Darsh Amavasya दर्श अमावस्या पूजन विधी आणि महत्त्व

 हिंदू धर्मात सर्वच अमावस्या महत्त्वाच्या असतात परंतू दर्श अमावस्येचं विशेष महत्त्व आहे. दर्श अमावस्येच्या दिवशी पूर्वजांची पूजा करण्याचे महत्त्व आहे. या दिवशी काही लोक व्रत देखील करतात. या दिवशी चंद्र दिसत नाही. कालसर्प दोष निवारण पूजा करण्यासाठी हा दिवस श्रेष्ठ असल्याचे मानले गेले आहे. अमावस्येला अवस देखील म्हणतात. दर्श अमावस्या पूजन विधी (Darsh Amavasya Pujan Vidhi) पुराणांनुसार अमावस्येला स्नान-दान करण्याची परंपरा आहे. तसं तर या दिवशी गंगा-स्नान केल्याचे विशेष महत्त्व असल्याचे सांगितले गेले आहे, परंतू जी व्यक्ती गंगा स्नानासाठी जाऊ शकत नाही अशा लोकांनी जवळीक नदीत किंवा तलावात जाऊन अंघोळ करावी. हे देखील शक्य नसेल तर घरात अंघोळीच्या पाण्यात पवित्र नदीचं पाणी मिसळून अंघोळ करावी. आणि महादेव- पार्वती आणि तुळशीची पूजा करावी. दर्श अमावस्या महत्व दर्श अमावस्येला व्रत करुन चंद्राची पूजा केल्याने चंद्र देवता कृपा करतात. सौभाग्य- समृद्धीचा आर्शीवाद देतात. चंद्र देव भावना आणि दिव्य अनुग्रहाचे स्वामी आहे. याला श्राद्धाची अमावस्या देखील म्हणतात. कारण या दिवशी पूर्वजांचे स्मरण केलं जातं. त्यांच्यासाठी प्रार्थना केली जाते. या दिवशी पूवर्ज पृथ्वीवर येऊन आपल्या कुटुंबाला आर्शीवाद देतात असे मानले गेले आहे.

Darsh Amavasya दर्श अमावस्या पूजन विधी आणि महत्त्व Read More »

गुरूभक्त उपमन्यु की कथा

उपमन्यु को महर्षि आयोदधौम्य के आश्रम में गाय चराने का कार्य सौंपा गया था. भोर होते ही गायों के लेकर वे वन निकल जाया ककरता था और सांझ ढले ही आश्रम लौटता था. आश्रम लौटने के उपरांत महर्षि आयोदधौम्य को प्रणाम कर वह विश्राम के लिए जाया करता था. महर्षि आयोदधौम्य उपमन्यु शारीरिक पुष्टता देखकर हतप्रभ थे. आश्रम में उसके भोजन की व्यवस्था नहीं थी. सुबह से लेकर पूरे दिन वह गायों के पीछे वन में भटकता रहता था. तिस पर भी वह दिन पर दिन हृष्ट-पुष्ट हुआ जा रहा था. एक दिन महर्षि आयोदधौम्य ने उपमन्यु को अपने पास बुलाया और पूछा, “वत्स! तुम्हें इतना हृष्ट-पुष्ट देख मैं चकित हूँ. आश्रम से तुम्हें भोजन की प्राप्ति नहीं हुआ. पूरे दिन तुम गाये चराने में व्यस्त रहते हो. ऐसे में तुम अपना निर्वाह कैसे करते हो?” उपमन्यु के उत्तर दिया, “गुरूवर! मैं गाँव जाकर भिक्षाटन करता हूँ. जो भी अन्न मुझे प्राप्त होता है. उससे अपनी क्षुधा शांत करता हूँ. इस तरह मेरा निर्वाह चल रहा है.” उपमन्यु का उत्तर सुनकर आयोदधौम्य ऋषि बोले, “वत्स! गुरू को अर्पण किये बिना तुम भिक्षा में प्राप्त अन्न का उपयोग कैसे कर सकते हो? यह तो घोर पाप है. भिक्षा में प्राप्त अन्न तुम्हें मुझे लाकर अर्पण करना चाहिए. आज से तुम ऐसा ही करोगे.” “जो आज्ञा गुरूवर.” कहकर उपमन्यु चला गया. उस दिन उपरांत से भिक्षा में प्राप्त अन्न वह महर्षि आयोदधौम्य अर्पित करने लगा. महर्षि पूरा अन्न स्वयं रख लेते और उपमन्यु को अन्न का एक दाना भी नहीं देते थे. इसी तरह दिन व्यतीत हो रहे थे. एक दिन महर्षि आयोदधौम्य ने ध्यान दिया कि भिक्षा का अन्न प्राप्त न होने के उपरांत भी उपमन्यु की पुष्टता में कोई अंतर नहीं आया था. वह पहले की ही तरह हृष्ट-पुष्ट था. उन्होंने पुनः उससे पूछा, “वत्स! भिक्षाटन में प्राप्त समस्त अन्न तुम मुझे अर्पण कर देते हो. किंतु अब भी तुम्हारी काया पहले जैसी ही हृष्ट-पुष्ट है. मैं जानना चाहता हूँ कि अब तुम अपना निर्वाह किस तरह कर रहे हो?” “गुरूवर! आपको भिक्षा अर्पित करने के उपरांत मैं पुनः भिक्षाटन कर लेता हूँ. उससे प्राप्त अन्न से मेरा निर्वाह हो रहा है.” “वत्स! ये तो अनुचित है. इस तरह तुम अन्य भिक्षुओं के जीविकोपार्जन में बाधा उत्पन्न कर रहे हो. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए.” महर्षि आयोदधौम्य बोले. आगे से ऐसा नहीं होगा गुरूवर”  कहकर उपमन्यु वहाँ से प्रस्थान कर गया. कुछ दिन और बीते. किंतु उपमन्यु पहले की तरह हृष्ट-पुष्ट बना रहा. उसमें कोई परिवर्तन न देख महर्षि आयोदधौम्य ने उसे पुनः बुलाया और पूछा, “वत्स! वर्तमान में तुम्हारे निर्वाह का साधन क्या है?” “गुररूवर! मैं गायों का दूध पीकर निर्वाह कर रहा हूँ.” उपमन्यु ने उत्तर दिया. इस पर महर्षि बोले “वत्स! तुम्हें गायों का दूध नहीं पीना चाहिए. उस पर बछड़ों का अधिकार है.” “जो आज्ञा गुरूवर.” कहकर उपमन्यु चला गया. उपमन्यु की शारीरिक पुष्टता में इसके उपरांत भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ. तब महर्षि ने उसे बुलाकर पुनः वही प्रश्न किया. इस बार उपमन्यु ने उत्तर दिया, “गुरूवर! बछड़े गायों का दूध पीने के बाद जो फेन उगलते हैं, उसे पीकर ही मैं अपनी क्षुधा शांत कर लेता हूँ.” “वत्स! इस तरह तो बछड़े भूखे रह जायेंगे. कदाचित, वे दयावश तुम्हारे लिए अधिक फेन उगल देते होंगे. क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारा कृत्य अनुचित है? आज के बाद तुम बछड़ों द्वारा उगला फेन नहीं पियोगे.” “जो आज्ञा गुरूवर.” कहकर उपमन्यु चला गया. उपमन्यु के पास जीविका का कोई साधन शेष नहीं रहा. बिना भोजन के वह दुर्बल होता चला गया. एक दिन वन में गायों को चराते हुए अपनी क्षुधा शांत करने उसने आक के पत्ते खा लिये और उसके विषैले पत्तों के प्रभाव से अपनि नेत्र-ज्योति खो दी. नेत्रों की ज्योति खोने के बाद भी बाद भी वह गायों की घंटी की आवाज़ सुनकर उनके पीछे-पीछे चलता रहा. चलते-चलते वह एक ऐसे स्थान पर पहुँचा, जहाँ सूखा कुवां था और दिखाई न देने के कारण वह उसमें गिर पड़ा. इधर सांझ होने पर आश्रम में उपमन्यु को न देखकर महर्षि आयोदधौम्य ने अन्य शिष्यों से उसके बारे में पूछा. शिष्यों द्वारा उन्हें बताया गया कि उपमन्यु आश्रम नहीं लौटा है. महर्षि आयोदधौम्य को उपमन्यु की चिंता होने लगी. वे जीवन की सीख प्रदान करने हेतु भले ही बाहर से शिष्यों के प्रति कठोर व्यवहार प्रदर्शित करते थे, किंतु मन ही मन उनसे अपार स्नेह किया करते थे. वे तुरंत कुछ शिष्यों को साथ लेकर उपमन्यु को ढूंढने निकल गए. वन में वे सभी उपमन्यु का नाम पुकार रहे थे. सूखे कुएं में गिरे नेत्रहीन उपमन्यु के कानों में जब महर्षि और अन्य शिष्यों की आवाज़ पड़ी, तो वह चिल्लाया, “गुरूवर! मैं यहाँ इस सूखे कुएं में हूँ.” आवाज़ की दिशा में गमन कर महर्षि कुएं के निकट पहुँचे और उसमें झांककर देखा, तो उपमन्यु को उसमें पाया. पूछने पर उपमन्यु ने बताया कि आक के पत्तों को खाने के कारण उसकी नेत्रों की ज्योति चली गई है. महर्षि ने उसे ऋग्वेद के मंत्रों का जाप कर देवताओं के वैध्य अश्विनी कुमारों का आह्वान करने हेतु कहा. उपमन्यु अश्विनी कुमारों का आह्वान करने लगा. अश्विनी कुमार प्रकट हुए और उन्होंने उपमन्यु को पुआ खाने को दिया. किंतु उपमन्यु ने बिना गुरू की आज्ञा के पुआ खाने से मना कर दिया. अश्विनी कुमारों ने उसे बताया कि उसके गुरू महर्षि आयोदधौम्य ने हमारे द्वारा दिए गये पुआ का सेवन अपने गुरू की आज्ञा प्राप्त किये बिना किया है. इसलिए बिना संकोच किये उसे यह खा लेना चाहिए. किंतु उपमन्यु नहीं माना. उपमन्यु की गुरूभक्ति देख अश्विनी कुमार अत्यंत प्रसन्न हुए. वे बोले, “उपमन्यु तुम्हारी गुरूभक्ति देख हम प्रसन्न है और तुम्हें नेत्र ज्योति का वरदान देते हैं. तुम्हारी गुरूभक्ति के कारण तुम्हारा सदा कल्याण होगा. तुम सभी विधाओं में स्फुरित होगे.” इस तरह अश्विनी कुमारों के वरदान से उपमन्यु को पुनः नेत्र ज्योति प्राप्त हो गई. कुएं से बाहर निकलकर उसने महर्षि आयोदधौम्य के चरण स्पर्श किये. महर्षि बोले, “वत्स! मैं तुम्हारी गुरूभक्ति की परीक्षा ले रहा था. तुम इसमें उत्तीर्ण रहे हो. मैं तुमसे अति-प्रसन्न हूँ. तुम मेरे परम शिष्य हो. अश्विनी कुमारों के कहे अनुसार तुम्हारा सदा कल्याण होगा और तुम सभी विधाओं में स्फुरित

