गोविंद देवी जी मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इस मंदिर को “राधा गोविंद देव मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। गोविंद देवी जी मंदिर श्री कृष्ण की नगरी मथुरा उत्तर प्रदेश के वृन्दावन में स्थित है। यह मंदिर वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इस मंदिर को “राधा गोविंद देव मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर वृंदावन के प्राचीन मंदिरों में से एक है। यह भगवान कृष्ण के गोविंद देव जी स्वरूप को समर्पित मंदिर है।  Govind Dev Ji Temple:मंदिर का इतिहास इस मंदिर का निर्माण सन् 1590 में राजा मानसिंह ने करवाया था। इस मंदिर का निर्माण गुरु और महान कृष्णभक्त श्री कल्याणदास जी की निगरानी में किया गया। मंदिर का पूर्ण खर्च राजा मानसिंह द्वारा ही किया गया था। गोविंद देवी जी मंदिर जब यह मंदिर बना था तो यह सात मंजिला मंदिर था। इस मंदिर के सबसे ऊपरी भाग पर एक विशाल दीपक बनवाया गया था। यह दीपक इतना विशाल था कि इसमें हर रोज 50 किलोग्राम से ज्यादा देसी घी का इस्तेमाल कर इसे जलाया जाता था। इस दीपक की लौ कई किमी तक से भी दिखाई देती थी। मंदिर में जलते इस लौ को देखकर औरंगजेब के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गयी और वह इस मंदिर की सुंदरता को नष्ट करने का विचार करने लगा। अपनी सेना को भेजकर मंदिर को तुड़वाना चाहा। गोविंद देवी जी मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत भगवान की कृपा से मंदिर के पुजारी को इस बात का अंदेशा हो गया। उन्होंने तुरंत ही भगवान गोविंद की पुरातन प्रतिमा को वहां से हटा दिया और बहुत दूर ले गए। जयपुर के गोविंद वल्लभ मंदिर में वास्तविक प्रतिमाओं को स्थानांतरित कर दिया गया था। औरंगजेब की सेना इस मंदिर के 4 मंजिल को ही गिरा सकी। मंदिर को खंडित करने का भी प्रयास किया गया। 1873 तक मंदिर उसी अवस्था में रहा। औरंगजेब के जाने के बाद इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया गया। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि जब औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ दिया था। उसके बाद उस मंदिर में कोई भी भक्त दर्शन करने नहीं जाता था। इस कारण मंदिर खंडहर बन गया था। गोविंद देवी जी मंदिर वहां पर भूतों का निवास हो गया था। परन्तु इन भूत प्रेतों ने किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाया था। ऐसा भी कहा जाता है कि इस मंदिर का पुनः निर्माण भव्यता के साथ करना बहुत ही मुश्किल था। गोविंद देवी जी मंदिर इस मंदिर के निर्माण में यहाँ रहने वाले भूतों का भी योगदान है। वह इसलिए क्योंकि इस मंदिर की कारीगरी इस तरह की है जो कोई भी मनुष्य पांच से दस साल में नहीं बना सकता। मंदिर की वास्तुकला गोविंद देव जी मंदिर की वास्तुकला अन्य मंदिरों से अलग है। गोविंद देवी जी मंदिर यह मंदिर पहले सात मंजिला ईमारत थी। मंदिर में दोनों तरफ शानदार खम्भे बने हुए है जो गर्भगृह तक जाते है। यह मंदिर बहुत ही खूबसूरती से बनाया गया है। मंदिर का समय गर्मियों में मंदिर खुलने का समय 04:30 AM – 12:00 PM सर्दियों में गोविंद देव जी का मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:30 PM गर्मियों में मंगल आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM गर्मियों में शाम को गोविंद देव जी का मंदिर खुलने का समय 05:30 PM – 09:30 PM सर्दियों में शाम को गोविंद देव जी का मंदिर खुलने का समय 05:00 PM – 08:30 PM सर्दियों में मंगला आरती का समय 05:00 AM – 06:00 AM मंदिर का प्रसाद गोविंद देव जी मंदिर में लड्डू ,माखन और मिश्री का भोग लगाया जाता है।

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कात्यायनी पीठ वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

ऐसा कहा जाता है कि यहां माता सती के केश गिरे थे, इसका प्रमाण शास्त्रों में भी मिलता है। कात्यायनी पीठ वृंदावन भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में मथुरा जिले के श्री वृंदावन धाम में स्थित है। भगवान कृष्ण की नगरी वृन्दावन में भी, देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक कात्यायनी पीठ स्थित है। यह एक बहुत ही प्राचीन सिद्ध पीठ है जो राधाबाग के पास है। यहाँ माता सती ‘उमा’ तथा भगवन शंकर ‘भूतेश’ के नाम से जाने जाते है। ऐसा कहा जाता है कि यहां माता सती के केश गिरे थे, इसका प्रमाण शास्त्रों में भी मिलता है। देवर्षि श्री वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध के 22वें अध्याय में उल्लेख किया है- कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नम:॥ katyayani peeth:मंदिर का इतिहास कात्यायनी पीठ का निर्माण स्वामी केशवानंद ने फरवरी 1923 में करवाया था। इस मंदिर में मां कात्यायनी के साथ पंचानन शिव, विष्णु, सूर्य तथा सिद्धिदाता श्री गणेशकी मूर्तियां हैं । कात्यायनी पीठ वृंदावन लोग मंदिर को मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण देखते ही श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और दिल और दिमाग में शांति पाते हैं। कात्यायनी पीठ में श्रद्धालुओं की भीड़ हमेशा लगी रहती है। बताया जाता है कि राधारानी ने भी श्रीकृष्ण को पाने के लिए इस शक्तिपीठ की पूजा की थी। कात्यायनी पीठ वृंदावन:मंदिर का महत्व कात्यायनी पीठ में अविवाहित युवक-युवती नवरात्र के मौके पर मनपसंद वर और वधु पाने के लिए कात्यायनी माता का आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं और उनकी मन की मुराद पूरी भी होती है। ऐसा कहा जाता है श्री कृष्ण ने कात्यायनी पीठ वृंदावन अपने मामा कंस का वध करने से कात्यायनी मां की पूजा की थी। कंस वध से पहले यमुना किनारे श्री कृष्ण मां कात्यायनी को कुलदेवी मानकर बालू से उनकी प्रतिमा बनाई और पूजा की। उसके बाद कंस का वध किया था। जिन लड़कियों या लड़को की शादी में किसी कारण कोई विलंब हो रहा होता है। कात्यायनी मां की कृपा से उनका भी विवाह जल्द से जल्द हो जाता है। मंदिर की वास्तुकला कात्यायनी पीठ मंदिर एक शांत और वास्तुकला की दृष्टि से अद्भुत मंदिर है। मंदिर की बनावट में राजस्थानी शैली की झलक देखने को मिलती है। मंदिर में एक विशाल परिसर है, जहां भक्त आकर मां की पूजा-अर्चना करते हैं। कात्यायनी पीठ वृंदावन उत्कृष्ट नक्काशी और पेंटिंग इसकी सुंदरता को और बढ़ाती हैं। मंदिर में कई स्तम्भ बने हैं, जिसपर कात्यायनी मां से जुड़े संस्कृत में मंत्र लिखे गए हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 12:00 PM सांय मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 07:30 PM

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Mahalaxmi Vrat Katha: महालक्ष्मी व्रत के दिन जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, बनी रहेगी मां लक्ष्मी की कृपा दृष्टि

