May 2023

प्रदोष व्रत से जुडी पौराणिक कथा

ऋषि शांडिल्य ने विधवा ब्राह्मणी को धर्म बुद्ध गुप्त की माता की मृत्यु के बारे में भी बताया. जब विधवा ब्राह्मणी को यह सभी बातें पता चली तो वह बहुत दुखी हुई. सब ऋषि शांडिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत के बारे में बताया. शांडिल्य ऋषि की आज्ञा का पालन करते हुए विधवा ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने प्रदोष व्रत करना आरंभ किया स्कंद पुराण में हिंदू धार्मिक तथ्यों के अनुसार प्रदोष व्रत का उल्लेख किया गया है. स्कंद पुराण में बताया गया है कि हर महीने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी के दिन शाम के समय को प्रदोष व्रत कहा जाता है. प्रदोष व्रत शिव जी को प्रसन्न करने और अपनी मनोकामना को पूरा करने के लिए किया जाता है.  पुराने समय में एक बहुत ही गरीब विधवा ब्राह्मणी थी. जीवन यापन करने के लिए वह विधवा ब्राम्हणी अपने पुत्र को साथ लेकर सुबह सुबह भिक्षा लेने निकल जाती थी और शाम होने पर अपने घर वापस आती थी .एक दिन जब वह विधवा ब्राह्मणी भिक्षा लेकर घर वापस आ रही थी तो उसे एक नदी के समीप एक खूबसूरत बालक बैठा दिखाई दिया पर वह विधवा ब्राह्मणी उस बालक को नहीं पहचानती थी. वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार धर्म गुप्त था. धर्म गुप्त को शत्रुओं ने युद्ध में हराकर उसे उसके राज्य से बाहर निकाल दिया था. एक युद्ध में धर्म गुप्त के शत्रुओं ने धर्म गुप्त के पिता की हत्या करके उसका राज्य छीन लिया. पिता की मृत्यु से धर्म गुप्त की माता को आघात लगा और उनकी भी मृत्यु हो गई. तब धर्म गुप्त अपना राज्य छोड़ कर एक नदी के किनारे उदास बैठा था. ब्राह्मणी को उस बालक पर दया आ गई और वह धर्म गुप्त को अपने घर ले गई और उसका पालन पोषण करने लगी. विधवा ब्राह्मणी धर्म गुप्त से अपने पुत्र के समान प्रेम करती थी. राजकुमार धर्म गुप्त भी उस विधवा ब्राह्मणी के साथ रहकर खुश थे. कुछ समय के बाद वह विधवा ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ मंदिर में दर्शन करने गई. मंदिर में उन्हें ऋषि शांडिल्य मिले. ऋषि शांडिल्य एक बहुत ही महान ऋषि थे. जिन्हें सभी कोई मानते थे. जब ऋषि शांडिल्य ने धर्म गुप्त को देखा तब उन्होंने विधवा ब्राह्मणी को बताया कि यह बालक विदर्भ देश के राजा का पुत्र धर्म गुप्त है. इसके पिता युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए हैं. ऋषि शांडिल्य ने विधवा ब्राह्मणी को धर्म बुद्ध गुप्त की माता की मृत्यु के बारे में भी बताया. जब विधवा ब्राह्मणी को यह सभी बातें पता चली तो वह बहुत दुखी हुई. सब ऋषि शांडिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत के बारे में बताया. शांडिल्य ऋषि की आज्ञा का पालन करते हुए विधवा ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने प्रदोष व्रत करना आरंभ किया. तीनों  ऋषि शांडिल्य द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते हुए व्रत करने लगे पर उन्हें व्रत के फल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. कुछ समय व्यतीत होने के बाद एक दिन वह दोनों बालक जंगल में घूम रहे थे. तब उन्होंने वहां पर कुछ गंधर्व कन्याओं को घूमते हुए देखा. ब्राह्मणी का बालक अपने घर वापस आ गया पर राजकुमार धर्म गुप्त वहीं ठहर गए. धर्म गुप्त  गंधर्व कन्या  अंशुमती  की ओर आकर्षित हो गए और उससे बात करने लगे. बात करते-करते गंधर्व कन्या और राजकुमार दोनों को एक दूसरे से प्रेम हो गया. तब धर्म गुप्त अंशुमती  से विवाह करने के लिए उसके पिता से मिलने गए. जब अंशुमती  के पिता को यह पता चला कि यह बालक विदर्भ देश का राजकुमार है तो उन्होंने भगवान शिव की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह धर्म गुप्त से कर दिया. अंशुमती  से विवाह होने के बाद राजकुमार चंद्रगुप्त की किस्मत के सितारे वापस पलटने लगे. राजकुमार धर्म गुप्त ने बहुत संघर्ष करके फिर से अपने गंधर्व सेना का निर्माण किया और विदर्भ देश पर आक्रमण करके विजय हासिल की. कुछ समय व्यतीत होने के बाद धर्म गुप्त को यह पता चला कि उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया है वह विधवा ब्राम्हणी और राजकुमार के प्रदोष करने का फल है. उनके प्रदोष व्रत करने से शिव जी ने प्रसन्न होकर उनके जीवन की सभी कठिनाइयों को दूर किया है.

