RAMAYANA

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग- कुंभकर्ण के पुत्र को मार कर यहां स्थापित हुए थे भगवान शिव

ऐसे हुई थी यहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना कहा जाता है कि कुंभकर्ण के एक पुत्र का नाम भीम था। कुंभकर्ण को कर्कटी नाम की एक महिला पर्वत पर मिली थी। उसे देखकर कुंभकर्ण उस पर मोहित हो गया और उससे विवाह कर लिया। विवाह के बाद कुंभकर्ण लंका लौट आया, लेकिन कर्कटी पर्वत पर ही रही। कुछ समय बाद कर्कटी को भीम नाम का पुत्र हुआ। जब श्रीराम ने कुंभकर्ण का वध कर दिया तो कर्कटी ने अपने पुत्र को देवताओं के छल से दूर रखने का फैसला किया।बड़े होने पर जब भीम को अपने पिता की मृत्यु का कारण पता चला तो उसने देवताओं से बदला लेने का निश्चय कर लिया। भीम ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके उनसे बहुत ताकतवर होने का वरदान प्राप्त कर लिया। कामरूपेश्वप नाम के राजा भगवान शिव के भक्त थे। एक दिन भीम ने राजा को शिवलिंग की पूजा करते हुए देख लिया। भीम ने राजा को भगवान की पूजा छोड़ उसकी पूजा करने को कहा। राजा के बात न मानने पर भीम ने उन्हें बंदी बना लिया। राजा ने कारागार में ही शिवलिंग बना कर उनकी पूजा करने लगा। जब भीम ने यह देखा तो उसने अपनी तलवार से राजा के बनाए शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया। ऐसा करने पर शिवलिंग में से स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए। भगवान शिव और भीम के बीच घोर युद्ध हुआ, जिसमें भीम की मृत्यु हो गई। फिर देवताओं ने भगवान शिव से हमेशा के लिए उसी स्थान पर रहने की प्रार्थना की। देवताओं के कहने पर शिव लिंग के रूप में उसी स्थान पर स्थापित हो गए। इस स्थान पर भीम से युद्ध करने की वजह से इस ज्योतिर्लिंग का नाम भीमशंकर पड़ गया।भीमशंकर मंदिर बहुत ही प्राचीन है, लेकिन यहां के कुछ भाग का निर्माण नया भी है। इस मंदिर के शिखर का निर्माण कई प्रकार के पत्थरों से किया गया है। यह मंदिर मुख्यतः नागर शैली में बना हुआ है। मंदिर में कहीं-कहीं इंडो-आर्यन शैली भी देखी जा सकती है। देवी पार्वती का मंदिर भी है यहां भीमशंकर मंदिर से पहले ही शिखर पर देवी पार्वती का एक मंदिर है। इसे कमलजा मंदिर कहा जाता है। मान्यता है कि इसी स्थान पर देवी ने राक्षस त्रिपुरासुर से युद्ध में भगवान शिव की सहायता की थी। युद्ध के बाद भगवान ब्रह्मा ने देवी पार्वती की कमलों से पूजा की थी। मंदिर के पास स्थित है कई कुंड यहां के मुख्य मंदिर के पास मोक्ष कुंड, सर्वतीर्थ कुंड, ज्ञान कुंड, और कुषारण्य कुंड भी स्थित है। इनमें से मोक्ष नामक कुंड को महर्षि कौशिक से जुड़ा हुआ माना जाता है और कुशारण्य कुंड से भीम नदी का उद्गम माना जाता है।

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रामायण की कहानी: हनुमान जी का जन्म

