June 2023

भगवान श्रीराम के जन्म की पौराणिक कथा पढ़ने और सुनने से मिलता है कई गुना पुण्य फल

महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ आरंभ करने की ठानी। महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया गया। महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिये बुलावा भेज दिया। निश्‍चित समय आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा अपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि को लेकर यज्ञ मण्डप में पधारे। इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया। सम्पूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने तथा समिधा की सुगन्ध से महकने लगा। समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद चरा(खीर) को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया। जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि नील वर्ण, चुंबकीय आकर्षण वाले, अत्यन्त तेजोमय, परम कान्तिवान तथा अत्यंत सुंदर था। उस शिशु को देखने वाले देखते रह जाते थे। इसके पश्चात् शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। सम्पूर्ण राज्य में आनन्द मनाया जाने लगा। महाराज के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में गन्धर्व गान करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवता अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे। महाराज ने उन्मुक्त हस्त से राजद्वार पर आए भाट, चारण तथा आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी। पुरस्कार में प्रजा-जनों को धन-धान्य तथा दरबारियों को रत्न, आभूषण प्रदान किए गए। चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ के द्वारा किया गया तथा उनके नाम राम चन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गए। आयु बढ़ने के साथ ही साथ राम चन्द्र गुणों में भी अपने भाइयों से आगे बढ़ने तथा प्रजा में अत्यंत लोकप्रिय होने लगे। उनमें अत्यन्त विलक्षण प्रतिभा थी जिसके परिणामस्वरूप अल्प काल में ही वे समस्त विषयों में पारंगत हो गए। उन्हें सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने तथा हाथी, घोड़े एवं सभी प्रकार के वाहनों की सवारी में उन्हें असाधारण निपुणता प्राप्त हो गई। वे निरन्तर माता-पिता और गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे। उनका अनुसरण शेष तीन भाई भी करते थे। गुरुजनों के प्रति जितनी श्रद्धा भक्ति इन चारों भाइयों में थी उतना ही उनमें परस्पर प्रेम और सौहार्द भी था। महाराज दशरथ का हृदय अपने चारों पुत्रों को देख कर गर्व और आनन्द से भर उठता था।

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हनुमान जी के जन्म के पीछे की पौराणिक कथा

महाबली हनुमान के नाम लेने से ही सभी कष्ट दूर हो जाते है। संकटमोचन हनुमान का सुमिरन करने से न सिर्फ भय, बल्कि सभी प्रकार के संकट भी छू-मंतर हो जाते है। बजरंगबली की महिमा से तो हम सभी भली-भांति परिचित है, लेकिन क्या आप हनुमान जी के जन्म के पीछे की पौराणिक कथा जानते है? हनुमान जी भगवान शिव के 11 वें रुद्र के रूप में जाने जाते है। आपको बता दें, रामचरितमानस में बजरंगबली के जन्म के बारे में वर्णन किया गया है। माना जाता है की हनुमान जी का जन्म ऋषियों-मुनियों द्वारा दिए गए वरदान से हुआ था, ऐसे में आइये विस्तार से जानते है हनुमान जी के धरती पर अवतरित होने की कथा। ऋषियों द्वारा वरदान प्राप्ति पवनसुत हनुमान का जन्म मंगलवार के दिन चैत्र माह की पूर्णिमा को हुआ था। हनुमान जी के पिता का नाम वानरराज केसरी था, वहीं माता का नाम अंजनी था। वेद पुराणों में ऐसा बताया जाता है की जब एक बार वानरराज केसरी प्रभास नामक तीर्थ स्थान पर गए, तब उन्होंने देखा की वहां समुद्र के किनारे बैठ कुछ ऋषि गण पूजन कर रहे है। वे सभी शांति से पूजा-पाठ कर ही रहे थे, की इतनी देर में वहां एक विशाल हाथी आ पहुंचा। वह हाथी उपद्रव मचाने लगा जिसके कारण ऋषियों के पूजा में खलल पड़ गया। राजा केसरी पर्वत पर बैठकर यह पूरा दृश्य देख रहे थे और यह देखकर वह तुरंत ऋषियों की मदद के लिए वहां पहुंचे। वानरराज ने उस उपद्रवी हाथी के दांत तोड़ कर उसे मौत के घाट उतार दिया। जिसके बाद वहां मौजूद समस्त ऋषि गण वानरराज केसरी से बहुत अधिक प्रसन्न हुए। उनके कार्य से प्रसन्न होकर ऋषियों ने उन्हें रूप बदलने वाले, वायु के समान तेज और बुद्धिवान पुत्र होने का वरदान दिया। भगवान शिव रूप में लिया था जन्म एक और कथा के अनुसार बताया जाता है की जब माता अंजनी सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए रुकी तो अचानक से बहुत तेज हवा चलने लगी। जब माता अंजनी ने अपने आस पास देखा तो उन्हें अहसास हुआ की यह सामान्य हवा नहीं है बल्कि कोई अपनी मायावी शक्तियों से हवा को उनकी ओर प्रवाहित कर रहा है। उन्होंने यह पता लगाने के लिए अपने चारों ओर देखा पर उन्हें वहां कोई भी नज़र नहीं आया, इसके बाद माता अंजनी क्रोधित हो गयी और उन्होंने ऊंचे स्वर में कहा की आखिर ऐसा कौन व्यक्ति है जो एक पतिव्रता स्त्री का अपमान करने का दुस्साहस कर रहा है? उनके यह कहने के बाद वहां पवन देव प्रकट हुए और माता अंजनी से क्षमा मांगने लगे। पवन देव ने कहा- “मुझे क्षमा कर दीजिये, लेकिन आपके पति को ऋषि गणों ने मेरे समान पुत्र होने का वरदान दिया था इसी कारण मुझे यहां प्रकट होना पड़ा। मेरे अंश के माध्यम से अब आपको एक पराक्रमी और तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी। मेरे स्पर्श से भगवान रूद्र बालक के रूप में प्रविष्ट हुए है जो की आपके पुत्र के रूप में प्रकट होंगे।” इसी प्रकार भगवान शिव के रूद्र अवतार ने माता अंजनी के गर्भ से जन्म लिया और यही कारण है की हनुमान जी को अंजनी पुत्र और केसरी नंदन के नाम से भी जाना जाता है।

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महाभारत के युद्ध के बाद श्री कृष्ण की मृत्यु कैसी हुई थी, आखिर क्या है इसका रहस्य

