श्रीकृष्ण

गोवर्धनाश्रयदशकम् (रघुनाथदासगोस्वामिविरचितम्) Govardhanashrayadasakam (Raghunathdasgoswamivirachitam)

गोवर्धनशरणदासकम् (रघुनाथदासगोस्वामीविरचितम्) एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 17वीं शताब्दी के वैष्णव संत और कवि रघुनाथदास गोस्वामी द्वारा रचित था। Govardhanashrayadasakam (Raghunathdasgoswamivirachitam) स्तोत्र के 10 श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला के एक विशेष पहलू की स्तुति की गई है। प्रथम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, और तुमने गोकुलवासियों को बचाया था। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक आश्रय हो। द्वितीय श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों की रक्षा की थी। तुमने दिखाया कि तुम सर्वशक्तिमान हो, और तुम अपने भक्तों के लिए कुछ भी कर सकते हो। तृतीय श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने प्रकृति की शक्ति को भी पराजित किया था। तुमने दिखाया कि तुम प्रकृति के नियमों से ऊपर हो, और तुम अपने भक्तों के लिए कुछ भी कर सकते हो। चतुर्थ श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों को एक महत्वपूर्ण सबक सिखाया था। तुमने दिखाया कि भक्ति ही सबसे शक्तिशाली शक्ति है, और यह सब कुछ हासिल कर सकती है। पंचम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक मजबूत आश्रय प्रदान किया था। तुमने दिखाया कि तुम हमेशा अपने भक्तों के साथ हो, और तुम उन्हें किसी भी संकट से बचा सकते हो। षष्ठम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक आदर्श स्थापित किया था। तुमने दिखाया कि भक्तों को हमेशा अपने ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए, और ईश्वर हमेशा उनके साथ रहेगा। सप्तम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक प्रेरणा प्रदान की है। तुमने दिखाया कि भक्ति ही जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है, और यह हमें सभी सुखों को प्राप्त करने में मदद कर सकती है। अष्टम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक आशीर्वाद दिया है। तुमने दिखाया कि तुम हमेशा अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हो, और तुम उन्हें हमेशा खुश रखते हो। नवम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक वरदान दिया है। तुमने दिखाया कि तुम हमेशा अपने भक्तों के साथ हो, और तुम उन्हें हमेशा प्यार करते हो। दशम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक आशा दी है। तुमने दिखाया कि भक्ति ही जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है, और यह हमें सभी सुखों को प्राप्त करने में मदद कर सकती है। गोवर्धनशरणदासकम् एक लोकप्रिय स्तोत्र है जो अक्सर कृष्ण भक्तों द्वारा पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र कृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है। स्तोत्र के कुछ महत्वपूर्ण पहलू स्तोत्र कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करता है। स्तोत्र कृष्ण की शक्ति, दया और प्रेम की महिमा का बखान करता है। स्तोत्र गोवर्धन पर्वत को कृष्ण की कृपा और शक्ति का प्रतीक मानता है। स्तोत्र का महत्व

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गोवर्धनाष्टकम् (विश्वनाथचक्रवर्तिन् ठक्कुरविरचितम्) Govardhanashtakam (Vishwanathchakravartin Thakkurvirchitam)

