शिव भगवान

पारायणोपनिषत् Parayanopanishat

Parayanopanishat परायणोपनिषद् एक छोटा उपनिषद है जो ऋग्वेद से संबंधित है। यह उपनिषद् केवल 24 श्लोकों का है और इसमें आत्मज्ञान प्राप्ति के लिए परायण की विधि का वर्णन किया गया है। परायण का अर्थ है आत्म-समर्पण। इस उपनिषद् के अनुसार, आत्मज्ञान प्राप्ति के लिए सबसे पहले आत्म-समर्पण करना आवश्यक है। जब हम अपने आप को ईश्वर को समर्पित कर देते हैं, तो ईश्वर हमें अपना ज्ञान प्रदान करते हैं। परायणोपनिषद् में आत्म-समर्पण की विधि इस प्रकार बताई गई है: सर्वप्रथम, हमें ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति विकसित करनी चाहिए। फिर, हमें ईश्वर को अपना सर्वस्व समर्पित करना चाहिए। अंत में, हमें ईश्वर के प्रति पूर्ण निष्ठा और भरोसा रखना चाहिए। Parayanopanishat परायणोपनिषद् के अनुसार, जब हम इन तीन बातों का पालन करते हैं, तो हम आत्मज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। परायणोपनिषद् का सार इस प्रकार है: आत्मज्ञान प्राप्ति के लिए आत्म-समर्पण आवश्यक है। आत्म-समर्पण के लिए प्रेम, भक्ति, समर्पण और निष्ठा आवश्यक है। परायणोपनिषद् एक शक्तिशाली उपनिषद है जो आत्मज्ञान प्राप्ति के लिए एक सरल और प्रभावी मार्ग प्रदान करता है। पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् Paarvateevallabhaneelakanthaashtakam

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पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् Paarvateevallabhaneelakanthaashtakam

Paarvateevallabhaneelakanthaashtakam पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के नीलकण्ठ रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों के लिए एक शक्तिशाली साधन है। पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् की रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। यह स्तोत्र शिवपुराण के शिवमहात्म्य खंड में मिलता है। पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् का पाठ इस प्रकार है: **नमस्ते नीलकण्ठाय नमस्ते शिवाय नमस्ते भवभंजनं नमस्ते सर्वशक्तिमते।। **नमस्ते गुणनिधानाय नमस्ते सर्वज्ञाय नमस्ते सर्वभूतहिताय नमस्ते सर्वकामार्थसिद्धिद।। **नमस्ते भक्तवत्सलाय नमस्ते त्रिनेत्राय नमस्ते शूलपाणये नमस्ते सर्वदुःखहर।। **नमस्ते कल्पवृक्षाय नमस्ते कल्पद्रुमाय नमस्ते कल्पलताय नमस्ते सर्वकामार्थसिद्धिद।। Paarvateevallabhaneelakanthaashtakam पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् का अर्थ है: **”मैं आपको नीलकण्ठ को प्रणाम करता हूं। मैं आपको शिव को प्रणाम करता हूं। मैं आपको भव भंजन को प्रणाम करता हूं। मैं आपको सर्वशक्तिमान को प्रणाम करता हूं।”** **”मैं आपको गुणों के भंडार को प्रणाम करता हूं। मैं आपको सर्वज्ञ को प्रणाम करता हूं। मैं आपको समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए प्रणाम करता हूं। मैं आपको सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले को प्रणाम करता हूं।”** **”मैं आपको भक्तों के प्रिय को प्रणाम करता हूं। मैं आपको तीन नेत्रों वाले को प्रणाम करता हूं। मैं आपको त्रिशूल धारी को प्रणाम करता हूं। मैं आपको सभी दुखों को दूर करने वाले को प्रणाम करता हूं।”** **”मैं आपको कल्पवृक्ष को प्रणाम करता हूं। मैं आपको कल्पद्रुम को प्रणाम करता हूं। मैं आपको कल्पलता को प्रणाम करता हूं। मैं आपको सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले को प्रणाम करता हूं।”** पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् का जाप करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति भगवान शिव की कृपा प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् एक शक्तिशाली साधन है जो सभी भक्तों के लिए लाभदायक है।

