RAMAYANA

सुग्रीव-बाली का युद्ध |श्रीराम के द्वारा बाली का वध | Sugreev Bali Fight, Death Of Bali in Hindi

Sugreev Bali Fight सुग्रीव-बाली का युद्ध रामायण के अनुसार, Sugreev सुग्रीव और बाली दो वानर राजा थे जो कि किष्किंधा के शासक थे। Sugreev Bali सुग्रीव बाली के छोटे भाई थे, लेकिन बाली ने अपने बल और पराक्रम के बल पर सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया था। सुग्रीव को वन में भागना पड़ा और वह अपने मित्रों के साथ रह रहा था। एक दिन, सुग्रीव के पास श्री राम और लक्ष्मण आते हैं। श्री राम माता सीता की खोज में थे और उन्हें सुग्रीव के बारे में पता चला था। सुग्रीव श्री राम से मदद मांगता है और श्री राम उसे वादा करते हैं कि वे उसे उसका राज्य वापस दिलाएंगे। श्री राम और लक्ष्मण सुग्रीव के साथ किष्किंधा जाते हैं। सुग्रीव बाली को युद्ध के लिए ललकारता है। बाली सुग्रीव को युद्ध के लिए तैयार देखकर प्रसन्न होता है। दोनों भाई युद्ध के मैदान में उतरते हैं और एक-दूसरे पर प्रहार करने लगते हैं। बाली अत्यंत बलशाली था और सुग्रीव उससे हार जाता है। सुग्रीव भाग जाता है और बाली उसे पराजित मान लेता है। श्री राम जानते हैं कि बाली को सीधे तौर पर मारना संभव नहीं है, क्योंकि बाली को ब्रह्मा जी का वरदान प्राप्त था कि जो भी उसके सामने युद्ध करे, उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाएगी। इसलिए श्री राम बाली को छिपकर मारने की योजना बनाते हैं। श्री राम सुग्रीव को फिर से बाली से युद्ध करने के लिए कहते हैं। इस बार सुग्रीव के गले में एक माला डाली जाती है ताकि श्री राम उसे पहचान सकें। सुग्रीव और बाली फिर से युद्ध के मैदान में उतरते हैं। बाली सुग्रीव पर प्रहार करता है, लेकिन सुग्रीव बच जाता है। सुग्रीव भी बाली पर प्रहार करता है। इस बार श्री राम बाली के पीछे से निकलकर उस पर बाण चलाते हैं। बाली बाण लगने से घायल हो जाता है और गिर जाता है। बाली मरने से पहले श्री राम से पूछता है कि उन्होंने उसे छिपकर क्यों मारा। श्री राम बाली को उसकी गलतियों का एहसास कराते हैं और उसे बताते हैं कि उन्होंने उसके साथ न्याय किया है। बाली की मृत्यु के बाद सुग्रीव किष्किंधा का राजा बनता है। वह श्री राम और लक्ष्मण का आभार मानता है और उन्हें अपना मित्र बनाता है। युद्ध का परिणाम सुग्रीव-बाली का युद्ध रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस युद्ध के परिणामस्वरूप सुग्रीव को उसका राज्य वापस मिलता है और बाली का वध होता है। इस युद्ध से यह भी पता चलता है कि कर्म का नियम सदा ही लागू रहता है। बाली ने अपने भाई सुग्रीव के साथ अधर्म किया था और उसके लिए उसे मृत्यु का दंड मिला। युद्ध का महत्व सुग्रीव-बाली का युद्ध कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह युद्ध न्याय, कर्म और अधर्म के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक है। यह युद्ध हमें यह भी सिखाता है कि यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं और अधर्म का विरोध करते हैं, तो हम सफलता प्राप्त कर सकते हैं। श्रीराम के द्वारा बाली का वध  कुछ ही समय बाद सुग्रीव बाली के दरबार पर जाकर उसे फिर से ललकारने लगता है। सुग्रीव की ललकार सुनकर वाली आग बबूला होकर निकलता है और बोलता है आज तुझे मेरे हाथों से कोई नहीं बचा सकता। दोनों में फिर से युद्ध शुरू हो जाता है। जैसा कि विदित है कि बाली बलाबल में सुग्रीव से कहीं अधिक था इसलिए वह फिर सुग्रीव पर भारी पड़ने लगता है। जब बाली अपने गधा के प्रहार से सुग्रीव का अंत करने ही वाला था कि श्री राम अपना बाण बाली  पर चला देते हैं। बाण लगते हैं बाली वहीं पर गिर जाता है और चिल्लाने लगता है कि मेरे साथ छल  हुआ है। कौन है वह कायर जिसने छुपकर यह पाप किया है मेरे सामने आए। तब श्री राम लक्ष्मण वाली के सामने जाते हैं जिन्हें देखकर बाली उनसे शिकायत करता है कि तुमने छुपकर मुझ पर बाण चलाया हैं तुमने मेरे साथ अन्याय किया है। तब बाली को समझाते हुए श्री राम कहते हैं कि तुमने अपने छोटे भाई को अपने राज्य से निकालकर और उसकी पत्नी को अपने अधीन करके  सबसे बड़ा महा पाप किया है क्योंकि छोटे भाई की पत्नी पुत्री के समान होती है और आज तुम हमें धर्माधर्म का पाठ पढ़ा रहे हो। सुग्रीव मेरा मित्र है और अपने मित्र की रक्षा के लिए यदि मुझे पाप कर्म करके नरक भी भोगना पड़े तो मैं इसके लिए तैयार हूं। बहुत समय तक समझाने के बाद बाली को श्रीराम की महिमा समझ में आ जाती है और वह अपने पुत्र अंगद को श्रीराम की सेवा में समर्पित करके प्राण त्याग देता है। 

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राम हनुमत मिलन । राम सुग्रीव की मित्रता | Ram Sugreev mitrata Story In Hindi

Ram Hanuman ka Milan राम हनुमत मिलन रामायण महाकाव्य का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जिसमें राम और हनुमान का मिलन होता है। यह मिलन राम की सीता की खोज में एक महत्वपूर्ण मोड़ होता है। Hanuman or Ram ka Milan हनुमान का राम से मिलन राम Ram और लक्ष्मण सीता की खोज में ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे थे। वहां, उन्होंने एक गुफा में एक व्यक्ति को देखा। वह व्यक्ति हनुमान था। हनुमान ने राम और लक्ष्मण को देखा और उन्हें पहचान लिया। हनुमान ने राम और लक्ष्मण को प्रणाम किया और कहा, “हे राम! मैं आपका बहुत बड़ा भक्त हूं। मैंने आपकी बहुत कठिन तपस्या की है। मैं आपको देखने के लिए बहुत उत्सुक था।” राम ने हनुमान को देखा और कहा, “हे हनुमान! तुम एक महान भक्त हो। तुमने मेरी बहुत कठिन तपस्या की है। तुम हमारे लिए बहुत ही भाग्यशाली हो।” Ram राम और हनुमान बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने एक-दूसरे से बहुत सारी बातें कीं। हनुमान ने राम को सीता के बारे में बताया। उसने उन्हें बताया कि सीता लंका में रावण के पास है। Ram Hanuman Milan mahatv राम हनुमत मिलन का महत्व राम हनुमत मिलन एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जो राम और हनुमान के बीच के अनन्य संबंध को दर्शाता है। यह प्रसंग हमें यह भी सिखाता है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। राम हनुमत मिलन में, हनुमान ने राम की मदद करने का संकल्प लिया। उन्होंने राम को सीता को लंका से बचाने में मदद की। हनुमान की मदद से राम ने सीता को लंका से मुक्त कराया। राम हनुमत मिलन का हमारे जीवन में भी बहुत महत्व है। हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। हमें अपने जीवन में हनुमान की तरह दूसरों की मदद करने का संकल्प लेना चाहिए। राम हनुमत मिलन की प्रमुख बातें राम हनुमत मिलन एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जो राम और हनुमान के बीच के अनन्य संबंध को दर्शाता है। राम हनुमत मिलन हमें यह भी सिखाता है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। राम हनुमत मिलन का हमारे जीवन में भी बहुत महत्व है। हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। Ram Sugreev mitrata राम सुग्रीव की मित्रता रामायण महाकाव्य का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जिसमें राम और सुग्रीव की मित्रता होती है। यह मित्रता राम की सीता की खोज में एक महत्वपूर्ण मोड़ होता है। Ram Sugreev mitrata सुग्रीव की राम से मित्रता राम और लक्ष्मण सीता की खोज में किष्किन्धा पहुंचे थे। वहां, उन्होंने एक वानरराज सुग्रीव से मुलाकात की। सुग्रीव ने राम और लक्ष्मण को बताया कि उसका भाई बाली ने उसका राज्य छीन लिया है और उसकी पत्नी रुमा को भी ले गया है। राम ने सुग्रीव की मदद करने का संकल्प लिया। उन्होंने बाली से युद्ध करके उसे पराजित किया और सुग्रीव को उसका राज्य वापस दिलाया। राम और सुग्रीव की मित्रता एक सच्ची मित्रता थी। दोनों ने एक-दूसरे की मदद की और एक-दूसरे के दुख-सुख में साथ रहे। Ram Sugreev mitrata ka mahatv राम सुग्रीव मित्रता का महत्व राम सुग्रीव मित्रता एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जो राम और सुग्रीव के बीच के अनन्य संबंध को दर्शाता है। यह प्रसंग हमें यह भी सिखाता है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। राम सुग्रीव मित्रता का हमारे जीवन में भी बहुत महत्व है। हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। हमें अपने जीवन में राम और सुग्रीव की तरह दूसरों की मदद करने का संकल्प लेना चाहिए। राम सुग्रीव मित्रता की प्रमुख बातें राम सुग्रीव मित्रता एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जो राम और सुग्रीव के बीच के अनन्य संबंध को दर्शाता है। राम सुग्रीव मित्रता हमें यह भी सिखाता है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। राम सुग्रीव मित्रता का हमारे जीवन में भी बहुत महत्व है।

