आखिर क्यों खाया था पांडवों ने अपने मृत पिता के शरीर का मांस

आज हम आपको महाभारत से जुडी एक घटना बताते है जिसमे पांचो पांडवों ने अपने मृत पिता पाण्डु का मांस खाया था उन्होंने ऐसा क्यों किया यह जानने के लिए पहले हमे पांडवो के जनम के बारे में जानना पड़ेगा। पाण्डु के पांच पुत्र युधिष्ठर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव थे।  इनमे से युधिष्ठर, भीम और अर्जुन की माता कुंती तथा नकुल और सहदेव की माता माद्री थी। पाण्डु इन पाँचों पुत्रों के पिता तो थे पर इनका जनम पाण्डु के वीर्य तथा सम्भोग से नहीं हुआ था क्योंकि पाण्डु को श्राप था की जैसे ही वो सम्भोग करेगा उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसलिए पाण्डु के आग्रह पर यह पुत्र कुंती और माद्री ने भगवान का आहवान करके प्राप्त किये थे। जब पाण्डु की मृत्यु हुई तो उसके मृत शरीर का मांस पाँचों भाइयों ने मिल बाट कर खाया था। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योकिं स्वयं पाण्डु की ऐसी इच्छा थी। चुकी उसके पुत्र उसके वीर्ये से पैदा नहीं हुए थे इसलिए पाण्डु का ज्ञान, कौशल उसके बच्चों में नहीं आ पाया था।  इसलिए उसने अपनी मृत्यु पूर्व ऐसा वरदान माँगा था की उसके बच्चे उसकी मृत्यु के पश्चात उसके शरीर का मांस मिल बाँट कर खाले ताकि उसका ज्ञान बच्चों में स्थानांतरित हो जाए। पांडवो द्वारा पिता का मांस खाने के सम्बन्ध में दो मान्यता प्रचलित है।  प्रथम मान्यता के अनुसार मांस तो पांचो भाइयों ने खाया था पर सबसे ज्यादा हिस्सा सहदेव ने खाया था।  जबकि एक अन्य मान्यता के अनुसार सिर्फ सहदेव ने पिता की इच्छा का पालन करते हुए उनके मस्तिष्क के तीन हिस्से खाये। पहले टुकड़े को खाते ही सहदेव को इतिहास का ज्ञान हुआ, दूसरे टुकड़े को खाने पे वर्तमान का और तीसरे टुकड़े को खाते ही भविष्य का। यहीं कारण था की सहदेव पांचो भाइयों में सबसे अधिक ज्ञानी था और इससे उसे भविष्य में होने वाली घटनाओ को देखने की शक्ति मिल गई थी। शास्त्रों के अनुसार श्री कृष्ण के अलावा वो एक मात्र शख्स सहदेव ही था जिसे भविष्य में होने वाले महाभारत के युद्ध के बारे में सम्पूर्ण बाते पता थी। श्री कृष्ण को डर था की कहीं सहदेव यह सब बाते औरों को न बता दे इसलिए श्री कृष्ण ने सहदेव को श्राप  दिया था की की यदि उसने ऐसा किया तो  मृत्यु हो जायेगी।

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इस कारण देवर्षि नारद को बनना पड़ा था एक बार बंदर