गोवर्धनष्टकम् (विश्वनाथचक्रवर्तिन ठाकुरविरचितम्) एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 17वीं शताब्दी के वैष्णव संत और विद्वान विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा रचित था। Govardhanashtakam (Vishwanathchakravartin Thakkurvirchitam) स्तोत्र के आठ श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला के एक विशेष पहलू की स्तुति की गई है। प्रथम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण के द्वारा उठाए गए थे, और तुमने गोकुलवासियों को बचाया था। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक आश्रय हो। द्वितीय श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की लीलाओं का साक्षी हो, और तुमने उनकी महिमा का प्रचार किया है। तुम कृष्ण के प्रेम का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक आशीर्वाद हो। तृतीय श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की भक्ति का केंद्र हो, और तुम भक्तों को उनके लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक मार्गदर्शक हो। चतुर्थ श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की शक्ति का प्रतीक हो, और तुम भक्तों को उनके दुखों से छुटकारा दिलाते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक ताकत हो। पंचम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की दया का प्रतीक हो, और तुम भक्तों को उनके पापों से छुटकारा दिलाते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक आशा हो। षष्ठम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की भक्ति का सार हो, और तुम भक्तों को मोक्ष प्राप्त करने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक वरदान हो। सप्तम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की प्रेम की अभिव्यक्ति हो, और तुम भक्तों को उनके जीवन को अर्थपूर्ण बनाने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक प्रेरणा हो। अष्टम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की लीलाओं का स्मरण हो, और तुम भक्तों को उनके जीवन में कृष्ण की उपस्थिति को महसूस करने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक पवित्र स्थान हो। गोवर्धनष्टकम् (विश्वनाथचक्रवर्तिन ठाकुरविरचितम्) एक लोकप्रिय स्तोत्र है जो अक्सर कृष्ण भक्तों द्वारा पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र कृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है। स्तोत्र के कुछ महत्वपूर्ण पहलू स्तोत्र कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करता है। स्तोत्र कृष्ण की शक्ति, दया और प्रेम की महिमा का बखान करता है। स्तोत्र गोवर्धन पर्वत को कृष्ण की कृपा और शक्ति का प्रतीक मानता है। स्तोत्र का महत्व गोवर्धनष्टकम् (विश्वनाथचक्रवर्तिन ठाकुरविरचितम्) एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो कृष्ण भक्तों को आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा सकता है। यह स्तोत्र कृष्ण की कृपा और शक्ति पर जोर देता है, और यह कृष्ण भक्तों को उनकी भक्ति में दृढ़ रहने के लिए प्रेरित कर सकता है। गोवर्धनष्टकम् (विश्वनाथचक्रवर्तिन ठाकुरविरचितम्) और गोवर्धनष्टकम् (रूपगोस्वामीविरचितम्) के बीच अंतर गोवर्धनष्टकम् (विश्वनाथचक्रवर्तिन ठाकुर Govardhanashtakam (Vishwanathchakravartin Thakkurvirchitam)

गोवर्धनाष्टकम् (विश्वनाथचक्रवर्तिन् ठक्कुरविरचितम्) Govardhanashtakam (Vishwanathchakravartin Thakkurvirchitam) Read More »

गोवर्धनाष्टकम् १ (रूपगोस्वामिविरचितम् Govardhanashtakam 1 (Roopagoswamivirachitam

गोवर्धनष्टकम् 1 (रूपगोस्वामीविरचितम्) एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 16वीं शताब्दी के वैष्णव संत और कवि रूपगोस्वामी द्वारा रचित था। स्तोत्र के आठ श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला के एक विशेष पहलू की स्तुति की गई है। प्रथम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण के द्वारा उठाए गए थे, और तुमने गोकुलवासियों को बचाया था। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक आश्रय हो। द्वितीय श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की लीलाओं का साक्षी हो, और तुमने उनकी महिमा का प्रचार किया है। तुम कृष्ण के प्रेम का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक आशीर्वाद हो। तृतीय श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की भक्ति का केंद्र हो, और तुम भक्तों को उनके लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक मार्गदर्शक हो। चतुर्थ श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की शक्ति का प्रतीक हो, और तुम भक्तों को उनके दुखों से छुटकारा दिलाते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक ताकत हो। पंचम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की दया का प्रतीक हो, और तुम भक्तों को उनके पापों से छुटकारा दिलाते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक आशा हो। षष्ठम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की भक्ति का सार हो, और तुम भक्तों को मोक्ष प्राप्त करने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक वरदान हो। सप्तम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की प्रेम की अभिव्यक्ति हो, और तुम भक्तों को उनके जीवन को अर्थपूर्ण बनाने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक प्रेरणा हो। अष्टम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की लीलाओं का स्मरण हो, और तुम भक्तों को उनके जीवन में कृष्ण की उपस्थिति को महसूस करने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक पवित्र स्थान हो। गोवर्धनष्टकम् 1 एक लोकप्रिय स्तोत्र है जो अक्सर कृष्ण भक्तों द्वारा पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र कृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है। स्तोत्र के कुछ महत्वपूर्ण पहलू स्तोत्र कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करता है। स्तोत्र कृष्ण की शक्ति, दया और प्रेम की महिमा का बखान करता है। स्तोत्र गोवर्धन पर्वत को कृष्ण की कृपा और शक्ति का प्रतीक मानता है। स्तोत्र का महत्व गोवर्धनष्टकम् 1 एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो कृष्ण भक्तों को आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा सकता है। यह स्तोत्र कृष्ण की कृपा और शक्ति पर जोर देता है, और यह कृष्ण भक्तों को उनकी भक्ति में दृढ़ रहने के लिए प्रेरित कर सकता है। गोवर्धनष्टकम् 1 और गोवर्धनष्टकम् 2 के बीच अंतर गोवर्धनष्टकम् 1 और गोवर्धनष्टकम् 2 दोनों ही कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करते हैं। हालांकि, दोनों स्तोत्रों में कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं। गोवर्धनष्टकम् 1 में, स्तोत्र गोवर्धन पर्वत को Govardhanashtakam 1 (Roopagoswamivirachitam

