MYTHOLOGICAL STORIES

यीशु के जन्म की कहानी | Jesus Christ Birth Story In Hindi

हजारों साल पहले की बात है। नजारेथ नामक शहर में मरियम नाम की एक जवान महिला रहती थी। उन दिनों मरियम का यूसुफ नाम के एक आदमी से प्रेम था। एक रात जब मरियम सो रही थी, तो ईश्वर ने उसके सपने में गेब्रियल नाम के एक स्वर्गदूत को भेजा। उसने मरियम को बताया कि वह जल्द ही एक पवित्र आत्मा वाले पुत्र को जन्म देगी, जिसका नाम उसे यीशु रखना होगा। जब यह बात मरियम ने अपने साथी यूसुफ को बताई, तो बदनामी के डर से इस खबर को सुनते ही यूसुफ ने मरियम से अलग होने का फैसला कर लिया। यह जानकर ईश्वर का वही स्वर्गदूत यूसुफ को उसके सपनों में मिला और उसे बताया कि मरियम एक पवित्र आत्मा को जन्म देगी। इसलिए, उसे मरियम से शादी करनी चाहिए और उसके साथ रहना चाहिए। उस स्वर्गदूत की बात सुनकर यूसुफ ने ऐसा ही किया। उन दिनों नजारेथ शहर पर रोमन साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। जब मरियम गर्भावती हुई, तो उन्हीं दिनों रोमन राज्य में जनगणना चल रही थी। राज्य के नियमों के अनुसार यूसुफ और उसकी पत्नी मरियम भी जनगणना में अपना नाम लिखवाने के लिए येरूशलम के बैतलहम नगर चले गए। हालांकि, बैतलहम में उन्हें रहने के लिए कोई स्थान नहीं मिला, जिस वजह से वे दोनों एक गौशाले में रूक गए। बैतलहम के उसी गौशाले में ही मरियम ने उस पवित्र आत्मा वाले पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम यीशु रखा। जब उस गौशाले में अपने जानवरों की देखभाल करने के लिए एक चरवाहा आया, तो ईश्वर के दूतों ने उसे बताया कि उसका उद्धार करने वाला बैतलहम में आज पैदा हुआ है। पहले तो उसने इस बात पर यकीन नहीं किया, लेकिन जब उसने गौशाला में मरियम, यूसुफ और यीशु को देखा तो वह हैरान रह गया। वहीं, यीशु के जन्म के समय आसमान में एक तेज चमकता हुआ सितारा भी दिखाई दिया था। उसे देखकर एक दूर के शहर में रहने वाले तीन ज्योतिषी भी यीशु के जन्म की खबर को समझ गए थे। वो तीनों उस सितारे का पीछा करते हुए उस गौशाले तक आ गए थे। वहां पहुंचकर उन्होंने प्रभु यीशु को प्रणाम किया। उन्होंने यीशु के परिवार को उपहार दिया और यीशु की पूजा भी की। उन तीनों ज्योतिषियों को यह पता था कि उस राज्य का राजा अच्छा नहीं है। उसे जब इसका पता चलेगा, तो वह यीशु को मार डालेगा। इसलिए, किसी ने भी राजा को यीशु के जन्म के बारे में नहीं बताया। कुछ दिनों के बाद यूसुफ के सपने में एक परी आई, जिसने बताया की राजा हरोदेस यीशु को मारने की योजना बना रहे हैं। इसलिए, वह अपनी पत्नी मरियम व पुत्र यीशु के साथ मिस्र चला गया। वहीं, जब दुष्ट राजा हरोदेस को यीशु की कोई जानकारी नहीं मिली, तो उसने बैतलहम के सभी छोटे बच्चों को मारने का आदेश दे दिया। हालांकि, इस दौरान उस दुष्ट राजा की मृत्यु हो गई। इसके बाद यीशु ने अपने परिवार के साथ मिस्र को छोड़ दिया और तीनों ने इजराइल की यात्रा की। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन नजारेथ में गुजारा। कहानी से सीख ईसा मसीह की कहानी हमें यह सीख देती है कि बुराई की कभी जीत नहीं होती है। बुरे लोगों का विनाश करने के लिए ईश्वर हमेशा किसी न किसी रूप में धरती पर आते हैं।

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नाग पंचमी की व्रत कथा | Nag Panchami Vrat Katha In Hindi

सालों पहले एक नगर में किसी सेठ के सात बेटे रहते थे। सभी की शादी सेठ ने समय रहते करवा दी। सातों बहु मिलकर घर का काम भी किया करती थीं। उन सभी में से सेठ की सबसे छोटी बहु खूब संस्कारी थी। एक दिन यूं ही काम करते हुए घर की बड़ी बहु ने अपनी देवरानियों से कहा कि घर को लीपने के लिए पीली मिट्टी नहीं है। जंगल जाकर मिट्टी लानी होगी। जेठानी के ऐसा कहते ही सभी उसके साथ घर लीपने के लिए मिट्टी लाने के लिए निकल गए। सभी खुरपी से मिट्टी निकाल ही रहे थे कि तभी सबसे बड़ी वाली बहु को एक नाग नजर आया।उसे मारने के लिए जैसे ही बड़ी वाली बहु ने खुरपी उठाई, वैसे ही सबसे छोटी बहु ने कहा, ‘जेठानी जी, इसे मत मारिए। इसकी कोई गलती नहीं है। जंगल तो इसका घर है।’ अपनी देवरानी की बात मानकर उसने नाग को कुछ नहीं किया। तभी उस छोटी बहु ने नाग से कहा कि आप एक जगह पर अलग से बैठ जाइए हम तबतक मिट्टी खोदते हैं। फिर आपके पास आएंगे।इतना कहकर सभी मिट्टी निकालने लगे और कुछ देर बाद घर चले गए। सभी के दिमाग से नाग वाली बात निकल गई थी। अगले दिन छोटी बहु को अचानक से याद आया कि उसने नाग को इंतजार करने के लिए कहा था। वो तुरंत अपनी सभी जेठानियों को अपने साथ लेकर नाग के पास चली गई। वहां देखा तो वो नाग उन सभी के इंतजार में उसी जगह पर बैठा हुआ था। नाग को देखते ही छोटी बहु ने प्यार से कहा, ‘भैया, कल हम लोग आपके पास आना भूल गए थे। उस बात के लिए आप हमें माफ कर दीजिए।’ जवाब में नाग बोला, ‘तुमने मुझे भाई कहा है, इसलिए मैं तुम्हें दण्ड नहीं दे रहा हूं। नहीं तो अबतक मैं तुम्हें डस चुका होता। आज के बाद में तुम हमेशा के लिए मेरी बहन रहोगी। अब तुम अपने भाई से कोई वरदान मांग लो। मैं तुमसे बहुत खुश हूं।’ इतना सब सुनने के बाद छोटी बहु ने नाग को बोला, ‘मेरा कोई भी सगा भाई नहीं है, इसलिए मैंने आपको भाई कहा था। अब से आप मेरे भाई हो। अब हरदम मेरी रक्षा करना आपका फर्ज है। बस यही वरदान मुझे आपसे चाहिए।’ नाग ने हर कदम पर साथ देने का वादा किया और अपने रास्ते निकल गया। सेठ की सारी बहु भी अपने घर लौट गईं। कुछ समय बाद नाग इंसान का रूप बनाकर अपनी बहन से मिलने सेठ के घर गया। उसने सेठ से कहा कि मेरी छोटी बहन को बुला दो। वो आपकी छोटी बहु है। पहले तो उनके मन में हुआ कि बहु का कोई भाई ही नहीं था, ये कहा से आ गया। फिर भी उन्होंने अपनी छोटी बहु को बाहर बुलाया। नाग ने फिर साथ में बहन को अपने घर लेकर जाने की बात की। सेठ ने इसकी भी आज्ञा दे दी। तभी नाग ने अपनी बहन से पूछा, ‘कहीं तुम मुझे भूल तो नहीं गई हो न? जवाब में बहन बोली, ‘नहीं, भैया मैं आपको बिल्कुल नहीं भूली हूं।’ फिर नाग ने कहा, ‘मैं तुम्हें अपने घर लेकर जा रहा हूं। तुम मेरी पूंछ पकड़कर चलती रहना पीछे।’ उसकी बहन ने वैसा ही किया। कुछ ही देर बाद वो एक बड़े से मकान में पहुंच गए। वहां हर तरफ सोना-चांदी और अन्य कीमती सामान थे। वहां नाग की बहन आराम से कुछ दिनों के लिए रहने लगी। नाग की मां भी उसे खूब प्यार करती थी। एक दिन नाग की मां ने छोटी बहु को अपने भाई के लिए दूध लेकर जाने के लिए कहा। छोटू बहु ने दूध को गर्म किया और भाई को पीने के लिए दे दिया। अब गर्म दूध पीते ही नाग का मुंह जलने लगा। ये सब देखकर नाग की मां को खूब गुस्सा आया। नाग ने किसी तरह से अपनी मां के गुस्से को शांत किया और बताया कि उसकी बहन को नहीं पता था कि मैं गर्म दूध नहीं पी सकता हूं। अब नाग के परिवार के साथ कुछ समय बीताने के बाद सेठ की छोटी बहु अपने घर जाने लगी। नाग ने अपनी बहन को खूब सारी दौलत और आभूषण देकर विदा किया। बहु के साथ घर में इतना सारा धन आते देख सेठ और उसकी जेठानियां हैरान हो गईं। एक दिन नाग की बहन को घर की बड़ी बहु ने कहा कि तुम अपने भाई से और सोना-चांदी लेकर आओ। उसके पास तो खूब पैसा है, वो तुम्हें मना नहीं करेगा। छोटी बहु ने अपने भाई नाग को यह बात बताई। इसके बारे में पता चलते ही नाग ने अपनी बहन का घर तरह-तरह के आभूषणों से भर दिया।सभी जेवरातों में से एक हीरे का हार बेशकीमती था। उसे देखते ही हर किसी का मन उसपर आ जाता था। होते-होते उस हीरे की हार की खबर राज्य की रानी तक पहुंची। उसने छोटी बहु से हार लेकर खुद अपने पास रख लिया। दुखी होकर सेठ की छोटी बहु ने अपने भाई को इसके बारे में बताया।गुस्से में उसके नाग भाई ने रानी के गले के हीरे के हार को नाग बना दिया। इससे डरकर रानी ने एकदम हार को अपने गले से उतारा और सेठ की छोटी बहु को महल बुलवाया। उसके महल पहुंचते ही रानी ने छोटी बहु को बताया कि कैसे हार उसके गले में नाग बन गया था और उससे इसकी वजह पूछने लगी? तब सेठ की छोटी बहु ने बताया की नाग भाई ने यह हार सिर्फ मुझे पहनने के लिए दिया है। इसे कोई दूसरा इंसान गले में डालेगा, तो यह तुरंत सांप बन जाएगा। इस बात को सही साबित करने के लिए रानी ने सेठ की छोटी बहु को सांप बन चुके हार को पहनने के लिए कहा। छोटी बहु ने जैसे ही नाग बने हार को गले में डाला, तो वो दोबारा हीरे के हार में बदल गया। महारानी ने ये सब होते हुए खुद अपनी आंखों से देखा और हैरान रह गई। अब उसे सेठ की छोटी बहु की बात पर यकीन हो गया। उसने हार छोटी बहु को अपने साथ लेकर जाने