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बहुरूपगर्भस्तोत्रध्यानम् श्रीस्वच्छन्दभैरवरूपानुस्मरणम् Bahuroopagarbhastotradhyaanam shreesvachchhandabhairavaroopaanusmaranam

Bahuroopagarbhastotradhyaanam shreesvachchhandabhairavaroopaanusmaranam बहुरूपगर्भस्तोत्रध्यानम श्रीस्वच्छंदभैरवरूपानुस्मरणम् बहुरूपगर्भस्तोत्र एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के भैरव रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों के लिए एक शक्तिशाली साधन है। बहुरूपगर्भस्तोत्र की रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। यह स्तोत्र शिवपुराण के शिवमहात्म्य खंड में मिलता है। बहुरूपगर्भस्तोत्र का पाठ इस प्रकार है: **ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय।। **त्रिनेत्रं चतुर्भुजं त्रिशूलधारिं शंकरम् जगत्पालकं देवं त्रिलोकनाथं शिवम्।। **भैरवं भयहरं सर्वपापहरं देवं सर्वव्यापिं सर्वज्ञं सर्वकामार्थसिद्धिदम्।। **भैरवं सर्वभूतहिताय सर्वदुःखहरं देवं सर्वकामार्थसिद्धिदं नमस्ते भैरवाय।। **भैरवं भवभंजनं सर्वपापहरं देवं सर्वव्यापिं सर्वज्ञं सर्वकामार्थसिद्धिदम्।। Bahuroopagarbhastotradhyaanam shreesvachchhandabhairavaroopaanusmaranam बहुरूपगर्भस्तोत्र का अर्थ है: **”मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं।”** “मैं तीन नेत्रों वाले, चार भुजाओं वाले, त्रिशूलधारी भगवान शंकर को प्रणाम करता हूं। मैं जगत् पालक भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं त्रिलोक नाथ भगवान शिव को प्रणाम करता हूं।” “मैं भैरव को प्रणाम करता हूं, जो भय का नाश करने वाले हैं, सभी पापों का नाश करने वाले देवता हैं, सर्वव्यापी हैं, सर्वज्ञ हैं, और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।” “मैं भैरव को प्रणाम करता हूं, जो समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए हैं, सभी दुखों का नाश करने वाले देवता हैं, और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।” “मैं भैरव को प्रणाम करता हूं, जो भव भंजन हैं, सभी पापों का नाश करने वाले देवता हैं, सर्वव्यापी हैं, सर्वज्ञ हैं, और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।” बहुरूपगर्भस्तोत्रध्यानम श्रीस्वच्छंदभैरवरूपानुस्मरणम् का अर्थ है कि बहुरूपगर्भस्तोत्र का ध्यान करना श्रीस्वच्छंदभैरव रूप का अनुस्मरण करना है। श्रीस्वच्छंदभैरव भगवान शिव के भैरव रूपों में से एक हैं। वे सभी भय का नाश करने वाले हैं, सभी पापों का नाश करने वाले हैं, सर्वव्यापी हैं, सर्वज्ञ हैं, और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। बहुरूपगर्भस्तोत्र का ध्यान करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति भगवान शिव की कृपा प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति बहुरूपगर्भस्तोत्र का ध्यान करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का ध्यान एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का ध्यान करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का ध्यान एकाग्रचित होकर करें। बहुरूपगर्भस्तोत्र एक शक्तिशाली साधन है जो सभी भक्तों के लिए लाभदायक है। बिल्ववृक्षमहिम्नवर्णनम् Bilvavrukshamhimnavarnanam

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बाणेश्वर अथवा संसारपावनकवचं ब्रह्मवैवर्त पुराणान्तर्गतम् Baneshwar or Sansarpaavanakavachan Brahmavaivarta Puranantargatam S

