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Somvar Vrat Katha

Somvar Vrat Katha:सोमवार के व्रत में जरूर सुनें ये कथा, मिलेगी श‍िव-पार्वती की कृपा

Somvar Vrat Katha: सोमवार का दिन शंकर भगवान को समर्पित होता है. आज के दिन भक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. कुछ लोग आज के दिन व्रत भी रखते हिन्दू धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवता को समर्पित होता है, और सोमवार का दिन देवों के देव महादेव, भगवान शंकर को समर्पित है। मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव बहुत ही भोले हैं, इसलिए उन्हें ‘भोलेनाथ’ भी कहा जाता है वे अपने भक्तों की सच्ची श्रद्धा और क्षणिक मात्र की भक्ति से प्रसन्न होकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं जो भक्त शिव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं, वे सोमवार का व्रत रखते हैं। हालांकि, शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि आप यह उपवास रखते हैं, तो आपको Somvar vrat katha पढ़ना या सुनना अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना व्रत का फल अधूरा माना जाता है इस विस्तृत लेख में हम Somvar vrat katha के महत्व, व्रत रखने की सही विधि और उस प्राचीन कहानी के बारे में जानेंगे जिसने सदियों से भक्तों के विश्वास को अटूट बनाए रखा है। Somvar Vrat Katha:सोमवार के व्रत में जरूर सुनें ये कथा…… 1. सोमवार व्रत का महत्व और शिव कृपा:Importance of Monday fast and grace of Shiva सोमवार के व्रत को लेकर यह दृढ़ मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से भगवान शिव अपने भक्तों की मुरादें बहुत जल्दी पूरी करते हैं। चूँकि महादेव को किसी विशेष तामझाम या कठिन पूजन की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए वे केवल जल और बेलपत्र चढ़ाने मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। सावन के सोमवार हों या सामान्य सोमवार, इस व्रत का फल साधक को मानसिक शांति, आर्थिक समृद्धि और संतान सुख के रूप में प्राप्त होता है। 2. सोमवार व्रत के प्रकार:types of monday fast नारद पुराण और अन्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का व्रत मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है: 1. साधारण प्रति सोमवार व्रत: यह हर सप्ताह सोमवार को रखा जाता है। 2. सौम्य प्रदोष व्रत: यह विशेष तिथियों पर महादेव की पूजा के लिए रखा जाता है। 3. सोलह सोमवार का व्रत (Solah Somvar): यह कठिन संकल्प के साथ लगातार 16 सोमवारों तक किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इन सभी व्रतों की पूजा विधि और Somvar vrat katha सुनने की प्रक्रिया लगभग एक समान ही होती है। 3. सोमवार व्रत की सम्पूर्ण पूजन विधि:Complete worship method of Monday fast किसी भी व्रत की सफलता उसकी विधि पर निर्भर करती है। सोमवार व्रत की विधि इस प्रकार है: • स्नान और शुद्धि: व्रत के दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। • शिव-गौरी पूजन: मंदिर या घर के देवालय में भगवान शिव और माता पार्वती (शिव-गौरी) की विधिवत पूजा करें। • अभिषेक और अर्पण: महादेव को शुद्ध जल, गंगाजल और उनका प्रिय बेलपत्र अर्पित करें। • कथा का श्रवण: पूजन के पश्चात Somvar vrat katha को श्रद्धापूर्वक पढ़ें या सुनें। • भोजन के नियम: सोमवार का व्रत साधारण रूप से दिन के तीसरे पहर (शाम) तक रखा जाता है। Somvar Vrat Katha इसके बाद केवल एक समय ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। 4. सम्पूर्ण पौराणिक Somvar Vrat Katha प्राचीन समय की बात है, किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, लेकिन वह संतान न होने के कारण बहुत दुखी रहता था। पुत्र की प्राप्ति की इच्छा लिए वह हर सोमवार को व्रत रखता था और पूरी निष्ठा के साथ शिव मंदिर जाकर शिव-पार्वती की पूजा करता था। माता पार्वती का आग्रह और शिव का वरदान साहूकार की अटूट भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का निवेदन किया। इस पर भगवान शिव ने कहा, “हे पार्वती! इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल भुगतना पड़ता है और भाग्य में जो लिखा है, वही होता है”। Somvar Vrat Katha परंतु माता पार्वती के बार-बार आग्रह करने पर शिवजी ने अपना निर्णय बदला और साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया, लेकिन साथ ही यह भी बताया कि उस बालक की आयु केवल 12 वर्ष ही होगी साहूकार भगवान शिव और माता पार्वती की यह बातचीत सुन रहा था। उसे न तो वरदान की बहुत खुशी हुई और न ही पुत्र की अल्पायु का दुख। वह पहले की तरह ही भक्ति भाव से Somvar vrat katha सुनता रहा और शिवजी की पूजा करता रहा। बालक का जन्म और काशी की यात्रा समय बीतने पर साहूकार की पत्नी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। जब वह बालक 11 वर्ष का हुआ, तो उसे विद्या प्राप्त करने के लिए काशी भेजने का निर्णय लिया गया। साहूकार ने बालक के मामा को बुलाकर बहुत सारा धन दिया और निर्देश दिया कि रास्ते में जगह-जगह यज्ञ करवाते जाना और ब्राह्मणों को भोजन व दक्षिणा देते हुए जाना। मामा और भांजा दोनों इसी मार्ग पर चल पड़े। राजकुमारी का विवाह और साहूकार के पुत्र की ईमानदारी रास्ते में एक नगर पड़ा जहाँ के राजा की पुत्री का विवाह था। जिस राजकुमार से विवाह तय हुआ था, वह एक आँख से काना था। राजकुमार के पिता ने अपनी कमी छुपाने के लिए साहूकार के पुत्र को दूल्हा बनाकर विवाह मंडप में बिठा दिया और सोचा कि विवाह के बाद इसे विदा कर देंगे और असली राजकुमार के साथ राजकुमारी को भेज देंगे। साहूकार का पुत्र बहुत ईमानदार था। उसे यह छल पसंद नहीं आया, इसलिए उसने राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिख दिया कि “तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है, लेकिन तुम्हें जिस राजकुमार के साथ भेजा जा रहा है, वह एक आँख से काना है”। जब राजकुमारी ने यह पढ़ा, तो उसने उस राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया और बारात वापस लौट गई। इधर साहूकार का पुत्र और उसके मामा काशी पहुँच गए। 12 वर्ष की आयु और शिव का चमत्कार काशी पहुँचकर उन्होंने यज्ञ शुरू किया। जिस दिन बालक 12 वर्ष का हुआ, उस दिन भी यज्ञ का आयोजन था। बालक की तबीयत खराब हुई और वह अंदर जाकर सो गया। शिवजी के

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करवा चौथ

Karwa Chauth 2025 Vrat Upay: करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए..

