शिव भगवान

हेमबाहु प्रोक्ता महादेवस्तुतिः Hembahu prokta mahadevstutih

Hembahu prokta mahadevstutih हेमबाहुरुवाच – आदिकन्द नमस्तुभ्यं नमस्तेऽव्यक्तयोनये । कामचारणसिंहाय सर्वेप्सितप्रदाय च ॥ ४१॥ भक्तप्रिय नमस्तुभ्यं विष्णुचक्रप्रदाय च । त्रिपुरघ्न नमस्तेऽस्तु नानासुरवरप्रद ॥ ४२॥ नागार्जुनसहायस्त्वं काशीराजवरप्रद । विद्यागोप्ता लोकसाक्षी अन्धकदीपकेशरी ॥ ४३॥ ईश्वरप्रोक्तं सोमनाथमहिमवर्णनम् Ishwarproktam Somnathmahimavarnanam

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ईश्वरप्रोक्तं सोमनाथमहिमवर्णनम् Ishwarproktam Somnathmahimavarnanam

Ishwarproktam Somnathmahimavarnanam ईश्वरप्रोक्ता सोमनाथ महिमावर्णन सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित एक ज्योतिर्लिंग है। यह ज्योतिर्लिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, जिनमें महाभारत, रामायण, और पुराण शामिल हैं। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का निर्माण भगवान शिव ने स्वयं किया था। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना समुद्र के किनारे की थी। तब से लेकर आज तक इस ज्योतिर्लिंग की पूजा-अर्चना होती आ रही है। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को कई बार नष्ट कर दिया गया है, लेकिन हर बार इसे फिर से बनाया गया है। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1947 में किया गया था। ईश्वरप्रोक्ता सोमनाथ महिमावर्णन सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की महिमा का वर्णन ईश्वर ने स्वयं किया है। ईश्वर ने कहा है कि जो भक्त सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन करता है, उसे सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। उसे सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। ईश्वर ने कहा है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति के जीवन में समृद्धि, शांति, और सुख-समृद्धि आती है। वह सभी प्रकार के कष्टों और दुखों से मुक्त हो जाता है। Ishwarproktam Somnathmahimavarnanam सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के लाभ सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन के कई लाभ हैं। इन लाभों में शामिल हैं: सभी प्रकार के पापों से मुक्ति सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति समृद्धि, शांति, और सुख-समृद्धि सभी प्रकार के कष्टों और दुखों से मुक्ति सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन का समय सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन का सबसे अच्छा समय प्रातःकाल और संध्याकाल है। प्रातःकाल के समय सूर्योदय से पहले और संध्याकाल के समय सूर्यास्त के बाद ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन करना विशेष लाभदायक माना जाता है। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन के लिए कोई विशेष नियम नहीं है। कोई भी व्यक्ति ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन कर सकता है। ऋषि मङ्कणककृतं श्रीमहादेवस्तुतिः Rishigautamproktam mahadevbhaktyotkarshvarnanam

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ऋषि मङ्कणककृतं श्रीमहादेवस्तुतिः Rishigautamproktam mahadevbhaktyotkarshvarnanam

Rishigautamproktam mahadevbhaktyotkarshvarnanam घोरेण तपसा दानैः अभ्यस्तैर्विविधैरपि । भविष्यति महादेवे भक्तिरव्यभिचारिणी ॥ १॥ अभ्यस्तोद्धूलनेनापि यावज्जीवं प्रयत्नतः । भविष्यति महादेवे भक्तिरव्यभिचारिणी ॥ २॥ रुद्राक्षधारणाभ्यासाद्यावज्जीवं प्रयत्नतः । भविष्यति महादेवे भक्तिरव्यभिचारिणी ॥ ३॥ अन्नराशिप्रदानेन यावज्जीवं प्रयत्नतः । भविष्यति महादेवे भक्तिरव्यभिचारिणी ॥ ४ ऋषिगौतमप्रोक्तं महादेवेभक्त्योत्कर्षवर्णनम् Rishigautamproktam mahadevbhaktyotkarshvarnanam

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ऋषिगौतमप्रोक्तं महादेवेभक्त्योत्कर्षवर्णनम् Rishigautamproktam mahadevbhaktyotkarshvarnanam