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सावन सोमवार व्रत कथा : सावन सोमवार की यह है व्रत कथा, जरूर पढ़ें पूरी होगी मनचाही मुराद

अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है

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ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर कहां है? मंदिर से जुड़ी कथा

वेद और पुराणों की मानें तो हिंदू धर्म में हमारे 33 कोटि देवी-देवता हैं जिन्हें कुछ लोग 33 करोड़ मानते हैं तो कुछ कोटि को प्रकार. संख्या चाहे जो हो इनमें त्रिमूर्ति यानी 3 देवताओं को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है. ब्रह्मा विष्णु और महेश यानी भगवान शिव ब्रह्मदेव को संसार का रचनाकार माना जाता है, विष्णु को पालनहार और महेश यानी शिव को संहारक. लेकिन हैरानी की बात है कि जिन्होंने सृष्टि की रचना की, उसका निर्माण किया उनकी संसार में पूजा नहीं की जाती ब्रह्मा जी का मंदिर कहां है? भारत के राजस्थान राज्य के अजमेर ज़िले के पवित्र स्थल पुष्कर में ब्रह्मा जी का मंदिर बना हुआ है. इस मन्दिर में जगत पिता ब्रह्मा जी की मूर्ति को स्थापित किया गया है. इस मंदिर का निर्माण लगभग 14वी शताब्दी में हुआ था जो कि लगभग 700 वर्ष पुराना है. यह मन्दिर संगमरमर के पत्थरों से बना है. ब्रह्मा जी के इस मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है. कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही यह यज्ञ किया था. यही कारण है कि हर साल अक्टूबर, नवंबर के बीच पड़ने वाले कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर में मेला लगता है. मंदिर से जुड़ी कथा भगवान ब्रह्मा इस संसार के पालनहार है. फिर भी उनका सिर्फ एक ही मंदिर है. ऐसा इसलिए है क्योंकि कहा जाता है कि ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री में ब्रह्मा जी को श्राप दिया था. सावित्री ने अपने पति ब्रह्मा को ऐसा श्राप क्यों दिया था. इसका उल्लेख पद्म पुराण में मिलता है. कहा जाता है कि धरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने बहुत उत्पात मचाया हुआ था. उसके बढ़ते अत्याचारों को देख ब्रह्मा जी ने उसका वध कर दिया था. परंतु जब उस राक्षक का बध किया था तब वध करते समय ब्रह्मा जी के हाथों से तीन जगहों पर कमाल का फूल गिरा.जिसके कारण इन तीन जगहों पर तीन झीलें बन गई. वहीं कहा जाता हैं कि इसी घटना के बाद इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ा गया. संसार की भलाई के लिए ब्रह्मा जी ने यज्ञ करने का फैसला किया. ब्रह्मा जी यज्ञ करने के लिए पुष्कर आए परंतु उनकी पत्नी सावित्री जी ठीक समय पर नहीं पहुंच पाई. इस यज्ञ को पूरा करने के लिए उनकी पत्नी का होना जरुरी था. पर सावित्री जी के यज्ञ में नहीं पहुंच पाने के कारण ब्रह्मा जी ने गुर्जर समुदाय की एक कन्या गायत्री के साथ विवाह कर यज्ञ को शुरू किया. जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत तभी उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंच गई और ब्रह्मा जी के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गई. उनहोंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद भी उनकी कभी भी पूजा नहीं होगी. सावित्री का यह रूप को देख सभी देवता डर गए और सावित्री जी से अपना श्राप वापस लेने की विनती करने लगे. लेकिन उन्होंने किसी की न सुनी और जब उनका गुस्सा शांत हुआ तब सावित्री जी ने कहा कि इस धरती पर केवल सिर्फ पुष्कर में ही आपकी पूजा होगी. कहते हैं कि भगवान भगवान विष्णु जी ने भी ब्रह्मा जी की मदद की थी लेकिन देवी सरस्वती ने विष्णु जी को श्राप दे दिया कि उन्हें पत्नी से अलग होने का कष्ट सहना पड़ेगा. इसी कारण भगवान विष्णु ने राम में 14 साल के वनवास के दौरान उन्हें पत्नी सीता से अलग रहना पड़ा था. आशा करते है कि यह लेख ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर कहां है?

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 जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत

भगवान शिव को कालों के काल महाकाल हैं। साक्षात् मृत्यु में भी उनका सामना करने का साहस नहीं है। वे मृत्युंजय हैं, अविनाशी हैं, आदि हैं, अनंत हैं। भगवान शिव इतने भोले हैं कि वे अपने भक्त की पुकार पर दौड़े चले आते हैं। उसे मनचाहा वरदान देते हैं और उसके मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। आज हम आपको लिंगपुराण की एक कथा के बारे में बताते हैं, जिसमें काल को भगवान शिव ने प्राण दान दिया और अपने भक्त के विश्वास को टूटने नहीं दिया।  भगवान शिव के परमभक्त श्वेतमुनि पर्वत पर एकांत में अपने आराध्य का ध्यान करते और उनकी पूजा करते थे। वे कहते थे कि मृत्यु उनका क्या कर सकती है? उन्होंने तो साक्षात् महाकाल की शरण ली हुई है। उनके आश्रम में शांति और आत्मविश्वास की पवित्रता झलकती थी। उनके तप के बल से आश्रम दिव्यमान था। श्वेतमुनि अपने जीवन काल के अंतिम पड़ाव पर थे। वे मृत्यु से निडर होकर रुद्र अध्याय का पाठ कर रहे थे। उनके जीवन ​का अंतिम श्वास चल रहा था। अचानक वे चौंक पड़े, उनके समक्ष एक विकराल आकृति खड़ी थी। पूरा शरीर काला था और उसने काले वस्त्र धारण कर रखे थे। श्वेतमुनि ने अपने आश्रम के शिव लिंग को करुणामय होकर देखा और ओम नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण किया। उन्होंने शिव लिंग को स्पर्श किया और उस विकराल आकृति से पूछा कि तुमने इस पवित्र आश्रम को अपवित्र करने की हिम्मत कैसे की? इस आश्रम को तो भगवान शिव की कृपा से अभय का आशीष प्राप्त है। उन्होंने दोबारा शिव लिंग को स्पर्श किया। विकराल आकृति वाले काल ने अपना परिचय देते हुए ​​कहा कि अब आप पृथ्वी पर नहीं रह सकते हैं। आपको यमलोक चलना है। इस पर श्वेतमुनि ने शिवलिंग को अपने हाथों से कसकर पकड़ लिया और कहा कि तुमने शिव की भक्ति को चुनौती दी है, क्या तुम्हें नहीं पता है कि भगवान शिव तो स्वयं ही काल के भी काल महाकाल हैं। इस पर काल ने कहा कि शिवलिंग शक्तिविहीन है, निश्चेतन है, पत्थर में महादेव की कल्पना एक भूल है। काल ने श्वेतमुनि को पाश में बांध लिया। जाने रोहिणी व्रत कब है, व्रत कथा, व्रत के नियम और इसका महत्व मुनि ने कहा कि ये तुम्हारी भूल है। महादेव तो कण कण में व्याप्त हैं। विश्वास के साथ उनका आवाहन करने पर वे अपने भक्त की रक्षा करने आते हैं। तभी भगवान शिव माता पार्वती के साथ वहां प्रकट हो गए। उन्होंने काल को चेताते हुए कहा कि ठहरो! श्वेतमुनि का बात सत्य है। उनका प्रकट होना विश्वास के ही अधीन है। भगवान शिव को देखकर काल प्राणहीन समान हो गया। वह शक्तिहीन हो गया। श्वेतमुनि भगवान शिव की स्तुति करने लगे। इस महादेव ने कहा कि आपकी लिंग उपासना धन्य है। विश्वास की विजय होती है। नंदी के निवेदन करने पर महाकाल शिव ने काल को प्राण दान दे दिया और वे वहां से अंतर्धान हो गए।

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जाने रोहिणी व्रत कब है, व्रत कथा, व्रत के नियम और इसका महत्व

जैन समुदाय द्वारा किया जाने वाला रोहिणी व्रत पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध व्रत है। इसे देश के कोने कोने में मनाया जाता है। भगवान वासुपूज्य जी को रोहिणी व्रत समर्पित होता है। इस शुभ अवसर पर रोहिणी देवी के साथ साथ भगवान वासुपूज्य जी की विधिवत पूजा की जाती है। यह व्रत अन्य व्रतों से थोड़ा भिन्न होता है। इस व्रत को क्यों करना चाहिए  रोहिणी व्रत प्रत्येक माह आने वाला व्रत है और कई बार संयोग से एक माह में दो बार किया जाता है। यह व्रत लिंग विशिष्ट नहीं है, इसे कोई भी कर सकता है। महिलाओ द्वारा रोहिणी व्रत अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन को व्रत रखकर इसे त्योहार की भांति मनाया जाता है। प्राचीन काल से इसे त्योहार के रूप में जैन समुदाय द्वारा मनाया जाता आ रहा है।Rohini Vrat 2023   – इस व्रत के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। जिनमें से सबसे लोकप्रिय कथा के बारे में हम आपको आगे बताएंगे। इससे पहले यह जान लेते हैं कि रोहिणी व्रत वर्ष के किस समय किया जाता है। सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा जानिए 2023 में कब है रोहिणी व्रत  दिनांक  वार  पक्ष  तिथि  4 जनवरी 2023 बुधवार शुक्ल पक्ष त्रियोदशी 31 जनवरी 2023 मंगलवार शुक्ल पक्ष दशमी 27 फरवरी 2023 सोमवार शुक्ल पक्ष अष्टमी 27 मार्च  2023 सोमवार शुक्ल पक्ष षष्ठी 23 अप्रैल 2023 रविवार शुक्ल पक्ष तृतीया 21 मई  2023 रविवार शुक्ल पक्ष द्वितीय 17 जून 2023 शनिवार शुक्ल पक्ष चतुर्दशी 14 जुलाई 2023 शुक्रवार शुक्ल पक्ष द्वादशी 10 अगस्त 2023 गुरुवार कृष्ण पक्ष दशमी 7 सितम्बर 2023 गुरुवार कृष्ण पक्ष अष्टमी 4 अक्टूबर 2023 बुधवार कृष्ण पक्ष षष्ठी 31 अक्टूबर 2023 मंगलवार कृष्ण पक्ष तृतीया 28 नवंबर 2023 मंगलवार कृष्ण पक्ष प्रतिपदा 25 दिसम्बर 2023 सोमवार कृष्ण पक्ष चतुर्दशी रोहिणी व्रत कब होता है धार्मिक मान्ताओं के अनुसार नक्षत्रों की कुल संख्या 27 होती है। इन 27 नक्षत्रों में एक रोहिणी नक्षत्र होता है, जिसका संबंध इस व्रत से है। जब महीने में सूर्योदय के पश्चात रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है, उस समय इस व्रत को किया जाता है। एक वर्ष में कम से कम छह से सात बार यह व्रत आता है, और कई बार यह नक्षत्र माह में दो बार आ जाता है। रोहिणी व्रत के नियम  इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना बहुत आवश्यक होता है। माना जाता है तीन, पांच और सात साल निश्चित रूप से इस व्रत का पालन करना चाहिए। इस व्रत की उचित अवधि पांच वर्ष की मानी जाती है। जिन अनुयायियों द्वारा पांच वर्ष की अवधि तक व्रत का पालन करना संभव नहीं हो पाता। इसके लिए पांच माह का समय भी उत्तम माना गया है। रोहिणी व्रत को कितने समय तक करना इसका निर्णय स्वंय लिया जाता है। इस समय अवधि में व्रत करने का संकल्प लेने के पश्चात, इस व्रत का उद्यापन तभी किया जाता है, जब अवधि पूर्ण होे जाती है। इसलिए दृढ़ निश्चय के बाद ही संकल्प लेना चाहिए। व्रत का उद्यापन हो जाने के बाद गरीबों को भोजन कराना चाहिए और दान करना चाहिए। इसी के साथ साथ पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ वासुपूज्य की पूजा करनी चाहिए। भगवान वासुपूज्य जी के दर्शनों के साथ ही व्रत का उद्यापन उचित माना जाता है। इस दिन भगवान वासुपूज्य की ताम्र, पंचरत्न या स्वर्ण की मूर्ति की स्थापना की जाती है और पूरा दिन भगवान की आराधना करके स्थापित मूर्ति का पूजन किया जाता है। पूजा के पूर्ण हो जाने के बाद नैवेद्य, वस्त्र और पुष्प अर्पित करके फल और मिठाई का भोग लगाया जाता है। इस व्रत को करते समय मन में ईर्ष्या और द्वेष जैसे भावों को नहीं लाना चाहिए।

