राखी बांधने समय करें इस मंत्र का जाप, जानिए रक्षाबंधन मनाने का सही तरीका

रक्षाबंधन हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह त्योहार हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन धूम-धाम से मनाया जाता है। इस साल भद्रा लगने से रक्षाबंधन 30 अगस्त व 31 अगस्त यानी कि दो दिन मनाया जा रहा है। पूर्णिमा तिथि 30 अगस्त के दिन सुबह 10 बजकर 58 मिनट पर शुरु होगी व 31 अगस्त की सुबह 7 बजकर 5 मिनट तक रहेगी। हालांकि इस दाैरान 30 अगस्त को रात 9 बजकर 1 मिनट तक भद्रा काल रहेगा। उसके बाद राखी बांधने का शुभ मुहूर्त रात 9 बजकर 2 मिनट से शुरु होगा। रक्षाबंधन के दिन बहनें भाई के माथे पर टीका लगाकर व कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी आयु की कामना करती है। इसके साथ ही उनसे अपनी रक्षा का वचन मांगती है। वहीं भाई भी राखी बंधवाने के बाद बहनों के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेते हैं साथ ही उनकी रक्षा का बचन देते हैं। बहनों द्वारा कलाई पर बांधे जाने की इस प्रक्रिया को रक्षाबंधन कहा जाता है। राखी बांधने की विधि राखी बांधते समय कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। मान्यता है कि रक्षाबंधन के दिन बहन भाई को जब राखी बांधे तो वह पूर्व दिशा में मुंह करके बैठे। रक्षाबंधन मनाने से पहले अपने ईष्टदेव के सामने राखी रखकर उनका ध्यान करें फिर भाई को रोली, चंदन व अक्षत का तिलक और आरती करें। इसके बाद श्लोक रुपी मंत्र “येन बद्धो बलिराज दानवेन्द्रो महाबलः। तेन स्वामापि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल” पढ़ते हुए भाई राखी बांधे। राखी बांधने के बाद अंत में भाई को मुंह मीठाई खिलाएं। कहते हैं कि जो लोग इस मंत्र के साथ राखी बांधते हैं तो वह रक्षासूत्र उनके भावनात्मक संबंधों को मजबूत बनाए रखता है साथ जीवन में खुशियों का आगमन होता है। राम की तरह श्रीकृष्ण ने एक पत्नी व्रत क्यों नहीं लिया? बहनें राखी बांधते समय पढ़ें ये मंत्र ऊँ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।। ऐसा माना जाता है कि जो लोग इस मंत्र के साथ राखी बांधते हैं तो वह रक्षासूत्र उनके भावनात्मक संबंधों को मजबूत बनाए रखता है साथ जीवन में खुशियों का आगमन होता है। न करें ये गलती हिंदू पंचांग के अनुसार भद्रा और राहुकाल के दौरान राखी नहीं बांधनी चाहिए। इन दोनों समय में किए गए कार्य अशुभ माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस समय राखी बांधने से भाई को कई परेशानियां आ सकती हैं।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राखी बांधते समय भूलकर भी उत्तर-पश्चिम दिशा में नहीं बैठना चाहिए। राखी बांधने के दौरान पूजा की थाली अक्षत यानी चावल मुख्य रूप से रखे जाते हैं। ध्यान रखें कि चावल टूटे हुए न हों। डिसक्लेमर: ‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। 

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राम की तरह श्रीकृष्ण ने एक पत्नी व्रत क्यों नहीं लिया?

