2023

Sapno ka matlab : सपने में खुद को देख लिया है तो आपके साथ होने वाला है यह, जानें क्या कहता है स्वप्न शास्त्र

अकसर लोग सपने में चीजें देखकर डर जाते हैं. चलिए बताते हैं सपनों खुद को या किसी चीज को देखने पर ज्योतिषी शास्त्र क्या कहता है. हर रात नींद के आगोश में जाने पर हम तरह तरह के सपने देखते हैं. यूं देखा जाए तो सपने हमारी मनोदशा का आईना होते हैं और यही सपने हमारे आने वाले कल का प्रतिबिंब बनाते हैं. ज्योतिष शास्त्र में भी कहा गया है कि सपने आने वाले दिनों के शुभ और अशुभ फलों का संकेत देते हैं. कई बार हम सपने देखकर डर जाते हैं लेकिन असल में वो सपने आने वाले अच्छे दिनों की निशानी होते हैं. सपने अच्छे और बुरे दोनों तरह के हो सकते हैं, इनको सही से समझ कर हम और आप आने वाले दिनों के बारे में जान सकते हैं. चलिए जानते हैं भविष्य में सुखद फल और शुभ संकेत वाले कुछ शुभ सपनों के बारे में.  ये सपने होते हैं शुभ सपने में हाथी के साथ महावत को देखना शुभ होता है. इससे धन को लेकर शुभ समाचार मिलते हैं.  मछली मां लक्ष्मी का प्रतीक है और अगर आप सपने में छली देखे या खुद को मछली पकड़ते देखे तो ये जिंदगी में लक्ष्मी के आगमन का संकेत हो सकता है. सपने में बांसुरी देखना दांपत्य जीवन में सुख और मधुरता का समय आने का संकेत है. सपने में अगर आपको सड़क पर पड़े पैसे, सिक्के या नोट मिल जाएं तो यह आने वाले दिनों में धन प्राप्ति का संकेत है.  सपने में सर्कस देखना भी धन प्राप्ति का संकेत है, इससे  संकेत मिलता है कि आपको आने वाले दिनों में कुछ भौतिक सुख प्राप्त होने वाले हैं.  सपने में अगर आप किसी मृत व्यक्ति से बात कर रहे हैं तो डरने की बजाय खुश हो जाइए क्योंकि ये शुभ सपना है और आगे जाकर आपको ढेर सारा धन मिलने वाला है.  अगर आप सपने में खुद को माणिक्य या माणिक की माला या अंगूठी पहने देखें तो समझिए कि आपका भाग्योदय होने वाला है.  अगर सपने में आप खुद को किसी ऊंची और बड़ी दीवार पर बैठा हुआ देख रहे हैं तो इसका मतलब है कि आने वाले जीवन में आपको जबरदस्त तरक्की और पदोन्नति मिलने वाली है.  अगर सपने में आप किसी को पुष्प गुच्छ देते दिखे तो समझना चाहिए कि आने वाले दिनों में आपको किसी की विरासत मिलने वाली है.

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इंदिरा एकादशी व्रत : व्रत विधि और प्रचलित पौराणिक कथा

यह एकादशी हमेशा श्राद्ध पक्ष में आती है इसलिए इस व्रत का फल पितरों की शांति से जोड़ा गया है। लेकिन इसके अलावा भी इंदिरा एकादशी व्रत करने के अनेक पुण्य लाभ हैं।  प्रचलित पौराणिक कथा  महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से कहने लगे, भगवान! आश्विन कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? कृपया आप मुझे इसकी विधि तथा फल बताएं। इस पर भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह एकादशी पापों को नष्ट करने वाली तथा पितरों को अधोगति से मुक्ति देने वाली होती है और फिर आगे भगवान इसकी कथा सुनाते हैं। जिसके अनुसार प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था। कहते हैं कि उस राजा को किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी। पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न वह राजा सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु जी का परम भक्त था। एक दिन राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था कि अचानक आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। उन्हें देखते ही राजा हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और उनका अपनी सभा में स्वागत किया। सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? नारद मुनि की ऐसी बातें सुनकर पहले तो राजा कुछ भौंचक्का रह गए लेकिन फिर विनम्रता से बताया। तभी राजा ने प्रश्न किया कि हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है। किसी को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं है। हमारे यहां सभी धार्मिक कार्य भी सही तरीके से हो रहे हैं। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! जो दृश्य मैं देखकर आ रहा हूं उसे तुम्हें बताना बेहद आवश्यक है। ऋषि आगे बोले, मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहां श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा। तुम्हारे जैसे विद्वान राजा के पिता को ऐसे स्थान पर देखकर मैं हैरान हो गया। मेरा यहां आने का यही कारण है राजन्। तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए एक संदेश भेजा है। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूं, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्ण इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए इसी मान्यता के आधार आज तक पितरों की आत्मा की शांति के लिए एवं उनके उद्धार के लिए इंदिरा एकादशी का व्रत रखा जाता है। संदेश पाने के बाद जिज्ञासु राजा ने नारद मुनि से इस एकादशी के व्रत को करने की विधि पूछी। Indira Ekadashi 2023: कब है इंदिरा एकादशी व्रत? जानिए इसका महत्व और शुभ मुहूर्त व्रत विधि उत्तर में नारद बोले, ‘आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल उठकर श्रद्धापूर्वक स्नान करें और फिर अपने पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करते हुए प्रतिज्ञा करें कि मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूंगा। शालिग्राम की मूर्ति की पूजा पूजा के लिए शालिग्राम की मूर्ति को स्थापित करें। शालिग्राम की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए और फिर पूजा के दौरान भोग लगाना चाहिए। पूजा समाप्त होने पर शालिग्राम की मूर्ति की आरती भी करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराएं पूजा के दौरान कहें ‘हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूं, आप मेरी रक्षा कीजिए। पूजा के बाद नियमों का खास ध्यान रखते हुए ब्राह्मणों का भोजन तैयार करें और उन्हें भोजन कराएं, साथ ही दक्षिणा भी दें। ऐसा माना जाता है कि कोई भी मनुष्य यदि इंदिरा एकादशी की तिथि को आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करता है, उसके पितरों को अवश्य स्वर्गलोक प्राप्त होता है। इंदिरा एकादशी की व्रत कथा सतयुग में इंद्रसेन नाम के एक राजा माहिष्मती नामक क्षेत्र में शासन करते थे। इंद्रसेन भगवान विष्णु के परम भक्त और धर्मपरायण राजा थे। वह सुचारू रूप से राज-काज कर रहे थे। एक दिन अचानक देवर्षि नारद का उनकी राज सभा में आगमन हुआ। राजा ने देवर्षि नारद का स्वागत सत्कार कर उनके आगमन का कारण पूछा। देवर्षि नारद जी ने बताया कि कुछ दिन पूर्व वो यमलोक गए थे वहां पर उनकी भेंट राजा इंद्रसेन के पिता से हुई। राजन आपके पिता ने आपके लिए संदेश भेजा है। उन्होंने कहा कि जीवन काल में एकादशी का व्रत भंग हो जाने के कारण उन्हें अभी तक मुक्ति नहीं मिली है और उन्हें यमलोक में ही रहना पड़ रहा है। मेरे पुत्र और संतान से कहिएगा कि यदि वो आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखें तो उसके भाग से मुझे मुक्ति मिल जाएगी। नारद मुनि की बात सुनकर राजा इंद्रसेन ने व्रत का विधान पूछा और व्रत करने का संकल्प लिया। राजा ने पितृ पक्ष की एकादशी तिथि पर विधि पूर्वक व्रत का पालन किया। पितरों के निमित्त मौन रह कर ब्राह्मण भोज और गौ दान किया। इस प्रकार राजा इंद्रसेन के व्रत और पूजन के भाग से उनके पिता को यमलोक से मुक्ति और बैकुंठ लोक की प्राप्ति हुई। उस दिन से ही इस व्रत का नाम इंदिरा एकादशी पड़ गया। पितृ पक्ष में पड़ने वाली इस इंदिरा एकादशी के व्रत से पितरों को अधोगति से मुक्ति मिलती है और आपको उनका आशीर्वाद।

