March 29, 2023

कैसे हुआ हनुमान जी का जन्म, बेहद रोचक है कहानी, जानें

हनुमान जयंती 6 अप्रैल 2023, गुरुवार को है. हनुमान जयंती पर हनुमान जी की जन्म कथा का श्रवण करने से बजरंगबली की कृपा बरसती है. हनुमान जयंती 6 अप्रैल 2023, गुरुवार को है. साल में दो बार हनुमान जयंती मनाई जाती है. उत्तर भारत में हनुमान जयंती चैत्र माह की पूर्णिमा पर दूसरी बार कार्तिक महीने में. महावीर हनुमान को भगवान शिव का 11वां रूद्र अवतार कहा जाता है और वे प्रभु श्री राम के अनन्य भक्त हैं. इस दिन हनुमान जी ने वानर जाति में जन्म लिया. हनुमानजी एक ऐसे देवता हैं जो त्रेतायुग से लेकर आज तक सबसे शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता माने जाते हैं. मान्यता है कि जहां भी राम कथा होती है वहां हनुमानजी किसी ना किसी रूप में मौजूद रहते हैं. हनुमान जयंती पर हनुमान जी की जन्म कथा का श्रवण करने से बजरंगबली की कृपा बरसती है. हनुमान जयंती 2023 मुहूर्त चैत्र पूर्णिमा तिथि शुरू – 05 अप्रैल 2023, सुबह 09.19 चैत्र पूर्णिमा तिथि समाप्त – 06 अप्रैल 2023, सुबह 10.04 शुभ (उत्तम) – सुबह 06.06 – सुबह 07.40 लाभ (उन्नति) – दोपहर 12.24 – दोपहर 01.58 हनुमान जयंती कथा हनुमान जी को केसरीनंदन और आंजनाय पुत्र कहा जाता है, वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार इन्हें हनुमान जी के जन्म के पीछे पवन देव का भी योगदान था, इसलिए यह पवन पुत्र भी कहलाए गए. पौराणिक कथा के अनुसार त्रैतायुग में राजा दशरथ में पुत्र प्राप्ति के लिए एक हवन. हवन समाप्ति के बाद गुरुदेव ने प्रसाद की खीर राजा दशरथ की तीनों रानियों  कौशल्या, सुभद्रा और कैकेयी को बांटी. उस समय खीर का थोड़ा सा हिस्सा एक पक्षी ले गया. ऐसे हुआ हनुमान जी का जन्म उड़ते-उड़ते वह पक्षी देवी अंजना के आश्रम चला गया. यहां माता अंजना तपस्या कर रही थी. उस दौरान पक्षी के मुंह से खीर माता अंजना के हाथ में गिर गई. देवी ने इसे भोलेनाथ का प्रसाद मानकर ग्रहण कर लिया. इस प्रसाद के प्रभाव और ईश्वर की कृपा से माता अंजना ने शिव के अवतार बाल हनुमान को जन्म दिया. उस दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि थी. हनुमान जयंती पर कैसे करें पूजा हनुमान जयंती के दिन बजरंगबली को चमेली के तेल में मिश्रित सिंदूर का चोला चढ़ाएं. अक्षत, कनेर, गुड़हल या गुलाब के पुष्प चढ़ाएं. नैवेद्य में मालपुआ, बेसन के लड्डू अर्पित करें. ‘ॐ हं हनुमते नम:‘ का 108 बार जाप करें. हनुमान चालीसा का पाठ करें. अब आरती के पश्चात गरीबों को दान दें. श्री हनुमान चालीसा दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।  बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।  चौपाई : जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।। हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै। संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन।। विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।। भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे।। लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।। सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।। जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।। तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।। तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना।। जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।। दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।। सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना।। आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।। भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।। नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।। संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।। सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा। और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।। चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।। साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।। अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।। राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।। तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै।। अन्तकाल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।। और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।। संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई।। जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।। तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।। दोहा : पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

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आज कामदा एकादशी पर पढ़ें यह व्रत कथा, पापों से मिलती है मुक्ति