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जितिया की व्रत कथा | Jitiya Ki Katha In Hindi

सालों पहले नर्मदा नदी के ठीक पास कंचनबटी नाम का एक नगर बसा हुआ था। वहां राजा मलयकेतु का शासन था। कंचनबटी नगर के पास में ही एक रेतीली बालुहटा नामक जगह थी, जिसके पास में एक बड़ा-सा पेड़ था। उस पेड़ में एक चील रहती थी और नीचे एक गीदड़। दोनों में गहरी दोस्ती थी। एक दिन दोनों ने सोचा कि सारी महिलाएं जितिया व्रत करती हैं, तो क्यों न हम भी कर लें। इसी सोच के साथ दोनों ने ठान ली कि अब वो भी इस व्रत को करेंगी। उन्होंने श्री जीऊतवाहन भगवान को मन-ही-मन नमस्कार करते हुए कहा, ‘हम आपकी पूजा और व्रत पूरी विधि के साथ करेंगे।’ जैसे ही व्रत का दिन आया, तो पास के ही एक धनवान व्यापारी की मौत हो गई। उसको अंतिम विदाई देने के लिए बालुहटा ही लाया गया, जहां गीदड़ और चील रहते थे। व्रत के दिन गीदड़ ने मरे हुए व्यक्ति को देखा, तो उसे भूख लग गई। वो खुद को रोक नहीं पाई और मांस खाने की वजह से उसका व्रत उसी वक्त टूट गया। उस व्यापारी के शव को चील ने भी देखा था, लेकिन उसने व्रत के कारण उसे नहीं खाया। उसके बाद चील और गीदड़ दोनों अगले जन्म में कंचनवटी के भास्कर नामक ब्राह्मण के घर में बेटी के रूप में पैदा हुए। चील का जन्म बड़ी बहन के रूप में हुआ, जिसका नाम शीलवती पड़ा और उसकी शादी बुद्धिसेन नामक लड़के से कराई गई। गीदड़ का जन्म उसकी छोटी बहन कपुरावती के रूप में हुआ। समय होने पर उसका विवाह कंचनवटी के राजा मलयकेतु से उसके पिता ने करवाया। भले ही कपुरावती विवाह के बाद कंचनबटी की रानी बन गई हो, लेकिन उसे बेटा का सुख नहीं मिला। उसके घर जितने भी बच्चे जन्म लेते थे, वो उसी दिन मर जाते। ऐसा होते-होते कपुरावती काफी परेशान हो गई। इधर, उसकी बड़ी बहन शीलवती को सात बेटे हुए थे। जब उसके सारे बेटे बड़े हो गए, तो उन्होंने महल में कार्य करना शुरू कर दिया। अपनी दीदी के बेटों को देखकर धीरे-धीरे कपुरावती रानी के मन में जलन का भाव पैदा होने लगा। उसने इसी जलन की वजह से अपने पति को कहकर अपनी दीदी के सारे बेटों के सिर कटवाकर एक बर्तन में रख दिए। उन सभी सात बर्तनों को कपुरावती ने लाल रंग के कपड़े से ढक दिया और अपनी दीदी शीलवती के पास भिजवा दिया। भगवान जीऊतवाहन भी ये सब देख रहे थे। उन्होंने रास्ते में ही सभी सात भाइयों के सिर को धड़ से जोड़ा और अमृत पिलाकर जिंदा कर दिया। फिर सभी भाई अपने घर चले गए और उन बर्तन में भगवान की कृपा से फल भर गए। उधर, कुपरावती अपनी दीदी के घर से शोक समाचार मिलने के इंतजार में बैठी हुई थी। जब कोई संदेश नहीं आया, तो वो खुद ही शीलवती के घर चली गई। वहां जैसे ही उसने अपनी दीदी के सारे बेटों को जिंदा देखा, तो वो हैरान हो गई। कुछ देर बाद उसने दीदी शीलवती को अपनी हरकत के बारे में बताया। उसने कहा कि किस तरह से उसने बर्तनों में उसके बेटों के सिर काटकर डाल दिए थे और जोर-जोर से रोने लगी। तभी शीलवती को अपने पिछले जन्म के बारे में याद आ गया। वो अपनी छोटी बहन को उसी पेड़ को पास लेकर गई, जहां वो दोनों पहले रहा करते थे। उसने कपुरावती को  पिछले जन्म में रखे जितिया व्रत की पूरी कहानी सुनाी। यह सब जानते ही कपुरावती ने उसी वक्त अपना दम तोड़ दिया। राजा को तुरंत शीलवती ने इस बात की जानकारी भिजवाई। अपनी पत्नी के बारे में दुख भरा समाचार मिलते ही राजा वहां पहुंचे और कपुरवती को उसी पेड़ के नीचे अंतिम विदाई दी।