गुरूभक्त उपमन्यु की कथा Read More »

राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कथा

शकुंतला स्वर्ग की अप्सरा मेनका और ऋषि विश्वामित्र की पुत्री थी. ऋषि विश्वामित्र की तपस्या भंग करने देवराज इंद्र ने अप्सरा मेनका को भेजा था. मेनका ने अपने रूप और यौवन से ऋषि विश्वामित्र की तपस्या भंग कर दी और दोनों के संसर्ग से ‘शकुंतला’ का जन्म हुआ. जन्म उपरांत ही मेनका ने शकुंलता का त्याग कर उसे वन में छोड़ दिया. शकुंत नामक पक्षी से नवजात शकुंलता की रक्षा कर कण्व ऋषि अपने आश्रम ले आये और पक्षी के नाम पर उसका नाम शकुंतला रख दिया. आश्रम में ही शकुंतला का पालन-पोषण हुआ. युवा होने पर शकुंतला अपनी माँ मेनका की तरह ही रूपसी हुई. एक दिन आखेट खेलते हुए हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत वन में आये और कण्व ऋषि के दर्शन की अभिलाषा में उनके आश्रम पधारे. द्वार से ही उन्होंने ऋषि को पुकारा. पुकार सुनकर शकुंतला बाहर आई. शकुंतला के रूप को देखकर राजा दुष्यंत मुग्ध हो गये. शकुंतला ने उन्हें बताया कि कण्व ऋषि तीर्थ यात्रा पर गए हैं. जब राजा दुष्यंत ने शकुंतला का परिचय मांगा, तो शकुंलता ने बताया कि वह कण्व ऋषि की पुत्री है. कण्व ऋषि आजन्म ब्रह्मचारी थे. अतः शकुंलता का परिचय सुन राजा दुष्यंत आश्चर्य में पड़ गए. तब शकुंतला ने अपने जन्म और त्याग की कथा का वर्णन करते हुए बताया कि वह कण्व ऋषि की दत्तक पुत्री है. शकुंतला को देखते ही राजा दुष्यंत उस पर मोहित हो गए और उसके प्रेम में पड़ गए. इधर शकुंतला ने भी उन्हें अपना ह्रदय अर्पित कर दिया.  इसलिए जब राजा ने उसके समक्ष विवाह प्रस्ताव रखा, तो उसने स्वीकार कर लिया. वन में ही दोनों का गंधर्व विवाह हुआ. विवाह के उपरांत कुछ समय तक राजा दुष्यंत शकुंतला के साथ आश्रम में ही रहे. किंतु राज-पाट के दायित्व के कारण उन्हें राजमहल लौटना था. उन्होंने शकुंतला को वचन दिया कि कण्व ऋषि के लौटने पर वह उसे विदा कर महल ले जायेंगे. प्रेम के प्रतीक स्वरुप उन्होंने शकुंतला को स्वर्ण मुद्रिका प्रदान की और हस्तिनापुर लौट गए. इस बीच एक दिन कण्व ऋषि के आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे और पुकार लगाई. राजा दुष्यंत के विचारों में खोई शकुंलता उनकी पुकार सुन नहीं पाई, जिसे दुर्वासा ऋषि ने अपना अपमान समझ लिया और शकुंतला को श्राप दे दिया कि जिस किसी के ध्यान में लीन होकर तूने मेरा अपमान किया है, वह तुझे भूल जायेगा. दुर्वासा ऋषि का श्राप सुनकर शकुंलता का ध्यान टूटा और वह अपने विचारों की दुनिया से बाहर आई. वह ऋषि के चरणों में गिर पड़ी और क्षमा याचना करने लगी. तब दुर्वासा ऋषि का ह्रदय द्रवित हुआ और उन्होंने कहा कि मैं अपना श्राप वापस तो नहीं ले सकता. किंतु तुम्हें ये आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारे प्रेम का प्रतीक चिन्ह देखकर तुम्हारे प्रेमी को तुम्हारा पुनः स्मरण हो आएगा. समय व्यतीत हुआ और कण्व ऋषि तीर्थ से आश्रम लौट आये. उनके वापस आने के पूर्व ही शकुंलता गर्भवती हो चुकी थी. उसने कण्व ऋषि को राजा दुष्यंत और स्वयं के गंधर्व विवाह के संबंध में पूरी बात बता दी. कण्व ऋषि उससे बोले कि विवाहित कन्या का अपने पिता के पास रहना उचित नहीं है. उसे अपने पति के घर जाना चाहिए और उन्होंने एक शिष्य के साथ शकुंतला को राजा दुष्यंत के पास भिजवा दिया. हस्तिनापुर जाने के मार्ग में राजा दुष्यंत द्वारा शकुंतला को दी हुई स्वर्ण मुद्रिका पानी पीते हुए सरोवर में गिर पड़ी और एक मछली द्वारा निगल ली गई. जब शकुंतला राजमहल पहुँची, तो राजा दुष्यंत ने उसे पहचानने से इंकार कर दिया. दुर्वासा ऋषि के श्राप के प्रभाव के कारण राजा दुष्यंत उसे भूल गए थे. उसी समय स्वर्ग से शकुंतला की माता मेनका आई और उसे अपने साथ ले गई. शकुंतला को कश्यप ऋषि के आश्रम में छोड़ वह वापस इंद्रलोक लौट गई. कश्यप ऋषि के आश्रम में ही शकुंतला ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया. इधर शकुंतला को भूल चुके राजा दुष्यंत को एक दिन एक मछुवारे ने एक स्वर्ग मुद्रिका लाकर दी. वह स्वर्ण मुद्रिका मछुवारे को उस मछली के पेट में से मिली थी, जिसने वह मुद्रिका निगल ली थी. राज चिन्ह देखकर मछुवारा उसे राजा को लौटने आया था. मुद्रिका देखते ही राजा दुष्यंत की याददाश्त वापस आ गई और उन्हें शकुंलता के बारे में सब स्मरण हो गया. उन्होंने तुरंत सैनिकों को शकुंतला को ढूंढने भेजा. किंतु वे उसे ढूंढ न सके. स्वर्ग में देवासुर