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गोवर्धनाष्टकम् २ (रूपगोस्वामिविरचितम्) Govardhanashtakam 2 (Roopagoswamivirachitam)

गोवर्धनष्टकम् 2 (रूपगोस्वामीविरचितम्) एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 16वीं शताब्दी के वैष्णव संत और कवि रूपगोस्वामी द्वारा रचित था। स्तोत्र के आठ श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला के एक विशेष पहलू की स्तुति की गई है। प्रथम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण के द्वारा उठाए गए थे, और तुमने गोकुलवासियों को बचाया था। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक आश्रय हो। द्वितीय श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की लीलाओं का साक्षी हो, और तुमने उनकी महिमा का प्रचार किया है। तुम कृष्ण के प्रेम का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक आशीर्वाद हो। तृतीय श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की भक्ति का केंद्र हो, और तुम भक्तों को उनके लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक मार्गदर्शक हो। चतुर्थ श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की शक्ति का प्रतीक हो, और तुम भक्तों को उनके दुखों से छुटकारा दिलाते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक ताकत हो। पंचम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की दया का प्रतीक हो, और तुम भक्तों को उनके पापों से छुटकारा दिलाते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक आशा हो। षष्ठम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की भक्ति का सार हो, और तुम भक्तों को मोक्ष प्राप्त करने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक वरदान हो। सप्तम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की प्रेम की अभिव्यक्ति हो, और तुम भक्तों को उनके जीवन को अर्थपूर्ण बनाने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक प्रेरणा हो। अष्टम श्लोक हे गोवर्धन, तुम कृष्ण की लीलाओं का स्मरण हो, और तुम भक्तों को उनके जीवन में कृष्ण की उपस्थिति को महसूस करने में मदद करते हो। तुम कृष्ण की कृपा का प्रतीक हो, और तुम भक्तों के लिए एक पवित्र स्थान हो। गोवर्धनष्टकम् 2 एक लोकप्रिय स्तोत्र है जो अक्सर कृष्ण भक्तों द्वारा पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र कृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है। स्तोत्र के कुछ महत्वपूर्ण पहलू स्तोत्र कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करता है। स्तोत्र कृष्ण की शक्ति, दया और प्रेम की महिमा का बखान करता है। स्तोत्र गोवर्धन पर्वत को कृष्ण की कृपा और शक्ति का प्रतीक मानता है। स्तोत्र का महत्व गोवर्धनष्टकम् 2 एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो कृष्ण भक्तों को आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा सकता है। यह स्तोत्र कृष्ण की कृपा और शक्ति पर जोर देता है, और यह कृष्ण भक्तों को उनकी भक्ति में दृढ़ रहने के लिए प्रेरित कर सकता है। Govardhanashtakam 2 (Roopagoswamivirachitam)

गोवर्धनाष्टकम् २ (रूपगोस्वामिविरचितम्) Govardhanashtakam 2 (Roopagoswamivirachitam) Read More »

गोवर्धनोद्धरणम् (रूपगोस्वामिविरचितम्) Govardhanodharanam (Rupagoswamivirachitam)

