May 2023

तुलसी और विष्णु की कहानी

सावर्णि मुनि की पुत्री तुलसी अपूर्व सुंदरी थी। उनकी इच्छा थी कि उनका विवाह भगवान नारायण के साथ हो। इसके लिए उन्होंने नारायण पर्वत की घाटी में स्थित बदरीवन में घोर तपस्या की। दीर्घ काल तक तपस्या के उपरांत ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर दर्शन दिया और वर मांगने को कहा। तुलसी ने कहा- “सृष्टिकर्ता ब्रह्मदेव ! आप अन्तर्यामी है। सबके मन की बात जानते है, फिर भी मैं अपनी इच्छा बताती हूं। मैं चाहती हूं कि भगवान श्री नारायण मुझे पति रूप में मिले।” ब्रह्मा ने कहा-“तुम्हारा अभीष्ट तुम्हें अवश्य मिलेगा। अपने पूर्व जन्म में किसी अपराध के कारण तुम्हें शाप मिला है। इसी प्रकार भगवान श्री नारायण के एक पार्षद को भी दानव-कुल में जन्म लेने का शाप मिला है। दानव कुल में जन्म ने के बाद भी उसमे नारायण का अंश विद्यमान रहेगा। इसलिए इस जन्म में पूर्व जन्म के पाप के शमन के लिए सम्पूर्ण नारायण तो नहीं, नारायण के अंश से युक्त दानव-कुल जन्मे उस शापग्रस्त पार्षद से तुम्हारा विवाह होगा। शाप-मुक्त होने पर भगवान श्री नारायण सदा सर्वदा के लिए तुम्हारे पति हो जायेंगे।” तुलसी ने ब्रह्मा के इस वर को स्वीकार किया, क्योंकि मानव-कुल में जन्म के कारण उसे मायावी भोग तो भोगना ही था। तुलसी बदरीवन में ही रहने लगी। नारायण का वह पार्षद दानव कुल में शंखचूड़ के नाम से पैदा हुआ था। कुछ दिनों के बाद वह भ्रमण करता हुआ बदरीवन में आया। यहां तुलसी को देखते ही वह उस पर मुग्ध हो गया। तुलसी के सामने उसने अपने साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। इतने में ही वहां ब्रह्मा जी आ गए और तुलसी से कहा-“तुलसी ! शंखचूड़ को देखो, कैसा देवोपम इसका स्वरूप है। दानव कुल में जन्म लेने के बाद भी लगता है जैसे इसके शरीर में नारायण का वास हो। तुम प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लो।” तुलसी को भी लगा कि उसकी तपस्या पूर्ण हुई। उसे इच्छित फल मिला है। शंखचूड़ के साथ उसका गांधर्व-विवाह हो गया और वह शंखचूड़ के साथ उसके महल में पत्नी बनकर आ गई। शंखचूड़ ने अपनी परम सुंदरी सती साध्वी पत्नी तुलसी के साथ बहुत दिनों तक राज्य किया। उसने अपने राज्य का इतना विस्तार किया कि देवलोक तक उसके अधिकार में आ गया। स्वर्ग का सुख भोगने वाले देवताओं की दशा भिखारियों जैसे हो गई। शंखचूड़ किसी को कष्ट नहीं देता था, पर अधिकार और राज्य छिन जाने से सारे देवता मिलकर ब्रह्मा,विष्णु और शिव की सभा में गए तथा अपनी विपत्ति सुनाई। ब्रह्मा जी ने कहा-“तुलसी परम साध्वी है। उसका विवाह शंखचूड़ से मैंने ही कराया था। शंखचूड़ को तब तक नहीं हराया या मारा जा सकता है जब तक तुलसी को न छला जाए।” विष्णु ने कहा -“शंखचूड़ पूर्व जन्म में मेरा पार्षद था। शाप के कारण उसे दैत्यकुल में जन्म लेना पड़ा। इस जन्म में भी मेरा अंश उसमे व्याप्त है। साथ ही तुलसी के पतिव्रत-धर्म से वह अजेय है।” फिर देवताओं की सहमति से भगवान शिव ने शंखचूड़ के पास सन्देश भेजा कि या तो वह देवताओं का राज्य लौटा दे, या फिर उनसे युद्ध करे। शंखचूड़ शंकर के पास पहुंचा। उसने कहा-“देवाधिदेव ! आपके लिए देवताओं का पक्ष लेना उचित नहीं है। राज्य बढ़ाना हर राजा का कर्तव्य है। मैं किसी को दुखी नहीं कर रहा हूं। देवताओं से कहिए वे मेरी प्रजा होकर रहे। मैंने आपका भी कोई अपकार नहीं किया है। हमारा आपका युद्ध शोभा नहीं देता। अगर आप हार गए तो बड़ी लज्जा की बात होगी। मैं हार गया तो आपकी कीर्ति बहुत अधिक नहीं बढ़ेगी।” भगवान शंकर हंसे। वे तो सब रहस्य समझते थे। तुलसी और शंखचूड़ के पूर्व-जन्म के शाप की अवधि लगभग पूरी हो चुकी थी। बोले- “इसमें कीर्ति और लज्जा की बात नहीं। तुम देवों का राज्य लौटाकर उन्हें उनके पद पर प्रतिष्ठित होने दो। युद्ध से बचने का यही एक उपाय है। ” शंखचूड़ ने कहा-“मैंने युद्ध के बल से देवलोक जीता है। कोई उसे युद्ध के द्वारा ही वापस ले सकता है। यह मेरा अंतिम उत्तर है। मैं जा रहा हूं।” ऐसा कहकर शंखचूड़ चला गया। उसने अपनी पत्नी तुलसी को सारी बात बताई और कहा-“कर्म-भोग सब काल-सूत्र में बंधा है। जीवन में हर्ष, शोक, भय, सुख-दुःख, मंगल-अमंगल काल के अधीन है। हम तो केवल निमित्त है। सम्भव है, भगवान शिव देवों का पक्ष लेकर मुझसे युद्ध करे। तुम चिंता मत करना। तुम्हारा सती तेज मेरी रक्षा करेगा।” दूसरे दिन भगवान शंकर के नेतृत्व में देवताओं ने युद्ध छेड़ दिया। शंखचूड़ ने भीषण वाणों की वर्षा कर उनका वेग रोका। उसके प्रहार से देवता डगमगाने लगे। उसने दानवी शक्ति का प्रयोग कर मायावी युद्ध आरम्भ किया। युद्ध स्थल पर वह किसी को दिखाई नहीं देता था, पर उसके अस्त्र-शस्त्र प्रहार कर देवों को घायल कर रहे थे। देवगण अपने अस्त्र चलाएं तो किस पर चलाएं, क्योंकि कोई शत्रु सामने था ही नहीं। कई दिनों तक इस तरह भयंकर युद्ध चला। शंखचूड़ पराजित नहीं हुआ। तब शिव ने विष्णु से कहा-“विष्णु ! कुछ उपाय करो, अन्यथा मेरा तो सारा यश मिट्टी में मिल जाएगा।” विष्णु ने सोचा-‘बल से तो शंखचूड़ को हराया नहीं जा सकता, इसलिए छल का सहारा लेना होगा। उन्होंने तुरन्त अपना स्वरूप शंखचूड़ जैसा बनाया और अस्त्र-शस्त्र से सज्जित हो तुलसी के पास आए, बोले-“प्रिये ! मैं युद्ध जीत गया। सारे देवता भगवान शंकर समेत हार गए। इस ख़ुशी में आओ मैं तुम्हे अंक से लगा लूं।” पति को प्रत्यक्ष खड़ा देख तथा विजय का समाचार सुन वह दौड़कर मायावी शंखचूड़ के गले से लिपट गई। इस प्रकार पति-पत्नी दोनों ने आलिंगन हो खूब ख़ुशी मनाई। पर-पुरुष के साथ इस प्रकार के व्यवहार से उसका सती-तेज नष्ट हो गया। उसका सती-तेज जो शंखचूड़ की कवच के रूप में रक्षा कर रहा था, वह कवच नष्ट हो गया। शंखचूड़ शक्तिहीन हो गया, यह जानते ही भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से प्रहार किया। त्रिशूल के लगते ही शंखचूड़ जलकर भस्म हो गया। शंखचूड़ के मरने को जानकर विष्णु अपने असली स्वरूप में आ गए। सामने अपने पति शंखचूड़ के स्थान पर भगवान विष्णु को खड़ा देख तुलसी बहुत विस्मित हुई। उसको पता लग गया कि स्वयं नारायण ने उसके साथ छल किया है।