संग्राम छिड़ा हुआ था. देवराज इंद्र के निमंत्रण पर राजा दुष्यंत उनकी सहायता हेतु इंद्र की नगरी अमरावती गए. युद्ध में विजयी होने के उपरांत वे आकाश मार्ग से वापस लौट रहे थे कि उन्हें कश्यप ऋषि का आश्रम दिखाई पड़ा और वे उनके दर्शन के लिए रुक गए. आश्रम के आँगन में राजा दुष्यंत एक सुंदर बालक खेलते हुए दिखा, जिसे देख उनका प्रेम उमड़ आया. वे उसे गोद में उठाने के लिए जैसे ही आगे बढ़ें, शकुंतला की सखी ने उन्हें रोकते हुए कहा, “राजन, इस बालक को न छुए. जो भी इसे छुएगा, इसकी भुजा में बंधा काला धागा नाग बनाकर उसे डस लेगा.” किंतु राजा दुष्यंत स्वयं को न रोक सके और बालक को अपनी गोद में उठा लिया. गोद में उठाते ही बालक की भुजा में बंधा काला धागा टूटकर गिर पड़ा. शकुंतला की सखी को ज्ञात था कि जब भी बालक का पिता उसे अपनी गोद में उठाएगा, तो उसकी भुजा में बंधा काला धागा टूटकर गिर जायेगा. उसने जाकर शकुंतला को पूरी बात बता दी. शकुंतला राजा दुष्यंत के पास गई, तो वे उसे पहचान गए. क्षमा याचना कर उन्होंने उसे राजमहल चलने को कहा. शकुंतला मान गई. फिर कश्यप ऋषि की आज्ञा लेकर वे हस्तिनापुर लौट आये. इस तरह दोनों की प्रेम-कहानी पूर्ण हुई. दोनों के पुत्र का नाम ‘भरत’ था, जो आगे चलकर एक पराक्रमी राजा हुआ और उसके नाम पर भारत का नाम ‘भारतवंश’ पड़ा

राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कथा Read More »

गुरुभक्त आरुणि की कथा

आरुणि महर्षि आयोदधौम्य का शिष्य था और उनके आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त किया करता था. पंचाल देश के रहने वाले आरुणि के लिए गुरू का आदेश पत्थर की लकीर हुआ करती थी. वे आज भी अपनी गुरूभक्ति और आज्ञाकरिता के कारण जाने जाते हैं. महर्षि आयोदधौम्य के आश्रम में छात्र शिक्षा प्राप्ति के अतिरिक्त आश्रम के कार्यों और गुरूसेवा में संलग्न रहते थे. सबसे कार्य विभाजित थे. कोई कृषि कार्य करता, तो कोई पशुओं को चराने का कार्य करता, तो कोई बागवानी. सभी छात्र विभिन्न कार्यों की ज़िम्मेदारी उठाया करते थे. उन दिनों खेत में चांवल की फ़सल बोई गई थी, जिसके लिए पानी की पर्याप्त मात्रा खेतों में एकत्रित होना अति-आवशयक था. सब वर्षा की बांट जोह रहे थे. एक संध्या तीव्र वर्षा प्रारंभ हो गई. आश्रम के सभी शिष्य प्रसन्न थे कि चांवल की कृषि के लिए पर्याप्त पानी की व्यवस्था हो जाएगी. किंतु महर्षि आयोदधौम्य चिंतित थे. उन्हें भय था कि खेत की कमज़ोर मेड़ वर्षा की तीव्र बौछारों में टूट न जाए. ऐसा हुआ, तो खेत में पानी टिक नहीं पायेगा और बिना पर्याप्त पानी के फ़सल बर्बाद हो जाएगी . शिष्यों में जब महर्षि आयोदधौम्य के माथे पर चिंता की लकीरें देखी, तो कारण पूछा. महर्षि ने अपनी चिंता उनके सामने व्यक्त कर दी. सभी शिष्य चिंतित हो गए, किंतु किसी की समझ में नहीं आया कि ऐसे मौसम में क्या किया जाए? उन शिष्यों में आरुणि भी था. उसने महर्षि से खेत जाकर मेड़ों को देखकर आने की आज्ञा मांगी. महर्षि ने उसे आज्ञा प्रदान करते हुए कहा, “पुत्र, यदि खेत की मेड़ टूट गई हो, तो उसकी मरम्मत कर देना. खेत में पानी का जमा रहना आवश्यक है.” आरुणि गुरू की आज्ञा ले भरी बारिश में खेत को ओर चल पड़ा. खेत पहुँचकर उसने देखा कि खेत की मेड़ें टूट गई है और उनसे होकर खेत का सारा पानी बह रहा है. आरुणि तुरंत प्रयासों में जुट गया. उसने खेत के तीन तरफ़ की मेड़ों की मरम्मत कर दी और वहाँ से बहता पानी रोक दिया. किंतु बहुत प्रयासों के बाद भी चौथे मेड़ की मरम्मत नहीं कर पाया. वह बार-बार उस मेड़ में मिट्टी भरता, किंतु पानी के तीव्र प्रवाह के कारण वहाँ की मिट्टी बह जाती. बहुत प्रयासों के भी उपरांत भी जब उस मेड़ से पानी जाना बंद न हुआ, तो आरुणि उस मेड़ पर लेट गया. उसके लेटने से वह स्थान बंद हो गया और वहाँ से पानी का बहाव रुक गया. आरुणि यूं ही भोर तक बारिश में भीगता उस मेड़ पर लेटा रहा. इधर जब भोर होने तक आरुणि आश्रम नहीं लौटा, तो महर्षि आयोदधौम्य कुछ शिष्यों को लेकर खेत पहुँचे. वहाँ उन्होंने आरूणि को खेत की मेड़ पर लेटा हुआ पाया. वह पूरी तरह से भीग चुका था और उसका शरीर बुखार से तप रहा था. महर्षि से उसे उठाया और गले से लगा लिया. साथ गये शिष्यों से कहकर उन्होंने खेत के मेड़ की मरम्मत करवाई. आरुणि की गुरुभक्ति देख महर्षि आयोदधौम्य अत्यंत प्रसन्न थे. उन्होंने उसे अपन परम शिष्यों में स्थान देते हुए तेजस्वी और दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया.