भगवान् श्री कृष्ण के भक्त उनका नाम सुनते ही उनके जन्म से जुड़ी न जाने कितनी कथाएं बताने लगते हैं। कोई कृष्ण जी के जन्म के बारे में बताता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ और फिर वो गोकुल में पीला बढ़े। कुछ लोग उनकी बाल लीलाओं की कहानियां सुनाते हैं। आपमें से सभी लोग ये भी जानते हैं कि महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु युद्ध के बाद कैसे हुई। दरअसल इस बात से लोग अब तक अंजान हैं कि युद्ध के बाद श्री कृष्ण की मृत्यु कब और कैसे हुई। ये वास्तव में ऐसा सवाल है जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता है। हमने भी इस सवाल का जवाब जानने की इच्छा रखते हुए इस बात का पता लगाने की कोशिश की। आइए आपको भी बताते हैं कृष्ण की मृत्यु से जुड़े कुछ रहस्यों के बारे में। श्री कृष्ण के जन्म से जुड़ी बातें पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ था। वैसे ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था, लेकिन उनके बचपन की लीलाएं गोकुल, वृंदावन, नंदगांव और बरसाना में हुईं। वहीं ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने 36 वर्षों तक द्वारिका नगरी में राज किया। महाभारत युद्ध के बाद क्या हुआ था ऐसा माना जाता है कि जब महाभारत युद्ध के बाद दुर्योधन के पूरे वंशजों का अंत हो गया तब उनकी माता दुखी अवस्था में आ गयीं। उस समय जब वो कौरवों की मृत्यु पर शोक दिखाते हुए युद्ध भूमि में गयीं तब उनके साथ श्री कृष्ण और पांडव भी गए। दुखी अवस्था में गांधारी ने भगवान कृष्ण को 36 वर्षों के बाद मृत्यु का अभिशाप दे दिया। ये सुनकर सभी पांडव चकित रह गए लेकिन भगवान कृष्ण विचलित न हुए और मुस्कुराते हुए उन्होंने ये अभिशाप स्वीकार कर लिया। एक शिकारी के तीर से हुई श्री कृष्ण की मृत्यु गांधारी के श्राप की वजह से जब कृष्ण जी युद्ध के 36 सालों के बाद द्वारका में बसने के बाद एक दिन एक वृक्ष के नीचे रात्रि में विश्राम कर रहे थे। उस समय उनके पैर में लगी हुई मणि तेजी से चमक रही थी। उस चमकती मणि को देखकर एक शिकारी जिसका नाम जरा था। उस समय शिकारी ने श्री कृष्ण के पैरों को देखकर यह अनुमान लगाया कि वह कोई मृग है। उस समय शिकारी जरा ने कृष्ण जी के पैरों में तीर से प्रहार कर दिया। जरा के तीर से घायल श्री कृष्ण ने वहीं पर देह त्यागने का निर्णय लिया। इस प्रकार युद्ध के समाप्त होने के 36 साल बाद यानी जब श्री कृष्ण की आयु लगभग 125 साल थी, उस समय प्रभु श्री कृष्ण ने अपनी देह त्याग दी और वापस स्वर्ग लोक को चले गए। रामायण काल के बाली ने लिया था कृष्ण से बदला ऐसी मान्यता है कि रामायण काल में श्री राम (भगवान राम की मृत्यु से जुड़े ये रोचक तथ्य) ने बाली के ऊपर छिपकर प्रहार किया था और उसका बदला लेने के लिए ही द्वापर युग में जब राम जी ने कृष्ण जी के रूप में जन्म लिया तब बाली ने उनसे बदला लेने के लिए एक शिकारी जरा का रूप धारण किया और कृष्ण जी से बदला लिया। इस प्रकार महाभारत युद्ध के बाद श्री कृष्ण की मृत्यु हुई और उन्होंने मनुष्य रूप से भगवान् का रूप पुनः धारण कर लिया। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे फेसबुक पर जरूर शेयर करें और इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।

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आखिर कैसे हुई थी भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु, आपको भी जानना चाहिए ये रोचक रहस्य

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कैसे हुआ? यह बात हम सभी लोग बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन भगवान कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई थी? उनके शरीर का दाह संस्कार (Cremation) किसने किया? इन सवालों के जवाब शायद आपको पता नहीं होंगे. इनके बारे में जानने के लिए सभी लोग उत्सुक हैं. तो आज हम आपको बताते हैं कि आखिर भगवान होते हुए भी श्रीकृष्ण की मृत्यु कैसे हो गई? पुराणों में मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ था. श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था, लेकिन उनका बचपन गोकुल, वृंदावन, नंदगांव, बरसाना और द्वारिका आदि जगहों पर बीता था. कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने 36 वर्षों तक द्वारिका पर राज किया. इसके बाद उन्होंने अपनी देह त्याग दी. मान्यता है कि उस समय उनकी आयु 125 वर्ष थी.भागवत पुराण में बताया गया है कि एक बार श्रीकृष्ण के पुत्र सांबा को एक शरारत सूझी. वो एक स्त्री का वेश धारण कर अपने दोस्तों के साथ ऋषि-मुनियों से मिलने गए. स्त्री के वेश में सांबा ने ऋषियों से कहा कि वो गर्भवती है. जब उन यदुवंश कुमारों ने इस प्रकार ऋषियों को धोखा देना चाहा तो ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने स्त्री बने सांबा को शाप दिया कि तुम एक ऐसे लोहे के तीर को जन्म दोगी, जो तुम्हारे कुल और साम्राज्य का विनाश कर देगा.ऋषियों के इस शाप सुनकर सांबा बहुत डर गए. उन्होंने तुरंत ये सारी घटना जाकर उग्रसेन को बताई, जिसके बाद उग्रसेन ने सांबा से कहा कि वे तीर का चूर्ण बनाकर प्रभास नदी में प्रवाहित कर दें, इस तरह उन्हें उस शाप से छुटकारा मिल जाएगा. इसके बाद सांबा ने ऐसा ही किया. साथ ही उग्रसेन ने ये भी आदेश पारित कर दिया कि यादव राज्य में किसी भी प्रकार की नशीली सामग्रियों का ना तो उत्पादन किया जाएगा और ना ही वितरण होगा. इस घटना के बाद द्वारका के लोगों ने कई अशुभ संकेतों का अनुभव किया, जिसमें सुदर्शन चक्र, श्रीकृष्ण का शंख, उनका रथ और बलराम के हल का अदृश्य हो जाना शामिल है. इसके अलावा वहां अपराधों और पापों में बढ़ोतरी होने लगी द्वारिका में चारों ओर अपराध और पाप का माहौल व्याप्त हो गया. ये देखकर श्रीकृष्ण बहुत दुखी हो गए और उन्होंने अपनी प्रजा से ये जगह छोड़कर प्रभास नदी के तट पर जाकर अपने पापों से मुक्ति पाने को कहा. उनकी बात को सबलोग मानकर प्रभास नदी के तट पर गए, लेकिन वहां जाकर सभी मदिरा के नशे में चूर हो गए और एक दूसरे से बहस करने लगे. इसके बाद उनकी बहस ने लड़ाई का रूप धारण कर लिया और वो आपस में ही लड़ने-मरने लगे. इस तरह आपस में ही लड़कर सभी लोग मारे गए. भागवत पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण एक दिन एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे, तभी जरा नामक एक बहेलिए ने श्रीकृष्ण को हिरण समझकर दूर से उनपर तीर चला लिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई. आपको बता दें कि ऋषि द्वारा कृष्ण के पुत्र सांब को दिए शाप के अनुसार, श्रीकृष्ण को लगे तीर में उसी लोहे के तीर का अंश था, जो सांबा के पेट से निकला था और जिसे उग्रसेन ने चूर्ण बनवाकर नदी में प्रवाहित करा दिया था. इस तरह ऋषि के शाप के अनुसार समस्त यदुवंशियों का नाश भी हो गया था और गांधारी के शाप के अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद श्रीकृष्ण के 36 वर्ष भी पूरे गए थे.