भगवान विष्णु के अवतार श्री राम ने आजीवन एक ही पत्नी धारण करने का व्रत लिया था जिसके चलते उनकी एक ही पत्नी थी लेकिन द्वापर युग में श्रीकृष्ण की 16 हजार पत्नियां हुईं और 8 पटरानियां थी, जबकि वे राधा से प्रेम करते थे लेकिन उन्होंने राधा से शादी नहीं की. श्रीमदभागवत की कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने राजा नरकासुर का वध किया था जिसके बाद उसके कैद से 16 हजार स्त्रियां आजाद हुई थीं और श्रीकृष्ण ने उन सभी के साथ विवाह किया था. लेकिन उन्होंने हजारों से स्त्रियों से विवाह क्यों किया था इसके पीछे की कथा को बहुत कम लोग ही जानते हैं. चलिए हम आपको बताते हैं उस कथा के बारे में. श्रीराम ने लिया था आजीवन एक पत्नी का व्रत आनंद रामायण के मुताबिक राम राज्य स्थापित होने के बाद एक दिन जब भगवान श्री राम अपने महल में थे, तब उनसे मिलने के लिए महर्षि वेदव्यास अपने शिष्यों के साथ पहुंचे. बातों ही बातों ने श्री राम ने उन्हें ये बताया कि उन्होनें एक पत्नी धारण करने का व्रत लिया है इसलिए सीता को छोड़कर सभी स्त्रियां उनके लिए माता कौशल्या के समान हैं. भगवान श्री कृष्ण की 16108 पत्नियों के पीछे क्या है पौराणिक कथा, जानिए श्री राम की इस बात को सुनकर वेदव्यासजी ने कहा कि आपने इस जन्म में एक पत्नी का व्रत लिया है तो इसके प्रभाव से जब आप द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रुप में जन्म लेंगे तब आपकी बहुत सारी पत्नियां होंगी. उन्होंने कहा कि इसके लिए आपको सीता के वजन के बराबर सोने की 16 मूर्तियां बनवाकर सरयू नदी के तट पर ब्राह्मणों को दान करना चाहिए. श्रीराम ने जब मूर्तियां बनवाकर दान किया तब उन मूर्तियों को लेते समय ब्राह्मणों ने श्री राम को वरदान दिया कि इस दान का आपको हजार गुना फल मिलेगा यानी अगले जन्म में आपकी 16 हज़ार पत्नियां होंगी. 16 हजार स्त्रियों ने श्रीराम से विवाह की जताई थी इच्छा रामायण की एक कथा के अनुसार एक समय श्री राम अपनी सेना के साथ शिकार पर गए तो उन्हें जंगल में एक गुफा दिखाई दी. जिसपर एक बहुत बड़ा पत्थर रखा हुआ था और उसे हटाना किसी के बस की बात नहीं थी, लेकिन श्री राम ने उस पत्थर एक ही प्रयास में हटा दिया. पत्थर हटाते ही उन्होंने देखा कि उस गुफा में चार स्त्रियां तपस्या कर रही थीं और उनके शरीर का मांस तपस्या के कारण गल चुका था. लेकिन जब श्री राम ने उन स्त्रियों को स्पर्श किया तो वो पहले की तरह सुंदर बन गईं. जब श्री राम ने उन स्त्रियों से पूछा कि वो कौन हैं तो उन्होंने बताया कि दुंदुभी नाम के दैत्य ने उन चारों के साथ अन्य 16 हजार स्त्रियों को इस गुफा में बंदी बनाया हुआ है. तब श्री राम ने उन्हें बताया कि दुंदुभी को बालि ने मार दिया है. इस बात को सुनकर स्त्रियां बेहद खुश हुईं तब श्री राम ने उनसे वरदान मांगने के लिए कहा जिसके बाद उन स्त्रियों ने श्री राम से गंधर्व विवाह करने की इच्छा जाहिर की. उन स्त्रियों की इस इच्छा को सुनकर श्री राम ने कहा कि उन्होंने इस जन्म में एक पत्नी का व्रत लिया है. लेकिन वो अपने कृष्ण जन्म में उन चारों के साथ विवाह करेंगे. ये सुनकर जब उन 16 हजार स्त्रियों ने भी श्री राम से विवाह की इच्छा जाहिर की तो श्री राम ने कहा कि द्वापर युग में दुंदुभी दैत्य नरकासुर के नाम से जन्म लेगा और उस जन्म में भी तुम सभी को कैद करेगा. तब मैं कृष्ण के अवतार में उसका वध करके तुम सभी से विवाह करुंगा. गौरतलब है त्रेता युग में श्री राम द्वारा लिए गए एक पत्नी व्रत और 16 हजार महिलाओं से अगले जन्म में विवाह करने के दिए हुए वचन के चलते ही द्वापर युग में श्रीकृष्ण की 16 हजार पत्नियां हुईं. नरकासुर के वध के उपलक्ष्य में ही मनाई जाती है ‘नरक चतुर्दशी’भगवान कृष्ण ने जिस दिन पत्नी सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का संहार कर 16 हजार लड़कियों को कैद से आजाद करवाया था। इस उपलक्ष्य में दिवाली के एक दिन पहले ‘नरक चतुर्दशी’ मनाई जाती है।   

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भगवान श्री कृष्ण की 16108 पत्नियों के पीछे क्या है पौराणिक कथा, जानिए

Janmashtami 2023 Date: कान्हा के जन्मोत्सव को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है. जन्माष्टमी की डेट को लेकर कंफ्यूजन बना हुआ है. आइए जानते हैं जन्माष्टमी 6 या 7 सितंबर कब मनाई जाएगी. द्वापर युग में श्रीहरि विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अपना आठवां अवतार लिया था. कान्हा के जन्मोत्सव को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है. हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है. श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृषभ राशि और बुधवार के दिन हुआ था. इस साल जन्माष्टमी बहुत खास है क्योंकि इस बार कान्हा का जन्मदिवस बुधवार को ही मनाया जाएगा, हालांकि जन्माष्टमी की डेट को लेकर कंफ्यूजन बना हुआ है. आइए जानते हैं जन्माष्टमी 6 या 7 सितंबर कब मनाई जाएगी. जन्माष्टमी 2023 तिथि भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी तिथि शुरू – 06 सितंबर 2023, दोपहर 03.37  भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि समाप्त – 07 सितंबर 2023, शाम 04.14 जानिये श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा सनातन धार्मिक शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की 8 पत्नियां थी। इनके नाम क्रमश रुक्मणि जाम्बवन्ती सत्यभामा कालिन्दी मित्रबिन्दा सत्या भद्रा और लक्ष्मणा था। असुर नरकासुर के चलते भगवान श्रीकृष्ण को 16000 नारियों संग विवाह करना पड़ा था। भगवान श्रीकृष्ण की लीला अपरंपार है। उनकी लीलाओं का अंत नहीं है। अनंत काल से भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीलाओं के जरिए सृष्टि का संचालन कर रहे हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि ज्ञानगंज में भगवान श्रीराम और कृष्ण आज भी मानव रूप में उपस्थित हैं। धार्मिक ग्रंथों में भगवान की लीलाओं का वर्णन विस्तार रूप से है। इसमें एक लीला नरकासुर वध का है। असुर नरकासुर के चलते भगवान श्रीकृष्ण को 16000 नारियों संग विवाह करना पड़ा था। इसके लिए आज भी धार्मिक प्रसंगों में भगवान श्रीकृष्ण की 16108 पत्नियों की कथा सुनाई जाती है। आइए, भगवान श्रीकृष्ण के 16108 पत्नियों के बारे में सबकुछ जानते हैं सनातन धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की 8 पत्नियां थी। इनके नाम क्रमश: रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा था। इसके अलावा, उन्होंने 16000 से अधिक कन्याओं संग विवाह किया था। हालांकि, उन्होंने 16000 कन्याओं संग केवल विवाह किया था, किन्तु अर्धांगिनी रूप में स्वीकार नहीं किया था। वहीं, 16000 कन्याओं ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। इसके बावजूद वे सभी द्वारका में भगवान की भक्ति कर जीवन यापन करती थी। किंदवंती है कि एक बार नरकासुर का आतंक बहुत बढ़ गया। उसके आतंक से स्वर्ग लोक में हाहाकार मच गया। सत्ता छीनने के डर से स्वर्ग नरेश इंद्र, भगवान के शरण में गए और उनसे स्वर्ग की रक्षा करने का अनुरोध किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने आश्वासन दिया कि नरकासुर का अंत निकट है। वहीं, दूसरी तरफ नरकासुर अमरता का वरदान प्राप्ति हेतु 16000 हजार कन्याओं को बंदी बनाकर एक कारागार में डाल रखा था। कालांतर में भगवान ने 16000 कन्याओं को नरकासुर के कारागार से मुक्त कराया। जबकि, नरकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसे कोई पुरुष मार नहीं सकता है। उस समय सत्यभामा की मदद से कृष्णजी ने नरकासुर का वध किया। वहीं, 16000 हजार कन्याएं समाज के कलंक से बचने के लिए भगवान को ही अपना पति मान लिया। तब भगवान 16000 रूप में प्रकट होकर उन कन्याओं से विवाह किया था। डिसक्लेमर इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।