गुरुभक्त आरुणि की कथा Read More »

महाशिवरात्रि से जुड़ी पौराणिक कथाएं

भगवान शिव के प्रति अटूट आस्‍था का त्‍योहार महाशिवरात्रि कल यानी सोमवार 4 मार्च को है। इस पर्व को पूरे देश भर में सच्‍ची श्रद्धा और आस्‍था के साथ देश भर में मनाया जाएगा। इस त्‍योहार को लेकर कई प्रकार की मान्‍यताएं प्रचलित हैं। पहली यह कि इस दिन भगवान लिंग के रूप में प्रकट हुए थे और दूसरी मान्‍यता यह है कि इस भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। शिव-पार्वती के विवाह के उत्‍सव के रूप में देश भर में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। महाशिवरात्रि से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। आइए जानते हैं कौन-कौन सी हैं जंगल में एक शिकारी था। अपने शिकार के इंतजार के लिए वह एक पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। बहुत देर इंतजार करने के बाद भी जब कोई शिकार उसके हाथ न लगा तो पेड़ के पत्ते नीचे तोड़कर फेंकने लगा। संयोगवश वह बेल का पेड़ था। उस दिन महाशिवरात्रि का व्रत था। शिकार का इंतजार करते करते वह थक गया और रात भर पत्ते तोड़ता रहा। सुबह उसे पता लगा कि जहां वह बेलपत्र फेंक रहा था वहां एक शिवलिंग था। इस तरह अनजाने में शिकारी से महाशिवरात्रि का व्रत हो गया और उसे मोक्ष की प्राप्ति हो गई। तब से मोक्ष प्राप्ति की साधना के तौर पर महाशिवरात्रि का व्रत रखने की परंपरा शुरू हो गई।अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन हुआ। मगर समुद्र से अमृत निकलने से पहले कालकूट नाम का विष भी सागर से निकला। ये विष इतना खतरनाक था कि इससे पूरा ब्रह्मांड नष्ट हो सकता था। मगर इस विष को केवल भगवान शिव ही नष्ट कर सकते थे। तब भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। इससे उनका कंठ (गला) नीला हो गया। इस घटना के बाद से भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ गया। मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा विष पीकर पूरे संसार को इससे बचाने की इस घटना के उपलक्ष में ही महाशिवरात्रि मनाई जाती है।

महाशिवरात्रि से जुड़ी पौराणिक कथाएं Read More »

रविवार व्रत कथा एवं व्रत विधि

रविवार व्रत सूर्य देव की कृपा प्राप्ति हेतु किया जाता है। सभी मनोकामनाएं पूर्ण करनेवाले और जीवन में सुख-समृद्धि, धन-संपत्ति और शत्रुओं से सुरक्षा हेतु सर्वश्रेष्ठ व्रत रविवार की कथा इस प्रकार से है रविवार व्रत कथा | Ravivar Vrat Katha प्राचीन काल में एक बुढ़िया रहती थी। वह नियमित रूप से रविवार का व्रत करती. रविवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर बुढ़िया स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती, उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हुए रविवार व्रत कथा सुन कर सूर्य भगवान का भोग लगाकर दिन में एक समय भोजन करती। सूर्य भगवान की अनुकम्पा से बुढ़िया को किसी प्रकार की चिन्ता व कष्ट नहीं था. धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था। उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे बुरी तरह जलने लगी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी सो गई। रात्रि में सूर्य भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और व्रत न करने तथा उन्हें भोग न लगाने का कारण पूछा। बुढ़िया ने बहुत ही करुण स्वर में पड़ोसन के द्वारा घर के अन्दर गाय बांधने और गोबर न मिल पाने की बात कही। सूर्य भगवान ने अपनी अनन्य भक्त बुढ़िया की परेशानी का कारण जानकर उसके सब दुःख दूर करते हुए कहा- हे माता, तुम प्रत्येक रविवार को मेरी पूजा और व्रत करती हो। मैं तुमसे अति प्रसन्न हूं और तुम्हें ऐसी गाय प्रदान करता हूं जो तुम्हारे घर-आंगन को धन-धान्य से भर देगी। तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी। रविवार का व्रत करनेवालों की मैं सभी इच्छाएं पूरी करता हूँ। मेरा व्रत करने व कथा सुनने से बांझ स्त्रियों को पुत्र की प्राप्ति होती है। स्वप्न में उस बुढ़िया को ऐसा वरदान देकर सूर्य भगवान अन्तर्धान हो गए। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुन्दर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुन्दर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फट गईं। पड़ोसन ने उस बुढ़िया को आसपास न पाकर तुरन्त उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी। बहुत दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। बुढ़िया पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उस दिन के बाद बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उस बुढ़िया के धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुनकर राख हो गई और उसने अपने पति को समझा-बुझाकर उस नगर के राजा के पास भेज दिया। राजा को जब बुढ़िया के पास सोने के गोबर देने वाली गाय के बारे में पता चला तो उसने अपने सैनिक भेजकर बुढ़िया की गाय लाने का आदेश दिया। सैनिक उस बुढ़िया के घर पहुंचे। उस समय बुढ़िया सूर्य भगवान को भोग लगाकर स्वयं भोजन ग्रहण करने वाली थी। राजा के सैनिकों ने गाय और बछड़े को खोला और अपने साथ महल की ओर ले चले। बुढ़िया ने सैनिकों से गाय और उसके बछड़े को न ले जाने की प्रार्थना की, बहुत रोई-चिल्लाई, लेकिन राजा के सैनिक नहीं माने। गाय व बछड़े के चले जाने से बुढ़िया को बहुत दुःख हुआ। उस दिन उसने कुछ नहीं खाया और सारी रात सूर्य भगवान से गाय व बछड़े को लौटाने के लिए प्रार्थना करती रही। सुन्दर गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सुबह जब राजा ने सोने का गोबर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उधर सूर्य भगवान को भूखी-प्यासी बुढ़िया को इस तरह प्रार्थना करते देख उस पर बहुत करुणा आई। उसी रात सूर्य भगवान ने राजा को स्वप्न में कहा, राजन, बुढ़िया की गाय व बछड़ा तुरन्त लौटा दो, नहीं तो तुम पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ेगा। तुम्हारा महल नष्ट हो जाएगा। सूर्य भगवान के स्वप्न से बुरी तरह भयभीत राजा ने प्रातः उठते ही गाय और बछड़ा बुढ़िया को लौटा दिया। राजा ने बहुत-सा धन देकर बुढ़िया से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी। राजा ने पड़ोसन और उसके पति को उनकी इस दुष्टता के लिए दण्ड दिया।फिर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए। चारों ओर खुशहाली छा गई। सभी लोगों के शारीरिक कष्ट दूर हो गए। राज्य में सभी स्त्री-पुरुष सुखी जीवन-यापन करने लगे। रविवार के व्रत को सर्वमनोकामना पूर्ण करने वाला व्रत माना जाता है। इस दिन प्रातः काल से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शांतचित्त होकर भगवान सूर्य का स्मरण करें। घर में जो भी भोजन बनाएं, उसमें शुद्धता का ध्यान रखें और भगवान को भोग लगाकर स्वयं भोजन ग्रहण करें। भोजन एक ही समय करें और फलाहार भी सूर्य का प्रकाश रहते ही कर लें। सूर्य के अस्त होने के बाद कुछ भी आहार ग्रहण ना करें, केवल पानी ले सकते हैं। अगले दिन सूर्योदय के बाद अर्घ्य देकर ही अन्न ग्रहण करें।

