शिव भगवान

शिवाष्टकम् ४ Shivashtakam 4

Shivashtakam 4 शिवष्टकम श्लोक 4 लम्बत्सपिङ्गलजटामुकुटोत्कटाय। दंष्ट्राकरालविकटोत्कटभैरवाय। व्याघ्राजिनाम्बरधराय मनोहराय। त्रैलोक्यनाथनमिताय नमः शिवाय॥ अर्थ जिनके लंबे और लाल जटाओं से मुकुट बना है, जिनके दांत नुकीले और भयानक हैं, जो व्याघ्रचर्म का वस्त्र धारण करते हैं और मनोहर हैं, उन त्रैलोक्यनाथ शिव को मैं नमस्कार करता हूँ। Shivashtakam 4 व्याख्या इस श्लोक में शिव भगवान के भैरव रूप की स्तुति की गई है। भैरव भगवान शिव के ही एक रूप हैं, जो अत्यंत भयंकर और शक्तिशाली हैं। वे सभी दुष्टों का नाश करने वाले हैं। इस श्लोक में शिव भगवान के लंबे और लाल जटाओं से बने मुकुट का वर्णन किया गया है। यह मुकुट उनकी अद्भुत शक्ति और महिमा का प्रतीक है। इस श्लोक में शिव भगवान के नुकीले और भयानक दांतों का वर्णन किया गया है। ये दांत उनके क्रोध और उग्रता का प्रतीक हैं। इस श्लोक में शिव भगवान के व्याघ्रचर्म के वस्त्र का वर्णन किया गया है। यह वस्त्र उनकी शक्ति और साहस का प्रतीक है। इस श्लोक में शिव भगवान के मनोहर रूप का वर्णन किया गया है। यह रूप उनकी करुणा और दया का प्रतीक है। इस श्लोक में शिव भगवान को त्रैलोक्यनाथ कहा गया है। इसका अर्थ है कि वे तीनों लोकों के स्वामी हैं। शिवाष्टकम् अगस्त्यकृत अथवा अगस्य्ताष्टकम् Shivashtakam Agastyakrit or Agastyashtakam

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शिवाष्टकम् अगस्त्यकृत अथवा अगस्य्ताष्टकम् Shivashtakam Agastyakrit or Agastyashtakam

Shivashtakam Agastyakrit or Agastyashtakam शिवष्टकम् अगस्त्यकृतम् या अगस्त्यष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र ऋषि अगस्त्य द्वारा रचित है। शिवष्टकम् अगस्त्यकृतम् इस प्रकार है: श्रीगणेशाय नमः श्रीशिवाय नमः ओं नमः शिवाय अर्थ: हे गणेश, हे शिव, हे नमस्कार हे शिव, हे नमस्कार ओम, हे शिव, हे नमस्कार नीलकंठं गंगाधरं चंद्रशेखरं भस्मधारि त्रिशूलधारिं शरभारुढं भक्तवत्सलं शिवम् भक्तार्तिहरं पापघ्नं सुखसौभाग्यदायकम् महादेवं त्रिगुणातीतं नमस्ते रुद्ररुपिणम् अर्थ: **नीले कंठ वाले, गंगाधारी, चंद्रशेखर, भस्मधारी, त्रिशूलधारी, शरभारूढ़, भक्तवत्सल, शिव, भक्तों के कष्टों को दूर करने वाले, पापों को नष्ट करने वाले, सुख और सौभाग्य प्रदान करने वाले, महादेव, त्रिगुणों से परे, रुद्र रूप में प्रकट होने वाले, आपको नमस्कार है।** शिवष्टकम् अगस्त्यकृतम् का पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सुख, समृद्धि, और शांति मिलती है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण को बढ़ावा देता है। शिवष्टकम् अगस्त्यकृतम् के कुछ प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं: यह भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने में मदद करता है। यह भक्तों को सुख, समृद्धि, और शांति प्रदान करता है। यह भक्तों को भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण को बढ़ावा देता है। शिवष्टकम् अगस्त्यकृतम् का पाठ करने के लिए कोई विशेष विधि निर्धारित नहीं है। भक्त इसे किसी भी समय और किसी भी स्थान पर कर सकते हैं। हालांकि, यदि भक्त इसे अधिक लाभकारी बनाना चाहते हैं तो वे इसे प्रातःकाल या संध्याकाल में किसी शांत स्थान पर कर सकते हैं। श्री श्रीशङ्करस्तोत्रम् Sri Srishankar Stotram