गोवर्धनधारणम् (रूपगोस्वामीविरचितम्) एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 16वीं शताब्दी के वैष्णव संत और कवि रूपगोस्वामी द्वारा रचित था। स्तोत्र के 10 श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला के एक विशेष पहलू की स्तुति की गई है। प्रथम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाया था, और तुमने इसे 7 दिन तक उठाए रखा था। तुमने अपनी दिव्य शक्ति से दुष्ट इंद्र को पराजित किया था, और तुमने गोकुलवासियों की रक्षा की थी। द्वितीय श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों की रक्षा की थी। तुमने दिखाया कि तुम सर्वशक्तिमान हो, और तुम अपने भक्तों के लिए कुछ भी कर सकते हो। तृतीय श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने प्रकृति की शक्ति को भी पराजित किया था। तुमने दिखाया कि तुम प्रकृति के नियमों से ऊपर हो, और तुम अपने भक्तों के लिए कुछ भी कर सकते हो। चतुर्थ श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों को एक महत्वपूर्ण सबक सिखाया था। तुमने दिखाया कि भक्ति ही सबसे शक्तिशाली शक्ति है, और यह सब कुछ हासिल कर सकती है। पंचम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक मजबूत आश्रय प्रदान किया था। तुमने दिखाया कि तुम हमेशा अपने भक्तों के साथ हो, और तुम उन्हें किसी भी संकट से बचा सकते हो। षष्ठम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक आदर्श स्थापित किया था। तुमने दिखाया कि भक्तों को हमेशा अपने ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए, और ईश्वर हमेशा उनके साथ रहेगा। सप्तम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक प्रेरणा प्रदान की है। तुमने दिखाया कि भक्ति ही जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है, और यह हमें सभी सुखों को प्राप्त करने में मदद कर सकती है। अष्टम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक आशीर्वाद दिया है। तुमने दिखाया कि तुम हमेशा अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हो, और तुम उन्हें हमेशा खुश रखते हो। नवम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक वरदान दिया है। तुमने दिखाया कि तुम हमेशा अपने भक्तों के साथ हो, और तुम उन्हें हमेशा प्यार करते हो। दशम श्लोक हे कृष्ण, तुमने गोवर्धन पर्वत को उठाकर, तुमने अपने भक्तों के लिए एक आशा दी है। तुमने दिखाया कि भक्ति ही जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है, और यह हमें सभी सुखों को प्राप्त करने में मदद कर सकती है। गोवर्धनधारणम् एक लोकप्रिय स्तोत्र है जो अक्सर कृष्ण भक्तों द्वारा पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र कृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है। स्तोत्र के कुछ महत्वपूर्ण पहलू स्तोत्र कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की लीला की स्तुति करता है। स्तोत्र कृष्ण की शक्ति और दया की महिमा का बखान करता है। स्तोत्र कृष्ण की भक्ति के महत्व पर जोर देता है। स्तोत्र का महत्व गोवर्धनधारणम् एक शक्तिशा Govardhanodharanam (Rupagoswamivirachitam)

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गोविन्ददामोदरस्तोत्रम् (बिल्वमङ्गलाचार्यविरचित) Govindadamodarastotram

गोविंदादमोदरस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के अवतार गोविंदादमोदर की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 17वीं शताब्दी के वैष्णव संत और विद्वान विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा रचित था। स्तोत्र के पांच श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में कृष्ण के एक विशेष पहलू की स्तुति की गई है। Govindadamodarastotram गोविन्ददेवाष्टकम् (विश्वनाथचक्रवर्तिन् ठक्कुरविरचितम्) Govindadevashtakam (Vishwanathchakravartin Thakkurvirachitam) प्रथम श्लोक श्यामसुंदर गोविंदादमोदर, अविनाशी अनंत अद्वितीय। करुणामय ज्ञानी दयालु, दुष्टों का नाश भक्तों का रक्षक। द्वितीय श्लोक अनंत गुणों से युक्त, भक्तों पर कृपा करने वाले। अद्भुत लीलाओं के रचयिता, अनंत लीलाओं के स्वामी। तृतीय श्लोक भक्ति ही मोक्ष का मार्ग, कृष्ण की भक्ति अद्वितीय। कृष्ण की भक्ति से मिलता है, मोक्ष का सुख अविनाशी। चतुर्थ श्लोक कृष्ण के भक्तों पर कृपा, कृष्ण की भक्ति से होता है। कृष्ण के भक्तों को मिलता है, सर्व सुखों का समुदाय। पंचम श्लोक कृष्ण के भक्तों का रक्षक, कृष्ण के भक्तों का आश्रय। कृष्ण के भक्तों पर कृपा, कृष्ण के भक्तों को मिलती है। अंतिम श्लोक वंदे गोविंदादमोदरं, कृष्णाय नमस्कारं। कृष्ण के रूप की वंदना, कृष्ण को नमस्कार। हिंदी अनुवाद प्रथम श्लोक हे श्यामसुंदर गोविंदादमोदर, तुम अविनाशी, अनंत और अद्वितीय हो। तुम करुणामय, ज्ञानी और दयालु हो, और तुम दुष्टों का नाश करने वाले और भक्तों के रक्षक हो। द्वितीय श्लोक तुम अनंत गुणों से युक्त हो, और तुम अपने भक्तों पर कृपा करते हो। तुम अद्भुत लीलाओं के रचयिता हो, और तुम अनंत लीलाओं के स्वामी हो। तृतीय श्लोक भक्ति ही मोक्ष का मार्ग है, और तुम्हारी भक्ति अद्वितीय है। तुम्हारी भक्ति से मोक्ष का सुख मिलता है, जो अविनाशी है। चतुर्थ श्लोक तुम्हारी भक्ति से तुम्हारे भक्तों पर कृपा होती है, और उन्हें सभी सुखों की प्राप्ति होती है। तुम अपने भक्तों के रक्षक और आश्रय हो, और तुम अपने भक्तों पर कृपा करते हो। पंचम श्लोक हे गोविंदादमोदर, हम तुम्हारी वंदना करते हैं। हे कृष्ण, हम तुम्हें नमस्कार करते हैं। गोविंदादमोदरस्तोत्र एक लोकप्रिय स्तोत्र है जो अक्सर कृष्ण भक्तों द्वारा पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र कृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है। स्तोत्र के कुछ महत्वपूर्ण पहलू स्तोत्र कृष्ण के रूप, गुणों और लीलाओं की स्तुति करता है। स्तोत्र कृष्ण की भक्ति के महत्व पर भी जोर देता है। स्तोत्र कृष्ण के भक्तों के लिए कृष्ण की कृपा की गारंटी देता है। स्तोत्र का महत्व गोविंदादमोदरस्तोत्र एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो कृष्ण भक्तों को आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा सकता है। यह स्तोत्र कृष्ण की भक्ति के महत्व पर जोर देता है, और यह कृष्ण के भक्तों को उनकी कृपा पाने के लिए प्रेरित कर सकता है। Govindadamodarastotram

