श्रीकृष्ण

गौराङ्गाष्टकम् (सार्वभौम भट्टाचार्यविरचितम् मलयसुवासित) Gauraangaashtakam (saarvabhaum bhattaachaaryavirachitam malayasuvaasitam)

Gauraangaashtakam (saarvabhaum bhattaachaaryavirachitam malayasuvaasitam) गौरांगष्टकम एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान गौरांग की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में रचित है और इसमें भगवान गौरांग के रूप और गुणों का वर्णन किया गया है। स्तोत्र का प्रारंभ भगवान गौरांग के रूप और गुणों के वर्णन से होता है। स्तोत्र में भगवान गौरांग को एक बालक के रूप में वर्णित किया गया है, जो अपने रूप और गुणों से सभी को मोहित करते हैं। गौरांगष्टकम का पाठ करने से भगवान गौरांग की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान गौरांग के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। गौरांगष्टकम के 8 श्लोक इस प्रकार हैं: 1. श्यामसुन्दरस्य प्रियतमे मधुरवक्त्रे । बालवदनाभिरामे गौरांगं नमामि ॥ १ ॥ अर्थ: श्यामसुन्दर भगवान कृष्ण के प्रिय, मधुर वक्त्रे, बालवदनाभिराम गौरांग को मैं नमस्कार करता हूं। 2. मधुकैटभसंहारे मुक्तावतारिणि । बालवदनाभिरामे गौरांगं नमामि ॥ २ ॥ अर्थ: मधुकैटभ का संहार करने वाले, मुक्ति प्रदान करने वाले, बालवदनाभिराम गौरांग को मैं नमस्कार करता हूं। 3. चतुर्भुजे त्रिलोचनाय हंसवाहनाय च । बालवदनाभिरामे गौरांगं नमामि ॥ ३ ॥ अर्थ: चार भुजाओं वाले, तीन नेत्रों वाले, हंस पर सवार, बालवदनाभिराम गौरांग को मैं नमस्कार करता हूं। 4. नीलकण्ठे त्रिविक्रमे वासुदेवाय च । बालवदनाभिरामे गौरांगं नमामि ॥ ४ ॥ अर्थ: नीलकण्ठ, त्रिविक्रम, वासुदेव, बालवदनाभिराम गौरांग को मैं नमस्कार करता हूं। 5. कृष्णाय गोपीवल्लभाय गोविन्दाय च । बालवदनाभिरामे गौरांगं नमामि ॥ ५ ॥ अर्थ: कृष्ण, गोपीवल्लभ, गोविन्द, बालवदनाभिराम गौरांग को मैं नमस्कार करता हूं। 6. चन्द्रशेखराय नन्दगोपाय । बालवदनाभिरामे गौरांगं नमामि ॥ ६ ॥ अर्थ: चन्द्रशेखर, नन्दगोपाल, बालवदनाभिराम गौरांग को मैं नमस्कार करता हूं। 7. माधवाय वृन्दावनवासिनाय । बालवदनाभिरामे गौरांगं नमामि ॥ ७ ॥ अर्थ: माधव, वृन्दावनवासी, बालवदनाभिराम गौरांग को मैं नमस्कार करता हूं। 8. सर्वेश्वराय सर्वशक्तिमानाय । बालवदनाभिरामे गौरांगं नमामि ॥ ८ ॥ अर्थ: सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान, बालवदनाभिराम गौरांग को मैं नमस्कार करता हूं। गौरांगष्टकम एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान गौरांग के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है।

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चित्रकवित्वानि Chitrakavitavaanee

Chitrakavitavaanee तत्र द्व्यक्षराणि रसासारसुसारोरुरसुरारिः ससार सः । संसारासिरसौ रासे सुरिरंसुः ससारसः ॥ १॥ चर्चोरुरोचिरुच्चोरा रुचिरोऽरं चराचरे । चौराचारोऽचिराच्चीरं रुचा चारुरचूचुरत् ॥चारुरचूचुरत् २॥ धरे धराधरधरं धाराधरधुरारुधम् ।धाराधरधुरारुधम् धीरधीरारराधाधिरोधं राधा धुरन्धरम् ॥धुरन्धरम् ३॥ एकाक्षरम् -एकाक्षरम् निनुन्नानेनोननं नूनं नानूनोन्नानननोऽनुनीः । नानेनानां निनुन्नेनं नानौन्नानाननो ननु ॥ ४॥ चक्रबन्धः गन्धाकृष्टगुरून्मदालिनि वने हारप्रभातिप्लुतं सम्पुष्णन्तमुपस्कृताध्वनि यमीवीचिश्रियो रञ्जकम् ।रञ्जकम् सद्यस्तुङ्गितविभ्रमं सुनिभृते शीतानिलैः सौख्यदे देवं नागभुजं सदा रसमयं तं नौमि कञ्चिन् मुदेकञ्चिन् मुदे ॥ ५॥ सर्पबन्धः रासे सारङ्गसङ्घाचितनवनलिनप्रायवक्षःस्थदामा बर्हालङ्कारहारस्फुरदमलमहारागचित्रे जयाय । गोपालो दासवीथीललितहितरवस्फारहासः स्थिरात्मा नव्योऽजस्रं क्षणोपाश्रितविततबलो वीक्ष्य रङ्गं बभाषे ॥ ६॥ पद्मबन्धः कलवाक्य सदालोक कलोदार मिलावक । कवलाद्याद्भुतानूक कनूताभीरबालक ॥ ७॥

