March 4, 2025

राम जानकी मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

यहां दर्शन करने से होती है सुख – सोभाग्य में वृद्धि राम जानकी मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। राम जानकी मन्दिर शहर के मंगलनाथ रोड़ स्थित अंकपात चौराहे पर बना हुआ है। शहर के बीचोंबीच बने इस मंदिर की गिनती पुराने मंदिरों में की जाती है, जिसका समय-समय पर सुंदरीकरण कराया जाता रहा है। मंदिर के राम दरबार में हाजिरी लगाने के लिए देश-प्रदेश से लोग आते हैं और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए पूजन-अर्चन करते हैं। इस मंदिर में माता सीता और प्रभु श्री राम छोटे भाई लक्ष्मण के साथ विराजमान हैं। राम जानकी मंदिर का इतिहास धर्म नगरी उज्जैन में एक से बढ़कर एक पुराने मंदिर हैं, जहां श्रद्धालुओं का हर समय तांता लगा रहता है। राम जानकी मन्दिर भी उनमें से एक है, जानकार इस मंदिर को दशकों पुराना बताते हैं। मीना समाज धर्मशाला की देख-रेख में राम जानकी मंदिर का संचालन होता है। प्रभु श्रीराम की भक्ति जीव को संसार में अनंत सुख देने वाली होती है। भक्त श्री राम की भक्ति में लीन होकर भजन कीर्तन करते हैं, जिससे उनकी और उनको सुनने वालों की आत्मा निर्मल हो जाती हैं। राम जानकी मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति निरन्तर पूरे विधि विधान से राम जानकी मन्दिर में पूजा करता है उस व्यक्ति के सुख – सोभाग्य में वृद्धि होती है और वह अपने जीवन की हर मनोकामना को पूर्ण प्राप्त कर पाता है। जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से इस मंदिर में प्रभु की भक्ति करते हैं, तो प्रभु उनकी हर इच्छा पूरी करते हैं। राम जानकी मन्दिर में आए भक्तों के सारे कष्ट भगवान खत्म कर देते हैं।इस मन्दिर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी की चालीसा का पाठ पूरे मन व आस्था के साथ करने से घर परिवार के लोगों मे अपनत्व बढ़ता है। राम जानकी मंदिर की वास्तुकला राम जानकी मन्दिर में एक मुख्य प्रवेश द्वार है। मंदिर के गर्भ गृह में श्री राम, माता जानकी और लक्ष्मण जी की भव्य मूर्तियां स्थापित है। मंदिर का भव्य और विशाल परिसर है, जिसमें शिव जी और माँ दुर्गा की प्रतिमा भी स्थापित है। मन्दिर की वास्तुकला में आधुनिकता के साथ भारतीय पारंपरिक वास्तुकला की झलक देखने को मिलती हैं। राम जानकी मंदिर का समय मंदिर का खुलने का समय 05:00 AM – 09:30 PM सुबह मंदिर क दर्शन 05:00 AM – 05:30 AM संध्या आरती का समय 09:00 PM – 09:30 PM मंदिर का प्रसाद राम जानकी मन्दिर में भक्त फल और बूंदी के लड्डू का भोग लगाते हैं और मनवांछित फल प्राप्त करते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार इस मंदिर में पूड़ी-सब्जी का भोग भी लगाते हैं।

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लक्ष्मीनारायण मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

