श्रीकृष्णाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की 108 नामों की प्रशंसा करता है। इसे 11वीं शताब्दी के वैष्णव संत श्रीपदाचार्य ने रचा था। स्तोत्र में कृष्ण के विभिन्न रूपों और लीलाओं का वर्णन किया गया है।
स्तोत्र के पहले दो श्लोक इस प्रकार हैं:
Shrikrishnaashtottarashatanamastotram
श्रीकृष्णः कमलानाथो वासुदेवः सनातनः । वसुदेवात्मजः पुण्यो लीलामानुषविग्रहः ॥ १ ॥
श्रीवत्सकौस्तुभधरो यशोदावत्सलो हरिः । चतुर्भुजात्तचक्रासिगदाशङ्खाम्बुजायुधः ॥ २ ॥
अर्थ:
1. कृष्ण कमल के स्वामी, वासुदेव, सनातन हैं। वे वसुदेव के पुत्र, पुण्यात्मा और मानव रूप में लीला करने वाले हैं।
2. वे श्रीवत्स और कौस्तुभ धारण करने वाले, यशोदा के लाडले हरि हैं। उनके चार हाथों में चक्र, गदा, शंख और कमल हैं।
स्तोत्र कृष्ण की लीलाओं और गुणों की प्रशंसा करता है। यह उनके बालपन की लीलाओं, जैसे कि पूतना का वध, गोवर्धन पर्वत उठाना, और राधा के साथ प्रेम लीलाओं का वर्णन करता है। यह उनकी युद्ध कौशल, उनके ज्ञान और उनकी करुणा का भी वर्णन करता है।
श्रीकृष्णाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र एक लोकप्रिय स्तोत्र है जिसे अक्सर भक्ति अनुष्ठानों और पूजा में गाया जाता है। यह कृष्ण भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण पाठ है।
KARMASU