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माता शबरी की कथा | Mata Sabri Ki Katha In Hindi

बात भगवान राम के जन्म से पहले की है, जब भील आदिवासी कबीले के मुखिया अज के घर बेटी पैदा हुई थी। उसका एक नाम श्रमणा और दूसरा नाम शबरी रखा गया। शबरी की मां इन्दुमति उसे खूब प्यार करती थी। बचपन से ही शबरी पशु-पक्षियों की भाषा समझकर उनसे बातें करती और जब सबरी की मां उसे देखती, तो कुछ समझ नहीं पाती थी। कुछ समय बाद एक पंडित ने शबरी के परिवार को बताया कि वो आगे चलकर संन्यासी बन सकती है। इस बात का पता चलते ही शबरी के पिता ने उसका रिश्ता तय कर दिया। जैसे ही शादी का दिन नजदीक आया, शबरी के घर वालों ने खूब सारी बकरियां और अन्य जानवर घर के पास लाकर बांध दिए। एक दिन शबरी का मां जब उसके बाल बना रही थी, तो उसने मां से पूछा, “इतने सारे जानवर हमारे घर क्यों लाए गए हैं।” मां ने जवाब दिया, ‘बेटी, तुम्हारा विवाह होने वाला है, इसलिए हम लोगों ने इनका इंतजाम बलि के लिए किया है। तुम्हारी शादी के दिन ही बलि प्रथा होगी और फिर इनसे स्वादिष्ट भोजन बनाकर सबको परोसा जाएगा।’ यह सब सुनकर शबरी दुखी हो गई। काफी देर तक शबरी ने उन जानवरों को आजाद करने के बारे में सोचा। सोचते-सोचते शबरी के मन में हुआ कि अगर ये जानवर यहां नहीं होंगे, तो इनकी बलि रूक सकती है। ऐसा नहीं हुआ, तो मेरे घर से कहीं चले जाने पर ही यह बलि रुकेगी। जब मैं ही नहीं रहूंगी, तब न विवाह होगा और न ही बलि प्रथा। इससे मासूम जानवर बच जाएंगे।इसी सोच के साथ जानवरों को रखी गई जगह पर सबरी पहुंची। उसने सोचा कि उन्हें खोल देती हूं, लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई। उसके बाद शबरी जंगल की तरफ भागने लगी। भागते-भागते शबरी ऋषिमुख पर्वत पहुंच गई। वहां करीब दस हजार ऋषि रहा करते थे। शबरी को लगा कि वो भी इसी जंगल में किसी तरह ऋषि-मुनियों की सेवा करके अपना जीवन जी लेगी। वो चुपचाप उसी जंगल में एक हिस्से में किसी तरह से रहने लगी। शबरी रोजाना ऋषि-मुनियों की झोपड़ी के आगे झाड़ु लगाती और हवन के लिए लकड़ियां भी लाकर रख देती। ऋषि-मुनियों को समझ नहीं आ रहा था कि जंगल में उनके काम अपने आप कैसे हो रहे हैं। एक दिन शबरी को किसी ऋषि ने देख लिया। उसे देखते ही उसका परिचय पूछा। जैसे ही शबरी ने बताया कि वो भील आदिवासी परिवार से संबंध रखती है, तो उसे ऋषियों ने खूब डांट लगाई। शबरी को इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं था कि उसकी जाति छोटी है और उसे ऋषियों द्वारा जाति की वजह अपमान सहन करना पड़ेगा।इतना सब होने के बाद भी शबरी हर ऋषि-मुनि के दरवाजे पहुंचती और उनके आंगन में झाड़ू लगाकर उनसे गुरु दीक्षा देने के लिए कहती। हर कोई शबरी को उसकी जाति की वजह से अपने आश्रम से भगा देता था। ऐसा होते-होते काफी समय बीत गया। उसके बाद शबरी मतंग ऋषि की कुटिया में पहुंची।वहां पहुंचकर मतंग ऋषि को सबरी ने बताया कि वो उनसे गुरु दीक्षा लेना चाहती है। उन्होंने खुशी-खुशी उसे अपने गुरुकुल में रहने दिया और भगवान से जुड़ा ज्ञान देते रहे। शबरी ने भी अपने गुरु मतंग ऋषि की सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वो गुरुकुल के भी सारे काम करती थी। शबरी से खुश होकर मतंग ऋषि ने उसे बेटी मान लिया था। समय के साथ मतंग ऋषि का शरीर बूढ़ा हो गया। उन्होंने एक दिन शबरी को अपने पास बुलाया और कहा, ‘बेटी मैं अपना देह त्यागना चाह रहा हूं। बहुत साल हो गए इस शरीर में रहते-रहते।’ शबरी ने दुखी मन से कहा, ‘आपके ही सहारे मैं इस जंगल में रह पाई हूं। आप ही चले जाएंगे, तो मैं जीकर क्या करुंगी। आप अपने संग मुझे भी ले जाइए। मैं भी देह त्याग दूंगी मतंग ऋषि ने जवाब दिया, ‘बेटी, तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। राम तुम्हारी चिंता करेंगे और ध्यान भी रखेंगे।’ शबरी ने ‘राम’ का नाम सुनने के बाद पूछा, ‘वो कौन हैं और उन्हें मैं किस तरह से ढूढूंगी।’ मंतग ऋषि ने बताया, ‘राम कोई और नहीं भगवान हैं। वो तुम्हें सारे अच्छे कर्मों का फल देंगे। तुम्हें उन्हें ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है। वो एक दिन खुद तुम्हें खोजते हुए इस कुटिया में आएंगे और तु्म्हें उनके हाथों ही मोक्ष मिलेगा। तब तक तुम इसी आश्रम में रहो।’ इतना कहते ही मंतग ऋषि ने अपना शरीर त्याग दिया।शबरी के मन में मंतग ऋषि के जाने के बाद से एक ही बात थी कि भगवान राम स्वयं उससे मिलने आएंगे। वो रोज भगवान राम से मिलने के लिए बाग से अच्छे-अच्छे फूल लाकर पूरा आश्रम सजाती और भगवान के लिए बेर तोड़कर लाती। भगवान के लिए बेर चुनते हुए शबरी उन्हें चख लेती थी, ताकि भगवान वो सिर्फ मीठे बेर ही दे। रोजाना शबरी इसी तरह भगवान के दर्शन की आस में फूल और बेर इकट्ठा करती रहती थी। इसी तरह इंतजार में कई साल बीत गए। शबरी का शरीर एकदम वृद्ध हो गया। एक दिन आश्रम के पास के ही तलाब में शबरी पानी लेने के लिए गई। तभी पास के ही एक ऋषि ने उसे अछूत कहते हुए वहां से भागने के लिए कहा और एक पत्थर मार दिया। वो पत्थर जब शबरी को लगा, तो उसे चोट लगी और खून बहने लगा। बहते हुए खून की एक बूंद उसी तलाब के पानी में गिर गई। तभी पूरा तालाब का पानी खून में बदल गया। ये सब होता देखकर ऋषि ने शबरी को ही डांटा और कहा कि पापीन तुम्हारी वजह से पूरा पानी खराब हो गया। रोज ऋषि उस पानी को साफ करने के लिए अपनी कई तरह की विद्याओं का इस्तेमाल करते। कई सारे जतन करने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। फिर उन्होंने गंगा जैसी कई पवित्र नदियों का जल भी उस तालाब में डाला। फिर भी तालाब का पानी साफ नहीं हो पाया और वो खून जैसा ही रहा। कई सालों तक तालाब के पानी को साफ करने की कोशिश के बाद भी कुछ काम नहीं आया, तो ऋषि ने थककर सबकुछ छोड़