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जानिये श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा

श्री कृष्ण के जन्मदिवस को भक्त बड़े ही प्रेम भाव से कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्र माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी कथा के बारे में जानते हैं। इससे पहले कि कृष्ण जन्माष्टमी की तिथि और पूजा मुहूर्त के बारे में जानिए। श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा। यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है? पुत्रदा एकादशी व्रत कब? जानें तारीख महत्व और मुहूर्त कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ माया थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी। उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए। अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा। यह है कृष्ण जन्म की कथा। श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत पूजन विधि जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व व्रत का नियम ग्रहण करे। जन्माष्टमी के दिन दोपहर को स्नानादि से निर्वत होकर भगवान कृष्ण के लिए एक सूतिका गृह बनाये। उसको फूलो और मालाओं से सजाये। द्वार रक्षा के लिए खड्ग रखना चाहिए। दीवारों को स्वास्तिक व रंगोली सजाये। सूतिका गृह सहित देवकी माता की प्रतिमा स्थापित करे। जन्माष्टमी व्रत कथा महत्व जन्माष्टमी व्रत परिवार में सौभाग्य और शांति लाता है। श्रीकृष्ण आपकी सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं; और आपके विकास की बाधाओं पर जीत हासिल करने में मदद करते है। कृष्ण जन्माष्टमी का मुख्य महत्व सद्भावना को प्रोत्साहित करना और बुरी इच्छा को हतोत्साहित करना है। यह भी एक साथ प्रतीक है। पवित्र अवसर लोगों को एक साथ लाता है, इस प्रकार यह एकता और विश्वास का प्रतीक है।

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पुत्रदा एकादशी व्रत कब? जानें तारीख महत्व और मुहूर्त

साल में आने वाली हर एक एकादशी का अपना अलग ही महत्व है। सावन शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है पुत्रदा एकादशी साल में वैसे 2 बार आती है। पुत्रदा एकादशी को लेकर मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान की सुख की प्राप्ति होती है साथ ही संतान की उन्नति होती है। आइए जानते हैं कब है सावन शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी। इसका महत्व और पूजा विधि। कब है पुत्रदा एकादशी पंचांग के अनुसार, सावन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 26 अगस्त देर रात 12 बजकर 9 मिनट पर प्रारंभ होगी और अगले दिन यानी 27 अगस्त की रात 9 बजकर 33 मिनट तक रहेगी। उदय तिथि में एकादशी तिथि होने के कारण यह व्रत 27 अगस्त को ही रखा जाएगा। वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा व कथा 27 अगस्त को बहुत ही शुभ सर्वार्थ सिद्धि योग भी है। सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 5 बजकर 56 मिनट से आरंभ होगा और 7 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। इसलिए इस शुभ मुहूर्त में पूजा करना अति उत्तम फलदायी रहेगा। पुत्रदा एकादशी का महत्व मान्यताओं के अनुसार, पुत्रदा एकादशी का व्रत उत्तम फल देने वाला है। अगर किसी को संतान सुख में बाधा आ रही है तो वह इस व्रत को रख सकते हैं। साथ ही इस व्रत को रखने से संतान के सभी कष्ट भी दूर होता है। साथ ही संतान को स्वास्थ्य और अच्छी आयु का वरदान मिलता है। पुत्रदा एकादशी पूजा विधि सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि के बाद घर के मंदिर में देसी घी का दीपक जलाएं। इसके बाद भगवान विष्णु को गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। साथ ही तुलसी माला से 108 बार ओम वासुदेवाय नम: का जप करें। अंत में भगवान विष्णु की आरती करें। इस दिन भगवान को भी सात्विक चीजों का ही भोग लगाएं। साथ ही भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। इस दिन रविवार है तो तुलसी के पत्ते पहले ही तोड़ कर रख दें। पुत्रदा एकादशी व्रत कथा  द्वापर युग के आरंभ में महिरूपति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन राज्य के सभी ऋषि-मुनियों, सन्यासियों और विद्वानों को बुलाकर संतान प्राप्ति के उपाय पूछे। राजा की बात सुनकर सभी ने कहा कि ‘हे राजन तुमने पूर्व जन्म में सावन माह की एकादशी के दिन अपने तालाब से एक गाय को जल नहीं पीने दिया था। जिसके कारण गाय ने तुम्हे संतान न होने का श्राप दिया था। इसके बाद सभी ऋषि-मुनियों ने कहा कि हे राजन यदि तुम और तुम्हारी पत्नी पुत्रदा एकादशी का व्रत रखें तो इस श्राप से मुक्ति पा सकते हो। जिसके बाद तुम्हें संतान की प्राप्ति हो सकती है। यह सुनकर राजा ने पत्नी के साथ मिलकर पुत्रदा एकादशी का व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद राजा ने सावन माह में आने वाली पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा और इस व्रत के प्रभाव से वह शाप से मुक्त हो गया। जिसके बाद उसकी पत्नी गर्भवती हुई और एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। राजा काफी प्रसन्न हुए और तब से वह प्रत्येक पुत्रदा एकादशी का व्रत करने लगे। कहते हैं जो कि साधक पूरे मन व श्रद्धा के साथ यह व्रत करता है भगवान विष्णु उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