रामभक्त हनुमान को कई नामों से जाना जाता है, जैसे मारुति नंदन, पवनपुत्र व संकटमोचन आदि। माना जाता है कि वह भगवान शिव के 11वें रूद्र अवतार थे और उनके जन्म का उल्लेख कई पौराणिक कथाओं में मिलता है। इस कहानी में हम हनुमान जी के जन्म से जुड़ी ऐसी ही एक प्रचलित कथा बता रहे हैं। हनुमान जी के जन्म की कथा बहुत रोचक है। वे माता अंजनी और वानर राज केसरी के पुत्र थे। माना जाता है कि उनका जन्म कोई साधारण संयोग नहीं था, बल्कि देवतागण, नक्षत्र और सारे भगवान के आशीर्वाद से पृथ्वी से पाप का विनाश करने के लिए हुआ था। मान्यताओं के अनुसार, माता अंजनी को यह वरदान मिला हुआ था कि उनका होने वाला पुत्र शिव का अंश होगा। इसके अलावा, एक मान्यता यह भी है कि जब बजरंगबली का जन्म हुआ था, उसी समय रावण के घर भी एक पुत्र ने जन्म लिया था। यह संयोग दुनिया में अच्छाई और बुराई का संतुलन बनाए रखने के लिए हुआ था। बात सतयुग की है, जब माता अंजनी एक जंगल में बैठकर पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान शिव की पूजा कर रही थीं। वह हाथ जोड़कर और आंखें बंद करके आराधना में लीन थी, तभी उनकी सामने रखी कटोरी में एक फल आकर गिरा। माता अंजनी ने जब उस फल को देखा, तो उन्होंने उसे प्रसाद समझ कर सेवन कर लिया। दरअसल, जब माता अंजनी जंगल में पूजा कर रही थी, तब वहां से दूर अयोध्या में राजा दशरथ भी पुत्र प्राप्ति के लिए शिव-यज्ञ करवा रहे थे। इस हवन के बाद पंडित ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को फल दिए, जिन्हें खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई थी। इन्हीं फलों में से एक छोटा-सा अंश एक पक्षी उठाकर ले गया, जिसे उसने बाद में माता अंजनी के सामने रख दिया। इस प्रकार भगवान शिव के आशीर्वाद से हुआ था केसरीनंदन हनुमान का जन्म।

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रामायण की कहानी: रामसेतु में गिलहरी का योगदान

माता सीता का हरण होने के बाद, भगवान राम को लंका तक पहुंचने के लिए उनकी वानर सेना जंगल को लंका से जोड़ने के लिए समुद्र के ऊपर पुल बनाने के काम में लग जाती है। पुल बनाने के लिए पत्थर पर भगवान श्रीराम का नाम लिखकर पूरी सेना समुद्र में पत्थर डालती है। भगवान राम का नाम लिखे जाने की वजह से पत्थर समुद्र में डूबने के बजाय तैरने लगते हैं। यह सब देखकर सभी वानर काफी खुश होते हैं और तेजी से पुल बनाने के लिए पत्थर समुद्र में डालने लगते हैं। भगवान राम पुल बनाने के लिए अपनी सेना के उत्साह, समर्पण और जुनून को देखकर काफी खुश होते हैं। उस वक्त वहां एक गिलहरी भी थी, जो मुंह से कंकड़ उठाकर नदी में डाल रही थी। उसे ऐसा बार-बार करते हुए एक वानर देख रहा था। कुछ देर बाद वानर गिलहरी को देखकर मजाक बनाता है। वानर कहता है, “हे! गिलहरी तुम इतनी छोटी-सी हो, समुद्र से दूर रहो। कहीं ऐसा न हो कि तुम इन्हीं पत्थरों के नीचे दब जाओ।” यह सुनकर दूसरे वानर भी गिलहरी का मजाक बनाने लगते हैं। गिलहरी यह सब सुनकर बहुत दुखी हो जाती है। भगवान राम भी दूर से यह सब होता देखते हैं। गिलहरी की नजर जैसे ही भगवान राम पर पड़ती है, वो रोते- रोते भगवान राम के समीप पहुंच जाती है। परेशान गिलहरी श्री राम से सभी वानरों की शिकायत करती है। तब भगवान राम खड़े होते हैं और वानर सेना को दिखाते हैं कि गिलहरी ने जिन कंकड़ों व छोटे पत्थरों को फेंका था, वो कैसे बड़े पत्थरों को एक दूसरे से जोड़ने का काम कर रहे हैं। भगवान राम कहते हैं, “अगर गिलहरी इन कंकड़ों को नहीं डालती, तो तुम्हारे द्वारा फेंके गए सारे पत्थर इधर-उधर बिखरे रहते। ये गिलहरी के द्वारा फेंके गए पत्थर ही हैं, जो इन्हें आपस में जोड़े हुए हैं। पुल बनाने के लिए गिलहरी का योगदान भी वानर सेना के सदस्यों जैसा ही अमूल्य है।” इतना सब कहकर भगवान राम बड़े ही प्यार से गिलहरी को अपने हाथों से उठाते हैं। फिर, गिलहरी के कार्य की सराहना करते हुए श्री राम उसकी पीठ पर बड़े ही प्यार से हाथ फेरने लगते हैं। भगवान के हाथ फेरते ही गिलहरी के छोटे-से शरीर पर उनकी उंगलियों के निशान बन जाते हैं। तब से ही माना जाता है कि गिलहरियों के शरीर पर मौजूद सफेद धारियां कुछ और नहीं, बल्कि भगवान राम की उंगलियों के निशान के रूप में मौजूद उनका आशीर्वाद है। कहानी से सीख : दूसरों के कार्य का मजाक नहीं बनाया जाना चाहिए। कार्य में किसी भी तरह का योगदान महत्वपूर्ण होता है। साथ ही दूसरों द्वारा मजाक बनाए जाने के बावजूद आपको अपना आत्मविश्वास नहीं खोना चाहिए।