इस मंदिर के चारो तरफ मौजूद प्राकृतिक हरियाली आनंद व शांति का अहसास कराती है। लक्ष्मीनारायण मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के मालवीय नगर क्षेत्र में स्थित यह मंदिर बिड़ला मंदिर नाम से प्रसिद्ध है। भोपाल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल इस मंदिर का निर्माण भारत के प्रमुख औद्योगिक बिड़ला परिवार ने कराया था। अरेरा पहाड़ियों पर बने इस मंदिर के पास एक झील है, जिसके कारण यह श्रद्धालुओं के लिए आस्था के साथ पर्यटन का भी केंद्र बनता जा रहा है। चारो तरफ प्राकृतिक हरियाली आनंद व शांति का अहसास कराती है। देशभर में लक्ष्मीनारायण मंदिर प्रसिद्धी है, भोपाल आने वाले श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन को जरूर जाते हैं। मंदिर का इतिहास भोपाल के लक्ष्मीनारायण मंदिर की स्थापना की कहानी काफी रोचक है। साल 1960 में बिड़ला परिवार ने मध्यप्रदेश में अपना उद्योग स्थापित करने की योजना बनाई। जिसके लिए उन्होंने प्रदेश सरकार से जमीन की मांग की। उस समय म.प्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ कैलाश नाथ काटजू थे। उन्होंने उद्योग के लिए जमीन देने के बदले बिड़ला परिवार के सामने भोपाल की अरेरा पहाड़ी पर भव्य लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण कराने की शर्त रखी। बिड़ला परिवार ने शर्त स्वीकार करते हुए 4 साल में साल 1964 में मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर बनने के बाद इसके उद्‍घाटन पर विष्णु महायज्ञ आयोजित किया गया था, जिसमें देश के बड़े विद्वानों व धर्म शास्त्रियों ने हिस्सा लिया था। लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास में ही एक संग्रहालय बना है, जिसमें प्रदेश के रायसेन, सेहोर, मंदसौर व सहदोल सहित अन्य जगहों से लाई गईं मूर्तियां रखी गई हैं। मंदिर का महत्व जन्माष्टमी पर मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के दर्शन-पूजन से हर मनोकामना पूरी होती है। भगवान विष्णु के साथ यह माता लक्ष्मी का भी एक विशेष मंदिर है। दीपावली पर लक्ष्मीनारायण मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना से मां लक्ष्मी की कृपा बरसती है। मंदिर की वास्तुकला अरेरा पहाड़ियों की चोटी पर करीब 7-8 एकड़ क्षेत्र में यह मंदिर बना है। मंदिर में प्रवेश के लिए अर्धमण्डप, महामण्डप, परिक्रमापथ व गर्भगृह है। मंदिर के अंदर संगमरमर पर की गई पौराणिक दृश्यों की नक्काशी काफी सुंदर व दर्शनीय है। दीवारों पर वेद, गीता, रामायण, महाभारत व पुराण आदि के श्लोक लिखे हैं। यह मंदिर देवी लक्ष्‍मी व उनके पति भगवान विष्‍णु को समर्पित है। इसमें भगवान शिव व मां जगदम्बा की प्रतिमा भी विराजमान है। मंदिर परिसर में हनुमानजी व शिवलिंग स्थापित हैं। मुख्य प्रवेश द्वार के सामने एक विशाल शंख है, जो श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:30 AM – 12:00 PM लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास बना संग्रहालय खुलने का समय 09:00 AM – 05:00 PM शाम को मन्दिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद लक्ष्मीनारायण मंदिर में नारियल, लईया, बताशा, मिश्री आदि का भोग लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त भक्त दूध से बने पेड़े का प्रसाद भी चढ़ाते हैं।

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पितृ स्तोत्र | Pitra Dev Stotram

Pitra Dev Stotram (पितृ स्तोत्र) अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् । नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।। इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा । सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।। मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा । तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि ।। नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा । द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।। देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।  अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि: ।। प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च । योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ।। नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु । स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।। सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा । नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।। अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् । अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ।। ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:। जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ।। तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस:। नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज ।। Pitra Dev Stotram पितृ स्तोत्र विशेषताएं पितृ स्तोत्र एक अत्यंत ही दिव्य व प्रभावशाली स्तोत्र है जिसकी रचना मूल रूप से संस्कृत में की गयी है| इस स्तोत्र का पाथ नियमित रुप से  करना चहीये| कहा जाता है जिस घर में पितृ स्तोत्र को लिखकर रखा जाता है Pitra Dev Stotram वहाँ श्राद्ध पक्ष में पितृ स्वयं निवास करते हैं। सामान्य उपायों में षोडश पिंडदान, सर्पपूजा, ब्राह्मण को गौदान, कन्यादान, कुआं, बावड़ी, तालाब आदि बनवाना, मंदिर प्रांगण में पीपल, बड़ (बरगद) आदि देववृक्ष लगवाना एवं विष्णु मंत्रों का जाप, प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए।

