्मबन्धुताभिनन्दितः क्सौणिलग्नभाललोकपालपालिवन्दितः ।नित्यकालसृष्टविप्रगौरवालिवन्दनः स्वाङ्घ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्रनन्दनः ॥ ४॥ लीलयेन्द्रकालियोष्णकंसवत्सघातक- स्तत्तदात्मकेलिवृष्टिपुष्टभक्तचातकः ।वीर्यशीललिलायात्मघोसवासिनन्दनः स्वाङ्घ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्रनन्दनः ॥ ५॥ Shri Krishnachandrashtakam 2: श्रीकृष्णचन्द्राष्टकम् २ कुञ्जरासकेलिसीधुराधिकादितोषण- स्तत्तदात्मकेलिनर्मतत्तदालिपोषणः ।प्रेमशीलकेलिकीर्तिविश्वचित्तनन्दनः स्वाङ्घ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्रनन्दनः ॥ ६॥ रासकेलिदर्शितात्मशुद्धभक्तिसत्पथः स्वीयचित्ररूपवेषमन्मथलीमन्मथः ।गोपीकसु नेत्रकोणभाववृन्दगन्धनः स्वाङ्घ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्रनन्दनः ॥ ७॥ पुष्पचायिराधिकाभिमर्षलब्धितर्षितः प्रेमवाम्यराम्यराधिकास्यदृष्टिहर्षितः ।राधिकोरसीह लेप एष हरिचन्दनः स्वाङ्घ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्रनन्दनः ॥ ८॥ अष्टकेन यस्त्वनेन राधिकासुवल्लभं संस्तवीति दर्शनेऽपि सिन्धुजादिदुर्लभम् ।तं युनक्ति तुष्टचित्त एष घोषकानने राधिकाङ्गसङ्गनन्दितात्मपादसेवने ॥ ९॥ इति कृष्णदासकविराजविरचितं कृष्णचन्द्राष्टकं सम्पूर्णम् ।

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Shri Krishnachandrashtakam 2: श्रीकृष्णचन्द्राष्टकम् २

Shri Krishnachandrashtakam 2: श्रीकृष्णचन्द्राष्टकम् २ Krishnachandrashtakam: श्रीकेवलरामप्रणीतम्वनभुवि विहरन्तौ तच्छविं वर्णयन्तौसुहृदमनुसरन्तौ दुर्हृदं सूदयन्तौ ।उपयमुनमटन्तौ वेणुनादं सृजन्तौभज हृदय हसन्तौ रामकृष्णौ लसन्तौ ॥ १॥ कलयसि भवरीतिं नैव चेद्भूरिभूतिंयमकृतनिगृहीतिं तर्हि कृत्वा विनीतिम् ।जहिहि मुहुरनीतिं जायमानप्रतीतिंकुरु मधुरिपुगीतिं रे मनो मान्यगीतिम् ॥ २॥ द्विपपरिवृढदन्तं यः समुत्पाट्य सान्तंसदसि परिभवन्तं लीलया हन्त सान्तम् ।स्वजनमसुखयन्तं कंसमाराद्भ्रमन्तंसकलहृदि वसन्तं चिन्तयामि प्रभुं तम् ॥ ३॥ गर्भगतकृष्णस्तुतिः Garbhgatakrishnastutih करधृतनवनीतः स्तेयतस्तस्य भीतःपशुपगणपरीतः श्रीयशोदागृहीतः ।निखिलनिगमगीतः कालमायाद्यभीतःकनकसदुपवीतः श्रीशुकादिप्रतीतः ॥ ४॥ सकलजननियन्ता गोसमूहानुगन्ताव्रजविलसदनन्ताभीरुगेहेषु रन्ता ।असुरनिकरहन्ता शक्रयागावमन्ताजयति विजयियन्ता वेदमार्गाभिमन्ता ॥ ५॥ सुकृतिविहितसेवो निर्जितानेकदेवोभवविधिकृतसेवः प्रीणिताशेषदेवः ।स्म नयति वसुदेवो गोकुलं यं मुदे वोभवतु स यदुदेवः सर्वदा वासुदेवः ॥ ६॥ करकजधृतशैले प्रोल्लसत्पीतचैले ?? मय् बे चोर्रेच्त्रुचिरनवघनाभे शोभने पद्मनाभे ।विकचकुसुमपुञ्जे शोभमाने निकुञ्जेस्थितवति कुरु चेतः प्रीतिमन्यत्र नेतः ॥ ७॥ विषयविरचिताशे प्राप्तसंसारपाशे-ऽनवगतनिजरूपे सृष्टकर्मण्यपूपे ।सुकृतकृतिविहीने श्रीहरे भक्तिहीनेमयि कृतय समन्तौ केवले दीनजन्तौ ॥ ८॥ इति श्रीकेवलरामप्रणीतं श्रीकृष्णचन्द्राष्टकं सम्पूर्णम् ।