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योगिनी एकादशी व्रत के दिन पढ़ें यह कथा, मिटेंगे दुख और पाप

आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष का योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) व्रत 24 जून शुक्रवार को है। यह एकादशी पापों के प्रायश्चित के लिए विशेष महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन श्री हरि के ध्यान, भजन और कीर्तन से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है। योगिनी एकादशी के दिन उपवास रखने और साधना करने से समस्याओं का अंत हो जाता है। यहां तक कि पीपल का पेड़ काटने का पाप भी इस एकादशी पर नष्ट हो जाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य प्राप्त होता है। जो लोग योगिनी एकादशी व्रत रहेंगे, वे योगिनी एकादशी व्रत कथा को अवश्य पढ़ें। ज्योतिष के जानकारों के मुताबिक, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान भगवान शंकर सृष्टि का संचालन करते हैं। इन महीनों में शुभ कार्यों की मनाही होती है। निर्जला एकादशी और देवशयनी एकादशी के बीच योगिनी एकादशी व्रत रखा जाता है। इसलिए इसे बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। योगिनी एकादशी का शुभ मुहूर्त योगिनी एकादशी का व्रत 24 जून को रखा जाएगा। एकादशी तिथि 23 जून रात 9:41 बजे से शुरू होगी और 24 जून को सूर्योदय तक रहेगी। 25 जून को एकादशी व्रत का पारण किया जाएगा। योगिनी एकादशी व्रत के नियम – सुबह नहाकर सूर्य देव को जल अर्पित करें। इसके बाद पीले कपड़े पहनकर भगवान विष्णु की पूजा करें।– श्रीहरि को पीले फूल, पंचामृत और तुलसी दल अर्पित करें।– इसके बाद श्री हरि और मां लक्ष्मी के मन्त्रों का जाप करें। किसी निर्धन व्यक्ति को जल, अनाज, कपड़े, जूते और छाते का दान करें। – इस दिन केवल जल और फल ग्रहण करके ही उपवास रखें।

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होली का वास्तविक स्वरुप

इस पर्व का प्राचीनतम नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है अर्थात् बसन्त ऋतु के नये अनाजों से किया हुआ यज्ञ, परन्तु होली होलक का अपभ्रंश है। यथा–तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलक: (शब्द कल्पद्रुम कोष) अर्धपक्वशमी धान्यैस्तृण भ्रष्टैश्च होलक: होलकोऽल्पानिलो मेद: कफ दोष श्रमापह।(भाव प्रकाश) अर्थात्―तिनके की अग्नि में भुने हुए (अधपके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। यह होलक वात-पित्त-कफ तथा श्रम के दोषों का शमन करता है। होलिका―किसी भी अनाज के ऊपरी पर्त को होलिका कहते हैं-जैसे-चने का पट पर (पर्त) मटर का पट पर (पर्त), गेहूँ, जौ का गिद्दी से ऊपर वाला पर्त। इसी प्रकार चना, मटर, गेहूँ, जौ की गिदी को प्रह्लाद कहते हैं। होलिका को माता इसलिए कहते हैं कि वह चनादि का निर्माण करती (माता निर्माता भवति) यदि यह पर्त पर (होलिका) न हो तो चना, मटर रुपी प्रह्लाद का जन्म नहीं हो सकता। जब चना, मटर, गेहूँ व जौ भुनते हैं तो वह पट पर या गेहूँ, जौ की ऊपरी खोल पहले जलता है, इस प्रकार प्रह्लाद बच जाता है। उस समय प्रसन्नता से जय घोष करते हैं कि होलिका माता की जय अर्थात् होलिका रुपी पट पर (पर्त) ने अपने को देकर प्रह्लाद (चना-मटर) को बचा लिया। अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है और बसन्त ऋतुओं में नये अन्न से यज्ञ (येष्ट) करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है। यथा―वासन्तो=वसन्त ऋतु। नव=नये। येष्टि=यज्ञ। इसका दूसरा नाम नव सम्वतसर है। मानव सृष्टि के आदि से आर्यों की यह परम्परा रही है कि वह नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव पितरों को समर्पित करते थे। तत्पश्चात् स्वयं भोग करते थे। हमारा कृषि वर्ग दो भागों में बँटा है―(1) वैशाखी, (2) कार्तिकी। इसी को क्रमश: वासन्ती और शारदीय एवं रबी और खरीफ की फसल कहते हैं। फाल्गुन पूर्णमासी वासन्ती फसल का आरम्भ है। अब तक चना, मटर, अरहर व जौ आदि अनेक नवान्न पक चुके होते हैं। अत: परम्परानुसार पितरों देवों को समर्पित करें, कैसे सम्भव है। तो कहा गया है–अग्निवै देवानाम मुखं अर्थात् अग्नि देवों–पितरों का मुख है जो अन्नादि शाकल्यादि आग में डाला जायेगा। वह सूक्ष्म होकर पितरों देवों को प्राप्त होगा। हमारे यहाँ आर्यों में चातुर्य्यमास यज्ञ की परम्परा है। वेदज्ञों ने चातुर्य्यमास यज्ञ को वर्ष में तीन समय निश्चित किये हैं―(1) आषाढ़ मास, (2) कार्तिक मास (दीपावली) (3) फाल्गुन मास (होली) यथा फाल्गुन्या पौर्णामास्यां चातुर्मास्यानि प्रयुञ्जीत मुखं वा एतत सम्वत् सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी आषाढ़ी पौर्णमासी अर्थात् फाल्गुनी पौर्णमासी, आषाढ़ी पौर्णमासी और कार्तिकी पौर्णमासी को जो यज्ञ किये जाते हैं वे चातुर्यमास कहे जाते हैं आग्रहाण या नव संस्येष्टि। समीक्षा―आप प्रतिवर्ष होली जलाते हो। उसमें आखत डालते हो जो आखत हैं–वे अक्षत का अपभ्रंश रुप हैं, अक्षत चावलों को कहते हैं और अवधि भाषा में आखत को आहुति कहते हैं। कुछ भी हो चाहे आहुति हो, चाहे चावल हों, यह सब यज्ञ की प्रक्रिया है। आप जो परिक्रमा देते हैं यह भी यज्ञ की प्रक्रिया है। क्योंकि आहुति या परिक्रमा सब यज्ञ की प्रक्रिया है, सब यज्ञ में ही होती है। आपकी इस प्रक्रिया से सिद्ध हुआ कि यहाँ पर प्रतिवर्ष सामूहिक यज्ञ की परम्परा रही होगी इस प्रकार चारों वर्ण परस्पर मिलकर इस होली रुपी विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते थे। आप जो गुलरियाँ बनाकर अपने-अपने घरों में होली से अग्नि लेकर उन्हें जलाते हो। यह प्रक्रिया छोटे-छोटे हवनों की है। सामूहिक बड़े यज्ञ से अग्नि ले जाकर अपने-अपने घरों में हवन करते थे। बाहरी वायु शुद्धि के लिए विशाल सामूहिक यज्ञ होते थे और घर की वायु शुद्धि के लिए छोटे-छोटे हवन करते थे दूसरा कारण यह भी था। ऋतु सन्धिषु रोगा जायन्ते―अर्थात् ऋतुओं के मिलने पर रोग उत्पन्न होते हैं, उनके निवारण के लिए यह यज्ञ किये जाते थे। यह होली हेमन्त और बसन्त ऋतु का योग है। रोग निवारण के लिए यज्ञ ही सर्वोत्तम साधन है। अब होली प्राचीनतम वैदिक परम्परा के आधार पर समझ गये होंगे कि होली नवान्न वर्ष का प्रतीक है। *पौराणिक मत में कथा इस प्रकार है―होलिका हिरण्यकश्यपु नाम के राक्षस की बहिन थी। उसे यह वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यपु का प्रह्लाद नाम का आस्तिक पुत्र विष्णु की पूजा करता था। वह उसको कहता था कि तू विष्णु को न पूजकर मेरी पूजा किया कर। जब वह नहीं माना तो हिरण्यकश्यपु ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को आग में लेकर बैठे। वह प्रह्लाद को आग में गोद में लेकर बैठ गई, होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। होलिका की स्मृति में होली का त्यौहार मनाया जाता है जो नितान्त मिथ्या है।