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Indira Ekadashi 2023: कब है इंदिरा एकादशी व्रत? जानिए इसका महत्व और शुभ मुहूर्त

इंदिरा एकादशी श्राद्ध पक्ष की एकादशी है और इस एकादशी में भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है। इस व्रत के धार्मिक कर्म दशमी से ही शुरू हो जाते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार, अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को इंदिरा एकादशी व्रत रखा जाता है। इस साल ये एकादशी मंगलवार, 10 अक्टूबर को पड़ रही है। हिंदू धर्म में इस व्रत का काफी अधिक महत्व है। पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली इंदिरा एकादशी को पितरों के उद्धार के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। ऐसा माना जाता है की इस व्रत के करने से हमारे पितरों के पाप धुलते हैं और उन्हें यम लोक से मुक्ति मिलती है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। तिथि एवं मुहूर्त एकादशी की तिथि 9 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 36 मिनट से शुरू होगी और 10 अक्टूबर को दोपहर 3 बजकर 8 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार एकादशी का व्रत 10 अक्टूबर को रखा जाएगा। 11 अक्टूबर को पारण होगा, जिसका मुहूर्त सुबह 06:19 बजे से 08:38 बजे तक है। व्रतियों को इस दो घंटों में पारण कर लेना चाहिए। कैसे करें व्रत? यह श्राद्ध पक्ष की एकादशी है और इस एकादशी में भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है। इस व्रत के धार्मिक कर्म दशमी से ही शुरू हो जाते हैं। दशमी के दिन नदी में तर्पण आदि कर ब्राह्मण भोज कराएं और उसके बाद स्वयं भी भोजन ग्रहण करें। दशमी पर सूर्यास्त के बाद भोजन न करें। एकादशी के दिन प्रात:काल उठकर व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु का पूजन करने के बाद दोपहर में पुन: श्राद्ध-तर्पण कर ब्राह्मणों को भोजन कराएं। अगले दिन यानी द्वादशी को पूजन के बाद दान-दक्षिणा दें और पारण करें। इंदिरा एकादशी व्रत कथा जानिए इंदिरा एकादशी की व्रत कथा में क्या कहा गया है।  शास्त्रों के अनुसार महिष्मतिपुरी के राजा इन्द्रसेन एक धार्मिक व्यक्ति थे.वे हमेशा ही अपनी प्रजा के भले के बारे में सोचते थे और भले का कार्य ही करते थे। इसके साथ साथ उनकी ईश्वर में भी अटूट आस्था एवं श्रद्धा थी ,एक बार नारद मुनि भ्रमण  करते हुए उनके दरबार में पधारे ,राजा ने उन्हें देखते ही हाथ जोड़ कर उनका स्वागत किया और उनका पूजन किया।  राजा ने महर्षि के आने की वजह पूछी । तो नारद मुनि ने जवाब दिया ,हे राजन ! मेरे वचनो को ध्यान से सुनो, मैं एक समय ब्रह्म लोक से याम लोक गया। मैंने यमराज से सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की,उसी यमराज की सभा में धर्मात्मा एकादशी व्रत को भांग होने की वजह को देखा,उन्होंने संदेशा दिया पूर्व जन्म में कोई विघ्न हो जाने के कारण मै यमराज के निकट रहा ,इसीलिए पुत्र इंदिरा एकादशी – Indira Ekadashi का व्रत करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी और मुझे मोक्ष भी मिल जायेगा।  नारद की बात को सुन कर राजा ने अपने बांधवो तथा दासों से साथ इस व्रत को किया जिसके पुण्य प्रभाव से राजा के पिता विष्णु लोक को गए। राजा इन्द्रसेन भी एकादशी का व्रत कर अपने पुत्र को बैठा कर स्वर्ग लोक गए ,राजा इन्द्रसेन के नाम पर ही इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी पड़ा।  इंदिरा एकादशी का महत्व पितृ पक्ष  में पड़ने वाकई इस एकादशी का एक विशिष्ठ प्रकार का महत्त्व मन जाता है यह एकादशी का व्रत अश्विनी मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है ऐसा माना जाता है की इस व्रत के करने से हमरे पितरो को उनके पाप कर्मो से मुक्ति मिलती है और उन्हें यम लोक से मुक्ति मिलती है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है ,इस कृत के बारे में खुद भगवन श्री कृष्ण ने बतया की यह  व्रत धर्मराज युधिष्ठिर को बताया जाता है  इंदिरा एकादशी की पूजा विधि एकादशी व्रत में दिन में सिर्फ एक बार ही भोजन करना होता है  इस व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है  व्रत करने के लिया स्नानं कर खुद को व्रत के लिए संकापित करे  विधि पूर्वक श्राद्ध सम्पन करे एवं प्रत्येक ब्राह्मण को भोजन व दक्षिणा प्रदान करे  पितरो के नाम से दान दिया हुआ अन्न पिंड गाय को खिलाएं  भगवन विष्णु को धुप ,फूल,मिठाई फल चढ़ाएं  एकादशी के अगले दिन द्वादशी के दिन पूजा कर ब्राह्मणो को भोजन करवाएं  और अपने परिवार के साथ भोजन करते समय मौन रहे। 

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STORY OF KALI MATA मां दुर्गा ने क्यों लिया था काली माता का अवतार? जानें यह पौराणिक कथा