Karwa Chauth 2025: करवा चौथ पर पति-पत्नी के आपसी प्रेम और विश्वास को मजबूत करने के लिए कई तरह के उपाय किए जाते हैं। Karwa Chauth 2025 mein Kab Hai: सुहागिन महिलाओं के लिए करवा चौथ का पर्व बहुत ही खास माना जाता है। इस पर्व पर सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए सुबह से निर्जला व्रत रखती है। यह पर्व पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम और विश्वास को मजबूत करता है। करवाचौथ पर सुहागिन महिलाएं सुबह से बिना कुछ खाए-पिए उपवास पर रहती हैं। फिर शाम के समय करवा माता की पूजा करती हैं और रात को चांद के निकलने का इंतजार करती हैं। जब चांद निकलता है तो उसके दर्शन करते हुए और अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। करवा चौथ पर पति-पत्नी के आपसी प्रेम और विश्वास को मजबूत करने के लिए कई तरह के उपाय किए जाते हैं। सनातन धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए करवाचौथ का दिन बेहद खास होता है. इस दिन सुहागिन महिलाएं अपनी पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. यह सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक भी है. करवा चौथ के दिन मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा आराधना की जाती है इसके साथ-साथ चंद्र देव को अर्घ प्रदान किया जाता है. इसके बाद ही सुहागिन महिलाएं व्रत खोल सकती हैं. यह व्रत अखंड सौभाग्य की प्राप्ति और पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है. करवा चौथ व्रत के दिन सुहागिन महिलाओं को क्या नहीं करना चाहिए? ताकि व्रत की पवित्रता बनी रहे. Karwa Chauth 2025 Vrat Upay: करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं…. Married women should take these measures on the day of Karva Chauth:करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं करें ये उपाय पहला उपाय- चौथ माता की पूजाजो सुहागिन महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखती हैं उनके लिए करवा माता की पूजा का विशेष महत्व होता है। करवा चौथ के दिन सुगाहिन महिलाओं को अपने करवा में जल भरकर चौथ माता को अर्पित करना चाहिए। पूजा के दौरान सुहागिन महिलाएं अपने सभी आभूषणों को पहनें। दूसरा उपाय- गौरी शंकर की पूजाकरवा चौथ पर जहां करवा माता की पूजा करने का विधान होता है,वहीं इसके साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन सुहागिन महिलाओं को गौरी शंकर की पूजा के साथ माता को सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी और वस्त्र चढ़ाएं। इसस दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही वैवाहिक जीवन में आने वाली परेशानियां दूर होती हैं। तीसरा उपाय- सुहाह की चीजों का करें दानकरवा चौथ पर सुख और सौभाग्य का आशीर्वाद पाने के लिए सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी और वस्त्र का दान करना सौभाग्यवती महिलाओं को शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसे करने से मां पार्वती प्रसन्न होती है। जिससे अखंड सौभाग्य और दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि के लिए अत्यंत लाभकारी मानी जाती है। चौथा उपाय- 7 सुहागिन महिलाओं का आशीर्वाद धर्म शास्त्रों के अनुसार, करवा चौथ के दिन पूजा के बाद सात सुहागिन महिलाओं का आशीर्वाद लेने की परंपरा होती है। इस दिन जो महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखती हैं वे सात दूसरी सुहागिन महिलाओं को सुहाग की सामग्री अर्पित करें। पांचवां उपाय- पति से लाल रंग के उपहार लेंकरवा चौथ पर सुहागिन महिलाएं अपने पति से लाल या फिर पीले रंग की सुहाग की चीजें उपहार में लें। इससे प्रेम और सौभाग्य में वृद्धि होगी। साथी पति-पत्नी के बीच प्रेम और स्नेह बढ़ेगा।  Do not make this mistake even by mistake on the day of Karva Chauth:करवा चौथ के दिन भूलकर भी ना करें यह गलती अनाज का सेवन: करवा चौथ का व्रत सूर्योदय से पहले खाई जाने वाली सरगी के बाद शुरू होता है और चांद निकलने के बाद ही खोला जाता है. इस दौरान जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती. अगर कोई महिला गलती से भी इस व्रत में जल या भोजन का सेवन कर लेती है, तो उसका व्रत खंडित हो जाता है. दिन में सोना: शास्त्र के अनुसार, व्रत रखने पर दिन के वक्त सोना अच्छा नहीं माना जाता है. इसलिए कोशिश करें अगर आपने व्रत रखा है तो दिन के समय में सोने से बचना बेहतर है. ना काले रंग के कपड़े पहने ना श्रृंगार करें: कई लोगों को काले रंग के या सफेद रंग के कपड़े पहनना काफी अच्छा लगता है. लेकिन करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं काले रंग के या सफेद रंग के कपड़े बिल्कुल भी ना पहने ऐसा करने से आपका व्रत निष्फल हो सकता है. चंद्रोदय के बाद ही खोले व्रत: करवा चौथ के दिन चंद्रोदय के बाद ही अर्घ प्रदान करें और उसके बाद ही अपने पति के हाथों व्रत का पारण करें, तभी शुभ फल की प्राप्ति होगी और हमेशा वैवाहिक जीवन में खुशहाली बनी रहेगी. करवा चौथ कथा karwa chauth vrat katha

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Ekadashi

Do not do this work on Ekadashi: एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये काम, वरना पाप के बनेंगे भागी

Do’s and Dont’s on Ekadashi: शास्त्रों में एकादशी तिथि को बहुत पवित्र बताया गया है। इस तिथि के पुण्य फल से जीवन में कभी किसी चीज की कमी नहीं होती है और भगवान का आशीर्वाद बना रहता है। शास्त्रों में एकादशी का महत्व बताते हुए कुछ नियम भी बताए हैं। इन नियमों के अनुसार एकादशी तिथि को भूलकर भी इन कार्यों को करने से बचना चाहिए… हिंदू धर्म में सभी तिथियों में एकादशी तिथि को सर्वश्रेष्ठ माना गया है और एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन किए गए उपवास, जप तप व ध्यान का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि एकादशी का व्रत करने से सांसारिक जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है और अंत में बैकुंठ धाम को प्राप्त करता है। धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि इस पुण्य तिथि पर कुछ ऐसे कार्य हैं, जिनको वर्जित बताया गया। ऐसा करने से जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है और भगवान विष्णु की नाराजगी का भी सामना करना पड़ता है। आइए जानते हैं कि एकादशी के दिन ऐसे कौन से कार्य हैं, जिनको भूलकर भी नहीं करना चाहिए… Do not do this work on Ekadashi: एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये काम एकादशी तिथि पर करें यह कार्य:Do this work on Ekadashi date एकादशी के दिन रात में सोना नहीं चाहिए, यह तिथि बेहद पुण्यदायी होती है। इस तिथि को पूरी रात भगवान विष्णु के भजन गाने चाहिए, मंत्र या आरती करनी चाहिए। भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने बैठकर पूरी रात जागरण करना चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और उनके आशीर्वाद से जीवन में उन्नति के योग बनते हैं। एकादशी तिथि पर ना करें इसका सेवन:Do not consume it on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन भूलकर भी चावल नहीं खाने चाहिए, चाहे आप उपवास ना भी रख रहे हों। धार्मिक कथाओं के अनुसार, एकादशी तिथि के दिन चावल खाने वाला व्यक्ति अगले जन्म में रेंगने वाली योनि में जन्म लेता है। हालांकि अगर आप द्वादशी तिथि को चावल खाते हैं तो आपको इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है एकादशी तिथि पर ना करें ये कार्य:Do not do these things on Ekadashi date एकादशी के दिन दातुन या मंजन करना वर्जित बताया गया है। इसके साथ ही इस दिन क्रोध करना, झूठ बोलना, चुगली करना और दूसरों की बुराई करना, ऐसी चीजों से बचना चाहिए। ऐसा करने से ना केवल परिवार बल्कि पूरे समाज में सम्मान नहीं मिलता और पाप के भागी भी बनते हैं। इन सब कार्यों के करने से अच्छा है कि इस दिन भगवान विष्णु का भजन कर लें। एकादशी तिथि पर ध्यान रखें यह बात:Keep this thing in mind on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन तुलसी के पत्तों को नहीं तोड़ना चाहिए, शास्त्रों में इसे वर्जित बताया गया है। वहीं द्वादशी तिथि को जब पारण करें तो तुलसी के पत्ते से ही करें। लेकिन उस दिन भी व्रती को तुलसी का पत्ता नहीं तोड़ना चाहिए। घर में अगर बच्चा या बुजुर्ग है, जिसने एकादशी का व्रत ना किया हो, उसको पत्ता तोड़ने के लिए द्वादशी तिथि में कहना चाहिए। एकादशी तिथि पर ना करें इन चीजों का सेवन:Do not consume these things on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन कुछ चीजें ऐसी हैं, जिनको खाने से बचना चाहिए। जैसे मसूर दाल, चना दाल, उड़द दाल, गोभी, गाजर, शलजम, पालक का साग आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही इस दिन शारीरिक व मानसिक तौर पर किए जाने वाले बुरे कार्यों को करने से बचना चाहिए। शास्त्रों में एकादशी तिथि को मोक्षदायिनी तिथि कहा गया है इसलिए एकादशी तिथि के दिन इन कार्यों करने से बचना चाहिए। एकादशी तिथि पर भूलकर भी ना करें ये काम:Do not do this work even by mistake on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन पान खाना, चोरी करना, हिंसा करना, क्रोध करना, मैथुन, स्त्रीसंग, कपट आदि चीजों से बचना चाहिए। वहीं अगर आपसे कोई गलती हो जाए तो उसके लिए माफी मांगनी चाहिए। साथ ही इनको आदत बना लेनी चाहिए, जो आपके लिए बेहद फायदेमंद साबित होगी। शारीरिक व मानसिक तौर पर अगर आप किसी को नुकसान पहुंचाते हैं तो यह बहुत गलत है, ऐसा करने से कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

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Sawan Somwar Vrat Katha In Hindi: इस कथा के बिना अधूरी है सावन सोमवार की पूजा, जरूर करें इसका पाठ