Mahalaxmi Vrat Katha:महालक्ष्मी व्रत की शुरूआत राधा अष्टमी से शुरू होता है और 16वें दिन इस व्रत का समापन किया जाता है। इस दिन महालक्ष्मी व्रत कथा का पाठ करने से भक्तों पर मां की कृपा दृष्टि बनी रहती है। महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के साथ शुरू हो जाता है। इस दिन राधारानी के जन्मदिन के रूप में राधा अष्टमी का पर्व भी मनाया जाता है। Mahalaxmi Vrat Katha आज के दिन विधिपूर्वक और श्रद्धा से महालक्ष्मी व्रत रखा जाता है। इससे देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और भक्तों पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती हैं। पूजा-अर्चना के साथ ही इस दिन महालक्ष्मी व्रत कथा का भी पाठ करना चाहिए। तो आइए पढ़ते हैं महालक्ष्मी व्रत कथा……. Mahalaxmi Vrat Katha:महालक्ष्मी व्रत कथा प्राचीन काल की बात है, एक गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण नियमानुसार भगवान विष्णु का पूजन प्रतिदिन करता था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिये और इच्छा अनुसार वरदान देने का वचन दिया। ब्राह्मण ने माता लक्ष्मी का वास अपने घर मे होने का वरदान मांगा। ब्राह्मण के ऐसा कहने पर भगवान विष्णु ने कहा यहाँ मंदिर मैं प्रतिदिन एक स्त्री आती है और वह यहाँ गोबर के उपले थापति है। वही माता लक्ष्मी हैं, Mahalaxmi Vrat Katha तुम उन्हें अपने घर में आमंत्रित करो। देवी लक्ष्मी के चरण तुम्हारे घर में पड़ने से तुम्हारा घर धन-धान्य से भर जाएगा। Laxmi Mata Aarti:लक्ष्मीजी आरती ऐसा कहकर भगवान विष्णु अदृश्य हो गए। अब दूसरे दिन सुबह से ही ब्राह्मण देवी लक्ष्मी के इंतजार मे मंदिर के सामने बैठ गया। जब उसने लक्ष्मी जी को गोबर के उपले थापते हुये देखा, तो उसने उन्हे अपने घर पधारने का आग्रह किया। ब्राह्मण की बात सुनकर लक्ष्मी जी समझ गयीं कि यह बात ब्राह्मण को विष्णुजी ने ही कही है। तो उन्होने ब्राह्मण को महालक्ष्मी व्रत करने की सलाह दी। लक्ष्मी जी ने ब्राह्मण से कहा कि तुम 16 दिनों तक महालक्ष्मी व्रत करो और व्रत के आखिरी दिन चंद्रमा का पूजन करके अर्ध्य देने से तुम्हारा व्रत पूर्ण होजाएगा। ब्राह्मण ने भी महालक्ष्मी के कहे अनुसार व्रत किया और देवी लक्ष्मी ने भी उसकी मनोकामना पूर्ण की। उसी दिन से यह व्रत श्रद्धा से किया जाता है। शुक्रवार के ये उपाय बदल देंगे आपकी किस्मत! घर में दौड़ी आएंगी मां लक्ष्मी Mahalaxmi Vrat Katha:द्वतीय कथा एक बार महाभारत काल में हस्तिनापुर शहर में महालक्ष्मी व्रत के दिन महारानी गांधारी ने नगर की सारी स्त्रियों को पूजन के लिए आमंत्रित किया, परंतु उन्होने कुंती को आमंत्रण नहीं दिया। गांधारी के सभी पुत्रों ने पूजन के लिए अपनी माता को मिट्टी लाकर दी और इसी मिट्टी से एक विशाल हाथी का निर्माण किया गया और उसे महल के बीच मे स्थापित किया गया। Laxmi prapti upay : रूठी लक्ष्मी को मनाकर घर कैसे लाऐं, लक्ष्मी आओ हमारे द्वार, दूर करो दरिद्रता, भर दो घर को धन-धान्य से नगर की सारी स्त्रियाँ जब पूजन के लिए जाने लगी, तो कुंती उदास हो गयीं। Mahalaxmi Vrat Katha जब कुंती के पुत्रों ने उनकी उदासी का कारण पूछा तो उसने सारी बात बताई। इस पर अर्जुन ने कहा माता आप पूजन की तैयारी कीजिये मैं आपके लिए हाथी लेकर आता हूँ। ऐसा कहकर अर्जुन इन्द्र देव के पास गये और अपनी माता के पूजन के लिए ऐरावत को ले आए। इसके पश्चात कुंती ने सारे विधि-विधान से पूजन किया। जब नगर की अन्य स्त्रियों को पता चला, कि कुंती के यहाँ इन्द्र देव की सारी ऐरावत आया है। Mahalaxmi Vrat Katha तो वे भी पूजन के लिए उमड़ पड़ी और सभी ने सविधि पूजन सम्पन्न किया। Diwali 2025 Date: दिवाली 2025 में कब है ? अभी से जान लें डेट, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त दीपावली पर धन प्राप्ति के लिए माँ लक्ष्मी के शक्तिशाली मंत्र – DIWALI MANTRA

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Charak Jayanti 2025 Date Hindi:आज चरक जयंती, आयुर्वेद में आचार्य चरक का है विशेष योगदान, जानें इतिहास और महत्व

Charak Jayanti 2025 Date Hindi:चरक पूजा, एक हिंदू लोक उत्सव है जो भगवान शिव के सम्मान में आयोजित किया जाता है जिसे नील पूजा के नाम से भी जाना जाता है । यह त्योहार भारत में विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में मनाया जाता है। बांग्लादेश में इस त्योहार को चैत्र महीने के आखिरी दिन के रूप में गिना जाता है। यह त्योहार बंगाली कैलेंडर में चैत्र महीने के आखिरी दिन चैत्र संक्रांति की आधी रात को मनाया जाता है Charak Jayanti 2025: आज चरक जयंती मनाई जा रही है. आचार्य चरक ही आयुर्वेद के चिकित्सक माने जाते हैं. आइए विस्तार से जानते हैं आचार्य चरक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी. Charak Jayanti 2025 Date Hindi:चरक पूजा कैसे मनाई जाती है: लोगों का मानना ​​है कि चरक पूजा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और यह पर्व पिछले वर्ष के दुखों और कष्टों को दूर कर समृद्धि लाता है।तैयारी आमतौर पर एक महीने पहले शुरू होती है। Charak Jayanti 2025 Date Hindi उत्सव की व्यवस्था करने वाली टीम गाँव-गाँव जाकर धान, तेल, चीनी, नमक, शहद, धन और अनुष्ठान के लिए आवश्यक अन्य वस्तुओं की खरीद करती है। संक्रांति की आधी रात को, पूजा करने वाले एक साथ सफलता के लिए शिव और मां दुर्गा की पूजा करने के लिए इकट्ठा होते हैं और पूजा के बाद प्रसाद बांटा जाता है। Bhagwan Shiv:भगवान शिव का जन्म नहीं हुआ है तो फिर क्या है उनकी अवतरण कथा… Charak Jayanti 2025 Date Hindi:इसे हजरा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महिलाएं पूजा से पहले भोजन नहीं करती हैं।कभी-कभी इस त्योहार में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक मानव `चरक` तैयार किया जाता है। चरक को उसकी पीठ पर एक हुक के साथ बांधा जाता है और फिर उसे एक लंबी रस्सी के सहारे एक पट्टी के चारों ओर घुमाया जाता है। हालांकि यह जोखिम भरा है, वे इसकी व्यवस्था करते हैं। महाराष्ट्र में इसी तरह के त्योहार को बगड़ कहा जाता है, जबकि विजयनगरम, आंध्र प्रदेश में इसे सिरिमानु उत्सवम कहा जाता है। बगड़ चरक पूजा, गजान या मैक्सिकन डेंज़ा डे लॉस वोलाडोर्स के भारतीय समानांतर की एक समान अवधारणा है। Swapna Shastra Ke Mutabik Durga Mata Ko Sapne Me Dekhna:पने में मां दुर्गा को देखने से मिलते हैं ये शुभ संकेत, जीवन में हो सकते हैं ये बदलाव कौन थे आचार्य चरक ? (Who is Rishi Charak) Charak Jayanti 2025 Date Hindi:चरक कुषाण राज्य के राजवैद्य थे. आचार्य चरक आयुर्वेद की जनक माने गए हैं. भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी चरक एक महर्षि एवं आयुर्वेद विशारद के रूप में प्रसिद्ध हैं. महा ऋषि चरक की जन्म तिथि के बारे में कुछ निश्चित तथ्य मौजूद नहीं हैं लेकिन माना जाता है कि 2300-2400 साल पहले उनका जन्म हुआ था. चरक ऐसे पहले चिकित्सक थे जिन्होंने पाचन, चयापचय और शरीर प्रतिरक्षा की अवधारणा दी थी.चरक के अनुसार शरीर में पित्त, कफ और वायु के कारण दोष उत्पन्न हो जाते है और यही बीमारियों की जड़ बनते हैं. Charak Jayanti 2025 Date Hindi आयुर्वेदाचार्य चरक मानव कल्याण के लिए आयुर्वेद ग्रंथ ‘चरक संहिता’ लिखा था. इसमें विभिन्न रोगों के उपचार के लिए आयुर्वेदिक औषधियों की व्याख्या की गई है, जिन्हें सही मात्रा और तरीके से प्रयोग करने के उपाय भी दिए गए हैं.  Lord Shiva in Dream:सपने में भगवान शिव को देखने का क्या होता है मतलब, जानिए इससे जीवन पर कैसा पड़ता है प्रभाव आयुर्वेद का अमूल्य ग्रंथ है चरक संहिता (Charak Samhita) ‘चरक संहिता’ में आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों, औषधियों, और रोगों के कारणों वर्णन किया गया है. Charak Jayanti 2025 Date Hindi इस पुस्तक को आज भी चिकित्सा जगत में बहुत सम्मान दिया जाता है. यह ग्रन्थ ऋषि आत्रेय तथा पुनर्वसु के ज्ञान का संग्रह है जिसे चरक ने कुछ संशोधित कर अपनी शैली में प्रस्तुत किया. Sapne me bichhu dekhna:सपने में बिच्छू सहित दिखें ये 5 चीज, तो समझ लीजिए चमकने वाली है आपकी किस्मत ‘इलाज नहीं बीमारी से बचाना ही चिकित्सक का कर्तव्य’ Charak Jayanti 2025 Date Hindi:आचार्य चरक कहते हैं कि ज्यादा महत्वपूर्ण यह है की व्यक्ति को बीमारी से बचाना न की इलाज करना ”. जो चिकित्सक अपने ज्ञान और समझ का दीपक लेकर बीमार के शरीर को नहीं समझता, वह बीमारी कैसे ठीक कर सकता है. इसलिए सबसे पहले उन सब कारणों का अध्ययन करना चाहिए जो रोगी को प्रभावित करते है, फिर उसका इलाज करना चाहिए.