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गोविन्ददेवाष्टकम् (विश्वनाथचक्रवर्तिन् ठक्कुरविरचितम्) Govindadevashtakam (Vishwanathchakravartin Thakkurvirachitam)

Govindadevashtakam, एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के अवतार गोविंददेव की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 17वीं शताब्दी के वैष्णव संत और विद्वान विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा रचित था। स्तोत्र में, ठाकुर कृष्ण के रूप, गुणों और लीलाओं का वर्णन करते हैं। वे कृष्ण को सर्वोच्च भगवान के रूप में स्वीकार करते हैं, जो समस्त सृष्टि के सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारक हैं। स्तोत्र के आठ श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में कृष्ण के एक विशेष पहलू की स्तुति की गई है। Govindadevashtakam (Vishwanathchakravartin Thakkurvirachitam) प्रथम श्लोक में, ठाकुर कृष्ण के रूप की स्तुति करते हैं। वे उन्हें “श्यामसुंदर” कहते हैं, जिसका अर्थ है “श्याम रंग का सुंदर”। वे कृष्ण के रूप को “अविनाशी”, “अनन्त” और “अद्वितीय” कहते हैं। दूसरे श्लोक में, ठाकुर कृष्ण के गुणों की स्तुति करते हैं। वे उन्हें “महान करुणामय”, “ज्ञानी” और “दयालु” कहते हैं। वे कृष्ण को “दुष्टों का नाश करने वाला” और “भक्तों का रक्षक” कहते हैं। तीसरे श्लोक में, ठाकुर कृष्ण की लीलाओं की स्तुति करते हैं। वे उन्हें “अद्भुत लीलाओं का रचयिता” कहते हैं। वे कृष्ण की लीलाओं को “अनंत” और “अद्वितीय” कहते हैं। चौथे श्लोक में, ठाकुर कृष्ण की भक्ति के महत्व की स्तुति करते हैं। वे कहते हैं कि कृष्ण की भक्ति ही मोक्ष का मार्ग है। वे कृष्ण की भक्ति को “अद्वितीय” और “अतिशय शक्तिशाली” कहते हैं। पांचवें श्लोक में, ठाकुर कृष्ण के भक्तों के लिए कृष्ण की कृपा की स्तुति करते हैं। वे कहते हैं कि कृष्ण अपने भक्तों पर अत्यंत कृपालु हैं। वे कृष्ण को “भक्तों का आश्रय” और “भक्तों का रक्षक” कहते हैं। छठे श्लोक में, ठाकुर कृष्ण के भक्तों के लिए कृष्ण की आशीषों की स्तुति करते हैं। वे कहते हैं कि कृष्ण अपने भक्तों को सभी प्रकार के सुखों से संपन्न करते हैं। वे कृष्ण को “भक्तों का कल्याणकारी” और “भक्तों का हितकारी” कहते हैं। सातवें श्लोक में, ठाकुर कृष्ण की भक्ति के लिए अपने स्वयं के प्रेम और भक्ति की अभिव्यक्ति करते हैं। वे कृष्ण के भक्त बनने की इच्छा व्यक्त करते हैं। आठवें श्लोक में, ठाकुर कृष्ण की स्तुति करते हुए स्तोत्र का समापन करते हैं। वे कृष्ण को “सर्वोच्च भगवान” कहते हैं, और उनकी स्तुति करते हुए अपना सिर झुकाते हैं। Govindadevashtakam एक लोकप्रिय स्तोत्र है जो अक्सर कृष्ण भक्तों द्वारा पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र कृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है। Govindadevashtakam (Vishwanathchakravartin Thakkurvirachitam)