शास्‍त्रों के अनुसार मां भगवती ने दुष्‍टों का अंत करने के लिए विकराल रूप धारण किया था जिन्‍हें मां काली के नाम से जाना जाता है. इनकी आराधना से मनुष्य के सभी भय दूर हो जाते हैं.मां दुर्गा का विकराल रूप हैं मां काली और यह बात सब जातने हैं कि दुष्‍टों का संहार करने के लिए मां ने यह रूप धरा था. शास्‍त्रों में मां के इस रूप को धारण करने के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं और उनका व्‍याखान भी वहां मिलता है. हिंदू धर्म में देवी देवताओं में मां दुर्गा का विशेष स्थान है। मान्यता है कि दुर्गा माता की आराधना करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार देवी देवताओं ने सृष्टि को बचाए रखने के लिए समय-समय पर कई अवतार लिए हैं। इसी प्रकार मां भगवती दुर्गा देवी ने भी दुष्टों का संहार करने के लिए अनेक अवतार लिए थे। नवरात्रि के 9 दिनों में दुर्गा माता के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है। जिसमें काली माता के स्वरूप का विशेष महत्व है। पौराणिक ग्रंथों में काली माता अवतार के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। तो आइए जानते हैं पंडित इंद्रमणि घनस्याल से दुर्गा मां के काली माता अवतार लेने के पीछे की पौराणिक कथा के बारे में। इसलिए मां दुर्गा ने लिया था काली माता का अवतार पंडित इंद्रमणि घनस्याल बताते हैं कि एक दारुक नाम का असुर था। दारुक ने कई वर्षों तक तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया था। ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर दारुक को मनचाहा वरदान दिया। ब्रह्माजी द्वारा वरदान मिलने पर दारुक देवों और ब्राह्मणों को प्रताड़ित करने लगा। उसके बाद दारुक ने सभी धार्मिक अनुष्ठान, हवन इत्यादि कार्य बंद करवा दिए और स्वर्ग पर भी अपना अधिकार जमा लिया। तब सभी देवता एकत्रित होकर ब्रह्मा और विष्णु जी के पास गए और दारुक के द्वारा किए गए कृत्यों के बारे में बताया। तब ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा कि दारुक का अंत केवल एक स्त्री ही कर सकती है अर्थात दारुक एक स्त्री के हाथों ही पराजित हो सकता है। तब सभी देवता ब्रह्माजी और विष्णु के साथ स्त्री रूप में प्रकट हुए और दारुक से युद्ध करने के लिए गए।‌ लेकिन दारुक ब्रह्माजी के द्वारा दिए गए वरदान के कारण अत्यंत बलशाली हो गया था। इसलिए उसने सभी देवताओं को परास्त कर दिया। उसके बाद सभी देवता ब्रह्मा जी और विष्णु के साथ शिव जी के पास गए और असुर दारुक के बारे में शिवजी को बताया। महादेव ने पार्वती की तरफ इशारा किया, पार्वती ने अपने एक अंश को शिवजी के शरीर में अदृश्य तरीके से प्रवेश कराया। माता पार्वती का वह अंश भगवान शिव के गले में मौजूद विष से अपना आकार धारण करने लगा। भगवान शिव के गले में विष होने के कारण उस अंश ने काले रंग के वर्ण में परिवर्तित होना शुरु कर दिया। भगवान शिव ने खोला तीसरा नेत्र उसके बाद भगवान शिव ने उस अंश को अपने शरीर में महसूस करके अपना तीसरा नेत्र खोला। उनके नेत्र खोलने से एक काले वर्ण की स्त्री काली माता के रूप में प्रकट हुई। काली माता के माथे पर भी तीसरा नेत्र था। उनका रूप बहुत ही ज्यादा विकराल था। काली माता के कंठ में कराल विष का चिन्ह था। काली माता ने अनेक प्रकार के आभूषण धारण कर रखे थे। उनके हाथ में एक त्रिशूल भी था। काली माता के इस अवतार को देखकर सभी देवता डर कर भागने लगे। माना जाता है कि काली माता के हुंकार मात्र से ही दारुक और अन्य असुर जलकर भस्म हो गए थे। सपने में आग दिखाई देना भविष्य में होने वाली इस घटना का देता है संकेत, जानिए भगवान शिव ने लिया बालक का रूप काली माता के क्रोध की ज्वाला से संपूर्ण लोक अग्नि में भस्म होने लगा। पूरी सृष्टि को जलता देख भगवान शिव ने एक बालक का रूप धारण किया और भगवान शिव शमशान में जाकर बालक स्वरूप में रोने लगे। जब काली माता की दृष्टि भगवान शिव के बालस्वरूप पर पड़ी तो उनमें ममता और वात्सल्य का भाव जाग गया। काली माता ने उस बालक को अपने कलेजे से लगाया और उसे स्तनपान कराने लगी। तब शिव रूपी उस बालक ने दूध के साथ साथ काली माता के पूरे क्रोध को भी पी लिया था। माना जाता है कि माता के क्रोध से 8 मूर्तियां उत्पन्न हुई जिन्हें क्षेत्रपाल के नाम से जाना जाता है।

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17 September 2023 Aaj Ka Panchang आज का पंचांग