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रामायण की कहानी: क्या सीता मंदोदरी की बेटी थी?

माता सीता के जन्म को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। कोई कुछ कहानी सुनता है, तो कोई कुछ। इसलिए, साफ-साफ कहना मुश्किल है कि सीता की माता कौन थी। सीता के जन्म से जुड़ी हम ऐसी ही एक प्रचलित कहानी सुना रहे हैं। एक बार लंकापति रावण के तप से खुश होकर भगवान ब्रह्मा उसे वरदान मांगने को कहते हैं। रावण उनसे अमर होने का वरदान मांगता है। ब्रह्माजी उसे अमर होने के अलावा कोई दूसरा वरदान मांगने को कहते है। रावण वरदान में मांगता है कि मुझे सुर, असुर, पिशाच, नाग, किन्नर या अप्सरा कोई भी न मार सके। रावण मनुष्य द्वारा न मारे जाने के बारे में नहीं बोलता है, क्योंकि वह मनुष्य को तिनके के समान समझता था। वरदान पाने के बाद रावण हर तरफ तबाही मचाना शुरू कर देता है। एक दिन वह दंडकारण्य नामक जगह पहुंचता है, जहां ऋषि-मुनियों का निवास था। रावण को ऋषि-मुनियों को मारना उचित नहीं लगा, लेकिन वो उन ऋषि-मुनियों के रक्त को एक कमंडल में भर कर साथ ले जाता है। वह कमंडल ‘गृत्समद ऋषि’ का था, जो पुत्री की लालसा में माता लक्ष्मी से प्रार्थना करते थे कि वह उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। इसके लिए गृत्समद ऋषि रोजाना पूजा-पाठ के दौरान पवित्र मंत्र पढ़कर दूध की कुछ बूंदें कमंडल में डाला करते थे, जिसमें रावण रक्त भरकर अपने साथ ले गया था। रावण कमंडल को लंका ले गया और वह पहुंचकर कमंडल अपनी पत्नी मंदोदरी को देकर कहता है, “यह विषैले रक्त से भरा है। इसे संभाल कर रखना और किसी को मत देना।” कुछ दिन बाद विहार के लिए रावण किसी पर्वत पर चला जाता है। मंदोदरी को इस तरह रावण का जाना अच्छा नहीं लगता है। वो मृत्यु प्राप्त करने के लिए कमंडल में भरे विष का पान कर लेती है। कमंडल के रक्त को पीने के कुछ समय बाद मंदोदरी गर्भवती हो जाती है। गर्भवती होने के बाद मंदोदरी घबरा जाती है कि महल में मौजूद अन्य लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे। फिर मंदोदरी तीर्थ यात्रा का नाम लेकर कुरुक्षेत्र चली जाती है। वहां मंदोदरी एक बच्ची को जन्म देती है, लेकिन लोक-लाज के चलते वो उसे एक कलश में रखकर जमीन में दफना देती है। कुछ दिनों बाद राजा जनक भी कुरुक्षेत्र जाते हैं। जब वह जमीन में हल चलाते हैं, तो उन्हें वहां कलश मिलता है, जिसमें मंदोदरी ने बच्ची को रखा था। बच्ची को कलश से निकालते ही आसमान से फूलों की वर्षा होने लगती है और साथ में आकाशवाणी भी होती है। आकाशवाणी में राजा जनक द्वारा उस कन्या के लालन-पालन की बात कही जाती है। हल के सीत (हल के आगे का नुकीला भाग) से टकराने की वजह से कलश मिला था, इसलिए राजा जनक ने कन्या का नाम सीता रखा।