यह व्रत रखने से पाप और कष्ट मिटते हैं. भगवान श्री विष्णु की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं. जो लोग व्रत रखते हैं, उनको कामदा एकादशी व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए. किसी कारणवश आप पाठ नहीं कर सकते हैं, तो कामदा एकादशी व्रत कथा को सुन लें. ऐसा करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है. आइए जानते हैं कामदा एकादशी व्रत कथा के बारे में. उस राजा की पत्नी ने चैत्र एकादशी का व्रत रखकर भगवान् नारायण से प्रार्थना की थी कि मेरे इस व्रत का फल मेरे पति को प्राप्त हो जाये। भगवान् नारायण ने पत्नी के व्रत का फल उसके राक्षस बन चुके पति राजा पुंडरीक को दे दिया जिससे वह राक्षस से एक बार फिर से राजा बन गया। कामदा एकादशी व्रत कथा एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में बताने की प्रार्थना की. तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि चैत्र शुक्ल एकादशी व्रत को कामदा एकादशी कहते हैं. इस व्रत को करने से पाप से मुक्ति मिलती है. इस एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है प्राचीन काल में एक भोगीपुर राज्य था, जिसका राजा पुंडरीक था. वह धन एवं ऐश्वर्य से युक्त था. उसके ही राज्य में ललित और ललिता नाम के स्त्री और पुरुष रहते थे. दोनों एक दूसरे से बेहद प्रेम करते थे. एक बार राजा पुंडरीक की सभा में ललित अन्य कलाकारों के साथ गाना गा रहा था, उसी दौरान ललिता को देखकर उसका ध्यान भंग हो गया और वह स्वर बिगड़ गया

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कामदा एकादशी का महत्व

कामदा एकादशी चैत्र शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार कामदा एकादशी का व्रत ब्रह्महत्या जैसे पापों आदि दोषों से मुक्ति दिलाता है। इस दिन भगवान विष्णु जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और हजारों वर्ष की तपस्या के बराबर का फल प्राप्त होता है। कामदा एकादशी का महत्व कामदा एकादशी बाकी दूसरे एकादशी से ज्यादा महत्व रखती है, कहा जाता है कि इस दिन हर मंगलमय कार्य पूर्ण होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सुहागन स्त्रियां यदि कामदा एकादशी का व्रत रखती हैं तो वह अखंड सौभाग्यवती रहती हैं। कामदा व्रत रखने वाले व्यक्ति की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और घर में सुख शांति बनी रहती है। मान्यता यह भी है कि इस व्रत को यदि विधि पूर्वक किया जाए तो सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और राक्षस जैसी योनि से मुक्ति मिल जाती है। यह भी कहा जाता है कि कामदा एकादशी के बराबर कोई दूसरा व्रत नहीं है और इसकी कथा पढ़ने या सुनने से लाभ पहुंचता है। (कामदा एकादशी की व्रत कथा) एक बार महाराज युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण भगवान से पूछा कि चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम कामदा एकादशी है। यह एकादशी सभी प्रकार के पापों को नष्ट करके मोक्ष प्रदान करने वाली है। प्राचीन समय में नाग लोक में भोगीपुर नाम का एक सुंदर नगर था जहां सोने के महल बने हुए थे। उस नगर में महा भयंकर नाग निवास करते थे। पुंडरीक नाम का  नाग उन दिनों वहां राज्य करता था। अप्सराएं, गंधर्व और किन्नर सभी उस नगर में निवास करते थे। एक श्रेष्ठ अप्सरा ललिता अपने पति ललित नाम के गंधर्व के साथ उसी नगर में रहती थी। उनके घर में धन, ऐश्वर्य और वैभव की कोई कमी नहीं थी। वह दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे। एक दिन ललित राजा पुंडरीक की सभा में नृत्य और गायन प्रस्तुत पर रहा था परंतु उसके साथ उसकी प्रिय पत्नी ललिता नहीं थी। नाचते और गाते हुए उसे अपनी पत्नी की याद आ गई और उसके पैरों की गति धीमी हो गई। उसकी जीभ लड़खड़ाने लगी। तब ही पुंडरीक के दरबार में कर्कोटक नाम का एक नाग देवता मौजूद थे। ललित को गाने का आदेश देकर राजा पुंडरीक कर्कोटक नाग देवता के साथ आनंद ले रहे थे। ललित गाने में मग्न था। तभी उसे अपनी पत्नी की याद आ गई और वह भूल गया। नाग  देवता ने ललित से हुई गलती को पकड़ लिया, जिसके बाद राजा पुंडरीक ने उसे राक्षस बनने का श्राप दिया। इतना कहते ही वह गंधर्व राक्षस बन गया। उसका  रूप बहुत ही डरावना था। जब उसकी पत्नी ललिता को इस बात का पता चला तो वह बहुत दुखी हुई और वह मन ही मन सोचने लगे कि उनके पति बहुत ही कष्ट भोग रहे हैं। अपने पति के पीछे-पीछे जंगल में घूमने लगी। तभी उसे एक सुंदर आश्रम दिखाई दिया जहां एक मुनि बैठे हुए थे। ललिता जल्दी से वहां पर पहुंच गई। तब तक मुनि ने ललिता को कामदा एकादशी व्रत के बारे में बताया। मुनि की बात मानकर ललिता ने उनके आश्रम में कामदा एकादशी व्रत किया और व्रत से मिलने वाले लाभ से अपने पति को ठीक कर दिया। कामदा एकादशी के लाभ से ललित अपने पापों से मुक्त हो गया और पहले की तरह सुंदर बन गया। कामदा एकादशी व्रत विधि   कामदा एकादशी के दिन ध्यान रखने वाली बातें कामदा एकादशी तिथि कामदा एकादशी  तिथि 1 अप्रैल को रविवार के दिन होगी। कामदा एकादशी तिथि 1 अप्रैल को 01:58 AM पर शुरू होगी। कामदा एकादशी तिथि 2 अप्रैल को 04:19 AM पर खत्म होगी।