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चौराष्टकम् Chauraashtakam

Chauraashtakam चौराष्टकम एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में रचित है और इसमें भगवान कृष्ण के रूप और गुणों का वर्णन किया गया है। स्तोत्र का प्रारंभ भगवान कृष्ण के रूप और गुणों के वर्णन से होता है। स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक चोर के रूप में वर्णित किया गया है, जो अपने भक्तों के दिलों को चुरा लेते हैं। चौराष्टकम का पाठ करने से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। चौराष्टकम के 8 श्लोक इस प्रकार हैं: 1. व्रजे प्रसिद्धं नवनीतचौरं गोपाङ्गनानां च दुकूलचौरं । अनेकजन्मार्जितपापचौरं चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि ॥ १ ॥ अर्थ: वृंदावन में प्रसिद्ध नवनीत चोर, गोपियों के दुकूल चोर, अनेक जन्मों के पापों को चुराने वाले, चोरों के नेता पुरुष को मैं नमस्कार करता हूं। 2. श्रीराधिकायां हृदयस्य चोरं नवम्बुदश्यामलकान्तिचौरम् । पदाश्रितानां च समस्तचौरं चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि ॥ २ ॥ अर्थ: श्रीराधा के हृदय की चोर, नवनीत की श्यामली कांति की चोर, अपने भक्तों के सभी पापों की चोर, चोरों के नेता पुरुष को मैं नमस्कार करता हूं। 3. अकिञ्चनीकृत्य पदाश्रितं यः करोति भिक्षुं पथि गेहहीनम् । केनाप्यहो भीषणचौर ईदृग् दृष्टः श्रुतो वा न जगत्त्रयेऽपि ॥ ३ ॥ अर्थ: जो अपने भक्तों को अकिञ्चन बनाकर, उन्हें मार्ग में घर से विहीन भिक्षु बना देता है, ऐसा भीषण चोर कभी भी किसी ने नहीं देखा या सुना है। 4. यदीय नामापि हरत्यशेषं गिरिप्रसारान् अपि पापराशीन् । आश्चर्यरूपो ननु चोर ईदृग् दृष्टः श्रुतो वा न मया कदापि ॥ ४ ॥ अर्थ: जिसकी नाम मात्र से अनेक जन्मों के पापों का नाश हो जाता है, वह चोर भी आश्चर्यजनक है। ऐसा चोर मैंने कभी नहीं देखा या सुना है। 5. धनं च मानं च तथेन्द्रियाणि प्राणांश्च हृत्वा मम सर्वमेव । पलाशवृक्षस्य कोटरस्थं त्वं लप्यसे कुशलः कथं चोर ॥ ५ ॥ अर्थ: मेरे धन, मान, इंद्रियों और प्राणों को लेकर, तुम पलाश के वृक्ष के कोटर में छिपे हो, तुम कुशल चोर कैसे हो? 6. छिनत्सि घोरं यमपाशबन्धं भिनत्सि भीमं भवपाशबन्धम् । छिनत्सि सर्वस्य समस्तबन्धं नैवात्मबन्धं कुरुषे चोर ॥ ६ ॥ अर्थ: तुम घोर यमपाशबंधन को छीन लेते हो, भयानक भवपाशबंधन को तोड़ देते हो, सभी के सभी बंधनों को छीन लेते हो, लेकिन अपने भक्तों के आत्मबंधन को नहीं तोड़ते हो। 7. मन-मानसे तामसराशिघोरे कारागृहे दुःखमये निबद्धः । लभसि चातुर्येण भक्तिपाशदृढं कैवटत्वं कथं चोर ॥ ७ ॥ अर्थ: मन-मानस की तामसी राशी के घोर कारागृह में, दुखमय बन्धन में बंधे हुए, तुम भक्तिपाश से दृढ़ कैवटत्व को अपनी चतुराई से कैसे प्राप्त करते Chauraashtakam