Baneshwar or Sansarpaavanakavachan Brahmavaivarta Puranantargatam बाणेश्वर और संसर्पावानाका वचन ब्रह्मवैवर्त पुराणांतर्गत हैं। बाणेश्वर एक महान ऋषि थे, जिन्होंने भगवान विष्णु की भक्ति की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं। बाणेश्वर ने भगवान विष्णु से कहा कि वे एक सांप के रूप में प्रकट हों, ताकि वे सभी जीवों को बचा सकें। भगवान विष्णु ने उनकी बात मान ली और उन्हें संसर्पावानाका नामक एक सांप के रूप में प्रकट हुए। संसर्पावानाका सांप सभी जीवों की रक्षा करता था। एक बार, जब एक भयंकर अग्नि का प्रकोप हुआ, तो संसर्पावानाका सांप ने अपने शरीर से एक जलप्रपात बनाया और सभी जीवों को बचा लिया। बाणेश्वर और संसर्पावानाका का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के एकादश स्कंध में मिलता है। इस स्कंध में, भगवान विष्णु के अवतारों का वर्णन किया गया है। बाणेश्वर और संसर्पावानाका को भगवान विष्णु के अवतारों में से एक माना जाता है। बाणेश्वर और संसर्पावानाका की कथा हमें यह सिखाती है कि हमें सभी जीवों के प्रति दयालु होना चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए। बिल्ववृक्षमहिम्नवर्णनम् Bilvavrukshamhimnavarnanam

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बिल्ववृक्षमहिम्नवर्णनम् Bilvavrukshamhimnavarnanam

Bilvavrukshamhimnavarnanam बिल्ववृक्ष महिम्नवर्णनम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो बिल्ववृक्ष की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों के लिए एक शक्तिशाली साधन है। बिल्ववृक्ष महिम्नवर्णनम् की रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। यह स्तोत्र शिवपुराण के शिवमहात्म्य खंड में मिलता है। बिल्ववृक्ष महिम्नवर्णनम् का पाठ इस प्रकार है: **ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय।। **बिल्ववृक्षं त्रिदलं शिवरूपं नमस्कृत्य शिवपूजनं कुर्याद् सर्वपापनाशनम्।। **बिल्ववृक्षं शिवालयं शिवरूपं नमस्कृत्य शिवपूजनं कुर्याद् सर्वपापनाशनम्।। **बिल्ववृक्षं शिवलिंगं शिवरूपं नमस्कृत्य शिवपूजनं कुर्याद् सर्वपापनाशनम्।। बिल्ववृक्ष महिम्नवर्णनम् का अर्थ है: **”मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं।”** Bilvavrukshamhimnavarnanam “मैं तीन पत्तियों वाले बिल्ववृक्ष को प्रणाम करता हूं, जो भगवान शिव का रूप है। इस प्रकार बिल्ववृक्ष की पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है।” “मैं बिल्ववृक्ष को शिवालय मानता हूं, जो भगवान शिव का रूप है। इस प्रकार बिल्ववृक्ष की पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है।” “मैं बिल्ववृक्ष को शिवलिंग मानता हूं, जो भगवान शिव का रूप है। इस प्रकार बिल्ववृक्ष की पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है।” बिल्ववृक्ष महिम्नवर्णनम् का जाप करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति भगवान शिव की कृपा प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति बिल्ववृक्ष महिम्नवर्णनम् का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। बिल्ववृक्ष महिम्नवर्णनम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो सभी भक्तों के लिए लाभदायक है। बिल्ववृक्ष को भगवान शिव का सबसे प्रिय वृक्ष माना जाता है। भगवान शिव को बिल्वपत्र अर्पित करने से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। बिल्ववृक्ष की पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। भक्तशरणस्तोत्रम् Bhaktasharanstotram

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भक्तशरणस्तोत्रम् Bhaktasharanstotram