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आज राम नवमी पर इस सरल विधि से करें हवन, प्रभु श्री राम के साथ मां सिद्धिदात्री भी होंगी प्रसन्न

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रामनवमी के दिन ही भगवान राम ने राजा दशरथ के घर जन्म लिया था. राम नवमी पर हवन करने का विधान है. माना जाता है कि कन्या पूजन के साथ राम नवमी पर हवन करने से प्रभु श्री राम के साथ साथ माँ सिद्धिदात्री भी अत्यंत प्रसन्न हो जाती हैं. हवन करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं व सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है. ऐसे में चलिए जानते हैं हवन करनेका शुभ मुहूर्त और सरल हवन विधि हवन सामग्रीरामनवमी पर हवन सामग्री में नीम, पंचमेवा, जटा वाला नारियल, गोला, जौ, आम की लकड़ी, गूलर की छाल, चंदन की लकड़ी, अश्वगंधा, मुलेठी की जड़, कपूर, तिल, चावल, लौंग, गाय की घी, इलायची, शक्कर, नवग्रह की लकड़ी, आम के पत्ते, पीपल का तना, छाल, बेल, आदि को शामिल करना चाहिए. हवन विधि– राम नवमी के दिन व्रती को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ- स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए.– इसके बाद हवन के लिए साफ-सुथरे स्थान पर हवन कुंड का निर्माण कर करना चाहिए.– अब गंगाजल का छिड़काव कर सभी देवताओं का आवाहन करें.– अब हवन कुंड में आम की लकड़ी और कपूर से अग्नि प्रज्जवलित करें.– इसके बाद हवन कुंड में सभी देवी- देवताओं के नाम की आहुति डालें.– धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हवनकुंड में कम से कम 108 बार आहुति डालनी चाहिए. – हवन समाप्त होने के बाद भगवान राम और माता सीता की आरती उतारनी चाहिए. राम नवमी के दिन स्थापित करें घर में राम यंत्र, होंगे ये अचूक लाभ राम यंत्र बनाते समय करें ये काम   सबसे पहले पूर्व दिशा में श्री राम का स्मरण करते हुए अपनी आंखों को बंद करके, दोनों भौहों के बीच त्रिपुटी पर अपना ध्यान केंद्रित करें और ऊँ शब्द का सस्वर 6 बार उच्चारण करें. फिर, दाहिनी नाक से सांस खींचिए, रोकिए और श्री राम का स्मरण करके बाईं नाक से निकाल दीजिए. ऐसा 6 बार करना है. फिर ‘राम’ शब्द का सस्वर 108 बार उच्चारण करके अपनी आंखें खोलिए. इस तरह आपका यंत्र तैयार हो जागा.  राम यंत्र से मिलने वाले लाभ  बिजनेस में लाभ अगर आप बिजनेस में, घर में, स्पोर्ट्स में, राजनीति में, किसी मुकदमे में या जीवन के किसी दूसरे क्षेत्र में अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं तो, आज राम यंत्र को अपने सामने रखकर आपको 108 बार ये मंत्र पढ़ना चाहिए. इसके लिए मंत्र – क्लीं रामाय नमः है.  आर्थिक स्थिति को करे मजबूतअगर आप अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं. इसके साथ ही अपनी इनकम में बढ़ोतरी करना चाहते हैं, तो आज आपको राम यंत्र सामने रखकर इस मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए. इसके लिए मंत्र – श्रीं रामाय (strong financial condition) नमः है. दाम्पत्य जीवन में खुशहालीअगर आप अपनी शादी-शुदा जिंदगी में खुशियां चाहते हैं. अपने सुख-सौभाग्य में बढ़ोतरी करना चाहते हैं, तो आज आपको राम यंत्र सामने रखकर इस मंत्र का 108 बार जप करें. इसके लिए मन्त्र ह्रीं रामाय नमः है.  विद्या के क्षेत्र में मिलेगा लाभ अगर आप विद्या के क्षेत्र में लाभ पाना चाहते हैं, तो आज राम यंत्र को अपने सामने रखकर 108 बार ये मंत्र पढ़ना चाहिए. इसके लिए मंत्र – ऐं रामाय नमः है. 