Sawan Somwar Vrat Katha: हिंदू धर्म की पवित्र परंपराओं में सावन सोमवार Somwar Vrat Katha का व्रत केवल एक नियम नहीं, बल्कि भक्ति और आत्मिक जुड़ाव की गहराई से जुड़ा एक दिव्य साधन है। यह व्रत न केवल मनोकामनाओं की पूर्ति का मार्ग है, बल्कि भगवान शिव के चरणों में समर्पण का प्रतीक भी है। सावन (Sawan Somwar Vrat Katha) का महीना बेहद पावन होता है। इस महीने के प्रत्येक सोमवार पर भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष पूजा की जाती है। साथ ही उनके निमित्त व्रत रखा जाता है। साथ ही सावन सोमवार Somwar Vrat Katha का व्रत रखा जाता है। इस व्रत की महिमा का वर्णन शास्त्रों में निहित है। भगवान शिव की पूजा से हर मनोकामना पूरी होती है। Sawan Somvar Vrat Katha in Hindi: सावन सोमवार Somwar Vrat Katha के व्रत में कथा का पाठ करने का महत्‍व श‍िव पुराण में बहुत खास माना गया है। मान्‍यता है कि जो लोग सावन सोमवार का व्रत करते हैं उनको विधि विधान से पूजा करने के बाद व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। भगवान शिव का सबसे पहले दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है और फिर विधि विधान से पूजा करने के बाद सावन सोमवार के व्रत की कथा का पाठ करने से आपका व्रत संपूर्ण माना जाता है और पूजा का शुभ फल प्राप्‍त होता है। तो पढ़ें सावन सोमवार की व्रत कथा विस्‍तार से। Sawan Somwar Vrat Katha: सावन सोमवार की व्रत कथा मृत्युलोक में भ्रमण करने की इच्‍छा करके एक समय श्री भूतनाथ भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ मृत्युलोक में पधारे। भ्रमण करते-करते दोनों विदर्भ देशांतर्गत अमरावती नाम की अति रमणीक नगरी में पहुंचे। अमरावती नगरी स्‍वर्ग के सदृश सभी प्रकार के सुखों से परिपूर्ण थी। उसमें वहां के महाराज द्वारा बनवाया हुआ अति रमणीक शिवजी का मंदिर भी था। भगवान शंकर भगवती पार्वती के साथ इस मन्दिर में निवास करने लगे। Somwar Vrat Katha एक समय माता पार्वतीजी भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न देखकर बोली, हे महाराज आज तो हम दोनों चौंसर खेलेंगे। शिवजी ने प्राण प्रिया की बात को मान लिया और चौंसर खेलने लगे। उसी समय मन्दिर का पुजारी ब्राह्मण मन्दिर में पूजा करने आया। माता पार्वती ने पुजारी से प्रश्‍न किया पुजारी जी, बताओ इस बाजी में हम दोनों में से किसी जीत होगी? ब्राह्मण बिना विचारे जल्‍दी से बोल उठा कि महादेव जी की जीत होगी। थोड़ी देर में बाजी समाप्‍त हो गई और पार्वतीजी जीत हुई। Somwar Vrat Katha पार्वतीजी को बहुत गुस्सा आया और ब्राह्मण को झूठ बोलने के अपराध के कारण श्राप देने चलीं। भोलेनाथ ने पार्वती को बहुत समझाया लेकिन उन्होंने ब्राह्मण को कोढ़ी होने का शाप दे दिया। कुछ समय बाद पार्वती जी के श्रापवश पुजारी के शरीर में कोढ़ पैदा हो गया। वह बहुत अधिक दुखी रहने लगा। पूजारी को कष्ट भोगते हुए जब बहुत दिन गुजर गए तब एक दिन देवलोक की अप्‍सराएं शिवजी की पूजा करने के लिए उस मंदिर में पधारीं। Somwar Vrat Katha पुजारी के कोड़ के कष्ट को देखकर उन्हें बड़ी दया आई। उन्‍होंने उससे रोगी होने का कारण पूछा। पुजारी ने निसंकोच सारी बातें बता दीं। वे अप्‍सराएं बोलीं हे पुजारी, अब तुम अधिक दुःखी मत होना। सावन सोमवार Somwar Vrat Katha का व्रत भक्तिभाव से करो। पुजारी ने अप्‍सराओं से व्रत की विधि पूछी। अप्‍सराओं ने बताया, सोमवार को भक्ति भाव से व्रत करो। साफ वस्‍त्र पहनो। संध्या व उपासना के बाद आधा सेर गेहूं का आटा लो और उसके तीन भाग कर लो। घी, गुड़, दीप, नैवेद्य, पूंगीफल, बेलपत्र, जनेऊ जोड़ा, चंदन, अक्षत पुष्‍पादि से प्रदोषकाल में भगवान शिव की पूजा करो। उसके बाद तीन भागों में से एक भाग शिवजी को अर्पण करो, बाकी दो शिवजी का प्रसाद समझकर उपस्थित लोगों में बांट दो और आप भी प्रसाद समझकर खाओ। इस विधि से सोलह सोमवार व्रत रखो। Somwar Vrat Katha सत्रहवें सोमवार को पाच-सेर पवित्र गेहूं के आटे की बाटी बनाओ, उसमें घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाओ। भगवान भोलेनाथ को भोग लगाकर उपस्थित भक्तों में बांट दो। इसके बाद कुट्‌म्ब सहित प्रसाद लो तो शिवजी की कृपा से उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। “ऐसा कहकर अप्सराएं स्वर्ग को चली गईं। ब्राहाण ने यथाविधि षोड्श सोमवार व्रत किया तथा भगवान शिव की कृपा से रोग से मुक्ति पाकर आनन्द से रहने लगा। कुछ दिन बाद शिवजी और पार्वतीजी उस मन्दिर में पुनः पधारे। ब्राह्मण को निरोग देखकर पार्वती जी ने ब्राह्मण से रोग से मुक्त होने का उपाय पूछा। ब्राह्मण ने सोलह सोमवार व्रत कथा सुनाई। पार्वतीजी बहुत प्रसन्‍न हुईं। ब्राह्मण से व्रत विधि पूछकर स्‍वयं भी व्रत करने के लिए तैयार हो गई। व्रत करने के बाद उनकी मनोकामना पूरी हुई हुई और उनके रूठे बेटे स्वामी कार्तिकेय स्वय माता के आज्ञाकारी हुए। कार्तिकेय जी को अपना यह विचार परिवर्तन का रहस्य जानने की इच्छा हुई। वे माता से बोले हे माता। आपने ऐसा कौन सा उपाय किया जिससे मेरा मम आपकी ओर आकर्षित हो गया?” पार्वती जी ने वही षोड्श सोमवार व्रत कथा की कथा उनको सुना दी। कार्तिकय जी कहा इस व्रत को में भी करूंगा, क्योंकि मेरा प्रिय मित्र ब्राह्मण बहुत दुःखी दिल से परदेश गया है। मेरी इसमे मिलने की बहुत इच्छा है। कार्तिकेय जी ने भी इस व्रत को किया और उनका प्यारा मित्र मिल गया। मित्र ने इस आकस्मिक मिलन का भेद पूछा तो कार्तिकेय जी बोले हे मित्र। हमने तुम्हारे मिलने की इच्छा करके सोलह सोमवार का व्रत किया था। अब तो ब्राह्मण मित्र को अपने विवाह की बड़ी चिन्ता हुई। Somwar Vrat Katha उसने कार्तिकेय जी से व्रत की विधि पूछी और यथाविधि व्रत किया। व्रत के प्रभाव से जब वह किसी कार्य से विदेश गया तो वहां के राजा की लड़की का स्वयंवर था। राजा ने प्रण किया था कि जिस राजकुमार के गले में सब प्रकार से श्रृङ्गारित हथिनी माला डालेगी, मैं उसी के साथ अपनी प्यारी बेटी का विवाह कर दूंगा। शिवजी की कृपा से वह ब्राह्मण भी उस स्वयंवर को देखने की इच्छा से राज्यसभा में एक ओर जाकर बैठ गया। Somwar Vrat Katha नियत समय पर हथिनी आई और उसने जयमाला उस ब्राह्मण

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Kokila Vrat 2025 date : कोकिला व्रत 2025, जाने कोकिला व्रत की कथा और इसकी पूजा विधि