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राम जटायु संवाद तथा शबरी के बेर | Shabri Ramayan In Hindi

सीता की खोज तथा राम जटायु संवाद  सीता की खोज Sita सीता का हरण होते ही, राम और लक्ष्मण बहुत दुखी हुए। उन्होंने सीता को खोजने का संकल्प लिया। वे वन में सीता की खोज करने लगे। एक दिन, वे एक घने जंगल में पहुंचे। वहां, उन्होंने एक घायल पक्षी देखा। पक्षी का नाम जटायु था। जटायु ने राम और लक्ष्मण को बताया कि उसने रावण को सीता का हरण करते हुए देखा था। राम और लक्ष्मण जटायु से सीता के बारे में और पूछने लगे। जटायु ने उन्हें बताया कि रावण ने सीता को लंका ले गया है। वह सीता को लंका के अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा है। राम और लक्ष्मण को जटायु की बातों से बहुत दुख हुआ। उन्होंने जटायु को धन्यवाद दिया और उसे मरने से बचा लिया। राम और लक्ष्मण सीता की खोज में आगे बढ़ गए। वे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे। वहां, उन्होंने शबरी नाम की एक भीलनी से मुलाकात की। शबरी ने उन्हें सीता के बारे में कुछ और जानकारी दी। शबरी ने उन्हें बताया कि सीता ने उसे एक बार देखा था। सीता ने उसे बताया था कि वह रावण द्वारा लंका ले जाई जा रही है। राम और लक्ष्मण को शबरी की बातों से भी कुछ और जानकारी मिली। वे सीता की खोज में आगे बढ़ते रहे। राम जटायु संवाद Sita सीता की खोज में राम और लक्ष्मण जब जटायु से मिले, तो उन्होंने उससे सीता के बारे में पूछा। जटायु ने उन्हें बताया कि उसने रावण को सीता का हरण करते हुए देखा था। राम ने जटायु से कहा, “हे पक्षिराज! तुमने सीता का हरण करते हुए रावण को देखा? तुमने उसे लंका ले जाते हुए देखा?” जटायु ने कहा, “हां, मैंने रावण को सीता का हरण करते हुए देखा था। मैंने उसे लंका ले जाते हुए भी देखा था।” राम ने कहा, “हे पक्षिराज! तुमने सीता को कैसे बचाया?” Jatau जटायु ने कहा, “मैंने रावण से सीता को छोड़ने के लिए कहा, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी। उसने मेरे पंख काट दिए और मुझे घायल कर दिया।” राम ने कहा, “हे पक्षिराज! तुमने हमारे लिए बहुत बड़ा उपकार किया है। तुमने सीता को बचाने की कोशिश की। हम तुम्हें कभी नहीं भूलेंगे।” जटायु ने कहा, “मैंने सीता को बचाने की कोशिश की, लेकिन मैं असफल रहा। मैं सीता को नहीं बचा सका।” राम ने कहा, “हे पक्षिराज! तुमने सीता को बचाने की कोशिश की, यह ही सबसे बड़ी बात है। तुमने सीता की रक्षा के लिए अपना प्राण तक दे दिया। हम तुम्हारी वीरता को कभी नहीं भूलेंगे।” राम और लक्ष्मण ने जटायु को धन्यवाद दिया और उसे मरने से बचा लिया। जटायु मरते-मरते भी राम और लक्ष्मण को सीता की खोज में सफल होने का आशीर्वाद दे गया। राम तथा गन्धर्व संवाद Shree ram श्रीराम एक पुत्र की तरह जटायु का अंतिम संस्कार करते है तथा सीता की खोज में दक्षिण की तरफ चल देते है। बहुत समय तक वन में भटकते हुए उनपर एक लंबी भुजाओं वाला राक्षस आक्रमण करता है। लक्ष्मण अपनी तलवार से उस राक्षस की दोनो भुजाए काट देते है । तब वह राक्षस श्रीराम को बताता है कि वह एक गंधर्व है और ऋषि के शाप के कारण ऐसा बन गया है यदि कृपया करके आप मेरे पूरे शरीर का अंतिम संस्कार करेंगे तो मैं श्राप से मुक्त हो जाऊंगा। तब मैं आपकी पत्नी सीता तक पहुंचने में आपकी सहायता करूंगा। तब श्रीराम लक्षमण से लकड़ियां एकत्रित करने के लिए कहते है और उस विशाल राक्षस का पुरे शरीर के  साथ अंतिम संस्कार करते है।  अंतिम संस्कार करने के बाद वह राक्षस एक रूपवान गंधर्व बन जाता है और श्रीराम को बताता है कि आपकी पत्नी को लंका का राजा रावण हरण करके ले गया है। मैं अपने दिव्य ज्ञान से यह देख सकता हु की आपकी मित्रता वानर राज सुग्रीव से होगी जिसकी सहायता से आप अपने कार्य में सफल होंगे तथा रावण पर विजय प्राप्त करेंगे । सुग्रीव से मिलने के लिए आप पहले माता शबरी से मिलेंगे जोकि परम तपस्विनी है और महर्षि मतंग मुनि की शिष्या है।  वह आपकी भक्ति कर रही है। इसलिए आप अभी पंपासरोवर के पास स्थित मतंग मुनि के आश्रम में जाइए जहां पर आपको माता शबरी मिलेंगी। राम-लक्षमण की माता शबरी से भेंट  उसके बाद श्री राम और लक्ष्मण पंपा सरोवर की तरफ चल देते हैं जहां पर उन्हें एक वृद्ध भीलनी मिलती है जोकि रास्ते पर फूल बिछा रही होती है। वह वृद्ध भीलनी परम तपस्विनी माता शबरी थी जोकी अपने भगवान श्री राम के आने के लिए कुटिया के रास्ते पर हर दिन फूल बिछाती थी ताकि जब श्री राम आए तो उनके पैर में कोई कांटा ना लगे। जब श्री राम और लक्ष्मण की कुटिया में पहुंचते हैं तो उनका परिचय पाकर माता शबरी खुशी से रोने लगती हैं तथा श्री राम और लक्ष्मण का स्वागत करती है वह उन्हें बताती हैं कि उनके गुरु श्री मतंग मुनि जी अब नहीं रहे लेकिन उन्होंने ही मुझे बताया था कि भविष्य में श्रीराम अपनी पत्नी सीता को खोजते हुए हमारे आश्रम में आएंगे और तुम उन्हें सुग्रीव तक जाने का मार्ग बता देना जिनकी सहायता से वह रावण पर विजय प्राप्त करके अपनी पत्नी सीता को पा सकेंगे।  (Shabri )शबरी के बेर  Mata माता शबरी Shabri श्री राम और लक्ष्मण को भोजन के रूप में अपने द्वारा लाए गए बेर देती है। शबरी श्रीराम के लिए आश्रम के वृक्षों से प्रतिदिन बेर चख चख कर अपनी टोकरी में रखती ताकि श्रीराम के लिए केवल मीठे बेर ला सके। शबरी द्वारा चख कर  इकट्ठे किए हुए  बेर भी श्री राम बड़े आदर भाव से खाते हैं क्योंकि वह जानते थे कि वह बेर झूठे होते हुए भी स्नेह और भक्ति भाव से परिपूर्ण है। शबरी मतंग मुनि के बाद केवल इसीलए रही की वह श्री राम के दर्शन करना चाहती थी। अतः श्री राम से मिलन के मिलने के पश्चात शबरी उनको बताती है कि पंपा सरोवर के दक्षिण तट की तरफ ऋषि मुख पर्वत है जिसके शिखर पर  वानर राज सुग्रीव अपने चार मंत्रियों के साथ वास करते हैं और