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रामायण की कहानी: रावण के दस सिर का रहस्य

रावण के बारे में हर कोई जानता है। वह राक्षस वंश का था और उसके द्वारा की गई गलतियों के कारण हर साल दशहरे के दिन रावण दहन भी किया जाता है। वैसे क्या आपको मालूम है कि महान विद्वान और पंडित होने के साथ-साथ रावण भगवान शिव का परम भक्त भी था। एक बार की बात है, रावण ने सोचा कि क्याें न अपने आराध्य शिव जी को प्रसन्न किया जाए। यह विचार कर वह तपस्या में लीन हो गया। बहुत समय तक तपस्या करने के बाद भी शिव जी प्रसन्न नहीं हुए, तो रावण ने अपना सिर काट कर शिव जी को अर्पण कर दिया। इसके बाद उसका सिर फिर से जुड़ गया। इसके बाद उसने फिर से अपना सिर काट दिया, लेकिन उसका सिर फिर से जुड़ गया। इस तरह एक-एक करके उसने दस बार अपना सिर काटा और हर बार उसका सिर जुड़ जाता। रावण की इस तपस्या को देख कर शिव जी प्रसन्न हो गए और उन्होंने वरदान के साथ ही उसे दस सिर भी दे दिए। इस तरह रावण का नाम पड़ा दशानंद पड़ा। रावण के दस सिर होने को लेकर इस कहानी के साथ-साथ कई अन्य कहानियां भी प्रचलित हैं। ऐसा कहा जाता है कि रावण दस सिर नहीं थे, वह सिर्फ दस सिर होने का भ्रम पैदा करता था। वहीं, कुछ का यह भी मानना है कि रावण छह दर्शन और चार वेदों को जानने वाला था, इसीलिए उसे दसकंठी भी कहा जाता था। शायद इस कारण से भी उसे दशानंद भी कहा जाता था।

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रामायण की कहानी: भगवान राम की मृत्यु

धरती पर भगवान राम ने अपने सारे काम कर लिए थे, अब उनकी मृत्यु का वक्त सामने आ गया था। ऐसे में यमराज ने एक साधू का रूप लिया और राम के नगर पहुंच गए। वो राम के महल पहुंचे और उनसे मिलने का वक्त तय किया। फिर वो श्री राम से मिलें और उन्होंने उनके बीच होने वाली बातों को सबसे छुपाकर रखने की शर्त रखी। साथ ही यह भी कहा कि अगर हम दोनों की बातों के बीच कोई भी आएगा, तो दरवाजे पर खड़े द्वाररक्षक को मृत्युदंड (यानी मरना पड़ेगा) दिया जाएगा। श्री राम ने साधू रूप धारण किए यमराज की बात मान ली और हनुमान जी के न रहने के कारण राम ने भाई लक्ष्मण को द्वारपाल बना दिया। फिर यमराज अपने असली रूप में आएं और बोले, “भगवान आपका पृथ्वी पर जीवन पूरा हो चुका है। अब आपका अपने लोक लौटने का वक्त आ गया है।” यमराज और भगवान राम के बीच बातचीत चल ही रही थी कि उसी वक्त दरवाजे पर ऋषि दुर्वासा पहुंच गए। उन्होंने लक्ष्मण को दरवाजे से हटने को कहा और अंदर जाने की जिद पर अड़ गए । लक्ष्मण ने मना किया, तो वह श्रीराम को श्राप देने की बात करने लगे। लक्ष्मण काफी परेशान हो गए। अगर श्रीराम की बात नहीं मानी, तो उन्हें मरना होगा और अगर ऋषि की बात नहीं मानी, तो श्रीराम को श्राप लगेगा। इस स्थिति में उन्होंने एक मुश्किल फैसला लिया और ऋषि को अंदर जाने दिया। बातचीत के बीच ऋषि को देख भगवान श्रीराम चिंतित हो गए कि अब उनको लक्ष्मण को मारने की सजा देनी होगी। ऐसे में भगवान राम ने लक्ष्मण को नगर से निकाल दिया। लक्ष्मण ने अपने भाई के वादे को निभाने के लिए सरयू नदी में जाकर जल समाधि (डूब गए) ले ली। लक्ष्मण के बारे में जानने के बाद राम बहुत दुखी हुए। फिर भगवान श्री राम ने भी जल समाधि लेने का फैसला किया। श्री राम भी सरयू नदी में जल समाधि लेने के निकल पड़े। उस वक्त वहां भरत, शत्रुघ्न, हनुमान, सुग्रीव और जामवंत भी मौजूद थे। देखते ही देखते भगवान श्रीराम सरयू नदी में समा गए। कुछ ही देर बाद नदी के अंदर से भगवान अपने विष्णु रूप में सबके सामने प्रकट हुए। उन्होंने अपने भक्तों समेत वहां मौजूद हर किसी को दर्शन दिए। इस तरह भगवान राम धरती पर अपने जीवन को पूरा कर स्वर्ग लौट गए।