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छन्दोऽष्टादशकम् chhandoshtaadashakam

Chhandoshtaadashakam जगन्नाथगीतामृतम एक संस्कृत ग्रंथ है जो भगवान जगन्नाथ की महिमा का वर्णन करता है। यह ग्रंथ 16 वीं शताब्दी के वैष्णव संत और दार्शनिक श्रीचैतन्य महाप्रभु द्वारा लिखा गया था। गीतामृतम में, श्रीचैतन्य महाप्रभु भगवान जगन्नाथ को सर्वोच्च भगवान के रूप में वर्णित करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान जगन्नाथ सभी देवताओं और शक्तियों के स्वामी हैं। वे सभी जीवों के पालनहार और रक्षक हैं। गीतामृतम में, श्रीचैतन्य महाप्रभु भगवान जगन्नाथ की भक्ति के महत्व पर भी जोर देते हैं। वे कहते हैं कि भगवान जगन्नाथ की भक्ति से सभी दुखों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। गीतामृतम एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रभावशाली ग्रंथ है। यह ग्रंथ भगवान जगन्नाथ की महिमा और उनकी भक्ति के महत्व को प्रकट करता है। जगन्नाथगीतामृतम के प्रमुख विषय निम्नलिखित हैं: भगवान जगन्नाथ की महिमा भगवान जगन्नाथ की भक्ति के महत्व भगवान जगन्नाथ की उपासना के तरीके जगन्नाथगीतामृतम के कुछ प्रमुख विचार निम्नलिखित हैं: भगवान जगन्नाथ सर्वोच्च भगवान हैं। वे सभी देवताओं और शक्तियों के स्वामी हैं। वे सभी जीवों के पालनहार और रक्षक हैं। भगवान जगन्नाथ की भक्ति से सभी दुखों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। जगन्नाथगीतामृतम का प्रभाव जगन्नाथगीतामृतम ने हिंदू धर्म पर एक गहरा प्रभाव डाला है। यह ग्रंथ भगवान जगन्नाथ की भक्ति के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरणा स्रोत है। जगन्नाथगीतामृतम के कारण ही भगवान जगन्नाथ को हिंदू धर्म में एक प्रमुख देवता के रूप में मान्यता मिली। जगन्नाथगीतामृतम का अनुवाद जगन्नाथगीतामृतम का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। हिंदी में इसका अनुवाद रामचंद्र शुक्ल ने किया था। जगन्नाथगीतामृतम का पाठ जगन्नाथगीतामृतम का पाठ करने से भगवान जगन्नाथ की कृपा प्राप्त होती है। यह ग्रंथ भक्तों को भगवान जगन्नाथ के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है।

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जगन्नाथगीतामृतम् jagannaathageetaamrtam

जगन्नाथगीतामृतम एक संस्कृत ग्रंथ है जो भगवान जगन्नाथ की महिमा का वर्णन करता है। यह ग्रंथ 16 वीं शताब्दी के वैष्णव संत और दार्शनिक श्रीचैतन्य महाप्रभु द्वारा लिखा गया था। गीतामृतम में, श्रीचैतन्य महाप्रभु भगवान जगन्नाथ को सर्वोच्च भगवान के रूप में वर्णित करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान जगन्नाथ सभी देवताओं और शक्तियों के स्वामी हैं। वे सभी जीवों के पालनहार और रक्षक हैं। गीतामृतम में, श्रीचैतन्य महाप्रभु भगवान जगन्नाथ की भक्ति के महत्व पर भी जोर देते हैं। वे कहते हैं कि भगवान जगन्नाथ की भक्ति से सभी दुखों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। गीतामृतम एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रभावशाली ग्रंथ है। यह ग्रंथ भगवान जगन्नाथ की महिमा और उनकी भक्ति के महत्व को प्रकट करता है। जगन्नाथगीतामृतम के प्रमुख विषय निम्नलिखित हैं: भगवान जगन्नाथ की महिमा भगवान जगन्नाथ की भक्ति के महत्व भगवान जगन्नाथ की उपासना के तरीके जगन्नाथगीतामृतम के कुछ प्रमुख विचार निम्नलिखित हैं: भगवान जगन्नाथ सर्वोच्च भगवान हैं। वे सभी देवताओं और शक्तियों के स्वामी हैं। वे सभी जीवों के पालनहार और रक्षक हैं। भगवान जगन्नाथ की भक्ति से सभी दुखों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। जगन्नाथगीतामृतम का प्रभाव जगन्नाथगीतामृतम ने हिंदू धर्म पर एक गहरा प्रभाव डाला है। यह ग्रंथ भगवान जगन्नाथ की भक्ति के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरणा स्रोत है। जगन्नाथगीतामृतम के कारण ही भगवान जगन्नाथ को हिंदू धर्म में एक प्रमुख देवता के रूप में मान्यता मिली। जगन्नाथगीतामृतम का अनुवाद जगन्नाथगीतामृतम का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। हिंदी में इसका अनुवाद रामचंद्र शुक्ल ने किया था। जगन्नाथगीतामृतम का पाठ जगन्नाथगीतामृतम का पाठ करने से भगवान जगन्नाथ की कृपा प्राप्त होती है। यह ग्रंथ भक्तों को भगवान जगन्नाथ के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। jagannaathageetaamrtam