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ब्राह्मण पुत्र होने के बाद भी परशुराम में क्यों थे क्षत्रियों के गुण

 यह तो हम सभी जानते है की भगवान परशुराम एक ब्राह्मण थे। लेकिन आचरण उनका क्षत्रियों जैसा था।ब्राह्मण पुत्र होते हुए भी परशुराम में क्षत्रियों के गुण क्यों थे, इसका जवाब जानने के लिए पढ़ते है यह पौराणिक प्रसंग  इसलिए परशुराम में थे क्षत्रियों के गुण महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना। किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा। तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था।

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कब है चैत्र कालाष्टमी व्रत? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और उपाय

हिंदी कैलेंडर के अनुसार साल का दूसरा माह यानि वैशाख का महीना शुरू हो गया है. इस माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन कालाष्टमी व्रत रखा जाता है. इस व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है और इस दिन काल भैरव का पूजन किया जाता है. काल भैरव को रुद्रावतार कहा जाता है और तंत्र-मंत्र का देवता माना जाता है. कहते हैं कि इनका पूजन करने से व्यक्ति को सिद्धि प्राप्त होती है और कई प्रकार के भय भी दूर होते हैं. कालाष्टमी के दिन लोग व्रत-उपवास रखते हैं और विधि-विधान के साथ काल भैरव का पूजन करते हैं. आइए जानते हैं इस बार कब है कालाष्टमी व्रत और शुभ मुहूर्त. कालाष्टमी व्रत 2023 कब है? हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन कालाष्टमी व्रत रखा जाता है. इस बार यह तिथि 13 अप्रैल को सुबह 3 बजकर 44 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन 14 अप्रैल को 1 बजकर 34 मिनट पर होगा. काल भैरव का पूजन निशिता मुहूर्त में किया जाता है और अष्टमी तिथि में निशिता मुहूर्त 13 अप्रैल को है. इसलिए 13 अप्रैल को कालाष्टमी व्रत रखा जाएगा. कालाष्टमी व्रत 2023 शुभ मुहूर्त कालाष्टमी व्रत के दिन निशिता मुहूर्त में पूजन किया जाता है. निशिता मुहूर्त 13 अ्रप्रैल को रात 11 बजकर 59 मिनट से लेकर रात 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा. काल भैरव की पूजा के लिए यह शुभ मुहूर्त हैं. इसके अलावा आप दिन में किसी भी समय कालाष्टमी पूजन कर सकते हैं. कालाष्टमी व्रत का महत्व काल भैरव को भगवान शिव का रौद्र रूप माना जाता है.वह समस्त पापों और रोगों का नाश करने वाले हैं.हिंदू शास्त्रों के अनुसार कालाष्टमी के दिन श्रद्धापूर्वक वर्त रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है.इस दिन व्रत रखकर कुंडली में मौजूद राहु के दोष से भी मुक्ति मिलती है कालाष्टमी पूजा विधि इस दिन भैरव चालीसा का पाठ करना चाहिए. कालाष्टमी के पावन दिन पर कुत्ते को भोजन कराना चाहिए. ऐसा करने से भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं और सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं भैरव बाबा का वाहन कुत्ता होता हैं इसलिए इस दिन कुत्ते को भोजन कराने से विशेष फल की प्राप्ति भक्तों को होती हैं.