श्री नारद बड़े ही तपस्वी और ज्ञानी ऋषि हुए जिनके ज्ञान और तप की माता पार्वती भी प्रशंसक थीं। तब ही एक दिन माता पार्वती श्री शिव से नारद मुनि के ज्ञान की तारीफ करने लगीं। शिव ने पार्वती जी को बताया कि नारद बड़े ही ज्ञानी हैं। लेकिन किसी भी चीज का अंहकार अच्छा नहीं होता है। एक बार नारद को इसी अहंकार (घमंड) के कारण बंदर बनना पड़ा था। यह सुनकर माता पार्वती को बहुत आश्चर्य हुआ । उन्होंने श्री शिव भगवान से पूरा कारण जानना चाहा। तब श्री शिव ने बतलाया। इस संसार में कोई कितना ही बड़ा ज्ञानी हो, लेकिन श्री हरि जो चाहते हैं वो उसे बनना ही पड़ता है। नारद को एक बार अपने इसी तप और बुद्धि का अहंकार (घमंड) हो गया था । इसलिए नारद को सबक सिखाने के लिए श्री विष्णु को एक युक्ति सूझी। हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उस गुफा के निकट ही गंगा जी बहती थीं। वह परम पवित्र गुफा नारद जी को अत्यन्त सुहावनी लगी। वहां पर के पर्वत, नदी और वन को देख कर उनके हृदय में श्री हरि विष्णु की भक्ति अत्यन्त बलवती हो उठी और वे वहीं बैठ कर तपस्या में लीन हो गए । नारद मुनि की इस तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए कि कहीं देवर्षि नारद अपने तप के बल से उनका स्वर्ग नहीं छीन लें। इंद्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिये कामदेव को उनके पास भेज दिया। वहां पहुंच कर कामदेव ने अपनी माया से वसंत ऋतु को उत्पन्न कर दिया। पेड़ और पत्ते पर रंग-बिरंगे फूल खिल गए कोयले कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने वाली शीतल.मंद.सुगंध सुहावनी हवा चलने लगी। रंभा आदि अप्सराएं नाचने लगीं। किन्तु कामदेव की किसी भी माया का नारद मुनि पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। तब कामदेव को डर सताने लगा कि कहीं नारद मुझे शाप न दे दें। इसलिए उन्होंने श्री नारद से क्षमा मांगी। नारद मुनि को थोड़ा भी क्रोध नहीं आया और उन्होंने कामदेव को क्षमा कर दिया। कामदेव वापस अपने लोक में चले गए। कामदेव के चले जाने पर नारद मुनि के मन में अहंकार (घमंड) हो गया कि मैंने कामदेव को जीत लिया। वहां से वे शिव जी के पास चले गए और उन्हें अपने कामदेव को हारने का हाल कह सुनाया। भगवान शिव समझ गए कि नारद को अहंकार हो गया है। शंकरजी ने सोचा कि यदि इनके अहंकार की बात विष्णु जी जान गए तो नारद के लिए अच्छा नहीं होगा। इसलिए उन्होंने नारद से कहा कि तुमने जो बात मुझे बताई है उसे श्री हरि को मत बताना। नारद जी को शिव जी की यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने सोचा कि आज तो मैने कामदेव को हराया है और ये भी किसी को नहीं बताऊं । नारद जी क्षीरसागर पह़ुंचे गए और शिव जी के मना करने के बाद भी सारी कथा उन्हें सुना दी। भगवान विष्णु समझ गए कि आज तो नारद को अहंकार (घमंड) ने घेर लिया है। अपने भक्त के अहंकार को वे सह नहीं पाते इसलिए उन्होंने अपने मन में सोचा कि मैं ऐसा उपाय करूंगा कि नारद का घमंड भी दूर हो जाए और मेरी लीला भी चलती रहे। नारद जी जब श्री विष्णु से विदा होकर चले तो उनका अभिमान और भी बढ़ गया। इधर श्री हरि ने अपनी माया से नारद जी के रास्ते में एक बड़े ही सुन्दर नगर को बना दिया । उस नगर में शीलनिधि नाम का वैभवशाली राजा रहता था। उस राजा की विश्व मोहिनी नाम की बहुत ही सुंदर बेटी थी, जिसके रूप को देख कर लक्ष्मी भी मोहित हो जाएं। विश्व मोहिनी स्वयंवर करना चाहती थी इसलिए कईं राजा उस नगर में आए हुए थे। नारद जी उस नगर के राजा के यहां पहुंचे तो राजा ने उनका पूजन कर के उन्हें आसन पर बैठाया। फिर उनसे अपनी कन्या की हस्तरेखा देख कर उसके गुण-दोष बताने के लिया कहा। उस कन्या के रूप को देख कर नारद मुनि वैराग्य भूल गए और उसे देखते ही रह गए । उस कन्या की हस्तरेखा बता रही थी कि उसके साथ जो विवाह करेगा वह अमर हो जाएगा, उसे संसार में कोई भी जीत नहीं सकेगा और संसार के समस्त जीव उसकी सेवा करेंगे। यह बात नारद मुनि ने राजा को नहीं बताईं और राजा को उन्होंने अपनी ओर से बना कर कुछ और अच्छी बातें कह दी। अब नारद जी ने सोचा कि कुछ ऐसा उपाय करना चाहिए कि यह कन्या मुझसे ही विवाह करे। ऐसा सोचकर नारद जी ने श्री हरि को याद किया और भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हो गए। नारद जी ने उन्हें सारी बात बताई और कहने लगे, हे नाथ आप मुझे अपना सुंदर रूप दे दो, ताकि मैं उस कन्या से विवाह कर सकूं। भगवान हरि ने कहा हे नारद! हम वही करेंगे जिसमें तुम्हारी भलाई हो। यह सारी विष्णु जी की ही माया थी । विष्णु जी ने अपनी माया से नारद जी को बंदर का रूप दे दिया । नारद जी को यह बात समझ में नहीं आई। वो समझे कि मैं बहुत सुंदर लग रहा हूं। वहां पर छिपे हुए शिव जी के दो गणों ने भी इस घटना को देख लिया। ऋषिराज नारद तत्काल विश्व मोहिनी के स्वयंवर में पहुंच गए और साथ ही शिव जी के वे दोनों गण भी ब्राह्मण का रूप बना कर वहां पहुंच गए। वे दोनों गण नारद जी को सुना कर कहने लगे कि भगवान ने इन्हें इतना सुंदर रूप दिया है कि राजकुमारी सिर्फ इन पर ही रीझेगी। उनकी बातों से नारद जी मन ही मन बहुत खुश हुए। स्वयं भगवान विष्णु भी उस स्वयंवर में एक राजा का रूप धारण कर आ गए। विश्व मोहिनी ने कुरूप नारद की तरफ देखा भी नहीं और राजा रूपी विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। मोह के कारण नारद मुनि की बुद्धि नष्ट हो गई थी । राजकुमारी द्वारा अन्य राजा को वरमाला डालते देख वे परेशान हो उठे। उसी समय शिव जी के गणों ने ताना कसते हुए नारद जी से कहा – जरा

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परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया? | Parshuram And Karna Story In Hindi