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प्रेरक कथा: श्री कृष्ण मोर से, तेरा पंख सदैव मेरे शीश पर होगा! (Prerak Katha Shri Krishn Mor Se Tera Aankh Sadaiv Mere Shish)

श्री कृष्ण के लीला काल का समय था, गोकुल में एक मोर रहता था, वह मोर बहुत चतुर था और श्री कृष्ण का भक्त था, वह श्री कृष्ण की कृपा पाना चाहता था। इसके लिए उस मोर ने एक युक्ति सोची वह श्री कृष्ण के द्वार पर जा पहुंचा, जब भी श्री कृष्ण द्वार से अंदर-बाहर आते-जाते तो उनके द्वार पर बैठा वह मोर एक भजन गाता।मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे!… इस प्रकार प्रतिदिन वह यही गुनगुनाता रहता एक दिन हो गया, 2 दिन हो गये इसी तरह 1 साल व्यतीत हो गया, परन्तु कृष्ण जी ने उसकी एक ना सुनी एक दिन दुखी होकर मोर रोने लगा। तभी वहा से एक मैना उडती जा रही थी, उसने मोर को रोता हुए देखा तो बहुत अचंभित हुई। वह अचंभित इस लिए नहीं थी की मोर रो रहा था वह इस लिए अचंभित हुई की श्री कृष्ण के द्वार पर कोई रो रहा था। मैना मोर के पास गई और उससे उसके रोने का कारण पूंछा वह मोर से बोली -हे मोर तू क्यों रोता हैं तब मोर ने बताया की पिछले एक वर्ष से में इस छलिये को रिझा रहा हु, परन्तु इसने आज तक मुझे पानी भी नही पिलाया। यह सुनकर मैना बोली -में श्री राधे के बरसना से आई हु.. तू मेरे साथ वहीं चल, राधे रानी बहुत दयालु हैं वह तुझ पर अवश्य ही करुणा करेंगी। मोर ने मैना की बात से सहमति जताई और दोनों उड़ चले बरसाने की और उड़ते उड़ते बरसाने पहुच गये। राधा रानी के द्वार पर पहुँच कर मैना ने गाना शुरू किया श्री राधे राधे, राधे बरसाने वाली राधे… परन्तु मोर तो बरसाने में आकर भी यही दोहरा रहा था मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे!… जब राधा जी ने ये सुना तो वो दोड़ी चली आई और प्रेम से मोर को गले लगा लिया, और मोर से पूंछा कि तू कहाँ से आया है। तब मोर बोला -जय हो राधा रानी आज तक सुना था की तुम करुणामयी हो और आज देख भी लिया। राधा रानी बोली वह कैसे तब मोर बोला में पिछले एक वर्ष से के द्वार पर कृष्ण नाम की धुन गाता रहा हु किन्तु कृष्ण जी ने मेरी सुनना तो दूर कभी मुझको थोड़ा सा पानी भी नही पिलाया.. राधा रानी बोली अरे नहीं मेरे कृष्ण ऐसे नहीं है, तुम एक बार फिर से वही जाओ किन्तु इस बार कृष्ण-कृष्ण नहीं राधे-राधे रटना। मोर ने राधा रानी की बात मान ली और लौट कर गोकुल वापस आ गया फिर से कृष्ण के द्वार पर पहुंचा और इस बार रटने लगा जय राधे राधे! जय राधे राधे! जय राधे राधे!… जब कृष्ण जी ने ये सुना तो भागते हुए आये और उन्होंने भी मोर को प्रेम से गले लगा लिया और बोले हे मोर, तू कहा से आया हैं। यह सुनकर मोर बोला – वाह रे छलिये जब एक वर्ष से तेरे नाम की रट लगा रहा था, तो कभी पानी भी नही पूछा और जब आज जय राधे राधे..बोला तो भागता हुआ आ गया ! कृष्ण बोले अरे बातो में मत उलझा, पूरी बात बता..! तब मोर बोला में पिछले एक वर्ष से आपके द्वार पर यही गा रहा हूँ। मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे!… किन्तु आपने कभी ध्यान नहीं दिया तो में बरसाने चला गया, इस प्रकार मोर ने समस्त वृतांत कृष्ण जी को कह सुनाया। तब कृष्ण जी बोले – मेने तुझको कभी पानी नहीं पिलाया यह मेने पाप किया है, और तूने राधा का नाम लिया,यह तेरा सौभाग्य है। इसलिए में तुझको वरदान देता हूँ कि जब तक ये सृष्टि रहेगी, तेरा पंख सदेव मेरे शीश पर विराजमान होगा..! और जो भी भक्त राधा का नाम लेगा, वो भी सदा मेरे शीश पर रहेगा..!! अतः श्री कृष्ण के भक्त प्रेमियों यदि श्री कृष्ण का सनिध्ये चाहिए तो प्रेम से कहिये…जय राधे राधे! जय राधे राधे! जय राधे राधे!…

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प्रेरक कथा: श‌िव के साथ ये 4 चीजें जरुर दिखेंगी! (Shiv Ke Sath Ye 4 Cheejen Jarur Dikhengi)