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वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा व कथा

पूजा-उपासना तो जैसे भारतवासियों की सांसों में बसा हुआ है. शायद की ऐसा कोई दिन गुजरता होगा, जब कोई खास पूजा का संयोग न बनता हो. सप्ताह के हर दिन के अनुसार भी विशेष पूजा का विधान है. शुक्रवार को लक्ष्मी देवी का व्रत रखा जाता है. इसे ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ भी कहा जाता है. पूजा-उपासना तो जैसे भारतवासियों की सांसों में बसा हुआ है. शायद की ऐसा कोई दिन गुजरता होगा, जब कोई खास पूजा का संयोग न बनता हो. सप्ताह के हर दिन के अनुसार भी विशेष पूजा का विधान है. शुक्रवार को लक्ष्मी देवी का व्रत रखा जाता है. इसे ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ भी कहा जाता है. वैभव लक्ष्मी व्रत की कथा किसी शहर में अनेक लोग रहते थे. सभी अपने-अपने कामों में लगे रहते थे. किसी को किसी की परवाह नहीं थी. भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए. शहर में बुराइयां बढ़ गई थीं. शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे. इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे. ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी. शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी. उनका पति भी विवेकी और सुशील था. शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे. शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे. देखते ही देखते समय बदल गया. शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा. अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा. इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह रोडपति बन गया. यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी. शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फंस गया. दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई. इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुए में गंवा दिया. शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किन्तु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी. वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी. अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी. शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक माँजी खड़ी थी. उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था. उनकी आँखों में से मानो अमृत बह रहा था. उसका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था. उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई. शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया. शीला उस माँजी को आदर के साथ घर में ले आई. घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था. अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया. मांजी बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मी जी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहां आती हूं.’ इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी. फिर मांजी बोलीं- ‘तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई.’ मांजी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया. उसकी आंखों में आंसू आ गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी. मांजी ने कहा- ‘बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छाँव जैसे होते हैं. धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता. क्या आप जानते हैं माता लक्ष्मी की उत्पत्ति की कहानी मांजी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने मांजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई. कहानी सुनकर माँजी ने कहा- ‘कर्म की गति न्यारी होती है. हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं. इसलिए तू चिंता मत कर. अब तू कर्म भुगत चुकी है. अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएँगे. तू तो माँ लक्ष्मी जी की भक्त है. माँ लक्ष्मी जी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं. वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं. इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मी जी का व्रत कर. इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा.’ शीला के पूछने पर मांजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई. मांजी ने कहा- ‘बेटी! मां लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है. उसे ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ कहा जाता है. यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है. वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है.’ शीला यह सुनकर आनंदित हो गई. शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई न था. वह विस्मित हो गई कि मांजी कहां गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि मांजी और कोई नहीं साक्षात्‌ लक्ष्मीजी ही थीं. दूसरे दिन शुक्रवार था. सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने मांजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया. आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ. यह प्रसाद पहले पति को खिलाया. प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया. उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं. शीला को बहुत आनंद हुआ. उनके मन में ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ के लिए श्रद्धा बढ़ गई. शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया. इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की सात पुस्तकें उपहार में दीं. फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- ‘हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है. हे मां! मेरी हर विपत्ति दूर करो. हमारा सबका कल्याण करो. जिसे संतान न हो, उसे संतान देना. सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना. कुंआरी लड़की को मनभावन पति देना. जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना. सभी को सुखी करना. हे माँ! आपकी महिमा अपार है.’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को प्रणाम किया. व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा. उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए. घर में धन की बाढ़ सी आ गई. घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई. ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी विधिपूर्वक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने लगीं. कैसे करें

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क्या आप जानते हैं माता लक्ष्मी की उत्पत्ति की कहानी