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Pitra Stotra | पितृ स्तोत्र

Pitra Stotra पितृ स्तोत्र: मार्कण्डेय पुराण में वर्णित इस चमत्कारी पितृ स्तोत्र का नियमित पाठ करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और पितृदोष से मुक्ति मिलती है। मार्कण्डेय पुराण में महात्मा रुचि द्वारा रचित पितरों के पितृ स्तोत्र को ‘पितृ स्तोत्र’ कहा गया है। पितरों की प्रसन्नता के लिए पितृ स्तोत्र का पाठ किया जाता है। यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष है तो पितृ स्तोत्र का पाठ करना बहुत लाभकारी रहेगा। Pitra Stotra पितृ स्तोत्र का पाठ श्राद्ध पक्ष में या अपने पितरों की तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन कराते समय करना चाहिए। यदि पितृ दोष के कारण आपको परेशानी हो रही है या काम में रुकावट आ रही है तो प्रतिदिन इसका पाठ करने से आपके पितृ दोष कम हो सकते हैं। अक्सर लोग असफलता के समय सौभाग्य और दुर्भाग्य के बारे में सोचते हैं। लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से सोचें तो व्यक्ति के कर्म ही उसे भाग्यशाली या दुर्भाग्यशाली बनाते हैं। यही कारण है कि शास्त्र सुखी जीवन के लिए अच्छे कर्म करने की शिक्षा देते हैं। ऐसे पुण्य कर्म से सौभाग्य प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में धार्मिक उपायों में पितृ पूजन और स्मरण का महत्व बताया गया है। Pitra Stotra धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ दोष व्यक्ति के जीवन में गहरे संकट, Pitra Stotra असफलता और संकट का कारण बन सकता है। Pitra Stotra कुंडली में राहु-केतु ग्रहों के कारण होने वाली कुंडली भी पितृदोष उत्पन्न करती है। पितृ दोष के कारण कई लोगों को संतान प्राप्ति में बाधा और रुकावटों का सामना करना पड़ता है। Pitra Stotra पितृ स्तोत्र के लाभ: धार्मिक पौराणिक कथाओं के अनुसार पितृ दोष निवारण में पितृ स्तोत्र का पाठ बहुत ही स्मरणीय है। पितृ स्तोत्र सभी के लिए शुभ फल प्रदान करने वाला लाभकारी है। Pitra Stotra अमावस्या या पूर्णिमा या श्राद्ध पक्ष के दिनों में शाम के समय तेल का दीपक जलाकर इस स्तोत्र का पाठ करने से पितृ दोष की शांति होती है और सभी दूरियों से उन्नति प्राप्त होती है। Pitra Stotra जो लोग जीवन में बहुत कठिनाई का अनुभव करते हैं, उन्हें यह पाठ प्रतिदिन अवश्य करना चाहिए। Pitra Stotra पितृ स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जिन व्यक्तियों की कुंडली में Pitra Stotra पितृ दोष है या जिन्होंने अपने पूर्वजों के विरुद्ध पाप किया है, उन्हें पितृ स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे उनके जीवन में शांति आएगी। यदि विधि-विधान और वैदिक नियमों के अनुसार किया जाए, Pitra Stotra तो निश्चित रूप से बुरे दिन समाप्त हो जाते हैं। पितृ स्तोत्र | Pitra Stotra रूचिरूवाच नमस्येऽहं पितृन् श्राद्धे ये वसन्त्यधिदेवताः । देवैरपि हि तर्प्यंते ये च श्राद्धैः स्वधोत्तरैः ।।1।। नमस्येऽहं पितृन्स्वर्गे ये तर्प्यन्ते महर्षिभिः । श्राद्धेर्मनोमयैर्भक्तया भुक्ति-मुक्तिमभीप्सुभिः ।।2।। नमस्येऽहं पितृन्स्वर्गे सिद्धाः संतर्पयन्ति यान् । श्राद्धेषु दिव्यैः सकलै रूपहारैरनुत्तमैः ।।3।। नमस्येऽहं पितृन्भक्तया येऽर्च्यन्ते गुह्यकैरपि । (गुह्यकैर्दिवि) तन्मयत्वेन वांछिद्भिर्ऋद्धिमात्यंतिकीं पराम् ।।4।। नमस्येऽहं पितृन्मर्त्यैरच्यन्ते भुवि ये सदा । श्राद्धेषु श्रद्धयाभीष्ट लोक-प्राप्ति-प्रदायिनः ।।