Kokila Vrat 2025 date: व्रत और त्यौहार की श्रेणी में प्रत्येक दिन और समय किसी न किसी तिथि नक्षत्र योग इत्यादि के कारण अपनी महत्ता रखता है. इसी के मध्य में आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन कोकिला व्रत भी मनाया जाता है. अषाढ़ मास में आने वाले अंतिम दिन के समय पूर्णिमा तिथि पर कोकिला व्रत के साथ ही आषाढ़ मास की समाप्ति भी होती है. Kokila Vrat 2025 date: 10 जुलाई 2025 गुरुवार के दिन रखा जाएगा कोकिला व्रत  कोकिला व्रत उन व्रतों कि श्रेणी में स्थान पाता जिसमें प्रकृति प्रेम को मुख्य आधार के रुप में मनाया जाता है. इस व्रत का प्रभाव से जीवन ओर सृष्टि के संबंध और हमारे जीवन की शुभता नेचर के साथ जुड़ कर अधिक बढ़ जाती है. आषाढ़ माह होता ही प्रकृति के भीतर नए बदलावों को दिखाने वाला माह. धर्म ग्रंथों के अनुसार आषाढ़ माह की पूर्णिमा को Kokila Vrat 2025 date कोकिला व्रत करने की परंपरा रही है.  कोकिला व्रत Kokila Vrat 2025 date आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि कोकिला व्रत उन वर्षों में किया जाना चाहिए, जब आषाढ़ अधिक मास होता है। दूसरे शब्दों में, कोकिला व्रत तभी रखा जाना चाहिए, जब आषाढ़ मास दो माह के लिए आता है।  इस मान्यता के अनुसार जब भी आषाढ़ का दोमास होता है, तो कोकिला व्रत सामान्य मास के दौरान करना चाहिए, न कि अधिक मास के दौरान। इस मान्यता का विशेष रूप से उत्तर भारतीय राज्यों में समर्थन किया जाता है। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में, विशेष रूप से भारत के दक्षिणी और पश्चिमी भागों में आषाढ़ पूर्णिमा को कोकिला व्रत प्रति वर्ष किया जाता है। Kokila Vrat 2025 date:परंपराओं से जुड़ा कोकिला व्रत कोकिला व्रत Kokila Vrat 2025 date एक लोक जीवन से जुड़ा और सांस्कृतिक महत्व से संबंध रखने वाला व्रत है. इस व्रत को विशेष रुप से ग्रामीण जीवन में जुड़ी लोक कथाओं के साथ पौराणिक महत्व के साथ जुड़ कर आगे बढ़ता है. प्रत्येक जातियां प्रकृति के अमूल्य गुणों को पहचानते हुए उनके साथ अपने जीवन का तालमेल बिठाते हुए कई प्रकार के धार्मिक व आध्यात्मिक कृत्य करते हैं. इसी में जब भारतीय परंपराओं की बात आती है तो यहां भी ऎसे व्रत और पर्व हैं जो पशु पक्षिओं और पेड़ पौधों के साथ मनुष्य प्रेम को दर्शाते हैं. कोकिला व्रत मुख्य रुप से स्त्रियां रखती हैं. इस व्रत का मूल प्रयोजन सौभाग्य में वृद्धि पाने ओर दांपत्य जीवन के सुख को पाने के लिए किया जाता है. विवाहित स्त्रियां और कुवांरियाँ कन्याएं भी इस व्रत को करती हैं. Kokila Vrat 2025 date कोकिला व्रत करने से योग्य पति की प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है. विवाह जल्द होने का आशीर्वाद मिलता है. इस व्रत को भी अन्य सभी प्रकार के व्रतों की ही भांति नियमों द्वारा रखा जाता है. कोकिला व्रत पूजा नियम-विधान Kokila Vrat 2025 date कोकिला व्रत में नियम पूर्वक विधि विधान से किया गया पूजन बहुत ही शुभ फल देने वाला होता है. जो भी इस व्रत का पालन नियम अनुसार और श्राद्ध भाव के साथ करते हैं, उन्हें इसका संपूर्ण फल प्राप्त होता है. कोकिला व्रत को पूर्णिमा के दिन किया जाता है पर इसका आरंभ एक दिन पहले से ही आरंभ कर दिया जाता है. हिन्दू धर्म में कोकिला व्रत का विशेष महत्व है यह व्रत दांपत्यु सुख और अविवाहितों के लिए विवाह जल्द होने का वरदान देता है. कोकिला व्रत को विशेष कर कुमारी कन्या सुयोग्य पति की कामना के लिए करती है जैसे तीज का व्रत भी जीवन साथी की लम्बी आयु का वरदान देता है उसी प्रकार कोकिला व्रत एक योग्य जीवन साथी की प्राप्ति का आशीर्वाद देता है. Kokila Vrat 2025 date इस व्रत को विधि विधान से करने पर व्यक्ति को मनोवांछित कामनाओं की प्राप्ति होती है. इस दिन निराहार रहकर व्रत का संकल्प करना चाहिए. प्रात:काल समय पूजा के उपरांत सारा दिन व्रत का पालन करते हुए भगवान के मंत्रों का जाप करना चाहिए. संध्या समय सूर्यास्त के पश्चात एक बार फिर से भगवान की आरती पूजा करनी चाहिए. Kokila Vrat 2025 date व्रत के दिन कथा को पढ़ना और सुनना चाहिए. शाम की पूजा पश्चात फलाहार करना चाहिए. Kokila Vrat Vrat Katha: कोकिला व्रत कथा कोकिला व्रत की कथा का संबंध भगवान शिव और देवी सती से बताया गया है. इस कथा अनुसार माता सती भगवान को पाने के लिए एक लम्बे समय तक कठोर तपस्या को करके उन्हें फिर से जीवन में पाती हैं. कोकिला व्रत Kokila Vrat 2025 date कथा शिव पुराण में भी वर्णित बतायी जाती है. इस कथा के अनुसार देवी सती ने भगवान को अपने जीवन साथी के रुप में पाया. इस व्रत का प्रारम्भ माता पार्वती के पूर्व जन्म के सती रुप से है. देवी सती का जन्म राजा दक्ष की बेटी के रुप में होता है. राजा दक्ष को भगवान शिव से बहुत नफरत करते थे. परंतु देवी सती अपने पिता के अनुमति के बिना भगवान शिव से विवाह करती हैं. दक्ष सती को अपने मन से निकाल देते हैं ओर उसे अपने सभी अधिकारों से वंचित कर देते हैं. राजा दक्ष अपनी पुत्री सती से इतने क्रोधित होते हैं कि उन्हें अपने घर से सदैव के लिए निकाल देते हैं. राजा दक्ष एक बार यज्ञ का आयोजन करते हैं. इस यज्ञ में वह सभी लोगों को आमंत्रित करते हैं ब्रह्मा, विष्णु, व सभी देवी देवताओं को आमंत्रण मिलता है किंतु भगवान शिव को नहीं बुलाया जाता है. ऎसे में जब सती को इस बात का पता चलता है कि उनके पिता दक्ष ने सभी को बुलाया लेकिन अपनी पुत्री को नही. तब सती से यह बात सहन न हो पाई. सती ने शिव से आज्ञा मांगी की वे भी अपने पिता के यज्ञ में जाना चाहतीं है. शिव ने सती से कहा कि बिना बुलाए जाना उचित नहीं होगा, फिर चाहें वह उनके पिता का घर ही क्यों न हो. सती शिव की बात से सहमत नहीं होती हैं और जिद्द करके अपने पिता के यज्ञ में चली जाती हैं. वह शिव से हठ करके दक्ष के यज्ञ पर जाकर पाती हैं, कि उनके पिता उन्हें

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Tulsi Puja on Ekadashi:एकादशी व्रत और तुलसी पूजन का अद्भुत फल – जानिए कारण और लाभ