रविवार व्रत कथा एवं व्रत विधि Read More »

शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी ?

आइए पढ़ते है भगवान शिव के वाहन नंदी से सम्बंधित एक कहानी जिससे हमें पता चलेगा की नंदी क्यों और कैसे महादेव की सवारी बनें? और शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी ? पौराणिक कथा शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त  होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। मुनि योग और तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे। शिलाद मुनि ने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान माँगा। परन्तु इंद्र ने यह वरदान देने में असर्मथता प्रकट की और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा।भगवान शंकर शिलाद मुनि के कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया और नंदी के रूप में प्रकट हुए। शंकर के वरदान से नंदी मृत्यु से भय मुक्त, अजर-अमर और अदु:खी हो गया। भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। बाद में मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। भगवान शंकर ने नंदी को वरदान दिया कि जहाँ पर नंदी का निवास होगा वहाँ उनका भी निवास होगा। तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है। नंदी के नेत्र सदैव अपने इष्ट को स्मरण रखने का प्रतीक हैं, क्योंकि नेत्रों से ही उनकी छवि मन में बसती है और यहीं से भक्ति की शुरुआत होती है। नंदी के नेत्र हमें ये बात सिखाते हैं कि अगर भक्ति के साथ मनुष्य में क्रोध, अहम व दुर्गुणों को पराजित करने का सामर्थ्य न हो तो भक्ति का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। नंदी के दर्शन करने के बाद उनके सींगों को स्पर्श कर माथे से लगाने का विधान है। माना जाता है इससे मनुष्य को सद्बुद्धि आती है, विवेक जाग्रत होता है। नंदी के सींग दो और बातों का प्रतीक हैं। वे जीवन में ज्ञान और विवेक को अपनाने का संंदेश देते हैं। नंदी के गले में एक सुनहरी घंटी होती है। जब इसकी आवाज आती है तो यह मन को मधुर लगती है। घंटी की मधुर धुन का मतलब है कि नंदी की तरह ही अगर मनुष्य भी अपने भगवान की धुन में रमा रहे तो जीवन-यात्रा बहुत आसान हो जाती हैनंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं।उनका हर क्षण शिव को ही समर्पित है और मनुष्य को यही शिक्षा देते हैं कि वह भी अपना हर क्षण परमात्मा को अर्पित करता चले तो उसका ध्यान भगवान रखेंगे।

शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी ? Read More »

माता वैष्णो देवी की अमर कथा

वैष्णो देवी उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य 2 कथाएँ अधिक प्रचलित हैं। माता वैष्णो देवी की प्रथम कथा मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्तपंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरे सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस – पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया। भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर – पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान – बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रूप में बदलकरत्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं। इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते – भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया। भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी। माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से ‘पिंडों’ की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं। माता वैष्णो देवी की अन्य कथा हिन्दू पौराणिक मान्यताओं में जगत में धर्म की हानि होने और अधर्म

माता वैष्णो देवी की अमर कथा Read More »

जानिए कैसे हुई भगवान श्रीराम की मृत्यु?

जिस तरह दुनिया में आने वाला हर इंसान अपने जन्म से पहले ही अपनी मृत्यु की तारीख यम लोक में निश्चित करके आता है। उसी तरह इंसान रूप में जन्म लेने वाले भगवान के अवतारों का भी इस धरती पर एक निश्चित समय था, वो समय समाप्त होने के बाद उन्हें भी मृत्यु का वरण करके अपने लोक वापस लौटना पड़ा था।हम अब तक आप सब को भगवान श्रीकृष्ण और भगवान लक्ष्मण की मृत्यु या यूँ कहे की उनके स्वलोक गमन की कहानी बता चुके है। आज हम जानेंगे की भगवान श्री राम कैसे इस लोक को छोड़कर वापस विष्णुलोक गए। भगवान श्री राम के मृत्यु वरण में सबसे बड़ी बाधा उनके प्रिय भक्त हनुमान थे। क्योंकि हनुमान के होते हुए यम की इतनी हिम्मत नहीं थी की वो राम के पास पहुँच चुके।  पर स्वयं श्री राम से इसका हल निकाला।  आइये जानते है कैसे श्री राम ने इस समस्या का हल निकाला। एक दिन, राम जान गए कि उनकी मृत्यु का समय हो गया था। वह जानते थे कि जो जन्म लेता है उसे मरना पड़ता है। “यम को मुझ तक आने दो। मेरे लिए वैकुंठ, मेरे स्वर्गिक धाम जाने का समय आ गया है”, उन्होंने कहा। लेकिन मृत्यु के देवता यम अयोध्या में घुसने से डरते थे क्योंकि उनको राम के परम भक्त और उनके महल के मुख्य प्रहरी हनुमान से भय लगता था। यम के प्रवेश के लिए हनुमान को हटाना जरुरी था। इसलिए राम ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छेद में से गिरा दिया और हनुमान से इसे खोजकर लाने के लिए कहा। हनुमान ने स्वंय का स्वरुप छोटा करते हुए बिलकुल भंवरे जैसा आकार बना लिया और केवल उस अंगूठी को ढूढंने के लिए छेद में प्रवेश कर गए, वह छेद केवल छेद नहीं था बल्कि एक सुरंग का रास्ता था जो सांपों के नगर नाग लोक तक जाता था। हनुमान नागों के राजा वासुकी से मिले और अपने आने का कारण बताया। वासुकी हनुमान को नाग लोक के मध्य में ले गए जहां अंगूठियों का पहाड़ जैसा ढेर लगा हुआ था! “यहां आपको राम की अंगूठी अवश्य ही मिल जाएगी” वासुकी ने कहा। हनुमान सोच में पड़ गए कि वो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे क्योंकि ये तो भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन सौभाग्य से, जो पहली अंगूठी उन्होंने उठाई वो राम की अंगूठी थी। आश्चर्यजनक रुप से, दूसरी भी अंगूठी जो उन्होंने उठाई वो भी राम की ही अंगूठी थी। वास्तव में वो सारी अंगूठी जो उस ढेर में थीं, सब एक ही जैसी थी। “इसका क्या मतलब है?” वह सोच में पड़ गए।वासुकी मुस्कुराए और बाले, “जिस संसार में हम रहते है, वो सृष्टि व विनाश के चक्र से गुजरती है। इस संसार के प्रत्येक सृष्टि चक्र को एक कल्प कहा जाता है। हर कल्प के चार युग या चार भाग होते हैं। दूसरे भाग या त्रेता युग में, राम अयोध्या में जन्म लेते हैं। एक वानर इस अंगूठी का पीछा करता है और पृथ्वी पर राम मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए यह सैकड़ो हजारों कल्पों से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है। सभी अंगूठियां वास्तविक हैं। अंगूठियां गिरती रहीं और इनका ढेर बड़ा होता रहा। भविष्य के रामों की अंगूठियों के लिए भी यहां काफी जगह है”।हनुमान जान गए कि उनका नाग लोक में प्रवेश और अंगूठियों के पर्वत से साक्षात, कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह राम का उनको समझाने का मार्ग था कि मृत्यु को आने से रोका नहीं जा सकेगा। राम मृत्यु को प्राप्त होंगे। संसार समाप्त होगा। लेकिन हमेशा की तरह, संसार पुनः बनता है और राम भी पुनः जन्म लेंगे।