5।। (लोक-पुष्टि-प्रदायिनः) नमस्येऽहं पितृन् विप्रैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा। वाञ्छिताभीष्ट-लाभाय प्राजापत्य-प्रदायिनः ।।6।। नमस्येऽहं पितृन् ये वै तर्प्यन्तेऽरण्यवासिभिः । वन्यैः श्राद्धैर्यताहारैस्तपोनिर्धूतकिल्बिषैः ।।7।। (श्राद्धैर्यताहारैस्तपोनिर्धूतकल्मषैः) नमस्येऽहं पितृन् विप्रैर्नैष्ठिकब्रह्मचारिभिः । (विप्रैर्नैष्ठिकैधर्मचारिभिः) ये संयतात्मभिर्नित्यं संतर्प्यन्ते समाधिभिः ।।8।। नमस्येऽहं पितृन् श्राद्धै राजन्यास्तर्पयंति यान् । कव्यैरशेषैर्विधिवल्लोकत्रय(द्वय)फलप्रदान् ।।9।। नमस्येऽहं पितृन्वैष्यैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा । स्वकर्माभिरतैर्नित्यं पुष्पधूपान्नवारिभिः ।।10।। नमस्येऽहं पितुन् श्राद्धैर्ये शूद्रैरपि च भक्तितः । संतृप्यन्ते जगत्यत्र (जगत्कृत्स्नं) नाम्ना ज्ञाताः (ख्याताः) सुकालिनः ।।11। नमस्येऽहं पितृन् श्राद्धैः पाताले ये महासुरैः । संतर्प्यन्ते स्वधाहारैस्त्यक्त(सुधाहारास्त्यक्त) दम्भमदैः सदा ।।12।। नमस्येऽहं पितृन् श्राद्धैरर्च्यन्ते ये रसातले । भोगैरशेषैर्विधिवन्नागैः कामानभीप्सुभिः ।।13।। नमस्येऽहं पितृन् श्राद्धैः सर्पैः संतर्पितान् सदा । तत्रैव विधिवन्मंत्रभोगसंपत्समन्वितैः।।14।। पितृन्नमस्ये निवसन्ति साक्षाद्ये देवलोके च तथांतरिक्षे। (देवलोकेऽथ महीतले वा) महीतले ये (तथांतरिक्षे) च सूरादिपूज्यास्ते मे प्रयच्छन्तु मयोपनीतम्।।15।। पितृन्नमस्ये परमात्मभूता (परमार्थभूता) ये वै विमाने निवसंति मूर्त्ताः। यजन्ति यानस्तमलैर्मनोभिर्यौगीश्वराः क्लेश-विमुक्ति-हेतून्।।16।। पितृन्नमस्ये दिवि ये च मूर्त्ताः स्वधाभुजः काम्यफलाभिसंधौ। प्रदानशक्ताः सकलेप्सितानां विमुक्तिदा येऽनभिसंहितेषु।।17।। तृप्यंतु तेऽस्मिन् पितरः समस्ता इच्छावतां ये प्रदिशंति कामान्। सुरत्वमिन्द्रत्वमतोधिकंवा सुतान् पशून् स्वानि बलं गृहाणि।।18।। (सुरत्वमिन्द्रत्वमितोऽधिकं वा गजाश्वरत्नानि महागृहाणि) सोमस्य ये रष्मिषुयेऽर्कबिम्बे शुक्ले विमाने च सदा वसन्ति। तृप्यंतु तेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयैर्गंधादिना (तेऽस्मिन्तिपरोऽन्नतोयैर्गन्धादिना) पुष्टिमितो व्रजंतु।।19।। येषां हुतेऽग्नौ हविषा च तृप्तिर्ये भुञ्जते विप्र-शरीर-भाजः (विप्र-शरीर-संस्था)। ये पिंडदानेन मुदं प्रयांति तृप्यन्तु तेऽस्मिन् पितरोन्नतोयैः(पितरोश्ष्न्नतोयैः)।।20।। ये खंगिमांसेन (खड्गमांसेन) सुरैरभीष्टैः कृष्णैस्तिलैर्दिव्यमनोहररैश्च। कालेनशाकेन महर्षि वर्यैः संप्रीणितास्ते मुदमत्र यान्तु।।21।। कव्यान्यशेषाणि च यान्यभीष्टान्यतीव तेषां ममरार्चितानाम् (मम पूजितानाम्)। तेषां तु सान्निध्यमिहास्तु पुष्पगंधान्नभोज्येषु (पुष्पगन्धाम्बुभोज्येषु) मया कृतेषु।।22।। दिनेदिने ये प्रतिगृह्णतेर्श्ष्चां मासान्तपूज्या (सामान्तपूज्या) भुवि येऽष्टकासु। येवत्सरान्तेऽभ्युदये च पूज्याः प्रयान्तु ते मे पितरोऽत्र तृप्तिम् (तुष्टिम्)।।23।। पूज्याद्विजानां कुमुदेंदुभासो ये क्षत्रियाणां च नवार्कवर्णाः। तथा विशां ये कनकावदाता नीलीनिभाः (नीलीप्रभाः) शूद्रजनस्य ये च।।24।। तेऽस्मिन् समस्ता मम पूष्पगंधधूपान्नतोयादि (पूष्पगंधधूपाम्बुभोज्यादि) निवेदनेन। तथाग्निहोमेन च यांतु तृप्तिं सदा पितृभ्यः प्रणतोऽस्मि तेभ्यः।।25।। ये देव पूर्वाण्यतितृप्तिहेतोरश्नंति कव्यानि शुभाहुतानि (शुभाहृतानि)। तृप्ताश्चयेभूतिसृजो(सूजो) भवंति तृप्यन्तु तेस्मिन् प्रणतोस्मि तेभ्यः।।