Rishigautamproktam mahadevbhaktyotkarshvarnanam ऋषि गौतम द्वारा वर्णित महादेव भक्ति के उत्कर्ष का वर्णन इस प्रकार है: भक्त के मन में भगवान शिव की अनन्य भक्ति होती है। वह भगवान शिव को अपना सर्वस्व मानता है। वह भगवान शिव के बिना अपना जीवन व्यर्थ समझता है। वह भगवान शिव के दर्शन, पूजन, ध्यान, और भजन में अपना जीवन व्यतीत करता है। वह भगवान शिव के नाम और स्वरूप को अपने हृदय में धारण करता है। वह भगवान शिव के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखता है। भक्त के मन में भगवान शिव की भक्ति इतनी प्रबल होती है कि वह उनके लिए किसी भी प्रकार का कष्ट सहने को तैयार रहता है। वह भगवान शिव के लिए अपना धन, यश, और मान-सम्मान भी त्याग सकता है। वह भगवान शिव के लिए अपने प्राण भी दे सकता है। भक्त के जीवन में भगवान शिव की भक्ति के कारण अनेक चमत्कार होते हैं। वह भगवान शिव की कृपा से सभी प्रकार के दुखों और कष्टों से मुक्त हो जाता है। उसे सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। ऋषि गौतम ने महादेव भक्ति के उत्कर्ष का वर्णन करते हुए कहा है कि जो भक्त भगवान शिव की भक्ति में पूर्ण रूप से लीन हो जाता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। ऋषि गौतम ने महादेव भक्ति के उत्कर्ष के लिए कुछ उपाय भी बताए हैं। उन्होंने कहा है कि भक्त को चाहिए कि वह भगवान शिव की नियमित रूप से पूजा-अर्चना करे। वह भगवान शिव के नाम और स्वरूप का ध्यान करे। वह भगवान शिव के भजन और कीर्तन करे। वह भगवान शिव के व्रत और उपवास रखे। वह भगवान शिव के दर्शन के लिए तीर्थ यात्रा करे। ऋषि गौतम का मानना है कि जो भक्त इन उपायों का पालन करता है, उसे भगवान शिव की भक्ति में अवश्य सफलता मिलती है। चतुःषष्टिभैरवनामावलिः Chatuhshashtibhairavanaamaavaleeh

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चतुःषष्टिभैरवनामावलिः Chatuhshashtibhairavanaamaavaleeh

Chatuhshashtibhairavanaamaavaleeh असिताङ्गो विशालाक्षो मार्तण्डो मोदकप्रियः । स्वच्छन्दो विघ्नसन्तुष्टः खेचरः सचराचरः ॥ १॥ रुरुश्च क्रोड-दंष्ट्रश्च तथैव च जटाधरः । विश्वरूपो विरूपाक्षो नानारूपधरः परः ॥ २॥ वज्रहस्तो महाकायश्चण्डश्च प्रलयान्तकः । भूमिकम्पो नीलकण्ठो विष्णुश्च कुलपालकः ॥ ३॥ चन्द्रमौलीशस्तोत्रम् Chandramoulis Stotram

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चन्द्रमौलीशस्तोत्रम् Chandramoulis Stotram

Chandramoulis Stotram श्रीगणेशाय नमः । ओङ्कारजपरतानामोङ्कारार्थं मुदा विवृण्वानम् । ओजःप्रदं नतेभ्यस्तमहं प्रणमामि चद्रमौलीशम् ॥ १॥ नम्रसुरासुरनिकरं नलिनाहङ्कारहारिपदयुगलम् । नमदिष्टदानधीरं सततं प्रणमामि चन्द्रमौलीशम् ॥ २॥ मननाद्यत्पदयोः खलु महतीं सिद्धिं जवात्प्रपद्यन्ते । मन्देतरलक्ष्मीप्रदमनिशं प्रणमामि चद्रमौलीशम् ॥ ३॥ त्र्यक्षरीमृत्युञ्जयजपविधिः Tryakshrimrityunjayapavidhih

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त्र्यक्षरीमृत्युञ्जयजपविधिः Tryakshrimrityunjayapavidhih