हिंदू धर्म में माता लक्ष्मी को धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी के रूप में पूजा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यदि माता लक्ष्मी किसी से नाराज हो जाती हैं तो उसकी सुख समृद्धि ख़त्म होने लगती है। शास्त्रों में माता लक्ष्मी को लेकर न जाने कितनी बातें प्रचलित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं माता लक्ष्मी की उत्पत्ति कहां से हुई और उनके जन्म की कहानी क्या है। हिन्दू पौराणिक कथाओं में उनके जन्म को लेकर बहुत सी बातें प्रचलित हैं। इस बात को विस्तार से जानने के लिए कि माता लक्ष्मी की उत्पत्ति कहां से हुई है, आइए जानें माता लक्ष्मी की उत्पत्ति से जुड़ी कुछ बातें। माता लक्ष्मी की उत्पत्ति की कहानी कुछ हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार लक्ष्मी की उत्पत्ति की कहानी के कई अलग-अलग संस्करण हैं और यह हमेशा कई अविश्वसनीय तत्वों से अलंकृत है। एक पौराणिक कथा के अनुसार माता लक्ष्मी की कहानी ऋषि दुर्वासा और भगवान इंद्र के बीच मुलाकात से शुरू होती है। एक बार ऋषि दुर्वासा, बहुत सम्मान के साथ, इंद्र को फूलों की माला भेंट करते हैं। भगवान इंद्र फूल लेते हैं और विनम्रतापूर्वक उन्हें अपने गले में डालने के बजाय, वह माला को अपने हाथी ऐरावत के माथे पर रख देते हैं। हाथी माला लेकर पृथ्वी पर फेंक देता है। दुर्वासा अपने उपहार के इस अपमानजनक व्यवहार पर क्रोधित हो जाते हैं और दुर्वासा ने भगवान इंद्र को श्राप देते हुए कहा कि जिस तरह उन्होंने अपने अत्यधिक अभिमान में माला को जमीन पर फेंक कर बर्बाद कर दिया, उसी तरह उनका राज्य भी बर्बाद हो जाएगा। क्या आप जानते हैं कान्हा को बांसुरी किसने दी, पढ़ें रोचक कथा दुर्वासा चले जाते हैं और इंद्र अपने घर लौट आते हैं। दुर्वासा के श्राप के बाद इंद्र की नगरी में परिवर्तन होने लगते हैं। देवता और लोग अपनी शक्ति और ऊर्जा खो देते हैं, सभी वनस्पति उत्पाद और पौधे मरने लगते हैं, मनुष्य दान करना बंद कर देते हैं, मन भ्रष्ट हो जाता है और सभी की इच्छाएं बेकाबू हो जाती हैं। उस समय देवताओं और दैत्यों ने अमृत्व के लिए समुद्र मंथन (समुद्र मंथन की कथा) का आग्रह किया। तब देवताओं और राक्षसों द्वारा आदिम दूधिया सागर की हलचल से माता लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इस प्रक्रिया के दौरान समुद्र से 14 ग्रन्थ निकले जिनमें से माता लक्ष्मी प्रमुख थीं। माता का स्वरुप इतना सुंदर था कि सभी देव और दैत्य उनकी तरफ खिंचे चले आए। ऐसे में दैत्यों ने भी उन्हें पाने की चेष्टा की और माता ने स्वयं की सुरक्षा के लिए खुद को पालनहार भगवान विष्णु को सौंप दिया। उसी समय से लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के साथ उनकी अर्धांगिनी के रूप में विराजमान हैं। समुद्र मंथन के दौरान निकलने की वजह से माता लक्ष्मी को दूध के समुद्र की पुत्री क्षीरब्धितान्या भी कहा जाता है। चूंकि माता लक्ष्मी का स्थान भगवान विष्णु के ह्रदय में है इसलिए उन्हें श्रीनिवास नाम से भी जाना जाता है। कैसा है माता लक्ष्मी का स्वरूप लक्ष्मी जी को अक्सर कमल के फूल पर बैठी या खड़ी एक सुंदर स्त्री के रूप में चित्रित किया जाता है, जो पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक हैं। उन्हें अक्सर एक हाथ में कमल का फूल और दूसरे हाथ में सोने का सामान लिए दिखाया जाता है, जो धन और समृद्धि का प्रतीक है। हिंदू धर्म में, लक्ष्मी को धन और सौभाग्य की देवी के रूप में पूजा जाता है, और उन्हें अपने भक्तों के लिए समृद्धि, सफलता और खुशी लाने वाली देवी माना जाता है। अपनी आर्थिक स्थिति ठीक बनाए रखने के लिए भक्त मुख्य रूप से माता का पूजन पूरे विधि-विधान के साथ भगवान विष्णु समेत करते हैं। माता लक्ष्मी धन, सौभाग्य, यौवन और सुंदरता की हिंदू देवी हैं और भगवान विष्णु की पत्नी हैं इसी वजह से उनकी जोड़ी को लक्ष्मी-नारायण के रूप में पूजा जाता है। लक्ष्मी-विष्णु विवाह कथा  जब लक्ष्मी जी बड़ी हुई तो वह भगवान नारायण के गुण-प्रभाव का वर्णन सुनकर उनमें ही अनुरक्त हो गई और उनको पाने के लिए तपस्या करने लगी उसी तरह जिस तरह पार्वतीजी ने शिव को पाने के लिए तपस्या की थी। वे समुद्र तट पर घोण तपस्या करने लगीं। तदनन्तर लक्ष्मी जी की इच्छानुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

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क्या आप जानते हैं कान्हा को बांसुरी किसने दी, पढ़ें रोचक कथा

भगवान कृष्ण की बांसुरी को लेकर अलग अलग- कथाएं प्रचलित हैं जिनमें दो कथाएं प्रमुख हैं। इनमें एक कथा भगवान शिव से जुड़ी थी तो दूसरी कथा बबूल के पेड़ से। भगवान शिव से मिली कृष्ण को बांसुरी कहते हैं भगवान कृष्ण की बांसुरी को लेकर अलग अलग- कथाएं प्रचलित हैं जिनमें दो कथाएं प्रमुख हैं। इनमें एक कथा भगवान शिव से जुड़ी थी तो दूसरी कथा बबूल के पेड़ से। द्वापरयुग के समय जब भगवान श्री कृष्ण ने धरती में जन्म लिया तब देवी-देवता वेश बदलकर समय-समय पर उनसे मिलने धरती पर आने लगे। इस दौड़ में भगवान शिवजी कहां पीछे रहने वाले थे, अपने प्रिय भगवान से मिलने के लिए वह भी धरती पर आने के लिए उत्सुक हुए।  कान्हा और कुम्हार की रोचक पौराणिक कथा भगवान शिव से मिली कृष्ण को बांसुरीकहते हैं कि द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण का जन्म हुआ तो नंद बाबा के घर बधाई देने वालों का तांता लग गया। क्या नगरवासी, क्या ऋषि मुनि यहां तक की देवता भी समाचार मिलने पर नंद बाबा के घर बधाई देने पहुंचने लगे। बधाई की परंपरा के अनुसार सभी भगवान के लिए कुछ न कुछ उपहार में ला रहे थे। ऐसा जब भगवान भोले शंकर ने देखा तो सोचा कि उन्हें भी कुछ न कुछ लेकर ही जाना चाहिए, लेकिन वह कुछ ऐसा ले जाएं जो बालक कृष्ण अपने साथ रख सके। ऐसा सोचते हुए भगवान शिव गोकुल मथुरा की ओर बढ़ रहे थे तभी उन्हें रास्ते में महर्षि दधीच की हड्डियों के कुछ अवेशेष मिले। यह वही महर्षि दधीच थे जिन्होंने राक्षसों के विनास के लिए अपने शरीर को दान कर दिया था। इन्हीं के हड्यिों से सारंग, पिनाक और गांडीव नामक तीन धनुष और एक बज्र बनाया गया था।  भगवान शिव ने हड्डी के एक टुकड़े को उठाया और माया से एक अनुपम और बांसुरी तैयार की। इसके बाद उन्होंने नंदबाबा के घर जब भगवान कृष्ण को देखा तो उन्हें यह बांसुरी भेंट की। भगवान शिव का आशीर्वाद समझकर भगवान कृष्ण हमेशा इस बांसुरी को अपने पास रखा। वहीं बबूल की दूसरी कथा में कहा जाता है कि भगवान कृष्ण बगीचे में टहले और फूलों को देखकर मुस्कुराते। वह सभी पेड़, पौधों और लताओं से बहुत ही स्नेह जताते। ऐसा देखकर वहां पर मौजूद बबूल के पेड़ को रहा नहीं गया तो उसने भगवान अपने से कम प्यार होने की शिकायत की। भगवान ने बबूल से कहा कि उसे भी प्यार मिलेगा लेकिन उसे कष्ट बहुत सहना पड़ेगा। बबूल तैयार हो गया। भगवान से बबूल की एक शाखा तोड़ी तो वह पीड़ा से कराह उठा। लेकिन भगवान ने इस शाखा से बांसुरी बनाई और फिर हमेशा अपने पास रखी।