Tulsi Puja on Ekadashi: धार्मिक मान्यता के अनुसार, तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है. एकादशी का दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इस दिन उनकी पूजा-अर्चना का विशेष महत्व होता है. तुलसी को भगवान विष्णु का ही एक रूप माना जाता है, इसलिए एकादशी पर तुलसी पूजा से भगवान विष्णु शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है. Tulsi Puja on Ekadashi:एकादशी व्रत और तुलसी पूजन हिंदू धर्म में एकादशी (ekadashi) तिथि को सभी तिथियों में शुभ और महत्वपूर्ण माना गया है. एकादशी तिथि भगवान विष्णु (lord vishnu) को समर्पित है और साल की सभी एकादशी तिथियों पर भगवान विष्णु की पूजा और व्रत किए जाते हैं. एकादशी के दिन तुलसी (tulsi) की पूजा को भी काफी शुभ माना जाता है. कहा जाता है कि तुलसी के पौधे में (tulsi plant) साक्षात मां लक्ष्मी (maa laxmi) निवास करती हैं. Tulsi Puja on Ekadashi: इस दिन तुलसी के पौधे की पूजा के साथ साथ इसके नीचे दीपक जलाने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है. आपको बता दें कि भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व है और तुलसी की पूजा पर भगवान विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं. चलिए जानते हैं कि एकादशी तिथि के दिन तुलसी के पौधे की पूजा कैसे करनी चाहिए और इस दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना क्यों निषेध कहा गया है. तुलसी पूजन का महत्व तुलसी माता, भगवान विष्णु की परम प्रिय हैं। Tulsi Puja on Ekadashi शास्त्रों में तुलसी को देवी स्वरूप माना गया है। तुलसी का पूजन करने से व्यक्ति के घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। कारण लाभ भगवान विष्णु को प्रिय है तुलसी (Tulsi plant puja is important for lord vishnu) Tulsi Puja on Ekadashi: तुलसी को वृंदा भी कहा जाता है. वृंदा पिछले जन्म में असुर जालंधर की पत्नी थीं और भगवान विष्णु की पूजा किया करती थीं. एक युद्ध के दौरान भगवान विष्णु को जालंधर का वध करने के लिए धोखे से वृंदा का पतिव्रत धर्म भंग करना पड़ा और इससे क्रोधित होकर वृंदा ने भगवान विष्णु को पत्थर में बदल जाने का श्राप दिया. भगवान विष्णु शालिग्राम पत्थर में बदल गए. इसके बाद वृंदा ने आत्मदाह किया और उसकी राख से तुलसी के पौधे का जन्म हुआ. तब मां लक्ष्मी तुलसी के पौधे में विराजमान हो गई और शालिग्राम और तुलसी के पौधे का विवाह हुआ. चूंकि तुलसी के पौधे में मां लक्ष्मी का निवास कहा गया है इसलिए Tulsi Puja on Ekadashi एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा के साथ साथ तुलसी के पौधे की पूजा से भी शुभ फल प्राप्त होते हैं. हर साल देवउठनी एकादशी के अगले दिन भक्त तुलसी के पौधे का भगवान विष्णु के विग्रह शालिग्राम से विवाह करवाते हैं जिसे बहुत ही पावन और शुभ कहा जाता है. एकादशी तिथि का व्रत करने और भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने के साथ साथ इस दिन तुलसी के पौधे की पूजा भी बहुत ही शुभ मानी जाती है. इस दिन तुलसी के पौधे को लेकर कुछ खास नियम अपनाने चाहिए. एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को जल नहीं देना चाहिए. कहा जाता है कि तुलसी में विराजित मां लक्ष्मी इस दिन निर्जला व्रत करती हैं. ऐसे में अगर आप तुलसी के पौधे को जल देते हैं तो मां लक्ष्मी का व्रत खंडित हो सकता है. ऐसे में मां लक्ष्मी क्रोधित हो सकती हैं. इसलिए एकादशी तिथि के दिन तुलसी के पौधे को जल नहीं देना चाहिए. एकादशी के दिन तुलसी के पौधे से पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए. Tulsi Puja on Ekadashi अगर आपको भगवान विष्णु की पूजा के लिए तुलसी दल चाहिए तो जमीन पर गिरे तुलसी दल इस्तेमाल कर सकते हैं. आप चाहें तो एक दिन पहले तुलसी के पौधे से पत्ते तोड़कर रख सकते हैं. इस दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए, ऐसा करने पर जातक के परिवार को शारीरिक और मानसिक परेशानियां हो सकती हैं. एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते यानी तुलसी दल भगवान विष्णु की पूजा में अर्पित करने चाहिए. इससे भगवान विष्णु विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं और जातक को सुख समृद्धि का वरदान देते हैं.  एकादशी के दिन पंचामृत बनाते वक्त भी तुलसी के पत्ते उसमें जरूर डालने चाहिए. एकादशी के दिन तुलसी के नीचे दीपक जलाना चाहिए. ऐसा करना शास्त्रों में बहुत ही शुभ कहा गया है. Tulsi Puja on Ekadashi एकादशी के दिन सायंकाल के समय भगवान विष्णु की पूजा के बाद तुलसी के नीचे घी का दीपक जलाने से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है. इस दिन तुलसी को लाल चुनरी पहनाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं. Tulsi Puja on Ekadashi एकादशी के दिन तुलसी की मंजरियां भगवान विष्णु को चढ़ानी चाहिए. आप किसी भी दिन इन मंजरियों को तुलसी के पौधे से ले सकते हैं. इनको धोकर भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित करें. इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु जातक को और उसके परिवार को सुख समृद्धि और शांति का वरदान देते हैं. एकादशी व्रत का महत्व एकादशी, हर माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को आती है। Tulsi Puja on Ekadashi यह दिन भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होता है। पुराणों के अनुसार, इस दिन व्रत रखने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वह मोक्ष की ओर बढ़ता है। कारण लाभ

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Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा, जानें कथा पाठ का लाभ

Devshayani ekadashi Vrat Katha In Hindi : आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी का उपवास किया जाता है। इस एकादशी का व्रत करने से और कथा सुनने व पढ़ने मात्र से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। आइए जानते हैं देवशयनी एकादशी व्रत कथा के बारे में… आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी व्रत किया जाता है। सनातन धर्म में इस एकादशी का काफी महत्व माना जाता है क्योंकि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर की योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद कार्तिक मास की एकादशी तिथि तक को भगवान विष्णु योगनिद्रा से निकलते हैं। इस दौरान भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं। देवशयनी एकादशी व्रत कथा का शास्त्रों में विशेष महत्व बताया गया है। इस व्रत की कथा सुनने व पढ़ने मात्र से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। देवशयनी एकादशी व्रत कथा:Devshayani Ekadashi Vrat Katha वामन अवतार की कथा:Story of Vaman Avatar वामन पुराण के अनुसार, एक बार राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया था। Devshayani Ekadashi Vrat Katha यह देखकर इंद्र समेत अन्‍य देवी-देवता घबरा गए और भगवान विष्णु की शरण में पहुंच गए। देवताओं को परेशान देखकर भगवान विष्‍णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। राजा बलि ने वामन देवता से कहा कि जो मांगना चाहते हैं मांग लीजिए। इस पर वामन देवता ने भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली। पहले और दूसरे पग में वामन देवता ने धरती और आकाश और पूरा संसार को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची तो राजा बलि से वामन देवता ने पूछा कि तीसरा पग में कहां रखूं तब राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान विष्णु राजा बलि को देखकर काफी प्रसन्‍न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। बलि ने उनसे वरदान में पाताल लोक में बस जाने की बात कही। बलि की बात मानकर उनको पाताल में जाना पड़ा। ऐसा करने से समस्‍त देवता और मां लक्ष्‍मी परेशान हो गए। Devshayani Ekadashi Vrat Katha अपने पति विष्‍णुजी को वापस लाने के लिए मां लक्ष्‍मी गरीब स्‍त्री के भेष में राजा बलि के पास गईं और उन्‍हें अपना भाई बनाकर राखी बांध दी और उपहार के रूप में विष्‍णुजी को पाताल लोक से वापस ले जाने का वरदान ले लिया। माता लक्ष्‍मी के साथ वापस जाते हुए भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया की वह प्रत्‍येक वर्ष आषाढ़ शुक्‍ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक मास की एकादशी तक पाताल में ही निवास करेंगे और इन 4 महीने की अवधि को उनकी योगनिद्रा माना जाएगा। यही वजह है कि दीपावली पर मां लक्ष्‍मी की पूजा भगवान विष्‍णु के बिना ही की जाती है। भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी यह कथा:Lord Krishna told this story to Yudhishthir Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा का वर्णन खुद भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस वृतांत को धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था। कथाओं के अनुसार, सतयुग में मांधाता नाम का एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। एक बार उसके राज्य में तीन साल तक वर्षा नहीं हुई, जिसकी वजह से राज्य में भंयकर अकाल पड़ गया। अकाल की वजह से चारो ओर त्रासदी का माहौल बन गया। राज्य के लोगों के अंदर धार्मिक भावनाएं कम होने लगीं। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपना दर्द बताया, जिससे राजा भी चिंतित थे। राजा मांधाता को लगता था कि आखिर ऐसा कौन-सा पाप हो गया है, जिसकी सजा हमारे राज्य को ईश्वर दे रहा है। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए राजा अपनी सेना के साथ ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुंचे। Devshayani Ekadashi Vrat Katha ऋषिवर ने उनको यहां आने का कारण पूछा। तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि हे ऋषिवर, मैंने हमेशा से पूरा निष्ठा से धर्म का पालन किया है, फिर मेरे राज्य की ऐसी हालत क्यों है। कृपया करके मुझे इसका समाधान दें। अंगिरा ऋषि ने कहा कि यह सतयुग है, यहां छोटे से पाप का भी बड़ा दंड मिलता है। अंगिरा ऋषि ने राजा को आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने को कहा। महर्षि ने कहा कि इस व्रत का फल जरूर मिलेगा और इसके प्रभाव से तुम्हारा संकट से भी निकल आएगा। Devshayani Ekadashi Vrat Katha महर्षि अंगिरा के निर्देश का पालन करते हुए राजा अपनी राजधानी वापस आ गए और उन्होंने चारों वर्णों सहित देवशयनी एकादशी का व्रत पूरा किया, जिसके बाद राज्य में मूसलधार वर्षा हुई।