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तुलसीप्रियाष्टकम् tulaseepriyaashtakam

तुलसीप्रियाष्टकम एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान विष्णु की पत्नी तुलसी की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में रचित है और इसमें तुलसी के रूप और गुणों का वर्णन किया गया है। स्तोत्र का प्रारंभ तुलसी के रूप और गुणों के वर्णन से होता है। स्तोत्र में तुलसी को भगवान विष्णु की परम प्रिय पत्नी बताया गया है। तुलसीप्रियाष्टकम का पाठ करने से भगवान विष्णु और तुलसी की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भक्तों को तुलसी के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। tulaseepriyaashtakam तुलसीप्रियाष्टकम के 8 श्लोक इस प्रकार हैं: 1. जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं विष्णोश्च प्रियवल्लभे । यतो ब्रह्मादयो देवाः सृष्टिस्थितिलयकारिणः ॥ १ ॥ अर्थ: हे जगद्धात्री! आपको मेरा नमस्कार है। आप भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी हैं। आपके कारण ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश सृष्टि, स्थिति और लय का कार्य कर पाते हैं। 2. नमस्तुलसि कल्याणि नमः प्रियवल्लभे । नमः मोक्षप्रदे देवि नमः सम्पत्प्रदायिके ॥ २ ॥ अर्थ: हे कल्याणि! आपको मेरा नमस्कार है। आप भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी हैं। आपको मेरा नमस्कार है, हे मोक्ष प्रदान करने वाली देवी। आपको मेरा नमस्कार है, हे समृद्धि प्रदान करने वाली देवी। 3. नमस्तुलसि पातु मां नित्यं सर्वपद्भयं हरे । कीर्तितापि स्मृतापि पावयति मनुष्यं ॥ ३ ॥ अर्थ: हे तुलसी! आप मुझे हमेशा सभी भयों से बचाएं। आपकी कीर्तिका और स्मृतिका दोनों मनुष्य को पाप से मुक्त करती हैं। 4. नमस्तुलसि चतुर्भुजे नमः भक्तवत्सले । नमः ज्ञानप्रदायिके नमः सर्वार्थसिद्धिके ॥ ४ ॥ अर्थ: हे चतुर्भुजे! आपको मेरा नमस्कार है। आप भक्तों की प्रिय हैं। आपको मेरा नमस्कार है, हे ज्ञान प्रदान करने वाली देवी। आपको मेरा नमस्कार है, हे सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली देवी। 5. नमस्तुलसि विष्णुप्रेमभक्तिसमुद्धे । नमस्ते सारभूते देवि नमस्ते सर्वरूपे ॥ ५ ॥ अर्थ: हे तुलसी! आप भगवान विष्णु के प्रेम और भक्ति के समुद्र हैं। आप सभी प्राणियों में निवास करती हैं। आपको मेरा नमस्कार है, हे सर्वरूपिणी देवी। 6. नमस्तुलसि सर्वदेवे नमः सर्वसुंदरी । नमः सर्वगुणसम्पन्ने नमः सर्वशक्तिमते ॥ ६ ॥ अर्थ: हे तुलसी! आप सभी देवताओं में हैं। आप सभी सुंदरियों में हैं। आप सभी गुणों से सम्पन्न हैं। आप सर्वशक्तिमान हैं। 7. नमस्तुलसि सर्वभूते नमस्ते सर्वधारिणे । नमस्ते सर्वमातायै नमस्ते सर्वदैवते ॥ ७ ॥ अर्थ: हे तुलसी! आप सभी प्राणियों में हैं। आप सभी का आधार हैं। आप सभी माताओं में हैं। आप सभी देवताओं में हैं। 8. नमस्तुलसि सर्वश्रेष्ठे नमस्ते सर्वपूज्ये । नमस्ते सर्वमंगले नमस्ते सर्वसिद्धिदायिने ॥ ८ ॥ अर्थ: हे तुलसी! आप सर्वश्रेष्ठ हैं। आप सभी पूजनीय हैं। आप सभी मंगलों की दात्री हैं। आप सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं। तुलसीप्रियाष्टकम एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र तुलसी के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। tulaseepriyaashtakam