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Batuk Bhairav Ashtottara Stotra | बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्रम्

Batuk Bhairav Ashtottara Stotra:बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्रम्: बटुक भैरव भगवान रुद्र के अवतार हैं। भगवान भैरव की पूजा-अर्चना से सभी तांत्रिक क्रियाओं में सफलता मिलती है। दस भैरवों में जहां कालभैरव को सबसे विकराल रूप माना जाता है, वहीं बटुक भैरव को सबसे शांत और सौम्य रूप में पूजा जाता है। अघोरिया और तांत्रिक लोगों के लिए काल भैरव की पूजा बताई गई है, वहीं आम लोगों के लिए बटुक भैरव की पूजा उपयुक्त मानी गई है। भैरव तंत्र के अनुसार भय से मुक्ति दिलाने वाले को भैरव कहा जाता है। इनकी आराधना से जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। श्री भैरव की वटुक रूप में आराधना के बिना श्री शिव मंत्र सिद्धि संभव नहीं है। Batuk Bhairav Ashtottara Stotra वे क्रिया शक्ति के रूप हैं, जो साधक को सात्विकता में प्रवृत्त कर शिव और शक्ति की ओर आकर्षित करते हैं। बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति शिव साधना में लग जाता है और मुक्ति प्राप्त करता है। भैरव तांत्रिकों के लिए सबसे पसंदीदा देवताओं में से एक हैं। Batuk Bhairav Ashtottara Stotra बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र की पूजा करने के लिए कुछ रोचक मंत्र हैं जो भय को दूर करने, रोगों को ठीक करने, शत्रुओं को नष्ट करने और समृद्धि प्रदान करने के लिए जाने जाते हैं। बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र भगवान भैरव को समर्पित एक गुप्त स्तोत्र है। बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र को पढ़ने या सुनने से कई लाभ और सिद्धियाँ मिलती हैं जैसे वाक सिद्धि (आप जो भी बोलेंगे वह सच हो जाएगा), बुद्धि, भय से मुक्ति, शत्रुओं का नाश और लंबी आयु प्राप्त होती है। एक बार नियमित अभ्यास करने के बाद, Batuk Bhairav Ashtottara Stotra बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र जप करने वाले पर अनंत आशीर्वाद प्रदान कर सकता है और उसे भगवान का दिव्य आशीर्वाद दिला सकता है जिससे समृद्धि और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए, लोग बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र का बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ पाठ करते हैं। Batuk Bhairav Ashtottara Stotra:बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र के लाभ जीवन में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करने के लिए भैरव देवता की पूजा में बहुत महत्व है। Batuk Bhairav Ashtottara Stotra यदि आप बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र के शब्दों का पाठ करते हैं, खासकर भैरव अष्टमी की पूर्व संध्या पर या शनिवार को, तो आप निश्चित रूप से अपने सभी कामों को सफल और सार्थक बनाने में सक्षम होंगे, साथ ही आपके व्यवसाय, व्यापार और जीवन में पूर्ण सफलता, परेशानियाँ, बाधाएँ, शत्रु, कोर्ट-कचहरी आदि से मुक्ति मिलेगी। Batuk Bhairav Ashtottara Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ जो व्यक्ति तुरंत समृद्धि चाहते हैं, Batuk Bhairav Ashtottara Stotra उन्हें नियमित रूप से बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्रम् | Batuk Bhairav Ashtottara Stotra सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़कर जल भूमि पर छोड़ दे। विनियोग:- ॐ अस्य श्रीबटुक भैरव स्तोत्र मन्त्रस्य, कालाग्नि रूद्र ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, आपदुद्धारक बटुक भैरवो देवता, ह्रीं बीजम्, भैरवी वल्लभः शक्तिः, नील वर्णों दण्ड पाणि: कीलकं, समस्त शत्रु दमने समस्ता-पन्निवारणे सर्वाभीष्ट प्रदाने च विनियोगः।  ऋष्यादि न्यास: ॐ कालाग्नि ऋषये नमः शिरसि। अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे। आपदुद्धारक श्रीबटुक भैरव देवतायै नमः हृदये। ह्रीं बीजाय नमः गुह्यये। भैरवी वल्लभ शक्तये नमः पादयोः नील वर्णों दण्ड-पाणि: कीलकाय नमः नाभौ। समस्त शत्रु दमने समस्तापन्निवारणे सर्वाभीष्ट प्रदाने च विनियोगाय नमः सर्वांगे। मूल-मन्त्र: ॐ ह्रीं बं बटुकाय क्षौं क्षौं आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय स्वाहा । ध्यान: नील-जीमूत-संकाशो जटिलो रक्त-लोचनः । दंष्ट्रा कराल वदनः सर्प यज्ञोपवीत-वान् ।। दंष्ट्राSSयुधालंकृतश्च कपाल-स्त्रग्-विभूषितः । हस्त-न्यस्त-करो टीका-भस्म-भूषित-विग्रहः ।। नाग-राज-कटि-सूत्रों बाल-मूर्तिर्दिगम्बरः । मञ्जु-सिञ्जान-मञ्जरी-पाद-कम्पित-भूतलः ।। भूत-प्रेत-पिशाचैश्च सर्वतः परिवारितः । योगिनी-चक्र-मध्यस्थो मातृ-मण्डल-वेष्टितः ।। अट्टहास-स्फुरद्-वक्त्रो भृकुटी-भीषणाननः । भक्त-संरक्षणार्थ हि दिक्षु भ्रमण-तत्परः ।। मूल स्तोत्र: ॐ ह्रीं बटुकों वरदः शूरो भैरवः काल भैरवः । भैरवी वल्लभो भव्यो दण्ड पाणिर्दया निधिः ।।1 वेताल वाहनों रौद्रो रूद्र भृकुटि सम्भवः । कपाल लोचनः कान्तः कामिनी वश कृद् वशी ।।2 आपदुद्धारणो धीरो हरिणाङ्क शिरोमणिः । दंष्ट्रा-करालो दष्टोष्ठौ धृष्टो-दुष्ट-निवर्हणः ।।3 सर्प-हारः सर्प-शिरः सर्प-कुण्डल-मण्डितः । कपाली करुणा-पूर्णः कपालैक-शिरोमणिः ।।4 श्मशान-वासी मासांशी मधु-मत्तोSट्टहास-वान् । वाग्मी वाम-व्रतो वामो वाम-देव-प्रियंङ्करः ।।5 वनेचरो रात्रि-चरो वसुदो वायु-वेग-वान् । योगी योग-व्रत-धरो योगिनी-वल्लभो युवा ।।6 वीर-भद्रो विश्वनाथो विजेता वीर-वन्दितः । भूताध्यक्षो भूति-धरो भूत-भीति-निवरणः ।।7 कलङ्क-हीनः कंकाली क्रूरः कुक्कुर-वाहनः । गाढ़ो गहन-गम्भीरो गण-नाथ-सहोदरः ।।8 देवी-पुत्रो दिव्य-मूर्तिर्दीप्ति-मान् दिवा-लोचनः । महासेन-प्रिय-करो मान्यो माधव-मातुलः ।।9 भद्र-काली -पतिर्भद्रो भद्रदो भद्र-वाहनः । पशूपहार-रसिकः पाशी पशु-पतिः पतिः ।।10 चण्डः प्रचण्ड-चण्डेशश्चण्डी-हृदय-नन्दनः । दक्षो दक्षाध्वर-हरो दिग्वासा दीर्घ-लोचनः ।।11 निरातङ्को निर्विकल्पः कल्पः कल्पान्त-भैरवः । मद-ताण्डव-कृन्मत्तो महादेव-प्रियो महान् ।।12 खट्वांग-पाणिः खातीतः खर-शूलः खरान्त-कृत् । ब्रह्माण्ड-भेदनो ब्रह्म-ज्ञानी ब्राह्मण-पालकः ।।13 दिक्-चरो भू-चरो भूष्णुः खेचरः खेलन-प्रियः , सर्व-दुष्ट-प्रहर्त्ता च सर्व-रोग-निषूदनः । सर्व-काम-प्रदः शर्वः सर्व-पाप-निकृन्तनः ।।14  फल-श्रुति: इत्थमष्टोत्तर-शतं नाम्ना सर्व-समृद्धिदम् । आपदुद्धार-जनकं बटुकस्य प्रकीर्तितम् ।। एतच्च श्रृणुयान्नित्यं लिखेद् वा स्थापयेद् गृहे । धारयेद् वा गले बाहौ तस्य सर्वा समृद्धयः ।। न तस्य दुरितं किञ्चिन्न चौर-नृपजं भयम् । न चापस्मृति-रोगेभ्यो डाकिनीभ्यो भयं नहि ।। न कूष्माण्ड-ग्रहादिभ्यो नापमृत्योर्न च ज्वरात् । मासमेकं त्रि-सन्ध्यं तु शुचिर्भूत्वा पठेन्नरः ।। सर्व-दारिद्रय-निर्मुक्तो निधि पश्यति भूतले । मास-द्वयमधीयानः पादुका-सिद्धिमान् भवेत् ।। अञ्जनं गुटिका खड्गं धातु-वाद-रसायनम् । सारस्वतं च वेताल-वाहनं बिल-साधनम् ।। कार्य-सिद्धिं महा-सिद्धिं मन्त्रं चैव समीहितम् । वर्ष-मात्रमधीनः प्राप्नुयात् साधकोत्तमः ।। एतत् ते कथितं देवि ! गुह्याद् गुह्यतरं परम् । कलि-कल्मष-नाशनं वशीकरणं चाम्बिके ! ।।