कर्ण द्वापर युग के महान योद्धा में से एक थे, लेकिन उनको मिला श्राप उनकी मौत का कारण बन गया। कर्ण को उनके जीवन काल में दो श्राप मिले थे। उन्हें पहला श्राप उनके गुरु भगवान परशुराम ने दिया था, जबकि दूसरा श्राप एक ब्राह्मण ने दिया था। कर्ण को बचपन से ही धनुर्धर बनने की चाहता थी, लेकिन सूत पुत्र होने के कारण कोई उन्हें शिक्षा नहीं देता था। जब वह धनुर विद्या सीखने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास जाते हैं, तो वह भी कर्ण के सूत पुत्र होने के कारण उसे धनुर विद्या देने से मना कर देते हैं। इससे कर्ण निराश होकर भगवान परशुराम के पास पहुंच जाते हैं, लेकिन भगवान परशुराम भी सिर्फ ब्राह्मणों को ही विद्या देते थे। अब कर्ण किसी भी तरह से धनुर विधा सीखना चाहता था, तो वह भगवान परशुराम से झूठ बोलता है कि वह ब्राह्मण है। भगवान परशुराम भी कर्ण को ब्राह्मण समझकर उसे शिक्षा देने लगते हैं। जब कर्ण की शिक्षा खत्म होने वाली होती है, तब एक दिन उनके गुरु भगवान परशुराम दोपहर के समय कर्ण की जंघा पर सिर रखकर आराम कर रहे होते हैं। थोड़े समय बाद वहां एक बिच्छू आता है, जो कर्ण के जंघा पर काट लेता है। अब कर्ण सोचता है कि अगर वह हिला या बिच्छू को हटाने की कोशिश की, तो गुरु परशुराम की नींद टूट जाएगी। इसलिए, वह बिच्छू को हटाने की बजाय उसे डंक मारने देता है। कर्ण काफी समय तक बिच्छू के डंक से होने वाले दर्द को सहता रहता है। फिर जब कुछ समय बाद गुरु परशुराम नींद से उठते हैं, तो वह देखते हैं कि कर्ण के जांघ से खून बह रहा है। यह देखकर भगवान परशुराम गुस्से में कहते हैं, “इतनी सहनशीलता सिर्फ किसी क्षत्रिय में ही हो सकती है। तुमने मुझसे झूठ बोलकर ज्ञान हासिल किया है, इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि जब भी तुम्हें मेरी दी हुई विद्या की सबसे ज्यादा जरूरत होगी, उस समय वह काम नहीं आएगी।” इससे निराश होकर कर्ण अपने गुरु से कहता है कि वह स्वयं नहीं जानता कि वह किस वंश और कुल का है। ऐसे में वह सारी बातें अपने गुरु परशुराम को बताते हैं। यह जानने के बाद भगवान परशुराम को श्राप देने पर पछतावा होता है, लेकिन दिया हुआ श्राप वापस नहीं लिया जा सकता था। इसलिए, वह अपना विजय धनुष कर्ण को वरदान के रूप में देते हैं। इसके बाद कर्ण भगवान परशुराम के आश्रम से विदा लेते हैं। इस घटना के कुछ वर्षों बाद एक दिन कर्ण जंगल में किसी अत्याचारी राक्षस का पीछे रहे होते हैं। वह राक्षस को निशाना बनाते हुए उसे मारने के लिए बाण चलाते हैं, लेकिन राक्षस अचानक गायब हो जाता है और बाण दलदल में फंसी एक गाय को लग जाता है। बाण लगने से गाय की वहीं पर मौत हो जाती है। उस गाय का स्वामी एक ब्राह्मण होता है, जो गाय की दुर्दशा देखकर कर्ण को वहीं पर श्राप दे देता है। श्राप में ब्राह्मण कहता है कि जिस तरह तुमने एक असहाय गाय को मारा है, ठीक उसी तरह ही एक दिन तुम्हारी भी मृत्यु होगी। आगे चलकर इन दोनों श्राप का प्रभाव महाभारत के युद्ध में नजर आया। युद्ध के दौरान कर्ण के रथ का पहिया दलदल में फंस जाता है। जब कर्ण उसे निकालने के लिए रथ से उतरता है, तभी अर्जुन बाण चला देता हैं, जिससे कर्ण की मृत्यु हो जाती है।

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पांडवों की जन्म कथा | Mahabharat Mein Pandav Ka Janm

पांडव हस्तिनापुर के राजा पांडु और उनकी दो पत्नियों कुंती व माद्री के पांच शक्तिशाली और कुशल पुत्र थे। महाभारत में युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, और सहदेव – ये पांच पांडव सबसे अधिक सराहना के पात्र रहे हैं। इनके जन्म की कहानी न सिर्फ दिलचस्प है, बल्कि हैरान कर देने वाली भी है। एक बार राजा पांडु अपनी पत्नियों के साथ शिकार करने के लिए जंगल में गए। राजा पांडु को वहां एक हिरण का जोड़ा दिखाई दिया, जो एक-दूसरे से बेहद प्यार करता था। जब राजा की नजर उस जोड़े पर पड़ी, तो उन्होंने तीर निकालकर नर हिरण को निशाना बनाया और तीर छोड़ दिया। तीर सीधा हिरण की छाती में जाकर लगा। वह हिरण कोई और नहीं, बल्कि हिरण के वेश में ऋषि किदंबा थे। उन्होंने पांडु को श्राप दिया कि वह जब भी किसी महिला के करीब जाएंगे, तभी उनकी मृत्यु हो जाएगी। पांडु ने ऋषि किदंबा से क्षमा मांगी, लेकिन तब तक वो मर चुके थे। श्राप के कारण पांडु ने राज्य त्याग दिया और अपन पत्नियों से निवेदन किया कि वो वापस राज्य लौट जाएं, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। कुंती और माद्री जंगल में राजा पांडु के साथ ही रहने लगीं। उस समय उनकी कोई संतान नहीं थी। तब कुंती ने अपने पती को बताया कि उन्हें ऋषि दुर्वासा से वरदान मिला था कि वह किसी भी भगवान को बुला कर उनसे एक शिशु को प्राप्त कर सकती है। दुर्वासा द्वारा कुंती को दिए गए मंत्रों के उपयोग के माध्यम से उसने यम यानी धर्म के देवता का आह्वान किया, जिससे उन्होंने युधिष्ठिर को जन्म दिया। उसने फिर पवन देव से भीम, इंद्र देव से अर्जुन के रूप में एक और पुत्र प्राप्त किया। इस प्रकार उसके तीन पुत्र हो गए, लेकिन माद्री के एक भी पुत्र नहीं था, तब कुंती ने माद्री को भी मंत्र विद्या सिखाई। मंत्रों की मदद से माद्री ने अश्विनी कुमारों को बुलाया, जिन्होंने उसे नकुल और सहदेव पुत्र के रूप में दिए। इस प्रकार, पांचों पांडवों का जन्म हुआ। देवताओं से प्राप्त सभी पांडवों को देवताओं की तरह ही दिव्य गुण प्राप्त हुए थे।