गोविन्ददेवाष्टकम् (विश्वनाथचक्रवर्तिन् ठक्कुरविरचितम्) Govindadevashtakam (Vishwanathchakravartin Thakkurvirachitam) Read More »

गोविन्दबिरुदावलिः (रूपगोस्वामिविरचिता) Govindabirudavalih (Rupagoswamivirchita)

गोविन्दविरुद्धावली (रुद्रगोस्वामीविरचित) एक संस्कृत ग्रन्थ है जो भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं का वर्णन करता है। यह ग्रन्थ 16वीं शताब्दी के वैष्णव संत और दार्शनिक रुद्रगोस्वामी द्वारा लिखा गया था। ग्रन्थ का नाम विरुद्धावली इसलिए है क्योंकि इसमें भगवान कृष्ण और राधा के रूप, गुण और लीलाओं का वर्णन किया गया है, जो एक दूसरे के विपरीत हैं। उदाहरण के लिए, भगवान कृष्ण को अक्सर एक बालक के रूप में वर्णित किया जाता है, जबकि राधा को एक युवा महिला के रूप में वर्णित किया जाता है। भगवान कृष्ण को अक्सर एक चरित्र के रूप में वर्णित किया जाता है जो अपने भक्तों को मुक्ति प्रदान करता है, जबकि राधा को अक्सर एक चरित्र के रूप में वर्णित किया जाता है जो अपने भक्तों को प्रेम और आनंद प्रदान करती है। गोविन्दविरुद्धावली एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं को एक नए और अनोखे दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। गोविन्दविरुद्धावली के प्रमुख विषय निम्नलिखित हैं:** भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं का वर्णन भगवान कृष्ण और राधा के रूप, गुण और लीलाओं की विपरीतता भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व गोविन्दविरुद्धावली के कुछ प्रमुख विचार निम्नलिखित हैं:** भगवान कृष्ण और राधा एक ही हैं। भगवान कृष्ण और राधा की लीलाएँ एक दूसरे के पूरक हैं। भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं का उद्देश्य भक्तों को प्रेम और मुक्ति प्रदान करना है। गोविन्दविरुद्धावली का प्रभाव** गोविन्दविरुद्धावली ने हिंदू धर्म पर एक गहरा प्रभाव डाला है। यह ग्रन्थ भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं को एक नए और अनोखे दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। इस ग्रन्थ ने भगवान कृष्ण और राधा की भक्ति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गोविन्दविरुद्धावली का अनुवाद** गोविन्दविरुद्धावली का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। हिंदी में इसका अनुवाद हरिकृष्ण द्वैवेदी ने किया है। गोविन्दविरुद्धावली का सार** गोविन्दविरुद्धावली एक ऐसी रचना है जो भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं को एक नए और अनोखे दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। यह ग्रन्थ भगवान कृष्ण और राधा के रूप, गुण और लीलाओं की विपरीतता पर प्रकाश डालता है, लेकिन यह भी दर्शाता है कि वे एक ही हैं। ग्रन्थ का उद्देश्य यह है कि भक्त भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं को बेहतर ढंग से समझें और उनकी भक्ति में वृद्धि करें। Govindabirudavalih (Rupagoswamivirchita)

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गोविन्दराजप्रपत्तिः Govindrajprapatthi