जानिए कैसे हुई भगवान श्रीराम की मृत्यु? Read More »

सांपो के सम्पूर्ण कुल विनाश के लिए जनमेजय ने किया था ‘सर्प मेध यज्ञ’

आज हम आपको महाभारत से जुडी एक कथा बताते है। यह कथा पांडव कुल के अंतिम सम्राट जनमेजय (अर्जुन के प्रपौत्र) से जुडी है। जनमेजय ने एक बार पृथ्वी से सांपो का अस्तित्व मिटाने के लिए सर्प मेध यज्ञ किया था जिसमे पृथ्वी पर उपस्तिथ लगभग सभी सांप समाप्त हो गए थे। हालंकि अंत में अस्तिका मुनि के हस्तक्षेप के कारण सांपो का सम्पूर्ण विनाश होने से रह गया था, अन्यथा आज पृथ्वी पर सांपो का अस्तित्व नहीं होता। आइये जानते है कौन थे जनमेजय और क्यों उन्होंने सांपो के सम्पूर्ण विनाश की प्रतिज्ञा ली थी ? राजा परीक्षित को ऋषि ने दिया शाप- महाभारत के युद्ध के बाद कुछ सालों तक पांडवों ने हस्तिनापुर पर राज किया। लेकिन जब वो राजपाठ छोड़कर हिमालय जाने लगे तो राज का जिम्मा अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को दे दिया गया। परीक्षित ने पांडवों की परंपरा को आगे बढ़ाया। लेकिन यहां पर विधाता कोई और खेल, खेल रहा था। एक दिन मन उदास होने पर राजा परीक्षित शिकार के लिए जंगल गए थे। शिकार खेलते-खेलते वह ऋषि शमिक के आश्रम से होकर गुजरे। ऋषि उस वक्त ब्रह्म ध्यान में आसन लगा कर बैठे हुए थे। उन्होंने राजा की ओर ध्यान नहीं दिया। इस पर परीक्षित को बहुत तेज गुस्सा आया और उन्होंने ऋषि के गले में एक मरा हुआ सांप डाल दिया। जब ऋषि का ध्यान हटा तो उन्हें भी बहुत गुस्सा आया और उन्होंने राजा परीक्षित को शाप दिया कि जाओ तुम्हारी मौत सांप के काटने से ही होगी।  राजा परीक्षित ने इस शाप से मुक्ति के लिए तमाम कोशिशे की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। कैसे हुई राजा परीक्षित की मौत- राजा परीक्षित ने हर मुमकिन कोशिश की कि उनकी मौत सांप के डसने से न हो। उन्होंने सारे उपाय किए ऐसी जगह पर घर बनवाया जहां परिंदा तक पर न मार सके। लेकिन ऋषि का शाप झूठा नहीं हो सकता था। जब चारों तरफ से राजा परीक्षित ने अपने आपको सुरक्षित कर लिया तो एक दिन एक ब्राह्मण उनसे मिलने आए। उपहार के तौर पर ब्राह्मण ने राजा को फूल दिए और परीक्षित को डसने वला वो काल सर्प ‘तक्षक’ उसी फूल में एक छोटे कीड़े की शक्ल में बैठा था। तक्षक सांपो का राजा था।  मौका मिलते ही उसने सर्प का रुप धारण कर लिया और राज परीक्षित को डस लिया।राजा परीक्षित की मौत के बाद राजा जनमेजय हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे। जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे। राजा जनमेजय का सर्प मेध यज्ञ- जनमेजय को जब अपने पिता की मौत की वजह का पता चला तो उसने धरती से सभी सांपों के सर्वनाश करने का प्रण ले लिया और इस प्रण को पूरा करने के लिए उसने सर्पमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ के प्रभाव से ब्रह्मांड के सारे सांप हवन कुंड में आकर गिर रहे थे। लेकिन सांपों का राजा तक्षक, जिसके काटने से परीक्षित की मौत हुई थी, खुद को बचाने के लिए सूर्य देव के रथ से लिपट गया और उसका हवन कुंड में गिरने का अर्थ था सूर्य के अस्तित्व की समाप्ति जिसकी वजह से सृष्टि की गति समाप्त हो सकती थी। कैसे हुई राजा परीक्षित की मौत- राजा परीक्षित ने हर मुमकिन कोशिश की कि उनकी मौत सांप के डसने से न हो। उन्होंने सारे उपाय किए ऐसी जगह पर घर बनवाया जहां परिंदा तक पर न मार सके। लेकिन ऋषि का शाप झूठा नहीं हो सकता था। जब चारों तरफ से राजा परीक्षित ने अपने आपको सुरक्षित कर लिया तो एक दिन एक ब्राह्मण उनसे मिलने आए। उपहार के तौर पर ब्राह्मण ने राजा को फूल दिए और परीक्षित को डसने वला वो काल सर्प ‘तक्षक’ उसी फूल में एक छोटे कीड़े की शक्ल में बैठा था। तक्षक सांपो का राजा था।  मौका मिलते ही उसने सर्प का रुप धारण कर लिया और राज परीक्षित को डस लिया।राजा परीक्षित की मौत के बाद राजा जनमेजय हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे। जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे। राजा जनमेजय का सर्प मेध यज्ञ- जनमेजय को जब अपने पिता की मौत की वजह का पता चला तो उसने धरती से सभी सांपों के सर्वनाश करने का प्रण ले लिया और इस प्रण को पूरा करने के लिए उसने सर्पमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ के प्रभाव से ब्रह्मांड के सारे सांप हवन कुंड में आकर गिर रहे थे। लेकिन सांपों का राजा तक्षक, जिसके काटने से परीक्षित की मौत हुई थी, खुद को बचाने के लिए सूर्य देव के रथ से लिपट गया और उसका हवन कुंड में गिरने का अर्थ था सूर्य के अस्तित्व की समाप्ति जिसकी वजह से सृष्टि की गति समाप्त हो सकती थी। कैसे खत्म हुआ सर्प मेध यज्ञ:- सूर्यदेव और ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए सभी देवता जनमेजय से इस यज्ञ को रोकने का आग्रह करने लगे लेकिन जनमेजय किसी भी रूप में अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहता था। जनमेजय के यज्ञ को रोकने के लिए अस्तिका मुनि को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिनके पिता एक ब्राह्मण और मां एक नाग कन्या थी। अस्तिका मुनि की बात जनमेजय को माननी पड़ी और सर्पमेध यज्ञ को समाप्त कर तक्षक को मुक्त करना पड़ा।