भगवान श‌िव का ध्यान करने मात्र से मन में जो एक छव‌ि उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की। इनके एक हाथ में त्र‌िशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सर्प माला, स‌िर पर त्र‌िपुंड चंदन लगा हुआ है। आप दुन‌िया में कहीं भी जाइये आपको श‌िवालय में श‌िव के साथ ये 4 चीजें जरुर द‌‌िखेगी। क्या यह श‌िव के साथ ही प्रकट हुए थे या अलग-अलग घटनाओं के साथ यह श‌िव से जुड़ते गए।1. श‌िव जी का त्र‌िशूल क्या है?भगवान श‌िव सर्वश्रेष्ठ सभी प्रकार के अस्‍त्र-शस्‍त्रों के ज्ञाता हैं लेक‌िन पौराण‌िक कथाओं में इनके दो प्रमुख अस्‍त्रों का ज‌िक्र आता है एक धनुष और दूसरा त्र‌िशूल। भगवान श‌िव के धनुष के बारे में तो यह कथा है क‌ि इसका आव‌िष्कार स्वयं श‌िव जी ने क‌िया था। लेक‌िन त्र‌िशूल कैसे इनके पास आया इस व‌िषय में कोई कथा नहीं है। माना जाता है क‌ि सृष्ट‌ि के आरंभ में ब्रह्मनाद से जब श‌िव प्रकट हुए तो साथ ही रज, तम, सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए। यही तीनों गुण श‌िव जी के तीन शूल यानी त्र‌िशूल बने। इनके बीच सांमजस्य बनाए बगैर सृष्ट‌ि का संचालन कठ‌िन था। इसल‌िए श‌िव ने त्र‌िशूल रूप में इन तीनों गुणों को अपने हाथों में धारण क‌िया। 2. जानें कैसे आया श‌िव के हाथों में डमरू?भगवन श‌िव के हाथों में डमरू आने की कहानी बड़ी ही रोचक है। सृष्ट‌ि के आरंभ में जब देवी सरस्वती प्रकट हुई तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सष्ट‌ि में ध्वन‌ि जो जन्म द‌िया। लेक‌िन यह ध्वन‌ि सुर और संगीत व‌िहीन थी। उस समय भगवान श‌िव ने नृत्य करते हुए चौदह बार डमरू बजाए और इस ध्वन‌ि से व्याकरण और संगीत के धन्द, ताल का जन्म हुआ। कहते हैं क‌ि डमरू ब्रह्म का स्वरूप है जो दूर से व‌िस्‍तृत नजर आता है लेक‌िन जैसे-जैसे ब्रह्म के करीब पहुंचते हैं वह संकु‌च‌ित हो दूसरे स‌िरे से म‌िल जाता है और फ‌िर व‌िशालता की ओर बढ़ता है। सृष्ट‌ि में संतुलन के ल‌िए इसे भी भगवान श‌िव अपने साथ लेकर प्रकट हुए थे। 3. श‌िव के गले में व‌िषधर नाग कहां से आया?भगवान श‌िव के साथ हमेशा नाग होता है। इस नाग का नाम है वासुकी। इस नाग के बारे में पुराणों में बताया गया है क‌ि यह नागों के राजा हैं और नागलोक पर इनका शासन है। सागर मंथन के समय इन्होंने रस्सी का काम क‌िया था ज‌िससे सागर को मथा गया था। कहते हैं क‌ि वासुकी नाग श‌िव के परम भक्त थे। इनकी भक्त‌ि से प्रसन्न होकर श‌िव जी ने इन्हें नागलोक का राजा बना द‌िया और साथ ही अपने गले में आभूषण की भांत‌ि ल‌िपटे रहने का वरदान द‌िया। 4. श‌िव के स‌िर पर चन्द्र कैसे पहुंचे?श‌िव पुराण के अनुसार चन्द्रमा का व‌िवाह दक्ष प्रजापत‌ि की 27 कन्याओं से हुआ था। यह कन्‍याएं 27 नक्षत्र हैं। इनमें चन्द्रमा रोह‌िणी से व‌िशेष स्नेह करते थे। इसकी श‌िकायत जब अन्य कन्याओं ने दक्ष से की तो दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय होने का शाप दे द‌िया। इस शाप बचने के ल‌िए चन्द्रमा ने भगवान श‌िव की तपस्या की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर श‌िव जी ने चन्द्रमा के प्राण बचाए और उन्हें अपने श‌‌ीश पर स्‍थान द‌िया। जहां चन्द्रमा ने तपस्या की थी वह स्‍थान सोमनाथ कहलाता है। मान्यता है क‌ि दक्ष के शाप से ही चन्द्रमा घटता बढ़ता रहता है।

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कथा: हनुमान गाथा (Katha Hanuman Gatha)

हम आज पवनसुत हनुमान की कथा सुनाते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।वीरों के वीर उस महावीर की गाथा गाते हैं,हम कथा सुनाते हैं ।जो रोम-रोम में सिया राम की छवि बासाते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।वीरों के वीर उस महावीर की गाथा गाते हैं,हम कथा सुनाते हैं ।पुंजिकस्थला नाम था जिसका,स्वर्ग की थी सुंदरी ।वानर राज को जर के जन्मी नाम हुआ, अंजनीकपि राज केसरी ने उससे,ब्याह रचाया था ।गिरी नामक संगपर क्या आनंद,मंगल छाया था ।राजा केसरी को अंजना का,रूप लुभाया था ।देख देख अंजनी को उनका,मान हार्षया था ।वैसे तो उनके जीवन में थी,सब खुशहाली ।परन्तु गोद अंजनी माता की,संतान से थी खाली ।अब सुनो हनुमंत कैसे पवन के पुत्र कहते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।बजरंगबली उस महाबली की,गाथा गाते है, हम कथा सुनाते हैं । हम आज पवनसुत हनुमान की कथा सुनाते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।वीरों के वीर उस महावीर की गाथा गाते हैं,हम कथा सुनाते हैं । पुत्र प्राप्ति कारण मां आंजना,तब की थी भारी ।मदन मुनि प्रसन्न हुए,अंजना पर अति भारी ।बक्तेश्वर भगवान को,जप और तप से प्रशन्न किया ।अंजना ने आकाश गंगा का,पावन जल पिया ।घोर तपस्या करके,वायु देव को प्रसन्न किया ।अंजनी मां को स्पर्श किया,वायु का एक झोंका ।पवन देव हो प्रकट उन्हें,फिर पुत्र प्रदान किया ।इस कारण बजरंग,पवन के पुत्र कहते हैं ।बजरंगबली उस महाबली की,गाथा गाते है, हम कथा सुनाते हैं । हम आज पवनसुत हनुमान की कथा सुनाते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।वीरों के वीर उस महावीर की गाथा गाते हैं,हम कथा सुनाते हैं । राजा केसरी और अंजना,करते शिव पूजा ।शिव भक्ति के बिना नहीं था,काम उन्हें दूजा ।हो प्रशन शिव प्रकट हुए,तब अंजना वर मांगी ।हे शिव शंकर पुत्र मेरा हो,आपके जैसा ही ।क्यों भाई जी बोले अंजना होगी,पूर्ण तेरी इच्छा ।मेरे अंश का 11 रुद्र ही,पुत्र तेरा होगा ।जन्म लिया बजरंगी,छठ गए संकट के बादल ।चैत्र शुक्ल की 15 की,और दिन था शुभ मंगल ।बजरंगी तब से शंकर के,अवतार कहते हैं, पावन कथा सुनाते हैं ।बजरंगबली उस महाबली की,गाथा गाते है, हम कथा सुनाते हैं । हम आज पवनसुत हनुमान की कथा सुनाते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।वीरों के वीर उस महावीर की गाथा गाते हैं,हम कथा सुनाते हैं । केसरी नंदन का है भक्तो प्यारा था बचपनझूल रहे थे चंदन के पालने में सुख रंजनकामकाज में लगी हुई थी तब अंजना रानीसूरज को फल समझ उन्होंने खाने की ढाणीउड़ने की शक्ति पवन देव ने उनको दे ही दी थीउड़ने लगे सूरज का फल खाने वाले बजरंगीवायु देव को चिंता हुई मेरा बच्चा जल ना जाएसूर्य देव की किरणों से मेरा फूल झुलस ना जाएबारुद के जैसी बायो देव आवाज चलाते हैंहम कथा सुनाते हैं सूर्य देव ने उनको आते देखा अपनी ओरसमझ गए वह पवन पुत्र है नहीं बालक कोई औरशीतल कर ली सूर्य देव ने अपनी गरम किरणेंपवन पुत्र गुरु रत्न पर चढ़कर सूर्य लगे डसनेअमावस्या को जब राहु सर्प डस ने को आयाबजरंगी का खेल देखकर बड़ा ही घबरायाइंद्रदेव को आकर सारा हाल था बतलायाबोला एक बालक से मैं तो प्राण थोड़ा लायाइंद्रदेव को साथ में लेकर राहु आते हैंहम कथा सुनाते हैं बाकी की गाथा को जल्दी ही पूरा किया जाएगा…

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अक्षय तृतीया कथा (Akshaya Tritiya Katha)

अक्षय तृतीया की एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मदास नामक वैश्य था। उसका सदाचार तथा देव एवं ब्राह्मणों के प्रति उसकी श्रद्धा अत्यधिक प्रसिद्ध थी।अक्षय तृतीया व्रत के महात्म्य को सुनने के पश्चात उसने अक्षय तृतीया पर्व के आने पर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की, व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र तथा दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान में दी। अनेक रोगों से ग्रस्त तथा वृद्ध होने के उपरांत भी उसने उपवास करके धर्म-कर्म और दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे अगले जन्म में कुशावती का राजा हुए। मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान-पुण्य व पूजन के कारण वह अपने अगले जन्म में बहुत धनी एवं प्रतापी राजा बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमंड नहीं हुआ, वह प्रतापी राजा महान एवं वैभवशाली होने के बावजूद भी धर्म मार्ग से कभी विचलित नहीं हुआ। माना जाता है कि यही राजा आगे के जन्मों में भारत के प्रसिद्ध सम्राट चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुए थे।