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कालीघाट काली मंदिर कोलकाता (समय, इतिहास, प्रवेश शुल्क, और सूचना)

 कालीघाट काली मंदिर कोलकाता समय दिन समय सोमवार सुबह 5:00 – दोपहर 2:00शाम 5:00 – रात 10:30 बजे मंगलवार सुबह 5:00 – दोपहर 2:00शाम 5:00 – रात 10:30 बजे बुधवार सुबह 5:00 – दोपहर 2:00शाम 5:00 – रात 10:30 बजे गुरुवार सुबह 5:00 – दोपहर 2:00शाम 5:00 – रात 10:30 बजे शुक्रवार सुबह 5:00 – दोपहर 2:00शाम 5:00 – रात 10:30 बजे शनिवार सुबह 5:00 – दोपहर 2:00शाम 5:00 – रात 10:30 बजे रविवार सुबह 5:00 – दोपहर 2:00शाम 5:00 – रात 10:30 बजे कालीघाट काली मंदिर कोलकाता का इतिहास वर्तमान मंदिर भवन 19वीं सदी में बना था और 200 साल पुराना है। हालाँकि, मंदिर का संदर्भ 15 वीं शताब्दी की मानसर भासन की रचना और कवि चंडी में भी पाया गया है जो 17 वीं शताब्दी के दौरान प्रकाशित हुआ था। लालमोहन विद्यानिधि के ‘संबंद निरनोय’ में कालीघाट काली मंदिर का एक और उल्लेख है। कहा जाता है कि मूल मंदिर एक छोटी झोपड़ी संरचना थी जिसे बाद में 16वीं शताब्दी के प्रारंभ में राजा मानसिंह द्वारा अधिकृत एक उचित मंदिर के रूप में परिवर्तित कर दिया गया था। बारिशा के सबरना रॉय चौधरी के परिवार के संरक्षण में यह था कि वर्तमान संरचना लगभग 1809 में पूरी हुई थी। यह प्रश्न कि क्या मंदिर प्राचीन काल का था, का उत्तर गुप्त साम्राज्य से संबंधित सिक्कों की उपस्थिति के बड़े विवरण और तथ्यात्मक प्रमाणों के साथ दिया गया है। सबसे लोकप्रिय धनुर्धारी सिक्के जो कुमारगुप्त प्रथम के बाद गुप्त शासन के दौरान प्रसिद्ध हुए, कालीघाट में पाए गए और इसलिए गुप्त वंश में भी मंदिर होने का प्रमाण मिलता है। माता कालिका के प्रसिद्ध तीन मंदिर, जहां जाने से खुलता है भक्तों का भाग्य पौराणिक कथाएं एक अनुश्रुति के अनुसार देवी किसी बात पर गुस्‍सा हो गई थीं। इसके बाद उन्‍होंने नरसंहार शुरू कर दिया। उनके मार्ग में जो भी आता‍ वह मारा जाता। उनके क्रोध को शांत करने के लिए भगवान शिव उनके रास्‍ते में लेट गए। देवी ने गुस्‍से में उनकी छाती पर भी पांव रख दिया। इसी दौरान उन्‍होंने शिव को पहचान लिया। इसके बाद ही उनका गुस्‍सा शांत हुआ और उन्‍होंने नरसंहार बंद कर दिया। कालीघाट काली मंदिर को भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में फैले 51 पीठों में से सबसे महत्वपूर्ण शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मंदिर के पीछे की पौराणिक कथा शिव के रुद्र तांडव से संबंधित है, जब वह अपने पिता के स्थान पर पूजा समारोह के लिए आमंत्रित नहीं किए जाने पर अपने पिता के साथ विवाद के बाद अपनी पत्नी सती के आत्मदाह से क्रोधित हो गए थे। ऐसा कहा जाता है कि तांडव करते समय शिव ने सती के जले हुए शरीर को उठाया और तभी देवी के शरीर के विभिन्न हिस्से पृथ्वी पर गिरे। कालीघाट में सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था और यहीं पर बाद में मंदिर का निर्माण हुआ और यहां की अधिष्ठात्री देवी को कालिका कहा जाता है, जिनके नाम पर इस शहर का नाम कोलकाता पड़ा। कालीघाट काली मंदिर से जुड़ी कई किंवदंतियों में से सबसे चर्चित आत्माराम नाम के ब्राह्मण की है, जिसे भागीरथी नदी में एक मानव पैर के आकार की पत्थर की संरचना मिली थी। ऐसा माना जाता है कि उन्हें प्रकाश की एक किरण द्वारा निर्देशित किया गया था जो नदी की दिशा से आ रही थी। ब्राह्मण ने उस शाम पत्थर के टुकड़े की प्रार्थना की और उसी रात एक सपना देखा जिसमें उसे सती के पैर की अंगुली के बारे में सूचित किया गया था जो नदी में गिर गई थी और जो पत्थर का टुकड़ा उसे मिला वह सती के दाहिने पैर के अलावा और कुछ नहीं था। उन्हें अपने सपनों में एक मंदिर स्थापित करने और नकुलेश्वर भैरव के स्वंभु लिंगम की खोज करने के लिए कहा गया, जो उन्होंने अंततः किया। आत्मा राम ने बाद में स्वंभु लिंगम और पैर के आकार के पत्थर दोनों की पूजा शुरू की। कालीघाट काली मंदिर कोलकाता के अंदर नटमंदिर नटमंदिर एक विशाल आयताकार बरामदा है जो केंद्रीय मंदिर की इमारत से सटा हुआ है। नटमंदिर को 1835 में जमींदार काशीनाथ रॉय द्वारा बनवाया गया था। जब कोई नटमंदिर पर चढ़ता है, तो वह देवी की छवि का चेहरा बहुत स्पष्ट रूप से देख सकता है। समय-समय पर ढांचे का नवीनीकरण होता रहता है। जोर बांग्ला जोर बांग्ला गर्भगृह के ठीक बाहर मुख्य मंदिर का मंच या बरामदा है। नटमंदिर के अलावा, इस मंच से गर्भगृह के अंदर के अनुष्ठानों को भी देखा जा सकता है। षष्ठी ताल सोस्ती ताल एक तीन फीट ऊंचा आयताकार मंच है जो तीन पत्थर की संरचनाओं के लिए एक वेदी बनाता है जो कि तीन देवी के रूप में प्रतिनिधित्व और पूजा की जाती है, सोस्ती, शीतला और मंगल चंडी, जिन्हें स्वयं देवी काली का एक हिस्सा माना जाता है। सोस्ती ताल वेदी का निर्माण 1880 में गोबिंद दास मोंडल द्वारा किया गया था। इस स्थान को ब्रह्मानंद गिरि की समाधि स्थल माना जाता है। कभी-कभी इस स्थान को सोस्ती ताल के स्थान पर मोनोशा ताल भी कहा जाता है। हरकत ताला हरकत ताल नटमंदिर के निकट दक्षिण की ओर स्थित है। इस स्थान का उपयोग मुख्य रूप से बाली या पशु बलि देने के लिए किया जाता है। पशु बलि देने के लिए दो लकड़ी के बाली-पीठ हैं। बड़े जानवर का उपयोग भैंस जैसे बड़े जानवरों की बलि देने के लिए किया जाता है, जबकि छोटे जानवरों जैसे बकरियों के लिए। एक ही झटके में जानवरों की बलि दी जाती है। राधा-कृष्ण मंदिर स्थानीय लोगों द्वारा शामो-रे मंदिर भी कहा जाता है, यह मंदिर मुख्य मंदिर के पश्चिम में मंदिर परिसर के अंदर स्थित है। राधा-कृष्णन का अलग मंदिर 1723 में मुर्शिदाबाद के एक बंदोबस्त अधिकारी द्वारा बनाया गया था। बाद में, 1843 के दौरान, उदय नारायण मोंडल नामक एक जमींदार द्वारा उसी स्थान पर एक नया मंदिर ढांचा (वर्तमान मंदिर संरचना) बनाया गया था। वर्तमान डोलमांको का निर्माण साहा नगर के मदन कोले ने वर्ष 1858 के दौरान किया था। एक जनादेश के रूप में, राधा-कृष्णन के लिए भोग तैयार करने की रसोई एक शुद्ध शाकाहारी रसोई है जिसे सामान्य रसोई से अलग रखा जाता है। कुंडुपुकुर दक्षिण पूर्व की ओर और मुख्य मंदिर की चारदीवारी के बाहर स्थित, किंदुपुकुर 7,200 वर्ग फुट के क्षेत्र में फैला एक पवित्र सरोवर है। ऐसा माना जाता है कि यह आकार में बहुत बड़ा