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कान्हा और कुम्हार की रोचक पौराणिक कथा

यह कहानी भगवान श्री कृष्ण के बाल्य काल के समय की है। बचपन में श्री कृष्ण बडे ही शरारती थे। आये दिन भगवान श्री कृष्ण के नए-नए उलाहने रोज यशोदा मैया के पास आते रहते थे। इन्हीं उलाहनो से तंग आकार एक दिन यशोदा मैया छड़ी लेकर कृष्ण भगवान के पीछे दौड़ने लगी। यशोदा मैया को भगाते-भगाते गोविंदा एक कुम्हार के घर में घुस गए। उस वक्त कुम्हार अपने काम में व्यस्त था। पर जब कुम्हार की दृष्टि भगवान कृष्ण पर पडी। तब कुम्हार बडा ही प्रसन्न हो गया। भगवान कृष्ण बोले कुम्हार जी – कुम्हार जी मेरी मैया बहुत क्रोधित है और छड़ी लेकर मुझे ढूंड रही है। कुछ समय के लिए आप मुझे मेरी मैया से छुपा लीजिए। कुम्हार भगवान श्री कृष्ण के अवतार स्वरुप से ज्ञात था। उसने तुरंत कृष्णजी को एक बडे से मिट्टी के घड़े के निचे छुपा दिया। कुछ समय पश्चात जब यशोदा मैया ने वहां आकार कुम्हार से पूछा। क्यों रे कुम्हार! क्या तूने मेरे कान्हा को कही देखा है? तो कुम्हार ने जवाब दिया नहीं मैया मैंने कहीं नहीं देखा। कुम्हार और यशोदा मैया के बिच हो रहा सवांद भगवान श्री कृष्ण गौर से सुन रहे थे। फिर जब माता यशोदा वहां से चली गई। तब कान्हा बोले कुम्हार जी मेरी माता यदि चली गई हो। तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालिए। कुम्हार बोला भगवान ऐसे नहीं आपको निकालुगा पहले आपको मुझे वचन देना होगा की आप मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त कर देंगे। कुम्हार की बात सुनकर कान्हा जी मुस्कुराये और बोले ठीक कुम्हार मैं वचन देता हूं की मैं तुम्हे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्ति दे दूंगा। अब तो मुझे बाहर निकाल दो। कुम्हार बोला मुझे अकेले को नहीं महाप्रभु मेरे पूरे परिवार को भी आप चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दीजिये, तो ही मैं आपको घडे़ से बाहर निकालूंगा। इस पर कृष्ण बोले ठीक हैं भैया। मैं उन्हें भी चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का आपको वचन देता हूं। अब तो बाहर निकाल दो मुझे। अब कुम्हार बोला बस प्रभुजी एक विनती और है। उसे पूरा करने का वचन देते है। तो मैं आपको घडे से बाहर निकाल दूंगा। कृष्ण बोले अब वह भी बता दो। कुम्हार ने कहा हे प्रभुजी जिस घडे़ के निचे आप छुपे है। उस घडे को बनाने के लिए, लाई गई मिट्टी को मैंने अपने बैलों पर लाद कर लाई है। आप मेरे उन बैलो को भी चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दीजिये। कृष्ण भगवान ने कुम्हार का प्राणी प्रेम देखकर उन बैलों को भी मोक्ष देने का वचन दिया। सावन (श्रावण) सोमवार व्रत कथा, व्रत विधि  अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्हार से कहते हैं – ‘कुम्हार जी, यदि मैया चली गई हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।’ कुम्हार बोला – ‘ऐसे नहीं, प्रभु जी पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’ भगवान मुस्कुराये और कहा – ‘ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूं। अब तो मुझे बाहर निकाल दो।’ कुम्हार कहने लगा – ‘मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूंगा।’ प्रभु जी कहते हैं – ‘चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूं। अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।’ कान्हा बोले लो कुम्हार तुम्हारी सभी इच्छाएं पूरी हो गई है। अब तो इस घडे से मुझे बाहर निकल लो। इसबार कुम्हार बोला अभी नहीं भगवान। बस एक अंतिम इच्छा शेष रह गई है और वह यह है कि जो भी जीव हम दोनों के बिच हुए इस सवांद को सुन रहा होगा उसे भी आप इस जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त कर देंगे। बस यह वचन भी दे दीजिये। तभी मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूंगा। कुम्हार की सच्ची प्रेमभावना देखकर कृष्ण भगवान अति प्रसन्न हुए और उन्होंने कुम्हार को तथास्तु कह दिया। फिर जाकर कुम्हार ने बाल कृष्ण को घडे़ से बाहर निकाला। उनको साष्टांग प्रणाम करके। उनके चरण धोये और वह चरण अमृत प्राशन करके। अपने पूरे घर में उसका छिडकाव किया। अंत में कुम्हार प्रभु कृष्ण के गले लगकर इतना रोया इतना रोया की उनमे ही विलीन हो गया।