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दुर्गा मन्दिर गोरखपुर, उत्तरप्रदेश, भारत

यहाँ श्रद्धालु करते हैं माँ दुर्गा को रक्त अर्पित Durga Mandir:दुर्गा मन्दिर गोरखपुर भारत के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक अद्रभुत माँ दुर्गा का मंदिर स्थित है। गोरखपुर शहर के बांसगांव में बने इस दुर्गा मंदिर में देवी को खुश करने के लिए श्रद्धालुओं द्वारा माँ को रक्त अर्पित किया जाता है। दुर्गा मन्दिर गोरखपुर माँ दुर्गा के इस मंदिर की अनोखी परंपरा आज से ही नहीं बल्कि सैकड़ों साल पूर्व से है। वैसे तो पूरे साल दुर्गा मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि के दिनों में यहां रक्त चढ़ाने की विशेष परंपरा है। नवमी के दिन माँ दुर्गा को रक्त अर्पित करने की परंपरा को निभाने के लिए देश-विदेश में रहने वाले लोग भी आते हैं। नवजात बच्चों को भी लेकर श्रद्धालु मंदिर में पहुंचते हैं और उनके ललाट से रक्त लेकर माँ को अर्पित करते हैं। मंदिर का इतिहास गोरखपुर के बांसगांव तहसील स्थित दुर्गा मंदिर में पिछले 300 वर्षों से माँ दुर्गा को रक्‍त चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। यह परंपरा क्षेत्रियों के श्रीनेत वंश के लोगों द्वारा निभाई जाती है। इस परंपरा के तहत 12 दिन के नवजात से लेकर 100 वर्ष के बुजुर्ग तक का रक्त चढ़ाया जाता है। उपनयन संस्कार के पहले तक एक जगह ललाट और जनेऊ धारण करने के बाद युवकों, दुर्गा मन्दिर गोरखपुर अधेड़ों व बुजुर्गों के शरीर से नौ जगहों पर एक ही उस्तरे से चीरा लगाकर खून निकाला जाता है। रक्त को बेलपत्र में लेकर माँ दुर्गा के चरणों में अर्पित किया जाता है और शरीर के कटे हुए हिस्से पर भभूत लगाई जाती है। मंदिर का महत्व माँ दुर्गा के इस मंदिर से जुड़ी ऐसी मान्यता है कि जिन नवजातों के ललाट से रक्त चढ़ाया जाता है, दुर्गा मन्दिर गोरखपुर उन्हें दुर्गा माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती हैं। श्रद्धालुओं का कहना है दुर्गा मन्दिर गोरखपुर कि ये माँ के आशीर्वाद का ही फल है कि आज तक किसी को न तो टिटनेस हुआ और न ही घाव भरने के बाद कहीं कटे का निशान पड़ा। मंदिर की वास्तुकला दुर्गा मंदिर की वास्तुकला बहुत ही सुंदर है। मंदिर को नागर शैली में बनाया गया है। सम्पूर्ण मंदिर को वर्गाकार और एक विशाल चबूतरे पर बनाया गया है। दुर्गा मंदिर में माँ के दर्शन के लिए एक प्रवेश द्वार है। वर्ष 2021 में माँ दुर्गा के इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया और श्रद्धालुओं के लिए एक धर्मशाला का भी निर्माण किया गया। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 10:00 PM सायंकाल आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM सुबह की आरती का समय 05:00 AM – 06:00 AM

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गोपीनाथ मंदिर वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