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श्री श्रीशङ्करस्तोत्रम् Sri Srishankar Stotram

Sri Srishankar Stotram श्री श्रीशंकर स्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के श्रीशंकर रूप की महिमा का वर्णन करता है। श्रीशंकर का अर्थ है “श्रीयुक्त शिव”। भगवान शिव को श्रीशंकर इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे सभी सुखों और समृद्धि के दाता हैं। श्री श्रीशंकर स्तोत्रम् इस प्रकार है: श्रीगणेशाय नमः श्रीशिवाय नमः ओं नमः शिवाय अर्थ: हे गणेश, हे शिव, हे नमस्कार हे शिव, हे नमस्कार ओम, हे शिव, हे नमस्कार जय श्रीशंकर, जय श्रीशंकर, महादेव जय श्रीशंकर, त्रिभुवनपति, जगदीश्वर, सर्वलोकनाथ, जय श्रीशंकर, सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, संहारकर्ता, जय श्रीशंकर, ज्ञानदाता, मोक्षदाता, सर्वकारण, जय श्रीशंकर, पापनाशक, रोगनाशक, विघ्ननाशक, जय श्रीशंकर, सुखदाता, समृद्धिदाता, आयुष्यदाता, जय श्रीशंकर, भक्तवत्सल, कृपानिधान, परमार्थस्वरूप, जय श्रीशंकर, अनंत गुणों से युक्त, सर्वशक्तिमान, जय श्रीशंकर, शिवम शिवम शिवम, जय श्रीशंकर, जय श्रीशंकर। Sri Srishankar Stotram अर्थ: **जय श्रीशंकर, जय श्रीशंकर, महादेव जय श्रीशंकर, त्रिभुवनपति, जगदीश्वर, सर्वलोकनाथ, जय श्रीशंकर, सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, संहारकर्ता, जय श्रीशंकर, ज्ञानदाता, मोक्षदाता, सर्वकारण, जय श्रीशंकर, पापनाशक, रोगनाशक, विघ्ननाशक, जय श्रीशंकर, सुखदाता, समृद्धिदाता, आयुष्यदाता, जय श्रीशंकर, भक्तवत्सल, कृपानिधान, परमार्थस्वरूप, जय श्रीशंकर, अनंत गुणों से युक्त, सर्वशक्तिमान, जय श्रीशंकर, शिवम शिवम शिवम, जय श्रीशंकर, जय श्रीशंकर।** श्री श्रीशंकर स्तोत्रम् का पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सुख, समृद्धि, और शांति मिलती है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण को बढ़ावा देता है। श्री श्रीशंकर स्तोत्रम् के कुछ प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं: यह भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने में मदद करता है। यह भक्तों को सुख, समृद्धि, और शांति प्रदान करता है। यह भक्तों को भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण को बढ़ावा देता है। श्री श्रीशंकर स्तोत्रम् का पाठ करने के लिए कोई विशेष विधि निर्धारित नहीं है। भक्त इसे किसी भी समय और किसी भी स्थान पर कर सकते हैं। हालांकि, यदि भक्त इसे अधिक लाभकारी बनाना चाहते हैं तो वे इसे प्रातःकाल या संध्याकाल में किसी शांत स्थान पर कर सकते हैं। श्रीप्रपञ्चमातापित्रष्टकम् Sriprapanchamatapitrashtakam

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श्रीप्रपञ्चमातापित्रष्टकम् Sriprapanchamatapitrashtakam