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Hartalika Teej

Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें

Hartalika Teej 2025: हरतालिका तीज का पर्व विशेष महत्व माना जाता है जो माता गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए एक उत्तम तिथि है। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा किया जाता है। पूजा के दौरान महिलाएं मां पार्वती को 16 शृंगार की सामग्री अर्पित करती हैं जिससे उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। Hartalika Teej 2025: हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का विशेष महत्व है। साल में कुल 3 तीज पड़ती है, जिसे हरियाली, कजरी और हरतालिका तीज कहा जाता है। हरियाली तीज श्रावण मास में पड़ती है, तो कजरी और हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास को रखा जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती है। Hartalika Teej 2025 Date इसके साथ ही अविवाहित  महिलाएं अच्छा जीवनसाथी पाने के लिए इस व्रत को रखने की विधान है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत पूजा करने का विधान है। आइए जानते हैं हरतालिका तीज की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, मंत्र और धार्मिक महत्व… Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज हरतालिका तीज मुहूर्त (Hartalika Teej shubh muhurat) भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का प्रारम्भ 25 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 34 मिनट पर हो रहा है। साथ ही इस तिथि का समापन 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 54 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, हरतालिका तीज का पर्व मंगलवार, 26 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन गौरी-शंकर की पूजा का मुहूर्त कुछ इस प्रकार रहने वाला है – हरितालिका पूजा मुहूर्त – प्रातः 5 बजकर 56 मिनट से सुबह 8 बजकर 31 मिनट तक गौरी-शंकर पूजा विधि (Shiv-Parvati Puja) हरतालिका तीज Hartalika Teej के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि के पश्चात् साफ-सुथरे विशेषकर हरे या लाल रंग के वस्त्र पहनें। शुभ मुहूर्त में पूजा स्थान पर चौकी पर साफ कपड़ा बिछाएं और स्वयं द्वारा बनाई गई माता पर्वती, भगवान शिव और गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें। सबसे पहले गणेश जी का विधिवत पूजन करें और इसके बाद गौरी-शंकर की विधि-विधान से पूजन करें। पूजा में मां गौरी को 16 शृंगार की सामग्री अर्पित करें और हरतालिका तीज व्रत कथा जरूर सुनें। आप पूजा में इन मंत्रों का जप भी कर सकते हैं – हरतालिका तीज पर बन रहे शुभ योग (Hartalika Teej 2025 Shubh Yog) इस साल हरतालिका तीज Hartalika Teej पर काफी शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। इस दिन चंद्रमा मंगल के साथ कन्या राशि में होंगे, जिससे महालक्ष्मी राजयोग बन रहा है। इसके अलावा इस दिन  हस्त नक्षत्र के साथ साध्य, शुभ योग बन रहा है। इसके साथ ही इस दिन सूर्य अपनी स्वराशि सिंह राशि में विराजमान रहेंगे। रतालिका तीज 2025 पर करें इन मंत्रों का जाप (Hartalika Teej 2025 Mantra) देवी पार्वती का मंत्रऊं उमयेए पर्वतयेए जग्दयेए जगत्प्रथिस्थयेए स्हन्तिरुपयेए स्हिवयेए ब्रह्म रुप्नियेए” शिव मंत्रऊं ह्रयेए महेस्ह्अरयेए स्हम्भवे स्हुल् पद्येए पिनक्ध्रस्हे स्हिवये पस्हुपतये महदेवयअ नमह्” हरतालिका तीज व्रत विधि एवं नियम: Hartalika Teej Vrat Vidhi and Niyam हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं। विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम शुद्ध घी का दीपक जलाएं। तत्पश्चात सीधे (दाहिने) हाथ में अक्षत रोली बेलपत्र, मूंग, फूल और पानी लेकर इस मंत्र से संकल्प करें:उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रत महं करिष्ये। इसके बाद कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं। उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। Kushotpatini Amavasya 2025 Date: कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम और तरीका इसके बाद हरतालिका व्रत Hartalika Teej की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता। प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं। भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए:ॐ उमायै नम:ॐ पार्वत्यै नम:ॐ जगद्धात्र्यै नम:ॐ जगत्प्रतिष्ठयै नम:ॐ शांतिरूपिण्यै नम:ॐ शिवायै नम: भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए:ॐ हराय नम:ॐ महेश्वराय नम:ॐ शम्भवे नम:ॐ शूलपाणये नम:ॐ पिनाकवृषे नम:ॐ शिवाय नम:ॐ पशुपतये नम:ॐ महादेवाय नम: हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री: Hartalika Vrat Pujan Ki Samgri फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।केले का पत्ता।विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।जनेऊ, नाडा, वस्त्र,।माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।घी, तेल, दीपक,