गोविन्दराजप्रपत्ति एक वैष्णव आध्यात्मिक अवधारणा है जो भगवान कृष्ण की शरण में जाने की प्रक्रिया को संदर्भित करती है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें भक्त भगवान कृष्ण को अपना सर्वस्व मानते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए उनके प्रति पूर्ण समर्पण करते हैं। गोविन्दराजप्रपत्ति की प्राप्ति के लिए, भक्त को भगवान कृष्ण के प्रति पूर्ण प्रेम और भक्ति विकसित करनी चाहिए। उन्हें भगवान कृष्ण के रूप, गुण और लीलाओं का गहन अध्ययन करना चाहिए और उनके जीवन को भगवान कृष्ण के आदर्शों के अनुरूप जीना चाहिए। गोविन्दराजप्रपत्ति की प्राप्ति के कई लाभ हैं। यह भक्त को भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करने में मदद करता है, जो उन्हें मोक्ष की प्राप्ति में सहायता करता है। यह भक्त को आध्यात्मिक ज्ञान और शांति प्राप्त करने में भी मदद करता है। गोविन्दराजप्रपत्ति के कुछ प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं: भगवान कृष्ण के प्रति पूर्ण प्रेम और भक्ति भगवान कृष्ण के रूप, गुण और लीलाओं का गहन अध्ययन भगवान कृष्ण के आदर्शों के अनुरूप जीवन जीना भगवान कृष्ण की शरण में जाने की इच्छा गोविन्दराजप्रपत्ति के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं: भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करना मोक्ष की प्राप्ति आध्यात्मिक ज्ञान और शांति प्राप्त करना गोविन्दराजप्रपत्ति की प्राप्ति के लिए कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं: नियमित रूप से भगवान कृष्ण की पूजा करें। भगवान कृष्ण की कथाओं और लीलाओं का अध्ययन करें। भगवान कृष्ण के नाम का जाप करें। भगवान कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण करें। गोविन्दराजप्रपत्ति एक ऐसा मार्ग है जो भक्तों को भगवान कृष्ण के साथ एक गहरा संबंध बनाने में मदद करता है। यह एक ऐसी स्थिति है जो भक्तों को आध्यात्मिक विकास और मोक्ष की प्राप्ति में मदद करती है। गोविन्दराजप्रपत्ति की प्राप्ति के लिए कुछ प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं: ज्ञान : भक्त को भगवान कृष्ण के बारे में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। उन्हें भगवान कृष्ण के रूप, गुण और लीलाओं के बारे में जानना चाहिए। भक्ति : भक्त को भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति विकसित करनी चाहिए। उन्हें भगवान कृष्ण को अपना सर्वस्व मानना चाहिए। समर्पण : भक्त को भगवान कृष्ण की शरण में जाना चाहिए और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए उन्हें अपना जीवन समर्पित करना चाहिए। गोविन्दराजप्रपत्ति एक ऐसा मार्ग है जो भक्तों को भगवान कृष्ण के साथ एक गहरा संबंध बनाने में मदद करता है। यह एक ऐसी स्थिति है जो भक्तों को आध्यात्मिक विकास और मोक्ष की प्राप्ति में मदद करती है। Govindrajprapatthi

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गोविन्दराजस्तुतिः (सुदर्शनवरदनारायणदासकृता) Govindarajstuti (Sudarshanvaradnarayandaskrita)

Govindarajstuti (Sudarshanvaradnarayandaskrita) गोविन्दराजस्तुति (सुदर्शनवरदनारायणदृष्टा) एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 17वीं शताब्दी के वैष्णव संत और दार्शनिक सुदर्शनवरदनारायण द्वारा लिखा गया था। स्तोत्र का प्रारंभ भगवान कृष्ण के रूप और गुणों के वर्णन से होता है। स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक बालक के रूप में वर्णित किया गया है, जो अपने रूप और गुणों से सभी को मोहित करते हैं। गोविन्दराजस्तुति का पाठ करने से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। गोविन्दराजस्तुति के 10 श्लोक इस प्रकार हैं: 1. गोविन्दराजाय नमः । गोपीवल्लभाय नमः । कृष्णाय नमः । अर्थ: गोविन्दराज को नमस्कार, गोपीवल्लभ को नमस्कार, कृष्ण को नमस्कार। 2. श्यामसुन्दरं मधुसूदनं । वृन्दावनवासिनं । राधाकृष्णं नमामि । अर्थ: श्यामसुन्दर, मधुसूदन, वृन्दावनवासी, राधाकृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं। 3. यस्य नामोच्चारणमात्रेण । पापमोक्षो भवेत् । तस्मै कृष्णाय नमामि । अर्थ: जिसका नामोच्चारणमात्र से, पापों से मुक्ति मिलती है, उस कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं। 4. वंशीवादिनं मुरलीधरं । गोपीवल्लभाय नमः । कृष्णाय नमः । अर्थ: वंशी बजाने वाले, मुरलीधर, गोपीवल्लभ को नमस्कार, कृष्ण को नमस्कार। 5. यस्य दर्शनमात्रेण । मोहजालभंजनं । तस्मै कृष्णाय नमामि । अर्थ: जिसके दर्शनमात्र से, मोहजाल का भंजन होता है, उस कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं। 6. गोपियों के साथ रास खेलने वाले । कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं। 7. राधिका के साथ प्रेम लीला करने वाले । कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं। 8. समस्त लोकों के स्वामी । कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं। 9. सर्वव्यापी । कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं। 10. सर्वशक्तिमान । कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं। गोविन्दराजस्तुति एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। Govindarajstuti (Sudarshanvaradnarayandaskrita)

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गोविन्दविरुदावली (रूपगोस्वामिविरचिता) Govindavirudavali (Rupagoswamivirchita)

