MYTHOLOGICAL STORIES

भगवान् परशुराम ने क्यों किया था महाबली सहस्त्रबाहु का वध

एक बार सहस्त्रबाहु अर्जुन अपनी सेना के साथ जंगल में ब्रह्मण के लिए गए होते है। उसी जंगल में परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि का आश्रम भी रहता है । सहस्त्रबाहु अर्जुन जंगल में विश्राम करने लिए लिए जमदग्नि के आश्रम देख अपनी सेनाओ के साथ आश्रम की और चल देते है । आश्रम पहुंचने के बाद ऋषि जमदग्नि सहस्त्रबाहु अर्जुन और उनकी सेनाओ का खूब सेवा सत्कार करते है और अपनी कामधेनु गाय की सहायता से उनका और उनकी सेनाओ के लिए राजसी भोजन की व्यवस्था भी करते है। ऋषी जग्मद्नी द्वारा सहस्त्रबाहु और उनके सानिको का इत्नी जल्दी राजसी भोजन की व्यव्स्था देख अचम्भित हो जाते है और सोचने लगते है की इतनी जल्दी और वो भी राजसी भोजन का प्रबनध एक साधरण ऋषि मुनि कैसे कर सकता है। जरूर इसके पास कोई रहस्य है। सहस्त्रबाहु ऋषि जग्मद्नी से यह सभी व्यवस्था करने का राज पूछते है । चमत्कारी कामधेनु गाय को बालपूर्वक ले जाते है ऋषि जगमदनी सहस्रबाहु अर्जुन को अपनी गाय कामधेनु के बारे में बातते हुए कहते है की महाराज यह सब इस गाय की कृपा है। कामधेनु गाय को देख और उसकी इस चमत्कार से प्रसन्न उस पर मोह जाते है और ऋषि जमदग्नि से कामधेनु गाय को अपने साथ ले जाने की इच्छा जाहिर करते है। परन्तु ऋषि जग्मद्नी कामधेनु गाय को ले जाने से इंकार कर देते हैं। ऋषि जग्मद्नी द्वारा मना करने पर सहस्रबाहु क्रोधित हो जाते है और बलपूर्वक काम धेनु गाय को अपने साथ ले जाते है। अपने पिता के अपमान सुन परशुराम क्रोधित हो उठते है कुछ समय बाद परशुराम जब आश्रम आते तो उन्हें उनके पिता घटना के बारे में बताते है और यह सुन परशुराम अत्यंत क्रोधित हो उठते और अपना फ़ारसु उठा सहस्रबाहु के नगर महिस्मती की और चल देते हैं। सहस्रबाहु कामधेनु और अपनी सेनाओ के साथ रास्ते में ही होते है । सहस्रबाहु परशुराम को अपनी ओर त्रीव गति से आते हुए देख अपनी सेनाओ को परशुराम को रोकने का आदेश देते है। सहस्रबाहु की सेना परशुरराम को रोकने के लिए उनके पास आती है पर कुछ पालों मे ही परशुराम हजारो सेनिको के रक्त से युद्ध भूमि को लाल कर देते है । अपनी सेनाओ का नष्ट होता देख सहस्रबाहु अर्जुन स्वयं परशुराम से युद्ध करने के लिए आ जाते हैं और घनघोर युद्ध प्रारम्भ हो जाता है। सहस्रबाहु का वध परन्तु सहस्रबाहु के लिए परशुराम के समक्ष टिक पाना असंभव ही था सहस्रबाहु जब अपनी हजारो भुजाओ से परशुराम को जकड़ने के लिए आगे बढते है तो परशुराम अपनी परसु से उनकी एक एक कर सभी भुजाओ को काट उसका सर धड़ से अलग कर डालते है । सहस्रबाहु अर्जुन वध के बाद भगववान परशुराम अपनी कामधेनु गाय को लेकर अपने पिता को सौप देते है। ऋषि जग्मद्नी अपने गाय को देख काफी प्रसन्न हो जाते है और अपने पुत्र परशुराम को गले लगाकर उन्हें आशीर्वाद देते है। क्यों परशुराम पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय विहीन करते है कहा जाता है जब सहस्रबाहु के पुत्रों ने अपने पिता का प्रतिशोध लेने के लिए परशुराम के पिता का छल पूर्वक वध कर देते है। जब जमदन्गि का वध हो जाता है तो उनकी पत्नी रेणुका भी उनके साथ अग्नि में लीन हो जाती है। इस घटना से परशुराम अति क्रोधित हो सहस्रबाहु के पुत्रों का वध कर देते है और साथ ही महिस्मती राज्य को भी उजाड़ डालते है और पृथ्वी से 21 बार सभी क्षत्रियों का नाश कर पृथ्वी को क्षत्रियविहीन करने के बाद परशुराम एक बड़े पर्वत पर जा भगवान् शिव के ध्यान में लीन हो जाते है।