वैष्णव संप्रदाय के इस मंदिर को “राधा गोपीनाथ मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। गोपीनाथ मंदिर उत्तर प्रदेश मथुरा के वृन्दावन नगरी में स्थित है। सप्तदेवालयों में शामिल यह मंदिर यमुना नदी के केशीघाट के समीप बना हुआ है। वैष्णव संप्रदाय के इस मंदिर को “राधा गोपीनाथ मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। गोपीनाथ मंदिर का इतिहास Mandir Shri Gopinath Ji : गोपीनाथ मंदिर में मूर्तियों की पूजा मधुपंडित गोस्वामी द्वारा की जाती थी जो गुरु चैतन्य के बहुत करीबी सहयोगियों में से एक थे। पौराणिक कथा के अनुसार, गोपीनाथजी की मूर्ति लंबे समय तक खोयी हुयी थी। ऐसा कहा जाता है कि परमानंद भट्टाचार्य नाम के एक महान भक्त ने खोई हुई मूर्ति को पुनर्जीवित किया था। एक रात को भगवान गोपीनाथ परमानंद भट्टाचार्य के स्वप्न में आए और उन्होंने वामशीवट नामक पेड़ के नीचे अपने रहने के स्थान का पता बताया। स्वप्न के अनुसार परमानंद उस पेड़ के पास गए और वहां पर मूर्ति को पुनर्जीवित किया। उन्होंने मूर्ति की पूजा करना शुरू कर दिया और बाद में मूर्ति मधुपंडितगोस्वामी को सौंप दी। मंदिर का महत्व ऐसा माना जाता है कि गोपीनाथ मंदिर में विराजित भगवान कृष्ण की मूर्ति चमत्कारी है। इनके दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। इस मंदिर का मनमोहक और शांत वातावरण भक्तों को भगवान की ओर आकर्षित करता है। मंदिर की वास्तुकला गोपीनाथ मंदिर लाल पत्थर से निर्मित है। नदी के किनारे होने के कारण मंदिर की सुंदरता और भी बढ़ जाती है। मंदिर में भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा बांसुरी बजाते हुए स्थापित है। भगवान के दाये तरफ प्रिय राधा जी और बाये तरफ अनंग-मंजरी खड़े हुए हैं। उनका साथ देने के लिए ललिता और विशाखा भी है। इस मंदिर में ही आचार्य मधु पंडित की समाधि भी है। यदि आप वृन्दावन गए है एक बार इस मंदिर के दर्शन जरूर करने चाहिए। मंदिर का समय गोपीनाथ मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 01:00 PM श्रृंगार आरती 08:30 AM – 09:00 AM शाम में गोपीनाथ मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 09:00 PM शयन आरती 08:00 PM – 08:30 PM मंगला आरती 05:00 AM – 05:30 AM राजभोग आरती 11:30 AM – 12:00 PM संध्या आरती 06:00 PM – 06:30 PM

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Pana Sankranti 2025 Date Hindi : पना संक्रांति कहां मनाई जाती है, इस दिन क्या करते हैं

Pana Sankranti 2025 Date:हिंदू पंचांग के अनुसार, जिस दिन भगवान सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं, उस दिन मेष संक्रांति मनाई जाती है। ओडिशा में इसे पना संक्रांति कहा जाता है और इस दिन नए साल का त्योहार भी मनाया जाता है। Pana Sankranti 2025 Date इस वर्ष 14 अप्रैल पना संक्रांति है। इस अवसर पर, ओडिशा के लोग एक दूसरे को पना संक्रांति और नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं। साथ ही इस दिन फल, दही, सत्तू और अन्य वस्तुओं से बने शर्बत पीने का भी विधान है। यह भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। जहां उत्तर भारत में बैसाखी मनाई जाती है। वहीं, विशु इस दिन केरल और तमिलनाडु में पुथांडु में मनाया जाता है। जबकि बोहाग बिहू असम में मनाया जाता है। केवल इस दिन, सूरज पूरी तरह से दो अवसरों पर भूमध्य रेखा पर रहता है, जैसे कि मेष संक्रांति और तुला संक्रांति। दिन का नाम पना के नाम पर रखा गया है। यह दिन बहुत खुशी, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक प्रदर्शनों के साथ मनाया जाता है। Pana Sankranti 2025 Date:पना संक्रांति क्यों कहा जाता है? Pana Sankranti 2025 Date:पना नाम उत्सव के मुख्य घटक से लिया गया है। मुख्य अनुष्ठानों में से एक में पके आम, नारियल, गुड़, दही और पानी जैसी विभिन्न सामग्रियों से बने “पना” नामक एक विशेष पेय की तैयारी और खपत शामिल है। पना को साझाकरण और सामुदायिक बंधन के प्रतीक के रूप में परिवार के सदस्यों, दोस्तों और पड़ोसियों के बीच वितरित किया जाता है। June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list:जून 2025 में पड़ने वाले प्रमुख व्रत और त्योहारों की सूची निम्नलिखित है Pana Sankranti ki pouranik katha:पना संक्रांति का पौराणिक कथा जिस दिन इसे मनाया जाता है उसका कारण यह है कि यह सौर वर्ष का पहला दिन है। Pana Sankranti 2025 Date केवल इस दिन, सूरज पूरी तरह से दो मौकों पर भूमध्य रेखा पर रहता है, जैसे कि मेष संक्रांति और तुला संक्रांति। मेष संक्रांति के बाद, सूर्य उत्तरी दिशा में उगता है जहां भारत भूमध्य रेखा के उत्तर में स्थित है। इसलिए, इस वर्ष से सूर्य के पहले दिन, जो मिशा संक्रांति है। ओडिया की परंपरा के अनुसार, पना संक्रांति को हिंदू देवता हनुमान का जन्मदिन माना जाता है। रामायण में विष्णु अवतार राम के प्रति उनकी प्रेममयी भक्ति पौराणिक है। शिव और सूर्य (सूर्य) भगवान के साथ उनके मंदिर नए साल में पूजनीय हैं। इस दिन हिंदू भगवान मंदिरों में भी जाते हैं। पना संक्रांति का समारोह Pana Sankranti 2025 Date:इस दिन, लोग पना से भरे एक छोटे बर्तन का उपयोग करते हैं या मिश्री का मीठा पेय और तुलसी के पौधे पर पानी डाला जाता है। बर्तन के तल पर एक छेद बनाया जाता है, जो बारिश का प्रतिनिधित्व करते हुए पानी को गिरने देता है। यह त्योहार व्यापक रूप से कुछ शहरों और गांवों में, तटीय क्षेत्रों में, ओडिशा में एक अनुष्ठान के रूप में मनाया जाता है। पना संक्रांति का महत्व (Pana Sankranti Ka Mahatva) पना संक्रांति सौर वर्ष के पहले दिन मनाई जाती है। Pana Sankranti 2025 Date ओडिया की परंपरा के अनुसार पना संक्रांति के दिन ही हनुमान भगवान का जन्मदिन हुआ था। इसलिए इस दिन यहां हनुमान जयंती भी मनाई जाती है। इस दिन भगवान सूर्य उत्तरायण का आधा सफर पूरा कर लेते हैं। अन्य संक्रांति की तरह ही इस दिन भी स्नान-दान, पितरों का तर्पण और मधुसूदन भगवान की पूजा का महत्व बताया गया है। पना संक्रांति पर क्या करते हैं (Pana Sankranti Par Kya Karte Hai) Pana Sankranti 2025 Date:इस दिन सूर्य की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। कहते हैं पना संक्रांति के दिन सूर्य की पूजा करने से व्यक्ति को जीवन में सूर्य देवता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। Pana Sankranti 2025 Date इसलिए इस दिन सूर्य को अर्घ्य जरूर देना चाहिए। कहते हैं सूर्य की पूजा करने से व्यक्ति को मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। पना संक्रांति पर करें ये दान (Pana Sankranti Daan) मेष संक्रांति के दिन दान पुण्य का भी विशेष महत्व माना जाता है। कहते हैं कि इस दिन दान करने से सूर्य देवता प्रसन्न होते हैं। लेकिन दान करने से पहले पवित्र नदी में स्थान जरूर करें। लेकिन अगर नदियों में स्नान नहीं कर सकते हैं तो घर में स्नान के पानी में ही गंगाजल डालकर स्नान करें। Pana Sankranti 2025 Date:खास संदेश  इस पना संक्रांति पर भगवान जगन्नाथ का दिव्य आशीर्वाद आपके जीवन में प्रचुरता और समृद्धि लाए। आपको और आपके परिवार को प्रेम, खुशी और एकजुटता से भरी आनंदमय पना संक्रांति की शुभकामनाएं। जैसे ही सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, यह आपके जीवन में नई शुरुआत और अवसर लेकर आएगा। पण संक्रांति की शुभकामनाएं! आइए नए सौर माह की शुरुआत का जश्न कृतज्ञता और भक्ति के साथ मनाएं। पण संक्रांति की शुभकामनाएँ! पाना पेय का मीठा स्वाद आपके जीवन को मिठास और आनंद से भर दे। पण संक्रांति की शुभकामनाएँ! इस शुभ दिन पर, भगवान जगन्नाथ आप और आपके प्रियजनों पर अपना आशीर्वाद बरसाएं। पण संक्रांति की शुभकामनाएं! Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi : कामदा एकादशी के दिन क्या करें क्या नहीं? जानें जरूरी नियम

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Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi : कामदा एकादशी के दिन क्या करें क्या नहीं? जानें जरूरी नियम

Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi : आज कामदा एकादशी का व्रत है. आज के दिन विष्णु जी की पूजा होती है. कामदा एकादशी के दिन कुछ खास काम करने की मनाही होती है. जानते हैं इससे जुड़े नियम. कामदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वासुदेव रूप की विधिवत पूजा करने का विधान है। इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति को सभी पापों से छुटकारा मिल सकता है।  Kamada Ekadashi:  यह हिंदू संवत्सर की पहली एकादशी है. इसे फलदा एकादशी भी कहा जाता है. सभी एकादशियों में कामदा एकादशी को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है.  कामदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की वासुदेव रुप का पूजन किया जाता है. Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi इस व्रत को करने से सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है. इसका व्रत करने से समस्त पापों का नाश होता है. कामदा एकादशी के कुछ खास नियम होते हैं. जानते हैं कि आज के दिन कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए. Kamada Ekadashi 2025: कामदा एकादशी हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण व्रतों में से एक मानी जाती है. यह व्रत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है और मान्यता है कि इसे करने से व्यक्ति के सभी पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं. इस व्रत के कुछ जरूरी नियम हैं, जिनका पालन करने से शुभ फल प्राप्त होता है. मान्यता के अनुसार, Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi कामदा एकादशी व्रत को करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और पापों से मुक्ति मिलती है. आइए जानते साल 2025 में कामदा एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा. Ekadashi Date List 2025:साल 2025 में कब-कब है एकादशी?नोट करें सही डेट एवं पूरी लिस्ट कामदा एकादशी कब है? Kamada Ekadashi 2025 Date पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 7 अप्रैल को रात 8 बजे होगी. वहीं इस शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का समापन 8 अप्रैल को रात 9 बजकर 12 मिनट पर हो जाएगा. ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, 8 अप्रैल को कामदा एकादशी मनाई जाएगी. इसी दिन इसका व्रत और भगवान विष्णु का पूजन भी किया जाएगा. Kamada Ekadashi Ke Din Kya Kare:कामदा एकादशी के दिन क्या करें? Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi:सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें. तुलसी, फल-फूल, धूप, दीप और प्रसाद चढ़ाकर भगवान विष्णु की आराधना करें. इस दिन निराहार (बिना खाए) या फलाहार व्रत रखने की परंपरा है. भगवद्गीता और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें , क्योंकि इस दिन श्रीहरि की भक्ति में लीन रहना शुभ माना जाता है. जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और धन दान करना बहुत पुण्यदायी होता है. इस दिन भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन के साथ जागरण करने से विशेष लाभ मिलता है. द्वादशी के दिन ब्राह्मण भोजन कराने के बाद खुद सात्त्विक भोजन करें. Kamada Ekadashi 2025 Kab Hai : अप्रैल माह का पहला एकादशी व्रत कब है? जानें डेट, पूजन व व्रत पारण का समय Kamada Ekadashi Ke Din Kya Nhi Kare : कामदा एकादशी के दिन क्या नहीं करें? Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi इस दिन चावल, गेहूं, मसूर दाल, प्याज-लहसुन और मांसाहार से परहेज करें. व्रत के दौरान मन और वाणी की शुद्धता बनाए रखें. इस दिन सत्य बोलना और अच्छे आचरण का पालन करना जरूरी होता है. Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi वाणी पर संयम रखना एकादशी व्रत का मुख्य नियम है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शरीर के किसी भी अंग को काटना वर्जित है. खाने की बर्बादी न करें और भोजन को आदरपूर्वक ग्रहण करें. Ekadashi Mata Ki Aarti:एकादशी माता की आरती कामदा एकादशी का महत्व | Kamada Ekadashi Significance Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi:मान्यता है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति को सभी दुखों से मुक्ति मिलती है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. यह व्रत पापों का नाश करने वाला और पुण्य फल देने वाला माना जाता है. यह व्रत मनोकामनाओं को पूरा करने और सुख-समृद्धि लाने में मदद करता है.यह व्रत मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी लाभकारी है. कामदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है. इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है. कामदा एकादशी का महत्व Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi:एकादशी के प्रकार एकादशी दो प्रकार की होती है। 1 सम्पूर्णा 2. विद्धा1) सम्पूर्णा – जिस तिथि में केवल एकादशी तिथि होती है अन्य किसी तिथि का उसमे मिश्रण नहीं होता उसे सम्पूर्णा एकादशी कहते है। 2) विद्धा एकादशी पुनः दो प्रकार की होती है2. A) पूर्वविद्धा – दशमी मिश्रित एकादशी को पूर्वविद्धा एकादशी कहते हैं। यदि एकादशी के दिन अरुणोदय काल (सूरज निकलने से 1घंटा 36 मिनट का समय) में यदि दशमी का नाम मात्र अंश भी रह गया तो ऐसी Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi एकादशी पूर्वविद्धा दोष से दोषयुक्त होने के कारण वर्जनीय है यह एकादशी दैत्यों का बल बढ़ाने वाली है। पुण्यों का नाश करने वाली है। वासरं दशमीविधं दैत्यानां पुष्टिवर्धनम ।मदीयं नास्ति सन्देह: सत्यं सत्यं पितामहः ॥ [पद्मपुराण]दशमी मिश्रित एकादशी दैत्यों के बल बढ़ाने वाली है इसमें कोई भी संदेह नहीं है। 2. B) परविद्धा – द्वादशी मिश्रित एकादशी को परविद्धा एकादशी कहते हैं।द्वादशी मिश्रिता ग्राह्य सर्वत्र एकादशी तिथि।द्वादशी मिश्रित एकादशी सर्वदा ही ग्रहण करने योग्य है। इसलिए भक्तों को परविद्धा एकादशी ही रखनी चाहिए। ऐसी एकादशी का पालन करने से भक्ति में वृद्धि होती है। Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi दशमी मिश्रित एकादशी से तो पुण्य क्षीण होते हैं। एकादशी ये उपरोक्त मत वैष्णव, गौड़ीय वैष्णव एवं इस्कॉन संप्रदाय के मतानुसार है। आज कामदा एकादशी पर पढ़ें यह व्रत कथा, पापों से मिलती है मुक्ति Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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Sapne me bichhu dekhna:सपने में बिच्छू सहित दिखें ये 5 चीज, तो समझ लीजिए चमकने वाली है आपकी किस्मत

Sapne me bichhu dekhna:सपने में हम कुछ भी देख सकते हैं। सपनों पर किसी का वश नहीं होता है। लेकिन, स्वप्न शास्त्र में कुछ सपने ऐसे बताए गए हैं जिनका आना बहुत ही शुभ माना गया है। इस तरह के सपनों का अर्थ है Sapne me bichhu dekhna कि आपको आने वाले समय में मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होगा। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में गुलाब का फूल समेत 5 चीजे दिखाई देना आपके अमीर बनने का संकेत हो सकता है। आइए जानते हैं सपने में यदि नीचे बताई गई 5 चीजें दिखाई दे रही हैं तो इसका अर्थ क्या है। Sapne me bichhu dekhna:हर किसी का सपना होता है कि वह बहुत अमीर बन जाए। इसके लिए व्यक्ति काफी मेहनत भी करता है। मेहनत के साथ साथ किस्मत का साथ देना भी बहुत जरूरी है। कई बार व्यक्ति को जो सपने दिखाई देते हैं Sapne me bichhu dekhna वह भी धन लाभ और अमीर बनने के संकेत देते हैं। स्वप्न शास्त्र में ऐसे सपनों के बारे में विस्तार से बताया गया है। जिन्हें देखने से पता चलता है कि आपके जीवन में कुछ अच्छा होने वाला है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में यदि ये 5 चीजें दिखाई दे जाएं तो इसका अर्थ है कि आपकी किस्मत चमकने वाली है। मां लक्ष्मी का आपके घर में वास होने जा रहा है। Devi Devtao Ko Sapne Me Dekhna:देवी-देवताओं को सपने में देखना सपने में अगर आप देवी- देवताओं को देखते हैं, तो यह एक बेहद शुभ संकेत है। Sapne me bichhu dekhna इसका मतलब है कि आपको कोई शुभ समाचार मिल सकता है। साथ ही धनलाभ हो सकता है। किसी योजना में सफलता मिल सकती है। Sapne me Madumakhi ka Chhata ka Dikhna:सपने में मधुमक्खी का छत्ता का दिखना स्वप्न शास्त्र अनुसार सपने में मधुमक्खी का छत्ता दिखना बेहद शुभ माना जाता है। इसका मतलब है कि आपकी इनकम में जबदस्त बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही आप कारोबार हैं तो आपके व्यापार का विस्तार हो सकता है। पेड़ पर फल देखना:Sapne me fruit Dekhna सपने में फल से लदा पेड़ देखना शुभ माना जाता है। साथ ही इसका मतलब है कि आपको कही से धन की प्राप्ति हो सकती है। साथ ही घर में कोई मांगलिक या धार्मिक कार्यक्रम हो सकता है। वहीं आपका कोई अटका हुआ काम बन सकता है। सपने में काला बिच्छू देखना Sapne Me Kala Bichhu Dekhna कुछ लोग सपने में बिच्छू या सांप देखकर डर जाते हैं। लेकिन स्वप्न शास्त्र अनुसार सपने में बिच्छु को देखना बेहद शुभ माना जाता है। साथ ही इसका मतलब है कि आपको इस सपने को देखने के बाद रुके हुए कार्य पूरे होने के भी आसार रहते हैं। तोता सपने में दिखना Sapne Me Tota Dikhna Sapne me bichhu dekhna:स्वप्न शास्त्र अनुसार सपने में तोता का दिखना शुभ फलदायी माना जाता है। इसका मतलब है कि आपको नौकरी और व्यापार में तरक्की मिलेगी। साथ ही जीवन में आपको सभी तरह कि सुख समृद्धि प्राप्त होगी।