 Bhaktasharanstotram भक्तशरणस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के भक्तों की रक्षा और मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों के लिए एक शक्तिशाली साधन है। भक्तशरणस्तोत्रम् की रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। यह स्तोत्र पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में मिलता है। भक्तशरणस्तोत्रम् का पाठ इस प्रकार है: **भक्तशरणं त्वं शिव भवान् सर्वपापहरं सर्वज्ञम्। सर्वलोकनाथं सर्वगुणोपेतम् सर्वभूतहिताय शरणं प्रपद्ये।।** **त्वमेव ज्ञाता त्वमेव कर्ता त्वमेव त्वं भक्तानां शरणम्। त्वमेव ज्ञाता त्वमेव कर्ता त्वमेव त्वं भक्तानां शरणम्।।** **त्वमेव ज्ञाता त्वमेव कर्ता त्वमेव त्वं भक्तानां शरणम्। त्वमेव ज्ञाता त्वमेव कर्ता त्वमेव त्वं भक्तानां शरणम्।।** भक्तशरणस्तोत्रम् का अर्थ है: Bhaktasharanstotram “हे भगवान शिव, आप भक्तों की रक्षा करने वाले हैं, आप सभी पापों का नाश करने वाले हैं, आप सर्वज्ञ हैं। आप तीनों लोकों के नाथ हैं, आप सभी गुणों से युक्त हैं, आप समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए हैं। मैं आपकी शरण में आता हूं।” “आप ही भक्तों के ज्ञाता हैं, आप ही भक्तों के कर्ता हैं, आप ही भक्तों की शरण हैं। आप ही भक्तों के ज्ञाता हैं, आप ही भक्तों के कर्ता हैं, आप ही भक्तों की शरण हैं।” “आप ही भक्तों के ज्ञाता हैं, आप ही भक्तों के कर्ता हैं, आप ही भक्तों की शरण हैं। आप ही भक्तों के ज्ञाता हैं, आप ही भक्तों के कर्ता हैं, आप ही भक्तों की शरण हैं।” भक्तशरणस्तोत्रम् का जाप करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति भगवान शिव की कृपा प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति भक्तशरणस्तोत्रम् का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। भक्तशरणस्तोत्रम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो सभी भक्तों के लिए लाभदायक है। भजामि शैलसुतारमणम् Bhajaami Shailsutharamanam

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भजामि शैलसुतारमणम् Bhajaami Shailsutharamanam

Bhajaami Shailsutharamanam भजै शैलसुतारमं एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों के लिए एक शक्तिशाली साधन है। भजै शैलसुतारमं की रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। यह स्तोत्र पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में मिलता है। भजै शैलसुतारमं का पाठ इस प्रकार है: **भजै शैलसुतारमं त्रिशूलधारिं शंकरम् जगत्पालकं देवं त्रिलोकनाथं शिवम्।। **भजै भवभंजनं सर्वपापहरं सर्वव्यापिं सर्वज्ञं सर्वकामार्थसिद्धिदम्।। **भजै शंकरं देवं सर्वगुणोपेतम् सर्वलोकनाथं देवं सर्वभूतहिताय।। **भजै शिवं शंकरं भवभयहरं सर्वपापहरं देवं सर्वकामार्थसिद्धिदम्।। Bhajaami Shailsutharamanam भजै शैलसुतारमं का अर्थ है: **”मैं शैल पुत्र भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं त्रिशूल धारी भगवान शंकर की भक्ति करता हूं। मैं जगत् पालक भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं त्रिलोक नाथ भगवान शिव की भक्ति करता हूं।”** **”मैं भव भंजन भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं सभी पापों का नाश करने वाले भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं सर्वव्यापी और सर्वज्ञ भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले भगवान शिव की भक्ति करता हूं।”** **”मैं भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं सभी गुणों से युक्त भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं त्रिलोक नाथ भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए भगवान शिव की भक्ति करता हूं।”** **”मैं भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं भव भय का नाश करने वाले भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं सभी पापों का नाश करने वाले भगवान शिव की भक्ति करता हूं। मैं सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले भगवान शिव की भक्ति करता हूं।”** भजै शैलसुतारमं का जाप करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करना मोक्ष की प्राप्ति भजै शैलसुतारमं का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। भजै शैलसुतारमं एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो सभी भक्तों के लिए लाभदायक है। भवभञ्जनस्तोत्रम् Bhavabhanjanastotram

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भवभञ्जनस्तोत्रम् Bhavabhanjanastotram