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Varaha Jayanti

Varaha Jayanti 2025 date: वराह जयंती 2025: बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव

Varaha Jayanti 2025 date:वराह जयंती भगवान विष्णु के तीसरे अवतार, वराह, के शक्तिशाली वराह रूप का उत्सव है। विष्णु का यह अवतार बुराई पर अच्छाई की अंतिम विजय और ब्रह्मांडीय संतुलन की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। प्राचीन इतिहास के अनुसार, भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए वराह रूप धारण किया था, जो राक्षस हिरण्याक्ष द्वारा ब्रह्मांडीय महासागर में डूब गई थी। यह त्योहार केवल इस महान घटना का स्मरणोत्सव ही नहीं है, बल्कि विपत्ति का सामना करने में धर्म, साहस और ईश्वरीय हस्तक्षेप के महत्व का स्मरण भी कराता है। वराह जयंती त्यौहार भगवान विष्णु के तीसरे अवतार का जन्म उत्सव मनाने के लिए होता है । दुनिया को बुराई से बचाने के लिए देवता ने सूअर के रूप में पुनर्जन्म लिया। अपने पुनर्जन्म का उद्देश्य धरती पर धर्म बहाल करना और निर्दोष लोगों को असुर और राक्षसों जैसे विभिन्न बुरी ताकतों से बचाने के लिए था। वराह जयंती की पूर्व संध्या पर कई अनुष्ठान होते हैं। Varaha Jayanti भक्त भगवान विष्णु की पूजा दूसरे दिन शुक्ला पक्ष के माघ महीने में या द्वितिया तीथी में करते हैं। भक्त अच्छे भाग्य से आशीर्वाद पाने और ब्रह्मांड के संरक्षक से आशीर्वाद लेने के लिए भारत भर के कई क्षेत्रों में भगवान विष्णु के सभी अवतारों का जश्न मनाते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं में, ऐसा माना जाता है कि भगवान वराह की पूजा करने से जातक को अत्यधिक धन, स्वास्थ्य और खुशी मिलती है। भगवान विष्णु के अवतार ने आधे मानव और आधे सूअर के रूप में सभी बुराइयों पर विजय प्राप्त की थी और हिरण्यक्ष को हराया था। इसलिए, इस दिन भक्त भगवान वराह की पूजा करते हैं और अपने जीवन से सभी बुराइयों से छुटकारा पाने के लिए प्रार्थना करते हैं। Varaha Jayanti 2025 date: वराह जयंती 2025: बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव Varaha Jayanti Kab Hai: वराह जयंती कब है? वर्ष 2025 में, वराह जयंती सोमवार, 25 अगस्त को पड़ रही है, जिस दिन विभिन्न आध्यात्मिक अनुष्ठानों, प्रार्थनाओं और भक्ति कार्यों का आयोजन किया जाएगा। यह शुभ अवसर भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो ब्रह्मांड की व्यवस्था बनाए रखने में भगवान विष्णु की भूमिका का सम्मान करने के लिए एकत्रित होते हैं। वराह जयंती का महत्व:Importance of Varaha Jayanti वराह जयंती केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक अवसर है जिसका भक्तों के लिए अत्यधिक महत्व है। भगवान विष्णु के वराह अवतार के सम्मान में मनाया जाने वाला यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है और ब्रह्मांड के संतुलन को बनाए रखने में धर्म या नैतिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण महत्व को रेखांकित करता है। बुराई पर अच्छाई की विजय: victory of good over evil वराह जयंती Varaha Jayanti का मूल, दुष्ट शक्तियों पर धर्म की विजय का उत्सव है। हिरण्याक्ष नामक राक्षस पर भगवान वराह की विजय की कथा एक सशक्त अनुस्मारक है कि अंधकार की शक्तियाँ चाहे कितनी भी विकराल क्यों न लगें, अंततः धर्म और ईश्वरीय न्याय की ही विजय होगी।