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सावन (श्रावण) सोमवार व्रत कथा, व्रत विधि 

सावन (श्रावण) सोमवार व्रत कथा, व्रत विधि | हिन्दू धर्म में सावन का महीना (श्रावण मास) बड़ा ही पवित्र माना जाता हैं। चूँकि सावन का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है इसलिए भोले के भक्तों के लिए भी यह महीना बड़ा ही विशेष है। स्कंद पुराण के अनुसार जब सनत कुमार ने भगवान शिव से पूछा कि आपको श्रावण मास इतना प्रिय क्यों है? तब शिवजी ने बताया कि देवी सती ने भगवान शिव को हर जन्म में अपने पति के रूप में पाने का प्रण लिया था। लेकिन अपने पिता दक्ष प्रजापति के भगवान शिव को अपमानित करने के कारण देवी सती ने योगशक्ति से शरीर त्याग दिया।इसके पश्चात उन्होंने दूसरे जन्म में पार्वती नाम से राजा हिमालय और रानी नैना के घर जन्म लिया। उन्होंने युवावस्था में श्रावण महीने में ही निराहार रहकर कठोर व्रत द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया। सावन सोमवार व्रत कथा एक समय की बात है, किसी नगर में एक साहूकार रहता था. उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी, इस कारण वह बहुत दुखी था. पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था. उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न हो गईं और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया. पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि ‘हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है.’ लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई. माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी. माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था. उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख. वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा. कुछ समय के बाद साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ. जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया. साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में यज्ञ कराना. जहां भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना. दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी की ओर चल पड़े. रात में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था. लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था, वह एक आंख से काना था. राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए एक चाल सोची. साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आया. उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं. विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा. लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया गया. लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार था. उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी. उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि ‘तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा, वह एक आंख से काना है. मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं.’ सपने में बंदर दिखना अच्छा संकेत या बुरा जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई. राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया जिससे बारात वापस चली गई. दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया. जिस दिन लड़के की आयु 12 साल की हुई, उसी दिन यज्ञ रखा गया. लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है. मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर सो जाओ. शिवजी के वरदानुसार कुछ ही देर में उस बालक के प्राण निकल गए. मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप शुरू किया. संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे. पार्वती ने भगवान से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा. आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें. जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया. अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है. लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव, आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे. माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया. शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया. शिक्षा समाप्त करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया. दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था. उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया. उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी खातिरदारी की और अपनी पुत्री को विदा किया. इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे. उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए. उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है. इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है, उसके सभी दुख दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. सावन (श्रावण) सोमवार व्रत विधि  स्कंदपुराण के अनुसार

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सपने में बंदर दिखना अच्छा संकेत या बुरा

सपने हर कोई देखता है। सपनों को लेकर अक्सर कहा जाता है कि हम पूरा दिन जो कुछ भी सोचते है वहीं हमें सपने में भी दिखता है। तो क्या यह सच है जो कुछ भी हम दिन भर में सोचते है वहीं हमे सपने में दिखता है। हालांकि ऐसा तो वैज्ञानिकों का मानना है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ अगर बात करें स्वप्न शास्त्र की, तो शास्त्र कुछ और कहता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार रात को सोते हुए देखे गए हर एक सपने का कोई न कोई विशेष महत्व होता है। चाहे फिर वो अच्छे सपने देखना हो या फिर बुरे। हर सपने का कोई न कोई मतलब जरूर होता है। वहीं जब भी हम कोई सपना देखते है तो सबसे पहले उस सपने के बारे में दूसरों को बताते है। आज के इस आर्टिकल में हम बात करेंगे कि अगर आपने सपने में बंदर को देखा है तो क्या ये अच्छा संकेत है या फिर बुरा सपने में बंदर का झुंड देखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में अलग-अलग पशु-पक्षियों को देखने का अर्थ अलग-अलग होता है। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति को अपने सपने में बंदर दिखते हैं तो इसका अर्थ शुभ भी हो सकता है, तो वहीं दूसरी और इसका अर्थ अशुभ भी हो सकता है। आपने सपने में बंदर को कैसे देखा है, शुभ या अशुभ इस बात पर निर्भर करता है। जैसे कि अगर कोई व्यक्ति बंदरों को झुड में देखता है तो यह एक अच्छा संकेत है। इसका अर्थ है कि जल्द ही उसे आर्थिक लाभ मिलने वाला है, और घर में सुख-शान्ति बनी रहेगी। सपने में बंदर को हंसते हुए देखना अगर आप सपने में बंदरों को हंसते हुए देख रहे है, तो यह भी एक अच्छे संकेत की और इशारा कर रहे है। हंसते हुए बंदर को देखने का मतलब कि आपका अच्छा समय जल्द ही शुरू होेने वाला है। ऐसे में व्यक्ति को आने वाले समय में धन लाभ के साथ-साथ मान-सम्मान भी बढ़ेगा।वहीं दूसरी और अगर आप अपने सपने में बंदरों को लड़ते हुए देखते है तो इसका मतलब कि परिवार में किसी कारण दरार पड़ सकती है। बंदर को खाना चुराते देखना वहीं स्वप्न शास्त्र के अनुसार आप बंदर को खाना चुराते देखा तो इसका मतलब है कि जल्द ही आपको धन लाभ होने वाला है। इसी के साथ अगर आप सपने में बंदर को तैरते हुए देखा तो इसका मतलब जल्दी ही आपकी सभी समस्याओं से आपको छुटकारा मिलने वाला है। वहीं अगर आप सपने में देखते है कि आपको बंद ने काट लिया है तो समझ लें कि भविष्य में आपको कोई गंभीर चोट लगने वाली है। सपने में गड़ा हुआ धन देखने या मिलने का क्या अर्थ है? बंदर को खाते हुए देखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार अगर किसी को सपने में बंदर कुछ खाते हुए नजर आता है तो इसे अशुभ संकेत माना गया है। यह सपना बताता है कि आपको भविष्य के लिए सतर्क रहना चाहिए। वहीं अगर कोई व्यक्ति सपने में बंदरों का झुंड देखता है, तो इसका मतलब है कि जल्द ही उसे आर्थिक लाभ मिलने वाला है। बंदरों को लड़ते हुए देखना अगर आप सपने में बंदरों को आपस में लड़ते हुए देखते हैं तो इसका मतलब है कि परिवार में किसी कारण दरार पड़ सकती है। इसलिए आपको संभलकर रहने की जरूरत है। अगर आप सपने में बंदर को खाना चुराते देखते हैं, तो इसका मतलब है कि व्यक्ति को जल्द ही धन लाभ होने वाला है। बंदर को तैरते हुए देखना अगर सपने में कोई बंदर तैरते हुए नजर आ रहा है, तो इसका मतलब है कि जल्द ही आपको जीवन में आ रही किसी समस्या से छुटकारा मिलने वाला है। अगर सपने में आप देखते हैं कि किसी बंदर ने आपको काट लिया है, तो समझ लें कि भविष्य में कोई गंभीर चोट लगने वाली है।