 Sriprapanchamatapitrashtakam श्रीप्रपंचमत्पित्राष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के प्रपंचमत्पिता रूप की महिमा का वर्णन करता है। प्रपंचमत्पिता का अर्थ है “सभी प्रपंचों के पिता”। भगवान शिव को प्रपंचमत्पिता इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे सभी ब्रह्मांडों के पिता हैं। श्रीप्रपंचमत्पित्राष्टकम् इस प्रकार है: श्रीगणेशाय नमः श्रीशिवाय नमः ओं नमः शिवाय अर्थ: हे गणेश, हे शिव, हे नमस्कार हे शिव, हे नमस्कार ओम, हे शिव, हे नमस्कार अनंत कोटि ब्रह्मांड नायक, सर्वलोकनाथ त्रिपुरारी, प्रपंचमत्पिता जगदीश्वर, आपके चरणों में मेरा प्रणाम। अर्थ: अनंत ब्रह्मांडों के नायक, सभी लोकों के स्वामी, त्रिपुरारी, जगदीश्वर, प्रपंचमत्पिता, आपके चरणों में मेरा प्रणाम। आप ही हैं त्रिदेव, आप ही हैं त्रिशक्ति, आप ही हैं त्रिलोकनाथ, आप ही हैं जगदीश्वर। अर्थ: आप ही हैं त्रिदेव, आप ही हैं त्रिशक्ति, आप ही हैं त्रिलोकनाथ, आप ही हैं जगदीश्वर। आप ही हैं सृष्टिकर्ता, आप ही हैं पालनकर्ता, आप ही हैं संहारकर्ता, आप ही हैं सबके स्वामी। Sriprapanchamatapitrashtakam अर्थ: आप ही हैं सृष्टिकर्ता, आप ही हैं पालनकर्ता, आप ही हैं संहारकर्ता, आप ही हैं सबके स्वामी। आप ही हैं सबके आधार, आप ही हैं सबके रक्षक, आप ही हैं सबके उद्धारक, आप ही हैं सबके त्राता। अर्थ: आप ही हैं सबके आधार, आप ही हैं सबके रक्षक, आप ही हैं सबके उद्धारक, आप ही हैं सबके त्राता। आप ही हैं सबके मस्तक, आप ही हैं सबके ह्रदय, आप ही हैं सबके प्राण, आप ही हैं सबके देवता। अर्थ: आप ही हैं सबके मस्तक, आप ही हैं सबके ह्रदय, आप ही हैं सबके प्राण, आप ही हैं सबके देवता। आप ही हैं सबके जीवन, आप ही हैं सबके प्रकाश, आप ही हैं सबके भक्ति, आप ही हैं सबके आश्रय। अर्थ: आप ही हैं सबके जीवन, आप ही हैं सबके प्रकाश, आप ही हैं सबके भक्ति, आप ही हैं सबके आश्रय। श्रीप्रपंचमत्पित्राष्टकम् का पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सुख, समृद्धि, और शांति मिलती है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण को बढ़ावा देता है। श्रीमल्लिकार्जुन प्रपत्तिः Shri Mallikarjuna Prapattih

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श्रीमल्लिकार्जुन प्रपत्तिः Shri Mallikarjuna Prapattih

Shri Mallikarjuna Prapattih जय जय जय शम्भो ! जम्भभित्पूर्वदेव प्रणतपदसरोजद्वन्द्व ! निर्द्वन्द्व ! बन्धो ! जय जय जय जन्मस्थेमसंहारकार ! प्रणयसगुणमूर्ते ! पालयास्मान् प्रपन्नान् ॥ १॥ वधूमुखं वल्गदपाङ्गरेखमखण्डितानन्दकरप्रसादम् । विलोकयन् विस्फुरदात्मभावस्स मे गतिश्श्रीगिरिसार्वभौमः ॥ २॥ कुरङ्गपाणिः करुणावलोकः सुरोत्तमश्चन्द्रकलावतंसः । वधूसहायस्सकलेष्टदाता भवत्यसौ श्रीगिरिभाग्यराशिः ॥ ३॥ श्रीमहाकालभैरवस्तोत्रम् अथवा श्रीमहाकालस्तोत्रम् Srimahakalbhairavastotram or Srimahakalstotram

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श्रीमहाकालभैरवस्तोत्रम् अथवा श्रीमहाकालस्तोत्रम् Srimahakalbhairavastotram or Srimahakalstotram