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रोहिणी व्रत का महत्व एवं पौराणिक कथा

पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्‍मीपति के साथ राज करते थे। उनके 7 पुत्र एवं 1 रोहिणी नाम की पुत्री थी। एक बार राजा ने निमित्‍तज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? तो उन्‍होंने कहा कि हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ तेरी पुत्री का विवाह होगा। यह सुनकर राजा ने स्‍वयंवर का आयोजन किया जिसमें कन्‍या रोहिणी ने राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाली और उन दोनों का विवाह संपन्‍न हुआ।  एक समय हस्तिनापुर नगर के वन में श्री चारण मुनिराज आए। राजा अपने प्रियजनों के साथ उनके दर्शन के लिए गया और प्रणाम करके धर्मोपदेश को ग्रहण किया। इसके पश्‍चात राजा ने मुनिराज से पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्‍यों है? तब गुरुवर ने कहा कि इसी नगर में वस्‍तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। उस धनमित्र की दुर्गंधा कन्‍या उत्पन्‍न हुई। धनमित्र को हमेशा चिंता रहती थी कि इस कन्‍या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लोभ देकर अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से उसका विवाह कर दिया, लेकिन अत्‍यंत दुर्गंध से पीडि़त होकर वह एक ही मास में उसे छोड़कर कहीं चला गया। इसी समय अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए नगर में आए, तो धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ वंदना करने गया और मुनिराज से पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्‍होंने बताया कि गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल राज्‍य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा, रानी सहित वनक्रीड़ा के लिए चले, सो मार्ग में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के लिए आहार व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली तो गई, परंतु क्रोधित होकर उसने मुनिराज को कड़वी तुम्‍बी का आहार दिया जिससे मुनिराज को अत्‍यंत वेदना हुई और तत्‍काल उन्‍होंने प्राण त्‍याग दिए। जब राजा को इस विषय में पता चला, तो उन्‍होंने रानी को नगर में बाहर निकाल दिया और इस पाप से रानी के शरीर में कोढ़ उत्‍पन्‍न हो गया। अत्‍यधिक वेदना व दु:ख को भोगते हुए वो रौद्र भावों से मरकर नर्क में गई। वहां अनंत दु:खों को भोगने के बाद पशु योनि में उत्‍पन्न और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्‍या हुई। यह पूर्ण वृत्तांत सुनकर धनमित्र ने पूछा- कोई व्रत-विधानादि धर्म कार्य बताइए जिससे कि यह पातक दूर हो।  तब स्वामी ने कहा- सम्‍यकदर्शन सहित रोहिणी व्रत पालन करो अर्थात प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन आए, उस दिन चारों प्रकार के आहार का त्‍याग करें और श्री जिन चैत्‍यालय में जाकर धर्मध्‍यान सहित 16 प्रहर व्‍यतीत करें अर्थात सामायिक, स्‍वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय बिताए और स्‍वशक्ति दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 मास तक करें। दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और आयु के अंत में संन्यास सहित मरण कर प्रथम स्‍वर्ग में देवी हुई। वहां से आकर तेरी परमप्रिया रानी हुई।  इसके बाद राजा अशोक ने अपने भविष्य के बारे में पूछा, तो स्‍वामी बोले- भील होते हुए तूने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, सो तू मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर जन्म लिया, सो अत्‍यंत घृणित शरीर पाया, तब तूने मुनिराज के उपदेश से रोहिणी व्रत किया। फलस्‍वरूप स्वर्गों में उत्‍पन्‍न होते हुए यहां अशोक नामक राजा हुआ। इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहिणी, रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्‍वर्गादि सुख पाने के उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। रोहिणी व्रत महत्व दिगंबर जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। 27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। महिलाओं के लिए यह व्रत अनिवार्य माना गया है। हालांकि इस व्रत को कोई भी कर सकता है। इस व्रत को पुरुष और महिलाएं दोनों कर सकते हैं। यह व्रत आत्‍मा के विकारों को दूर कर कर्म बंधन से छुटकारा दिलाने में सहायक है। इस व्रत में पूरे विधि विधान के सात भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है।  इस दिन जैन धर्म के अनुयायी वासुपूज्य स्वामी की पूजा और उपासना करके व्रत रखते है। इस दिन व्रत रखने से भगवान वासुपूज्य और माता रोहिणी के आशीर्वाद से घर से आर्थिक समस्या दूर होती हैं तथा उस घर में सदैव धन की देवी मां लक्ष्मी का वास होना, माना जाता है और ऋण मुक्त होने और आय बढ़ने का मार्ग मिल जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से पति की आयु लंबी हो जाती है और उनका स्वास्थ भी अच्छा रहता है। इससे ईर्ष्या, द्वेष, जैसे भाव भी दूर हो जाते हैं। घर में सुख, समृद्धि और धन-धान्य की निरंतर बढ़ोतरी होती है। इस व्रत का समापन उद्यापन के बाद ही किया जाता है।