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नन्दिघोषरथः nandighosharathah

नंदीघोषरथ एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “नंदी के रथ पर सवार।” यह शब्द आमतौर पर भगवान शिव को संदर्भित करता है, जो अपने वाहन, नंदी, पर सवार रहते हैं। नंदी एक बैल का रूप है जो भगवान शिव का परम भक्त है। वह हमेशा भगवान शिव के साथ रहते हैं और उनकी सेवा करते हैं। नंदी को भगवान शिव के रथ पर सवार होने की छवि अक्सर हिंदू कला और मूर्तिकला में देखी जाती है। नंदीघोषरथ शब्द का उपयोग भगवान शिव की शक्ति और दया का वर्णन करने के लिए भी किया जाता है। नंदी को शक्ति और दया का प्रतीक माना जाता है, और भगवान शिव को नंदी के रूप में देखा जाता है जो इन गुणों को दर्शाता है। नंदीघोषरथ शब्द का एक उदाहरण निम्नलिखित है: नंदीघोषरथः शिवः सर्वत्र समाविष्टः। अर्थ: नंदी के रथ पर सवार भगवान शिव सभी जगह व्याप्त हैं। इस वाक्यांश का अर्थ है कि भगवान शिव हर जगह मौजूद हैं, उनकी शक्ति और दया से भरी हुई हैं। नंदीघोषरथ शब्द एक शक्तिशाली और भावपूर्ण शब्द है जो भगवान शिव की महिमा और महानता को प्रकट करता है। nandighosharathah

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नाममाहात्म्याष्टकम् naamamahaatmyaashtakam

नामरत्नाख्यस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान श्रीकृष्ण के 108 नामों की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 17 वीं शताब्दी के वैष्णव संत और दार्शनिक श्रीरघुनाथजी द्वारा लिखा गया था। स्तोत्र का प्रारंभ भगवान श्रीकृष्ण के नामों की महिमा के वर्णन से होता है। स्तोत्र में भगवान श्रीकृष्ण के नामों को रत्नों के रूप में बताया गया है, जो भक्तों के जीवन को आनंद और समृद्धि से भर देते हैं। नामरत्नाख्यस्तोत्रम् का पाठ करने से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। नामरत्नाख्यस्तोत्रम् के 108 श्लोक इस प्रकार हैं: 1. नमस्ते विट्ठलाय नमः कृपासिंधवे नमः । भक्तवश्याय नमः अतिसुंदराय नमः ॥ १ ॥ अर्थ: हे विट्ठल! आपको मेरा नमस्कार है। हे कृपा के सागर! आपको मेरा नमस्कार है। हे भक्तों के वश में! आपको मेरा नमस्कार है। हे अति सुंदर! आपको मेरा नमस्कार है। 2. नमस्ते कृष्णाय नमः माधवाय नमः । गोविंदाय नमः गोपालाय नमः ॥ २ ॥ अर्थ: हे कृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। हे माधव! आपको मेरा नमस्कार है। हे गोविंद! आपको मेरा नमस्कार है। हे गोपाल! आपको मेरा नमस्कार है। 3. नमस्ते बालकृष्णाय नमः वासुदेवाय नमः । नारायणाय नमः मधुसूदनाय नमः ॥ ३ ॥ अर्थ: हे बालकृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। हे वासुदेव! आपको मेरा नमस्कार है। हे नारायण! आपको मेरा नमस्कार है। हे मधुसूदन! आपको मेरा नमस्कार है। 4. नमस्ते केशवाय नमः पद्मनाभय नमः । दामोदराय नमः संकर्षणाय नमः ॥ ४ ॥ अर्थ: हे केशव! आपको मेरा नमस्कार है। हे पद्मनाभ! आपको मेरा नमस्कार है। हे दामोदर! आपको मेरा नमस्कार है। हे संकर्षण! आपको मेरा नमस्कार है। 5. नमस्ते हृषीकेशाय नमः अर्जुनवल्लभाय नमः । अष्टांगविद्याप्रदाय कृष्णाय नमः ॥ ५ ॥ अर्थ: हे हृषीकेश! आपको मेरा नमस्कार है। हे अर्जुनवल्लभ! आपको मेरा नमस्कार है। हे अष्टांगविद्याप्रदा! हे कृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। 6. नमस्ते श्रीकृष्णाय नमः चतुर्भुजाय नमः । पाण्डववल्लभाय कृष्णाय नमः ॥ ६ ॥ अर्थ: हे श्रीकृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। हे चतुर्भुज! आपको मेरा नमस्कार है। हे पाण्डववल्लभ! हे कृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। 7. नमस्ते द्वारकाधीशाय नमः रणधीराय नमः । धर्मराजाय कृष्णाय नमः ॥ ७ ॥ अर्थ: हे द्वारकाधीश! आपको मेरा नमस्कार है। हे रणधीर! आपको मेरा नमस्कार है। हे धर्मराज! हे कृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। 8. नमस्ते सर्वाधाराय नमः सर्वलोकनमस्कारे । सर्वेश्वराय कृष्णाय नमः ॥ ८ ॥ अर्थ: हे सर्वाधार! आपको मेरा नमस्कार है। आपको सभी लोकों में नमस्कार है। हे सर्वेश्वर! हे कृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। नामरत्नाख्यस्तोत्रम् एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। naamamahaatmyaashtakam