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Satyanarayan Vrat 2025 Dates:साल 2025 में कब-कब रखा जाएगा सत्यनारायण व्रत? जानें इस व्रत का महत्व और पूजा विधि

Satyanarayan Vrat Date 2025: सत्यनारायण भगवान का व्रत पूर्णिमा के दिन रखा जाता है। जनवरी से दिसंबर तक सत्यनारायण व्रत की तिथियां। साथ में जानेंगे कैसें करें सत्यनारायण पूजा (Satyanarayan puja) Satyanarayan Vrat 2025: भगवान सत्यनारायण श्री हरी विष्णु का ही रूप हैं। सत्यनारयण भगवान की पूजा कभी भी और किसी भी दिन कर सकते हैं। लेकिन पूर्णिमा के दिन सत्यनारयण भगवान का पूजन करना अति शुभ माना जाता है। लक्ष्मीपति श्री हरी विष्णु का यह रूप सत्य का अवतार माना गया है। भक्त इस दिन उपवास करते हैं और प्रातः काल व संध्याकाल में Satyanarayan Vrat सत्यनारयण भगवान की पूजा करते हैं। सत्यनारायण भगवान का पूजन करने से भगवान उनके समस्त कष्ट हर लेते हैं और उनको आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यहाँ जानेगे साल 2025 में सत्यनारयण भगवान पूजा की समस्त तिथियों के बारे में।  सत्यनारायण की कथा क्यों की जाती है, जानिए व्रत पूजा, महत्व और मंत्र पूर्णिमा व्रत कब है? | Purnima Vrat Puja Muhurat? सत्यनारायण व्रत कब है? – मंगलवार, 10 जून 2025 | ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा पूर्णिमा प्रारंभ – 10 जून 2025 11:35 AMपूर्णिमा समाप्त – 11 जून 2025 1:13 PMपूर्णिमा चन्द्रोदय – 6:45 PM Satyanarayan Vrat 2025 Dates:साल 2025 में श्री सत्यनारायण पूजा की डेट 13 जनवरी 2025, सोमवार (पौष, शुक्ल पूर्णिमा) 12 फरवरी 2025, बुधवार (माघ, शुक्ल पूर्णिमा) 13 मार्च 2025, बृहस्पतिवार (फाल्गुन, शुक्ल पूर्णिमा) 12 अप्रैल 2025, शनिवार (चैत्र, शुक्ल पूर्णिमा) 12 मई 2025, सोमवार (वैशाख, शुक्ल पूर्णिमा) 10 जून 2025, मंगलवार (ज्येष्ठ, शुक्ल पूर्णिमा) 10 जुलाई 2025, बृहस्पतिवार (आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा) 09 अगस्त 2025, शनिवार (श्रावण, शुक्ल पूर्णिमा) 07 सितम्बर 2025, रविवार (भाद्रपद, शुक्ल पूर्णिमा) 06 अक्टूबर 2025, सोमवार (आश्विन, शुक्ल पूर्णिमा) 05 नवम्बर 2025, बुधवार (कार्तिक, शुक्ल पूर्णिमा) 04 दिसम्बर 2025, बृहस्पतिवार (मार्गशीर्ष, शुक्ल पूर्णिमा) सत्यनारायण पूजा और व्रत का महत्व Importance of Satyanarayan Puja and fasting सत्यनारायण पूजा और व्रत का महत्व वैदिक ज्योतिष के अनुसार सत्यनारायण व्रत रखने से Satyanarayan Vrat भगवान विष्णु को स्वास्थ्य, समृद्धि, धन और वैभव की प्राप्ति होती है। साथ ही यह भी माना जाता है कि इस दिन व्रत करने और पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ सत्यनारायण कथा का पाठ करने से सभी संकट दूर हो जाते हैं। सत्यनारायण व्रत की पूजा विधि Satyanarayan Puja Vidhi Satyanarayan Vrat शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है Satyanarayan Vrat ऐसा माना जाता है। पूजा सुबह के साथ-साथ शाम को भी की जा सकती है और शाम को सत्यनारायण पूजा करना अधिक उपयुक्त माना जाता है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए।इसके बाद सत्यनारायण की मूर्ति को स्थापित करें और उसके चारों ओर केले के पत्ते बांध दें।पंचामृतम (दूध, शहद, घी/मक्खन, दही और चीनी का मिश्रण) का उपयोग देवता को साफ करने के लिए किया जाता है, Satyanarayan Vrat आमतौर पर शालिग्राम, जो महा विष्णु का दिव्य पत्थर है।चौकी पर जल से भरा कलश रखें और देसी घी का दीपक जलाएं।अब सत्यनारायण की पूजा और कथा करें।भुने हुए आटे में शक्कर मिलाकर भगवान को अर्पित करें।प्रसाद में तुलसी जरूर डालें।पूजा के बाद प्रसाद बांटें। पूजा एक आरती के साथ समाप्त होती है, जिसमें भगवान की छवि या देवता के चारों ओर कपूर से जलाई गई एक छोटी सी आग की परिक्रमा होती है। आरती के बाद व्रतियों को पंचामृत और प्रसाद ग्रहण करना होता है। Satyanarayan Vrat व्रती पंचामृत से व्रत तोड़ने के बाद प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं।

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Pradosh Vrat 2025 List:कब रखा जाएगा May का पहला प्रदोष व्रत, जानें तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त

Pradosh Vrat 2025 List:प्रदोष व्रत का फल दिन अनुसार प्राप्त होता है। सोमवार के दिन पड़ने के चलते यह सोम प्रदोष व्रत कहलाता है। वहीं मंगलवार के दिन पड़ने के चलते यह भौम प्रदोष व्रत कहलाता है। भौम प्रदोष व्रत करने से धन संबंधी परेशानी दूर हो जाती है। साथ ही मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इसके अलावा भगवान शिव का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। May Pradosh Vrat 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार हर माह के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर मई का पहला प्रदोष व्रत रखा जाएगा। इस बार यह तिथि शुक्रवार को पड़ रही है, जिसके कारण इसे शुक्र प्रदोष कहा जाएगा। प्रदोष व्रत में दिनभर उपवास रखा जाता है Pradosh Vrat 2025 List और शाम को भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से जीवन के सभी दोष समाप्त होते हैं और शिव जी की कृपा से इच्छाएं पूर्ण होती हैं। ऐसे में आइए जानते हैं मई का पहला प्रदोष व्रत किस दिन रखा जाएगा। प्रदोष व्रत 2025 तिथि pradosh vrat 2025 date दृक पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल त्रयोदशी तिथि का आरंभ 9 मई को दोपहर 2:56 बजे होगा और यह 10 मई शाम 5:29 बजे तक रहेगी। इस आधार पर व्रत 9 मई शुक्रवार के दिन रखा जाएगा। प्रदोष पूजा के लिए शुभ मुहूर्त Auspicious time for Pradosh Puja Pradosh Vrat 2025 List इस बार शुक्र प्रदोष व्रत पर वज्र योग और हस्त नक्षत्र का संयोग बन रहा है। Pradosh Vrat 2025 List इस दिन संध्या पूजा के लिए करीब दो घंटे से अधिक का शुभ समय रहेगा। इस दिन प्रदोष समय शाम 07:01 बजे से रात 09:08 बजे तक रहेगा, जिसकी अवधि 02 घण्टे 06 मिनट के लिए रहने वाली है। प्रदोष पूजा के लिए शुभ मुहूर्त इसे ही माना जाता है।  शाम को ही क्यों की जाती है प्रदोष व्रत की पूजा? Why is Pradosh Vrat worship done only in the evening? Pradosh Vrat 2025 List धार्मिक मान्यताओं के अनुसार त्रयोदशी तिथि को प्रदोष काल में (सूर्यास्त के बाद जब अंधेरा होने लगता है) भगवान शिव प्रसन्न होकर कैलाश पर नृत्य करते हैं। माना जाता है कि इस समय यदि आप भगवान शिव से जो भी मांगेंगे, वो जरूर मिलता है, इसलिए प्रदोष व्रत में शाम के समय ही पूजा की जाती है।  प्रदोष व्रत का महत्व Importance of Pradosh Vrat Pradosh Vrat 2025 List पौराणिक कथाओं के अनुसार क्षय रोग होने पर चंद्रदेव ने भगवान शिव की पूजा की थी और शिव जी की कृपा से उनके सभी दोष मिट गए थे। इसी तरह जो लोग प्रदोष व्रत रखते हैं, भगवान उनके सभी दुखों को दूर करते हैं। Pradosh Vrat 2025 List:प्रदोष व्रत लिस्ट 2025 शनिवार 11 जनवरी को शनि प्रदोष व्रत है। इस दिन पौष माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि है।  27 जनवरी को सोम प्रदोष व्रत है। इस दिन माघ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि है।  09 फरवरी को रवि प्रदोष व्रत है। इस दिन माघ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि है।  25 फरवरी को भौम प्रदोष व्रत है। इस दिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि है।  11 मार्च को भौम प्रदोष व्रत है। इस दिन फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है। 27 मार्च को गुरु प्रदोष व्रत है। इस दिन चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है। 10 अप्रैल को गुरु प्रदोष व्रत है। इस दिन चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है।  25 अप्रैल को शुक्र प्रदोष व्रत है। इस दिन वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है। 09 मई को शुक्र प्रदोष व्रत है। इस दिन वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है। 24 मई को शनि प्रदोष व्रत है। इस दिन ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है। 08 जून को रवि प्रदोष व्रत है। इस दिन ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है। सोमवार 23 जून को सोम प्रदोष है। Pradosh Vrat 2025 List इस दिन आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि है।  08 जुलाई को भौम प्रदोष व्रत है। इस दिन आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है। 22 जुलाई को भौम प्रदोष व्रत है। इस दिन सावन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है। 06 अगस्त को बुध प्रदोष व्रत है। इस दिन सावन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है। 20 अगस्त को बुध प्रदोष व्रत है। इस दिन भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है। 05 सितंबर को शुक्र प्रदोष व्रत है। इस दिन भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है। 19 सितंबर को शुक्र प्रदोष व्रत है। इस दिन अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है। 04 अक्टूबर को शनि प्रदोष व्रत है। इस दिन अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है। 18 अक्टूबर को शनि प्रदोष व्रत है। इस दिन कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है। 03 नवंबर को सोम प्रदोष व्रत है। इस दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है। 17 नवंबर को सोम प्रदोष व्रत है। इस दिन मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है। 02 दिसंबर को भौम प्रदोष व्रत है। इस दिन मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी है। 17 दिसंबर को भौम प्रदोष व्रत है। इस दिन पौष माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है।