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सीता हरण और रावण जटायु का युद्ध | Sita haran Story in Hindi

Sita haran सीता हरण रामायण महाकाव्य का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। इसमें रावण, लंका का राजा, सीता, राम की पत्नी का हरण करता है। रावण की योजना रावण, सीता की सुंदरता से मोहित हो गया था। वह उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता था। उसने अपनी बहन शूर्पणखा को सीता को लुभाने के लिए भेजा। शूर्पणखा ने सीता को प्रपोज किया, लेकिन सीता Sita ने उसे अपमानित कर दिया। शूर्पणखा ने रावण को यह बात बताई, तो रावण ने सीता का हरण करने की योजना बनाई। स्वर्ण मृग (हिरन) तब लंकापति रावण मारीच को कहते हैं कि तुम एक अद्भुत स्वर्ण मृग (हिरण) का रूप धारण करो जिसके सींग सोने के हों तथा जिसकी चमड़ी सुनहरे रंग की हो। ऐसे अद्भुत हिरण को देखकर सीता अवश्य ही उसकी मांग करेगी और राम लक्ष्मण को उसका शिकार करने के लिए बोलेगी। जब राम लक्ष्मण उस सुनहरे मृग (हिरण) के पीछे पीछे जाएंगे तब मैं सीता का हरण कर लूंगा। रावण की बात मानकर मारीच एक अद्भुत सुनहरे हिरण का रूप धारण करके श्री राम लक्ष्मण की कुटिया की तरफ जाकर विचरण करने लगता है। सीता जी की नजर जब उस हिरण पर पड़ती है तो वह उस स्वर्ण मृग के सुंदर रूप को देखकर मोहित हो जाती है । कुटिया में आकर वह श्री राम लक्ष्मण को उस स्वर्ण मृग के बारे में बताती हैं और इच्छा जाहिर करती हैं कि वह मृग उन्हे चाहिए। सीता Sita के इच्छा का मान रखते हुए श्री राम लक्ष्मण को वहीं छोड़कर हिरन रूपी मारीच के पीछे धनुष बाण लेकर चल पड़ते हैं। श्री राम को अपनी ओर आता देख कर योजना के अनुसार मृग के वेश में मारीच कुटिया से दूर भाग जाता है जिसके पीछे श्रीराम भी चले जाते हैं। कुछ समय तक स्वर्ण मृग के पीछे भागते हुए श्रीरम उस पर बाण चला देते हैं।  बाण लगते ही मारीच श्रीराम के जैसे स्वर में चिल्लाने लगता है हे सीते हे लक्ष्मण, हे सीते हे लक्ष्मण। श्री राम जैस स्वर में अपना और लक्ष्मण का नाम सुनकर सीता जी को यही लगता है कि श्रीराम पर कोई संकट आ गया है और वह मदद के लिए लक्ष्मण तथा उन्हें पुकार रहे हैं। इसलिए सीता जी लक्ष्मण को तुरंत अपने भैया की सहायता के लिए जाने को कहती लेकिन लक्ष्मण उनकी बात मानने से मना कर देते हैं। क्योंकि लक्ष्मण जी को पता था की श्रीराम का कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता यह किसी असुर की चाल हो सकती है। लेकिन अपने पति के  ऐसे स्वर  सुनने के बाद सीता जी को शांति नहीं हो रही थी और वह लक्ष्मण को बार-बार जाने के लिए कहती है। जब लक्ष्मण  नहीं मानते तो वह उन्हें अपशब्द कहने लगती हैं।  लक्ष्मण रेखा  अंत में लक्ष्मण जी के पास कोई और रास्ता नहीं होता इसलिए वह सीता जी की सुरक्षा के लिए कुटिया के दहलीज के पास एक रेखा खींच देते है और बोलते हैं कि जो भी इस रेखा को पार करने की कोशिश करेगा वह जलकर भस्म हो जाएगा। अंत में लक्ष्मण जाते-जाते माता सीता से कहते हैं कि आप कितनी भी विकट परिस्थिति में इस रेखा को पार नहीं करेंगी। और कोई भी असुर, देव या जीव इस लक्ष्मण रेखा को पार नहीं कर पाएगा। कहकर लक्ष्मण कुटिया से चले जाते है।  लक्ष्मी जी के जाते ही कुटिया के आस पास झाड़ियों में छुपा हुआ रावण बाहर निकलता है और कुटिया के अंदर जाने की कोशिश करता है। लेकिन जैसे ही रावण लक्ष्मण द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा पर पैर रखता है तो उसके पैर जल जाते हैं। बार-बार प्रयत्न करने के बाद भी जब रावण कुटिया में प्रवेश नहीं कर पाया तो उसने दूसरी योजना सोची। तब रावण एक साधु का वेश धारण करके कुटिया के बाहर अलख जगाता है। कुटिया के बाहर आए किसी साधु की आवाज सुनकर माता सीता कुटिया से बाहर आती है तो देखती हैं एक साधु उनके दरवाजे पर भिक्षा मांग रहा है। भिक्षा लेकर सीता कुटिया से बाहर आती  हैं और लक्ष्मण रेखा के पास आकर खड़ी हो जाती और रावण (साधु) को बोलती है कि वह आकर  भिक्षा ले ले। क्योंकि वह इस रेखा से बाहर नहीं आ सकती। इस पर साधु के भेष में रावण बोलता है कि तु शायद हमें नहीं जानती हैं, हम परम तपस्वी साधु हैं यदि तुम बाहर भिक्षा लेकर नहीं आई तो मैं तुम्हारे पति को श्राप दे दूंगा।  Sita haran सीता हरण एक दिन, रावण ने अपने मामा मारीच को सोने का हिरण बनकर सीता को लुभाने के लिए भेजा। सीता को हिरण बहुत सुंदर लगा और वह उसे पकड़ने के लिए राम से कहती है। राम हिरण को पकड़ने के लिए जाते हैं और मारीच को मार देते हैं। मरते समय, मारीच राम की आवाज में सीता और लक्ष्मण को पुकारता है। सीता को लगता है कि यह राम की आवाज है और वह लक्ष्मण से कहती है कि वह राम की मदद करे। लक्ष्मण कुटिया के चारों ओर लक्ष्मण रेखा खींच देते हैं और सीता को उस रेखा को पार करने से मना करते हैं। लक्ष्मण की बात मानकर सीता कुटिया में ही रहती है। तभी रावण साधु का वेश धारण करके आता है और सीता से भिक्षा मांगता है। सीता रावण को भिक्षा देती है। भिक्षा लेने के बाद, रावण सीता से कुटिया से बाहर आने के लिए कहता है। सीता रावण की बात मानकर कुटिया से बाहर आती है। रावण उसी समय सीता का हरण कर लेता है। रावण और जटायु का युद्ध  जब रावण सीता को पुष्पक विमान में ले जा रहा था तब सीता की मदद की गुहार वहां पर बैठे जटायु नाम के गिद्ध ने सुनी और वह सीता की सहायता करने के लिए रावण से युद्ध करने लगता है। बहुत समय तक रावण से लड़ते हुए रावण अपनी चंद्रहास खड़ग (तलवार) से जटायु का एक पंख काट देता है जिससे वह लुढ़कता  हुआ जमीन पर आकर गिरता है और दर्द से कराहने लगता है।  जब कुछ भी ना हो पाया तो सीता जी अपने पल्लू का एक टुकड़ा फाड़ कर अपने सारे जेवर उसमें बांधकर नीचे ऋषिमुख पर्वत पर फेंक देती