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कर्ण और दुर्योधन की मित्रता | Duryodhan Karan Ki Mitrata

महाभारत की कहानी में सिर्फ दुश्मनी नहीं है, बल्कि इसमें दोस्ती और प्यार के कई किस्से भी शामिल हैं। कर्ण और दुर्योधन की मित्रता भी महाभारत में दोस्ती की मिसाल पेश करती है। इनकी गहरी दोस्ती की कई कहानियां महाभारत में प्रचलित हैं। आइए, जानते हैं उन घटनाओं के बारे में। एक बार की बात है, गुरु द्रोणाचार्य ने राजकुमारों के बीच प्रतियोगिता रखी, जिसमें उन्हें कई करतब दिखाने थे। इस प्रतियोगिता में भाग लेने कौरवों और पांडवों के अलावा दूर-दूर के राज्यों से भी राजकुमार आए थे। इस प्रतियोगिता में अर्जुन ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन तभी वहां कर्ण आ गया। कर्ण ने वो सारे करतब कर दिखाए, जो अर्जुन कर चुका था। इसके बाद कर्ण ने अर्जुन को मुकाबले के लिए ललकारा, लेकिन गुरु द्रोणाचार्य ने इस मुकाबले के लिए मना कर दिया, क्योंकि कर्ण कोई राजकुमार नहीं था और यह प्रतियोगिता राजकुमारों के बीच थी। वहीं, दुर्योधन नहीं चाहता था कि यह प्रतियोगिता अर्जुन जीत जाए, इसलिए दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राज सौंप दिया और उसे अंगराज घोषित कर दिया। इस तरह दुर्योधन ने कर्ण को अर्जुन से मुकाबला करने की योग्यता दी। इस घटना के बाद कर्ण सदा दुर्योधन का आभारी रहा और उसे अपना परम मित्र मानने लगा। कर्ण ने हमेशा दुर्योधन की मदद की और एक ईमानदार साथी का फर्ज निभाया। कर्ण बहुत वीर था, इसलिए वह दुर्योधन को योद्धा की तरह लड़ने की शिक्षा देता था। दुर्योधन जब भी अपने मामा शकुनि के बहकावे में आकर पांडवों को धोखा देने की सोचता, तो कर्ण उसे कायर कहकर धिक्कार देता था। एक बार दुर्योधन ने जब पांडवों को जलाकर मारने के लिए लाक्षागृह का निर्माण करवाया, तो कर्ण को यह बात बहुत बुरी लगी। कर्ण ने कहा, “दुर्योधन तुम्हें युद्ध के मैदान में अपनी वीरता का प्रदर्शन करना चाहिए, न कि छल कपट करके अपनी कायरता का प्रदर्शन करना चाहिए।” कर्ण ने हमेशा मुसीबत में फंसे दुर्योधन का साथ दिया। दुर्योधन चित्रांगद की राजकुमारी से शादी करना चाहता था, लेकिन राजकुमारी ने उसे स्वयंवर में अस्वीकार कर दिया था। दुर्योधन तिलमिलाकर राजकुमारी को जबरदस्ती उठा लाया। अन्य राजा दुर्योधन के पीछे-पीछे भागे, वो दुर्योधन को मार देना चाहते थे। यहां भी कर्ण ने दुर्योधन की मदद की और सभी राजाओं को परास्त कर दिया। महाभारत में कई ऐसी घटनाएं हैं, जो साबित करती हैं कि कर्ण एक वीर योद्धा और दुर्योधन का वफादार साथी था।

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परीक्षित के जन्म की कहानी |  Raja Parikshit Story In Hindi