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चंद्र ग्रहण आज लगने वाले हैं, जानें किन राशियों को रहना होगा सावधान, किसे होगा फायदा

साल का पहला चंद्र ग्रहण 05 मई 2023 को लगने जा रहा है. यह उपछाया चंद्र ग्रहण तुला राशि में स्वाति नक्षत्र में आरंभ होगा और अंत विशाखा नक्षत्र में होगा. चंद्र ग्रहण की शुरुआत रात 08 बजकर 45 मिनट पर होगी और समाप्ति देर रात 01 बजे होगी. चंद्र ग्रहण का सूतक काल 9 घंटे पहले शुरु हो जाता है लेकिन भारत में ग्रहण दिखाई नहीं देगा इसलिए यहां सूतक भी मान्य नहीं रहेगा.  चंद्र ग्रहण पर 12 साल बाद मेष राशि में सूर्य, बुध, गुरु और राहु का चतुर्ग्रही योग बन रहा है जिससे कई राशियों के किस्मत के द्वार खुलने वाले हैं, लेकिन कुछ राशियों पर चंद्र ग्रहण का अशुभ असर भी देखने को मिलेगा, इन्हें सावधान रहने की जरुरत है. सिंह राशि सिंह राशि वालों के लिए साल का पहला चंद्र ग्रहण शुभ फलदायी होने वाला है. आपकी नए योजनाएं फलीभूत होंगी. धन लाभ के योग बन रहे हैं. जिस काम को करने की ठानेंगे उसमें सफलता प्राप्त होगी. नौकरी और कारोबार में उन्नति का मौका मिलेगा. सामाजिक तौर पर मान-सम्मान में वृद्धि होगी. धनु राशि चंद्र ग्रहण धनु राशि से ग्याहवें घर में लगेगा. ऐसे में इनको धन संपत्ति का लाभ मिलेगा. नौकरीपेशा लोगों को प्रमोशन और आय में बढ़ोत्तरी के प्रबल योग हैं. संतान पक्ष को कार्यों में शिक्षा के क्षेत्र में सफलता मिलेगी. बिजनेस में उन्नति का ग्राफ आसमान छूएगा. मिथुन राशि मिथुन राशि वालों  के लिए चंद्र ग्रहण आर्थिक तौर पर लाभदायक रहेगा. पैसों की परेशानी दूर होगी. आर्थिक स्थिति में मजबूती आएगी.  रूका हुआ धन आपको मिल सकता है. लंबे समय से जॉब की तलाश कर रहे लोग कामयाब होंगे. अच्छी नौकरी के ऑफर आ सकते हैं. मकर राशि  मकर राशि वालों के लिए चंद्र ग्रहण कारोबार और नौकरी के लिहाज से अनुकूल रहेगा. कार्यस्थल पर काम का प्रेशर रहेगा लेकिन ये आपको फायदा पहुंचाएगा. मान-सम्मान में बढ़ोत्तरी होगी और भौतिक सुख का लाभ ले पाएंगे. चंद्र ग्रहण इन राशियों के लिए रहेगा अशुभ मेष राशि मेष राशि के जीवन में चंद्र ग्रहण के अशुभ असर देखने को मिलेंगे. धन के मामले में कोई भी निर्णय पर पहुंचने से पहले सलाह -मश्विरा कर लें. 15 दिन तक पैसों के लेन-देन से बचें. मानसिक तौर पर कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. मन की चंचलता के कारण स्वभाव में चिड़चिड़ापन आएगा, ऐसे में विवाद की स्थिति से बचें नहीं तो बनते काम बिगड़ जाएंगे. वृषभ राशि  वृषभ राशि वालें चंद्र ग्रहण वाले दिन वाणी पर कंट्रोल रखें, छोटी-छोटी बात पर बहस हो सकती है ऐसे में परिवार के साथ तनातनी के आसार हैं. मन को शांत रखने के लिए इस दिन मंत्रों का जाप करें. कर्क राशि चंद्र ग्रहण से कर्क राशि वालों की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है, स्वास्थ को लेकर लापरवाही न बरतें नहीं तो ये लंबे समय तक नुकसान पहुंचाएगी. नौकरीपेशा लोगों के काम में अड़चने आ सकती है, इससे परेशान न हो. बुद्धि का उपयोग करें. साल 2023 का दूसरा चंद्र ग्रहण कब साल 2023 का दूसरा चंद्र ग्रहण 28 अक्टूबर 2023 को आंशिक चंद्र ग्रहण लगेगा, जिसका असर भारत पर भी पड़ेगा.