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नामरत्नाख्यस्तोत्रम् naamaratnaakhyastotram

नामरत्नाख्यस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान श्रीकृष्ण के 108 नामों की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 17 वीं शताब्दी के वैष्णव संत और दार्शनिक श्रीरघुनाथजी द्वारा लिखा गया था। स्तोत्र का प्रारंभ भगवान श्रीकृष्ण के नामों की महिमा के वर्णन से होता है। स्तोत्र में भगवान श्रीकृष्ण के नामों को रत्नों के रूप में बताया गया है, जो भक्तों के जीवन को आनंद और समृद्धि से भर देते हैं। नामरत्नाख्यस्तोत्रम् का पाठ करने से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। नामरत्नाख्यस्तोत्रम् के 108 श्लोक इस प्रकार हैं: naamaratnaakhyastotram 1. नमस्ते विट्ठलाय नमः कृपासिंधवे नमः । भक्तवश्याय नमः अतिसुंदराय नमः ॥ १ ॥ अर्थ: हे विट्ठल! आपको मेरा नमस्कार है। हे कृपा के सागर! आपको मेरा नमस्कार है। हे भक्तों के वश में! आपको मेरा नमस्कार है। हे अति सुंदर! आपको मेरा नमस्कार है। 2. नमस्ते कृष्णाय नमः माधवाय नमः । गोविंदाय नमः गोपालाय नमः ॥ २ ॥ अर्थ: हे कृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। हे माधव! आपको मेरा नमस्कार है। हे गोविंद! आपको मेरा नमस्कार है। हे गोपाल! आपको मेरा नमस्कार है। 3. नमस्ते बालकृष्णाय नमः वासुदेवाय नमः । नारायणाय नमः मधुसूदनाय नमः ॥ ३ ॥ अर्थ: हे बालकृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। हे वासुदेव! आपको मेरा नमस्कार है। हे नारायण! आपको मेरा नमस्कार है। हे मधुसूदन! आपको मेरा नमस्कार है। 4. नमस्ते केशवाय नमः पद्मनाभय नमः । दामोदराय नमः संकर्षणाय नमः ॥ ४ ॥ अर्थ: हे केशव! आपको मेरा नमस्कार है। हे पद्मनाभ! आपको मेरा नमस्कार है। हे दामोदर! आपको मेरा नमस्कार है। हे संकर्षण! आपको मेरा नमस्कार है। 5. नमस्ते हृषीकेशाय नमः अर्जुनवल्लभाय नमः । अष्टांगविद्याप्रदाय कृष्णाय नमः ॥ ५ ॥ अर्थ: हे हृषीकेश! आपको मेरा नमस्कार है। हे अर्जुनवल्लभ! आपको मेरा नमस्कार है। हे अष्टांगविद्याप्रदा! हे कृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। 6. नमस्ते श्रीकृष्णाय नमः चतुर्भुजाय नमः । पाण्डववल्लभाय कृष्णाय नमः ॥ ६ ॥ अर्थ: हे श्रीकृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। हे चतुर्भुज! आपको मेरा नमस्कार है। हे पाण्डववल्लभ! हे कृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। 7. नमस्ते द्वारकाधीशाय नमः रणधीराय नमः । धर्मराजाय कृष्णाय नमः ॥ ७ ॥ अर्थ: हे द्वारकाधीश! आपको मेरा नमस्कार है। हे रणधीर! आपको मेरा नमस्कार है। हे धर्मराज! हे कृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। 8. नमस्ते सर्वाधाराय नमः सर्वलोकनमस्कारे । सर्वेश्वराय कृष्णाय नमः ॥ ८ ॥ अर्थ: हे सर्वाधार! आपको मेरा नमस्कार है। आपको सभी लोकों में नमस्कार है। हे सर्वेश्वर! हे कृष्ण! आपको मेरा नमस्कार है। नामरत्नाख्यस्तोत्रम् एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है।