Govindavirudavali (Rupagoswamivirchita) गोविन्दविरुद्धावली (रुद्रगोस्वामीविरचित) एक संस्कृत ग्रन्थ है जो भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं का वर्णन करता है। यह ग्रन्थ 16वीं शताब्दी के वैष्णव संत और दार्शनिक रुद्रगोस्वामी द्वारा लिखा गया था। ग्रन्थ का नाम विरुद्धावली इसलिए है क्योंकि इसमें भगवान कृष्ण और राधा के रूप, गुण और लीलाओं का वर्णन किया गया है, जो एक दूसरे के विपरीत हैं। उदाहरण के लिए, भगवान कृष्ण को अक्सर एक बालक के रूप में वर्णित किया जाता है, जबकि राधा को एक युवा महिला के रूप में वर्णित किया जाता है। भगवान कृष्ण को अक्सर एक चरित्र के रूप में वर्णित किया जाता है जो अपने भक्तों को मुक्ति प्रदान करता है, जबकि राधा को अक्सर एक चरित्र के रूप में वर्णित किया जाता है जो अपने भक्तों को प्रेम और आनंद प्रदान करती है। गोविन्दविरुद्धावली एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं को एक नए और अनोखे दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। गोविन्दविरुद्धावली के प्रमुख विषय निम्नलिखित हैं:** भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं का वर्णन भगवान कृष्ण और राधा के रूप, गुण और लीलाओं की विपरीतता भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व गोविन्दविरुद्धावली के कुछ प्रमुख विचार निम्नलिखित हैं:** भगवान कृष्ण और राधा एक ही हैं। भगवान कृष्ण और राधा की लीलाएँ एक दूसरे के पूरक हैं। भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं का उद्देश्य भक्तों को प्रेम और मुक्ति प्रदान करना है। गोविन्दविरुद्धावली का प्रभाव** गोविन्दविरुद्धावली ने हिंदू धर्म पर एक गहरा प्रभाव डाला है। यह ग्रन्थ भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं को एक नए और अनोखे दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। इस ग्रन्थ ने भगवान कृष्ण और राधा की भक्ति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गोविन्दविरुद्धावली का अनुवाद** गोविन्दविरुद्धावली का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। हिंदी में इसका अनुवाद हरिकृष्ण द्वैवेदी ने किया है।

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गोविन्दस्तोत्रम् Govindastotram

Govindastotram गोविन्दस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 10 श्लोकों में रचित है और इसमें भगवान कृष्ण के रूप, गुण और लीलाओं का वर्णन किया गया है। स्तोत्र का प्रारंभ भगवान कृष्ण के रूप और गुणों के वर्णन से होता है। स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक बालक के रूप में वर्णित किया गया है, जो अपने रूप और गुणों से सभी को मोहित करते हैं। गोविन्दस्तोत्र का पाठ करने से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है। गोविन्दस्तोत्रम् के 10 श्लोक इस प्रकार हैं: 1. गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द। मैया बिनवौं तोरी शरण जोई। अर्थ: हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द। माँ, मैं आपकी शरण में आता हूँ। 2. बालक रूप धरि राधिका सहित। गोकुल धाम में खेलत फिरौ। अर्थ: बालक रूप धारण करके राधा के साथ, गोकुल धाम में खेलते फिरते हो। 3. गोपिया संग नन्दनंदन। रास खेलत मधुर नृत्य करत। अर्थ: गोपियों के साथ नंदनंदन, मधुर नृत्य करते हैं। 4. गोपी संग प्रेम लीला। करत सदा मधुर रसीला। अर्थ: गोपियों के साथ प्रेम लीला, सदैव मधुर रसीला करते हैं। 5. कान्हा कन्हैया बृज बिहारी। श्याम सुन्दर गोपाल मुरारी। अर्थ: कान्हा, कन्हैया, बृज बिहारी, श्याम सुन्दर, गोपाल, मुरारी। 6. नन्दनन्दन मुरारि। गोपिका प्रिय राधिका पति। अर्थ: नन्द के पुत्र मुरारी, गोपियों के प्रिय राधिका के पति। 7. मधुर मधुर बोल बोलत। सबके मन को मोहत। अर्थ: मधुर मधुर बोल बोलते हैं, सबके मन को मोहते हैं। 8. मधुर मधुर वंशी बजावत। सबको आनंदित करावत। अर्थ: मधुर मधुर वंशी बजाते हैं, सबको आनंदित कराते हैं। 9. प्रेमी प्रेमिका संग। रास खेलत मधुर नृत्य करत। अर्थ: प्रेमी प्रेमिका के साथ, रास खेलते हैं। 10. गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द। मैया बिनवौं तोरी शरण जोई। अर्थ: हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द, हे गोविन्द। माँ, मैं आपकी शरण में आता हूँ। गोविन्दस्तोत्रम् एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति को बढ़ावा देता है।

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