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रामायण की कहानी: भगवान राम की बहन शांता

अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्नियों और उनसे होने वाले चार पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन भगवान राम की बड़ी बहन के बारे में हर किसी को नहीं पता। वाल्मीकि रामायण में भी राम की बहन शांता के बारे में जानकारी नहीं है, लेकिन दक्षिण पुराण में भगवान राम की बहन शांता का इतिहास जरूर मिलता है। भगवान राम की बहन शांता का सच यह है कि शांता राम की बड़ी बहन और माता कौशल्या की बेटी थी। वह बहुत ही सुन्दर और हर कार्य में निपुण थी। शास्त्र से लेकर पाक कला तक में एकदम पारंगत। वहीं, रानी कौशल्या की बहन थी रानी वर्षिणी, जिनका विवाह अंगदेश के राजा रोमपद के साथ हुआ था। दुर्भाग्य की बात यह थी कि किन्हीं कारणों उनकी कोई भी सन्तान न हो सकी। एक दिन वर्षिणी राजा रोमपद के साथ कौशल्या से मिलने अयोध्या आई। जब सभी एक साथ बैठकर भोजन कर रहे थे, तभी वर्षिणी ने दशरथ की पुत्री शांता की शालीनता और कार्यकुशलता से मोहित होकर अपनी एक इच्छा प्रकट की। वर्षिणी ने कहा, “वैसे तो मेरी कोई भी सन्तान नहीं है, लेकिन मेरी इच्छा है कि शांता की तरह ही मेरी भी एक पुत्री हो।” वर्षिणी की इस बात पर राजा दशरथ उन्हें शांता को गोद देने का वचन दे देते हैं। इस प्रकार राजकुमारी शांता अंगदेश के राजा रोमपद की पुत्री बन जाती है। एक दिन राजा रोमपद किसी काम में इतना खोये रहते हैं कि उनकी चौखट पर आए ब्राह्मण की आवाज उन्हें सुनाई ही नहीं देती। फलस्वरूप, ब्राह्मण को खाली हाथ वापस लौटना पड़ता है। देवराज इंद्र को राजा रोमपद द्वारा किया गया ब्राह्मण का यह अपमान जरा भी रास नहीं आता। वह अंगदेश में वर्षा न करने का निश्चय कर लेते हैं। ऐसे में बिना वर्षा अंगदेश में सूखा पड़ जाता है। इस वजह से अकाल की स्थिति पैदा हो जाती है। इस समस्या से उबरने के लिए राजा रोमपद ऋषि श्रंग के पास जाते हैं और उनसे इस समस्या का उपाय पूछते हैं। ऋषि राजा को यज्ञ कराने की सलाह देते हैं, जिससे रूठे इंद्र देव को मनाया जा सके। राजा रोमपद ऐसा ही करते हैं और यज्ञ के बाद अंगदेश में पुनः वर्षा होती है। इससे अंगदेश में आई समस्या का अंत होता है। ऋषि श्रंग से प्रसन्न होकर राजा रोमपद उनसे अपनी पुत्री शांता का विवाह करा देते हैं। शांता के बाद राजा दशरथ के कोई सन्तान नहीं थी। इसके लिए वह बहुत ही चिंतित रहते थे। इसी कारण वह भी ऋषि श्रंग के पास जाते हैं। ऋषि श्रंग उन्हें कामाक्षी यज्ञ कराने की सलाह देते हैं। ऋषि के कहे अनुसार राजा दशरथ कामाक्षी यज्ञ संपन्न कराते हैं और प्रसाद के रूप में खीर बनवाते हैं। यज्ञ समाप्त होने के बाद जो खीर का प्रसाद था, उसे राजा दशरथ की तीनों पत्नियां कौशल्या, सुमित्रा और कैकई ग्रहण करती हैं। कामाक्षी यज्ञ के प्रताप से रानी कौशल्या को पुत्र के रूप में राम, कैकई को भरत और सुमित्रा को लक्ष्मण व शत्रुघ्न की प्राप्ति होती है। चारों पुत्रों को अपनी बहन शांता के बारे में कुछ भी मालूम नहीं होता है। समय के साथ धीरे-धीरे राम को अपनी माता के दुख का पता चलता है। साथ ही भगवान राम की बहन शांता के जीवन का सच, जो कोई नहीं जानता था, राम को मालूम हो जाता है। बहन शांता के बारे में जानने के बाद राम अपनी मां को बहन शांता से मिलवाते हैं और सभी पुराने मतभेदों को दूर कर एक साथ रहने का वचन देते हैं।