परीक्षित के जन्म की कथा महाभारत के युद्ध के समय की है। जब द्रौपदी को इस बात की जानकारी मिली कि अश्वत्थामा ने उसके पांचों बेटों की हत्या कर दी है तो उसने अनशन करने की ठान ली। द्रौपदी ने प्रण लिया कि वह अपना अनशन तभी तोड़ेगी जब तक कि अश्वत्थामा के सिर पर लगी मणि उसे नहीं मिल जाती। जब अर्जुन को इसकी जानकारी मिली तो वे अश्वत्थामा से युद्ध करने निकल गए। दोनों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। अर्जुन को मौत के घाट उतारने के लिए अश्वत्थामा ने अपना ब्रह्मास्त्र निकाला। यह देख अर्जुन ने भी अपना बचाव करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। तभी वहां नारद और ऋषि व्यास पहुंचे और उन्होंने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल करने से मना किया। इसके बाद अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस कर लिया, लेकिन अश्वत्थामा ने ऐसा नहीं किया। दरअसल, अश्वत्थामा पांच पांडवों के कुल को नष्ट करना चाहता था। इसलिए उसने अपने ब्रह्मास्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी जो कि गर्भवती थी उसकी ओर कर दिया। इसपर भगवान कृष्ण ने कहा, “अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा को परीक्षित नामक बेटे के जन्म का वरदान मिला है, इसलिए वह जरूर जन्म लेगा। अगर वह मरा हुआ भी पैदा हुआ तो मैं खुद उसे जीवनदान दूंगा और वह बड़ा होकर एक महान सम्राट बनेगा जबकि तुम तीन हजार वर्ष तक इस पाप को ढोते रहोगे। साथ ही हमेशा तुम्हारे खून से बदबू आते रहेगी और वह ऐसे ही बहता रहेगा। यही नहीं तुम हर प्रकार के बीमारियों से घिरे रहोगे। ” इसके बाद अर्जुन ने अश्वत्थामा को रस्सी में बांधा और द्रौपदी के पास ले आया। अश्वत्थामा की हालत देखकर द्रौपदी को दया आ गई और उसने अर्जुन से उसे छोड़ने की अपील की। मगर भगवान कृष्ण ने ऐसा नहीं होने दिया और उन्होंने अर्जुन को आदेश दिया कि उसके सिर से मणि निकाल ले और द्रौपदी को दे दे। इधर, ब्रह्मास्त्र के गर्भ में जाते ही उत्तरा को तेज दर्द होने लगा। यह देख भगवान कृष्ण ने अपना छोटा रूप धारण किया और उत्तरा के गर्भ में दाखिल हो गए। कृष्ण का छोटा रूप एक अंगूठे के बराबर ही था। वे शंख, चक्र, गदा और पद्म सबकुछ धारण किए हुए थे। उत्तरा के गर्भ में अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गये ब्रह्मास्त्र की आग को शांत कर रहे थे। वहीं, गर्भ में पल रहा बालक उन्हें देखकर हैरान था कि मेरी मां के गर्भ में यह कौन घुस गया है। कुछ समय बाद उत्तरा ने अपने बच्चे को जन्म दिया लेकिन वह मृत पैदा हुआ। यह देख वह रोने लगी। उसने भगवान कृष्ण से कहा, “ ये नारायण! आपने तो कहा था कि मेरा बेटे पर ब्रह्मास्त्र का असर नहीं होगा और वह जीवित ही पैदा होगा। वह सालों तक अमर होकर राज करेगा, लेकिन यह तो मरा पड़ा है। इसे जीवित करने की कृपा करो प्रभु। ” उत्तरा की बात सुनकर भगवान कृष्ण तुरंत प्रसूति गृह में प्रवेश किया और कहा, “ हे पुत्री तुम दुखी न हो। तुम्हारा बेटा जरूर जीवित होगा। मैंने खुद इसके जीवन की रक्षा की है।” इसके बाद कृष्ण भगवान ने मृत बालक पर अमृतमयी नजरें डाली और कहा, “अगर मैंने जीवन में कभी झूठ का साथ नहीं दिया है और हमेशा ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन किया है। कभी किसी लड़ाई में अपनी पीठ नहीं दिखाई है न ही कभी अधर्म का साथ दिया है को अभी इसी समय अभिमन्यु का यह पुत्र जो मरा पड़ा है वह जीवित हो जाए। ” इतना कहने के बाद कृष्ण ने जब उस मृत बालक पर अपना हाथ डाला तो वह जीवित हो गया और रोने लगा। इसके बाद भगवान कृष्ण ने ब्रह्मास्त्र को वापस ब्रह्मलोक भेज दिया। यह चमत्कार देख सभी स्त्रियां आश्चर्यचकित हो गई। इसके बाद भगवान कृष्ण ने अभिमन्यु के पुत्र का नाम परीक्षित रखा। इसके पीछे का कारण था कि वह बालक कुरुकुल के नाश होने पर जन्मा था। वहीं, जब युधिष्ठिर वापस आए और उन्हें बालक के जन्म के बारे में पता चला तो वे भी खुशी से झूम उठे। इस खुशी में उन्होंने हाथी, छोड़े, अन्न, गाय आदि दान दिए। इसके बाद उन्होंने ज्योतिष को बुलाया और बच्चे के भविष्य की जानकारी ली। इसपर ज्योतिषी ने कहा, “यह बालक प्रभु श्रीकृष्ण चन्द्र का भक्त कहलाएगा। यह एक धर्मी, यशस्वी, पराक्रमी व दानी होगा। ” ज्योतिष ने आगे बताया कि, “ जीवन में एक ऋषि का शाप पाकर गंगा के तट पर यह श्री शुकदेव से आत्मज्ञान की प्राप्ति करेगा। ” ज्योतिष की बात सुनकर युधिष्ठिर खुश हुए और उन्हें दक्षिणा देकर वहां से विदा कर दिया। कहानी से सीख – इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि कभी भी किसी कार्य को छल कपट के साथ नहीं करना चाहिए। इससे हमारा बुरा ही होता है।

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रामायण की कहानी: हनुमान जी का जन्म

रामभक्त हनुमान को कई नामों से जाना जाता है, जैसे मारुति नंदन, पवनपुत्र व संकटमोचन आदि। माना जाता है कि वह भगवान शिव के 11वें रूद्र अवतार थे और उनके जन्म का उल्लेख कई पौराणिक कथाओं में मिलता है। इस कहानी में हम हनुमान जी के जन्म से जुड़ी ऐसी ही एक प्रचलित कथा बता रहे हैं। हनुमान जी के जन्म की कथा बहुत रोचक है। वे माता अंजनी और वानर राज केसरी के पुत्र थे। माना जाता है कि उनका जन्म कोई साधारण संयोग नहीं था, बल्कि देवतागण, नक्षत्र और सारे भगवान के आशीर्वाद से पृथ्वी से पाप का विनाश करने के लिए हुआ था। मान्यताओं के अनुसार, माता अंजनी को यह वरदान मिला हुआ था कि उनका होने वाला पुत्र शिव का अंश होगा। इसके अलावा, एक मान्यता यह भी है कि जब बजरंगबली का जन्म हुआ था, उसी समय रावण के घर भी एक पुत्र ने जन्म लिया था। यह संयोग दुनिया में अच्छाई और बुराई का संतुलन बनाए रखने के लिए हुआ था। बात सतयुग की है, जब माता अंजनी एक जंगल में बैठकर पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान शिव की पूजा कर रही थीं। वह हाथ जोड़कर और आंखें बंद करके आराधना में लीन थी, तभी उनकी सामने रखी कटोरी में एक फल आकर गिरा। माता अंजनी ने जब उस फल को देखा, तो उन्होंने उसे प्रसाद समझ कर सेवन कर लिया। दरअसल, जब माता अंजनी जंगल में पूजा कर रही थी, तब वहां से दूर अयोध्या में राजा दशरथ भी पुत्र प्राप्ति के लिए शिव-यज्ञ करवा रहे थे। इस हवन के बाद पंडित ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को फल दिए, जिन्हें खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई थी। इन्हीं फलों में से एक छोटा-सा अंश एक पक्षी उठाकर ले गया, जिसे उसने बाद में माता अंजनी के सामने रख दिया। इस प्रकार भगवान शिव के आशीर्वाद से हुआ था केसरीनंदन हनुमान का जन्म।