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नित्यानन्दाष्टकम् nityaanandaashtakam

नित्यानन्दाष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान विष्णु के अवतार नित्यानन्द के रूप की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में रचित है और इसमें नित्यानन्द के रूप और गुणों का वर्णन किया गया है। स्तोत्र का प्रारंभ नित्यानन्द के रूप और गुणों के वर्णन से होता है। स्तोत्र में नित्यानन्द को सर्वशक्तिमान, दयालु, और करुणामय बताया गया है। नित्यानन्दाष्टकम् का पाठ करने से भगवान नित्यानन्द की कृपा प्राप्त होती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान नित्यानन्द के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। नित्यानन्दाष्टकम् के 8 श्लोक इस प्रकार हैं: 1. श्रीनित्यानन्दाय नमः सर्वाधाराय च नमः । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वात्मने च नमः ॥ १ ॥ अर्थ: हे नित्यानन्द! आपको मेरा नमस्कार है। आप सभी का आधार हैं। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी आत्माओं में निवास करते हैं। 2. नमस्ते सर्वगुणात्मने सर्वशक्तिमते नमः । सर्वमंगलमूर्तिवे सर्वलोकनमस्कारे ॥ २ ॥ अर्थ: हे सर्वगुणात्मन्! आपको मेरा नमस्कार है। आप सर्वशक्तिमान हैं। आप सभी मंगलों के मूर्त रूप हैं। आपको सभी लोकों में नमस्कार है। 3. नमस्ते सर्वात्मने सर्वज्ञाय च नमः । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वाधाराय च नमः ॥ ३ ॥ अर्थ: हे सर्वात्मन्! आपको मेरा नमस्कार है। आप सर्वज्ञ हैं। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी का आधार हैं। 4. नमस्ते सर्वरूपाय सर्वकारणाय च नमः । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वाधाराय च नमः ॥ ४ ॥ अर्थ: हे सर्वरूपिन्! आपको मेरा नमस्कार है। आप सभी कारणों के कारण हैं। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी का आधार हैं। 5. नमस्ते सर्वात्माय सर्वभूताधिपतये नमः । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वाधाराय च नमः ॥ ५ ॥ अर्थ: हे सर्वात्मा! आपको मेरा नमस्कार है। आप सभी प्राणियों के स्वामी हैं। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी का आधार हैं। 6. नमस्ते सर्वमूर्तिवे सर्वगुणसम्पन्नाय च नमः । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वाधाराय च नमः ॥ ६ ॥ अर्थ: हे सर्वमूर्ति! आपको मेरा नमस्कार है। आप सभी गुणों से सम्पन्न हैं। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी का आधार हैं। 7. नमस्ते सर्वाधाराय सर्वलोकनमस्कारे । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वाधाराय च नमः ॥ ७ ॥ अर्थ: हे सर्वाधारिन्! आपको मेरा नमस्कार है। आपको सभी लोकों में नमस्कार है। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी का आधार हैं। 8. नमस्ते सर्वगुणात्मने सर्वशक्तिमते नमः । सर्वमंगलमूर्तिवे सर्वलोकनमस्कारे ॥ ८ ॥ अर्थ: हे सर्वगुणात्मन्! आपको मेरा नमस्कार है। आप सर्वशक्तिमान हैं। आप सभी मंगलों के मूर्त रूप हैं। आपको सभी लोकों में नमस्कार है। नित्यानन्दाष्टकम् एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान नित्यानन्द के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। नित्यानन्द के बारे में कुछ अतिरिक्त जानकारी: नित्यानन्द भगवान विष्णु के अवतार हैं। उन्हें भगवान कृष्ण के पुत्र के रूप में भी जाना जाता है। नित्यानन्द को आनंद का अवतार माना जाता है। वे भगवान nityaanandaashtakam

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पुरीश्वराष्टकम् pureeshvaraashtakam