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जब देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को रुला दिया था

आज गुरुवार है। आज के दिन श्री हरि यानी भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। विष्णु जी से संबंधित कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक कथा आज हम आपके लिए लिए लाए हैं। इस कथा में यह बताया गया है कि आखिर ऐसा क्या हुआ था कि विष्णु जी को देवी लक्ष्मी ने रुला दिया था पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री हरि एक बार धरती भ्रमण के लिए जा रहे थे। तब देवी लक्ष्मी ने उन्हें कहा कि वो भी उनके साथ चलना चाहती हैं। तब विष्णु जी ने कहा कि वो उनके साथ एक शर्त पर ही चल सकती हैं। लक्ष्मी जी ने शर्त पूछी तो विष्णु जी ने कहा कि धरती पर चाहें कोई भी स्थिति क्यों न आए उन्हें उत्तर दिशा की तरफ नहीं देखना है। लक्ष्मी जी ने शर्त मानी और श्री हरि के साथ चल दीं। जब दोनों धरती का भ्रमण कर रहे थे तब देवी की नजर उत्‍तर द‍िशा की तरफ पड़ी। वहीं इतनी ज्यादा हरियाली थी कि वो खुद को रोक न पाईं और बगीचें की तरफ चल दीं। वहां से उन्होंने एक फूल तोड़ा और विष्णु जी के पास आ गईं। विष्णु जी लक्ष्मी जो देखते ही रो पड़े। तब मां लक्ष्मी को विष्णु जी की शर्त याद आ गई। श्री हरि ने कहा कि बिना किसी से पूछे किसी भी चीज को छूना अपराध है। यह सुन देवी लक्ष्मी को एहसास हुआ कि उनसे गलती हो गई है। उन्होंने माफी मांगी। लेकिन श्री हरि ने कहा कि इसकी माफी को बगीचे का माली ही दे सकता है। विष्णु जी ने कहा कि लक्ष्मी जी को माली के घर दासी बनकर रहना होगा। लक्ष्मी जी ने यह सुन तुरंत ही गरीब औरत का वेस धारण किया और माली के घर चली गईं। कभी खेत में तो कभी घर में माली ने उनसे काम कराया। लेकिन जब माली को पता चला कि वो कोई और नहीं बल्कि मां लक्ष्मी हैं तो वो रो पड़ा। उसने कहा कि जो भी उसने किया उसके लिए उसे माफ कर दें। तब लक्ष्मी जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि जो भी हुआ वो नियति थी। इसमें किसी का कोई दोष नहीं है। लेकिन माली ने जिस तरह से लक्ष्मी जी को अपने घर का सदस्य समझा उन्होंने उसकी झोली आजीवन सुख-समृद्धि से भर दी। उन्होंने कहा कि अब जीवन में उसके परिवार को किसी भी तरह का दुख नहीं भोगना होगा। इसके बाद वो विष्णु लोक वापस चली गईं।

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सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा

प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या को उत्तर भार‍‍त की सुहागिनों द्वारा तथा ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को दक्षिण भार‍त की सुहागिन महिलाओं द्वारा वट सावित्री व्रत का पर्व मनाया जाता है। कहा जाता है कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु व डालियों व पत्तियों में भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। इस व्रत में महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं, सती सावित्री की कथा सुनने व वाचन करने से सौभाग्यवती महिलाओं की अखंड सौभाग्य की कामना पूरी होती है। सावित्री और सत्यवान की कथा पौराणिक, प्रामाणिक एवं प्रचलित वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार सावित्री के पति अल्पायु थे, उसी समय देव ऋषि नारद आए और सावित्री से कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है। आप कोई दूसरा वर मांग लें। पर सावित्री ने कहा- मैं एक हिन्दू नारी हूं, पति को एक ही बार चुनती हूं। इसी समय सत्यवान के सिर में अत्यधिक पीड़ा होने लगी। सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति के सिर को रख उसे लेटा दिया। उसी समय सावित्री ने देखा अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है। सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं। उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है। अब तुम वापस लौट जाओ। उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है। सावित्री के मुख से यह उत्तर सुन कर यमराज बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री को वर मांगने को कहा और बोले- मैं तुम्हें तीन वर देता हूं। बोलो तुम कौन-कौन से तीन वर लोगी।  तब सावित्री ने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी, ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा एवं अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा। सावित्री के यह तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा- तथास्तु! ऐसा ही होगा। ‍सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौट आई। जहां सत्यवान मृत पड़ा था। सत्यवान के मृत शरीर में फिर से संचार हुआ। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया।  तभी से वट सावित्री अमावस्या और वट सावित्री पूर्णिमा के दिन वट वृक्ष का पूजन-अर्चन करने का विधान है। यह व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है। चौथा दिन आने पर जब सत्यवान ने लकड़ी, फूल और फल लाने के लिए जंगल की ओर प्रस्थान किया तब सावित्री भी सास-ससुर से आज्ञा लेकर दुखी मन से पति के साथ उस भयंकर जंगल में गयी। नारदजी के वचनों का ध्यान करके मन में भीषण कष्ट रहने पर भी उसने अपने इस भय को पति के सामने उजागर नहीं होने दिया।पति का मन बहलाने के लिए वह झूठ-मुठ उस वन के वृक्षों और पशु-पक्षियों के बारे में पूछताछ करती रही। शूरवीर सत्यवान उस भयंकर वन में विशाल वृक्षों, पक्षियों एवं पशुओं के दल को दिखला-दिखला कर थकी हुई एवं कमल के समान विशाल नेत्रोंवाली राजकुमारी सावित्री को आश्वासन देता रहा। इस प्रकार से कुछ समय बीतने पर सत्यवान ने कहा – ” सावित्री ! मैं फलों को एकत्र कर चूका और तुम फूलों को एकत्र कर चुकी, लेकिन अभी ईंधन के लिए लकड़ी का कोई प्रबंध नहीं हुआ, अतः तुम इस वट वृक्ष की छाया में बैठकर क्षणभर प्रतीक्षा करते हुए विश्राम करो। “ सावित्री बोली – ” कान्त ! जैसा आप कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगी, लेकिन आप मेरे आँखों के सामने से दूर न जाएँ, क्योंकि मैं इस घने जंगल में डर रही हूँ। “ सावित्री के ऐसा कहने पर सत्यवान उसके सामने ही कुछ दूरी पर लकड़ी काटने लगे।

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कालाष्टमी की प्रामाणिक और पौराणिक कथा

हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार हिन्दू कैलेंडर में हर माह आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि मासिक कालाष्टमी पर्व के रूप में मनाई जाती है। यह अष्टमी भगवान भैरव को समर्पित है तथा इसे काला अष्‍टमी भी कहा जाता है। यह तिथि भगवान भैरव से असीम शक्ति प्राप्त करने का समय मानी जाती है अत: इस दिन पूजा और व्रत करने का विशेष महत्व है। कालाष्टमी की एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार की बात है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीनों में श्रेष्ठता की लड़ाई चली। इस बात पर बहस बढ़ गई, तो सभी देवताओं को बुलाकर बैठक की गई। सबसे यही पूछा गया कि श्रेष्ठ कौन है? सभी ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए और उत्तर खोजा लेकिन उस बात का समर्थन शिवजी और विष्णु ने तो किया, परंतु ब्रह्माजी ने शिवजी को अपशब्द कह दिए। इस बात पर शिवजी को क्रोध आ गया और शिवजी ने अपना अपमान समझा। कालाष्टमी की एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार की बात है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीनों में श्रेष्ठता की लड़ाई चली। इस बात पर बहस बढ़ गई, तो सभी देवताओं को बुलाकर बैठक की गई। सबसे यही पूछा गया कि श्रेष्ठ कौन है? सभी ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए और उत्तर खोजा लेकिन उस बात का समर्थन शिवजी और विष्णु ने तो किया, परंतु ब्रह्माजी ने शिवजी को अपशब्द कह दिए। इस बात पर शिवजी को क्रोध आ गया और शिवजी ने अपना अपमान समझा। भैरव ने क्रोध में ब्रह्माजी के 5 मुखों में से 1 मुख को काट दिया, तब से ब्रह्माजी के पास 4 मुख ही हैं। इस प्रकार ब्रह्माजी के सिर को काटने के कारण भैरवजी पर ब्रह्महत्या का पाप आ गया। ब्रह्माजी ने भैरव बाबा से माफी मांगी तब जाकर शिवजी अपने असली रूप में आए। भैरव बाबा को उनके पापों के कारण दंड मिला इसीलिए भैरव को कई दिनों तक भिखारी की तरह रहना पड़ा। इस प्रकार कई वर्षों बाद वाराणसी में इनका दंड समाप्त होता है। इसका एक नाम ‘दंडपाणी’ पड़ा था।

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जानें कब है कालाष्टमी, यहां जानें शुभ मुहूर्त व हिंदू धर्म में इसका पौराणिक महत्व