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वैशाख पूर्णिमा आज, जानिए इस दिन चंद्रमा की पूजा के लाभ और चंद्रोदय का सही समय

वैशाख माह की पूर्णिमा 05 मई 2023, शुक्रवार को है. इस दिन चंद्र ग्रहण भी है. जानते हैं वैशाख पूर्णिमा पर चंद्रोदय समय, पूजा विधि, मंत्र और इस दिन चंद्रमा की पूजा का महत्व पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूजा के लाभ धार्मिक मान्यता के अनुसार पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है.  ग्रंथों में बताया गया है कि पूर्णिमा पर चंद्रमा को दिया गया अर्घ्य पितरों तक पहुंचता है, जिससे पितृ संतुष्ट होते हैं. चंद्रमा की पूजा से मन को नियंत्रण में करने की शक्ति प्राप्त होती है जिससे काम को बेहतर ढंग से कर पाता है और दूसरों की साइकोलॉजी समझने में आसानी होती है. वैशाख माह की पूर्णिमा 05 मई 2023, शुक्रवार को है. वैशाख पूर्णिमा तिथि 04 मई को रात 11.34 मिनट से 05 मई को रात 11.03 तक रहेगी. इस दिन को बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. मान्यताओं के अनुसार वैशाख पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु ने बुद्ध अवतार लिया. बौद्ध धर्म वाले इस दिन शांति और अहिंसा के प्रतीक भगवान गौतम बुद्ध की उपासना करते हैं, उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रण लेते हैं. वैशाख माह की पूर्णिमा 05 मई 2023, शुक्रवार को है. वैशाख पूर्णिमा तिथि 04 मई को रात 11.34 मिनट से 05 मई को रात 11.03 तक रहेगी. इस दिन को बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. मान्यताओं के अनुसार वैशाख पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु ने बुद्ध अवतार लिया. बौद्ध धर्म वाले इस दिन शांति और अहिंसा के प्रतीक भगवान गौतम बुद्ध की उपासना करते हैं, उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रण लेते हैं. वैशाख पूर्णिमा उपाय मान्यता है कि पूर्णिमा की रात औषधियों को चंद्रमा की रोशनी में रखकर अगले दिन खाना चाहिए, इससे व्यक्ति नीरोगी रहता है. बीमारियों में राहत मिलने लगती है. मां लक्ष्मी की पूजा करें। पूजा में 11 पीली कौड़ियां, गोमती चक्र रखें। पूजा के बाद ये चीजें तिजोरी में रखें शिवलिंग के पास दीपक जलाएं और श्रीराम नाम का जाप 108 बार करें. अपने घर के मंदिर में श्रीयंत्र, कुबेर यंत्र, एकाक्षी नारियल, दक्षिणवर्ती शंख की पूजा करें. हनुमानजी के सामने दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें. घर में सुख-शांति बनाए रखने के लिए सत्यनारायण भगवान की कथा करें. वैशाख पूर्णिमा 2023 मुहूर्त स्नान मुहूर्त – सुबह 04.12 – सुबह 04.55 सत्यनारायण पूजा मुहूर्त – सुबह 07:18 – सुबह 08:58 चंद्रोदय को अर्घ्य देने का समय – शाम 06.45 लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त – 05 मई 2023, रात 11:56 – 06 मई 2023, प्रात: 12:39 कूर्म जयंती पूजा मुहूर्त – शाम 04.18 – शाम 0.59 वैशाख पूर्णिमा पूजा विधि वैशाख पूर्णिमा पर पवित्र नदी के जल से स्नान करें, घर में श्रीहरि विष्णु की पूजा कर सत्यनारायण की कथा करें, पीपल को जल चढ़ाएं और 7 बार परिक्रमा करें. इस दिन रात में चंद्र उदय के बाद चांदी के लोटे से चंद्र को दूध और जल में मिश्री-चावल मिलाकर अर्घ्य अर्पित करें. इस दौराना ऊँ सों सोमाय नम: मंत्र का जाप 108 बार करें. मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी को हल्दी की गांठ, इत्र, गुलाब के फूल चढ़ाएं। माता लक्ष्मी के सामने केसर का तिलक खुद के मस्तक पर लगाएं और देवी लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करें.

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 जल्द लगने जा रहा चंद्र ग्रहण, जानिए भारत में क्या होगा इसका प्रभाव

साल 2023 में कुल 4 ग्रहण लगने जा रहे हैं। इनमे से दो सूर्य ग्रहण और दो चंद्र ग्रहण हैं। पहला सूर्य ग्रहण लग चुका है। ये सूर्य ग्रहण 20 अप्रैल को लगा था, जो कि भारत में दृश्य नहीं था। अब पहले सूर्य ग्रहण के बाद साल का पहला चंद्र ग्रहण भी लगने जा रहा है। ये चंद्र ग्रहण 05 मई को वैशाख पूर्णिमा यानी बुद्ध पूर्णिमा वाले दिन लगेगा। वैसे तो चंद्र ग्रहण एक भौगोलिक घटना है, लेकिन पौराणिक मान्यता है कि पूर्णिमा की रात जब राहु और केतु चंद्रमा को निगलने की कोशिश करते हैं, तब चंद्र ग्रहण लगता है। वहीं चंद्र ग्रहण से कुछ घंटे पहले सूतक काल लग जाता है, जिसे ज्योतिष के नजरिए से शुभ नहीं माना जाता है। ऐसे में चलिए जानते हैं चंद्र ग्रहण कब से कब तक रहेगा और इसका सूतक काल लगेगा या नहीं कब लगेगा साल का पहला चंद्र ग्रहणसाल 2023 का पहला चंद्र ग्रहण 5 मई 2023 दिन शुक्रवार को लग रहा है। ये चंद्र ग्रहण रात 8 बजकर 45 मिनट से शुरू होगा और देर रात 1 बजे समाप्त होगा। चंद्र ग्रहण 2023 का सूतक कालवैसे तो चंद्र ग्रहण का सूतक काल 9 घंटे पहले शुरू हो जाता है, लेकिन साल का पहला चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए यहां इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा। कहां-कहां नजर आएगा पहला चंद्र ग्रहणये उपच्छाया चंद्र ग्रहण है। जब चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया सिर्फ एक तरफ से होती है तो उपच्छाया चंद्र ग्रहण कहा जाता है। इसके कारण ये ग्रहण हर जगह नहीं देखा जा सकेगा। ये चंद्र ग्रहण यूरोप, सेंट्रल एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, अंटार्कटिका, प्रशांत अटलांटिक और हिंद महासागर में देखा जा सकेगा। चंद्र ग्रहण कब लगता है?सूर्य के चारों ओर पृथ्वी घूमती है और चंद्रमा पृथ्वी का चक्कर लगाता है। इस प्रक्रिया में एक समय ऐसा आता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य एक ही सीध में आ जाते हैं। इस दौरान सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर पड़ता है, लेकिन चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाता है। इस घटना को खगोलीय घटना के रूप में चंद्र ग्रहण कहा जाता है।