आज का पंचांग ~ 🌞🌤️ दिनांक – 17 सितम्बर 2023🌤️ दिन – रविवार🌤️ संवत्सर–पिंगल🌤️ विक्रम संवत – 2080 (गुजरात – 2079)🌤️ शक संवत – 1945🌤️ कलियुगाब्द-–5125🌤️ अयन – दक्षिणायन🌤️ ऋतु – शरद ॠतु🌤️ मास – भाद्रपद🌤️ पक्ष – शुक्ल🌤️ तिथि – द्वितीया सुबह 11:08 तक तत्पश्चात तृतीया🌤️ नक्षत्र – हस्त सुबह 10:02 तक तत्पश्चात चित्रा🌤️ योग – ब्रह्म 18 सितम्बर प्रातः 04:28 तक तत्पश्चात इन्द्र🌤️ राहुकाल – शाम 04:39 से शाम 06:11 तक🌞 सूर्योदय- 05:46🌤️ सूर्यास्त- 18:14_स्थानीय समयानुसार राहुकाल सूर्यास्त सूर्योदय समय में अंतर सम्भव है।👉 दिशाशूल- पश्चिम दिशा में🔥 अग्निवास🔥02+01+01=04÷4=00 पृथ्वी लोक में।✅✅🔱 शिववास🔱 02+02+5=07÷7 =00 श्मशान वासे। ❌❌🚩 व्रत पर्व विवरण – षणशीति-कन्या संक्रांति (पुण्यकाल:दोपहर 01:43 से सूर्यास्त तक💥 विशेष- द्वितीया को बृहती (छोटा बैगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)💥 रविवार के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)💥 रविवार के दिन मसूर की दाल, अदरक और लाल रंग का साग नहीं खाना चाहिए।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंडः 75.90)💥 रविवार के दिन काँसे के पात्र में भोजन नहीं करना चाहिए। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंडः 75)💥 स्कंद पुराण के अनुसार रविवार के दिन बिल्ववृक्ष का पूजन करना चाहिए। इससे ब्रह्महत्या आदि महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। 🌷 हरितालिका तीज 🌷🙏🏻 भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका तीज का व्रत किया जाता है। इस बार ये व्रत 18 सितम्बर, सोमवार को है। विधि-विधान से हरितालिका तीज का व्रत करने से कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है, वहीं विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य मिलता है। इस व्रत की विधि इस प्रकार है-🌷 विधिइस दिन महिलाएं निर्जल (बिना कुछ खाए-पिए) रहकर व्रत करती हैं। इस व्रत में बालूरेत से भगवान शंकर व माता पार्वती का मूर्ति बनाकर पूजन किया जाता है। घर को साफ-स्वच्छ कर तोरण-मंडप आदि से सजाएं। एक पवित्र चौकी पर शुद्ध मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश, पार्वती एवं उनकी सखी की आकृति (प्रतिमा) बनाएं।🙏🏻 प्रतिमाएं बनाते समय भगवान का स्मरण करें। देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन करें। व्रत का पूजन रात भर चलता है। महिलाएं जागरण करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है।🌷 भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलें-ऊं उमायै नम:, ऊं पार्वत्यै नम:, ऊं जगद्धात्र्यै नम:, ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:, ऊं शांतिरूपिण्यै नम:, ऊं शिवायै नम:🌷 भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करें-ऊं हराय नम:, ऊं महेश्वराय नम:, ऊं शम्भवे नम:, ऊं शूलपाणये नम:, ऊं पिनाकवृषे नम:, ऊं शिवाय नम:, ऊं पशुपतये नम:, ऊं महादेवाय नम:🙏🏻 पूजा दूसरे दिन सुबह समाप्त होती है, तब महिलाएं अपना व्रत खोलती हैं और अन्न ग्रहण करती हैं।🌷 ससुराल में कोई तकलीफ 🌷👩🏻 किसी सुहागन बहन को ससुराल में कोई तकलीफ हो तो शुक्ल पक्ष की तृतीया को उपवास रखें… उपवास माने एक बार बिना नमक का भोजन कर के उपवास रखें .. भोजन में दाल चावल सब्जी रोटी नहीं खाएं, दूध रोटी खा लें ..शुक्ल पक्ष की तृतीया को.. अमावस्या से पूनम तक की शुक्ल पक्ष में जो तृतीया आती है उसको ऐसा उपवास रखें… नमक बिना का भोजन(दूध रोटी) , एक बार खाएं बस…… अगर किसी बहन से वो भी नहीं हो सकता पूरे साल का तो केवल*होग➡ माघ महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया➡ वैशाख शुक्ल तृतीया और भाद्रपद मास की शुक्ल तृतीया जरुर ऐसे ३ तृतीया का उपवास जरुर करें … नमक का उपयोग न करें …. जरुर लाभ होगा…💥 विशेष – 18 सितम्बर 2023 सोमवार को भाद्रपद मास की शुक्ल तृतीया है।🙏🏻🌷🍀🌼🌹🌻🌸🌺💐🙏🏻पंचक26 सितम्बर 2023 दिन मंगलवार रात्रि 08:28 बजे से 30 सितम्बर 2023 दिन शनिवार को रात्रि 09:08 बजे तक ।एकादशी25 सितम्बर 2023 दिन सोमवार पद्मा एकादशी (स्मार्त व्रत) ।26 सितम्बर 2023 दिन मंगलवार पद्मा एकादशी (वैष्णव व्रत) ।प्रदोष27 सितम्बर 2023 दिन बुधवार प्रदोष व्रत ।पूर्णिमा28 सितम्बर 2023 दिन गुरुवार अनन्त चतुर्दशी पूर्णिमा व्रत ।29 सितम्बर 2023 दिन शुक्रवार स्नान दान पूर्णिमा। श्राद्धपक्ष आरम्भ। 17 September 2023 Aaj Ka Panchang english me Jai Shri Ram 🌞 ~ Today’s Almanac ~ 🌞🌤️ Date – 17 September 2023🌤️ Day – Sunday🌤️ Samvatsara-Pingal🌤️ Vikram Samvat – 2080 (Gujarat – 2079)🌤️ Shak Samvat – 1945🌤️ Kaliyugabd ––5125🌤️ Ayan – Dakshinayan🌤️ Season – Autumn🌤️ Month – Bhadrapada 🌤️ Side – Shukla🌤️ Date – Dwitiya till 11:08 am followed by Tritiya🌤️ Nakshatra – Hasta till 10:02 am and then Chitra🌤️ Yoga – Brahma till 04:28 am on 18th September and then Indra🌤️ Rahukaal – 04:39 PM to 06:11 PM🌞 Sunrise- 05:46🌤️ Sunset- 18:14_According to local time, difference in Rahukaal sunset and sunrise time is possible.👉 Dishashul- in the west direction🔥Agnivaas🔥 02+01+01=04÷4=00 in the earth.✅🔱 Shivvas🔱 02+02+5=07÷7 =00 Cremation grounds.🚩 Fast festival details – Shanashiti-Kanya Sankranti (Punyakaal: 01:43 pm to sunset💥 Special- Eating Brihati (small brinjal or brinjal) is prohibited on Dwitiya. (Brahmavaivarta Purana, Brahma Khand: 27.29-34)💥 Sex with a woman and eating and applying sesame oil are prohibited on 💥 Sunday. (Brahmavaivarta Purana, Brahma Khand: 27.29-38) 💥 Lentils, ginger and red colored vegetables should not be eaten on Sunday. (Brahmavaivarta Purana, Shri Krishna section: 75.90)💥 One should not eat food in bronze utensils on Sunday. (Brahmavaivarta Purana, Shri Krishna Volume: 75)💥 According to Skanda Purana, Bilva tree should be worshiped on Sunday. By this the great sins like Brahmahatya etc. are also destroyed. 🌷 Haritalika Teej 🌷🙏🏻 Haritalika Teej fast is observed on the third day of Shukla Paksha of Bhadrapada month. This time this fast is on 18th September, Monday. By observing the fast of Haritalika Teej as per the rituals, unmarried girls get the groom of their choice, while married women get unbroken good fortune. The method of this fast is as follows- 🌷 MethodOn this day women observe Nirjal (without learning anything) fast. In this fast, the idol of Lord Shankar and Mother Parvati is worshipped. Clean the house and decorate it with Toran-Mandap etc. A sacred temple contains the idols (statues) of Ganesha, Parvati and his Sakhi along with Ganga water, Riddhi-Siddhi in pure soil. 🙏🏻 Remember