26।। रक्षांसि भुतान्यसुरांस्तथोग्रान्निर्णाशयन्तस्त्व शिवं प्रजानाम्। आद्याः सुराणाममरेशपूज्यास्तृप्यन्तु तेऽस्मिन् प्रणतोऽस्मि तेभ्यः।।27।। अग्निश्वात्ता बर्हिषदा आज्यपाः सोमपास्तथा। व्रजन्तु तृप्तिं श्राद्धेऽस्मिन् पितरस्तर्पितामया।28।। अग्निष्वात्ताः पितृगणाः प्राचीं रक्षन्तु मे दिशम्। तथा बर्हिषदः पान्तु याम्यां पितरस्तथा (पितरः सदा)।।29।। प्रतीचीमाज्यपास्तद्वदुदीचीमपि सोमपाः। रक्षोभूतपिशाचेभ्यस्तथैवासुरदोषतः।।30।। सर्वतश्चाधिपस्तेषां यमो रक्षां करोतु मे। (सर्वतः पितरो रक्षां कुर्वन्तु मम नित्यशः) विश्वो विश्वभुगाराध्यो धर्म्यो धन्यः शुभाननः।।31।। भूतिदो भूतिकृद्भूतिः पितृणां ये गणा नव। कल्याणः कल्पतां (कल्यदः)कर्त्ता कल्पः कल्पतराश्रयः।।32।। कल्पताहेतुरनघः षडिमे ते गणाः स्मृताः। वरो वरेण्यो वरदः पुष्टिदस्तुष्टिदस्तथा।।33।। विश्वपाता तथा धाता सप्तैवैते गणास्तथा (गणाः स्मृताः)। महान् महात्मा महितो महिमावान्महाबलः।।34।। गणाः पंचतथैवेते पितृणां पापनाशनाः। सुखदो धनदश्चान्यो धर्मदोऽन्यश्च भूतिदः।।35।। पितृणां कथ्यते चैतत्तथा गणचतुष्टयम्। एकत्रिंशत् पितृगणा यैर्व्याप्तमखिलं जगत्।।36।। ते मेऽनुतृप्तास्तुष्यंतु यच्छन्तु च सदा हितम्। (त एवात्र पितृगणास्तुष्यन्तु च मदाहितात्) मार्कण्डेय उवाच एवं तु स्तुवतस्तस्य तेजसो राशिरुच्छ्रितः । प्रादुर्बभुव सहसा गगनव्याप्तिकारकः ।। तद्दृष्ट्वा सुमहत्तेजः समाच्छाद्य स्थितं जगत् । जानुभ्यामवनीं गत्वा रुचिः स्तोत्रमिदं जगौ ।। रुचिरुवाच (सप्तार्चिस्तपम्) अमूर्त्तानां च मूर्त्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।।37।। नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्। इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।।38।। सप्तर्षीणां तथान्येषां तान्नमस्यामि कामदान्। मन्वादीनां मुनींद्राणां (च नेतारः) सूर्य्याचन्द्रमसोस्तथा।।39।। तान्नमस्याम्यहं सर्वान् पितरश्चार्णवेषु च (पितरनप्युदधावपि)। नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।।40।। द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः। प्रजापतेः कश्यपाय सामाय वरुणाय च । देवर्षीणां ग्रहाणां च सर्वलोकनमस्कृतान्।।41।। योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः। नमो गणेभ्यःसप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।।42।। स्वायम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे। सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।।43।। नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्। अग्निरूपांस्तथैवान्यान्नमस्यामि पितृनहम्।।44।। अग्निसोममयं विश्वं यत एतदशेषतः। ये च तेजसि ये चैते सोमसूर्य्याग्निमूर्त्तयः।।45।। जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः। तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः। नमोनमो नमस्तेऽस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।46।। मार्कण्डेय उवाच एवं स्तुतास्ततस्तेन तेजसो मुनिसत्तमाः । निश्चक्रमस्ते पितरो भासयन्तो दिशो दश ।। निवेदनं च यत्तेन पुष्पगन्धानुलेपनम् । तदभूषितानथ स तान् ददृशे पुरतः स्थितान् ।। प्रणिपत्य रुचिर्भक्त्या पुरेव कृतांजलिः । नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यमित्याह पृथगादृतः ।। पितर ऊचुः स्तोत्रेणानेन च नरो यो मां स्तोष्यति भक्तितः। तस्य तुष्टा वयं भोगानात्म ज्ञानं तथोत्तमम्।।47।। शरीरारोग्यमर्थं च पुत्रपौत्रादिकं तथाः।

