पांडुरंगाष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान विष्णु के अवतार पांडुरंग की स्तुति करता है। यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है। पांडुरंग का अर्थ है “नीले रंग वाला”। यह स्तोत्र भगवान पांडुरंग के आठ दिव्य गुणों का वर्णन करता है। पांडुरंगाष्टकम् के आठ श्लोक इस प्रकार हैं: pandurangashtakan महायोगपीठे तटे भीमरथ्या वरं पुंडरीकाय दातुं मुनीन्द्रैः। समागत्य तिष्ठन्तमानन्दकदं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम्॥ अर्थ: मैं भीमा नदी के तट पर स्थित महायोगपीठ पर पुंडरीक को वरदान देने के लिए ऋषि-मुनियों के साथ आए आनंदकंद परब्रह्मलिंग पांडुरंग की पूजा करता हूं। तडिद्वाससं नीलमेघावभासं रमामन्दिरं सुन्दरं चित्प्रकाशम्। वरं त्विष्टिकायां समन्यस्तपादं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम्॥ अर्थ: मैं उस पांडुरंग की पूजा करता हूं, जिनके पास बिजली जैसा आभामंडल है, जो नीले बादलों के समान दिखते हैं, जो देवी रमा का निवास हैं, जो चित्तप्रकाश हैं, और जो अपने पैरों को ईंट पर मजबूती से स्थापित किए हुए हैं। प्रमाणं भवाब्धेरिदं मामकानां नितम्बः कराभ्यां धृतो येन तस्मात्। विधातुर्वसत्यै धृतो नाभिकोशः परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम्॥ अर्थ: मैं उस पांडुरंग की पूजा करता हूं, जिनके पास सांसारिक जीवन के सागर की समानता है, जो अपने दोनों हाथों से अपनी कमर को पकड़े हुए हैं, और जो ब्रह्मा के लिए निवास प्रदान करने के लिए अपनी नाभि में फूल का उत्पादन करते हैं। स्फुरत्कौस्तुभालंकृतं कण्ठदेशे श्रिया जुष्टकेयूरकं श्रीनिवासम्। शिवं शान्तमीड्यं वरं लोकपालं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम्॥ अर्थ: मैं उस पांडुरंग की पूजा करता हूं, जिनके गले में चमकते हुए कौस्तुभ मणि है, जो देवी लक्ष्मी के साथ युग्मित हैं, जो शांति और मधुर स्वभाव वाले हैं, और जो लोकपाल हैं। शरचंद्रबिंबाननं चारुहासं लसत्कुंडलक्रान्तगंडस्थलांगम्। जपारागबिंबाधरं कंजनेत्रम् परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम्॥ अर्थ: मैं उस पांडुरंग की पूजा करता हूं, जिनकी चारुता चंद्रमा और सूर्य के समान है, जिनका हास्य मन को मोह लेता है, जिनके कान कुंडल से सुशोभित हैं, जिनके कंधे पर जपामाला है, और जिनकी आंखें कमल के समान हैं। किरीटोज्ज्वलत्सर्वदिक् प्रान्तभागं सुरैरर्चितं दिव्यरत्नैरमर्घ्यैः। त्रिभंगाकृतिं बर्हमाल्यावतंसं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम्॥ अर्थ: मैं उस पांडुरंग की पूजा करता हूं, जिनके सिर पर मुकुट है, जिनके चारों ओर दिशाओं में ज्योति है, जिन्हें देवताओं द्वारा पूजित किया जाता है, और जो दिव्य रत्नों से सुशोभित हैं। विभुं वेणुनादं चरन्तं दुरन्तं स्वयं लीलया गोपवेषं दधानम्। गवां वृंदकानन्दनं चारुहासं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम्॥ अर्थ: मैं उस पांडुरंग की पूजा करता हूं, जो वेणु बजाते हुए, दुरन्त हैं, और स्वयं ही गोपवेश धारण करके लीला करते हैं। वे गायों के झुंड के आनंद के स्रोत हैं, और उनकी हास्य मन