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राम नवमी के दिन पढ़ें ये व्रत कथा, भगवान राम की बरसेगी कृपा

हिंदुओं के लिए चैत्र का महीना बहुत ही शुभ और पवित्र होता है. इस महीने में मां दुर्गा के साथ-साथ भगवान श्री राम की भी पूजा-आराधना की जाती है. आपको बता दें, चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव यानी कि रामनवमी मनाया जाता है. इस दिन मां सिद्धिदात्री माता के साथ-साथ भगवान श्री राम की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है.  रामनवमी व्रत कथा पौराणिक कथा की मानें तो भगवान श्री राम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण वनवास जा रहे थे. उस वक्त प्रभु श्रीराम विश्राम करने के लिए थोड़ी देर रुके. जहां भगवान विश्राम कर रहे थे वहीं पास में एक बुढ़िया रहती थी. भगवान श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता उस बुढ़िया के घर गए. उस वक्त बुढ़िया सूत काट रही थी. बुढ़िया ने श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता का आदर पूर्वक स्वागत किया और उन्हें स्नान ध्यान करवाकर भोजन करने के कहा. ये सुनकर श्रीराम ने उस बुढ़िया से कहा कि ‘माता’ मेरा हंस भी बहुत भूखा है, इसके लिए पहले मोती ला दो. फिर मैं बाद में भोजन करूंगा. ये सुनकर बुढ़िया बहुत परेशान हो गई. लेकिन, बुढ़िया अपने घर आए मेहमानों का निरादर नहीं करना चाहती थी. इसी वजह से वे दौड़ते-दौड़ते अपने नगर के राजा के पास गई और उससे उधार में मोती देने को कहा. बुढ़िया की हैसियत राजा को मोती लौट आने की नहीं थी लेकिन, फिर भी बुढ़िया पर तरस खाकर राजा ने उसे मोती दे दी. बुढ़िया दौड़ते हुए उस मोती को लाकर भगवान श्री राम के हंस को खिला दिया.  हंस को खाना खिलाने के बाद बुढ़िया ने भगवान श्रीराम को भी भोजन कराया. भोजन करने के बाद भगवान श्रीराम जाते समय बुढ़िया के आंगन में एक मूर्ति का पेड़ लगा गए. जब पेड़ बड़ा हो गया तो उसमें बहुत सारे मोती होने लगें. लेकिन, बुढ़िया को इस मोती के बारे में कुछ पता नहीं था. जब पेड़ से मोती गिरता था, तो उसकी पड़ोसी उसे उठाकर ले जाती थी.  एक दिन जब बुढ़िया उस पेड़ के नीचे बैठकर सूत काट रही थी. तो, पेड़ से एक मोती गिरा. बुढ़िया ने मोती के गिरते ही उसे उठा लिया और उसे राजा के पास ले गई. बुढ़िया के पास इतने सारे मोती देखकर राजा को बड़ी हैरानी हुई. राजा ने बुढ़िया से पूछा कि तुम्हारे पास इतने मोती कहां से आएं. तब बुढ़िया ने अपने राजा को बताया कि उसके आंगन में एक मोती का पेड़ हैं.  ये सुनकर राजा ने तुरंत उस पेड़ को अपने आंगन में लगवा लिया. लेकिन, भगवान श्री राम की कृपा से राजा के आंगन में लगा हुआ मोती का पेड़ में मोती के बजाय कांटे लगने लगें. एक दिन उसी पेड़ का एक कांटा रानी के पैर में चुभ गया. रानी के पैर में कांटा चुभने के बाद उन्हें बहुत पीड़ा हुई. वो चिल्लाते-चिल्लाते राजा के पास गई. ये देखकर राजा ने उस पेड़ को फिर से बुढ़िया के आंगन में लगवा दिया. प्रभु श्री राम की कृपा से पेड़ में फिर से मोती लगने लगें. अब जब पेड़ से मोती गिरता बुढ़िया उसे उठाकर प्रभु के प्रसाद के रूप में सभी को बांट देती थी. 