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सूर्पनखा की नाक कटना तथा खर-दूषण का वध (रामायण)। Khar Dushan Vadh Story in Hindi (Ramayan)

Ramayan रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है खर-दूषण का वध। यह घटना राम, सीता और लक्ष्मण के वनवास के दौरान हुई थी। घटना का कारण रावण की बहन शूर्पणखा ने राम और लक्ष्मण को देखकर उनसे विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। राम ने उसे नकार दिया। इससे शूर्पणखा बहुत क्रोधित हो गई। उसने राम और लक्ष्मण को धमकी दी कि वह उन्हें मार डालेगी। शूर्पणखा की धमकी से डरकर खर और दूषण, जो शूर्पणखा के भाई थे, राम और लक्ष्मण से बदला लेने के लिए पंचवटी आए। सूर्पनखा की नाक कटना | खर-दूषण का वध (रामायण) अपने वनवास के अंतिम वर्षों में श्री राम, लक्ष्मण और सीता दंडक वन में गोदावरी नदी के किनारे पर पंचवटी स्थान पर अपने रहने के लिए कुटिया बनाते हैं। और वहीं पर अपने वनवास का बाकी समय बिताते है। एक बार जब श्रीराम अपने आंगन में बैठे ध्यान कर रहे थे तब सूर्पनखा नामक राक्षसी वहां पर आ जाती है। सुपनखा वास्तव में लंकापति रावण की बहन थी। सूर्पनखा ध्यान में बैठे श्री राम के सुंदर स्वरूप को देखकर उन पर मोहित हो जाती हैं । वह एक सुंदर रूपवती नारी का रूप धारण करके श्री राम के पास पहुंचकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखती है। तब श्री राम बड़े ही विनम्र भाव से उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं और कहते हैं कि वह अपनी पत्नी सीता को आजीवन एक विवाह में रहने का वचन दे चुके हैं। उस समय लक्ष्मण जी वन से लकड़ियां एकत्रित करने के लिए गए हुए थे और वह भी आ जाते हैं जिन्हें देखकर शूर्पणखा एक बार उन पर भी मोहित हो जाती है। शूर्पणखा ने अपने साथ विवाह का वही प्रस्ताव लक्ष्मण जी के समक्ष भी रखा। तब लक्ष्मण जी उनको बोलते हैं कि उनके बड़े भाई श्री राम के होते हुए वह उन के योग्य नहीं हैं।   सूर्पनखा की नाक कटना जब श्री राम और लक्ष्मण दोनों सूर्पनखा के विवाह प्रस्ताव को इंकार कर देते हैं तो सूर्पनखा को क्रोध आ जाता है। और तभी देवी सीता भी कुटिया के अंदर से बाहर निकल कर आती हैं। सीता को देखकर सूर्पनखा श्रीराम को कहती है कि तुम इस औरत के कारण ही मुझे नकार रहे हो, इसलिए मैं तुम्हारी पत्नी को ही खा जाती हूं। यह कह कर क्रोध में सुपनखा माता सीता की तरफ बढ़ती है तभी श्री राम लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं और लक्ष्मण जी अपनी तलवार निकालकर सूर्पनखा की नाक पर वार करते है। लक्ष्मण जी के तलवार के वार से सुपनखा की नाक कट जाती है और वह रोते हुए वहां से चली जाती है। खर दूषण का दरबार अपने कटी हुई नाक को लेकर सुपनखा अपने भाई और दंडक वन के उस समय के असुर राजा खर के पास पहुंचती है। अपने भाई खर और दूषण के पास पहुंचकर सूर्पनखा न्याय की दुहाई देते हुए रोने लगती है। अपनी बहन को रोता हुआ देखकर राजा कर पूछते हैं कि उसकी यह दशा किसने की है। तब सूर्पनखा रोते हुए खर को बताती है कि श्री राम और लक्ष्मण नाम के दो युवक गोदावरी नदी के किनारे अपनी कुटिया बनाकर वहां पर रहने आए हैं, उन्होंने मुझे अकेली पाकर मेरा अपमान करने की कोशिश की। इसलिए आप वहां जाकर उन दोनों से मेरे अपमान का बदला लीजिए। उनके साथ एक सुंदर नारी भी है जोकि राम की पत्नी है। Shree ram श्रीराम का वनवास । राम वन गमन । अपने बहन के अपमान का बदला लेने के लिए खर और दूषण अपने 14 राक्षसों को एक साथ भेज देते हैं और कहते हैं कि जाओ और पंचवटी में बनी हुई कुटिया का तिनका तिनका बिखेर डालो और उजाड़ दो। असुर खर के  14 सैनिक एक साथ पंचवटी की तरफ जाते हैं वहां श्रीराम पहले से ही उनका इंतजार कर रहे थे। क्योंकि उन्हें अंदाजा था कि सूर्पनखा अपने अपमान का बदला लेने के लिए अवश्य किसी ना किसी को भेजेगी। चौदह असुर एक कतार में उनके सामने आकर बोले कि दंडक वन के राजा खर ने का आदेश दिया है कि तुम दोनों भाई हमारे राजा की शरण में खुद को समर्पित कर दो तथा तुम्हारे साथ जो सुंदर औरत है उसे हमारे राजा की सेवा में उपस्थित करो। उनके यह बातें सुनकर श्रीराम ने अपने धनुष पर एक बाण साधकर उनकी तरफ छोड़ा और एक ही बाण से उन सभी असुरों का सर धड़ से अलग हो गया जिसे देखकर सूर्पनखा चौक गई और फिर अपने भाई खर दूषण के दरबार में आ पहुंची और बोली। Ramayan खर और दूषण का वध रक्षा कीजिए भैया रक्षा कीजिए आपके भेजे हुए 14 असुरों को उस राम ने अपने की बाण से मार डाला। यह सुनकर खर दूषण समझ जाते हैं कि श्री राम लक्ष्मण कोई साधारण मानव नहीं है और वह अपनी सेना लेकर खुद ही श्री राम लक्ष्मण से युद्ध करने के लिए चल पड़ते हैं। पंचवटी पहुंचने के बाद खर दूषण श्री राम लक्ष्मण को ललकार ते हैं। कुछ समय तक युद्ध होने के पश्चात ऋषि अगस्त प्रकट होते हैं और श्री राम को बोलते हैं कि खर दूषण परम मायावी राक्षस है इसलिए आप अपने दिव्यास्त्रों में से मन मोहिनी अस्त्र का उपयोग कीजिए। तब श्रीराम मनमोहनी अस्त्र खर दूषण की ओर चला देते है जिसके प्रभाव से खर दूषण की सेना मोहित होकर आपस में ही लड़कर नष्ट हो जाती है। और आखिर में श्रीराम अपने दिव्यास्त्र के द्वारा दंडक वन के राजा खर का वध कर देते है।

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Shree ram श्रीराम का वनवास । राम वन गमन ।