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Baisakhi Festival 2025: पंजाब से जुड़ी इस फसल कटाई के पर्व की खास बातें

Baisakhi Festival 2025:वैशाखी त्यौहार सिख धर्म के पवित्र त्यौहारों में से एक है। वैशाखी त्यौहार हर साल 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है और सौर वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। वैशाखी जिसे बैसाखी के नाम से भी जाना जाता है। जो भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य क्षेत्रों जैसे पोइला बोइशाख, बोहाग बिहू, विशु, पुथंडु और अन्य क्षेत्रों में बैशाख के पहले दिन मनाए जाते हैं। वैशाखी विशेष रूप से पंजाब और उत्तर भारत के राज्य में मनाया जाता है। सिख समुदाय के लिए वैशाखी का एक विशेष अर्थ है क्योंकि यह खालसा की स्थापना का प्रतीक है। इस दिन, दसवें और अंतिम गुरु – गुरु गोबिंद सिंह ने सिखों को खालसा या शुद्ध लोगों में संगठित किया। ऐसा करके, उन्होंने उच्च और निम्न के मतभेदों को समाप्त कर दिया और स्थापित किया कि सभी मनुष्य एक समान हैं। Baisakhi Festival 2025:बैसाखी बैसाखी को हर साल देशभर में उत्साह एवं जोश के साथ मनाया जाता है। साल 2025 में कब है बैसाखी का पर्व? कैसे मनाते है बैसाखी? जानने के लिए पढ़ें। बैसाखी के त्यौहार को प्रतिवर्ष वैशाख के महीने में मनाया जाता है। Baisakhi Festival 2025 वैसे तो साल भर अनेक व्रत, पर्व एवं त्यौहार मनाये जाते हैं। बैसाखी को वैसाखी,वैशाखी या फसल त्यौहार और नए वसंत के के प्रतीक के रूप में अत्यंत उत्साह एवं धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हिंदुओं द्वारा बैसाखी के पर्व को नए साल के रूप में अधिकांश भारत में मनाया जाता है।  बैसाखी 2025 की तिथि एवं मुहूर्त बैसाखी का त्यौहार कब और क्यों मनाया जाता है? पंचांग के अनुसार, बैसाखी के दिन आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है। पूर्णिमा में विशाखा नक्षत्र होने के कारण ही इस माह को बैसाखी कहते हैं। अन्य शब्दों में कहें तो, वैशाख महीने के प्रथम दिन को बैसाखी कहा जाता है। Baisakhi Festival 2025 बैसाखी से पंजाबी नववर्ष का आरंभ होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, बैसाखी को हर साल 13 अप्रैल या 14 अप्रैल के दिन मनाया जाता है। Baisakhi Festival 2025:बैसाखी का महत्व Baisakhi Festival 2025 बैसाखी का पर्व सामाजिक और सांस्कृतिक के साथ आर्थिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण है। खालसा पंथ का स्थापना दिवस होने के कारण जहां यह सिक्खों के लिए पवित्र दिन है, वहीं हिंदूओं के लिए भी कई मायनों से खास है। ऐसी मान्यता है कि बैसाख माह में भगवान बद्रीनाथ की यात्रा की शुरुआत होती है। पद्म पुराण में, बैसाखी के दिन स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। सूर्य के मेष राशि में परिवर्तन करने यानि मेष संक्रांति होने के कारण यह ज्योतिषीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है। सौर नववर्ष का आरंभ भी इसी दिन से होता है। बैसाखी का पर्व उन तीन त्योहारों में से एक है जिसे सिखों के तीसरे गुरु, गुरु अमर दास द्वारा मनाया गया था। बैसाखी को अंतिम सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह के राज्याभिषेक के साथ-साथ सिख धर्म के खालसा पंथ की नींव के तौर पर मनाया जाता है, इसलिए इसे सिख धर्म के लिए विशेष माना गया है। देशभर में बैसाखी को फसल के मौसम के अंत का प्रतीक माना जाता है Baisakhi Festival 2025 जो किसानों के लिए विशेष रूप से समृद्धि का समय है। वैसाखी के नाम से भी प्रसिद्ध है और यह खुशी और उत्सव का पर्व है। यह त्यौहार मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा के लिए महत्वपूर्ण होता है। बड़ी सिख आबादी के द्वारा बैसाखी बहुत ऊर्जा और जोश के साथ मनाई जाती है।  यह त्यौहार पश्चिम बंगाल में पोहेला बोइशाख, तमिलनाडु में पुथंडु, असम में बोहाग बिहु, पूरामुद्दीन केरल, उत्तराखंड में बिहू, ओडिशा में महा विष्णु संक्रांति और आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में उगादी के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। किसानों का त्यौहार बैसाखी इस पर्व के दिन सूर्य की स्थिति में परिवर्तन होने के कारण धूप तेज होने लगती है, साथ ही गर्मी का आरंभ हो जाता है। सूरज की गर्माहट से रबी की फसल पक जाती है इसलिए किसानों के द्वारा इसे एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। अप्रैल के महीने में सर्दी पूरी तरह समाप्त हो चुकी होती है और गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है। इस त्यौहारको मौसम में होने वाले कुदरती बदलाव के कारण भी मनाया जाता है. बैसाखी से जुड़ीं पौराणिक मान्यता Baisakhi Festival 2025:ऐसा पौराणिक मान्यता है कि गुरु तेग बहादुर जो सिखों के 9वें गुरु है, वो औरंगज़ेब के साथ युद्ध करते हुए शहीद हो गए थे। उस समय तेग बहादुर मुगलों द्वारा हिन्दुओं पर किए जा रहे अत्याचार के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे। इस युद्ध में उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र गुरु गोबिन्द सिंह अगले गुरु बने। सन् 1650 में पंजाब मुगलों, अत्याचारियों और भ्रष्टाचारियों का अत्याचार झेल रहा था। Baisakhi Festival 2025 उस समय समाज में लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा था और लोगों को न्याय की कही उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी।  ऐसी विपरीत परिस्थितियों में गुरू गोबिन्द सिंह ने सभी लोगों में अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज उठाने और उनमें साहस भरने का कार्य किया था। उन्होंने आनंदपुर में सिखों के संगठन का निर्माण करने के लिए लोगों का आवाह्न किया। Baisakhi Festival 2025 इस सभा में ही उन्होंने तलवार उठाकर लोगों से ये सवाल किया कि आप में से वे बहादुर योद्धा कौन हैं जो बुराई के ख़िलाफ शहीद होने के लिए तैयार हैं। उस समय सभा में से पाँच योद्धा सामने आए और इन्ही पांच योद्धाओं को “पंच प्यारे” कहा गया जिन्हे खालसा पंथ का नाम दिया गया। बैसाखी कैसे मनाते है? बैसाखी को मुख्य रूप से किसी गुरुद्वारे या किसी खुले स्थान पर मनाया जाता है Baisakhi Festival 2025 जिसमें भांगड़ा और गिद्दा आदि नृत्यु करते हैं। इस पर्व को निम्नलिखित तरीके से मनाया जाता है।  इस दिन लोग प्रातःकाल उठकर गुरूद्वारे में जाकर प्रार्थना करते हैं। बैसाखी में गुरुद्वारे में गुरुग्रंथ साहिब जी के स्थान को जल और दूध से शुद्ध किया जाता है। उसके बाद पवित्र किताब को ताज के साथ उसके स्थान पर रखा जाता है। इसके बाद किताब को पढ़ा जाता है और अनुयायी ध्यानपूर्वक गुरू की वाणी सुनते हैं। इस दिन श्रद्धालुयों के लिए विशेष प्रकार का अमृत तैयार किया जाता है जो बाद में बाँटा जाता है। परंपरा के अनुसार,अनुयायी एक पंक्ति