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जब हनुमान जी हारे एक तपस्वी से

श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी को वीरों के वीर महावीर कहा जाता है। जिन्होंने अपने प्रभु राम की रक्षा करने के लिए बहुत से युद्ध किए और जीते। शास्त्रों में इन्हें संकटमोटन कहा जाता है क्योंकि ये अपने भक्तों को हर संकट से उबारते हैं। रामायण महाकाव्य में महर्षि वाल्मीकि ने राम चंद्र और हनुमान जी के कार्यो का बहूत ही सुंदर तरीके वर्णन किया है। रामायण के पान से यह पता चलता की हनुमान अपनी निस्वार्थ भक्ति से राम के मन मंदिर में बसे हुए हैं। राम जी के लिए बजरंगबली ने हर असंभव कार्य को भी संभव सिद्ध किया। इन्होंने अपने पराक्रम से बड़े-बड़ राक्ष्सों का नाश किया। इतना ही नहीं इन्होंने अपने पराक्रम से शनिदेव, बालि, अर्जुन, भीम जैसे बड़े-बड़े वीरों को युद्ध में पराजित करके उनका अभिमान चूर-चूर किया। लेकिन क्या आपको पता है कि संकटमोचन हनुमान ने अपने जीवन काल में अभिमान वश एक ऐसा भी युद्ध लड़ा जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं इस युद्ध में हनुमान जी को हराने वाला कोई और नहीं एक राम भक्त ही था। तो आईए जानें आख़िर कौन था ये राम भक्त दरअसल मच्छिंद्रनाथ नाम के बड़े तपस्वी थें, एक बार जब वो रामेश्वरम में आए तो रामजी का निर्मित सेतु देख कर वे भावविभोर हो गए और प्रभु राम की भक्ति में लीन होकर वे समुद्र में स्नान करने लगे। तभी वहां वानर वेश में उपस्थित हनुमान जी की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने मच्छिंद्रनाथ जी के शक्ति की परीक्षा लेनी चाही। इसलिए हनुमान जी ने अपनी लीला आरंभ की, जिससे वहां जोरों की बारिश होने लगी, ऐसे में बानर रूपी हनुमान जी उस बारिश से बचने के लिए एक पहाड़ पर वार कर गुफा बनाने की कोशिश का स्वांग करने लगे। दरअसल उनका उद्देश्य था कि मच्छिंद्रनाथ का ध्यान टूटे और उन पर नज़र पड़े और वहीं हुआ मच्छिंद्रनाथ ने तुरंत सामने पत्थर को तोड़ने की चेष्टा करते हुए उस वानर से कहा, ‘हे वानर तुम क्यों ऐसी मूर्खता कर रहे हो, जब प्यास लगती है तब कुआं नहीं खोदा जाता, इससे पहले ही तुम्हें अपने घर का प्रबंध कर लेना चाहिए था।’ ये सुनते ही वानर रूपी हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ से पूछा, आप कौन हैं? जिस पर मच्छिंद्रनाथ ने स्वयं का परिचय दिया ‘मैं एक सिद्ध योगी हूं और मुझे मंत्र शक्ति प्राप्त है। जिस पर हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ की शक्ति की परीक्षा लेने के उद्देश्य से कहा, वैसे तो प्रभु श्रीराम और महाबली हनुमान से श्रेष्ठ योद्धा इस संसार में कोई नहीं है, पर कुछ समय उनकी सेवा करने के कारण, उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी शक्ति का एक प्रतिशत हिस्सा मुझे भी दिया है, ऐसे में अगर आप में इतनी शक्ति है और आप पहुंचे हुए सिद्ध योगी है तो मुझे युद्ध में हरा कर दिखाएं, तभी मैं आपके तपोबल को सार्थक मानूंगा, अन्यथा स्वयं को सिद्ध योगी कहना बंद करें। इतना सुनते ही मच्छिंद्रनाथ ने उस वानर की चुनौती स्वीकार कर ली और युद्ध की शुरुआत हो गई। जिसमें वानर रुपी हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ पर एक-एक करके 7 बड़े पर्वत फेंके, पर इन पर्वतों को अपनी तरफ आते देख मच्छिंद्रनाथ ने अपनी मंत्र शक्ति का प्रयोग किया और उन सभी सातों पर्वतों को हवा में स्थिर कर उन्हें उनके मूल स्थान पर वापस भेज दिया। इतना देखते ही महाबली को क्रोध आया उन्होनें मच्छिंद्रनाथ पर फेंकने के लिए वहां उपस्थित सबसे बड़ा पर्वत अपने हाथ में उठा लिया। जिसे देखकर मच्छिंद्रनाथ ने समुंद्र के पानी की कुछ बूंदों को अपने हाथ में लेकर उसे वाताकर्षण मंत्र से सिद्ध कर उन पानी की बूंदों को हनुमान जी के ऊपर फेंक दिया। इन पानी की बूंदों का स्पर्श होते ही हनुमान का शरीर स्थिर हो गया और हलचल करने में भी असमर्थ हो गया, साथ ही उस मंत्र की शक्ति से कुछ क्षणों के लिए हनुमान जी की शक्ति छिन्न गई और ऐसे में वे उस पर्वत का भार न उठा पाने के कारण तड़पने लगे। तभी हनुमान जी का कष्ट देख उनके पिता वायुदेव वहां प्रगट हुए और मच्छिंद्रनाथ से हनुमान जी को क्षमा करने की प्रार्थना की। वायुदेव की प्रार्थना सुन मच्छिंद्रनाथ ने हनुमान जी को मुक्त कर दिया और हनुमान जी अपने वास्तविक रुप में आ गए । इसके बाद उन्होंने मच्छिंद्रनाथ से कहा – हे मच्छिंद्रनाथ आप तो स्वयं में नारायण के अवतार हैं, ये मैं भलीभांति जानता था, फिर भी मैं आपकी शक्ति की परीक्षा लेने की प्रयास कर बैठा, इसलिए आप मेरी इस भूल को माफ करें। ये सुनकर और स्थिति को समझते हुए मच्छिंद्रनाथ ने हनुमान जी को माफ़ कर दिया।