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Pashuptastrey Stotra:पशुपतास्त्रेय स्तोत्र

Pashuptastrey Stotra:जैसा कि मैं पहले से भी कहता आ रहा हूं कि शनि स्वयं कोई फल प्रदान नहीं करता वह जातक के निज कर्मों का फल प्रदान करता है। न्याय के आसन पर बैठकर वे कभी इस बात की परवाह नहीं करते उनके द्वारा किया गया न्याय संबंधित व्यक्ति को कितना कष्टकारी होगा, उसे कितना दुख भुगतना पड़ेगा। वे मात्र उसके किये गये कुकर्मों को देखते हुए निर्णय देते हैं। यदि किसी व्यक्ति की जन्म-कुण्डली में शनि प्रतिकूल परिस्थितियों में स्थित हैं तो जरूर उसने पूर्वजन्म में कहीं न कहीं ऐसे अशुभ कर्म किये होंगे जो मानवता के अथवा धर्म के प्रतिकूल थे। Pashuptastrey Stotra पिछले कुछ वर्षों में मैंने देवाधिदेव शनिदेव की कृपा से शिव के मंत्र व स्तोत्र का प्रयोग स्वयं कई व्यक्तियों के लिए किया है और उसका फल बहुत ही अनुकूल प्राप्त हुआ। उसी अमोघ प्रयोग को मैं यहां दे रहा हूं जिसका फल बहुत जल्दी प्राप्त होता है। यह स्तोत्र अग्नि पुराण के 322 वें अध्याय से लिया गया है। यह अत्यन्त प्रभावशाली व शीघ्र फलदायी प्रयोग है। Pashuptastrey Stotra यदि मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ गुरू के निर्देशानुसार संपादित करे तो अवश्य फायद मिलेगा। शनिदेव शिव भक्त भी हैं और शिव के शिष्य भी हैं। शनि के गुरु शिव होने के कारण इस अमोघ प्रयोग का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। यदि किसी साधारण व्यक्ति के भी गुरु की कोई आवभगत करें तो वह कितना प्रसन्न होता है। फिर शनिदेव अपने गुरु की उपासना से क्यों नहीं प्रसन्न होंगे। इस स्तोत्र के पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और शिव की प्रसन्नता से शनिदेव खुश होकर संबंधित व्यक्ति को अनुकूल फल प्रदान करते हैं। साथ ही एक विशेषता यह भी परिलक्षित होती है Pashuptastrey Stotra कि संबंधित व्यक्ति में ऐसी क्षमता आ जाती है Pashuptastrey Stotra कि वह शनिदेव के द्वारा प्राप्त दण्ड भी बड़ी सरलता से स्वीकार कर लेता है। साथ ही वह अपने जीवन में ऐसा कोई अशुभ कर्म भी नहीं करता जिससे उस पर शनिदेव भविष्य में भी नाराज हों। जैसा कि इसका नाम अमोघ प्रयोग है, उसी प्रकार यह किसी भी कार्य के लिए अमोघ राम बाण है। Pashuptastrey Stotra अन्य सारी बाधाओं को दूर करने के साथ ही युवक-युवतियों के लिए यह अकाट्य प्रयोग माना ही नहीं जाता अपितु इसका अनेक अनुभूत प्रयोग किया जा चुका है। जिस वर या कन्या के विवाह में विलंब होता है, यदि इस पशुपतास्त्रेय स्तोत्र का प्रयोग जैसा कि बताया गया है 1008 की संख्या में पाठ करने के बाद दशांश, हवन, तर्पण एवं मार्जन कर यथा शक्ति ब्राह्मण भोजन कराकर पूर्णाहुति करें तो निश्चित रूप से शीघ्र ही उन्हें दाम्पत्य सुख का लाभ मिलता है। केवल इतना ही नहीं, अन्य सांसारिक कष्टों को