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अक्षय तृतीया: श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार (Akshaya Tritiya: Shri Krishna Mundan Sanskar)

प्राचीन काल में व्रज के लोगों का मुख्य व्यवसाय गौ-चारण ही था इसलिए मुख्य व्यवसाय से सम्बंधित कुछ वर्जनाएं भी थी। अब इसे वर्जनाएं कहें या सामाजिक नियम बालक का जब तक मुंडन नहीं हो जाता तब तक उसे जंगल में गाय चराने नहीं जाने दिया जाता था।अब तो हम काफी आधुनिक हो गये हैं या यूं कह सकते हैं अपनी जड़ों से दूर हो गये हैं नहीं तो हमारे यहाँ भी बालक को मुंडन के पहले ऐसी-वैसी जगह नहीं जाने दिया जाता था। खैर! बालक कृष्ण रोज़ अपने परिवार के व पास-पडौस के सभी पुरुषों को, थोड़े बड़े लड़कों को गाय चराने जाते देखते तो उनका भी मन करता पर मैया यशोदा उन्हें मना कर देती कि अभी तू छोटा है, थोड़ा बड़ा हो जा फिर जाने दूँगी। एक दिन बलराम जी को गाय चराने जाते देख कर लाला अड़ गये: दाऊ जाते हैं तो मैं भी गाय चराने जाऊंगा। ये क्या बात हुई। वो बड़े और मैं छोटा ? मैया ने समझाया कि दाऊ का मुंडन हो चुका है इसलिए वो जा सकते हैं, तुम्हारा मुंडन हो जायेगा तो तुम भी जा सकोगे। लाला को चिंता हुई इतनी सुन्दर लटें रखे या गाय चराने जाएँ? बहुत सोच विचार के बाद उन्होंने सोचा कि लटें तो फिर से उग जायेगी पर गाय चराने का इतना आनंद अब मुझसे दूर नही रहना चाहिए। वे तुरंत नन्दबाबा से बोले: कल ही मेरा मुंडन करा दो। मुझे गाय चराने जाना है। नंदबाबा हँस के बोले: ऐसे कैसे करा दें मुंडन। हमारे लाला के मुंडन में तो बहुत बड़ा आयोजन करेंगे तब लाला के केश जायेंगे। लाला ने अधीरता से कहा: आपको जो आयोजन करना है करो पर मुझे गाय चराने जाना है। आप जल्दी से जल्दी मेरा मुंडन करवाओ। मुंडन तो करवाना ही था अतः नंदबाबा ने गर्गाचार्यजी से लाला के मुंडन का शुभ-मुहूर्त निकलवाने का आग्रह किया। इसलिए उस दिन मुंडन का आयोजन तय हुआ। आसपास के सभी गावों में न्यौते बांटे गये, हर्षोल्लास से कई तैयारियां की गयी। आखिर आयोजन का दिन आ ही गया। आसपास के गावों के हजारों अतिथियों की उपस्थिति में भव्य आयोजन हुआ, मुंडन हुआ और मुंडन होते ही लाला मैया से बोले: मैया मुझे कलेवा (नाश्ता) दो। मुझे गाय चराने जाना है। मैया थोड़ी नाराज़ होते हुए बोली: इतने मेहमान आये हैं घर में तुम्हें देखने और तुम हो कि इतनी गर्मी में गाय चराने जाना है। थोड़े दिन रुको गर्मी कम पड़ जाए तो मैं तुम्हें दाऊ के साथ भेज दूँगी। लाला भी अड़ गये: ऐसा थोड़े होता है। मैंने तो गाय चराने के लिए ही मुंडन कराया था। नहीं तो मैं इतनी सुन्दर लटों को काटने देता क्या? मैं कुछ नहीं जानता। मैं तो आज और अभी ही जाऊंगा गाय चराने। मैया ने नन्दबाबा को बुला कर कहा: लाला मान नहीं रहा। थोड़ी दूर तक आप इसके साथ हो आइये। इसका मन भी बहल जायेगा। क्योंकि इस गर्मी में मैं इसे दाऊ के साथ या अकेले तो भेजूंगी नहीं। नन्दबाबा सब को छोड़ कर निकले। लाला भी पूरी तैयारी के साथ छड़ी, बंसी, कलेवे की पोटली ले कर निकले एक बछिया भी ले ली जिसे हुर्र। हुर्र कर घेर कर वो अपने मन में ही बहुत खुश हो रहे थे। कि आखिर मैं बड़ा हो ही गया। बचपन में सब बड़े होने के पीछे भागते हैं कि कब हम बड़े होगे। और आज हम बड़े सोचते हैं कि हम बालक ही रहते तो कितना अच्छा था। खैर! गर्मी भी वैशाख माह की थी और व्रज में तो वैसे भी गर्मी प्रचंड होती है। थोड़ी ही देर में बालक श्रीकृष्ण गर्मी से बेहाल हो गये पर अपनी जिद के आगे हार कैसे मानते, बाबा को कहते कैसे की थक गया हूँ। अब घर ले चलो। चलते रहे.. मैया होती तो खुद समझ के लाला को घर ले आती पर संग में बाबा थे, वे भी चलते रहे। थोड़ी ही दूर ललिताजी और कुछ अन्य सखियाँ मिली। देखते ही लाला की हालत समझ गयी। गर्मी से कृष्ण का मुख लाल हो गया था सिर पर बाल भी नही थे इसलिए लाला पसीना-पसीना हो गये थे। उन्होंने नन्दबाबा से कहा कि आप इसे हमारे पास छोड़ जाओ। हम इसे कुछ देर बाद नंदालय पहुंचा देंगे। नंदबाबा को रवाना कर वो लाला को निकट ही अपने कुंज में ले गयीं। उन्होंने बालक कृष्ण को कदम्ब की शीतल छांया में बिठाया और अपनी अन्य सखी को घर से चन्दन, खरबूजे के बीज, मिश्री का पका बूरा, इलायची, मिश्री आदि लाने को कहा। सभी सामग्री ला कर उन सखियों ने प्रेम भाव से कृष्ण के तन पर चन्दन की गोटियाँ लगाई और सिर पर चन्दन का लेप किया। कुछ सखियों ने पास में ही बूरे और खरबूजे के बीज के लड्डू बना दिए और इलायची को पीस कर मिश्री के रस में मिला कर शीतल शरबत तैयार कर दिया और बालक कृष्ण को प्रेमपूर्वक आरोगाया। साथ ही ललिता जी लाला को पंखा झलने लगी। यह सब अरोग कर लाला को नींद आने लगी तो ललिताजी ने उन्हें वहीँ सोने को कहा और स्वयं उन्हें पंखा झलती रही। कुछ देर आराम करने के बाद लाला उठे और ललिताजी उन्हें नंदालय छोड़ आयीं। आज भी अक्षय-तृतीया के दिन प्रभु को ललिताजी के भाव से बीज के लड्डू और इलायची का शीतल शर्बत आरोगाये जाते हैं व विशेष रूप से केशर मिश्रित चन्दन (जिसमें मलयगिरी पर्वत का चन्दन भी मिश्रित होता है) की गोटियाँ लगायी जाती हैं। लाला ने गर्मी में गाय चराने का विचार त्याग दिया था। औपचारिक रूप से श्री कृष्ण ने गौ-चारण उसी वर्ष गोपाष्टमी (दीपावली के बाद वाली अष्टमी) के दिन से प्रारंभ किया और इसी दिन से उन्हें गोपाल कहा जाता है।वर्ष में एक ये ही दिन ऐसा होता है जब बीज के लड्डू अकेले श्रीजी को आरोगाये जाते हैं अन्यथा अन्य दिनों में बीज के लड्डू के साथ चिरोंजी के लड्डू भी आरोगाये जाते हैं।