साहस, त्याग और धार्मिकता: वराह जयंती की कथा साहस, त्याग और न्याय की स्थापना के लिए अटूट प्रतिबद्धता की शिक्षाओं से भरपूर है। हिरण्याक्ष के विरुद्ध भगवान वराह के महाकाव्य युद्ध ने बुराई के विरुद्ध खड़े होने और व्यापक भलाई की रक्षा के लिए आवश्यक बलिदान देने का महत्व सिखाया है। भक्तगण इन मूल्यों का उत्सव मनाते हैं और इन्हें आत्मसात करते हैं, तथा सत्यनिष्ठा और साहस से भरा जीवन जीने के लिए प्रेरित होते हैं। आध्यात्मिक विकास और परिवर्तन:spiritual growth and transformation वराह जयंती के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठान और प्रार्थनाएँ भक्तों को आध्यात्मिक विकास और आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करती हैं। इन पवित्र अनुष्ठानों में संलग्न होकर, भक्तों को संकट के समय ईश्वर की निरंतर उपस्थिति और हस्तक्षेप का स्मरण होता है। इससे आंतरिक परिवर्तन की भावना जागृत होती है और उनकी आध्यात्मिक यात्रा गहन होती है। समुदाय और दान: वराह जयंती समुदाय और दान के मूल्यों पर भी ज़ोर देती है। भक्तजन अनुष्ठानों में भाग लेने, प्रार्थना करने और दयालुता एवं दान के कार्यों में संलग्न होने के लिए एक साथ आते हैं। यह सामूहिक पूजा एकता की भावना को बढ़ावा देती है और एक-दूसरे, विशेषकर ज़रूरतमंदों, की सहायता करने के महत्व पर बल देती है। समृद्धि और प्रचुरता का आशीर्वाद:Blessings of prosperity and abundance अंततः, Varaha Jayanti वराह जयंती को समृद्धि और प्रचुरता का आशीर्वाद पाने के लिए एक शुभ दिन माना जाता है। भक्तों का मानना है कि भक्ति और ईमानदारी से अनुष्ठान करने से भगवान वराह का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे उनके जीवन में सुरक्षा, समृद्धि और बाधाएँ दूर होती हैं और भविष्य में शांति और सफलता सुनिश्चित होती है। Where is Varaha Jayanti celebrated: वराह जयंती कहाँ मनाई जाती है? वराह जयंती Varaha Jayanti भारत के विभिन्न क्षेत्रों में, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के मथुरा और आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध तिरुमाला मंदिर में, धूमधाम से मनाई जाती है। प्राचीन हिंदू इतिहास से गहराई से जुड़ा शहर, मथुरा, भगवान विष्णु के वराह अवतार के सम्मान में पारंपरिक अनुष्ठानों और सामुदायिक समारोहों के साथ इस त्योहार को मनाता है। कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम और तरीका Necessary materials of puja:पूजा की आवश्यक सामग्री वराह जयंती Varaha Jayanti समारोह का मुख्य भाग षोडशोपचार पूजा है, जो एक विस्तृत सोलह चरणों वाली पूजा प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न प्रसाद और अनुष्ठान शामिल हैं। भक्त पंचामृत—जल, दूध, दही, शहद और घी के मिश्रण—से भगवान वराह की मूर्ति का अभिषेक या अनुष्ठानिक स्नान करते हैं। यह अनुष्ठान एक प्रतीकात्मक शुद्धिकरण और श्रद्धा का कार्य है। अभिषेक के बाद देवता को कमल के फूल, चंदन, अक्षत, कुमकुम, पान और मेवे चढ़ाए जाते हैं। भक्त वराह सहस्रनाम (भगवान वराह के एक हजार नाम) या अन्य विष्णु मंत्रों का जाप करते हैं, जिससे आध्यात्मिक रूप से आवेशित वातावरण बनता है। पूजा का समापन आरती से होता है, एक अनुष्ठान जिसमें भक्त भजन गाते हुए देवता के सामने प्रज्वलित दीप लहराते हैं, जो अंधकार और अज्ञानता के नाश का प्रतीक है। Dhan:दान दान-पुण्य वराह जयंती Varaha Jayanti का एक अभिन्न अंग है। भक्तों का मानना है कि ज़रूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या आर्थिक दान देने से न केवल भगवान वराह प्रसन्न होते हैं, बल्कि समृद्धि और सुख का आशीर्वाद भी मिलता

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