Tryakshrimrityunjayapavidhih त्र्यक्ष्रीमृत्युंजय पाठ विधि उपकरण: रुद्राक्ष की माला शिवलिंग धूप दीप फूल जल विधि: सबसे पहले, एक पवित्र स्थान पर बैठें और शिवलिंग को सामने रखें। फिर, अपने हाथों को जोड़कर भगवान शिव का ध्यान करें। अब, रुद्राक्ष की माला से त्र्यक्ष्रीमृत्युंजय मंत्र का जाप करें। मंत्र का जाप करते समय, अपनी आंखें बंद रखें और भगवान शिव का ध्यान करें। मंत्र का जाप कम से कम 108 बार करें। मंत्र: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् | उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् || Tryakshrimrityunjayapavidhih अर्थ: हम सुगन्धित और पुष्टि प्रदान करने वाले त्रिनेत्र भगवान शिव की पूजा करते हैं। जैसे कि नारियल पानी से बँधा हुआ नारियल मृत्यु से मुक्त होकर जीवन प्राप्त करता है, वैसे ही मैं भी मृत्यु से मुक्त होकर अमरता प्राप्त करूं। लाभ: त्र्यक्ष्रीमृत्युंजय मंत्र का जाप करने से सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति मिलती है। यह मंत्र मृत्यु के भय को दूर करता है और मोक्ष की प्राप्ति में मदद करता है। यह मंत्र शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। विशेष ध्यान दें: त्र्यक्ष्रीमृत्युंजय मंत्र का जाप करते समय, शुद्ध मन और एकाग्रचित रहें। मंत्र का जाप नियमित रूप से करें, इससे आपको अधिक लाभ मिलेगा। त्र्यक्ष्रीमृत्युंजय मंत्र का जाप करने के कुछ अन्य लाभ: यह मंत्र धन-धान्य और समृद्धि को बढ़ाता है। यह मंत्र शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में मदद करता है। यह मंत्र ज्ञान और विवेक को बढ़ाता है। यह मंत्र मन को शांत और स्थिर करता है। यदि आप इन लाभों को प्राप्त करना चाहते हैं, तो त्र्यक्ष्रीमृत्युंजय मंत्र का जाप नियमित रूप से करें। देवैःकृता महाकालमहेश्वरस्तुतिः Devaihkrita mahakalmaheshwarstutih

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देवैःकृता महाकालमहेश्वरस्तुतिः Devaihkrita mahakalmaheshwarstutih

Devaihkrita mahakalmaheshwarstutih देवैः कृत्रिता महाकालमहादेवस्तुतिः श्रीगणेशाय नमः **नमो गिरिजापतिभ्यो नमो गिरिजापतिभ्यो नमो गिरिजापतिभ्यो नमो गिरिजापतिभ्यो॥ नमो देवायै नमः देवायै नमो देवायै नमः देवायै॥ नमो देवायै नमः देवायै नमो देवायै नमः देवायै॥ नमः शिवायै नमः शिवायै नमः शिवायै नमः शिवायै॥ नमः शिवायै नमः शिवायै नमः शिवायै नमः शिवायै॥ अर्थ: हे श्रीगणेश, आपको नमस्कार। हे गिरिजापति, आपको नमस्कार। हे देवताओ, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। Devaihkrita mahakalmaheshwarstutih हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। हे शिव, आपको नमस्कार। द्वादशज्योतिर्लिङ्गनामानि Dwadashjyotirlinganamani

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द्वादशज्योतिर्लिङ्गनामानि Dwadashjyotirlinganamani