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माता कालिका के प्रसिद्ध तीन मंदिर, जहां जाने से खुलता है भक्तों का भाग्य

देवी कालिका यानी काली माता की पूजा करने से मनुष्य की आंतरिक शक्ति मजबूत होती है। साथ ही नकारात्मक शक्तियां, शत्रु प्रभाव और विपरीत परिस्थितियों का संकट भी दूर होता है। इसलिए देवी कालिका का दर्शन-पूजन किस्मत खोलने वाला माना गया है। मां कालिका देवी दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक मानी गई हैं। मां काली के चार रूप है- दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली। मान्यता है कि देवी कालिका का दर्शन यदि मनुष्य एक बार कर ले तो उनके दरबार में उस मनुष्य का नाम-पता दर्ज हो जाता है। देवी न्याय की देवी हैं और यदि मनुष्य ने कोई गलती की हो तो उस दंडित भी करती है और अपने भक्तों का कल्याण भी। तो आइए देवी कालिका के तीन प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में जानें, जहां दर्शन करने मात्र से मनुष्य के भाग्य खुल जाते हैं। 1. दक्षिणेश्वर काली मंदिर कोलकाता में देवी मां कालिका का विश्व अति प्राचीन प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर को दक्षिणेश्वर काली मंदिर के नाम से जाना जाता है। ये कोलकाता के उत्तर में विवेकानंद पुल के पास स्थित है। इस जगह को कालीघाट के नाम से जानते हैं। ये जागृत देवी स्थान है और 52 शक्तिपीठों में शामिल है। यहां देवी सती की दाहिने पैर की चार अंगुलियां गिरी थी। इस मंदिर का निर्माण 1847 में जान बाजार की महारानी रासमणि ने कराया था। 25 एकड़ क्षेत्र में फैले इस मंदिर का निर्माण कार्य सन् 1855 में पूरा हुआ था। 2. गढ़ कालिका मंदिर उज्जैन के कालीघाट स्थित कालिका देवी का ये प्राचीन मंदिर गढ़ कालिका के नाम से जाना जाता है। गढ़ कालिका के मंदिर में देवी का दर्शन करने मात्र से कई चमत्कारिक लाभ मिलते हैं। यहां देवी की पूजा ज्यादातर तांत्रिक करते हैं। इस मंदिर की प्राचीनता के विषय में बहुत जानकारी नहीं मिलती, लेकिन लोगों की मान्यता है कि ये मंदिर महाभारत काल का है, लेकिन देवी की प्रतिमा सतयुग की है। इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन ने कराया था। बाद में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया। हालांकि ये मंदिर भले ही शक्तिपीठ में शामिल नहीं, लेकिन इस मंदिर में मां हरसिद्धि ‍शक्तिपीठ होने के कारण इस क्षेत्र का महत्व है। पुराणों में उल्लेख है कि उज्जैन में ‍शिप्रा नदी के तट के पास स्थित भैरव पर्वत पर मां भगवती सती के होंठ गिरे थे। 3. पावागढ़ महाकाली शक्तिपीठ गुजरात की पहाड़ी पर स्थित देवी महाकाली का मंदिर है। इसे पावागढ़ मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह प्रसिद्ध मंदिर मां के शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि पावागढ़ में देवी सती का वक्षस्थल गिरा था। यहां देवी का जागृत दरबार लगता है और यहां देवी की सेविकाएं ही कार्य करती हैं। मान्यता है कि गुरु विश्वामित्र ने यहां काली मां की तपस्या की थी। यह मंदिर गुजरात चंपारण्य के पास स्थित है, जो वडोदरा शहर से लगभग 50 किलोमीटर दूर है। देवी कालिका के ये तीन मंदिर अपनी आस्था और दैवीय चमत्कारों के लिए जाने जाते हैं।हालांकि, देवी कालिका का गोवा के नार्थ गोवा में महामाया, कर्नाटक के बेलगाम में, पंजाब के चंडीगढ़ में और कश्मीर में स्थित मंदिर की भी प्रसिद्ध बहुत है।

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कब, क्यों और कैसे डूबी द्वारका