सांपो के सम्पूर्ण कुल विनाश के लिए जनमेजय ने किया था ‘सर्प मेध यज्ञ’ Read More »

सम्पूर्ण महाभारत कथा

महाभारत हिंदू संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर है। शास्त्रों में इसे पांचवां वेद भी कहा गया है। इसके रचयिता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं। महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में स्वयं कहा है- यन्नेहास्ति न कुत्रचित्। अर्थात जिस विषय की चर्चा इस ग्रंथ में नहीं की गई है, उसकी चर्चा अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। श्रीमद्भागवतगीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है। परिचय महाभारत की रचना महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने की है, लेकिन इसका लेखन भगवान श्रीगणेश ने किया है। इस ग्रंथ में चंद्रवंश का वर्णन है। महाभारत में न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या तथा धर्मशास्त्र का भी विस्तार से वर्णन किया गया हैं। यह महाकाव्य ‘जय’, ‘भारत’ और ‘महाभारत’ इन तीन नामों से प्रसिद्ध है। इस ग्रंथ में कुल मिलाकर एक लाख श्लोक हैं, इसलिए इसे शतसाहस्त्री संहिता भी कहा जाता है। यह ग्रंथ स्मृति वर्ग में आता है। इसमें कुल 18 पर्व हैं जो इस प्रकार हैं- आदिपर्व, सभा पर्व, वनपर्व, विराट पर्व, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशासन पर्व, आश्वमेधिक पर्व, आश्रमवासिक पर्व, मौसल पर्व, महाप्रास्थनिक पर्व व स्वर्गारोहण पर्व। आइए इस लेख में हम इन 18 पर्वों के माध्यम से जानते है सम्पूर्ण महाभारत। 1. आदिपर्व चंद्रवंश में शांतनु नाम के प्रतापी राजा हुए। शांतनु का विवाह देवी गंगा से हुआ। शांतनु व गंगा के पुत्र देवव्रत (भीष्म) हुए। अपने पिता की प्रसन्नता के लिए देवव्रत ने उनका विवाह सत्यवती से करवा दिया और स्वयं आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा कर ली। देवव्रत की इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही उन्हें भीष्म कहा गया। शांतनु को सत्यवती से दो पुत्र हुए- चित्रांगद व विचित्रवीर्य। राजा शांतनु की मृत्यु के बाद चित्रांगद राजा बने। चित्रांगद के बाद विचित्रवीर्य गद्दी पर बैठे। विचित्रवीर्य का विवाह अंबिका एवं अंबालिका से हुआ। अंबिका से धृतराष्ट्र तथा अंबालिका से पांडु पैदा हुए। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, इसलिए पांडु को राजगद्दी पर बिठाया गया। धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से तथा पांडु का विवाह कुंती व माद्री से हुआ। धृतराष्ट्र से गांधारी को सौ पुत्र हुए। इनमें सबसे बड़ा दुर्योधन था। पांडु को कुंती से युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा माद्री से नकुल व सहदेव नामक पुत्र हुए। असमय पांडु की मृत्यु होने पर धृतराष्ट्र को राजा बनाया गया। कौरव (धृतराष्ट्र के पुत्र) तथा पांडव (पांडु के पुत्र) को द्रोणाचार्य ने शस्त्र विद्या सिखाई। एक बार जब सभी राजकुमार शस्त्र विद्या का प्रदर्शन कर रहे थे, तब कर्ण (यह कुंती का सबसे बड़ा पुत्र था, जिसे कुंती ने पैदा होते ही नदी में बहा दिया था।) ने अर्जुन से प्रतिस्पर्धा करनी चाही, लेकिन सूतपुत्र होने के कारण उसे मौका नहीं दिया गया। तब दुर्योधन ने उसे अंगदेश का राजा बना दिया। एक बार दुर्योधन ने पांडवों को समाप्त करने के उद्देश्य से लाक्षागृह का निर्माण करवाया। दुर्योधन ने षड्यंत्रपूर्वक पांडवों को वहां भेज दिया। रात के समय दुर्योधन ने लाक्षागृह में आग लगवा दी, लेकिन पांडव वहां से बच निकले। जब पांडव जंगल में आराम कर रहे थे, तब हिंडिब नामक राक्षस उन्हें खाने के लिए आया, लेकिन भीम ने उसका वध कर दिया। हिंडिब की बहन हिडिंबा भीम पर मोहित हो गई। भीम ने उसके साथ विवाह किया। हिडिंबा को भीम से घटोत्कच नामक पुत्र हुआ। एक बार पांडव घूमते-घूमते पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर में गए। यहां अर्जुन ने स्वयंवर जीत कर द्रौपदी का वरण किया। जब अर्जुन द्रौपदी को अपनी माता कुंती के पास ले गए तो उन्होंने बिना देखे ही कह दिया कि पांचों भाई आपस में बांट लो। तब श्रीकृष्ण ने कहने पर पांचों भाइयों ने द्रौपदी से विवाह किया। जब भीष्म, विदुर आदि को पता चला कि पांडव जीवित हैं तो उन्हें वापस हस्तिनापुर बुलाया गया। यहां आकर पांडवों ने अपना अलग राज्य बसाया, जिसका नाम इंद्रप्रस्थ रखा। एक बार नियम भंग होने के कारण अर्जुन को 12 वर्ष के वनवास पर जाना पड़ा।वनवास के दौरान अर्जुन ने नागकन्या उलूपी, मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा व श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह किया। अर्जुन को सुभद्रा से अभिमन्यु तथा द्रौपदी से पांडवों को पांच पुत्र हुए। वनवास पूर्ण कर अर्जुन जब पुन: इंद्रप्रस्थ पहुंचे तो सभी बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन व श्रीकृष्ण के कहने पर ही मयासुर नामक दैत्य ने इंद्रप्रस्थ में एक सुंदर सभा भवन का निर्माण किया। 2. सभा पर्व मयासुर द्वारा निर्मित सभा भवन बहुत ही सुंदर व विचित्र था। एक बार नारद मुनि युधिष्ठिर के पास आए और उन्हें राजसूय यज्ञ करने की सलाह दी। युधिष्ठिर ने ऐसा ही किया। भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव चारों दिशाओं में गए तथा सभी राजाओं को युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया। इसके बाद युधिष्ठिर ने समारोह पूर्वक राजसूय यज्ञ किया। इस समारोह में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध कर दिया। युधिष्ठिर का ऐश्वर्य देखकर दुर्योधन के मन में ईष्र्या होने लगी। दुर्योधन ने पांडवों का राज-पाठ हथियाने के उद्देश्य से उन्हें हस्तिनापुर जुआ खेलने के लिए बुलाया। पांडव जुए में अपना राज-पाठ व धन आदि सबकुछ हार गए। इसके बाद युधिष्ठिर स्वयं के साथ अपने भाइयों व द्रौपदी को भी हार गए। भरी सभा में दु:शासन द्रौपदी को बालों से पकड़कर लाया और उसके वस्त्र खींचने लगा। किंतु श्रीकृष्ण की कृपा से द्रौपदी की लाज बच गई। द्रौपदी का अपमान देख भीम ने दु:शासन के हाथ उखाड़ कर उसका खून पीने और दुर्योधन की जंघा तोडऩे की प्रतिज्ञा की। यह देख धृतराष्ट्र डर गए और उन्होंने पांडवों को कौरवों के दासत्व से मुक्त कर दिया। इसके बाद धृतराष्ट्र ने पांडवों को उनका राज-पाठ भी लौटा दिया।इसके बाद दुर्योधन ने पांडवों को दोबारा जुआ खेलने के लिए बुलाया। इस बार शर्त रखी कि जो जुए में हारेगा, वह अपने भाइयों के साथ तेरह वर्ष वन में बिताएगा, जिसमें अंतिम वर्ष अज्ञातवास होगा। इस बार भी दुर्योधन की ओर से शकुनि ने पासा फेंका तथा युधिष्ठिर को हरा दिया। शर्त के अनुसार पांडव तेरह वर्ष वनवास जाने के लिए विवश हुए और राज्य भी उनके हाथ से चला गया। 3. वन पर्व जुए की शर्त के अनुसार युधिष्ठिर को अपने भाइयों के साथ बारह वर्ष का वनवास