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सपने में आग दिखाई देना भविष्य में होने वाली इस घटना का देता है संकेत, जानिए

स्वप्न शास्त्र अनुसार सपने यूं ही नहीं आते, हर सपने का कुछ न कुछ अर्थ जरूर होता है। सपने भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में पहले से ही सतर्क कर देते हैं। सपने शुभ भी हो सकते हैं और अशुभ भी। यहां हम बात करेंगे आग से संबंधित सपनों के बारे में, जिसके आने के कई मायने हो सकते हैं। जानिए सपने में आग देखना शुभ होता है या अशुभ… अगर सपने में आपको अपना घर जलते हुए दिखाई देता है तो इससे घबराएं नहीं ये सपना शुभ माना गया है। कहते हैं कि किसी अविवाहित को ये सपना दिखाई देता है तो इसका मतलब उसे मनचाहा जीवनसाथी मिलेगा और अगर विवाहित लोगों को ये सपना दिखाई देता है तो इसका मतलब सर्वगुण संपन्‍न संतान की प्राप्ति होगी। यदि आप खुद को आग में जलता हुआ देखते हैं तो इसका मतलब आपका भविष्य शानदार रहेगा। यदि सपने में आप खुद को आग में जलता हुआ देखते हैं तो इससे उम्र बढ़ जाती है। इसके अलावा इस सपने से ये भी पता चलता है कि मां लक्ष्मी की अपार कृपा से आपको सुख-समृद्धि मिलेगी। अगर आपको सपने में किसी भी तरह का धुआं दिखाई देता है तो यह समझ लें कि आपके नए दुश्मन बनेंगे। हो सकता है कि आने वाले समय में आपको व्यापार में भी हानि हो जाए। ये सपना बीमारी होने का भी संकेत देता है। अगर आप सपने में हवन या पूजा की अग्नि देखते हैं तो आपकी परेशानियां जल्‍दी ही दूर होने वाली हैं। ये सपना बताता है कि जल्‍दी ही आपके जीवन में सुख और शांति का वास होगा। यदि आप सपने में किसी को आग से जलता हुआ देखें तो यह सपना खराब माना जाता है। इसका अर्थ है कि आपको व्‍यापार में नुकसान होने वाला है। वहीं अगर किसी वस्‍तु को आग में जलता हुआ देखें तो इसका मतलब आपको पित्त संबंधी रोग होने की संभावना है। सपने में अगर आप खुद को या फिर किसी दूसरे को आग पकड़ता हुए देखें तो इसका मतलब है कि आपका फिजूल खर्चा हो सकता है।  ऑफिस या दुकान में आग देखना  सपने में आग देखना सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की घटनाओं की ओर इशारा करती है. इसके लिए मायने ये रखता है कि आप सपने में आग लगने की घटना कहां होने की देख रहे हैं. बता दें कि, यदि आप सपने में अपनी दुकान या ऑफिस को जलता हुए देखते हैं तो ये आपकी तरक्की की ओर इशारा करती है. अगर आप बिजनेशमैन हैं तो व्यापार में लाभ हो सकता है और यदि आप नौकरीपेशा हैं तो प्रमोशन या वेतन वृद्धि संभव है. खुद को आग में फंसा देखना सपने में यदि आप भयंकर आग को देखते हैं तो आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है. दरअसल इस तरह के मतलब का अर्थ है कि आपका मानसिक तनाव अब समाप्ति की ओर है. आपको विदेश यात्रा का योग बन सकता है. इसके अलावा यदि आप खुद को सपने में आग के बीच खुद को फंसा देखते हैं और खुद को बचा नहीं पा रहे हैं तो इसका अर्थ है कि आपके शरीर में पित्त की समस्या बढ़ सकती है. बेहतर है कि ऐसा सपना देखने पर चेकअप जरूर कराएं. खुद को आग बुझाते देखना सपने में आग बुझाते देखना जीवन में आने वाली नकारात्मक घटनाओं की ओर इशारा है. ऐसे में जरूरी है कि एहतियात के साथ काम लें. बता दें कि यदि आप इस तरह का सपना देखते हैं तो इसका मतलब है कि किसी के साथ आपके रिश्तों में खटास आ सकती है. इस तरह की स्थिति परिवार के सदस्यों के साथ भी हो सकती है. इसके लिए बेहतर है कि आप खुद पर संयम बनाकर रखें. अपने घर में लगी आग देखना सपने में यदि आप खुद के ही घर में आग लगी देखें तो चिंता करने के बजाह आपको खुश होने की जरूरत है. हालांकि इस तरह का सपना देखते ही कई लोग घबरा भी जाते हैं. बता दें कि, यदि आप सपने में अपने घर को जलता देखते हैं तो संकट दूर होने की ओर इशारा है. दरअसल इस तरह के संकेत का मतलब है कि जल्द ही आपके घर नन्हा मेहमान आने वाला है. यदि आप अविवाहित हैं तो मनपसंद जीवनसाथी की खोज पूर्ण हो सकती है.

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सपने में पानी देखना शुभ होता है या अशुभ, जानें अर्थ