द्वादशज्योतिर्लिंगानि भगवान शिव के द्वादश (बारह) प्रमुख रूपों को कहते हैं। इन ज्योतिर्लिंगों का वर्णन शिवपुराण के शिवमहात्म्य खंड में मिलता है। द्वादशज्योतिर्लिंगों के नाम और स्थान इस प्रकार हैं: सोमनाथ: गुजरात मल्लिकार्जुन: आन्ध्र प्रदेश महाकाल: उज्जैन, मध्य प्रदेश ओंकारेश्वर: मध्य प्रदेश वैद्यनाथ: झारखण्ड नागेश्वर: गुजरात रामेश्वरम: तमिलनाडु भुवनेश्वर: ओड़िशा केदारनाथ: उत्तराखण्ड त्र्यंबकेश्वर: महाराष्ट्र घृष्णेश्वर: महाराष्ट्र इन ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है। इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और पूजन से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। द्वादशज्योतिर्लिंगों के बारे में कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं: इन ज्योतिर्लिंगों में भगवान शिव स्वयं लिंग रूप में प्रकट हुए थे। इन ज्योतिर्लिंगों में भगवान शिव के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और पूजन से सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति मिलती है। द्वादशज्योतिर्लिंगों का भारत के विभिन्न राज्यों में स्थान है। इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और पूजन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। द्वादशज्योतिर्लिंगों के नाम और उनके महत्व सोमनाथ: भगवान शिव के चंद्रमौलेश्वर रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। मल्लिकार्जुन: भगवान शिव के मल्लिकार्जुन रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित है। महाकाल: भगवान शिव के महाकाल रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। ओंकारेश्वर: भगवान शिव के ओंकारेश्वर रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। वैद्यनाथ: भगवान शिव के वैद्यनाथ रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग झारखण्ड के देवघर जिले में स्थित है। नागेश्वर: भगवान शिव के नागेश्वर रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित है। रामेश्वरम: भगवान शिव के रामेश्वरम रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु के रामेश्वरम द्वीप पर स्थित है। भुवनेश्वर: भगवान शिव के भुवनेश्वर रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित है। केदारनाथ: भगवान शिव के केदारनाथ रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग उत्तराखण्ड के हिमालय पर्वतों में स्थित है। त्र्यंबकेश्वर: भगवान शिव के त्र्यंबकेश्वर रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नाशिक जिले में स्थित है। घृष्णेश्वर: भगवान शिव के घृष्णेश्वर रूप का प्रतीक है। यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित है। द्वादशज्योतिर्लिंगों के दर्शन और पूजन से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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द्वादशज्योतिर्लिङ्गानि Dvaadashajyotirlangaani

Dvaadashajyotirlangaani द्वादशज्योतिर्लिंगानि भगवान शिव के द्वादश (बारह) प्रमुख रूपों को कहते हैं। इन ज्योतिर्लिंगों का वर्णन शिवपुराण के शिवमहात्म्य खंड में मिलता है। द्वादशज्योतिर्लिंगों के नाम और स्थान इस प्रकार हैं: सोमनाथ: गुजरात मल्लिकार्जुन: आन्ध्र प्रदेश महाकाल: उज्जैन, मध्य प्रदेश ओंकारेश्वर: मध्य प्रदेश वैद्यनाथ: झारखण्ड नागेश्वर: गुजरात रामेश्वरम: तमिलनाडु भुवनेश्वर: ओड़िशा केदारनाथ: उत्तराखण्ड त्र्यंबकेश्वर: महाराष्ट्र घृष्णेश्वर: महाराष्ट्र Dvaadashajyotirlangaani द्वादशज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है। इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और पूजन से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। द्वादशज्योतिर्लिंगों के बारे में कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं: इन ज्योतिर्लिंगों में भगवान शिव स्वयं लिंग रूप में प्रकट हुए थे। इन ज्योतिर्लिंगों में भगवान शिव के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और पूजन से सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति मिलती है। द्वादशज्योतिर्लिंगों का भारत के विभिन्न राज्यों में स्थान है। इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और पूजन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। नववर्णमाला Navavarnamaala

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नववर्णमाला Navavarnamaala

Navavarnamaala नववर्णामाल एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के नौ रूपों की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों के लिए एक शक्तिशाली साधन है। नववर्णामाल की रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। यह स्तोत्र शिवपुराण के शिवमहात्म्य खंड में मिलता है। नववर्णामाल का पाठ इस प्रकार है: **ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय।। **शिव: शंकर: चंद्रशेखर: त्र्यंबक: विश्वेश्वर: सदाशिव: ईशान:।। **गौरीपति: भैरव: भव: कल्पनाथ: नीलकंठ:।। Navavarnamaala नववर्णामाल का अर्थ है: **”मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं।”** “मैं शिव को प्रणाम करता हूं, शंकर को प्रणाम करता हूं, चंद्रशेखर को प्रणाम करता हूं, त्र्यंबक को प्रणाम करता हूं, विश्वेश्वर को प्रणाम करता हूं।” “मैं सदाशिव को प्रणाम करता हूं, ईशान को प्रणाम करता हूं, गौरीपति को प्रणाम करता हूं, भैरव को प्रणाम करता हूं, भव को प्रणाम करता हूं, कल्पनाथ को प्रणाम करता हूं, नीलकंठ को प्रणाम करता हूं।” नववर्णामाल का जाप करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति भगवान शिव की कृपा प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति नववर्णामाल का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। नववर्णामाल एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो सभी भक्तों के लिए लाभदायक है। नववर्णामाल के नौ रूप शिव: भगवान शिव की प्रथम और प्रधान रूप है। वे सृष्टि के सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। शंकर: भगवान शिव की दूसरी रूप है। वे ज्ञान, दर्शन और तप की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। चंद्रशेखर: भगवान शिव की तीसरी रूप है। वे चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करते हैं। त्र्यंबक: भगवान शिव की चौथी रूप है। वे तीन नेत्रों वाले हैं। विश्वेश्वर: भगवान शिव की पांचवीं रूप है। वे समस्त विश्व के स्वामी हैं। सदाशिव: भगवान शिव की छठी रूप है। वे सदा आनंदित रहने वाले हैं। ईशान: भगवान शिव की सातवीं रूप है। वे समस्त विश्व के अधिपति हैं। गौरीपति: भगवान शिव की आठवीं रूप है। वे माता पार्वती के पति हैं। भैरव: भगवान शिव की नौवीं रूप है। वे भय का नाश करने वाले हैं। परमेश्वरस्तोत्रम् Parameshwar Stotram