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June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list:जून 2025 में पड़ने वाले प्रमुख व्रत और त्योहारों की सूची निम्नलिखित है

June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list:जून 2025 में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्यौहार आने वाले हैं, जो हमारे जीवन में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखते हैं। इन त्यौहारों में मिथुन संक्रांति पितृ दिवस, संकष्टी गणेश चतुर्थी, पूर्णिमा, कबीर जयंती, पूर्णिमा, सत्य व्रत, गंगा दशहरा, विश्व पर्यावरण दिवस, और कई अन्य महत्वपूर्ण त्यौहार शामिल हैं। ये त्यौहार न केवल हमें अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ते हैं, बल्कि हमें आध्यात्मिक ज्ञान और शांति की प्राप्ति भी कराते हैं। इन त्यौहारों के महत्व और उनके पीछे की कहानियों को जानने से हमें अपनी जड़ों को समझने और अपनी संस्कृति को समृद्ध बनाने में मदद मिलती है। यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि ये त्यौहार क्यों मनाए जाते हैं और उनके पीछे की पौराणिक कथाएं क्या हैं। इन त्यौहारों के दौरान, लोग पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं, और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं। June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list इन त्यौहारों का महत्व न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से है, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी है। ये त्यौहार हमें अपनी संस्कृति और परंपराओं को समझने और समृद्ध बनाने में मदद करते हैं।  इस लेख में, हम आपको जून 2025 में आने वाले विशेष व्रत और त्यौहारों की एक पूरी लिस्ट प्रदान करेंगे, साथ ही हम आपको इन त्यौहारों के महत्व, उनके पीछे की कहानियों, और उनके आयोजन के तरीकों के बारे में भी बताएंगे…. June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list:जून 2025 में प्रमुख व्रत और त्योहारों की विस्तृत जानकारी हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व होता है। June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list यह धार्मिक अनुष्ठान न केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक हैं, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शांति भी लाते हैं। आइए देखें जून 2025 में आने वाले महत्वपूर्ण व्रत और त्योहारों का विवरण। जून 2025 में प्रमुख व्रत और त्योहारों की विस्तृत जानकारी हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व होता है। June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list यह धार्मिक अनुष्ठान न केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक हैं, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शांति भी लाते हैं। आइए देखें जून 2025 में आने वाले महत्वपूर्ण व्रत और त्योहारों का विवरण। 1 जून (रविवार) – षष्ठी व्रत षष्ठी व्रत का संबंध भगवान स्कंद (कार्तिकेय) से होता है। June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list इसे विशेष रूप से संतान प्राप्ति और उनके उत्तम स्वास्थ्य के लिए रखा जाता है। 2 जून (सोमवार) – सोमवार व्रत यह व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। इसे करने से मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और इच्छाओं की पूर्ति होती है। 3 जून (मंगलवार) – वृषभ व्रत, दुर्गाष्टमी व्रत, धूमावती जयंती वृषभ व्रत: वृषभ राशि के जातकों के लिए यह दिन विशेष शुभ होता है। दुर्गाष्टमी व्रत: मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करने के लिए अष्टमी के दिन यह व्रत रखा जाता है। धूमावती जयंती: यह दिन देवी धूमावती को समर्पित है, जो तंत्र साधना करने वालों के लिए विशेष महत्व रखती हैं। 4 जून (बुधवार) – महेश नवमी यह पर्व भगवान शिव को समर्पित होता है और विशेष रूप से माहेश्वरी समाज द्वारा मनाया जाता है। 5 जून (गुरुवार) – गंगा दशहरा, विश्व पर्यावरण दिवस गंगा दशहरा: इस दिन गंगा नदी स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list गंगा स्नान और दान-पुण्य करने से पापों का नाश होता है। विश्व पर्यावरण दिवस: पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए यह दिन मनाया जाता है। 6 जून (शुक्रवार) – निर्जला एकादशी निर्जला एकादशी व्रत को सभी एकादशियों में श्रेष्ठ माना जाता है। June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list इस दिन बिना जल ग्रहण किए उपवास रखा जाता है, जिससे हजारों एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त होता है। 7 जून (शनिवार) – बकरीद (ईद-उल-अज़हा) यह इस्लाम धर्म का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे कुर्बानी के रूप में मनाया जाता है। 8 जून (रविवार) – प्रदोष व्रत शिव जी की उपासना के लिए यह व्रत रखा जाता है। June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list इसे करने से सभी दोष समाप्त होते हैं। 10 जून (मंगलवार) – सत्य व्रत, पूर्णिमा व्रत, वैट सावित्री पूर्णिमा सत्य व्रत: यह व्रत सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने और पूजा करने के लिए किया जाता है। पूर्णिमा व्रत: पूर्णिमा तिथि को चंद्र देव की पूजा की जाती है। वैट सावित्री पूर्णिमा: यह व्रत सुहागिन स्त्रियों द्वारा अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। 11 जून (बुधवार) – देव स्नान पूर्णिमा, कबीर जयंती देव स्नान पूर्णिमा: इस दिन भगवान जगन्नाथ का विशेष अभिषेक किया जाता है। कबीर जयंती: संत कबीर का जन्म इसी दिन हुआ था, June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list जो समाज सुधारक और भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत थे। 14 जून (शनिवार) – संकष्टी गणेश चतुर्थी गणपति बप्पा की कृपा पाने के लिए यह व्रत रखा जाता है। इसे करने से संकट दूर होते हैं। 15 जून (रविवार) – मिथुन संक्रांति, पितृ दिवस मिथुन संक्रांति: यह दिन सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश करने का संकेत देता है और विशेष धार्मिक कार्य किए जाते हैं। पितृ दिवस: पितरों (पूर्वजों) को सम्मान देने के लिए यह दिन मनाया जाता है। 18 जून (बुधवार) – कालाष्टमी, बुधाष्टमी व्रत कालाष्टमी: भगवान काल भैरव की पूजा इस दिन की जाती है। बुधाष्टमी व्रत: यह व्रत विशेष रूप से बुध ग्रह से संबंधित दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है। 21 जून (शनिवार) – योगिनी एकादशी यह व्रत पापों के नाश के लिए श्रेष्ठ माना जाता है और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। 23 जून (सोमवार) – सोम प्रदोष व्रत, मास शिवरात्रि सोम प्रदोष व्रत: शिव जी की कृपा पाने के लिए यह व्रत किया जाता है। मास शिवरात्रि: इस दिन विशेष रूप से भगवान शिव की आराधना की जाती है। 24 जून (मंगलवार) – रोहिणी व्रत यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list और विशेष रूप से जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा किया जाता है। 25 जून (बुधवार) – अमावस्या अमावस्या को पितृ तर्पण और श्राद्ध कर्म करने का विशेष महत्व होता है। 26 जून (गुरुवार) – गुप्त नवरात्र प्रारंभ, चंद्र दर्शन गुप्त नवरात्र: यह तंत्र साधकों

June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list:जून 2025 में पड़ने वाले प्रमुख व्रत और त्योहारों की सूची निम्नलिखित है Read More »