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 Somvati Amavasya 2025 Date:वट सावित्री पर बना सोमवती अमावस्या का दुर्लभ संयोग, जानिए तिथि और शुभ मुहूर्त

Somvati Amavasya:हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व होता है। इस दिन सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन के लिए रखती हैं। आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत की तिथि, शुभ योग और शुभ मुहूर्त… Somvati Amavasya 2025 me Kab hai:धार्मिक दृष्टि से ज्येष्ठ माह (Jyeshtha Month 2025) का विशेष महत्व माना गया है। इस माह में बड़ा मंगल और निर्जला एकादशी जैसे पर्व आते हैं। इसी तरह ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि भी बहुत ही खास है। इस तिथि को आध्यात्मिक शुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए काफी शुभ माना गया है। इसी के साथ अमावस्या तिथि पितरों की कृपा प्राप्ति के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है।  Vat Savitri Vrat 2025 Date: हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि के दिन रखा जाता है। ये व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन के लिए रखती हैं। Somvati Amavasya इस दिन वट (बरगद) के पेड़ की पूजा की जाती है और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनने का खास महत्व होता है। लेकिन 2025 में वट सावित्री व्रत की तिथि को लेकर थोड़ा संशय बना हुआ है, क्योंकि इस साल अमावस्या दो दिन पर पड़ रही है। ऐसे में आइए जानते हैं इस साल कब रखा जाएगा वट सावित्री का व्रत। साथ ही, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और शुभ योग। वट सावित्री व्रत की तिथि:date of vat savitri fast पंचांग के अनुसार, 2025 में ज्येष्ठ अमावस्या 26 मई को दोपहर 12:12 बजे से शुरू होकर 27 मई की सुबह खत्म हो रही है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस दिन दोपहर के समय Somvati Amavasya अमावस्या हो, उसी दिन व्रत करना शुभ माना जाता है। इसलिए, इस साल वट सावित्री का व्रत 26 मई 2025 दिन सोमवार को रखा जाएगा। Somvati Amavasya:कब है ज्येष्ठ अमावस्या ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि 26 मई को दोपहर 12 बजकर 11 मिनट से शुरू हो रही है। वहीं इस तिथि का समापन 27 मई को सुबह 8 बजकर 31 मिनट पर होने जा रहा है। ऐसे में ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि सोमवार, 26 मई को मनाई जाएगी। सोमवार के दिन पड़ने के कारण इसे सोमवती अमावस्या भी कहा जाएगा, जो मुख्य रूप से भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए खास मानी गई है।  इस कार्यों से मिलते हैं शुभ परिणाम These actions yield auspicious results अमावस्या के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करने के बाद गरीबों और जरूरतमंद लोगों को दान-पुण्य करना बेहद शुभ माना जाता है। अगर आपके लिए ऐसा करना संभव नहीं है, तो आप घर पर पानी में गंगाजल मिलाकर भी स्नान कर सकते हैं। Somvati Amavasya इसके साथ ही पितरों के आशीर्वाद के लिए अमावस्या पर पिंड दान और श्राद्ध कर्म भी जरूर करना चाहिए। प्रसन्न होंगे पितृ Father will be happy सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ का पूजन करें और भी जरूर करें। पूजन के दौरान पीपल के पेड़ की सात बार परिक्रमा करनी चाहिए और पेड़ के नीचे सरसों के तेल में काले तिल डालकर दीपक जलाना चाहिए। इसी के साथ आपको सोमवती अमावस्या पर पितृ चालीसा (Somvati Amavasya 2025) का पाठ भी कर सकते हैं, जिससे पितरों का कृपा आपके ऊपर बनी रहे। करें इन चीजों का दान:Donate these things सोमवती अमावस्या (Somvati Amavasya Daan) के दिन दान का भी विशेष महत्व है। ऐसे में आप पितरों की कृपा प्राप्ति के लिए गरीबों व जरूरतमंद लोगों में अन्न, धन और वस्त्रों का दान कर सकते हैं। इसी के साथ इस दिन पर सफेद रंग की चीजें जैसे चावल, दही, मिश्री, खीर और सफेद कपड़ों का दान किया जा सकता है। इससे आपको महादेव की कृपा प्राप्ति हो सकती है। 

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Krishna Janmashtami 2025: साल 2025 में कब-कब रखा जाएगा मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत? यहां देखें पूरी लिस्ट