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रामायण की कहानी: रामसेतु में गिलहरी का योगदान

माता सीता का हरण होने के बाद, भगवान राम को लंका तक पहुंचने के लिए उनकी वानर सेना जंगल को लंका से जोड़ने के लिए समुद्र के ऊपर पुल बनाने के काम में लग जाती है। पुल बनाने के लिए पत्थर पर भगवान श्रीराम का नाम लिखकर पूरी सेना समुद्र में पत्थर डालती है। भगवान राम का नाम लिखे जाने की वजह से पत्थर समुद्र में डूबने के बजाय तैरने लगते हैं। यह सब देखकर सभी वानर काफी खुश होते हैं और तेजी से पुल बनाने के लिए पत्थर समुद्र में डालने लगते हैं। भगवान राम पुल बनाने के लिए अपनी सेना के उत्साह, समर्पण और जुनून को देखकर काफी खुश होते हैं। उस वक्त वहां एक गिलहरी भी थी, जो मुंह से कंकड़ उठाकर नदी में डाल रही थी। उसे ऐसा बार-बार करते हुए एक वानर देख रहा था। कुछ देर बाद वानर गिलहरी को देखकर मजाक बनाता है। वानर कहता है, “हे! गिलहरी तुम इतनी छोटी-सी हो, समुद्र से दूर रहो। कहीं ऐसा न हो कि तुम इन्हीं पत्थरों के नीचे दब जाओ।” यह सुनकर दूसरे वानर भी गिलहरी का मजाक बनाने लगते हैं। गिलहरी यह सब सुनकर बहुत दुखी हो जाती है। भगवान राम भी दूर से यह सब होता देखते हैं। गिलहरी की नजर जैसे ही भगवान राम पर पड़ती है, वो रोते- रोते भगवान राम के समीप पहुंच जाती है। परेशान गिलहरी श्री राम से सभी वानरों की शिकायत करती है। तब भगवान राम खड़े होते हैं और वानर सेना को दिखाते हैं कि गिलहरी ने जिन कंकड़ों व छोटे पत्थरों को फेंका था, वो कैसे बड़े पत्थरों को एक दूसरे से जोड़ने का काम कर रहे हैं। भगवान राम कहते हैं, “अगर गिलहरी इन कंकड़ों को नहीं डालती, तो तुम्हारे द्वारा फेंके गए सारे पत्थर इधर-उधर बिखरे रहते। ये गिलहरी के द्वारा फेंके गए पत्थर ही हैं, जो इन्हें आपस में जोड़े हुए हैं। पुल बनाने के लिए गिलहरी का योगदान भी वानर सेना के सदस्यों जैसा ही अमूल्य है।” इतना सब कहकर भगवान राम बड़े ही प्यार से गिलहरी को अपने हाथों से उठाते हैं। फिर, गिलहरी के कार्य की सराहना करते हुए श्री राम उसकी पीठ पर बड़े ही प्यार से हाथ फेरने लगते हैं। भगवान के हाथ फेरते ही गिलहरी के छोटे-से शरीर पर उनकी उंगलियों के निशान बन जाते हैं। तब से ही माना जाता है कि गिलहरियों के शरीर पर मौजूद सफेद धारियां कुछ और नहीं, बल्कि भगवान राम की उंगलियों के निशान के रूप में मौजूद उनका आशीर्वाद है। कहानी से सीख : दूसरों के कार्य का मजाक नहीं बनाया जाना चाहिए। कार्य में किसी भी तरह का योगदान महत्वपूर्ण होता है। साथ ही दूसरों द्वारा मजाक बनाए जाने के बावजूद आपको अपना आत्मविश्वास नहीं खोना चाहिए।

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रामायण की कहानी: क्या सीता मंदोदरी की बेटी थी?