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कब मनाई जाएगी भगवान नरसिंह जयंती? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन भगवान नरसिंह जयंती मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु और नरसिंह भगवान की विधि-विधान उपासना करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। भगवान श्री हरि विष्णु के पांचवे अवतार नरसिंह का जन्मोत्सव वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अधर्म और अहंकार का नाश करने के लिए भगवान नारायण ने यह अवतार लिया था। श्री हरि विष्णु के सभी अवतारों में नरसिंह को अति उग्र माना गया है। लेकिन यह अपने भक्तजनों के लिए सदैव सरल और सौम्य रहते हैं। जन्मोत्सव का दिन नरसिंह जन्मोत्सव वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि यानी 3 मई की रात 11 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगा। वहीं, इसका समापन 4 मई को रात 11 बजकर 44 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार, नरसिंह जयंती 4 मई, गुरुवार के दिन मनाई जाएगी। प्रत्येक वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन नरसिंह जयंती मनाई जाती है। बता दें कि भगवान नरसिंह भगवान विष्णु के चौथे अवतार थे, जिन्होंने हिरण्यकश्यप के वध के लिए धरती पर अवतरण लिया था। इस विशेष दिन पर भगवान नरसिंह एवं भगवान विष्णु की उपासना करने से सभी दुख दूर हो जाते हैं। आइए जानते हैं, वर्ष 2023 में कब मनाई जाएगी नरसिंह जयंती, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि? नरसिंह जयंती 2023 शुभ मुहूर्त  हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि 03 मई 2023 को रात्रि 11 बजकर 49 मिनट पर प्रारंभ होगी और इसका समापन अगले दिन यानी 04 मई 2023 को रात्रि 11 बजकर 44 मिनट पर होगा। नरसिंह जयंती पर भगवान नरसिंह की पूजा सायं काल में की जाती है। इसलिए पूजा का समय शाम 04 बजकर 18 मिनट से शाम 06 बजकर 58 मिनट तक ही रहेगा। वहीं व्रत का पारण अगले दिन यानी 5 मई को सुबह 05 बजकर 38 मिनट के बाद किया जाएगा। नरसिंह जयंती 2023 पूजा विधि नरसिंह जयंती के दिन साधक सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करें और साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान नरसिंह और माता लक्ष्मी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा के समय विधि-विधान से नरसिंह भगवान की पूजा करें और उनकी मंत्रों का जाप करें। शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान नरसिंह को लाल वस्त्र में नारियल लपेटकर अर्पित करने से विशेष लाभ मिलता है। इस दिन नरसिंह भगवान को मिठाई, फल, केसर, फूल और कुमकुम जरूर अर्पित करें। अंत में नरसिंह स्तोत्र का पाठ करें और आरती के साथ पूजा संपन्न करें। नरसिंह जयंती 2023 महत्त्व पौराणिक किवदंतियों के अनुसार, भगवान विष्णु ने दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध के लिए नरसिंह रूप में धरती पर अवतरण लिया था। साथ ही भगवान नरसिंह की परम भक्ति से ही भक्त प्रहलाद को बैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई थी। मान्यता है कि भगवान नरसिंह की पूजा करने से शारीरिक व मानसिक कष्ट दूर हो जाते हैं और कई प्रकार के भय से मुक्ति प्राप्त होती है। इसके साथ भगवान विष्णु के इन स्वरूप की उपासना करने से जीवन में आ रही सभी बाधाएं दूर हो जाती है।

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नारद जयंती पर 3 रोचक कथाएं जब श्रीहरि विष्णु ने नारद जी से किया मजाक