स्वप्न शास्त्र के अनुसार यदि आपको सपने में पानी दिखता है तो इसका क्या अर्थ होता है। क्या सपने में पानी दिखना शुभ होता है या फिर अशुभ। जानें स्वप्न शास्त्र में इस बात को लेकर क्या बात कही गई। व्यक्ति जब गहरी नींद में होता है तो वह सपने देखता है। व्यक्ति सपने में न जाने से कहां से कहां पहुंच जाता है, पर जब उठता है तो खुद को बेड पर ही पाता है। हालांकि देखे हुए सपने का कोई न कोई मतलब जरूर निकलता है। ऐसे में यदि आपको सपने में पानी से जुड़ी चीजें दिखती हैं तो उनका क्या मतलब होता है? तो चलिए जानते हैं कि इन सपनों का क्या अर्थ होता है और साथ ही जानेंगे कि ये सपने शुभ होते हैं या फिर अशुभ। सपने में तालाब देखने का अर्थ सपने में यदि आप तालाब देखते हैं तो स्वप्न शास्त्र में इसे भी शुभ माना गया है। सपने में तालाब को देखना शुभ होता है। यदि तालाब का पानी साफ दिखता है तो ये शुभ होता है। यदि आप ने तालाब में या किसी भी जगह पर गंदा पानी देखा है तो ये अशुभ होता है। सपने में पानी दिखने का मतलब 1. सपने में बरसात के पानी का दिखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में बरसात के पानी का दिखना शुभ प्रतीक माना जाता है। इसका मतलब है, कि आपको बहुत जल्द कोई बड़ी खुशखबरी मिलने वाली है या आपको किसी काम में सफलता मिलने की उम्मीद हैं। 2. सपने में बाढ़ के पानी का दिखना  बाढ़जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है। यदि आपको सपने में बाढ़ का पानी दिख रहा है, तो समझ जाए आपके जीवन में बहुत जल्द कष्ट आ सकता है या आपको कहीं से बुरी खबर मिल सकती हैं। 3.सपने में कुएं के पानी का दिखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में कुएं के पानी का देखना शुभ संकेत माना जाता है। यदि आपको सपने में कुएं का पानी दिखाई दें, तो आपको बहुत जल्द कहीं से शुभ समाचार मिल सकता है या धन का भी लाभ हो सकता हैं। 4. सपने में नदी का पानी दिखाई देना स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में नदी का पानी दिखाई देने से पुरानी इच्छा बहुत जल्द पूरी हो सकती है। आपको जीवन में कोई सुनहरा अवसर मिल सकता है या आपको करियर में आगे बढ़ने का चांस भी मिल सकता हैं। यदि आप स्वयं को नदी में तैरते करते हुए देखें, तो यह भी शुभ माना जाता है। 5. सपने में समुद्र का पानी दिखाई देना सपने में समुद्र का पानी दिखाई देना शुभ नहीं माना जाता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार ऐसा सपना जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव की तरफ इशारा करता है। ऐसा सपना देखने का मतलब भविष्य में आपको किसी के साथ झगड़ा हो सकता है। यदि आपको सपने में समुद्र का पानी दिखाई दें, तो आप अपनी वाणी पर नियंत्रण रखने की कोशिश करें। क्योंकि यह बहुत बड़े विवाद की वजह बन सकती है।

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सपने में खुद की मृत्यु देखने का मतलब होता है बेहद खास, जानें-इससे जुड़ी रोचक बातें

सपने आगामी भविष्य के संकेत होते हैं। इसमें कई सपने अच्छे होते हैं तो कई सपने बुरे होते हैं। वहीं कई सपने बेहद डरावने होते हैं। इन सपनों को देख व्यक्ति घबरा जाता है। खासकर सपने में खुद की मृत्यु देखना तो और भी डरावना होता है। सपने का वास्तविक जीवन से गहरा संबंध होता है। ये आगामी भविष्य के संकेत होते हैं। इसमें कई सपने अच्छे होते हैं, तो कई सपने बुरे होते हैं। वहीं, कई सपने बेहद डरावने होते हैं। इन सपनों को देख व्यक्ति घबरा जाता है। खासकर, सपने में खुद की मृत्यु देखना तो और भी डरावना होता है। लोग सपने में खुद की मृत्यु देख डर जाते हैं। अगर आप भी सपने में खुद की मृत्यु या किसी अनजान व्यक्ति की मृत्यु देखते हैं, तो इन सपनों का मतलब बहुत खास होता है। आइए, इन सपनों के बारे में सबकुछ जानते हैं क्या आप ने भी सपने में देखी है खुद की शादी? जानें क्या है इसका मतलब अगर आप सपने में किसी मृत व्यक्ति को देखते हैं, तो ये संकेत है कि उस व्यक्ति से आपका बेहद खास लगाव है। वहीं, बार-बार मृत व्यक्ति का सपना देखना शुभ नहीं होता है। ये संकेत है कि आने वाले समय में कोई बड़ी मुसीबत आ सकती है। अगर आप सपने में खुद की मृत्यु देखते हैं, तो ये शुभ संकेत है। इस सपने का मतलब यह है कि आपकी उम्र लंबी होने वाली है। आसान शब्दों में कहें तो जीवन में व्याप्त सभी परेशानियां दूर होने वाली हैं। अगर आप विषम परिस्थिति से गुजर रहे हैं, तो सभी परेशानियां दूर हो जाएंगी। साथ ही जीवन में कोई बड़ी खुशखबरी मिलने वाली है। स्वप्न शास्त्र की मानें तो सपने में बीमार व्यक्ति को देखना या बीमार व्यक्ति की मृत्यु के सपने देखना नुकसानदेह नहीं होता है। इस सपने का मतलब होता है कि जल्द बीमार व्यक्ति की सेहत में सुधार होने वाला है। सपने में स्वर्गवासी पिता का देखना सकारात्मक संकेत होता है। सपने में स्वर्गवासी पिता से बात करना या पिता को देखना शुभ होता है। इस सपने का मतलब होता है कि आपके जीवन में खुशियां आने वाली हैं। इस सपने का यह भी अर्थ होता है कि जल्द घर में कोई उत्सव का आयोजन होने वाला है। अगर आप सपने में किसी बीमार व्यक्ति की मौत देखते हैं तो आपको बिल्कुल भी घबराने की जरूरत नहीं है. स्वप्नशास्त्र के अनुसार, यह सपना उस व्यक्ति की सेहत में सुधार होने का संकेत देता है. किसी की मौत का सपना देखना शुभ माना जाता है. अगर सपने में आपको आपके पूर्वज दिखाई देते हैं तो इसका संकेत है कि या तो उनकी कोई इच्छा अतृप्त रह गई है या फिर वो आपको किसी आगामी घटना का आभास करा रहे हैं. अगर आप सपने में खुद को बीमार होते हुए देखता है तो स्वप्न शास्त्र के अनुसार यह सपना अशुभ होता है. इस सपने का अर्थ है कि आने वाले समय में आपको बहुत सारे कष्टों का सामना करना पड़ सकता है. आपको धन की हानि भी ह सकती है.

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Shardiya Navratri 2023 Date: शारदीय नवरात्रि कब से हो रहे शुरू, जानें महत्व, कलश स्थापना का मुहूर्त