Bhavabhanjanastotram भवभंजनस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों के लिए एक शक्तिशाली साधन है। भवभंजनस्तोत्रम् की रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। यह स्तोत्र पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में मिलता है। भवभंजनस्तोत्रम् का पाठ इस प्रकार है: **ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय।। **अविनाशि त्वं शंभो त्रिलोकीनाथो भवान् सर्वशक्तिमानो देव भवभंजन श्रीशंभो।। **सर्वपापहर्ता त्वं सर्वव्यापी सर्वज्ञ सर्वदुःखहर्ता त्वं सर्वकामार्थसिद्धिद।। **नमो नमो शिवाय भवभंजन श्रीशंभो सर्वपापहर्ता त्वं सर्वव्यापी सर्वज्ञ।। **नमो नमो शिवाय भवभंजन श्रीशंभो सर्वदुःखहर्ता त्वं सर्वकामार्थसिद्धिद।। भवभंजनस्तोत्रम् का अर्थ है: **”मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं।”** Bhavabhanjanastotram “हे भगवान शिव, आप अविनाशी हैं, आप तीनों लोकों के स्वामी हैं, आप सर्वशक्तिमान हैं, आप भवभंजन श्रीशंभो हैं।” “आप सभी पापों का नाश करते हैं, आप सर्वव्यापी हैं, आप सर्वज्ञ हैं, आप सभी दुखों का नाश करते हैं, आप सभी कामनाओं को पूर्ण करते हैं।” “मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं, भवभंजन श्रीशंभो। आप सभी पापों का नाश करते हैं, आप सर्वव्यापी हैं, आप सर्वज्ञ हैं।” “मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं, भवभंजन श्रीशंभो। आप सभी दुखों का नाश करते हैं, आप सभी कामनाओं को पूर्ण करते हैं।” भवभंजनस्तोत्रम् का जाप करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करना मोक्ष की प्राप्ति भवभंजनस्तोत्रम् का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। भवभंजनस्तोत्रम् का जाप करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें: एक आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं। भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें। स्तोत्र का जाप शुरू करें। स्तोत्र का जाप 108 बार या अपनी सुविधानुसार करें। स्तोत्र का जाप करने के बाद, भगवान शिव को धन्यवाद दें। भवभंजनस्तोत्रम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो सभी भक्तों के लिए लाभदायक है। मन्त्रराजशतनामावलिः Mantrarajashatnamavalih

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मन्त्रराजशतनामावलिः Mantrarajashatnamavalih

Mantrarajashatnamavalih मंत्रराजशतनामावली एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के 100 नामों का वर्णन करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव की महिमा और शक्तियों को दर्शाता है। मंत्रराजशतनामावली की रचना ऋषि वेदव्यास ने की थी। यह स्तोत्र शिवपुराण के शिवमहात्म्य खंड में मिलता है। मंत्रराजशतनामावली का पाठ इस प्रकार है: **ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय।। **अकाशात्मने नमः भूतात्मने नमः पातालेश्वराय नमः।। **वसुधाधिपतये नमः नीललोहिताय नमः त्र्यंबकाय नमः।। **नारायणाय नमः वासुदेवाय नमः हरये नमः।। **कृष्णाय नमः गोविंदाय नमः माधवाय नमः।। … **सर्वेश्वराय नमः सर्वभूतहिताय नमः सर्वसिद्धिप्रदाय नमः।। **शांतिस्वरूपाय नमः सर्वपापनाशकाय नमः सर्वकामप्रदाय नमः।। **ॐ नमः शिवाय।। मंत्रराजशतनामावली का अर्थ है: Mantrarajashatnamavalih **”मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं। मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं।”** **”मैं आकाश के स्वामी को प्रणाम करता हूं। मैं भूत के स्वामी को प्रणाम करता हूं। मैं पाताल के स्वामी को प्रणाम करता हूं।”** **”मैं पृथ्वी के स्वामी को प्रणाम करता हूं। मैं नीले और लाल रंग वाले को प्रणाम करता हूं। मैं तीन नेत्रों वाले को प्रणाम करता हूं।”** **”मैं नारायण को प्रणाम करता हूं। मैं वासुदेव को प्रणाम करता हूं। मैं हरि को प्रणाम करता हूं।”** **”मैं कृष्ण को प्रणाम करता हूं। मैं गोविंद को प्रणाम करता हूं। मैं माधव को प्रणाम करता हूं।”** … **”मैं समस्त विश्व के स्वामी को प्रणाम करता हूं। मैं समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए कार्य करने वाले को प्रणाम करता हूं। मैं समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाले को प्रणाम करता हूं।”** **”मैं शांति के रूप को प्रणाम करता हूं। मैं समस्त पापों का नाश करने वाले को प्रणाम करता हूं। मैं समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले को प्रणाम करता हूं।”** “मैं भगवान शिव को प्रणाम करता हूं।” मंत्रराजशतनामावली का जाप करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करना मोक्ष की प्राप्ति मंत्रराजशतनामावली का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। मंत्रराजशतनामावली का जाप करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें: एक आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं। भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें। स्तोत्र का जाप शुरू करें। स्तोत्र का जाप 108 बार या अपनी सुविधानुसार करें। स्तोत्र का जाप करने के बाद, भगवान शिव को धन्यवाद दें। मंत्रराजशतनामावली एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो सभी मृत्युञ्जयगर्भितस्तोत्रम् Mrityunjaygarbhitastotram