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रामायण की कहानी: भगवान राम ने दिया हनुमान को मृत्यु दंड

हनुमान जी को भगवान राम का सबसे प्रिय भक्त माना जाता है। हनुमान जी भगवान राम से बहुत प्रेम करते थे। जब श्री राम अयोध्या के राजा बने तब हनुमान जी दिन रात उनकी सेवा में लगे रहते। एक दिन की बात है श्री राम जी के दरबार में एक सभा चल रही थी। उस सभा में सभी वरिष्ठ गुरु और देवतागण मौजूद थे। चर्चा का विषय था कि राम ज्यादा शक्तिशाली हैं या राम का नाम। सब लोग राम को अधिक शक्तिशाली बता रहे थे और नारद मुनि का कहना था कि राम नाम में ज्यादा ताकत है। नारद मुनि की बात कोई सुन ही नहीं रहा था। हनुमान जी इस चर्चा के दौरान चुपचाप बैठे हुए थे। जब सभा खत्म हुई, तो नारद मुनि ने हनुमान जी से कहा कि ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर वो सब ऋषि मुनियों को नमस्कार करें। हनुमान जी ने पूछा, “ऋषि विश्वामित्र को नमस्कार क्यों न करूं?” नारद मुनि ने जवाब दिया, “वो पहले राजा हुआ करते थे, इसलिए उन्हें ऋषियों में मत गिनो।” नारद जी कहने पर हनुमान जी ने ऐसा ही किया। हनुमान जी सबको नमस्कार कर चुके थे और उन्होंने विश्वामित्र को नमस्कार नहीं किया। इस बात पर ऋषि विश्वामित्र क्रोधित हो गए और उन्होंने राम से कहा कि इस गलती के लिए हनुमान को मौत की सजा दें। श्री राम अपने गुरु विश्वामित्र का आदेश नहीं टाल सकते थे, इसलिए उन्होंने हनुमान को मारने का निश्चय कर लिया। हनुमान जी ने नारद मुनि से इस संकट का समाधान पूछा। नारद ने कहा, “आप बेफिक्र होकर राम नाम का जाप करना शुरू करें।” हनुमान जी ने ऐसा ही किया। वो आराम से बैठकर राम नाम का जाप करने लगे। श्रीराम ने उन पर अपना धनुष बाण तान दिया। साधारण तीर हनुमान जी का बाल भी बांका न कर सके। जब हनुमान जी पर श्री राम के तीरों का कोई असर नहीं हुआ तो उन्होंने ब्रह्माण्ड के सबसे शक्तिशाली शस्त्र ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया, लेकिन राम नाम जपते हुए हनुमान पर ब्रह्मास्त्र का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा। बात को बढ़ता देख नारद मुनि ने ऋषि विश्वामित्र से हनुमान जी को क्षमा करने को कहा। तब जाकर विश्वामित्र ने हनुमान जी को क्षमा किया।

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रामायण की कहानी: लक्ष्मण जी नहीं सोए 14 साल