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सपने में गड़ा हुआ धन देखने या मिलने का क्या अर्थ है?

सपने में गड़ा हुआ धन देखना हमारे हिन्दू शास्त्रों में लगभग हर कृत्य के पीछे एक ठोस कारण छिपा हुआ है, यानी इस संसार में जो भी घटित हो रहा या घटित होने की संभावना है उसके होने का कोई न कोई कारण तो है। भगवान कृष्ण ने भी कहा है कि मनुष्य द्वारा किये जा रहे कर्म उनके पूर्व जन्म में किये गए कर्मों का ही फल हैं। आज हम कर्म या भविष्य का लेखा जोखा रखने वाले सपनों की बात करेंगे, वो सपनें जो हमारे लिए भले ही इतने महत्वपूर्ण न हो पर उनका कोई न कोई अर्थ तो जरूर है। ऐसा हम नहीं कह रहे बल्कि हिन्दू धर्म के स्वप्न शास्त्र स्वयं ही इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। आज के इस लेख में हम सपने में खजाने या गड़े हुए खजाने को देखने के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं की बात करने जा रहे हैं। सपने में गड़ा हुआ खजाना देखना हमारे वैदिक ग्रंथों में रावण सहिंता और वराह संहिता स्वप्न फल को जानने के लिए सबसे उत्तम माने जाते हैं। लोगों को सपने बड़े ही विचित्र से आते हैं कई बार तो उन सपनों का कोई अर्थ ही नहीं निकलता है पर सपनों में हमारा जोर तो चलता नहीं है। कुछ लोग सपनें में कहीं पर गड़ा हुआ खजाना देख लेते हैं फिर उन्हें लगता है कि यह सच हो सकता है। फिर वे जी जान से उस गड़े हुए खजाने को ढूंढने में जुट जाते हैं। शायद लोगों को यह नहीं मालूम कि सपने में गड़े हुए खजाने को देखने का अर्थ यह नहीं है। जब भी कोई व्यक्ति सपने में गड़ा धन मिलना देखता है तो यह रावण सहिंता और वराह सहिंता के अनुसार यह नहीं कहता कि उस व्यक्ति को कहीं पर गड़ा हुआ खजाना मिल ही जाएगा। दरअसल इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उस व्यक्ति को अचानक धन मिलने या सम्मान-प्रतिष्ठा हासिल होने की संभावना है। गड़ा धन मिलने के संकेत है कि आपको अज्ञात स्त्रोतों से धन की प्राप्ति हो सकती है और समाज में प्रतिष्ठा मिल सकती है। अब आपको बताते हैं कि आखिर कब आपको गड़ा हुआ धन प्राप्त होने की संभावना अत्यधिक होती है और गुप्त धन मिलने के संकेत क्या होते हैं? रावण सहिंता और वराह सहिंता के अनुसार अगर किसी व्यक्ति को गड़े हुए खजाने के मिलने की संभावनाएं होती हैं तो उसे सपनें में सफेद नाग दिखाई देता है। वह सफेद नाग जिस स्थान पर दिखाई देता हैं वहीँ पर गड़ा हुआ खजाना मिलने की संभावना होती है। क्या आप ने भी सपने में देखी है खुद की शादी? जानें क्या है इसका मतलब आपको बता दें कि सपने में दिखने वाला सफेद नाग कोई सामान्य नाग नहीं बल्कि नाग के रूप में पितर होते हैं जो अपने वंशजों को गड़े हुए खजाने ( Gada hua khajana ) पाने के लिए संकेत दिया करते हैं। पितर अपने ही द्वारा छिपाए गए खजाने के रक्षक होते हैं जो अपने परिवार जनों को बार बार सफेद नाग के रूप में सपने में आकर संकेत दिया करते हैं और गुप्त धन के बारे में जानकारी देते हैं। तंत्र शास्त्र में गड़ा धन मिलने के संकेत जिस प्रकार कलियुग में मशीनों से तमाम तरह के काम होते हैं पहले तंत्र शास्त्र से कई तरह के रहस्य से पर्दा उठाया जाता था। तंत्र शास्त्र में गड़ा धन होने के संकेत कुछ इस तरह दिए गए हैं- जिस जमीन में कई पेड़ हों और एक ही पेड़ पर ज्यादा पक्षी बैठते हों, वहां गड़ा धन होने की संभावना है. जहां बारिश होने पर पानी वाली जगह पर घास न उगती हो, लेकिन गर्मी के मौसम में धूप में भी घास उगती हो, वहां जमीन के अंदर संपत्ति की संभावना है. जहां सांप, नेवले या गिरगट निकलते हों या उनके बिल हों वहां भी गड़ा धन होने की आशंका है. जहां पौधे प्राकृतिक कद से ऊंचे हों वहां भी गड़ी संपत्ति मिलने की संभावना रहती है

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