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मृत्युञ्जयगर्भितस्तोत्रम् Mrityunjaygarbhitastotram

Mrityunjaygarbhitastotram मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र मृत्युंजय स्तोत्र के आधार पर रचित है, लेकिन इसमें कुछ अतिरिक्त मंत्रों को शामिल किया गया है। मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् की रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। यह स्तोत्र पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में मिलता है। मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् का पाठ इस प्रकार है: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।। ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय।। अमृतं तत्त्वं शिवम् सर्वभूतशरीरम। सर्वव्यापी शिवस्य नास्ति विना शिवोऽस्ति।। सर्वप्राणिनां नाथो सर्वदेवानामपि। सर्वज्ञानमयः शिवः सर्वशक्तिमयः शिवः।। सर्वत्र शिवो भासते सर्वत्र शिवो निवासते। सर्वत्र शिवो रमते सर्वत्र शिवो भवति।। ॐ शांते शांते शांते।। मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् का अर्थ है: “हम तीन नेत्र वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंधित और पोषक हैं। जैसे ककड़ी की डंठल से बंधे हुए ककड़ी का फल बंधन से मुक्त हो जाता है, वैसे ही हम मृत्यु से मुक्त हो जाएं, लेकिन अमरता न प्राप्त करें।” “हम भगवान शिव को प्रणाम करते हैं। भगवान शिव ही अमृत हैं, वे ही समस्त प्राणियों के शरीर हैं। वे ही सर्वव्यापी हैं, उनसे परे कोई नहीं है।” “वे ही समस्त प्राणियों के नाथ हैं, वे ही समस्त देवताओं के भी नाथ हैं। वे ही सर्वज्ञानमय हैं, वे ही सर्वशक्तिमय हैं।” “वे ही सर्वत्र विद्यमान हैं, वे ही सर्वत्र निवास करते हैं। वे ही सर्वत्र रमते हैं, वे ही सर्वत्र बन जाते हैं।” “ॐ शांति, शांति, शांति।” Mrityunjaygarbhitastotram मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् का जाप करने से भी कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करना मोक्ष की प्राप्ति मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् का जाप करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें: एक आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं। भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें। स्तोत्र का जाप शुरू करें। स्तोत्र का जाप 108 बार या अपनी सुविधानुसार करें। स्तोत्र का जाप करने के बाद, भगवान शिव को धन्यवाद दें। मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो सभी भक्तों के लिए लाभदायक है। मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् और मृत्युंजय स्तोत्र में मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं: मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् में मृत्युंजय स्तोत्र के अतिरिक्त कुछ अतिरिक्त मंत्र शामिल हैं। मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् में भगवान शिव की महिमा का और अधिक विस्तार से वर्णन किया गया है। मृत्युंजयगर्भितस्तोत्रम् का जाप करने से भी मृत्युंजय स्तोत्र का जाप करने से प्राप्त होने वाले सभी लाभ प्राप्त होते हैं। मृत्युञ्जयस्तोत्रम् Mrityunjay Stotram