श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात समुद्र में डूब जाती है। द्वारिका के समुद्र में डूबने से पूर्व श्री कृष्ण सहित सारे यदुवंशी भी मारे जाते है।  समस्त यदुवंशियों के मारे जाने और द्वारिका के समुद्र में विलीन होने के पीछे मुख्य रूप से दो घटनाएं जिम्मेदार है।  एक माता गांधारी द्वारा श्री कृष्ण को दिया गया श्राप और दूसरा ऋषियों द्वारा श्री कृष्ण पुत्र सांब को दिया गया श्राप।  आइए इस घटना पर विस्तार से जानते है। गांधारी ने दिया था यदुवंश के नाश का श्राप  महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा। ऋषियों ने दिया था सांब को श्राप महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो तरह-तरह के अपशकुन होने लगे। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व, देवर्षि नारद आदि द्वारका गए। वहां यादव कुल के कुछ नवयुवकों ने उनके साथ परिहास (मजाक) करने का सोचा। वे श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेष में ऋषियों के पास ले गए और कहा कि ये स्त्री गर्भवती है। इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा? ऋषियों ने जब देखा कि ये युवक हमारा अपमान कर रहे हैं तो क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि- श्रीकृष्ण का यह पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा तुम जैसे क्रूर और क्रोधी लोग अपने समस्त कुल का संहार करोगे। उस मूसल के प्रभाव से केवल श्रीकृष्ण व बलराम ही बच पाएंगे। श्रीकृष्ण को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ये बात अवश्य सत्य होगी। मुनियों के श्राप के प्रभाव से दूसरे दिन ही सांब ने मूसल उत्पन्न किया। जब यह बात राजा उग्रसेन को पता चली तो उन्होंने उस मूसल को चुरा कर समुद्र में डलवा दिया। इसके बाद राजा उग्रसेन व श्रीकृष्ण ने नगर में घोषणा करवा दी कि आज से कोई भी वृष्णि व अंधकवंशी अपने घर में मदिरा तैयार नहीं करेगा। जो भी व्यक्ति छिपकर मदिरा तैयार करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। घोषणा सुनकर द्वारका वासियों ने मदिरा नहीं बनाने का निश्चय किया।द्वारका में होने लगे थे भयंकर अपशकुन इसके बाद द्वारका में भयंकर अपशकुन होने लगे। प्रतिदिन आंधी चलने लगी। चूहे इतने बढ़ गए कि मार्गों पर मनुष्यों से ज्यादा दिखाई देने लगे। वे रात में सोए हुए मनुष्यों के बाल और नाखून कुतरकर खा जाया करते थे। सारस उल्लुओं की और बकरे गीदड़ों की आवाज निकालने लगे। गायों के पेट से गधे, कुत्तियों से बिलाव और नेवलियों के गर्भ से चूहे पैदा होने लगे। उस समय यदुवंशियों को पाप करते शर्म नहीं आती थी। अंधकवंशियों के हाथों मारे गए थे प्रद्युम्न जब श्रीकृष्ण ने नगर में होते इन अपशकुनों को देखा तो उन्होंने सोचा कि कौरवों की माता गांधारी का श्राप सत्य होने का समय आ गया है। इन अपशकुनों को देखकर तथा पक्ष के तेरहवें दिन अमावस्या का संयोग जानकर श्रीकृष्ण काल की अवस्था पर विचार करने लगे। उन्होंने देखा कि इस समय वैसा ही योग बन रहा है जैसा महाभारत के युद्ध के समय बना था। गांधारी के श्राप को सत्य करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने यदुवंशियों को तीर्थयात्रा करने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण की आज्ञा से सभी राजवंशी समुद्र के तट पर प्रभास तीर्थ आकर निवास करने लगे। प्रभास तीर्थ में रहते हुए एक दिन जब अंधक व वृष्णि वंशी आपस में बात कर रहे थे। तभी सात्यकि ने आवेश में आकर कृतवर्मा का उपहास और अनादर कर दिया। कृतवर्मा ने भी कुछ ऐसे शब्द कहे कि सात्यकि को क्रोध आ गया और उसने कृतवर्मा का वध कर दिया। यह देख अंधकवंशियों ने सात्यकि को घेर लिया और हमला कर दिया। सात्यकि को अकेला देख श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उसे बचाने दौड़े। सात्यकि और प्रद्युम्न अकेले ही अंधकवंशियों से भिड़ गए। परंतु संख्या में अधिक होने के कारण वे अंधकवंशियों को पराजित नहीं कर पाए और अंत में उनके हाथों मारे गए। यदुवंशियों के नाश के बाद अर्जुन को बुलवाया था श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र और सात्यकि की मृत्यु से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने एक मुट्ठी एरका घास उखाड़ ली। हाथ में आते ही वह घास वज्र के समान भयंकर लोहे का मूसल बन गई। उस मूसल से श्रीकृष्ण सभी का वध करने लगे। जो कोई भी वह घास उखाड़ता वह भयंकर मूसल में बदल जाती (ऐसा ऋषियों के श्राप के कारण हुआ था)। उन मूसलों के एक ही प्रहार से प्राण निकल जाते थे। उस समय काल के प्रभाव से अंधक, भोज, शिनि और वृष्णि वंश के वीर मूसलों से एक-दूसरे का वध करने लगे। यदुवंशी भी आपस में लड़ते हुए मरने लगे। श्रीकृष्ण के देखते ही देखते सांब, चारुदेष्ण, अनिरुद्ध और गद की मृत्यु हो गई। फिर तो श्रीकृष्ण और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने शेष बचे सभी वीरों का संहार कर डाला। अंत में केवल दारुक (श्रीकृष्ण के सारथी) ही शेष बचे थे। श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा कि तुम तुरंत हस्तिनापुर जाओ और अर्जुन को पूरी घटना बता कर द्वारका ले आओ। दारुक ने ऐसा ही किया। इसके बाद श्रीकृष्ण बलराम को उसी स्थान पर रहने का कहकर द्वारका लौट आए। बलरामजी के स्वधाम गमन के बाद ये किया श्रीकृष्ण ने द्वारका आकर श्रीकृष्ण ने पूरी घटना अपने पिता वसुदेवजी को बता दी। यदुवंशियों के संहार की बात जान कर उन्हें भी बहुत दुख हुआ। श्रीकृष्ण ने वसुदेवजी से कहा कि आप अर्जुन के आने तक स्त्रियों की रक्षा करें। इस समय बलरामजी वन में मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनसे मिलने जा रहा हूं। जब श्रीकृष्ण ने नगर में स्त्रियों का विलाप सुना तो उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि शीघ्र ही अर्जुन द्वारका आने वाले हैं। वे ही तुम्हारी रक्षा करेंगे। ये कहकर श्रीकृष्ण बलराम से मिलने चल पड़े। वन में जाकर श्रीकृष्ण ने देखा कि बलरामजी समाधि में लीन हैं। देखते ही देखते उनके मुख से सफेद रंग का बहुत बड़ा सांप निकला और समुद्र की ओर चला गया। उस सांप के हजारों

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परशुराम जयंती जानिए कुछ रोचक बातें

 हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान परशुराम की जयंती मनाई जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु के आवेशावतार परशुराम का जन्म हुआ था। परशुराम जयंती के अवसर पर आज हम आपको भगवान परशुराम से संबंधित कुछ रोचक बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार है 1. अपने शिष्य भीष्म को नहीं कर सके पराजित महाभारत के अनुसार महाराज शांतनु के पुत्र भीष्म ने भगवान परशुराम से ही अस्त्र-शस्त्र की विद्या प्राप्त की थी। एक बार भीष्म काशी में हो रहे स्वयंवर से काशीराज की पुत्रियों अंबा, अंबिका और बालिका को अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के लिए उठा लाए थे। तब अंबा ने भीष्म को बताया कि वह मन ही मन किसी और का अपना पति मान चुकी है तब भीष्म ने उसे ससम्मान छोड़ दिया, लेकिन हरण कर लिए जाने पर उसने अंबा को अस्वीकार कर दिया।तब अंबा भीष्म के गुरु परशुराम के पास पहुंची और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। अंबा की बात सुनकर भगवान परशुराम ने भीष्म को उससे विवाह करने के लिए कहा, लेकिन ब्रह्मचारी होने के कारण भीष्म ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। तब परशुराम और भीष्म में भीषण युद्ध हुआ और अंत में अपने पितरों की बात मानकर भगवान परशुराम ने अपने अस्त्र रख दिए। इस प्रकार इस युद्ध में न किसी की हार हुई न किसी की जीत। 2. ऐसे हुआ भगवान परशुराम का जन्म महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना।किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा।तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था। 3. किया श्रीकृष्ण के प्रस्ताव का समर्थन महाभारत के युद्ध से पहले जब भगवान श्रीकृष्ण संधि का प्रस्ताव लेकर धृतराष्ट्र के पास गए थे, उस समय श्रीकृष्ण की बात सुनने के लिए भगवान परशुराम भी उस सभा में उपस्थित थे। परशुराम ने भी धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण की बात मान लेने के लिए कहा था। 4. नहीं हुआ था श्रीराम से कोई विवाद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम भी वहां आ गए। अपने आराध्य शिव का धनुष टूटा हुआ देखकर वे बहुत क्रोधित हुए और वहां उनका श्रीराम व लक्ष्मण से विवाद भी हुआ।जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे। तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम ने बाण धनुष पर चढ़ा कर छोड़ दिया। यह देखकर परशुराम को भगवान श्रीराम के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया और वे वहां से चले गए। 5. क्यों किया माता का वध? एक बार परशुराम की माता रेणुका स्नान करके आश्रम लौट रही थीं। तब संयोग से राजा चित्ररथ भी वहां जलविहार कर रहे थे। राजा को देखकर रेणुका के मन में विकार उत्पन्न हो गया। उसी अवस्था में वह आश्रम पहुंच गई। जमदग्रि ने रेणुका को देखकर उसके मन की बात जान ली और अपने पुत्रों से माता का वध करने को कहा। किंतु मोहवश किसी ने उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया। तब परशुराम ने बिना सोचे-समझे अपने फरसे से उनका सिर काट डाला। ये देखकर मुनि जमदग्रि प्रसन्न हुए और उन्होंने परशुराम से वरदान मांगने को कहा। तब परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने और उन्हें इस बात का ज्ञान न रहे ये वरदान मांगा। इस वरदान के फलस्वरूप उनकी माता पुनर्जीवित हो गईं।

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मासिक कालाष्टमी व्रत 2023

महत्वपूर्ण जानकारी आषाढ़, कृष्ण अष्टमी, जून 2023 शनिवार, 10 जून 2023 अष्टमी तिथि प्रारंभ : 10 जून 2023 को दोपहर 2 बजकर 02 मिनट पर अष्टमी तिथि समाप्त : 11 जून 2023 को दोपहर 12 बजकर 06 मिनट पर कालाष्टमी व्रत भगवान भैरव के भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है। यह व्रत प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान भैरव के भक्त पूरे दिन उपवास रखते है और वर्ष में सभी कालाष्टमी के दिन उनकी पूजा करते हैं। कालाष्टमी, जिसे काला अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण कालाष्टमी, जिसे कालभैरव जयंती के रूप में जाना जाता है। यह माना जाता है कि भगवान शिव उसी दिन भैरव के रूप में प्रकट हुए थे। कालभैरव जयंती को भैरव अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कालाष्टमी व्रत सप्तमी तीथ पर मनाया जा सकता है। धार्मिक पाठ के अनुसार व्रतराज कालाष्टमी का व्रत उस दिन मनाया जाना चाहिए जब अष्टमी तिथि रात्रि के समय रहती है। कालाष्टमी व्रत तिथि 2023 इस प्रकार है :- कालाष्टमी व्रत दिनांक 2023 इस प्रकार है:- कालाष्टमी व्रत जनवरी में शनिवार, 14 जनवरी 2023माघ, कृष्ण अष्टमी14 जनवरी 2023 शाम 7:23 बजे – 15 जनवरी 2023 शाम 7:45 बजे कालाष्टमी व्रत फरवरी में सोमवार, 13 फरवरी 2023फाल्गुन, कृष्ण अष्टमी13 फरवरी 2023 सुबह 9:46 बजे – 14 फरवरी 2023 सुबह 9:04 बजे मार्च में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 14 मार्च 2023चैत्र, कृष्ण अष्टमी14 मार्च 2023 को रात 8:22 बजे – 15 मार्च 2023 को शाम 6:46 बजे कालाष्टमी व्रत अप्रैल में गुरुवार, 13 अप्रैल 2023वैशाख, कृष्ण अष्टमी13 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 3:44 – 14 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 1:34 बजे मई में कालाष्टमी व्रत शुक्रवार, 12 मई 2023ज्येष्ठ, कृष्ण अष्टमी12 मई 2023 सुबह 9:07 बजे – 13 मई 2023 सुबह 6:51 बजे जून में कालाष्टमी व्रत शनिवार, 10 जून 2023आषाढ़, कृष्ण अष्टमी10 जून 2023 दोपहर 2:02 बजे – 11 जून 2023 दोपहर 12:06 बजे कालाष्टमी व्रत जुलाई में रविवार, 09 जुलाई 2023श्रवण, कृष्ण अष्टमी09 जुलाई 2023 रात 8:00 बजे – 10 जुलाई 2023 शाम 6:44 बजे अगस्त में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 08 अगस्त 2023श्रवण, कृष्ण अष्टमी08 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 4:14 बजे – 09 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 3:52 बजे कालाष्टमी व्रत सितंबर में बुधवार, 06 सितंबर 2023भाद्रपद, कृष्ण अष्टमी06 सितंबर 2023 अपराह्न 3:38 बजे – 07 सितंबर 2023 अपराह्न 4:14 बजे कालाष्टमी व्रत अक्टूबर में शुक्रवार, 06 अक्टूबर 2023अश्विना, कृष्ण अष्टमी06 अक्टूबर 2023 सुबह 6:35 बजे – 07 अक्टूबर 2023 सुबह 8:08 बजे कालाष्टमी व्रत नवंबर में रविवार, 16 नवंबर 2023कार्तिका, कृष्ण अष्टमी05 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 1:00 बजे – 06 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 3:18 बजे दिसंबर में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 05 दिसंबर 2023मार्गशीर्ष, कृष्ण अष्टमी04 दिसंबर 2023 रात 10:00 बजे – 06 दिसंबर 2023 पूर्वाह्न 12:37 बजे