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क्यों काटा था भगवान परशुराम ने अपनी ही माँ का सिर

पुराणों के अनुसार भगवान परशुराम को श्री हरि विष्णु के अवतार माना गया है। भगवान विष्णु का यह सबसे क्रूर अवतार था। शिव जी द्वारा प्राप्त परशु के कारण ही उनका नाम परशुराम पड़ा था। परशुराम महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका की संतान थे। परशुराम उनके सबसे छोटे कर लाडले पुत्र थे पांचो भाइयों में परशुराम ही सबसे तेजस्वी और न्याय पूर्ण योद्धा थे।  धरती पर उनके जैसा योद्धा कोई नहीं था। परशुराम अपने माता-पिता के सबसे लाडले और आज्ञाकारी पुत्र होते हुए भी उन्होंने माता का सिर काट दिया था आखिर उन्होने ऐसा कठोर कदम क्यों लेना पड़ा ऐसा क्या कारण था जो उनकी माता के जीवन से भी बढ़कर था। आगे हम इसके बारे में विस्तारपूर्वक पड़ेंगे। परशुराम के पिता जगमदनी बड़े ज्ञानी और तपस्वी थे उन्हें सभी प्रकार की सिद्धियों का ज्ञान था।  परशुराम अपने पिता की आज्ञाकारी पुत्र थे और पिताजी की हर आज्ञा को पत्थर की लकीर मान हर हाल में पूर्ण करते थे। माता रेणुका से हो गई थी यह एक भूल और महर्षि जमदग्नि हुए क्रोधित एक बार की बात है ऋषि जग मदनी के स्नान के लिए पत्नी रेणुका नदी में पानी लेने के लिए गई वही कुछ दूरी पर राजा चित्र भी स्नान कर रहे थे। राजा चित्ररथ को देख वह काफी समय तक वह उन्हें ही स्नान करते देखती रही। उनका मन विचलित हो गया और भूल गई कि उन्हें अपने पति के लिए स्नान का पानी ले जाना था। काफी समय हो गया महर्षि जमदग्नि पत्नी रेणुका की प्रतीक्षा में बैठे उनका इंतजार करते रहे। जब पत्नी रेणुका आश्रम पहुंची तो ऋषि जगमदनी ने अपनी ध्यानशक्ति से उनके देर में आने का कारण ज्ञात करना चहा इससे उन्हें सब ज्ञात हो गया और महाऋषि जगमादनी अपनी पत्नी पर क्रोधित हो उठे। पिता ने दया चारो पुत्रों को दिया अपनी ही माँ का सर काट देने का आदेश उसी समय उनके चारो पुत्र रघुवंशी शुरू वस्तु और विश्वासों भी आश्रम आ गए  थे। महर्षि जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को बारी-बारी से अपनी मां का वध करने को कहा पर किसी ने भी माँ की मोहा वश ऐसा करने का हिम्मत नहीं जुटा पाए। किसी ने भी पिता की आज्ञा को नहीं माना और सभी पीछे हट गए क्योंकि हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार किसी भी स्त्री