Srimahakalbhairavastotram or Srimahakalstotram श्रीमहाकालभैरवस्तोत्रम् और श्रीमहाकालस्तोत्रम् दोनों ही भगवान शिव के महाकाल रूप की महिमा का वर्णन करने वाली स्तोत्र हैं। इन दोनों स्तोत्रों में भगवान शिव को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, जैसे कि महाकाल, भैरव, रुद्र, महेश्वर, शंभु, त्र्यम्बकेय, वैद्यनाथ, अग्निनेत्र, वज्रहस्त, परशुधारक, त्रिशूलधारक, अष्टभुजाय, नवग्रहदैत्यवधकाय, सर्वशत्रुविनाशकाय, सर्वपापनाशकाय, सर्वसुखप्रदायकाय, सर्वप्राप्तिदायकाय, सर्वकामदायकाय, सर्वरोगनाशकाय, सर्वविघ्ननाशकाय, सर्वशक्तिदायकाय, सर्वरक्षादायकाय, सर्वसौभाग्यदायकाय, सर्वसिद्धिदायकाय। श्रीमहाकालभैरवस्तोत्रम् में भगवान शिव के भैरव रूप की महिमा का विशेष रूप से वर्णन किया गया है। भैरव भगवान शिव के गण हैं और उन्हें क्रोध और विनाश का प्रतीक माना जाता है। श्रीमहाकालभैरवस्तोत्रम् का पाठ करने से भक्तों को भैरव की कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सभी शत्रुओं का नाश, सभी पापों से मुक्ति, सभी सुखों की प्राप्ति, सभी कामनाओं की पूर्ति, सभी रोगों से मुक्ति, सभी विघ्नों का नाश, सभी शक्तियों की प्राप्ति, सभी रक्षाएं, और सभी सौभाग्यों और सिद्धियों की प्राप्ति होती है। Srimahakalbhairavastotram or Srimahakalstotram श्रीमहाकालस्तोत्रम् में भगवान शिव के महाकाल रूप की महिमा का सामान्य रूप से वर्णन किया गया है। महाकाल भगवान शिव के काल रूप हैं और उन्हें सृष्टि, पालन, और संहार का देवता माना जाता है। श्रीमहाकालस्तोत्रम् का पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सुख, समृद्धि, और शांति मिलती है। श्रीमहाकालभैरवस्तोत्रम् और श्रीमहाकालस्तोत्रम् दोनों ही शक्तिशाली स्तोत्र हैं जो भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं। श्रीमहादेवस्तुतिः २ Shri Mahadevstuti: 2

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श्रीमहादेवस्तुतिः २ Shri Mahadevstuti: 2

Shri Mahadevstuti: 2 श्री महादेवस्तुति: श्री गणेशाय नमः श्री शिवाय नमः ओं नमः शिवाय हे महादेव, हे शंकर, हे त्रिलोकनाथ, हे जगदीश्वर, हे आदिदेव, हे नमस्ते! हे संहारकर्ता, हे सृष्टिकर्ता, हे पालनकर्ता, हे तीनों लोकों के स्वामी, हे नमस्ते! हे अविनाशी, हे निराकार, हे निर्गुण, हे निर्विकार, हे नमस्ते! हे ज्योतिर्मय, हे कल्याणकारी, हे सर्वशक्तिमान, हे सर्वज्ञ, हे नमस्ते! हे भोलेनाथ, हे दयालु, हे करुणामय, हे परमपिता, हे नमस्ते! हे नीलकंठ, हे गंगाधर, हे त्रिशूलधारी, हे चंद्रशेखर, हे नमस्ते! हे नटराज, हे अर्धनारीश्वर, हे विश्वनाथ, हे सोमनाथ, हे नमस्ते! हे भस्मधारी, हे भक्तवत्सल, हे सर्वभक्तों के आश्रय, हे नमस्ते! हे शूलपाणी, हे रुद्र, हे पिनाकी, हे वैश्वानर, हे नमस्ते! हे शरभारुढ़, हे त्रिपुरारी, हे महादेव, हे जगदीश्वर, हे नमस्ते! हे मेरे इष्टदेव, हे मेरे आराध्य, हे मेरे जीवन के आधार, हे नमस्ते! Shri Mahadevstuti: 2 हे महादेव, मैं आपका अनन्य भक्त हूँ। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे अपने चरणों में स्थान प्रदान करें। आप मेरे सभी पापों को धो दें और मुझे मोक्ष प्रदान करें। हे महादेव, आप मेरे जीवन में सुख, समृद्धि, और शांति प्रदान करें। आप मेरे सभी कष्टों और दुखों को दूर करें। हे महादेव, आप मेरे मार्गदर्शन करें और मुझे सही मार्ग पर चलने में मदद करें। आप मुझे अपने ज्ञान और शक्ति से आशीर्वाद दें। हे महादेव, मैं आपके चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित करता हूँ। ओं नमः शिवाय श्री गणेशाय नमः श्री शिवाय नमः यह स्तुति भगवान शिव की महिमा का वर्णन करती है। इसमें भगवान शिव को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, जैसे कि महादेव, शंकर, त्रिलोकनाथ, जगदीश्वर, आदिदेव, अविनाशी, निराकार, निर्गुण, निर्विकार, ज्योतिर्मय, कल्याणकारी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, भोलेनाथ, दयालु, करुणामय, परमपिता, नीलकंठ, गंगाधर, त्रिशूलधारी, चंद्रशेखर, नटराज, अर्धनारीश्वर, विश्वनाथ, सोमनाथ, भस्मधारी, भक्तवत्सल, शूलपाणी, रुद्र, पिनाकी, वैश्वानर, शरभारुढ़, त्रिपुरारी। भक्त भगवान शिव से अपने पापों को धोने, मोक्ष प्रदान करने, सुख, समृद्धि, और शांति प्रदान करने, कष्टों और दुखों को दूर करने, मार्गदर्शन करने, और ज्ञान और शक्ति से आशीर्वाद देने की प्रार्थना करते हैं। यह स्तुति नियमित रूप से करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सुख, समृद्धि, और शांति मिलती है। श्रीरामनाथस्तुतिः Shriramnathstutih