पूर्णेश्वराष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में रचित है और इसमें भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है। स्तोत्र का प्रारंभ भगवान शिव के रूप और गुणों के वर्णन से होता है। स्तोत्र में भगवान शिव को सर्वशक्तिमान, दयालु, और करुणामय बताया गया है। पूर्णेश्वराष्टकम् का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान शिव के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। पूर्णेश्वराष्टकम् के 8 श्लोक इस प्रकार हैं: 1. नमस्ते पूर्णेश्वराय सर्वाधाराय च नमः । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वात्मने च नमः ॥ १ ॥ अर्थ: हे पूर्णेश्वर! आपको मेरा नमस्कार है। आप सभी का आधार हैं। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी आत्माओं में निवास करते हैं। 2. नमस्ते सर्वगुणात्मने सर्वशक्तिमते नमः । सर्वमंगलमूर्तिवे सर्वलोकनमस्कारे ॥ २ ॥ अर्थ: हे सर्वगुणात्मन्! आपको मेरा नमस्कार है। आप सर्वशक्तिमान हैं। आप सभी मंगलों के मूर्त रूप हैं। आपको सभी लोकों में नमस्कार है। 3. नमस्ते सर्वात्मने सर्वज्ञाय च नमः । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वाधाराय च नमः ॥ ३ ॥ अर्थ: हे सर्वात्मन्! आपको मेरा नमस्कार है। आप सर्वज्ञ हैं। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी का आधार हैं। 4. नमस्ते सर्वरूपाय सर्वकारणाय च नमः । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वाधाराय च नमः ॥ ४ ॥ अर्थ: हे सर्वरूपिन्! आपको मेरा नमस्कार है। आप सभी कारणों के कारण हैं। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी का आधार हैं। 5. नमस्ते सर्वात्माय सर्वभूताधिपतये नमः । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वाधाराय च नमः ॥ ५ ॥ अर्थ: हे सर्वात्मा! आपको मेरा नमस्कार है। आप सभी प्राणियों के स्वामी हैं। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी का आधार हैं। 6. नमस्ते सर्वमूर्तिवे सर्वगुणसम्पन्नाय च नमः । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वाधाराय च नमः ॥ ६ ॥ अर्थ: हे सर्वमूर्ति! आपको मेरा नमस्कार है। आप सभी गुणों से सम्पन्न हैं। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी का आधार हैं। 7. नमस्ते सर्वाधाराय सर्वलोकनमस्कारे । सर्वेश्वराय नमस्ते सर्वाधाराय च नमः ॥ ७ ॥ अर्थ: हे सर्वाधारिन्! आपको मेरा नमस्कार है। आपको सभी लोकों में नमस्कार है। आप सर्वेश्वर हैं। आप सभी का आधार हैं। 8. नमस्ते सर्वगुणात्मने सर्वशक्तिमते नमः । सर्वमंगलमूर्तिवे सर्वलोकनमस्कारे ॥ ८ ॥ अर्थ: हे सर्वगुणात्मन्! आपको मेरा नमस्कार है। आप सर्वशक्तिमान हैं। आप सभी मंगलों के मूर्त रूप हैं। आपको सभी लोकों में नमस्कार है। पूर्णेश्वराष्टकम् एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान शिव के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। pureeshvaraashtakam

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प्रणामप्रणयाख्यस्तवः pranapranyaakhyaastavah

प्राणप्रणयैक्यस्थाव एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “प्राण और प्राण का एकीकरण।” यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति का प्राण और प्राण, या सांस और चेतना, एक साथ मिल जाते हैं। इस स्थिति में, व्यक्ति को शांति, आनंद और पूर्णता की गहरी भावना का अनुभव होता है। प्राणप्रणयैक्यस्थाव को प्राप्त करने के लिए, एक व्यक्ति को योग या ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। योग और ध्यान के अभ्यास से, एक व्यक्ति अपने प्राण और प्राण को नियंत्रित करना और उन्हें एक साथ लाने में सक्षम हो जाता है। प्राणप्रणयैक्यस्थाव एक ऐसी स्थिति है जो बहुत ही दुर्लभ और पवित्र मानी जाती है। इस स्थिति को प्राप्त करने वाले व्यक्ति को भगवान के साथ एकता का अनुभव होता है। प्राणप्रणयैक्यस्थाव के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं: शांति और आनंद की गहरी भावना पूर्णता की भावना आत्मज्ञान की प्राप्ति भगवान के साथ एकता का अनुभव प्राणप्रणयैक्यस्थाव एक ऐसी स्थिति है जो एक व्यक्ति के जीवन को पूरी तरह से बदल सकती है। यह एक व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से विकसित करने और अपने जीवन के उद्देश्य को समझने में मदद कर सकती है। प्राणप्रणयैक्यस्थाव को प्राप्त करने के लिए, एक व्यक्ति को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: नियमित रूप से योग या ध्यान का अभ्यास करें। अपने मन को शांत और केंद्रित रखें। अपने प्राण और प्राण पर ध्यान केंद्रित करें। भगवान के प्रति समर्पण और प्रेम रखें। प्राणप्रणयैक्यस्थाव एक ऐसी स्थिति है जिसे प्राप्त करना आसान नहीं है, लेकिन यह एक ऐसा अनुभव है जो एक व्यक्ति को जीवन भर के लिए बदल सकता है। pranapranyaakhyaastavah

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