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नवरात्रि में मां दुर्गा को पसंद हैं ये 9 भोग, जानें किस दिन कौन-सा लगाएं भोग

चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन से नवरात्रि का पर्व शुरू होता है। यूं तो मां दुर्गा की पूजा से हमेशा लाभ होता है लेकिन नवरात्र के दौरान ग्रहों के योग संयोग कुछ ऐसे होते हैं जिनमें देवी की पूजा अधिक फलदायी होती है। क्योंकि नवरात्र के नौ दिनों में मां के नौ रूपों की आराधना की जाती है। वैसे तो माता को सच्चे मन से जो भी भोग लगाओ, वह ग्रहण कर लेती है लेकिन माता दुर्गा को नवरात्र को यह 9 भोग पसंद हैं। मान्यता है कि जगत जननी को इनका भोग लगाने से मनोकामना की पूर्ति होती है। साथ ही बुद्धि व धन-संपदा की भी वृद्धि होती है। आइए जानते हैं किस दिन माता को कौन सा भोग लगाएं माता का पहला स्वरूप नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन मां शैलपुत्री को गाय के घी भोग लगाने चाहिए। इससे आरोग्य लाभ की प्राप्ति होती है। माता का दूसरा स्वरूप नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के द्वितीय स्वरूप देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा जाती है। इस दिन देवी ब्रह्मचारिणी को शक्कर का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से चिरायु का वरदान प्राप्त होता है। माता का तीसरा स्वरूप नवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन मां चंद्रघंटा को दूध का भोग चढ़ाएं और उसे जरूरतमंद को दान कर देना चाहिए। ऐसा करने से धन-वैभव और ऐशवर्य की प्राप्ति होती है माता का चौथा स्वरूप नवरात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप कुष्मांडा की पूजा की जाती है। इस दिन माता को मालपुआ का नैवेध अर्पण करना चाहिए और उसे जरूरतमंद को दान कर देना चाहिए। ऐसा करने से मनोबल बढ़ता है। माता का पांचवा स्वरूप नवरात्र के पांचवे दिन मां दुर्गा के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा होती है। इस दिन मां भवानी को केले का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से बुद्धि का विकास होता है और करियर में ग्रोथ मिलती है। माता का छठवां स्वरूप नवरात्र के छठवें दिन मां दुर्गा के षष्टम स्वरूप मां कात्यानी की पूजा होती है। इस दिन मां कात्यानी को शहद का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से सौंदर्य की प्राप्ति होती है और घर से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। माता का सातवां स्वरूप नवरात्र के सातवें दिन मां दुर्गा के सप्तम स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा होती है। इस दिन मां कालरात्रि को गुड़ से निर्मित भोग अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से रोग-शोक से मुक्ति मिलती है और परिवार भी स्वस्थ्य रहता है। माता का आठवां स्वरूप नवरात्र के आठवें दिन मां दुर्गा के अष्टम स्वरूप मां महागौरी की पूजा की जाती है। इस दिन देवी महागौरी को नारियल का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और माता का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। माता का नौंवा स्वरूप नवरात्र के नौवें दिन मां दुर्गा के नवम् स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस दिन मां भवानी को घर में बने हुए हलवा-पूड़ी और खीर का भोग लगाकर कंजक पूजा करें। ऐसा करने से मनुष्य के जीवन में सुख-शांति मिलती है।

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नवरात्र का आठवां दिन: जानें मां महागौरी की पूजा विधि, मंत्र, भोग और कथा