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हिरण्यगर्भ दूधेश्वर ज्योतिर्लिंग प्रादुर्भाव पौराणिक कथा! (Hiranyagarbh Shri Dudheshwarnath Mahadev Utpatti Pauranik Katha)

ॐ हौं जूं स: ॐ भू र्भुव: स्व:।ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम् ॥उर्वारुक मिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।स्व: भुव: भू ॐ स: जूं हौं ॐ ॥द्वादश ज्योतिर्लिंगों के अतिरिक्त अनेक ऐसे हिरण्यगर्भ शिवलिंग हैं, जिनका बड़ा अदभुत महातम्य है। इनमें से अनेक बड़े चमत्कारी और मनोकामना को पूर्ण करने वाले हैं तथा सिद्धपीठों में स्थापित हैं। ऐसे ही सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ महादेव मठ मंदिर के अतिपावन प्रांगण में स्थापित हैं। स्वयंभू हिरण्यगर्भ दूधेश्वर शिवलिंग। हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेभूतस्य जात: पतिरेक आसीत् पुराणों में हरनंदी के निकट हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग का वर्णन मिलता है। हरनंदी, हरनद अथवा हिरण्यदा ब्रह्मा जी की पुत्री है और कालांतर में इनका नाम हिन्डन विख्यात हुआ। शिवालिक की पर्वत श्रंखलाओं से सहारनपुर से कुछ दूर से निकल हिन्डन पुराण प्रसिद्ध नदी है। इसने तीन छोटी जलधाराओं से मिलकर हिन्डन रूप धारण किया है। हिन्डन के दर्शन, इसमें स्नान व पूजन से अनेक जन्मों के पाप-ताप सब स्वत: समाप्त हो जाते हैं, ऐसी मान्यता है। हिन्डन के पावन तट पर तपस्या में लीन तपस्वियों के मंत्रोच्चारण से यहाँ का वातावरण पवित्र होता था। साथ ही इस क्षेत्र के दुर्गम वन प्रांतर में रहने वाले मारीच, सुबह और तड़का जैसे राक्षसी प्रवृति के मदांधों के अट्टहास से भी यह क्षेत्र कम्पायमान रहता था। गाज़ियाबाद के पास बिसरख नामक एक गाँव है। पहले यहाँ घना जंगल था। रावण के पिता विश्वेश्रवा ने यहाँ तपस्या की थी। वह शिव के परम भक्त थे। अब गौतमबुद्धनगर ज़िले में पड़ने वाले रावण के पैत्रक गाँव बिसरख में आज भी वह पूजनीय है। इस गाँव में न तो रामलीला का मंचन होता है और न ही दशहरा पर्व मनाया जाता है। इस गाँव का नाम ऋषि विश्वेश्रवा के नाम पर विश्वेश्वरा पड़ा ,कालांतर में इसे बिसरख कहा जाने लगा। त्रेतायुग में श्री रामावतार से पूर्व कुबेर के पिता महर्षि पुलस्त्य बिसरख क्षेत्र में ही निवास करते थे। महर्षि पुलस्त्य का विवाह महर्षि भारद्वाज की बहन से हुआ था। कुबेर इसी भाग्यशाली दम्पति के सुपुत्र थे। कुबेर ब्रह्मा जी के पौत्र तथा भगवान् शिव के अनन्य मित्र और देवलोक के कोषाध्यक्ष थे। अपनी व्यस्तताओं के कारण कुबेर के पास इतना समय नहीं था कि वह अपने पिता को भी थोडा समय दे सके। इसी के चलते महर्षि पुलस्त्य अपने बेटे से न मिल पाने के कारण कुंठित रहा करते थे। कुबेर को भी अपने पिता की सेवा न कर पाने का कष्ट था, लेकिन समयाभाव के कारण इस समस्या का कोई समाधान उनके पास नहीं था। महर्षि पुलस्त्य प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने एक दिन सोचा: यदि पुत्र कुबेर के परम मित्र ओढरदानी भगवान् शिव को प्रसन्न कर उन्हें अपने पास रख लूँ तो समस्या का समाधान स्वत: हो जायेगा। कुबेर अपने परम मित्र शिवजी से मिलने आया करेगा तो मैं भी उससे मिल लिया करूँगा। पल दो पल ही सही मेरा पुत्र कुबेर मेरे पास बैठ लिया करेगा। बाप-बेटे दुःख-सुख की बातें कर लिया करेंगे। यही सबसे सही उपाय है: ऐसा सोच कर महर्षि पुलस्त्य ने भगवान् शिव को प्रसन्न करने के लिये कठोर तप करने का निर्णय लिया। बिसरख की भीड़-भाड़ व चहल-पहल तपस्या में व्यवधान उत्पन्न करती इसलिये महर्षि पुलस्त्य ने हिन्डन के निकट घने वन को अपनी तपस्या के लिये चुना। उन्होंने भगवान् भोले नाथ की वर्षों तक निरंतर आराधना की। बिना किसी बाधा के जारी उनकी तपस्या ने अपना रंग दिखाया। महर्षि पुलस्त्य की सिद्धि यहाँ तक पहुँची की वे स्वयं भगवान शंकर के रूप हो गये। महर्षि पुलस्त्य की तापोराधना से प्रसन्न होकर भगवान् भोलेनाथ माता पार्वती सहित साक्षात प्रगट हुए। भगवान् शिव ने महर्षि पुलस्त्य से कहा: मैं तुम्हारी आराधना से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं काशी और कैलाश में वास करता हूँ। तुम्हारी इच्छा है की मैं यहाँ वास करूँ। काशी तो मेरे त्रिशूल पर टिकी है, दूसरा त्रिशूल मेरे पास नहीं है, इसलिये यहाँ काशी तो बन नहीं सकती। हाँ, यदि तुम चाहो तो यहाँ कैलाश जरुर बन सकता है। इसपर महर्षि पुलस्त्य ने कहा: प्रभो! आप यहाँ कैलाश बनाने की आज्ञा दें और उसी में वास करें: इसमें मेरा स्वार्थ तो निश्चित रूप से है लेकिन जनकल्याण की भावना भी इसमें निहित है। आपके आशीर्वाद से जन-जन का कल्याण अनंतकाल तक होता रहेगा। महर्षि पुलस्त्य ने जिस स्थान पर घोर तप किया और शिवस्वरूप हो विश्वेश्रवा कहलाये: जिस स्थान पर भगवान् शिव ने विश्वेश्रवा को माता पार्वती के साथ साक्षात् दर्शन दिये और उन्हें कैलाश बनाने की आज्ञा दी, जिस स्थान पर अपनी पहचान के रूप में भगवान् भोलेनाथ हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग छोड़ गये, वही स्थान आज श्री दूधेश्वर नाथ महादेव मठ मंदिर के नाम से जाना जाता है। यही वह अति पावन ज्योतिर्लिंग है, जिसके दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामनायें पूर्ण हो जाती हैं। यही वह मंगलकारी दूधनियन्ता भगवान् भोलेनाथ का दूधेश्वर लिंग है जिसके अभिषेक से जन्म-जन्म के पापों से मुक्ति मिल जाती है शिव साधक विश्वेश्रवा का पुत्र रावण भी अपने तपस्वी पिता की भांति ही भगवान् शिव का अनन्य भक्त था। शिवजी के प्रति रावण की भक्ति जगविदित एवं अनुकरणीय है। अपने पिता के तपोबल से विकसित कैलाश में हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग श्री दूधेश्वर की रावण ने भी वर्षों तक साधना की थी। रावण यहाँ तब तक श्री दूधेश्वर का अभिषेक करता रहा था जब तक महर्षि विश्वेश्रवा सपरिवार स्वर्ण नगरी लंका में नहीं जा बसे थे। इसी पुराण वर्णित हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग को श्री दूधेश्वर नाथ महादेव के नाम से जाना व पूजा जाता है।

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