श्रीराम का वनवास श्रीराम का वनवास रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस घटना के माध्यम से हमें कई संदेश मिलते हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं: वनवास का कारण श्रीराम के वनवास का कारण था कैकेयी का क्रोध। कैकेयी दशरथ की तीसरी पत्नी थी। वह दशरथ से बहुत प्रेम करती थी। लेकिन दशरथ ने एक समय में उसे दो वरदान दिए थे। एक वरदान था कि भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए। दूसरा वरदान था कि राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए। एक दिन, जब दशरथ राजा थे, तब कैकेयी ने अपने वरदानों का स्मरण कराते हुए दशरथ से भरत को अयोध्या का राजा और राम को चौदह वर्ष का वनवास देने की मांग की। दशरथ अपने वचनों के प्रति वचनबद्ध थे। इसलिए उन्होंने कैकेयी की मांग को मान लिया। Sita Swayamver सीता स्वयंवर की कथा। श्रीराम और माता सीता का विवाह Shree ram राम का वनवास राम, सीता और लक्ष्मण को वनवास जाना था। वे सभी अयोध्या से निकलकर वन की ओर चल पड़े। अयोध्या में सभी लोग उनके जाने से बहुत दुखी थे। राम, सीता और लक्ष्मण वन में कई स्थानों पर रहे। उन्होंने कई राक्षसों का वध किया। उन्होंने कई लोगों की मदद की। वनवास का अंत चौदह वर्ष बाद, राम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की। उन्होंने सीता को मुक्त कराया और अयोध्या लौट आए। अयोध्या में उनका भव्य स्वागत हुआ। वनवास का संदेश श्रीराम का वनवास एक कठिन समय था। लेकिन राम ने धर्म और सत्य के मार्ग पर चलकर इस कठिन समय को भी सहन किया। उन्होंने यह भी दिखाया कि माता-पिता के वचनों का पालन करना चाहिए। श्रीराम के वनवास से हमें यह भी सीख मिलती है कि सच्ची भक्ति से भगवान की कृपा प्राप्त होती है। श्रीराम ने भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उन्होंने कभी भी भगवान की भक्ति नहीं छोड़ी। अंत में, भगवान की कृपा से उन्हें सफलता मिली।

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Sita Swayamver सीता स्वयंवर की कथा। श्रीराम और माता सीता का विवाह

श्रीराम और माता सीता का विवाह रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह विवाह हिंदू धर्म में प्रेम और समर्पण के प्रतीक के रूप में माना जाता है। विवाह का प्रसंग राजा दशरथ के चार पुत्र थे। श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। श्रीराम सबसे बड़े पुत्र थे। राजा दशरथ चाहते थे कि उनके बड़े पुत्र श्रीराम का विवाह हो जाए। एक दिन, राजा दशरथ ने अपने गुरु वशिष्ठ से सलाह ली। वशिष्ठ ऋषि ने उन्हें सलाह दी कि वे राजा जनक की पुत्री सीता के स्वयंवर में भाग लें। Sita Swayamver सीता स्वयंवर की शर्त  राजा जनक सभी को की शर्त बताते हुए कहते है। आप सभी राजाओं का मेरी पुत्री सीता के स्वयंवर में स्वागत है। आज इस स्वयंवर को जीतने की शर्त यह है कि जो भी महारथी  सामने रखें भगवान शिव के पिनाक धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा उसी से मेरी पुत्री सीता का विवाह संपन्न होगा। अतः आप सभी से अनुरोध है कि एक-एक करके आए और भगवान शिव के इस धनुष को उठाकर और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा कर अपने बलाबल तथा शक्ति का परिचय दें। राजा जनक की यह घोषणा सुनकर सभी राजा एक-एक करके आते हैं और धनुष को उठाने का प्रयास करते हैं। लेकिन भगवान शिव के उस धनुष को उठाना या प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर कोई भी राजा महाराजा उस धनुष को हिला तक नहीं पाया।  लक्ष्मण जी को आया क्रोध  बहुत समय बीत जाने के बाद भी जब कोई राजा उस धनुष को हिला नहीं पाया तो महाराजा जनक को क्रोध आ गया। उन्हें लगने लगा कि कोई भी इस शिव धनुष को उठा नहीं पाएगा और उनकी पुत्री सीता अविवाहित ही रह जाएंगी। यही सोचकर उन्होंने वहां उपस्थित सभी राजाओं की निंदा करने शुरू कर दी कि उनमें से कोई भी लायक पुरुष नहीं है। जो शिव धनुष का उठा सके।  राजा जनक की ऐसी अपमानजनक बातें सुनकर लक्ष्मण जी को क्रोध आ जाता है और वह इसे श्रीराम तथा रघुकुल  का अपमान समझते हैं। लक्ष्मण जी राजा जनक को ललकारने लगते हैं कि वह उनके तथा श्रीराम के सभा में होते हुए पूरी सभा को अयोग्य कैसे कह सकते हैं। तब ऋषि विश्वामित्र ने लक्ष्मण जी को शांत कराया और श्री राम को धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए बोला। श्रीराम  विनम्र भाव  से ऋषि  विश्वामित्र जी को प्रणाम करके शिव धनुष की तरफ बढ़ते हैं तो वहां पर उपस्थित राजा उनका उपहास करने लगते हैं क्योंकि कहा जाता है कि उस समय भगवान राम की आयु लगभग 16 से 17 वर्ष की थी। इसलिए वहां उपस्थित सभी राजा उन्हें  “लो, अब चिड़िया पहाड़ उठाने को चली है”  बोलकर उनका उपहास उड़ा रहे थे।  Shree Ram : श्री राम द्वारा ताड़का वध तथा अहिल्या का उद्धार  श्रीराम ने तोडा शिव धनुष  लेकिन भगवान विष्णु के अवतार श्री राम सहर्ष भाव से शिव धनुष को प्रणाम करते हैं और केवल अपने एक ही हाथ से शिव धनुष को उठा लेते हैं जिसे देखकर वहां उपस्थित सभी राजा हैरान रह जाते हैं। तभी  श्री राम धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर उसकी डोरी को खींच देते हैं जिससे वह शिव धनुष टूट जाता है और स्वयंवर की शर्त के अनुसार देवी सीता और श्री राम का विवाह हो जाता है। माता सीता श्री राम को वरमाला पहना देती हैं श्रीराम को अपने पति के रूप में स्वीकार करती है। यह देखकर राजा जनक तथा उनके परिवार जन की खुशी की कोई सीमा नहीं रहती। देवी सीता तथा श्रीराम का विवाह  तब राजा जनक ऋषि विश्वामित्र को बधाई देते हुए उनका अभिनंदन करते हैं तथा श्री राम और देवी सीता के विवाह के आगे के कार्यक्रम के बारे में पूछते हैं। ऋषि विश्वामित्र राजा जनक को कहते हैं कि हे जनक यह विवाह तो शिव धनुष के अधीन था। तुम धनुष टूटते ही है विवाह तो हो चुका है लेकिन फिर भी आपने कुल के रीति रिवाज के अनुसार ही आगे का कार्यक्रम बनाइए।  ऋषि विश्वामित्र के कहने पर जनकपुरी से राजा दशरथ के पास सन्देश भेजा जाता है। तथा उसके बाद दोनों परिवारों के द्वारा विचार करके राजा दशरथ के चारो पुत्रो का विवाह राजा जनक की चारो पुत्रियों से निश्चित कर दिया जाता है। जिसमे श्रीराम के साथ देवी सीता, भरत  के साथ मान्ध्वि, लक्ष्मण के साथ उर्मिला, तथा शत्रुघ्न के साथ श्रुतिकीर्ति का शुभ विवाह संपन्न किया जाता है। 

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Shree Ram : श्री राम द्वारा ताड़का वध तथा अहिल्या का उद्धार 