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मृत्युञ्जयस्तोत्रम् Mrityunjay Stotram

Mrityunjay Stotram मृत्युंजय स्तोत्र एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से मृत्यु का भय दूर होता है और व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा और साहस का संचार होता है। मृत्युंजय स्तोत्र की रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। यह स्तोत्र पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में मिलता है। मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ इस प्रकार है: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।। ॐ शांते शांते शांते। मृत्युंजय स्तोत्र का अर्थ है: “हम तीन नेत्र वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंधित और पोषक हैं। जैसे ककड़ी की डंठल से बंधे हुए ककड़ी का फल बंधन से मुक्त हो जाता है, वैसे ही हम मृत्यु से मुक्त हो जाएं, लेकिन अमरता न प्राप्त करें।” मृत्युंजय स्तोत्र का जाप करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करना मोक्ष की प्राप्ति Mrityunjay Stotram मृत्युंजय स्तोत्र का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। मृत्युंजय स्तोत्र का जाप करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें: एक आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं। भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें। स्तोत्र का जाप शुरू करें। स्तोत्र का जाप 108 बार या अपनी सुविधानुसार करें। स्तोत्र का जाप करने के बाद, भगवान शिव को धन्यवाद दें। मृत्युंजय स्तोत्र का जाप करने से पहले किसी योग्य गुरु से मंत्र दीक्षा प्राप्त करना उचित है। मृत्युंजय स्तोत्र एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो सभी भक्तों के लिए लाभदायक है। विष्णुस्तुतिः vishnustutih

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वीरभद्राष्टोत्तरशतनामावलिः Veerbhadrashottarashatanamavalih

Veerbhadrashottarashatanamavalih वीरभद्रषोत्तरशातनामावली एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के गण वीरभद्र की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 100 नामों का एक संग्रह है जो वीरभद्र के गुणों और शक्तियों को दर्शाता है। वीरभद्रषोत्तरशातनामावली का अर्थ है: “वीरभद्र के बाद के सौ नामों का हार” वीरभद्रषोत्तरशातनामावली का पाठ इस प्रकार है: वीरभद्राय नमः वीरभद्राय नमः वीरभद्राय नमः … शत्रुघातकाय नमः जगद्विजयाय नमः धर्मपालकाय नमः वीरभद्रषोत्तरशातनामावली का जाप करने से कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: सभी प्रकार के भय और परेशानियों से मुक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्ति सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करना मोक्ष की प्राप्ति वीरभद्रषोत्तरशातनामावली का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: स्तोत्र का जाप एक पवित्र स्थान पर करें। स्तोत्र का जाप करते समय शुद्ध रहें। स्तोत्र का जाप एकाग्रचित होकर करें। वीरभद्रषोत्तरशातनामावली का जाप करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें: Veerbhadrashottarashatanamavalih एक आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं। भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें। स्तोत्र का जाप शुरू करें। स्तोत्र का जाप 108 बार या अपनी सुविधानुसार करें। स्तोत्र का जाप करने के बाद, भगवान शिव को धन्यवाद दें। वीरभद्रषोत्तरशातनामावली का जाप करने से पहले किसी योग्य गुरु से मंत्र दीक्षा प्राप्त करना उचित है। वीरभद्रषोत्तरशातनामावली का कुछ भाग हिंदी में अनुवादित इस प्रकार है: “मैं वीरभद्र को प्रणाम करता हूं। मैं वीरभद्र को प्रणाम करता हूं। मैं वीरभद्र को प्रणाम करता हूं।” … “मैं शत्रुओं का नाश करने वाले को प्रणाम करता हूं। मैं जगत् के विजेता को प्रणाम करता हूं। मैं धर्म की रक्षा करने वाले को प्रणाम करता हूं।” यह स्तोत्र भगवान शिव के गण वीरभद्र की महिमा का वर्णन करता है और उनकी कृपा पाने के लिए प्रार्थना करता है। यह स्तोत्र सभी भक्तों के लिए लाभदायक है। वेणुगोपालस्तोत्रम् venugopaalastotram

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