माता सीता के जन्म को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। कोई कुछ कहानी सुनता है, तो कोई कुछ। इसलिए, साफ-साफ कहना मुश्किल है कि सीता की माता कौन थी। सीता के जन्म से जुड़ी हम ऐसी ही एक प्रचलित कहानी सुना रहे हैं। एक बार लंकापति रावण के तप से खुश होकर भगवान ब्रह्मा उसे वरदान मांगने को कहते हैं। रावण उनसे अमर होने का वरदान मांगता है। ब्रह्माजी उसे अमर होने के अलावा कोई दूसरा वरदान मांगने को कहते है। रावण वरदान में मांगता है कि मुझे सुर, असुर, पिशाच, नाग, किन्नर या अप्सरा कोई भी न मार सके। रावण मनुष्य द्वारा न मारे जाने के बारे में नहीं बोलता है, क्योंकि वह मनुष्य को तिनके के समान समझता था। वरदान पाने के बाद रावण हर तरफ तबाही मचाना शुरू कर देता है। एक दिन वह दंडकारण्य नामक जगह पहुंचता है, जहां ऋषि-मुनियों का निवास था। रावण को ऋषि-मुनियों को मारना उचित नहीं लगा, लेकिन वो उन ऋषि-मुनियों के रक्त को एक कमंडल में भर कर साथ ले जाता है। वह कमंडल ‘गृत्समद ऋषि’ का था, जो पुत्री की लालसा में माता लक्ष्मी से प्रार्थना करते थे कि वह उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। इसके लिए गृत्समद ऋषि रोजाना पूजा-पाठ के दौरान पवित्र मंत्र पढ़कर दूध की कुछ बूंदें कमंडल में डाला करते थे, जिसमें रावण रक्त भरकर अपने साथ ले गया था। रावण कमंडल को लंका ले गया और वह पहुंचकर कमंडल अपनी पत्नी मंदोदरी को देकर कहता है, “यह विषैले रक्त से भरा है। इसे संभाल कर रखना और किसी को मत देना।” कुछ दिन बाद विहार के लिए रावण किसी पर्वत पर चला जाता है। मंदोदरी को इस तरह रावण का जाना अच्छा नहीं लगता है। वो मृत्यु प्राप्त करने के लिए कमंडल में भरे विष का पान कर लेती है। कमंडल के रक्त को पीने के कुछ समय बाद मंदोदरी गर्भवती हो जाती है। गर्भवती होने के बाद मंदोदरी घबरा जाती है कि महल में मौजूद अन्य लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे। फिर मंदोदरी तीर्थ यात्रा का नाम लेकर कुरुक्षेत्र चली जाती है। वहां मंदोदरी एक बच्ची को जन्म देती है, लेकिन लोक-लाज के चलते वो उसे एक कलश में रखकर जमीन में दफना देती है। कुछ दिनों बाद राजा जनक भी कुरुक्षेत्र जाते हैं। जब वह जमीन में हल चलाते हैं, तो उन्हें वहां कलश मिलता है, जिसमें मंदोदरी ने बच्ची को रखा था। बच्ची को कलश से निकालते ही आसमान से फूलों की वर्षा होने लगती है और साथ में आकाशवाणी भी होती है। आकाशवाणी में राजा जनक द्वारा उस कन्या के लालन-पालन की बात कही जाती है। हल के सीत (हल के आगे का नुकीला भाग) से टकराने की वजह से कलश मिला था, इसलिए राजा जनक ने कन्या का नाम सीता रखा।

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रामायण की कहानी: रावण के दस सिर का रहस्य

रावण के बारे में हर कोई जानता है। वह राक्षस वंश का था और उसके द्वारा की गई गलतियों के कारण हर साल दशहरे के दिन रावण दहन भी किया जाता है। वैसे क्या आपको मालूम है कि महान विद्वान और पंडित होने के साथ-साथ रावण भगवान शिव का परम भक्त भी था। एक बार की बात है, रावण ने सोचा कि क्याें न अपने आराध्य शिव जी को प्रसन्न किया जाए। यह विचार कर वह तपस्या में लीन हो गया। बहुत समय तक तपस्या करने के बाद भी शिव जी प्रसन्न नहीं हुए, तो रावण ने अपना सिर काट कर शिव जी को अर्पण कर दिया। इसके बाद उसका सिर फिर से जुड़ गया। इसके बाद उसने फिर से अपना सिर काट दिया, लेकिन उसका सिर फिर से जुड़ गया। इस तरह एक-एक करके उसने दस बार अपना सिर काटा और हर बार उसका सिर जुड़ जाता। रावण की इस तपस्या को देख कर शिव जी प्रसन्न हो गए और उन्होंने वरदान के साथ ही उसे दस सिर भी दे दिए। इस तरह रावण का नाम पड़ा दशानंद पड़ा। रावण के दस सिर होने को लेकर इस कहानी के साथ-साथ कई अन्य कहानियां भी प्रचलित हैं। ऐसा कहा जाता है कि रावण दस सिर नहीं थे, वह सिर्फ दस सिर होने का भ्रम पैदा करता था। वहीं, कुछ का यह भी मानना है कि रावण छह दर्शन और चार वेदों को जानने वाला था, इसीलिए उसे दसकंठी भी कहा जाता था। शायद इस कारण से भी उसे दशानंद भी कहा जाता था।

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रामायण की कहानी: भगवान राम की मृत्यु

धरती पर भगवान राम ने अपने सारे काम कर लिए थे, अब उनकी मृत्यु का वक्त सामने आ गया था। ऐसे में यमराज ने एक साधू का रूप लिया और राम के नगर पहुंच गए। वो राम के महल पहुंचे और उनसे मिलने का वक्त तय किया। फिर वो श्री राम से मिलें और उन्होंने उनके बीच होने वाली बातों को सबसे छुपाकर रखने की शर्त रखी। साथ ही यह भी कहा कि अगर हम दोनों की बातों के बीच कोई भी आएगा, तो दरवाजे पर खड़े द्वाररक्षक को मृत्युदंड (यानी मरना पड़ेगा) दिया जाएगा। श्री राम ने साधू रूप धारण किए यमराज की बात मान ली और हनुमान जी के न रहने के कारण राम ने भाई लक्ष्मण को द्वारपाल बना दिया। फिर यमराज अपने असली रूप में आएं और बोले, “भगवान आपका पृथ्वी पर जीवन पूरा हो चुका है। अब आपका अपने लोक लौटने का वक्त आ गया है।” यमराज और भगवान राम के बीच बातचीत चल ही रही थी कि उसी वक्त दरवाजे पर ऋषि दुर्वासा पहुंच गए। उन्होंने लक्ष्मण को दरवाजे से हटने को कहा और अंदर जाने की जिद पर अड़ गए । लक्ष्मण ने मना किया, तो वह श्रीराम को श्राप देने की बात करने लगे। लक्ष्मण काफी परेशान हो गए। अगर श्रीराम की बात नहीं मानी, तो उन्हें मरना होगा और अगर ऋषि की बात नहीं मानी, तो श्रीराम को श्राप लगेगा। इस स्थिति में उन्होंने एक मुश्किल फैसला लिया और ऋषि को अंदर जाने दिया। बातचीत के बीच ऋषि को देख भगवान श्रीराम चिंतित हो गए कि अब उनको लक्ष्मण को मारने की सजा देनी होगी। ऐसे में भगवान राम ने लक्ष्मण को नगर से निकाल दिया। लक्ष्मण ने अपने भाई के वादे को निभाने के लिए सरयू नदी में जाकर जल समाधि (डूब गए) ले ली। लक्ष्मण के बारे में जानने के बाद राम बहुत दुखी हुए। फिर भगवान श्री राम ने भी जल समाधि लेने का फैसला किया। श्री राम भी सरयू नदी में जल समाधि लेने के निकल पड़े। उस वक्त वहां भरत, शत्रुघ्न, हनुमान, सुग्रीव और जामवंत भी मौजूद थे। देखते ही देखते भगवान श्रीराम सरयू नदी में समा गए। कुछ ही देर बाद नदी के अंदर से भगवान अपने विष्णु रूप में सबके सामने प्रकट हुए। उन्होंने अपने भक्तों समेत वहां मौजूद हर किसी को दर्शन दिए। इस तरह भगवान राम धरती पर अपने जीवन को पूरा कर स्वर्ग लौट गए।