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परमेश्वरस्तोत्रम् Parameshwar Stotram

Parameshwar Stotram परमेश्वर स्तोत्र एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों के लिए एक शक्तिशाली साधन है। परमेश्वर स्तोत्र की रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। यह स्तोत्र शिवपुराण के शिवमहात्म्य खंड में मिलता है। परमेश्वर स्तोत्र का पाठ इस प्रकार है: **परमेश्वर जगदीश सुधीश भवेश विभो परात्पर पूत पित: भवानीपति:। प्रणतं पतितं हतबुद्धिबलं जनतारण तारय तापितकम्॥1॥ **गुणहीनसुदीनमलीनमतिं त्वयि पातरि दातरि चापरतिम्। तमसा रजसावृतवृत्तिमिमं मरुघोरभूवीह सुवीहमहो॥2॥ **भववारण कारण कर्मततौ भवसिन्धुजले शिव मग्नमत:। करुणाञ्च सम‌र्प्य तरिं त्वरितं अतिनाश्य जनुर्मम पुण्यरुचे॥3॥ **दुरितौघभरै: परिपूर्णभुव: सुजघन्यमगण्यमपुण्यरुचिं। भवकारक नारकहारक हे भवतारक पातकदारक हे॥4॥ **तृषितश्चिरमस्मि सुधां हित मे- च्युत चिन्मय देहि वदान्यवर। अतिमोहवशेन विनष्टकृतं प्रणमामि नमामि नमामि भवं॥5॥ Parameshwar Stotram परमेश्वर स्तोत्र का अर्थ है: “हे परम ईश्वर, हे जगदीश, हे सुधीश, हे भवेश, हे विभो, हे परात्पर, हे पूत, हे पित, हे भवानीपति। मैं आपकी शरण में आता हूं। मैं एक पतित हूं, मेरा बुद्धिबल नष्ट हो गया है। मैं जनतारण हूं, मैं तापित हूं।” “हे भगवान, मैं गुणहीन, सुधीन, मलीन बुद्धि वाला हूं। मैं आपके पातरि, दातारि में अपरति हूं। मैं तमसा और रजसा से आच्छादित हूं। मैं मरुघोर भूवी पर सुवीह हूं।” “हे भगवान, मैं कर्मततौ के कारण भवसिन्धुजले में शिव मग्न हूं। मुझे करुणा का समर्पण कर जल्दी से तरी। मैं तुम्हारा पुण्य रुचि हूं।” “हे भगवान, मैं दुरितौघभरै: से परिपूर्ण भूव हूं। मैं सुजघन्य, अमण्य, अपुण्य रुचि हूं। मैं भवकारक, नारकहारक, हे भवतारक, पातकदारक हूं।” “हे भगवान, मैं चिरकाल से सुधा का प्यासा हूं। मुझे चिन्मय देहि, वदान्यवर। मैं अतिमोहवशेन विनष्टकृत हूं। मैं आपको प्रणाम करता हूं, मैं आपको प्रणाम करता हूं, मैं आपको प्रणाम करता हूं।” परमेश्वर स्तोत्र का जाप करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति भगवान शिव की कृपा प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति परमेश्वर स्तोत्र का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। परमेश्वर स्तोत्र एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो सभी भक्तों के लिए लाभदायक है। पारायणोपनिषत् Parayanopanishat

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