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श्रीरामनाथस्तुतिः Shriramnathstutih

 Shriramnathstutih (श्रीरामेश्वरक्षेत्रे) श्रीरामपूजितपदाम्बुज चापपाणे श्रीचक्रराजकृतवास कृपाम्बुराशे श्रीसेतुमूलचरणप्रवणान्तरङ्ग श्रीरामनाथ लघु तारय जन्मवार्धिम् ॥ नम्राघवृन्दविनिवारणबद्धदीक्ष शैलाधिराजतनयापरिरब्धवर्ष्मन् । श्रीनाथमुख्यसुरवर्यनिषेविताङ्घ्रे श्रीवीरभद्ररनक्षत्रनामावलिः Shriveerbhadraranakshatranamavalih

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श्रीवीरभद्ररनक्षत्रनामावलिः Shriveerbhadraranakshatranamavalih

 Shriveerbhadraranakshatranamavalih श्री वीरभद्रनक्षत्रनामावली एक स्तोत्र है जो भगवान शिव के वीरभद्र रूप की महिमा का वर्णन करता है। वीरभद्र भगवान शिव के एक क्रोध रूप हैं, जिन्हें भगवान शिव के गण भी कहा जाता है। श्री वीरभद्रनक्षत्रनामावली इस प्रकार है: ॐ नमः शिवाय वीरभद्राय नमः भैरवाय नमः रुद्राय नमः महेश्वराय नमः शंभवे नमः त्र्यम्बकेय नमः वैद्यनाथाय नमः अग्निनेत्राय नमः वज्रहस्ताय नमः परशुधारकाय नमः त्रिशूलधारकाय नमः अष्टभुजाय नमः नवग्रहदैत्यवधकाय नमः सर्वशत्रुविनाशकाय नमः सर्वपापनाशकाय नमः सर्वसुखप्रदायकाय नमः सर्वप्राप्तिदायकाय नमः सर्वकामदायकाय नमः सर्वरोगनाशकाय नमः सर्वविघ्ननाशकाय नमः सर्वशक्तिदायकाय नमः सर्वरक्षादायकाय नमः सर्वसौभाग्यदायकाय नमः सर्वसिद्धिदायकाय नमः श्री वीरभद्राय नमः ॐ नमः शिवाय Shriveerbhadraranakshatranamavalih अर्थ: हे शिव, मैं आपको नमन करता हूं। हे वीरभद्र, मैं आपको नमन करता हूं। हे भैरव, मैं आपको नमन करता हूं। हे रुद्र, मैं आपको नमन करता हूं। हे महेश्वर, मैं आपको नमन करता हूं। हे शंभु, मैं आपको नमन करता हूं। हे त्र्यम्बकेय, मैं आपको नमन करता हूं। हे वैद्यनाथ, मैं आपको नमन करता हूं। हे अग्निनेत्र, मैं आपको नमन करता हूं। हे वज्रहस्त, मैं आपको नमन करता हूं। हे परशुधारक, मैं आपको नमन करता हूं। हे त्रिशूलधारक, मैं आपको नमन करता हूं। हे अष्टभुज, मैं आपको नमन करता हूं। हे नवग्रह और दैत्यों के वधकर्ता, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी शत्रुओं के नाशक, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी पापों के नाशक, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी सुखों के दाता, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी प्राप्तियों के दाता, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी कामनाओं के दाता, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी रोगों के नाशक, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी विघ्नों के नाशक, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी शक्तियों के दाता, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी रक्षाओं के दाता, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी सौभाग्यों के दाता, मैं आपको नमन करता हूं। हे सभी सिद्धियों के दाता, मैं आपको नमन करता हूं। हे वीरभद्र, मैं आपको नमन करता हूं। हे शिव, मैं आपको नमन करता हूं। श्री वीरभद्रनक्षत्रनामावली का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं: वीरभद्र की कृपा प्राप्त होती है। सभी शत्रुओं का नाश होता है। सभी पापों से मुक्ति मिलती है। सभी सुखों की प्राप्ति होती है। सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं। सभी रोगों से मुक्ति मिलती है। सभी विघ्नों का नाश होता है। सभी शक्तियों की प्राप्ति होती है। सभी रक्षाएं प्राप्त होती हैं। सभी सौभाग्यों की प्राप्ति होती है। सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। श्री वीरभद्रनक्षत्रनामावली का पाठ नियमित रूप से करने से भक्तों को वीरभद्र की विशेष कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सुख, श्रीव्याडेश्वरकृपाकवचम् Srivyadeshwarkripakavacham