की हत्या को बहुत बड़ा पाप माना गया है और यही अपनी ही मां का वध करने की बात थी लेकिन पिता आज्ञा का विरोध करना भी एक बड़ा अपराध है। चारों पुत्र समझ नहीं पा रहे थे क्या करना उचित होगा जब ऋषि के चारों पुत्रों ने उनकी आज्ञा को नहीं माना तो अपने चारों पुत्रों को चेतना बुद्धि और विचार नष्ट होने का शार्प दे दि। परशुराम ने ही अपने पिता के आदेश क्यों माना वही थोड़ी देर में परशुराम भी आश्रम आ गए । परशुराम को देख महर्षि जमदग्नि ने उन्हें अपनी मां की और अपने चारों भाइयों का वध करने का आदेश दिया । अपनी पिता की आज्ञा पाकर उन्होंने अपनी माता और चारों भाइयों का वध कर डाला यह देख ऋषि जगमग काफी प्रसन्न हुए और परशुराम से वर मांगने के लिए कहा । परशुराम जानते थे कि उनके पिता बहुत बड़े ज्ञानी हैं और सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हैं । उन्हें अपने पिता की बातों से पूर्ण से अवगत था कि वह अपने पिता के आदेश मानेंगे तो उनके पिताजी उन्हें मुंह मांगा वरदान देंगे । इसलिए उनके पिताजी जब उनसे वरदान मांगने को कहते हैं तो परशुराम ने अपनी मां का और अपने चारों भाइयों को पुनर्जीवित करने का वरदान मांगते है। इससे उनके पिता ने उनकी इच्छा मान माता रेणुका और चारों भाइयों को जीवित हो गए इस तरह परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा भी मानी और अपनी माता और भाइयों को जीवित भी करा लिया। परशुराम ने अपनी पुनः जीवित माँ हत्या पाप के लिया किया पारयश्चित परन्तु माता तो पुण्य जीवित हो गई पर उन पर अपनी मां हत्या का पाप चढ़ गया  इस पाप से मुक्ति पाने के लिए परशुराम एक पर्वत पर शिव आराधना करने के लिए चले गए। कई वर्षों की कठोर तपस्या से प्रसन्न शिवजी ने उनके समक्ष आ गए और उन्हें मृत्यु कुंडली के जल में स्नान करने के आदेश दिया तभी वह अपनी माता के बाप से मुक्त हो पाएंग परशुराम ने शिवजी कहे अनुसार ऐसा ही किया और अपने माता हत्या के पाप से मुक्ति प्राप्त की यह मृत्यु गुंडे हो वर्तमान राजस्थान के चित्तौड़ जिले में है स्थित है इस स्थान को मेवाड़ के तीर्थ स्थल भी कहा जाता है इस स्थान से कुछ दूरी पर एक पहाड़ी पर भगवान शिव जी का मंदिर जिसे परशुराम जी ने खुद अपने परसों से काटकर बनाया था ।

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भगवान श्री कृष्ण ने अभिमन्यु को चक्रव्यूह से क्यों नहीं बचाया था