भगवान शंकर को भोलेनाथ भी कहा जाता है क्योंकि उनका स्वभाव बहुत ही भोला है लेकिन जब शिव को क्रोध आता है तो सृष्टि तितर-बितर हो जाती है. पौराणिक काल में शिव जी के क्रोध से भगवान काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी. हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी का दिन कालभैरव को समर्पित है. इसे कालाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. मान्यता है कि जो इस दिन सच्चे मन से शिव के रोद्र रूप काल भैरव की उपासना करता है बाबा भैरव उसके तमाम कष्ट, परेशानियां हर लेते हैं और हर पल उसकी सुरक्षा करते हैं. शनि और राहु की बाधाओं से मुक्ति के लिए भगवान भैरव की पूजा अचूक होती है. आइए जानते हैं चैत्र माह की कालाष्टमी कब है, पूजा का मुहूर्त और उपाय. चैत्र कालाष्टमी 2023 मुहूर्त चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 14 मार्च 2023 को रात 08 बजकर 22 मिनट पर शुरू होगी. अष्टमी तिथि का समापन 15 मार्च 2023 को शाम 06 बजकर 45 मिनट पर होगा. धार्मिक मूल ग्रन्थ के अनुसार जिस दिन अष्टमी तिथि रात्रि के दौरान प्रबल होती है उस दिन व्रतराज कालाष्टमी का व्रत किया जाना चाहिए. भगवान काल भैरव की ऐसे करें पूजा कालाष्टमी भगवान शिव के भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन भक्त सूर्योदय से पहले उठकर जल्दी स्नान करते हैं। वे काल भैरव का आशीर्वाद लेने और अपने पापों के लिए क्षमा मांगने के लिए उनकी विशेष पूजा करते हैं। शाम को सभी श्रद्धालु भगवान काल भैरव के मंदिर भी जाते हैं और वहां विशेष पूजा अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि कालाष्टमी भगवान शिव का रौद्र रूप है। उनका जन्म भगवान ब्रह्मा के क्रोध को समाप्त करने के लिए हुआ था। कालाष्टमी पर सुबह के समय पूर्वजों की विशेष पूजा के साथ अनुष्ठान भी किया जाता है। कष्टों से मुक्ति के लिए कालाष्टमी पर ऐसे करें पूजा अगर जीवन में भयंकर परेशानी से जूझ रहे हैं, कोई उपाय समझ न आ रहा हो तो इस दिन काले कुत्ते को मीठी रोटी खिलाएं. मान्यता है इससे तमाम कष्टों से मुक्ति मिलती है. वहीं कालाष्टमी के दिन से  रात्रि के समय भगवान भैरव की प्रतिमा के आगे सरसों के तेल का दीपक जलाएं, अगर मंदिर जाना संभव नहीं है तो शिवलिंग के समक्ष ये उपाय करें, फिर कालभैरवाष्टक का पाठ करें. इससे शत्रु और शनि बाधा दूर होती है. ध्यान रहेकाल भैरव की पूजा किसी का अहित करने के लिए न करें, वरना इसके बुरे परिणाम झेलने पड़ सकते हैं. साथ ही इस दिन इस दिन किसी भी कुत्ते, गाय, आदि जानवर के साथ गलत व्यवहार और हिंसक व्यवहार ना करें. कालाष्टमी का महत्व कालाष्टमी का माहात्म्य ‘आदित्य पुराण’ में बताया गया है। हिंदी में ‘काल’ शब्द का अर्थ ‘समय’ है जबकि ‘भैरव’ का अर्थ ‘शिव का प्रकट होना’ है। इसलिए काल भैरव को ‘समय का देवता’ भी कहा जाता है और भगवान शिव के अनुयायी पूरी भक्ति के साथ उनकी पूजा करते हैं।पौराणिक किंवदंतियों के अनुसार, एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच बहस के दौरान भगवान शिव ब्रह्मा जी की एक टिप्पणी पर नाराज हो गए इसके बाद उन्होंने ‘महाकालेश्वर’ का रूप धारण किया और भगवान ब्रह्मा के 5वें सिर को काट दिया। तभी से देवता और मनुष्य भगवान शिव के इस रूप को ‘काल भैरव’ के रूप में पूजते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो लोग कालाष्टमी पर भगवान शिव की पूजा करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

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कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा कार्तिक मास संकष्टी गणेश चतुर्थी की कहानी