दूर करने के लिए भी 1008 पाठ या जप, हवन, तर्पण, मार्जन आदि करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। Pashuptastrey Stotra मंत्र पाठ: Pashuptastrey Stotra:पशुपतास्त्रे का 21 दिन नियमित सुबह-शाम 21-21 पाठ प्रतिदिन करें। साथ ही नीचे लिखे स्तोत्र का एक सौ आठ बार अवश्य जाप करें और सुबह या शाम को इस मंत्र की 51 आहुतियां काले तिल से हवन अवश्य करें। विनियोग: सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग का पाठ करे अस्य श्री पाशुपताशान्तिस्तोत्रस्य भगवान् वेदव्यासगषि: अनुष्टुप छन्द: श्रीसदशिवपरमात्मा देवता सर्वविघ्नविनाशार्थे पाठे विनियोग:। पशुपतात्र मंत्र: नमो भगवते महापाशुपताय, अतुलवीर्यपराक्रमाय, त्रिपंचनयनाय, नानारूपाय, नानाप्रहरणोद्यताय, सर्वांगरंक्ताय, मनीसांजनचयप्रख्याय,श्मशानवेतालप्रियाय, सर्वविघ्न- निकृन्तनरताय, सर्वसिद्धिप्रधान, भक्तानुकंपिनेऽसंख्यवक्त्रभुज- पादय, तस्मिन् सिद्धाय, वेतालवित्रासिने, शाकिनी क्षोभजनकाय, व्याधिनिग्रहकारिणे पापभंजनाय, सूर्यसोमाग्निर्नत्राय, विष्णुकवचाय, खड्गवज्रहस्ताय, यमदंडवरुणपाशाय, रुद्रशूलाय,ज्वलज्जिह्वाय, सर्वरोगविद्रावणाय, ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनाशक्षयकारिणे। कृष्णपिंगलाय फट्। हुंकारााय फट्। वज्रहस्ताय फट्। शक्तये फट्। दंडाय फट्। यमाय फट्। खड्गाय फट्। निर्गतये फट्। वरुणाय फट्। वज्राय फट्। पाशाय फट्। धवजाय फट्। अंकुशाय फट्। गदय फट्। कुबेराय फट्। त्रिशूलाय फट्। मुद्गाय फट्। चक्राय फट्। पद्माय फट्। नागाय फट्। ईशानाय फट्। खेटकाय फट्। मुंडाय फट्। मुंडाय फट्। कंकालाख्याय फट्। पिबिछकाय फट्। क्षुरिकाय फट्। ब्रह्माय फट्। शक्त्यय फट्। गणाय फट्। सिद्धाय फट्। पिलिपिबछाय फट्। गंधर्वाय फट्। पूर्वाय फट्। दक्षिणाय फट्। वामाय फट्। पश्चिमाय फट्। मंत्राय फट्। शाकिन्य फट्। योगिन्यय फट्। दंडाय फट्। महादंडाय फट्। नमोऽय फट्। शिवाय फट्। ईशानाय फट्। पुरुषाय फट्। आघोराय फट्। सद्योजाताय फट्। हृदयाय फट्। महाय फट्। गरुड़ाय फट्। राक्षसाय फट्। दनवाय फट्। क्षौंनरसिंहाय फट्। त्वष्ट्य फट्। सर्वाय फट्। न: फट्। व: फट्। प: फट्। फ: फट्। भ: फट्। श्री: फट्। पै: फट्। भू: फट्। भुव: फट्। स्व फट्। मह: फट्। जन: फट्। तप: फट्। सत्यं फट्। सर्वलोक फट्। सर्वपाताल फट्। सर्वतत्तव फट्। सर्वप्राण फट्। सर्वनाड़ी फट्। सर्वकारण फट्। सर्वदेव फट्। द्रीं फट्। श्रीं फट्। हूं फट्। स्वां फट्। लां फट्। वैराग्याय फट्। कामाय फट्। क्षेत्रपालाय फट्। हुंकाराय फट्। भास्कराय फट्। चन्द्राय फट्। विघ्नेश्वराय फट्। गौ: गा: फट्। भ्रामय भ्रामय फट्। संतापय संतापय फट्। छादय छादय फट्। उन्मूलय उन्मूलय फट्। त्रासय त्रासय फट्। संजीवय संजीवय फट्। विद्रावय विद्रावय फट्। सर्वदुरितं नाशय नाशय फट्॥ इन मंत्रों का 1008 की संख्या में पाठ करने के उपरांत प्रतिदशांश हवन, तर्पण एवं मार्जन भी विधिपूर्वक करें।