रामचंद्र जी को जब उनके पिता दशरथ राजपाट सौंपने वाले थे, तभी उनकी दूसरी पत्नी कैकेयी को उनकी दासी मथंरा ने खूब भड़काया। मंथरा ने कहा कि राजा तो आपके बेटे भरत को बनना चाहिए। इसके बाद कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वर मांगे, पहला भरत को गद्दी मिलनी चाहिए और दूसरा राम को 14 वर्ष तक वन में रहना होगा। राजा दशरथ को अपनी पत्नी के वर पूरे करने पड़े। जब रामचंद्र जी वनवास के लिए अयोध्या से निकले, तब लक्ष्मण जी ने भी उनके साथ जाने की इच्छा जाहिर की। लक्ष्मण के वन जाने की बात सुनकर उनकी पत्नी उर्मिला भी साथ जाने की जिद करने लगती है। तब लक्ष्मण अपनी पत्नी उर्मिला को समझाते हैं कि वह अपने बड़े भाई और मां समान भाभी सीता की सेवा करने के लिए जा रहे हैं। अगर तुम वनवास में साथ चलोगी, तो मैं ठीक तरह से सेवा नहीं कर पाऊंगा। लक्ष्मण के सेवा भाव को देखकर उर्मिला साथ जाने की जिद छोड़ देती है और महल में ही रुक जाती है। वन में पहुंचकर लक्ष्मण, भगवान राम और सीता के लिए एक कुटिया बनाते हैं। जब राम और सीता कुटिया में विश्राम करते थे, तब लक्ष्मण बाहर पहरेदारी करते थे। वनवास के पहले दिन जब लक्ष्मण पहरेदारी कर रहे थे, तब उनके सामने निद्रा देवी प्रकट हुईं। लक्ष्मण ने निद्रा देवी से वरदान मांगा कि वह 14 साल तक निद्रा मुक्त रहना चाहते हैं। निद्रा देवी ने कहा कि तुम्हारे हिस्से की नींद किसी और को लेनी होगी। लक्ष्मण कहते हैं कि उनके हिस्से की नींद उनकी पत्नी को दे दें। इस कारण लक्ष्मण 14 साल तक नहीं सोए और उनकी पत्नी उर्मिला लगातार 14 वर्ष तक सोती रही। 14 वर्ष बाद जब भगवान राम और माता सीता के साथ जब लक्ष्मण अयोध्या वापस आए, तब नींद की अवस्था में रामचंद्र जी के राजतिलक समारोह में उर्मिला भी उपस्थित थी। यह देख लक्ष्मण को हंसी आती है। जब लक्ष्मण से हंसी की वजह पूछी गई, तो उन्होंने निद्रा देवी के वरदान के बारे में सब कुछ बताया। लक्ष्मण ने कहा कि जब मैं उबासी लूंगा, तब उर्मिला की नींद खुलेगी। लक्ष्मण जी की इस बात को सुनकर सभा में मौजूद सभी हंस पड़े। सभी को हंसते देख उर्मिला लज्जावश समारोह से उठकर बाहर चली जाती हैं।

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रामायण की कहानी: कुंभकरण की नींद

रामायण में रावण के भाई कुम्भकरण की भूमिका भी अद्भुत है। वो अपने विशाल शरीर और अपनी भूख से ज्यादा अपनी गहरी नींद के लिए जाना जाता था। माना जाता है कि राक्षस वंश का होने के बावजूद कुम्भकरण बुद्धिमान और बहादुर था। उसकी ताकत से देवराज इंद्र भी ईर्ष्या करते थे। एक बार रावण, कुम्भकरण और विभीषण एक साथ ब्रह्मदेव की तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने के लिए कहा। वहीं, दूसरी ओर इंद्र को डर था कि कुम्भकरण वरदान में कहीं स्वर्ग का सिंहासन न मांग लें। इस बात से डरकर, इंद्र ने मां सरस्वती से कुम्भकरण के वरदान के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की। मां सरस्वती ने कुम्भकरण की जीभ बांध दी, जिससे कुम्भकरण के मुख से इंद्रासन की जगह निंद्रासन निकल गया। इससे पहले कि कुम्भकरण को अपनी गलती का अहसास होता, ब्रह्मा तथास्तु बोल चुके थे। रावण सब कुछ समझ गया था, उसने ब्रह्मा से उनके दिए हुए वरदान को वापस लेने के लिये कहा। ब्रह्मा ने एक शर्त के साथ उस वरदान को वापस लिया कि कुम्भकरण 6 माह सोएगा और 6 माह तक जागता रहेगा। इस बात को रावण ने मान लिया। कहा जाता है कि जब राम-रावण का युद्ध हो रहा था, तब कुम्भकरण सो रहा था। उसे जगाने की कोशिश की गई, बहुत प्रयास करने के बाद ही वो नींद से जागा था।

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