हिन्‍दू मान्‍यताओं के अनुसार नारद मुनि का जन्‍म सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी की गोद से हुआ था। ब्रह्मवैवर्तपुराण के मतानुसार ये ब्रह्मा के कंठ से उत्पन्न हुए थे। जोभी हो नारद को ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक माना गया है। आओ जानते हैं इसके संबंध में 3 रोचक कथाएं। 1. नारद बने स्त्री कहते हैं कि भगवान विष्णु ने नारद को माया के विविध रूप समझाए थे। एक बार यात्रा के दौरान एक सरोवर में स्नान करने से नारद को स्त्रीत्व प्राप्त हो गया था। स्त्री रूप में नारद 12 वर्षों तक राजा तालजंघ की पत्नी के रूप में रहे। फिर विष्णु भगवान की कृपा से उन्हें पुनः सरोवर में स्नान का मौका मिला और वे पुनः नारद के स्वरूप को लौटे।  2. नारद को मिला शाप एक अन्य कथा के अनुसार दक्षपुत्रों को योग का उपदेश देकर संसार से विमुख करने पर दक्ष क्रुद्ध हो गए और उन्होंने नारद का विनाश कर दिया। फिर ब्रह्मा के आग्रह पर दक्ष ने कहा कि मैं आपको एक कन्या दे रहा हूं, उसका कश्यप से विवाह होने पर नारद पुनः जन्म लेंगे। पुराणों में ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि राजा प्रजापति दक्ष ने नारद को शाप दिया था कि वह दो मिनट से ज्यादा कहीं रुक नहीं पाएंगे। यही वजह है कि नारद अक्सर यात्रा करते रहते हैं। अथर्ववेद में भी अनेक बार नारद नाम के ऋषि का उल्लेख है। भगवान सत्यनारायण की कथा में भी उनका उल्लेख है। यह भी कहते हैं कि दक्ष प्रजापति के 10 हजार पुत्रों को नारदजी ने संसार से निवृत्ति की शिक्षा दी जबकि ब्रह्मा उन्हें सृष्टिमार्ग पर आरूढ़ करना चाहते थे। ब्रह्मा ने फिर उन्हें शाप दे दिया था। इस शाप से नारद गंधमादन पर्वत पर गंधर्व योनि में उत्पन्न हुए। इस योनि में नारदजी का नाम उपबर्हण था। यह भी मान्यता है कि पूर्वकल्प में नारदजी उपबर्हण नाम के गंधर्व थे। कहते हैं कि उनकी 60 पत्नियां थीं और रूपवान होने की वजह से वे हमेशा सुंदर स्त्रियों से घिरे रहते थे। इसलिए ब्रह्मा ने इन्हें शूद्र योनि में पैदा होने का शाप दिया था इस शाप के बाद नारद का जन्म शूद्र वर्ग की एक दासी के यहां हुआ। जन्म लेते ही पिता के देहान्त हो गया। एक दिन सांप के काटने से इनकी माताजी भी इस संसार से चल बसीं। अब नारद जी इस संसार में अकेले रह गए। उस समय इनकी अवस्था मात्र पांच वर्ष की थी। एक दिन चतुर्मास के समय संतजन उनके गांव में ठहरे। नारदजी ने संतों की खूब सेवा की। संतों की कृपा से उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। समय आने पर नारदजी का पांचभौतिक शरीर छूट गया और कल्प के अन्त में ब्रह्माजी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए। 3. जब श्री हरि विष्णु ने नारद जी से किया मजाक ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी थीं। उनकी माता का नाम ख्याति था। एक बार लक्ष्मीजी के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ। माता लक्ष्मी पहले ही मन ही मन विष्णु जी को पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं लेकिन नारद मुनि भी लक्ष्मीजी से विवाह करना चाहते थे। नारदजी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी। तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए। विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वरमाला पहनाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। नारदजी वहां से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में उन्होंने अपना चेहरा देखा। अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गए, क्योंकि उनका चेहरा बंदर जैसा लग रहा था। ‘हरि’ का एक अर्थ विष्णु होता है और एक अर्थ वानर भी होता है। भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था। नारद समझ गए कि भगवान विष्णु ने उनके साथ छल किया। उनको भगवान पर बड़ा क्रोध आया। नारद सीधे बैकुंठ पहुंचे और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाना होगा। जिस तरह मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा। इसलिए राम और सीता के रूप में जन्म लेकर विष्णु और देवी लक्ष्मी को वियोग सहना पड़ा। इस कथा प्रसंग में भगवान गणेशजी का विष्णु और देवताओं द्वारा अपमान करने का भी उल्लेख मिलता है जिसके चलते विष्णुजी बारात लेकर निकले तब रास्ते में गणेशजी ने अपने मूषक से कहकर संपूर्ण रास्ता खुदवा दिया था। बाद में गणेशजी को मनाया और उनकी पूजा की गई थी तब बारात आगे बढ़ सकी थी।

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जानिए कब है नारद जयंती? आखिर नारद जी ने क्यों दिया विष्णु भगवान को श्राप ?