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Dreams About Hairs : सपने में काले सफेद बाल देखना देता है भविष्य में होने वाली इन घटनाओं का संकेत

Dreams About Hairs:सपने में सफेद बाल दिखाई देने का मतलब है कि आपको भविष्य में अपने प्रयासों का शुभ फल प्राप्त होगा। समाज में आपकी मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी। Dream Interpretation: स्वप्न शास्त्र के अनुसार हम सोते हुए जो भी सपने देखते हैं उसका कुछ न कुछ अर्थ जरूर होता है। सपने हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में संकेत देते हैं। सपने में इंसान कई चीजें देखता है। बस जरूरत होती है उन चीजों को समझने की। यदि सपने में आपको बाल दिखाई देते हैं तो ये सपना शुभ भी हो सकता है और अशुभ भी। जानिए कैसे… सपने में सिर के कटे हुए बाल देखना या बाल काटना दोनों ही सपने शुभ माने जाते हैं। इसका अर्थ है कि भविष्य में जल्द ही आप कर्ज मुक्त हो जाएंगे। Dreams About Hairs अगर सपने में आपको अपने काले बाल दिखाई देते हैं तो इसका मतलब है कि आपको धन लाभ होने वाला है। तो वहीं दूसरों के काले बाल देखने का अर्थ है कि आपकी मुलाकात किसी ऐसे इंसान से होने वाली है जिसका प्रभाव आप पर अच्छा नहीं पड़ेगा। सपने में सफेद बाल दिखाई देने का मतलब है कि आपको भविष्य में अपने प्रयासों का शुभ फल प्राप्त होगा। समाज में आपकी मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी।अगर आपको सपने में अपने हाथों या फिर तलवे पर बाल उगते दिखाई दें तो इसका अर्थ है Dreams About Hairs कि आपको शायद किसी से कर्ज लेना पड़ सकता है। अगर आपको बगल या नाभि के आस-पास सपने में बाल दिखाई दें तो इसका मतलब आपका जल्द ही नई परेशानियों से सामना हो सकता है। यदि सपने में आप अपने उलझे बालों को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं पर सुलझा नहीं पा रहे हैं। तो इसका मतलब आप किसी चीज से बहुत परेशान हैं और उसका हल आपको जल्द ही निकाल लेना चाहिए। बालों को कंघे से सुलझाते हुए सपने में देखने का मतलब है कि आप जिस दिशा की तरफ असल जिंदगी में बढ़ रहे हैं उससे आपके जीवन में नया बदलाव आएगा। Dreams About Hairs सपने में बाल रंगते हुए देखने का मतलब है कि आप अपनी योजनाओं में सफल होंगे। सपने में बालों को झड़ते हुए देखने का मतलब है कि आपके अंदर आत्मविश्वास की कमी है। सपने में अपने काले, लंबे और घने बाल देखने का अर्थ होता है कि आपकी सोच सही दिशा में बढ़ रही है और आनेवाले दिनों में मान-सम्मान और बड़ी मात्रा में धन मिल सकता है। Dreams About Hairs सपने में किसी व्यक्ति या फिर खुद को गंजा देखने का मतलब है कि आपके जीवन में चल रही परेशानियां खत्म होने वाली हैं। धन प्राप्ति के योग बनेंगे। साथ ही समाज में मान-सम्मान मिलेगा Dreams About Hairs:सपने में काले सफेद बाल देखना का क्या है मतलब Dreams Meaning About Hairstyle : सपनों की दुनिया में व्यक्ति जो भी देखता है हर उस बात का कुछ न कुछ मतलब जरूर होता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने व्यक्ति को जीवन में होने वाली घटनाओं के बारे में संकेत देते हैं। सपनों का इशारा जानकर आप जीवन की बहुत सी मुश्किलों से बच सकते हैं। स्वप्न शास्त्र में सपनों के बारे में लगभग सारी जानकारी दी गई हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं बालों से जुड़े सपनों का क्या अर्थ होता है। सपने में कटे हुए बाल देखना का मतलब अगर सपने में आप खुद के कटे हुए बाल देखते हैं तो स्वप्न शास्त्र के अनुसार इस तरह के सपने आना बहुत ही शुभ माना जाता है। इस तरह के सपने देखने का मतलब है की व्यक्ति को जल्द ही कर्ज से मुक्ति मिलने वाली है। सपने में बदला हुआ हेयरस्टाइल देखना का मतलब कई बार व्यक्ति इस तरह के सपने भी देखता है की उसका हेयरस्टाइल अचानक से बदल गया है। आपका हेयरस्टाइल कुछ ऐसा हो गया है जो पहले कभी आपने नहीं रखा है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपनों का अर्थ है की Dreams About Hairs आप खुद को बहुत ही सकारात्मक तरीके से आगे बढ़ाएंगे। आने वाले दिनों में जिसका लाभ आपको जरूर मिलेगा।

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Holi 2025 Special Tips: होली के दिन भूलकर भी न करें ये 5 काम, वरना हो सकता है भारी नुकसान

Holi 2025 Special Tips: 14 मार्च 2025 को रंगों का त्योहार होली मनाया जाने वाला है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि होली पर भूलकर भी इन 5 चीजों का दान न करें वरना हो सकता है भारी नुकसान। जानिए होली के दिन किन गलतियों से बचें ताकि बनी रहे सुख-समृद्धि और नकारात्मक शक्तियों का असर न हो। Holi 2025 Special Tips:होलिका दहन पर क्या न करें? उधार– आज होलिका दहन के दिन किसी को पैसे उधार देने से बचें। होलिका दहन पर पैसे उधार देने से आर्थिक स्थिति पर नेगेटिव असर पड़ सकता है। फटे-पुराने कपड़े– होलिका दहन के दिन कटे-फटे कपड़े पहनने से बचें। किसी भी त्योहार या शुभ मौके पर फटे कपड़े पहनना अशुभ माना जाता है। कहा जाता है की फटे-पुराने कपड़े पहनने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं। मास-मदिरा– होलिका दहन के दिन भूलकर भी मास-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन का सेवन करने से भगवान विष्णु नराज हो सकते हैं। काले वस्त्र– धर्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी शुभ अवसर या फिर पूजा-पाठ के दौरान काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। इसलिए होलिका दहन के दिन काले रंग के कपड़े पहनने से बचें। भगवान विष्णु की असीम कृपा पाने के लिए इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ रहेगा।अपमान- कोशिश करें की इस दिन आप किसी का दिल न दुखाएं और वाद-विवाद से भी बचें। किसी का भी Holi 2025 Special Tips अपमान करने से बचें और न ही किसी का मजाक उड़ाएं। 

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