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रामायण की कहानी: भगवान राम की बहन शांता

अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्नियों और उनसे होने वाले चार पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन भगवान राम की बड़ी बहन के बारे में हर किसी को नहीं पता। वाल्मीकि रामायण में भी राम की बहन शांता के बारे में जानकारी नहीं है, लेकिन दक्षिण पुराण में भगवान राम की बहन शांता का इतिहास जरूर मिलता है। भगवान राम की बहन शांता का सच यह है कि शांता राम की बड़ी बहन और माता कौशल्या की बेटी थी। वह बहुत ही सुन्दर और हर कार्य में निपुण थी। शास्त्र से लेकर पाक कला तक में एकदम पारंगत। वहीं, रानी कौशल्या की बहन थी रानी वर्षिणी, जिनका विवाह अंगदेश के राजा रोमपद के साथ हुआ था। दुर्भाग्य की बात यह थी कि किन्हीं कारणों उनकी कोई भी सन्तान न हो सकी। एक दिन वर्षिणी राजा रोमपद के साथ कौशल्या से मिलने अयोध्या आई। जब सभी एक साथ बैठकर भोजन कर रहे थे, तभी वर्षिणी ने दशरथ की पुत्री शांता की शालीनता और कार्यकुशलता से मोहित होकर अपनी एक इच्छा प्रकट की। वर्षिणी ने कहा, “वैसे तो मेरी कोई भी सन्तान नहीं है, लेकिन मेरी इच्छा है कि शांता की तरह ही मेरी भी एक पुत्री हो।” वर्षिणी की इस बात पर राजा दशरथ उन्हें शांता को गोद देने का वचन दे देते हैं। इस प्रकार राजकुमारी शांता अंगदेश के राजा रोमपद की पुत्री बन जाती है। एक दिन राजा रोमपद किसी काम में इतना खोये रहते हैं कि उनकी चौखट पर आए ब्राह्मण की आवाज उन्हें सुनाई ही नहीं देती। फलस्वरूप, ब्राह्मण को खाली हाथ वापस लौटना पड़ता है। देवराज इंद्र को राजा रोमपद द्वारा किया गया ब्राह्मण का यह अपमान जरा भी रास नहीं आता। वह अंगदेश में वर्षा न करने का निश्चय कर लेते हैं। ऐसे में बिना वर्षा अंगदेश में सूखा पड़ जाता है। इस वजह से अकाल की स्थिति पैदा हो जाती है। इस समस्या से उबरने के लिए राजा रोमपद ऋषि श्रंग के पास जाते हैं और उनसे इस समस्या का उपाय पूछते हैं। ऋषि राजा को यज्ञ कराने की सलाह देते हैं, जिससे रूठे इंद्र देव को मनाया जा सके। राजा रोमपद ऐसा ही करते हैं और यज्ञ के बाद अंगदेश में पुनः वर्षा होती है। इससे अंगदेश में आई समस्या का अंत होता है। ऋषि श्रंग से प्रसन्न होकर राजा रोमपद उनसे अपनी पुत्री शांता का विवाह करा देते हैं। शांता के बाद राजा दशरथ के कोई सन्तान नहीं थी। इसके लिए वह बहुत ही चिंतित रहते थे। इसी कारण वह भी ऋषि श्रंग के पास जाते हैं। ऋषि श्रंग उन्हें कामाक्षी यज्ञ कराने की सलाह देते हैं। ऋषि के कहे अनुसार राजा दशरथ कामाक्षी यज्ञ संपन्न कराते हैं और प्रसाद के रूप में खीर बनवाते हैं। यज्ञ समाप्त होने के बाद जो खीर का प्रसाद था, उसे राजा दशरथ की तीनों पत्नियां कौशल्या, सुमित्रा और कैकई ग्रहण करती हैं। कामाक्षी यज्ञ के प्रताप से रानी कौशल्या को पुत्र के रूप में राम, कैकई को भरत और सुमित्रा को लक्ष्मण व शत्रुघ्न की प्राप्ति होती है। चारों पुत्रों को अपनी बहन शांता के बारे में कुछ भी मालूम नहीं होता है। समय के साथ धीरे-धीरे राम को अपनी माता के दुख का पता चलता है। साथ ही भगवान राम की बहन शांता के जीवन का सच, जो कोई नहीं जानता था, राम को मालूम हो जाता है। बहन शांता के बारे में जानने के बाद राम अपनी मां को बहन शांता से मिलवाते हैं और सभी पुराने मतभेदों को दूर कर एक साथ रहने का वचन देते हैं।

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