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है । कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला व्रत, कार्तिक संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कहलाता है। इसे करवा चतुर्थी भी कहते हैं । इस दिन ‘पिंग’ गणेश की पूजा की जाती है । सौभाग्यवती स्त्रियाँ इस दिन अपने पति के लम्बी उम्र के लिये व्रत रखती है। गणेश जी को करवा अर्पित करती हैं। यह व्रत स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्य प्रदान करती है। इस व्रत से मनुष्य को सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। भविष्य पुराण में कहा गया है कि जब मन संकटों से घिरा महसूस करे, तो गणेश चतुर्थी का व्रत करें । इससे कष्ट दूर होते हैं और धर्म, अर्थ, मोक्ष, विद्या, धन व आरोग्य की प्राप्ति होती है । कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा पार्वती जी कहती है कि हे भाग्यशाली! लम्बोदर! भाषणकर्ताओं में श्रेष्ठ! कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को किस नाम वाले गणेश जी की पूजा किस भांति करनी चाहिए। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि अपनी माता की बात सुनकर गणेश जी ने कहा कि कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का नाम संकटा है। उस दिन पिंग नामक गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। पूजन पूर्वोक्त विधि से करना उचित हैं। भोजन एक बार करना चाहिए। व्रत और पूजन के बाद ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं मौन होकर भोजन करना चाहिए। मैं इस व्रत का महात्म्य कह रहा हूँ, सावधानी पूर्वक श्रवण कीजिये। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को घी और उड़द मिलाकर हवन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को सर्वसिद्धि प्राप्त होती हैं। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि वृत्रासुर दैत्य ने त्रिभुवन को जीत करके सम्पूर्ण देवों को परतंत्र कर दिया। उसने देवताओं को उनके लोकों से निष्काषित कर दिया। परिणामस्वरूप देवता लोग दसों दिशाओं में भाग गए। तब सभी देव इंद्र के नेतृत्व में भगवान विष्णु के शरणागत हुए। देवों की बात सुनकर विष्णु ने कहा कि समुद्री द्वीप में बसने के कारण वे निरापद होकर बलशाली हो गए हैं। पितामह ब्रह्मा जी से किसी देवों के द्वारा न मरने का उन्होंने वर प्राप्त कर लिया हैं। अतः आप लोग अगस्त्य मुनि को प्रसन्न करे। वे मुनि समुद्र को पी जाएंगे। तब दैत्य लोग अपने पिता के पास चले जाएंगे। आप लोग सुख पूर्वक स्वर्ग में निवास करने लगेंगे। अतः आप लोगों का कार्य अगस्त्य मुनि की सहायता से पूरा होगा। ऐसा सुनकर सब देवगण अगस्त्य मुनि के आश्रम में गये और स्तुति के द्वारा उन्हें प्रसन्न किया। मुनि ने प्रसन्न होकर कहा कि हे देवताओं! डरने की कोई बात नहीं हैं, आप लोगों को मनोरथ अवशय ही पूरा होगा। मुनि की बात से सब देवता अपने अपने लोक को चले गए। इधर मुनि को चिंता हुई कि एक लाख योजन इस विशाल समुद्र को मैं कैसे पी सकूंगा? तब गणेश जी का स्मरण करके संकट चतुर्थी के उत्तम व्रत को विधिपूर्वक संपन्न किया। तीन महीने तक व्रत करने के बाद गणेश जी उन पर प्रसन्न हुए। उसी व्रत के प्रभाव से अगस्त्य जी ने समुद्र को सहज ही पान करके सूखा डाला। गणेश जी की इस बात से पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न हुई। कृष्ण जी कहते है कि हे महाराज युधिष्ठिर! आप भी चतुर्थी का व्रत कीजिये। इसके करने से आप शीघ्र ही सब शत्रुओं को जीतकर अपना राज्य पा जायेंगे। श्रीकृष्ण के आदेशानुसार युधिष्ठिर ने गणेश जी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उन्होंने शत्रुओं को जीतकर अखंड राज्य प्राप्त कर लिया। कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजन विधि  प्रात: काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हो स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। श्री गणेश जी का पूजन पंचोपचार (धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, फूल) विधि से करें। इसके बाद हाथ में जल तथा दूर्वा लेकर मन-ही-मन श्री गणेश का ध्यान करते हुये व्रत का संकल्प करें। संध्या होने पर दुबारा स्नान कर स्वच्छ हो जायें। श्री गणेश जी के सामने सभी पूजन सामग्री के साथ बैठ जायें। विधि-विधान से गणेश जी का पूजन करें। वस्त्र अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में लड्डू अर्पित करें। चंद्रमा के उदय होने पर चंद्रमा की पूजा कर अर्घ्य अर्पण करें। उसके बाद गणेश चतुर्थी की कथा सुने अथवा सुनाये। घी और उड़द मिला कर हवन करें। तत्पश्चात् गणेश जी की आरती करें। व्रत और पूजन के बाद ब्राह्मण को भोजन करा कर खुद मौन रह कर भोजन करें। स्त्रियाँ चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात् अपने पति की आरती और पूजा करें।

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8 मई को पड़ रही संकष्टी चतुर्थी, क्या है इसका महत्व, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त

सनातन धर्म में भगवान गणेश को सभी देवी देवताओं में सबसे पहले पूजा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य के पहले भगवान गणेश को पूजने से उस कार्य में सफलता जरूर प्राप्त होती है. 8 मई 2023 को संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है. इस दिन को विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है. संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा की जाती है. इस दिन भक्त व्रत भी रखते हैं. एकदंत संकष्टी चतुर्थी का शुभ मुहूर्त गणपति का पूजा का शुभ फल प्रदान करने वाला एकदंत संकष्टी चतुर्थी व्रत इस साल 08 मई 2023 को मनाया जाएगा.पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 08 मई 2023 को शाम को 06:18 बजे से प्रारंभ होकर 09 मई 2023 को शाम के समय 04:08 बजे तक रहेगी. पंचांग के अनुसार एकदंत संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा रात्रि 10:04 बजे होगा. संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व एकदंत संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व होता है. इस दिन गणेश भगवान की पूजा करने से जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं. अपनी सभी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए इस दिन व्रत रखने का भी विधान है. एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत सुख-सौभाग्य दिलाता है.यदि आप संतान प्राप्ति का सुख भोगना चाहते हैं तो भी इस दिन विधि-विधान से गणेश भगवान की पूजा करें. जो भी व्यक्ति श्रद्धा भाव से संकष्टि चतुर्थी का व्रत रखता है उसकी हर एक मनोकामना भगवान गणेश पूरी करते हैं. इसके अलावा भगवान गणेश जीवन भर उनके हर विघ्न को हर लेते हैं. संकष्टी चतुर्थी की तिथि संकष्टी चतुर्थी जेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है. जिसकी शुरुआत 8 मई 2023 को शाम 6:18 से हो रही है इसका समापन अगले दिन यानी 9 मई 2023 शाम 4:08 पर होगा. संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार व्रत 8 मई को रखा जाएगा. संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि संकष्टी चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त हो जाएं. स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान गणेश की पूजा करते समय व्रत रखने का संकल्प लें.अब एक लकड़ी के पति पर भगवान गणेश की प्रतिमा रखकर उन्हें हल्दी का तिलक लगाएं. उनके समक्ष दूर्वा, फूल माला, लड्डू और फल अर्पित करें.अब भगवान गणेश के समीप घी का दीपक जलाएं.भगवान गणेश की विधि विधान से पूजा करने के बाद उन्हें घी से बने मोतीचूर के लड्डू या मोदक का भोग लगाकर अपनी गलती के लिए क्षमा याचना करें.

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