ऋषि नारद, जिन्हें देवर्षि नारद या नारद मुनि के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण देवता हैं। वह भगवान ब्रह्मा के पुत्र हैं, जो तीन सर्वोच्च देवताओं में से एक हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने ब्रह्मांड का निर्माण किया था। नारद, देवताओं के दिव्य दूत और भगवान विष्णु के एक समर्पित अनुयायी के रूप में पूजनीय हैं। वह अपने मन में लगातार “नारायण नारायण” का जप करने के लिए जाने जाते हैं। हर साल, हिंदू इस श्रद्धेय ऋषि की जयंती मनाने के लिए नारद जयंती मनाते हैं। देवर्षि नारद, जिन्हें नारद मुनि के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में देवताओं के एक दिव्य दूत हैं और उन्हें भगवान विष्णु का एक स्नेही भक्त माना जाता है। अपनी आध्यात्मिक खोज के अलावा, नारद एक प्रतिभाशाली संगीतकार हैं जो करथल और वीणा धारण करते हैं। वह अपने ज्ञान और कहानी कहने की क्षमताओं के लिए भी जाने जाते हैं, जिन्हें महाभारत और रामायण सहित विभिन्न हिंदू महाकाव्यों में प्रलेखित किया गया है। नारद ने भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद के जीवन में उन्हें शिक्षा और मार्गदर्शन प्रदान करके महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाँकि, हिंदू मान्यता के अनुसार, नारद को एक बार ब्रह्मा के प्रसिद्ध पुत्र दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था। नारद जयंती 2023 हिंदू धर्म में पूर्णिमांत कैलेंडर के अनुसार, नारद जयंती ज्येष्ठ के महीने में कृष्ण पक्ष के दौरान प्रतिपदा तिथि को होती है। हालाँकि, अमावसंत कैलेंडर में, नारद जयंती वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। हालाँकि चंद्र मास के अलग-अलग नाम हैं, नारद जयंती का पालन दोनों हिंदू कैलेंडर में समान है। नारद जयंती 2023: तिथि और समय नारद जयंती: शनिवार, 6 मई, 2023 प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: 05 मई, 2023 को रात्रि 11:03 बजे प्रतिपदा तिथि समाप्त: 06 मई, 2023 को रात्रि 09:52 बजे ऋषि नारद कौन हैं हिंदू पौराणिक कथाओं में, ऋषि नारद को भगवान ब्रह्मा का मानस पुत्र या मन से जन्मे पुत्र माना जाता है, जो तीन त्रिदेवों में से एक हैं जिनमें ब्रह्मा निर्माता, विष्णु अनुरक्षक और महेश विनाशक शामिल हैं। कुछ सूत्र यह भी बताते हैं कि नारद मुनि महर्षि कश्यप के पुत्र हैं, जबकि अन्य मानते हैं कि वे संत त्यागराज और पुरंदरदास के अवतार हैं। भगवान नारायण या विष्णु के कट्टर भक्त के रूप में, ऋषि नारद अपनी संगीत क्षमताओं के लिए जाने जाते हैं और अक्सर उन्हें करथल और वीणा के साथ चित्रित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने कभी शादी नहीं की और एक ब्रह्मचारी बने रहे। विष्णु पुराण और अन्य पुराणों के अनुसार, ऋषि नारद को अस्तित्व के तीनों क्षेत्रों में भटकने के लिए जाना जाता है: स्वर्ग लोक (स्वर्ग), पाताल लोक (नीदरवर्ल्ड), और मृत्यु लोक पृथ्वी लोक (पृथ्वी)। जब वह यात्रा करते हैं, तो वह “नारायण, नारायण” कहते हुए भगवान विष्णु के नाम का जाप करते हैं। उनके पास जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति, मोक्ष की ओर आत्माओं या आत्मा का मार्गदर्शन करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है। इसलिए, नारद जयंती 2023 का उत्सव हिंदू संस्कृति में महत्वपूर्ण महत्व रखता है। इस दिन, लोग ऋषि नारद को उनकी बुद्धिमान सलाह और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए सम्मान और पूजा करते हैं। नारद मुनि जयंती की कथा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पिछले एक कल्प में, नारद एक गंधर्व के रूप में प्रकट हुए थे, लेकिन उनके अभद्र व्यवहार के कारण, भगवान ब्रह्मा ने उन्हें एक शूद्रदासी के पुत्र के रूप में जन्म लेने का दंड दिया। बच्चा बड़ा हुआ और उसने गुरुओं और विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की, जिससे उसे रजोगुण और तमोगुण को समाप्त करने वाले समर्पण को प्राप्त करने में मदद मिली। भगवान विष्णु की पूजा करते समय उन्हें भगवान के दर्शन हुए। अपनी आत्मा में नारायण के रूप को देखने की बार-बार कोशिश करने के बावजूद, वह ऐसा करने में असमर्थ थे। अंततः, भगवान नारायण ने उन्हें अगले जन्म में उनके सलाहकार बनने का वरदान दिया। हजारों वर्षों के बाद, जब ब्रह्मा ने सृजन करना चाहा, नारद मुनि ने मानस पुत्र के रूप में जन्म लिया और ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में जाने गए। तब से, नारद मुनि भगवान नारायण के आशीर्वाद के लिए स्वतंत्र रूप से वैकुंठ सहित तीनों लोकों की खोज कर रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि नारद मुनि वीणा बजाते हैं और ब्रह्म मुहूर्त के दौरान सभी मनुष्यों के कार्यों की निगरानी करते हुए भगवान की स्तुति करते हैं। रामायण की कहानी के अनुसार त्रेता युग में भगवान राम को माता सीता से अलग करने के लिए नारद मुनि जिम्मेदार थे। नारायण के प्रति नारद की भक्ति इतनी प्रबल हो गई थी कि कामदेव भी उन्हें अपनी पवित्रता भंग करने के लिए प्रलोभित नहीं कर सके। नारद के अहंकार को शांत करने के लिए, भगवान विष्णु ने एक मायावी महल बनाया जहां राजकुमारी का स्वयंवर आयोजित किया जा रहा था। नारद को राजकुमारी ने मोहित कर लिया और भगवान नारायण से उसे सुंदर बनाने के लिए कहा ताकि वह उससे शादी कर सके। लेकिन जब वह स्वयंवर में पहुंचे, तो उन्होंने एक बंदर का रूप धारण कर लिया था, जिससे राजकुमारी चली गई। नारद ने क्रोधित होकर भगवान नारायण को मानव रूप में अपनी पत्नी से अलग होने की पीड़ा का अनुभव करने का श्राप दिया। बाद में नारद को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान नारायण से माफी मांगी। नारद जयंती के अनुष्ठान क्या हैं अन्य हिंदू त्योहारों की तरह, नारद जयंती पर सूर्योदय से पहले पवित्र स्नान करना पवित्र माना जाता है। स्नान के बाद, भक्त स्वच्छ और ताजा पूजा वस्त्र (पूजा वस्त्र) पहनते हैं। भक्त भगवान विष्णु की पूजा करते हैं क्योंकि नारद मुनि देवता के समर्पित भक्त थे। भक्त देवता को चंदन, तुलसी के पत्ते, कुमकुम, अगरबत्ती, फूल और मिठाई चढ़ाते हैं। नारद जयंती व्रत (व्रत) का पालन करना अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, और दाल या अनाज के सेवन से बचना आवश्यक है। दुग्ध उत्पादों और फलों की अनुमति है। पर्यवेक्षकों को भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए मंत्रों का जाप करते हुए रात बितानी चाहिए और सोने की अनुमति नहीं है। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। सभी अनुष्ठानों को

जानिए कब है नारद जयंती? आखिर नारद जी ने क्यों दिया विष्णु भगवान को श्राप ? Read More »