शारदीय नवरात्र अब अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। आज मां दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा की जाती है। आठवें दिन महागौरी की पूजा देवी के मूल भाव को दर्शाता है। देवीभागवत पुराण के अनुसार, मां के नौ रूप और 10 महाविद्याएं सभी आदिशक्ति के अंश और स्वरूप हैं लेकिन भगवान शिव के साथ उनकी अर्धांगिनी के रूप में महागौरी सदैव विराजमान रहती हैं। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। नवरात्र की अष्टमी तिथि को विशेष महत्व रखती है क्योंकि कई लोग इस दिन कन्या पूजन कर अपना व्रत खोलते हैं। आइए जानते हैं कि मां महागौरी के बारे में विशेष बाते इस तरह मां का नाम पड़ा महागौरी देवीभागवत पुराण के अनुसार, देवी पार्वती का जन्म राजा हिमालय के घर हुआ था। देवी पार्वती को मात्र 8 वर्ष की उम्र में अपने पूर्वजन्म की घटनाओं का आभास हो गया है और तब से ही उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या शुरू कर दी थी। अपनी तपस्या के दौरान माता केवल कंदमूल फल और पत्तों का आहार करती थीं। बाद में माता ने केवल वायु पीकर तप करना आरंभ कर दिया। तपस्या से देवी पार्वती को महान गौरव प्राप्त हुआ था इसलिए उनका नाम महागौरी पड़ा। इस दिन दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित्र का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। कल्याणकारी हैं मां महागौरी माता की तपस्या की प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे गंगा स्नान करने के लिए कहा। जिस समय मां पार्वती स्नान करने गईं तब देवी का एक स्वरूप श्याम वर्ण के साथ प्रकट हुईं, जो कौशिकी कहलाईं और एक स्वरूप उज्जवल चंद्र के समान प्रकट हुआ, जो महागौरी कहलाईं। गौरी रूप में माता अपने हर भक्त का कल्याण करती हैं और उनको समस्याओं से मुक्त करती हैं। जो व्यक्ति किन्हीं कारणों से नौ दिन तक उपवास नहीं रख पाते हैं, उनके लिए नवरात्र में प्रतिपदा और अष्टमी तिथि को व्रत रखने का विधान है। इससे नौ दिन व्रत रखने के समान फल मिलता है। ऐसा है मां का स्वरूप देवीभागवत पुराण के अनुसार, महागौरी वर्ण पूर्ण रूप से गौर अर्थात सफेद हैं और इनके वस्त्र व आभूषण भी सफेद रंग के हैं। मां का वाहन वृषभ अर्थात बैल है। मां के दाहिना हाथ अभयमुद्रा में है और नीचे वाला हाथ में दुर्गा शक्ति का प्रतीक त्रिशुल है। महागौरी के बाएं हाथ के ऊपर वाले हाथ में शिव का प्रतीक डमरू है। डमरू धारण करने के कारण इन्हें शिवा भी कहा जाता है। मां के नीचे वाला हाथ अपने भक्तों को अभय देता हुआ वरमुद्रा में है। माता का यह रूप शांत मुद्रा में ही दृष्टिगत है। इनकी पूजा करने से सभी पापों का नष्ट होता है। भोग में मां को चढ़ाएं यह चीज देवीभागवत पुराण के अनुसार, नवरात्र की अष्टमी तिथि को मां को नारियल का भोग लगाने की पंरपरा है। भोग लगाने के बाद नारियल को या तो ब्राह्मण को दे दें अन्यथा प्रशाद रूप में वितरण कर दें। जो भक्त आज के दिन कन्या पूजन करते हैं, वह हलवा-पूड़ी, सब्जी और काले चने का प्रसाद विशेष रूप से बनाया जाता है। महागौरी को गायन और संगती अतिप्रिय है। भक्तों को पूजा करते समय गुलाबी रंग के वस्त्र पहनना चाहिए। गुलाबी रंग प्रेम का प्रतीक है। एक परिवार को प्रेम के धागों से ही गूथकर रखा जा सकता हैं, इसलिए नवरात्र की अष्टमी को गुलाबी रंग पहनना शुभ माना जाता है। मां का ध्यान मंत्र श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥ या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ पूजा करने से होती है सौभाग्य की प्राप्ति जो भक्त इस दिन कन्या पूजन करते हैं, वह माता को हलवा व चना के प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। इस दिन कन्याओं को घर पर बुलाकर उनके पैरों को धुलाकर मंत्र द्वारा पंचोपचार पूजन करना चाहिए। रोली-तिलक लगाकर और कलावा बांधकर सभी कन्याओं को हलाव, पूरी, सब्जी और चने का प्रशाद परोसें। इसके बाद उनसे आशीर्वाद लें और समार्थ्यनुसार कोई भेंट व दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। ऐसा करने से भक्त की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मां का यह रूप मोक्षदायी है इसलिए इनकी आराधना करने से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

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