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शनि त्रयोदशी व्रत कथा, पूजा विधि

जब त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन आती है तो वो शनि त्रयोदशी या शनि प्रदोष कहलाती है। सभी त्रयोदशी तिथि में शनि त्रयोदशी त्रयोदशी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। शनि त्रयोदशी का व्रत संतान प्राप्ति के लिए किया जाता है। साथ ही इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शनि त्रयोदशी व्रत कथा प्राचीन समय की बात है। एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था। वह अत्यन्त दयालु था। उसके यहां से कभी कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को जी भरकर दान-दक्षिणा देता था। लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्‍नी स्वयं काफी दुखी थे। दुःख का कारण था- उनके सन्तान का न होना। सन्तानहीनता के कारण दोनों घुले जा रहे थे। एक दिन उन्होंने तीर्थयात्र पर जाने का निश्‍चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सोंप चल पडे। अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति-पत्‍नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की समाधि नही टूटी। मगर सेठ पति-पत्‍नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे। अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे । सेठ पति-पत्‍नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले- ‘मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूं वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं।’ साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि त्रयोदशी व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई हे रुद्रदेव शिव नमस्कार । शिव शंकर जगगुरु नमस्कार ॥हे नीलकंठ सुर नमस्कार । शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार ॥हे उमाकान्त सुधि नमस्कार । उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥ईशान ईश प्रभु नमस्कार । विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार ॥ तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि त्रयोदशी व्रत करने लगे । कालान्तर में सेठ की पत्‍नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया । शनि त्रयोदशी व्रत के प्रभाव से उनके यहां छाया अन्धकार लुप्त हो गया । दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे। शनि त्रयोदशी व्रत विधि शनि त्रयोदशी व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिये। पूरे दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सुर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करना चाहिये। शनि प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है। व्रती को चाहिये की शाम को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें । पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें। यदि व्रती चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। “ऊँ नम: शिवाय ” कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिव जी का ध्यान करें। ध्यान का स्वरूप- करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगलवर्ण के जटाजूटधारी, नीले कण्ठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुण्डल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किये हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान शिव जी हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख समृद्धि प्रदान करें। ध्यान के बाद, शनि त्रयोदशी व्रत की कथा सुने अथवा सुनायें। कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार “ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा ” मंत्र से आहुति दें । उसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें। सभी को प्रसाद वितरित करें । उसके बाद भोजन करें । भोजन में केवल मीठी सामग्रियों का उपयोग करें।

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शुक्र प्रदोष (भुगुवारा प्रदोष) व्रत कथा, पूजा विधि

जो प्रदोष व्रत शुक्रवार के दिन पड़ता है वो शुक्र प्रदोष या भुगुवारा प्रदोष व्रत कहलाता है। इस व्रत को करने से जीवन से नकारात्मकता समाप्त होती है और सफलता मिलती है। शुक्र प्रदोष व्रत कथा प्राचीनकाल की बात है, एक नगर में तीन मित्र रहते थे – एक राजकुमार, दूसरा ब्राह्मण कुमार और तीसरा धनिक पुत्र। राजकुमार व ब्राह्मण कुमार का विवाह हो चुका था। धनिक पुत्र का भी विवाह हो गया था, किन्तु गौना शेष था। एक दिन तीनों मित्र स्त्रियों की चर्चा कर रहे थे। ब्राह्मण कुमार ने स्त्रियों की प्रशंसा करते हुए कहा- ‘नारीहीन घर भूतों का डेरा होता है।’ धनिक पुत्र ने यह सुना तो तुरन्त ही अपनी पत्‍नी को लाने का निश्‍चय किया। माता-पिता ने उसे समझाया कि अभी शुक्र देवता डूबे हुए हैं। ऐसे में बहू-बेटियों को उनके घर से विदा करवा लाना शुभ नहीं होता। किन्तु धनिक पुत्र नहीं माना और ससुराल जा पहुंचा। ससुराल में भी उसे रोकने की बहुत कोशिश की गई, मगर उसने जिद नहीं छोड़ी। माता-पिता को विवश होकर अपनी कन्या की विदाई करनी पड़ी। ससुराल से विदा हो पति-पत्‍नी नगर से बाहर निकले ही थे कि उनकी बैलगाड़ी का पहिया अलग हो गया और एक बैल की टांग टूट गई। दोनों को काफी चोटें आईं फिर भी वे आगे बढ़ते रहे। कुछ दूर जाने पर उनकी भेंट डाकुओं से हो गई। डाकू धन-धान्य लूट ले गए। दोनों रोते-पीटते घर पहूंचे। वहां धनिक पुत्र को सांप ने डस लिया। उसके पिता ने वैद्य को बुलवाया। वैद्य ने निरीक्षण के बाद घोषणा की कि धनिक पुत्र तीन दिन में मर जाएगा। जब ब्राह्मण कुमार को यह समाचार मिला तो वह तुरन्त आया। उसने माता-पिता को शुक्र प्रदोष व्रत करने का परामर्ष दिया और कहा- ‘इसे पत्‍नी सहित वापस ससुराल भेज दें। यह सारी बाधाएं इसलिए आई हैं क्योंकि आपका पुत्र शुक्रास्त में पत्‍नी को विदा करा लाया है। यदि यह वहां पहुंच जाएगा तो बच जाएगा।’ धनिक को ब्राह्मण कुमार की बात ठीक लगी। उसने वैसा ही किया। ससुराल पहुंचते ही धनिक कुमार की हालत ठीक होती चली गई। शुक्र प्रदोष के माहात्म्य से सभी घोर कष्ट टल गए। शुक्र प्रदोष व्रत विधि  शुक्र प्रदोष व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिये। पूरे दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सुर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करना चाहिये। शुक्र प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है। व्रती को चाहिये की शाम को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें । पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें। यदि व्रती चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। “ऊँ नम: शिवाय ” कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिव जी का ध्यान करें। ध्यान का स्वरूप- करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगलवर्ण के जटाजूटधारी, नीले कण्ठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुण्डल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किये हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान शिव जी हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख समृद्धि प्रदान करें। ध्यान के बाद, शुक्र प्रदोष व्रत की कथा सुने अथवा सुनायें। कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार “ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा ” मंत्र से आहुति दें । उसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें। सभी को प्रसाद वितरित करें । उसके बाद भोजन करें । भोजन में केवल मीठी सामग्रियों का उपयोग करें। शुक्र प्रदोष व्रत उद्यापन विधि स्कंद पुराणके अनुसार व्रती को कम-से-कम 11 अथवा 26 त्रयोदशी व्रत के बाद उद्यापन करना चाहिये। उद्यापन के एक दिन पहले( यानी द्वादशी तिथि को) श्री गणेश भगवान का विधिवत षोडशोपचार विधि से पूजन करें तथा पूरी रात शिव-पार्वती और श्री गणेश जी के भजनों के साथ जागरण करें। उद्यापन के दिन प्रात:काल उठकर नित्य क्रमों से निवृत हो जायें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा गृह को शुद्ध कर लें। पूजा स्थल पर रंगीन वस्त्रों और रंगोली से मंडप बनायें। मण्डप में एक चौकी अथवा पटरे पर शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें। अब शिव-पार्वती की विधि-विधान से पूजा करें। भोग लगायें। शुक्र प्रदोष व्रत की कथा सुने अथवा सुनायें। अब हवन के लिये सवा किलो (1.25 किलोग्राम) आम की लकड़ी को हवन कुंड में सजायें। हवन के लिये गाय के दूध में खीर बनायें। हवन कुंड का पूजन करें । दोनों हाथ जोड़कर हवन कुण्ड को प्रणाम करें। अब अग्नि प्रज्वलित करें। तदंतर शिव-पार्वती के उद्देश्य से खीर से ‘ऊँ उमा सहित शिवाय नम:’ मंत्र का उच्चारण करते हुए 108 बार आहुति दें। हवन पूर्ण होने के पश्चात् शिव जी की आरती करें । ब्राह्मणों को सामर्थ्यानुसार दान दें एवं भोजन करायें। आप अपने इच्छानुसार एक या दो या पाँच ब्राह्मणों को भोजन एवं दान करा सकते हैं। यदि भोजन कराना सम्भव ना हो तो किसी मंदिर में यथाशक्ति दान करें। इसके बाद बंधु बांधवों सहित प्रसाद ग्रहण करें एवं भोजन करें। इस प्रकार उद्यापन करने से व्रती पुत्र-पौत्रादि से युक्त होता है तथा आरोग्य लाभ होता है। इसके अतिरिक्त वह अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है एवं सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर शिवधाम को पाता है।