श्री राम द्वारा ताड़का का वध | श्री राम द्वारा ताड़का का वध रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस घटना के माध्यम से श्री राम के साहस, पराक्रम और धर्मपरायणता का परिचय मिलता है। श्रीराम तथा चारों भाइयों की शिक्षा पूर्ण होने के चारों भाई राजमहल में वापस लौट जाते हैं। उसके कुछ ही समय पश्चात महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के महल में आते हैं तथा राजा दशरथ से कहते हैं कि उन्हें श्री राम चाहिए ताकि उनके यज्ञ तथा अनुष्ठानों की असुरों तथा राक्षसों से रक्षा की जा सके । राक्षस हमेशा हमारे यज्ञ में बाधा डालते है और यज्ञ को पूरा नहीं होने देते। इसलिए हम राम को अपने साथ ले जाना चाहते हैं ताकि वह हमारे यज्ञ तथा अनुष्ठानों रक्षा कर सकें। ताड़का कौन थी? ताड़का एक राक्षसी थी जो कि ऋषि विश्वामित्र के आश्रम के आसपास रहने वाले ऋषियों और साधुओं को सताती थी। वह बहुत ही बलशाली थी और उसकी आवाज इतनी भयानक थी कि सुनने वाले कांप उठते थे। Shree Ram श्री राम और लक्ष्मण का ऋषि विश्वामित्र के साथ वन में जाना राजा दशरथ ने अपने पुत्रों श्री राम, लक्ष्मण और भरत को ऋषि विश्वामित्र के साथ वन में भेजा था। ऋषि विश्वामित्र उनसे यज्ञ की रक्षा करने के लिए कहा चाहते थे। राक्षसी ताड़का का वध  श्री राम तथा लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम में चले जाते हैं। जहां पर विश्वामित्र श्री राम को बताते हैं कि एक राक्षसी ताड़का उनके हर यज्ञ में विघ्न डालती है तथा उसका विनाश करना आवश्यक है  यह माना जाता है कि राक्षसी ताड़का एक यक्षिणी थी। महा पुराण में वर्णित है कि यक्षिणीया स्वयं मां दुर्गा की शक्ति का अंश होती है इसलिए वे बहुत शक्तिशाली होती है। इसलिए श्री राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ राक्षसी ताड़का के निवास स्थान पर जाते हैं और उसको ललकारते हैं। ललकार सुनकर राक्षसी तड़का बाहर निकलती है और इनपर हमला करने लगती है काफी समय तक युद्ध के बाद श्री राम अपने एक बाण से राक्षसी तड़का का अंत कर देते है। उसके बाद विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण को अपने आश्रम में ठहर आते हैं। अगले दिन जब ऋषि विश्वामित्र यज्ञ कर रहे होते हैं तब सुबाहु तथा मारीच नाम के दो राक्षस उनका यज्ञ भंग करने के लिए कुछ राक्षसों को साथ ले आते हैं। लेकिन श्री राम और लक्ष्मण पहले से ही वहां यज्ञ की रक्षा में तैनात होते हैं और मैं दोनों अपने दिव्य बाणों से सभी राक्षसों का अंत कर देते हैं। अहिल्या का उद्धार अहिल्या कौन थी? अहिल्या एक पतिव्रता और धर्मपरायण स्त्री थी। वह ऋषि गौतम की पत्नी थी। एक बार, जब ऋषि गौतम आश्रम से बाहर गए थे, तब इंद्र ने अहिल्या का रूप धारण करके उसके साथ बलात्कार किया। इस घटना से अहिल्या बहुत दुखी हुईं और उन्होंने भगवान से अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी। अहिल्या स्वयं ब्रह्म देव की पुत्री थी। अत्यंत रूपवती होने के कारण देवराज इंद्र की नियत अहिल्या पर खराब हो गई। इसके पश्चात भी अहिल्या की शादी महर्षि गौतम से हो गई इससे देवराज इंद्र बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने उन दोनो से बदला लेने की सोची। एक रात देवराज इंद्र ने मुर्गे का रूप धारण करके ऋषि गौतम के आश्रम के बाहर जाकर बांग देनी शुरू कर दी। उसकी आवाज सुनकर गौतम को लगा कि सुबह हो गई है और वह प्रतिदिन की तरह अपना कमंडल लेकर गंगा स्नान करने के लिए चल पड़ते है। पीछे से देवराज इंद्र ऋषि गौतम का वेश धारण करके अहिल्या के पास चले जाते हैं और उसके साथ समागम करते है । जब ऋषि गौतम गंगा तट पर स्नान करने के लिए पहुंचते हैं तो उन्हें यह आभास होता है कि अभी सुबह हुई नहीं है। अवश्य ही किसी ने उनके साथ छल किया है। इसीलिए वह तुरंत अपने आश्रम की तरफ चल देते हैं। ऋषि गौतम अपने आश्रम पहुंचते हैं तो वह देखते हैं कि उन्हीं के भेष में एक व्यक्ति उनकी कुटिया से निकल रहा है। ऋषि गौतम परम तपस्वी थे इसलिए वह छल वेश में भी देवराज इंद्र को पहचान जाते हैं और उसे कुरूप होने का श्राप देते हैं। यह सुनकर अहिल्या अपनी कुटिया से बाहर निकलती है तब वह समझ जाती है कि उसके साथ छल हुआ है और अपने पति ऋषि गौतम के पैरों में गिरकर क्षमा मांगने लगती है। लेकिन क्रोध में भरे हुए श्री गौतम ने उन्हें क्षमा नहीं किया और तुरंत पत्थर में बदलने का श्राप दिया। बार-बार मिन्नत करने के बाद ऋषि गौतम को अहिल्या पर दया आ जाते हैं और वह उसके मुक्ति का मार्ग बताते हैं। जब भगवान विष्णु राम अवतार में पृथ्वी पर आएंगे तब वह अपने चरणों से स्पर्श करके तुम्हें इस श्राप से मुक्त करेंगे।  ताड़का वध के बाद जब महर्षि विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण के साथ जनकपुरी की तरफ रवाना होते हैं तब वह ऋषि गौतम के आश्रम से होकर गुजरते हैं जहां पर वह श्री राम को अहिल्या की कहानी बताते हैं। तब श्रीराम अपने पैरों से स्पर्श करके पाषाण में परिवर्तित हो चुकी  अहिल्या को शाप मुक्त कर देते हैं। और इस तरह भगवान राम के द्वारा अहिल्या का उद्धार हो जाता है। 

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भारत की इन 5 जगहों से जुडी है रावण के जीवन की सबसे प्रमुख घटनाएं, जानिए क्या है वो?