Krishna Janmashtami 2025:भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रप्रद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। हिंदू धर्म में इस दिन को हर साल श्री कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। बाल गोपाल के भक्त भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव बहुत धूमधाम से मनाते हैं। भगवान कृष्ण की पूजा के लिए हर महीने मासिक कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। हिंदू धर्म में भगवान श्री कृष्ण की पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। Krishna Janmashtami 2025 मासिक जन्माष्टमी हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल की साधना या व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और संतान सुख की प्राप्ति होती है। जिन लोगों को संतान प्राप्ति में दिक्कतें आती हैं, अगर वे इस दिन लड्डू गोपाल की पूजा करें तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है। Krishna Janmashtami 2025:मासिक जन्माष्टमी व्रत का महत्व हिंदू धर्म ग्रंथों में भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव पर रखे जाने वाले व्रत की अपार महिमा बताई गई है, जिसे विधि-विधान से करने पर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं जल्द ही पूरी हो जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि Krishna Janmashtami 2025 जन्माष्टमी का व्रत करने से व्यक्ति के जीवन से जुड़ी सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं और उसे जीवन से जुड़ी सभी खुशियां मिलती हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार यह व्रत व्यक्ति को अकाल मृत्यु और पाप कर्मों से बचाकर मोक्ष प्रदान करता है। हिंदू धर्म में जन्माष्टमी के व्रत का बहुत ही विशेष महत्व माना जाता है। जन्माष्टमी का व्रत एक हजार एकादशियों के व्रत के बराबर है। इस दिन कृष्ण भक्त पूजा-अर्चना के साथ-साथ पूरे दिन व्रत रखते हैं और रात 12 बजे भगवान के जन्म के बाद व्रत समाप्त करते हैं। Masik Krishna Janmashtami 2025 List: हिंदू धर्म में मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का दिन बहुत ही विशेष और पवित्र माना जाता है. ये दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु के द्वापर युग के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित किया गया है. Krishna Janmashtami 2025 मासिक कृष्ण जन्माष्टमी को कृष्ण के श्री जन्मदिन के रूप में मनाने की मान्यता है. हर महीने होती है मासिक जन्माष्टमी हर महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक जन्माष्टमी मनाई जाती है. Masik Krishna Janmashtami 2025 मासिक जन्माष्टमी पर व्रत भी रखा जाता है. हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूजन और व्रत करने वालों के घर में सुख-शांति और ससृद्धि का वास सदा बना रहता है. ऐसे में आइएं जानते हैं कि इस साल मासिक जन्माष्टमी का व्रत कब-कब है. Krishna Janmashtami 2025 list:मासिक जन्माष्टमी 2025 लिस्ट Magh Masik Krishna Janmashtami 2025: कब है साल की पहली मासिक कृष्ण जन्माष्टमी? जानें तिथि और शुभ मुहूर्त Krishna Janmashtami 2025 Puja vidhi:मासिक जन्माष्टमी पूजा विधि मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लेना चाहिए. इसके बाद भगवान कृष्ण का ध्यान करके व्रत का संकल्प करना चाहिए. इस दिन लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान करवाना चाहिए. इसके बाद उन्हें पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करवाना चाहिए. फिर उन्हें कपड़े पहनाने चाहिए. उनका श्रृंगार करना चाहिए. फिर भगवान को माखन मिश्री का भोग लगाना चाहिए. उनके भोग में तुलसी भी अववश्य डालनी चाहिए. उनके सामने घी का दिया प्रज्वलित करना चाहिए. श्री कृष्ण के मंत्रों का जाप करना चाहिए. अंत में उनकी आरती करके पूजा संपन्न करनी चाहिए. मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर जो भी व्रत और पूजन करता है उसे यश, कीर्ति, धन और वैभव प्राप्त होता है. साथ ही इस दिन व्रत और भगवान श्री कृष्ण के पूजन से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. Krishna Janmashtami bhog ke uppay:भोग के उपाय मासिक जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण का आशीर्वाद पाना है तो गाय को चारा खिलाने का आसान उपाय करें. मासिक जन्माष्टमी पर अगर श्रीकृष्ण को भोग के रूप में लड्डू, माखन, मिश्री अर्पित करें तो व मोर पंख चढ़ाएं तो घर में खुशहाली आएगी.  मासिक जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को तुलसी दल और खीर का भोग अर्पित करने से घर की समृद्धि बढ़ती है.  श्री कृष्ण की कृपा पाने के लिए मासिक जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल की सेवा करें. अच्छे अच्छे भोग अर्पित करें. Masik Krishna Janmashtami 2025:मासिक जन्माष्टमी पर गुप्त रूप से करें ये उपाय, श्रीकृष्ण देंगे अपार कृपा और समृद्धि !  संतान के लिए उपाय  मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर अगर श्रीकृष्ण को मोर पंख अर्पित करें को घर में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है. संतान पक्ष की समस्याएं दूर होती है.  मासिक जन्माष्टमी पर संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ करना अति शुभ होता है. इस उपाय को करने से संतान रोग दोष से दूर रहती है.

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Mahalaxmi Vrat Katha: महालक्ष्मी व्रत के दिन जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, बनी रहेगी मां लक्ष्मी की कृपा दृष्टि

Mahalaxmi Vrat Katha:महालक्ष्मी व्रत की शुरूआत राधा अष्टमी से शुरू होता है और 16वें दिन इस व्रत का समापन किया जाता है। इस दिन महालक्ष्मी व्रत कथा का पाठ करने से भक्तों पर मां की कृपा दृष्टि बनी रहती है। महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के साथ शुरू हो जाता है। इस दिन राधारानी के जन्मदिन के रूप में राधा अष्टमी का पर्व भी मनाया जाता है। Mahalaxmi Vrat Katha आज के दिन विधिपूर्वक और श्रद्धा से महालक्ष्मी व्रत रखा जाता है। इससे देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और भक्तों पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती हैं। पूजा-अर्चना के साथ ही इस दिन महालक्ष्मी व्रत कथा का भी पाठ करना चाहिए। तो आइए पढ़ते हैं महालक्ष्मी व्रत कथा……. Mahalaxmi Vrat Katha:महालक्ष्मी व्रत कथा प्राचीन काल की बात है, एक गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण नियमानुसार भगवान विष्णु का पूजन प्रतिदिन करता था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिये और इच्छा अनुसार वरदान देने का वचन दिया। ब्राह्मण ने माता लक्ष्मी का वास अपने घर मे होने का वरदान मांगा। ब्राह्मण के ऐसा कहने पर भगवान विष्णु ने कहा यहाँ मंदिर मैं प्रतिदिन एक स्त्री आती है और वह यहाँ गोबर के उपले थापति है। वही माता लक्ष्मी हैं, Mahalaxmi Vrat Katha तुम उन्हें अपने घर में आमंत्रित करो। देवी लक्ष्मी के चरण तुम्हारे घर में पड़ने से तुम्हारा घर धन-धान्य से भर जाएगा। Laxmi Mata Aarti:लक्ष्मीजी आरती ऐसा कहकर भगवान विष्णु अदृश्य हो गए। अब दूसरे दिन सुबह से ही ब्राह्मण देवी लक्ष्मी के इंतजार मे मंदिर के सामने बैठ गया। जब उसने लक्ष्मी जी को गोबर के उपले थापते हुये देखा, तो उसने उन्हे अपने घर पधारने का आग्रह किया। ब्राह्मण की बात सुनकर लक्ष्मी जी समझ गयीं कि यह बात ब्राह्मण को विष्णुजी ने ही कही है। तो उन्होने ब्राह्मण को महालक्ष्मी व्रत करने की सलाह दी। लक्ष्मी जी ने ब्राह्मण से कहा कि तुम 16 दिनों तक महालक्ष्मी व्रत करो और व्रत के आखिरी दिन चंद्रमा का पूजन करके अर्ध्य देने से तुम्हारा व्रत पूर्ण होजाएगा। ब्राह्मण ने भी महालक्ष्मी के कहे अनुसार व्रत किया और देवी लक्ष्मी ने भी उसकी मनोकामना पूर्ण की। उसी दिन से यह व्रत श्रद्धा से किया जाता है। शुक्रवार के ये उपाय बदल देंगे आपकी किस्मत! घर में दौड़ी आएंगी मां लक्ष्मी Mahalaxmi Vrat Katha:द्वतीय कथा एक बार महाभारत काल में हस्तिनापुर शहर में महालक्ष्मी व्रत के दिन महारानी गांधारी ने नगर की सारी स्त्रियों को पूजन के लिए आमंत्रित किया, परंतु उन्होने कुंती को आमंत्रण नहीं दिया। गांधारी के सभी पुत्रों ने पूजन के लिए अपनी माता को मिट्टी लाकर दी और इसी मिट्टी से एक विशाल हाथी का निर्माण किया गया और उसे महल के बीच मे स्थापित किया गया। Laxmi prapti upay : रूठी लक्ष्मी को मनाकर घर कैसे लाऐं, लक्ष्मी आओ हमारे द्वार, दूर करो दरिद्रता, भर दो घर को धन-धान्य से नगर की सारी स्त्रियाँ जब पूजन के लिए जाने लगी, तो कुंती उदास हो गयीं। Mahalaxmi Vrat Katha जब कुंती के पुत्रों ने उनकी उदासी का कारण पूछा तो उसने सारी बात बताई। इस पर अर्जुन ने कहा माता आप पूजन की तैयारी कीजिये मैं आपके लिए हाथी लेकर आता हूँ। ऐसा कहकर अर्जुन इन्द्र देव के पास गये और अपनी माता के पूजन के लिए ऐरावत को ले आए। इसके पश्चात कुंती ने सारे विधि-विधान से पूजन किया। जब नगर की अन्य स्त्रियों को पता चला, कि कुंती के यहाँ इन्द्र देव की सारी ऐरावत आया है। Mahalaxmi Vrat Katha तो वे भी पूजन के लिए उमड़ पड़ी और सभी ने सविधि पूजन सम्पन्न किया। Diwali 2025 Date: दिवाली 2025 में कब है ? अभी से जान लें डेट, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त दीपावली पर धन प्राप्ति के लिए माँ लक्ष्मी के शक्तिशाली मंत्र – DIWALI MANTRA

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