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मां दुर्गा के इन 8 मंदिरों में आप भी दर्शन करने पहुंचें

देवी दुर्गा भारत में हिन्दू धर्म के सबसे पूजनीय देवी में से एक हैं। मां दुर्गा को भारत में कष्ट हरणी, पाप नाशनी आदि कई शक्ति के नाम से जाना जाता है। इस साल नवरात्रि 26 सितंबर से लेकर 4 अक्टूबर तक है और 5 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा।  नवरात्रि के पावन दिनों में भक्त भी मां दुर्गा के दर्शन करने के लिए फेमस और पवित्र मंदिरों में जाते रहते हैं। ऐसे में अगर आप भी नवरात्रि में माता का दर्शन करना चाहते हैं तो इन पवित्र मंदिरों में जा सकते हैं। आइए जानते हैं। 1.वैष्णो देवी मंदिर 2.मनसा देवी 3.नैना देवी 4.कामाख्या देवी मंदिर 5.चामुंडा देवी मंदिर 6.करणी माता मंदिर 7.मां ब्रह्मचारिणी मंदिर 8.अम्बा मंदिर 1. वैष्णो देवी मंदिर समुद्र तल से लगभग 15 हज़ार से भी अधिक मीटर की ऊंचाई पर त्रिकुट पहाड़ियों में स्थित वैष्णो देवी मां दुर्गा का पवित्र स्थान है। मान्यताओं के अनुसार जो भी वैष्णो देवी का दर्शन करता है तो उनकी सभी मुरादे पूरी हो जाती हैं। नवरात्रि में यहां लाखों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 2.मनसा देवी कहा जाता है कि उत्तराखंड में स्थित मनसा देवी का नाम इस विश्वास से पड़ा कि देवी अपने भक्तों की सभी मुरादे पूरी कर देती हैं। यह मंदिर इस कदर पवित्र है कि उत्तराखंड के लगभग हर शहर से मां का दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि में यहां हर दिन कार्यक्रम का आयोजन होता है। तुलसी और विष्णु की कहानी  3. नैना देवी उत्तराखंड के नैनीताल में नैनी झील के किनारे स्थित नैना देवी मंदिर भारत के लगभग हर शहर, जिला और कस्बों में फेमस है। इस मंदिर को भारत में स्थित 51 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर देवी सती की आंखों के लिए समर्पित है। कहा जाता है कि मंदिर उसी जगह बना है जहां देवी सती की नज़र पृथ्वी पर गिरी थी। 4. कामाख्या देवी मंदिर असम की राजधानी गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ी के मध्य में स्थित कामाख्या देवी मंदिर एक विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। कामाख्या मंदिर देवी दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस पवित्र मंदिर का जिक्र पौराणिक कथाओं में भी है। नवरात्रि में यहां हर रोज हजारों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 5. चामुंडा देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश में स्थित चामुंडा देवी का मंदिर प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में से एक है। चामुंडा देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां स्थापित देवी को दुर्गा मां के सबसे शक्तिशाली अवतारों में एक माना जाता है। कहा जाता है कि मंदिर के अंदर एक तलब है जिसमें डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं। 6. करणी माता मंदिर भारत के पवित्र दुर्गा मंदिरों में से एक करणी माता राजस्थान के बीकानेर शहर में मौजूद है। यह मंदिर दुर्गा के अवतारों में से एक करणी माता को समर्पित है। इस मंदिर की अनूठी विशेषता चूहों की आबादी हैं जो मंदिर के अंदर निवास करते हैं।   7. मां ब्रह्मचारिणी मंदिर उत्तर प्रदेश के काशी में स्थित मां ब्रह्मचारिणी का मंदिर भी एक प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर है। गंगा किनारे स्थित इस मंदिर में नवरात्र के दिनों में भक्तों की लाइन लगी रहती हैं। कहा जाता है कि जो भी सच्चे मन से मां के दरबार में पहुंचते हैं उसकी सभी मुरादे पूरी हो जाती हैं। 8. अम्बा मंदिर गुजरात के जूनागढ़ में स्थित अंबा मंदिर देवी 51 शक्ति पीठो में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार अगर नवविवाहित जोड़े दर्शन करते हैं तो उनकी सभी मुराद पूरी हो जाती है। नवरात्र के दिनों में यहां देश के हर कोने से लोग पहुंचते हैं।

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