रावण को अपने काल का सबसे श्रेष्ठ विद्वान और तपस्वी माना गया है। ये बात अलग है कि उसके बुरे कर्मों के कारण उसका पांडित्य भी उसकी रक्षा नहीं कर पाया। रावण के बारे में अनेक ग्रंथों में वर्णन मिलते हैं। रामायण में कुछ ऐसी जगहों का वर्णन मिलता है, जहाँ रावण के जीवन की प्रमुख घटनाए घटी है।  आज हम उन्हीं में से 5 प्रमुख जगहों और उनसे जुडी घटनाओं के बारे में आपको बता रहे है। 1. महिष्मती नगर (वर्तमान- मध्यप्रदेश का महेश्वर) :- वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब राक्षसराज रावण ने सभी राजाओं को जीत लिया, तब वह महिष्मती नगर (वर्तमान में महेश्वर) के राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन को जीतने की इच्छा से उनके नगर में गया। उस समय सहस्त्रबाहु अर्जुन अपनी पत्नियों के साथ नर्मदा नदी में जलक्रीड़ा कर रहा था। रावण को जब पता चला कि सहस्त्रबाहु नहीं है तो वह युद्ध की इच्छा से वहीं रुक गया। नर्मदा की जलधारा देखकर रावण ने वहां भगवान शिव का पूजन करने का विचार किया। जिस स्थान पर रावण भगवान शिव की पूजा कर रहा था, वहां से थोड़ी दूर सहस्त्रबाहु अर्जुन अपनी पत्नियों के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। सहस्त्रबाहु अर्जुन की एक हजार भुजाएं थीं। उसने खेल ही खेल में नर्मदा का प्रवाह रोक दिया, जिससे नर्मदा का पानी तटों के ऊपर चढ़ने लगा। जिस स्थान पर रावण पूजा कर रहा था, वह भी नर्मदा के जल में डूब गया। नर्मदा में आई इस अचानक बाढ़ के कारण को जानने रावण ने अपने सैनिकों को भेजा। सैनिकों ने रावण को पूरी बात बता दी। रावण ने सहस्त्रबाहु अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारा। नर्मदा के तट पर ही रावण और सहस्त्रबाहु अर्जुन में भयंकर युद्ध हुआ। अंत में सहस्त्रबाहु अर्जुन ने रावण को बंदी बना लिया। जब यह बात रावण के पितामह (दादा) पुलस्त्य मुनि को पता चली तो वे सहस्त्रबाहु अर्जुन के पास आए और रावण को छोडने के लिए निवेदन किया। सहस्त्रबाहु अर्जुन ने रावण को छोड़ दिया और उससे मित्रता कर ली। 2. बैद्यनाथ (वर्तमान- झारखंड) :- शिव पुराण के अनुसार, रावण भगवान शिव का भक्त था। उसने बहुत कठिन तपस्या की और एक-एक करके अपने मस्तक भगवन शिव को अर्पित कर दिए। उसकी इस तपस्या से शंकर भगवान् बहुत प्रसन्न हुए। उसके दस सर भगवान ने फिर जोड़ दिए। रावण ने भगवान से वरदान के रूप में भगवान शिव को अपने साथ लंका चलने की बात कही। भगवान शिव ने रावण की बात मान ली, लेकिन रावण के सामने एक शर्त रखी। शर्त यह थी कि अगर रावण भगवान के शिवलिंग को रास्ते में कहीं भी जमीन पर रख देगा तो भगवान शिव उसी जगह पर स्थापित हो जाएंगे। रावण ने भगवान शिव की शर्त मान ली और शिवलिंग को लेकर लंका की ओर जाने लगा। यह सूचना मिलते ही देवताओं में खलबली मच गई। यदि भगवान शिव लंका में स्थापित हो जाएंगे तो लंका को हरा पाना किसी के लिए भी असंभव हो जाता। ऐसे में रावण को कोई भी नहीं हरा पाता। इस परेशानी का हल निकालने के लिए सब विष्णु भगवान के पास पहुंचे। सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से किसी भी तरह रावण को शिवलिंग लंका ले जाने से रोकने की प्रार्थना की। देवताओं की प्रार्थना पर विष्णु भगवान् एक ब्राह्मण का वेश धारण करके धरती पर चले आए। साथ ही, वरूण देव ने रावण के पेट में प्रवेश किया। जैसे ही वरुण देव रावण के पेट में घुसे। रावण को बड़ी तीव्र लघुशंका लगी। लघु शंका करने के पहले रावण को शिवलिंग किसी के हाथ में देना था। तभी वहां से ब्राह्मण वेश में विष्णु भगवान गुजरे रावण ने उन्हें थोडी देर शिवलिंग पकड़ने का आग्रह किया। वह ख़ुद लघुशंका करने चला गया, लेकिन उसके पेट में तो वरुण देव घुसे हुए थे। रावण के बहुत देर तक न आने पर ब्राह्मण ने शिवलिंग को नीचे रख दिया। जैसे ही शिवलिंग नीचे स्थापित हुआ वरुण देव रावण के पेट से निकल गए। रावण जब ब्राह्मण को देखने आया तो देखा कि शिवलिंग जमीन पर रखा हुआ है और ब्राह्मण जा चुका है। उसने शिवलिंग उठाने की कोशिश की, लेकिन शर्त के अनुसार, भगवान शिव उसी जगह पर स्थापित हो गए थे।। आखिर में क्रोधित होकर रावण ने शिवलिंग पर मुष्टि प्रहार किया जिससे वह जमीन में धंस गया। बाद में रावण ने क्षमा मांगी। कहते हैं वह रोज लंका से शिव पूजा के लिए बैद्यनाथ आता था। जिस जगह ब्राह्मण ने शिवलिंग रखा, वहीं आज शंकर भगवान का मन्दिर है, जिसे बैद्यनाथ धाम कहते हैं। 3. पंचवटी (वर्तमान- नासिक) :- पंचवटी नासिक जिला, महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के निकट स्थित एक प्रसिद्ध पौराणिक स्थान है। यहां पर भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और सीता सहित अपने वनवास काल में काफी दिनों तक रहे थे। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, यहीं से लंका के राजा रावण ने माता सीता का हरण किया था। रावण ने मारीच नाम के राक्षस को सीता हरण की योजना में शामिल किया। उसने सोने के हिरण का रूप धारण किया। सीताजी उस पर मोहित हो गईं। सीताजी ने रामजी को उस हिरण को लाने को कहा। बाद में राम के न लौटने पर लक्ष्मण उन्हें खोजने वन में गए। रावण साधु के वेष में आया और सीताजी का हरण करके ले गया। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मन्दिर खंडहर रूप में विद्यमान है। 4. किष्किंधापुरी (वर्तमान- कर्नाटक) :- एक बार रावण ने सुना कि किष्किंधापुरी का राजा बालि बड़ा बलवान और पराक्रमी है तो वह उसके पास युद्ध करने के लिए जा पहुंचा। बालि की पत्नी तारा,तारा के पिता सुषेण, युवराज अंगद और उसके भाई सुग्रीव ने रावण समझाया कि इस समय बालि नगर से बाहर सन्ध्योपासना के लिए गए हुए हैं। वे ही आपसे युद्ध कर सकते हैं। अन्य कोई वानर इतना पराक्रमी नहीं है, जो आपके साथ युद्ध कर सके। इसलिए, आप थोड़ी देर उनकी प्रतीक्षा करें। साथ ही सुग्रीव ने रावण को बालि की ताकत और क्षमता के बारे में बताया और दक्षिण के तट पर जाने को कहा, क्योंकि बालि वहीं पर था। सुग्रीव के वचन सुनकर रावण विमान पर सवार हो तत्काल दक्षिण सागर में उस स्थान पर जा पहुंचा। जहां

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आखिर क्यों दिया राम ने लक्ष्मण को मृत्युदंड?

रामायण में एक घटना का वर्णन आता है की श्री राम को न चाहते हुए भी जान से प्यारे अपने अनुज लक्ष्मण को मृत्युदंड देना पड़ता है। आइये जानते है, आखिर क्यों भगवान राम को लक्ष्मण को मृत्युदंड देना पड़ा?ये घटना उस वक़्त की है जब श्री राम लंका विजय करके अयोध्या लौट आते है और अयोध्या के राजा बन जाते है। एक दिन यम देवता कोई महत्तवपूर्ण चर्चा करने श्री राम के पास आते है। चर्चा प्रारम्भ करने से पूर्व वो भगवान राम से कहते है की आप जो भी प्रतिज्ञा करते हो उसे पूर्ण करते हो। मैं भी आपसे एक वचन मांगता हूं कि जब तक मेरे और आपके बीच वार्तालाप चले तो हमारे बीच कोई नहीं आएगा और जो आएगा, उसको आपको मृत्युदंड देना पड़ेगा। भगवान राम, यम को वचन दे देते है। राम, लक्ष्मण को यह कहते हुए द्वारपाल नियुक्त कर देते है की जब तक उनकी और यम की बात हो रही है वो किसी को भी अंदर न आने दे, अन्यथा उसे उन्हें मृत्युदंड देना पड़ेगा। लक्ष्मण भाई की आज्ञा मानकर द्वारपाल बनकर खड़े हो जाते है। लक्ष्मण को द्वारपाल बने कुछ ही समय बीतता है वहां पर ऋषि दुर्वासा का आगमन होता है। जब दुर्वासा ने लक्ष्मण से अपने आगमन के बारे में राम को जानकारी देने के लिये कहा तो लक्ष्मण ने विनम्रता के साथ मना कर दिया। इस पर दुर्वासा क्रोधित हो गये तथा उन्होने सम्पूर्ण अयोध्या को श्राप देने की बात कही। लक्ष्मण समझ गए कि ये एक विकट स्थिति है जिसमें या तो उन्हे रामाज्ञा का उल्लङ्घन करना होगा या फिर सम्पूर्ण नगर को ऋषि के श्राप की अग्नि में झोेंकना होगा। लक्ष्मण ने शीघ्र ही यह निश्चय कर लिया कि उनको स्वयं का बलिदान देना होगा ताकि वो नगर वासियों को ऋषि के श्राप से बचा सकें। उन्होने भीतर जाकर ऋषि दुर्वासा के आगमन की सूचना दी। राम भगवान ने शीघ्रता से यम के साथ अपनी वार्तालाप समाप्त कर ऋषि दुर्वासा की आव-भगत की। परन्तु अब श्री राम दुविधा में पड़ गए क्योंकि उन्हें अपने वचन के अनुसार लक्ष्मण को मृत्यु दंड देना था। वो समझ नहीं पा रहे थे की वो अपने भाई को मृत्युदंड कैसे दे, लेकिन उन्होंने यम को वचन दिया था जिसे निभाना ही था।इस दुविधा की स्तिथि में श्री राम ने अपने गुरु का स्मरण किया और कोई रास्ता दिखाने को कहा। गुरदेव ने कहा की अपने किसी प्रिय का त्याग, उसकी मृत्यु के समान ही है।  अतः तुम अपने वचन का पालन करने के लिए लक्ष्मण का त्याग कर दो।लेकिन जैसे ही लक्ष्मण ने यह सुना तो उन्होंने राम से कहा की आप भूल कर भी मेरा त्याग नहीं करना, आप से दूर रहने से तो यह अच्छा है की मैं आपके वचन की पालना करते हुए मृत्यु को गले लगा लूँ। ऐसा कहकर लक्ष्मण ने जल समाधी ले ली।