सनातन धर्म में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ हो जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शारदीय नवरात्रि में मां शक्ति के 9 स्वरूपों की उपासना करने से साधक को विशेष लाभ प्राप्त होता है। साथ ही जीवन में आ रही सभी समस्या दूर हो जाती है। हिंदू धर्म में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। बता दें कि हर वर्ष दो नवरात्रि पर मनाए जाते हैं। एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में। आश्विन मास में पड़ने वाली नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्रि की शुरुआत आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से हो जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शारदीय नवरात्रि में घटस्थापना और नौ दिनों तक देवी दुर्गा की उपासना करने से साधक को सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए यहां शारदीय नवरात्रि 2023 तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 14 अक्टूबर रात्रि 11 बजकर 24 मिनट से शुरू होगी और 16 अक्टूबर मध्य रात्रि 12 बजकर 32 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। ऐसे में शारदीय नवरात्रि पर्व का शुभारंभ 15 अक्टूबर 2023, रविवार के दिन होगा। इस विशेष दिन पर चित्रा नक्षत्र और स्वाति नक्षत्र का निर्माण हो रहा है, जिसे शुभ कार्यों के लिए बहुत ही श्रेष्ठ माना जाता है। शारदीय नवरात्रि 2023 घटस्थापना समय शास्त्रों में बताया गया है कि शारदीय नवरात्रि के शुभ अवसर पर घटस्थापना मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त के दौरन तय होता है। घट स्थापना का समय निश्चित चित्रा नक्षत्र के दौरन ही होता है। ऐसे में इस दिन चित्रा नक्षत्र 14 अक्टूबर को शाम 04 बजकर 24 मिनट से 15 अक्टूबर शाम 06 बजकर 13 मिनट तक रहेगा। वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 04 मिनट से सुबह 11 बजकर 50 मिनट के बीच रहेगा, इसलिए घटस्थापना पूजा भी इसी अवधि में की जाएगी। शारदीय नवरात्रि का धार्मिक महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पहले चैत्र नवरात्रि को ही बहुत धूमधाम से मनाया जाता था लेकिन जब भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की तब वह चैत्र नवरात्रि का इंतजार नहीं करना चाहते थे और आश्विन मास की प्रतिपदा को दुर्गा पूजा आयोजित की। तभी से शारदीय नवरात्रि की धूम होने लगी। देवी भागवत पुराण में भी भगवान श्रीराम द्वारा शारदीय नवरात्रि का व्रत और शक्ति पूजन करने का वर्णन मिलता है। इसके साथ ही आश्विन मास में ही मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस पर आक्रमण कर दिया और उससे नौ दिन तक युद्ध किया और दसवें दिन राक्षस का वध कर दिया इसलिए नौ दिन तक मां दुर्गी की पूजा शक्ति के रूप में की जाती है। कलश स्थापना का मुहूर्त शारदीय नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि यानी पहले दिन कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा की पूजा शुरू होती है। शक्ति पूजा से पहले मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त 15 अक्टूबर को 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक है। ऐसे में कलश स्थापना के लिए 46 मिनट का समय दिया गया है। नवरात्रि में इस दिन करें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा नवरात्रि का पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा – 15 अक्टूबर 2023नवरात्रि का दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा – 16 अक्टूबर 2023नवरात्रि का तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा – 17 अक्टूबर 2023नवरात्रि का चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा – 18 अक्टूबर 2023नवरात्रि का पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा – 19 अक्टूबर 2023 नवरात्रि का छठवें दिन मां कात्यायनी की पूजा – 20 अक्टूबर 2023नवरात्रि का सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा – 21 अक्टूबर 2023नवरात्रि का आठवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा – 22 अक्टूबर 2023नवरात्रि का नौवें दिन मां महागौरी की पूजा – 23 अक्टूबर 2023विजयदशमी या दशहरा पर्व – 24 अक्टूबर 2023

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Chandra Darshan 2023: आज कब और कैसे करें चंद्र दर्शन, जानें चंद्रमा की पूजा विधि और उपाय

ज्येष्ठ मास की अमावस्या के बाद चंद्र देवता के दर्शन का सौभाग्य कब प्राप्त होगा और क्या है इसकी पूजा विधि, मंत्र और धार्मिक महत्व, विस्तार से जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. सनातन परंपरा में किसी भी मास की अमावस्या के बाद होने वाले चंद्र दर्शन का बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व माना गया है. यही कारण है कि जीवन में शुभता और सौभाग्य की कामना लिए लोग इस दिन का बहुत बेसब्री से इंतजार करते हैं. ज्योतिष में जिस चंद्रमा को मन का कारक माना गया है, उसका दर्शन महीने की 20 तारीख को होगा. चंद्र दर्शन करना किस समय बहुत ज्यादा शुभ रहता है? चंद्र दर्शन की पूजा विधि और मंत्र क्या है? आइए इन सभी बातों के साथ चंद्र देवता की पूजा का पुण्य लाभ दिलाने वाला महाउपाय को विस्तार से जानते हैं. Vishwakarma Jayanti 2023 Date:  कब है विश्वकर्मा जयंती, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त चंद्र दर्शन की पूजा विधि हिंदू मान्यता के अनुसार चंद्र दर्शन करने के लिए व्यक्ति को शाम के समय तन और मन से पवित्र होकर इस पूजा को करना चाहिए. यदि संभव हो तो चंद्र दर्शन करते समय व्यक्ति को सफेद कपड़े पहनना चाहिए. चंद्र दर्शन की पूजा में सबसे पहले दूध और उसके बाद शुद्ध जल चंद्र देवता को अर्पित करें. इसके बाद उन्हें खीर का भोग लगाकर धूप-दीप दिखाएं और चंद्र देवता के मंत्र ‘ॐ सों सोमाय नम:’ अथवा ‘ॐ श्रीं श्रीं चन्द्रमसे नम:’का जप करें. मान्यता है कि यह पूजा और मंत्र जप पति और पत्नी दोनों साथ मिलकर करें तो वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है. इसी तरह चंद्र दर्शन से व्यक्ति मन से जुड़ी चिंताएं दूर होती है और घर-परिवार में सुख-सौभाग्य बना रहता है. चंद्र दर्शन का महत्व चंद्र ग्रह को ज्ञान, बुद्धि और मन का स्वामी ग्रह माना जाता है. चंद्र दर्शन के दिन चंद्रमा के दर्शन से विशेष लाभ मिलते हैं. लोग भगवान की कृपा पाने के लिए कठोर व्रत और तपस्या करते हैं. चंद्र दर्शन और पूजा से भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है. जीवन से नकारात्मकता को कम करने के लिए चंद्र यंत्र की पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने से लाभ मिलता है. इस दिन ब्रह्मणों को दान करने से भी लाभ मिलता है.