सम्पूर्ण महाभारत कथा Read More »

मातृ और पितृभक्त श्रवण कुमार की कहानी/कथा |

श्रवण कुमार की कथा जनमानस के मष्तिस्क पटल पर आज भी अंकित है. मातृ और पिता के प्रति भक्ति की ऐसी कथा विरले ही सुनने को मिलती है. यह माता-पिता के प्रति अतुलनीय प्रेम और सम्मान का वर्णन करती है. श्रवण कुमार ने अपना संपूर्ण जीवन माता और पिता की सेवा-सुश्रुषा में समर्पित कर दिया और मृत्यु पर्यंत उनकी सेवा करते रहे. अपनी इसी मातृ और पितृभक्ति के कारण वह अमर हो गए. श्रवण कुमार का वर्णन वाल्मीकि रामायण के ६४वें अध्याय में मिलता है. श्रवण कुमार शांतनु नामक एक साधु के पुत्र थे. उनकी माता का नाम ज्ञानवती था, जो एक धर्मपरायण स्त्री थी. उनके माता-पिता नेत्रहीन थे. बड़े कष्ट सहकर उन्होंने उनका पालन-पोषण किया था. इसलिए माता-पिता के प्रति उनके मन में अथाह प्रेम और श्रद्धा थी.जब वे कुछ बड़े हुए, तो अपने माता-पिता की सेवा में लग गए. वे नदी से पानी भरकर लाते, जंगल से लकड़ियाँ चुनकर लाते, भोजन तैयार करते और घर के समस्त कार्य करते. माता-पिता की सेवा करना वे अपना परम धर्म मानते थे. विवाह योग्य होने पर माता-पिता द्वारा उनका विवाह करवा दिया गया. किंतु जिस स्त्री से उनका विवाह हुआ, वह श्रवण कुमार के नेत्रहीन माता-पिता को बोझ स्वरुप मानती थी. वह दिखावे मात्र के लिए श्रवण कुमार के समक्ष माता-पिता की सेवा करती और पीठ पीछे उनसे बुरा व्यवहार करती थी. जब श्रवण कुमार को इस विषय में ज्ञात हुआ, तो उन्होंने अपनी पत्नि को फटकार लगाईं. तब रूठकर वह अपने मायके चली गई और कभी वापस नहीं आई. पत्नि के जाने के बाद श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को कभी कोई दुःख नहीं पहुँचने दिया. समय के साथ श्रवण कुमार के माता-पिता वृद्ध हो चले थे. उनकी इच्छा मृत्यु पूर्व तीर्थ यात्रा पर जाने की थी. एक दिन उन्होंने अपनी इच्छा श्रवण कुमार को बताई, तो श्रवण कुमार उनकी इस इच्छा की पूर्ति की तैयारियों में लग गए. दो बड़ी टोकरियों को एक मजबूत लकड़ी के दोनों छोर पर बंधकर उन्होंने कांवर तैयार किया. एक टोकरी में अपने पिता को बैठाया और एक में माता को. फिर उस कांवर को अपने कंधों में लादकर वे विभिन्न तीर्थों की यात्रा पर निकल गए. वे अपने माता-पिता को काशी, गया, प्रयागराज जैसे कई तीर्थों पर ले गए. तीर्थ स्थानों का वर्णन कर वे अपने माता-पिता को सुनाया करते थे. इस तरह उनके नेत्रहीन माता-पिता उनकी आँखों से तीर्थ दर्शन करने लगे. एक संध्या श्रवण कुमार कांवर लेकर एक वन से प्रस्थान कर रहे थे. उनके माता-पिता बहुत देर से प्यासे थे. उन्होंने श्रवण कुमार से पानी लाने को कहा. श्रवण कुमार ने एक पेड़ के नीचे कांवर नीचे रखा और कलश लेकर जल की खोज में निकल पड़े. पास ही उन्हें एक नदी दिखाई पड़ी और वे नदी तट पर पहुँच गए. उस दिन अयोध्या के राजा दशरथ उसी वन में आखेट कर रहे थे. दिन भर वन में भटकने के उपरांत भी उन्हें कोई आखेट न प्राप्त हो सका. वे वापस लौटने का मन बना ही रहे थे कि उन्हें नदी तट पर आहट सुनाई पड़ी. उन्होंने सोचा कि अवश्य ही कोई वन्य जीव नदी तट पर प्यास बुझाने आया है. शब्दभेदी बाण चलाने में पारंगत राजा दशरथ ने आहट की दिशा में बाण छोड़ दिया. किंतु वह कोई वन्य प्राणी नहीं अपितु श्रवण कुमार थे, जो अपने माता-पिता के लिए कलश में जल भर रहे थे. बाण उनके सीने में जा घुसा और वे पीड़ा से कराह उठे. यह कराह सुनकर राजा दशरथ को अपनी त्रुटी का भान हुआ और वे नदी के तट पर पहुँचे. घायल अवस्था में श्रवण वहाँ पड़े हुए थे. राजा दशरथ प्रायश्चित से भर उठे. वे श्रवण से क्षमा याचना करने लगे. तब श्रवण कुमार ने कहा, “राजन! मुझे अपनी मृत्यु का कोई दुःख नहीं. दुःख है कि मैं अपने माता-पिता की इच्छा पूर्ण न कर सका. मैं उन्हें समस्त तीर्थों की यात्रा न करा सका. इस समय वे प्यास से व्याकुल है. कृपा कर आप इस कलश में पानी भरकर उनकी प्यास बुझा दीजिये.” इतना कहकर श्रवण ने प्राण त्याग दिए. अनजाने में स्वयं से हुए अपराध से दु;खी राजा दशरथ श्रवण के माता-पिता के पास पहुँचे. श्रवण कुमार के माता-पिता कदमों की आहत से जान गए कि वह उनका पुत्र नहीं है. पूछने पर दशरथ ने पूरा वृतांत सुना दिया. अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार सुन माता-पिता विलाप करने लगे और उन्होंने दशरथ को श्राप दिया कि पुत्र वियोग में तड़प-तड़प कर वह भी अपने प्राण त्यागेगा. इस श्राप के कारण राजा दशरथ को तब पुत्र वियोग भोगना पड़ा, जब मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम १४ वर्ष के वनवास के लिए वन चले गए. पुत्र वियोग में तड़पते हुये ही राजा दशरथ ने अपने प्राण त्यागे. 

मातृ और पितृभक्त श्रवण कुमार की कहानी/कथा | Read More »