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श्रीव्याडेश्वरकृपाकवचम् Srivyadeshwarkripakavacham

Srivyadeshwarkripakavacham श्री वैद्येशव कृपाकवच एक शक्तिशाली कवच है जो भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह कवच भगवान शिव के वैद्येशव रूप को समर्पित है, जो रोगों को दूर करने वाले देवता हैं। श्री वैद्येशव कृपाकवच इस प्रकार है: श्री गुरूभ्यो नमः ॐ नमः शिवाय नमः रुद्राय नमः महेश्वराय नमः शंभवे नमः त्र्यम्बकेय नमः वैद्यनाथाय एहि एहि श्री वैद्येशवेंद्राय त्रिकाल ज्ञाताय नित्यम् पापापहर्ता सर्वरोगनिवारणाय मम सर्वरोगान् हर मम सर्वपापान् हर मम सर्वदुःखान् हर मम सर्वकार्याणि साधय मम सर्वसौभाग्यं देहि मम सर्वविद्यां देहि मम सर्वशक्तिं देहि मम सर्वविजयं देहि मम सर्वरक्षां कुरु मम सर्वाभीष्टं देहि श्री वैद्येशवेंद्राय नमः ॐ नमः शिवाय Srivyadeshwarkripakavacham अर्थ: हे गुरुओं, मैं आपको नमन करता हूं। हे शिव, मैं आपको नमन करता हूं। हे रुद्र, मैं आपको नमन करता हूं। हे महेश्वर, मैं आपको नमन करता हूं। हे शंभु, मैं आपको नमन करता हूं। हे त्र्यम्बकेय, मैं आपको नमन करता हूं। हे वैद्यनाथ, मैं आपको नमन करता हूं। हे श्री वैद्येशवेंद्र, आप मेरे पास आइए। आप तीनों कालों के ज्ञाता हैं। आप सदैव पापों को दूर करने वाले हैं। आप सभी रोगों को दूर करने वाले हैं। मेरे सभी रोगों को दूर करें। मेरे सभी पापों को दूर करें। मेरे सभी दुखों को दूर करें। मेरे सभी कार्यों को सिद्ध करें। मेरी सभी सौभाग्य प्रदान करें। मेरी सभी विद्याएं प्रदान करें। मेरी सभी शक्तियां प्रदान करें। मेरी सभी विजय प्रदान करें। मेरी सभी रक्षा करें। मेरी सभी अभीष्ट प्रदान करें। हे श्री वैद्येशवेंद्र, मैं आपको नमन करता हूं। हे शिव, मैं आपको नमन करता हूं। श्री वैद्येशव कृपाकवच का पाठ करने के लिए, सबसे पहले अपने शरीर और आसपास के क्षेत्र को शुद्ध करें। फिर, एक आरामदायक स्थिति में बैठें और कवच का पाठ करें। कवच का पाठ करते समय, अपने मन को भगवान शिव के वैद्येशव रूप पर केंद्रित करें। श्री वैद्येशव कृपाकवच का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं: रोगों से मुक्ति स्वास्थ्य और दीर्घायु मानसिक शांति धन-धान्य की वृद्धि श्री वैद्येशव कृपाकवच का पाठ नियमित रूप से करने से भक्तों को भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सुख, समृद्धि, और शांति मिलती है। श्रीव्याडेश्वरध्यानमन्त्रः Srivyadeshvaradhyamantra:

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श्रीव्याडेश्वरध्यानमन्त्रः Srivyadeshvaradhyamantra:

Srivyadeshvaradhyamantra: श्री वैद्येशवराध्य मंत्र एक शक्तिशाली मंत्र है जो भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह मंत्र भगवान शिव के वैद्येशव रूप को समर्पित है, जो रोगों को दूर करने वाले देवता हैं। श्री वैद्येशवराध्य मंत्र इस प्रकार है: ॐ श्री वैद्येशवेंद्राय नमः ॐ त्र्यम्बकेय विद्महे वैद्यनाथाय धीमहि तन्नो वैद्येशव प्रचोदयात् Srivyadeshvaradhyamantra: अर्थ: हे श्री वैद्येशवेंद्र, मैं आपको नमन करता हूं। हे त्र्यम्बकेय, मैं आपको जानता हूं। हे वैद्यनाथ, मैं आपका ध्यान करता हूं। हे वैद्येशव, मुझे प्रेरित करें। श्री वैद्येशवराध्य मंत्र का पाठ करने के लिए, सबसे पहले अपने शरीर और आसपास के क्षेत्र को शुद्ध करें। फिर, एक आरामदायक स्थिति में बैठें और मंत्र का जाप करें। मंत्र का जाप करते समय, अपने मन को भगवान शिव के वैद्येशव रूप पर केंद्रित करें। श्री वैद्येशवराध्य मंत्र का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं: रोगों से मुक्ति स्वास्थ्य और दीर्घायु मानसिक शांति धन-धान्य की वृद्धि श्री वैद्येशवराध्य मंत्र का पाठ नियमित रूप से करने से भक्तों को भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सुख, समृद्धि, और शांति मिलती है। श्रीशिव आरती Shree Shiv Aarti

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श्रीशिव आरती Shree Shiv Aarti

Shree Shiv Aarti श्री शिव आरती **ॐ जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥** **ॐ जय शिव ओंकारा॥ **एकदंत दयाला, चार भुजाधारी। माथे पर चंद्रमा, जटा में गंगा धारी॥** **ॐ जय शिव ओंकारा॥ **सुखकारी दुखहारी, त्रिभुवन के पालनहारी। योगी जनों के स्वामी, शिव हैं अविनाशी॥** **ॐ जय शिव ओंकारा॥ **भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों का ज्ञाता। रक्षक भक्त जनों के, सदा ही सुखदाता॥** **ॐ जय शिव ओंकारा॥ **त्राहिमाम त्राहिमाम, भव सागर से ताहिमाम। शिव शंकर शरण में, करो अब मोहि उबारा॥** **ॐ जय शिव ओंकारा॥ **पापमोचनी मंत्र है, ओम नमः शिवाय। पाठ कर इस मंत्र का, पापों से हो भवतारि॥** Shree Shiv Aarti **ॐ जय शिव ओंकारा॥ इति श्री शिव आरती समाप्त। श्री शिव आरती भगवान शिव की पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह आरती भगवान शिव की महिमा का वर्णन करती है और उन्हें प्रसन्न करने के लिए गाई जाती है। आरती में भगवान शिव को कई नामों से पुकारा जाता है, जैसे कि “जय शिव ओंकारा”, “ब्रह्मा विष्णु सदाशिव”, “एकदंत दयाला”, “सुखकारी दुखहारी”, “त्रिभुवन के पालनहारी”, “योगी जनों के स्वामी”, “भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों का ज्ञाता”, “रक्षक भक्त जनों के”, “त्राहिमाम त्राहिमाम”, “भव सागर से ताहिमाम”, “शिव शंकर शरण में”, “पापमोचनी मंत्र है”, और “ओम नमः शिवाय”। आरती के अंत में, भक्त भगवान शिव से अपने पापों को धोने और उन्हें मोक्ष प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं। श्री शिव आरती का गायन या पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सुख, समृद्धि, और शांति मिलती है। हेमबाहु प्रोक्ता महादेवस्तुतिः Hembahu prokta mahadevstutih

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