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रामायण – आखिर क्यों हंसने लगा मेघनाद का कटा सिर

 महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित हिंदू धर्मग्रंथ ‘रामायण’ में उल्लेख मिलता है कि रावण के बेटे का नाम मेघनाद था। उसका एक नाम इंद्रजीत भी था। दोनों नाम उसकी बहादुरी के लिए दिए गए थे। दरअसल मेघनाद, इंद्र पर जीत हासिल करने के बाद इंद्रजीत कहलाया। और मेघनाद, का मेघनाद नाम मेघों की आड़ में युद्ध करने के कारण पड़ा। वह एक वीर राक्षस योद्धा था। मेघनाद, श्रीराम और लक्ष्मण को मारना चाहता था। एक युद्ध के दौरान उसने सारे प्रयत्न किए लेकिन वह विफल रहा। इसी युद्ध में लक्ष्मण के घातक बाणों से मेघनाद मारा गया। लक्ष्मण जी ने मेघनाद का सिर उसके शरीर से अलग कर दिया। उसका सिर श्रीराम के आगे रखा गया। उसे वानर और रीछ देखने लगे। तब श्रीराम ने कहा, ‘इसके सिर को संभाल कर रखो। दरअसल, श्रीराम मेघनाद की मृत्यु की सूचना मेघनाद की पत्नी सुलोचना को देना चाहते थे। उन्होंने मेघनाद की एक भुजा को, बाण के द्वारा मेघनाद के महल में पहुंचा दिया। वह भुजा जब मेघनाद की पत्नी सुलोचना ने देखी तो उसे विश्वास नहीं हुआ कि उसके पति की मृत्यु हो चुकी है। उसने भुजा से कहा अगर तुम वास्तव में मेघनाद की भुजा हो तो मेरी दुविधा को लिखकर दूर करो। सुलोचना का इतना कहते ही भुजा हरकत करने लगी, तब एक सेविका ने उस भुजा को खड़िया लाकर हाथ में रख दी। उस कटे हुए हाथ ने आंगन में लक्ष्मण जी के प्रशंसा के शब्द लिख दिए। अब सुलोचना को विश्वास हो गया कि युद्ध में उसका पति मारा गया है। सुलोचना इस समाचार को सुनकर रोने लगीं। फिर वह रथ में बैठकर रावण से मिलने चल पड़ी। रावण को सुलोचना ने, मेघनाद का कटा हुआ हाथ दिखाया और अपने पति का सिर मांगा। सुलोचना रावण से बोली कि अब में एक पल भी जीवित नहीं रहना चाहती में पति के साथ ही सती होना चाहती हूं। तब रावण ने कहा, ‘पुत्री चार घड़ी प्रतिक्षा करो में मेघनाद का सिर शत्रु के सिर के साथ लेकर आता हूं। लेकिन सुलोचना को रावण की बात पर विश्वास नहीं हुआ। तब सुलोचना मंदोदरी के पास गई। तब मंदोदरी ने कहा तुम राम के पास जाओ, वह बहुत दयालु हैं।’ सुलोचना जब राम के पास पहुंची तो उसका परिचय विभीषण ने करवाया। सुलोचना ने राम से कहा, ‘हे राम में आपकी शरण में आई हूं। मेरे पति का सिर मुझे लौटा दें ताकि में सती हो सकूं। राम सुलोचना की दशा देखकर दुखी हो गए। उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारे पति को अभी जीवित कर देता हूं।’ इस बीच उसने अपनी आप-बीती भी सुनाई। सुलोचना ने कहा कि, ‘मैं नहीं चाहती कि मेरे पति जीवित होकर संसार के कष्टों को भोगें। मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि आपके दर्शन हो गए। मेरा जन्म सार्थक हो गया। अब जीवित रहने की कोई इच्छा नहीं।’ राम के कहने पर सुग्रीव मेघनाद का सिर ले आए। लेकिन उनके मन में यह आशंका थी कि कि मेघनाद के कटे हाथ ने लक्ष्मण का गुणगान कैसे किया। सुग्रीव से रहा नहीं गया और उन्होंने कहा में सुलोचना की बात को तभी सच मानूंगा जब यह नरमुंड हंसेगा। सुलोचना के सतीत्व की यह बहुत बड़ी परीक्षा थी। उसने कटे हुए सिर से कहा, ‘हे स्वामी! ज्लदी हंसिए, वरना आपके हाथ ने जो लिखा है, उसे ये सब सत्य नहीं मानेंगे। इतना सुनते ही मेघनाद का कटा सिर जोर-जोर से हंसने लगा। इस तरह सुलोचना अपने पति की कटा हुए सिर लेकर चली गईं। ’

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रावण के पूर्वजन्मों की कहानियां

रावण अपने पूर्वजन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल हुआ करते थे पर एक श्राप के चलते उन्हें तीन जन्मो तक राक्षस कुल में जन्म लेना पड़ा था।  आज इस लेख में हम आपको रावण के दो पूर्वजन्मों और एक बाद के जन्म के बारे में बताएँगे। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के दर्शन हेतु सनक, सनंदन आदि ऋषि बैकुंठ पधारे परंतु भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें प्रवेश देने से इंकार कर दिया। ऋषिगण अप्रसन्न हो गए और क्रोध में आकर जय-विजय को शाप दे दिया कि तुम राक्षस हो जाओ। जय-विजय ने प्रार्थना की व अपराध के लिए क्षमा माँगी। भगवान विष्णु ने भी ऋषियों से क्षमा करने को कहा। तब ऋषियों ने अपने शाप की तीव्रता कम की और कहा कि तीन जन्मों तक तो तुम्हें राक्षस योनि में रहना पड़ेगा और उसके बाद तुम पुनः इस पद पर प्रतिष्ठित हो सकोगे। इसके साथ एक और शर्त थी कि भगवान विष्णु या उनके किसी अवतारी-स्वरूप के हाथों तुम्हारा मरना अनिवार्य होगा। यह शाप राक्षसराज, लंकापति, दशानन रावण के जन्म की आदि गाथा है। भगवान विष्णु के ये द्वारपाल पहले जन्म में हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु राक्षसों के रूप में जन्मे। हिरण्याक्ष राक्षस बहुत शक्तिशाली था और उसने पृथ्वी को उठाकर पाताल-लोक में पहुँचा दिया था। पृथ्वी की पवित्रता बहाल करने के लिए भगवान विष्णु को वराह अवतार धारण करना पड़ा था। फिर विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को मुक्त कराया था। हिरण्यकशिपु भी ताकतवर राक्षस था और उसने वरदान प्राप्तकर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया था। भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष का वध करनेकी वजह से हिरण्यकशिपु विष्णु विरोधी था और अपने विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद को मरवाने के लिए भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फिर भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकशिपु का वध किया था। खंभे से नृसिंह भगवान का प्रकट होना ईश्वर की शाश्वत, सर्वव्यापी उपस्थिति का ही प्रमाण है।त्रेतायुग में ये दोनों भाई रावण और कुंभकर्ण के रूप में पैदा हुए और विष्णु अवतार श्रीराम के हाथो मारे गए। तीसरे जन्म में द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, तब ये दोनों शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे। इन दोनों का भी वध भगवान श्रीकृष्ण के हाथों हुआ।

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