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Vishwakarma Jayanti 2023 Date:  कब है विश्वकर्मा जयंती, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त

भगवान विश्वकर्मा को प्राचीन काल का सबसे पहला इंजीनियर कहा जाता है। उन्होंने भगवान शिव के त्रिशूल से लेकर कई और भी चीजों का निर्माण किया था। आइए जानते हैं इस साल कब है विश्वकर्मा जयंती और पूजा के लिए शुभ मुहूर्त कब से कब तक रहेगा। विश्वकर्मा की जयंती हर साल कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है।। भगवान विश्वकर्मा ने ही भगवान शिव की त्रिशूल, लंका महल, द्वारका और देवताओं के अस्त्र और शस्त्र का निर्माण किया था। आइए जानते हैं इस साल कब मनाई जाएगी भगवान विश्वकर्मा की जयंती। करवा चौथ व्रत कथा | Karwa Chauth Vrat Katha In Hindi कब मनाई जाएगी विश्वकर्मा जयंती विश्वकर्मा जयंती 17 सितंबर 2023 को मनाई जाएगी। इसी के साथ पूजा के लिए सुबह 7 बजकर 50 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 26 मिनट तक का शुभ मुहूर्त है। विश्वकर्मा पूजा महत्व ऋषियों-मुनियों ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ विश्वकर्मा जी की पूजा आराधना का प्रावधान है। विश्वकर्मा जी को ही प्राचीन काल का पहला इंजीनियर माना जाता है। इस दिन औद्योगिक क्षेत्रों से जुड़े उपकर औजार, की पूजा की करने से कार्य में कुशलता आती है। साथ ही आपके कारोबार में बढ़ोतरी होती है। इतना ही नहीं आपके घर में धन धान्य और सुख समृद्धि का आगमन होता है। विश्वकर्मा ने की थी पुष्पक विमान की रचना विश्वकर्मा पुराण के अनुसार, नारायण ने सर्वप्रथम ब्रह्माजी और फिर विश्वकर्मा जी की रचना की थी। ब्रह्माजी के दिशा निर्देश के अनुसार, ही उन्होंने पुष्पक विमान की रचना की थी। इन सबके अलावा भगवान विश्वकर्मा को वास्तु शास्त्र का ज्ञान, यंत्र का निर्माण, विमान विद्या आदि के बारे में भी कई जानकारी प्राप्त हैं। विश्वकर्मा पूजन विधि विश्वकर्मा जयंती के दिन प्रतिमा को विराजित करके पूजा की जाती है। जिस व्यक्ति के प्रतिष्ठान में पूजा होनी है, वह प्रात:काल स्नान आदि करने के बाद अपनी पत्नी के साथ पूजन करें। हाथ में फूल, चावल लेकर भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए घर और प्रतिष्ठान में फूल व चावल छिड़कने चाहिए। इसके बाद पूजन कराने वाले व्यक्ति को पत्नी के साथ यज्ञ में आहुति देनी चाहिए। पूजा करते समय दीप, धूप, पुष्प, गंध, सुपारी आदि का प्रयोग करना चाहिए। पूजन से अगले दिन प्रतिमा का विसर्जन करने का विधान है।  पूजन के मंत्र भगवान विश्वकर्मा की पूजा में ‘ॐ आधार शक्तपे नम: और ॐ कूमयि नम:’, ‘ॐ अनन्तम नम:’, ‘पृथिव्यै नम:’ मंत्र का जप करना चाहिए। जप के लिए रुद्राक्ष की माला होना चाहिए।  जप शुरू करने से पहले ग्यारह सौ, इक्कीस सौ, इक्यावन सौ या ग्यारह हजार जप का संकल्प लें। चूंकि इस दिन प्रतिष्ठान में छुट्टी रहती है तो आप किसी पुरोहित से भी जप संपन्न करा सकते हैं।

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2023 गणेश उत्सव के दस दिनों में लगाएं इन 10 चीजों का भोग, बप्पा पूरी करेंगे आपकी हर मनोकामना

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन सुख-समृद्धि के देवता भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था। इसी उपलक्ष्य में हर साल गणेश उत्सव मनाया जाता है। यह पर्व पूरे दस दिनों तक चलता है। गणेश उत्सव का यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तिथि के दिन तक चलता है। इस साल गणेश उत्सव की शुरुआत 19 सितंबर को हो रही है। वहीं इसका समापन 28 सितंबर 2023 को अनंत चतुर्थी वाले दिन होगा। गणेश उत्सव के इन 10 दिनों में गणपति बप्पा को 10 अलग-अलग चीजों का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इन दिनों भगवान गणेश को उनकी प्रिय चीजों का भोग लगाने से गणपति बप्पा अति प्रसन्न होते हैं। आइए जानते हैं गणेश उत्सव के दौरान बप्पा को कौन से भोग लगाने चाहिए….. गणेश चतुर्थी पर इस मुहूर्त में घर लाएं गणपति, जानिए गणपति स्थापना और पूजा विधि गणेश उत्सव पर गणपति बप्पा को  अर्पित करने योग्य चीजें पहला दिन उन्हें मोदक बहुत प्रिय है, इसलिए गणेश उत्सव के पहले दिन मोदक चढ़ाने से भी उन्हें अत्यंत प्रसन्नता होती है। दूसरा दिन  गणेश जी को मोतीचूर के लड्डू भी बहुत प्रिय हैं. ऐसे में गणेश उत्सव के दूसरे दिन भगवान गणेश को मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाना सर्वोत्तम होता है। तीसरा दिन  विघ्नहर्ता गणेश को बेसन के लड्डू भी पसंद हैं. इसलिए गणेश उत्सव के तीसरे दिन लड्डुओं का भोग लगाने की सलाह दी जाती है। दिन 4  भगवान गणेश को केले का भोग लगाना सर्वोत्तम प्रसादों में से एक है। इसलिए गणेश उत्सव के चौथे दिन प्रसाद में केले का फल जरूर शामिल करें। दिन 5  धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश जी को मखाने की खीर भी बहुत पसंद है. इसलिए पांचवें दिन बप्पा को प्रसाद के रूप में मखाना खीर का भोग अवश्य लगाएं। दिन 6  हिंदू धर्म में, नारियल का उपयोग अक्सर पूजा के दौरान किया जाता है और अधिकांश पूजा थालियों, यज्ञ, हवन आदि पर देखा जाता है। नारियल को प्रसाद के रूप में भी वितरित और खाया जाता है। ऐसे में छठे दिन बप्पा को नारियल का भोग लगा सकते हैं. दिन 7  पूजा के दौरान गुड़ का भोग लगाना भी बहुत शुभ माना जाता है. यह एक पारंपरिक प्रसाद है जो भगवान गणेश को बहुत प्रिय है। इसलिए सातवें दिन बप्पा को घी और गुड़ का भोग लगाना अच्छा विचार है। दिन 8 ऐसा कहा जाता है कि भगवान गणेश को मोदक और लड्डू बहुत पसंद हैं. इसलिए आठवें दिन मोतीचूर और बेसन का भोग लगाने के अलावा आप मावा के लड्डू का भी भोग लगा सकते हैं. दिन 9 दूध से बनी कलाकंद और खोपरपाक जैसी स्वादिष्ट मिठाइयाँ भी गौरी पुत्र गणेश को बहुत प्रिय हैं। ऐसे में नौवें दिन भगवान गणेश को दूध और घी से बनी मिठाई का भोग लगाना बहुत शुभ होता है। दिन 10 – हिंदू धर्म में 56 भोग का बहुत महत्व है. ऐसे में गणेशोत्सव के दसवें यानी आखिरी दिन बप्पा को 56 भोग लगाना चाहिए।

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