दोस्तों महाभारत कथा से तो आप भली-भांति परिचित होंगे ही महाभारत युद्ध क्यों और कैसे और किन योद्धाओं में लड़ा गया था यह तो आपको पता ही होगा और भगवान श्री कृष्ण ने किस का साथ दिया था। लेकिन इसमें कई ऐसे योद्धाओं से जुड़े कई रोचक तथ्य और रहस्य भी हैं। जिन्हें आप को जानना चाहिए ऐसे ही एक पौराणिक कथा (Pauranik Katha, dharmik kahani) अभिमन्यु से भी जुड़ी है इस रोचक कथा के बारे में हम नीचे विस्तारपूर्वक बताएंगे। अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु को तो आप लोग जानते ही होंगे की महाभारत युद्ध मे अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो गए थे। लेकिन बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न अवश्य होता होगा कि आखिर सर्वशक्तिमान श्री कृष्ण ने अपनी ही बहन सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु को क्यों नहीं बचाया था। जबकि अर्जुन और पांचों पांडवों की युद्ध के अंत तक उनके रक्षा कवच बने रहे थे तो अभिमन्यु को क्यों मर जाने दिया अगर चाहते तो लीलाधारी भगवान श्री कृष्ण अपने सुदर्शन चक्र भेज अभिमन्यु को चक्रव्यूह से बाहर ले आते और अभिमन्यु का वध नहीं हो पाता परंतु श्री कृष्ण ने ऐसा नहीं किया। इसलिए कारण नहीं बचाया श्रीकृष्ण ने अभिमन्यु को कहां जाता है जब भी धरती पर धर्म और सत्य की हानि होने लगे तो भगवान को नियति के अनुसार धरती से अधर्मियों और अत्याचारियों का नाश करना होता है और इस उद्देश्य हेतु भगवान स्वयं धरती पर जन्म लेते हैं और उनके इस उद्देश्य में सहायता हेतु विभिन्न देवी-देवताओं को भी अपने पुत्र को भेज या स्वयं जाकर धरती पर जन्म लेना होता है। ऐसा ही जब द्वापर युग में भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण अवतार में जन्म लिया था तब ब्रह्मा जी ने और सभी देवी देवताओं को भी श्रीकृष्ण की सहायता हेतु धरती पर जन्म लेने का आदेश दिया था। किसने किया था ब्रह्मा जी के आदेश का विरोध ? ब्रह्मा जी के इस आदेश का सभी देवी देवताओं ने स्वागत किया था । परंतु चंद्रमा ने इस आदेश का विरोध किया और अपने पुत्र वरचा को पृथ्वी पर जन्म लेने से इनकार कर दिया। लेकिन जब सभी देवताओं ने मिलकर चंद्रमा को समझाया कि धर्म की रक्षा करना ही हम देवताओं का परम कर्तव्य और धर्म है । इसलिए हम सभी को ब्रह्मा जी का आदेश का पालन करना है यह हमारा दायित्व और कर्तव्य भी है। चन्द्रमा के इस शर्त के कारण ही अभिमन्यु को मरना पड़ा सभी देवताओं के समझाने पर चंद्रमा मान तो गए पर फिर भी उन्होंने एक शर्त भी रख दी कि यदि मेरा पुत्र धरती पर जन्म लेगा तो वह ज्यादा दिनों तक धरती पर नहीं रुकेगा और महाभारत युद्ध में अपना कार्य समाप्त होते ही वह मेरे पास लौट आएगा। इसके साथ ही वह युद्ध में अपने पराक्रम से बड़े-बड़े महारथियों को भी चकित कर खोर युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होगा और उसके इस अदम्या साहस को युगो युगो तक याद रखा जाएगा। दोस्तो चंद्रमा पुत्र “वरचा” ही अभिमन्यु थे जिसने धरती पर ब्रह्मा के आदेश का पालन कर श्री कृष्ण की सहायता के लिए जन्म लिया था। चंद्रमा के शर्त अनुसार ही श्री कृष्ण ने अभिमन्यु की नियति में दखल नहीं दिया और अभिमन्यु महाभारत युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो अपने पिता चंद्रमा के पास चले गए।

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सहस्त्रबाहु अर्जुन द्वारा अहंकारी रावण को बंधी बनाना

सहस्रबाहु अर्जुन एक पराकर्मी और शूर वीर योद्धा थे । भगवान् द्वारा उन्हें हर प्रकार की सिद्धियां प्राप्त थी और वायु की गति से पूरे संसार में कोई भी रूप धारण कर जब चाहे विचरण कर सकते थे। पुराणो के अनुसार शास्त्र बाहु ने महाराज हेय की 10वी पीढ़ी मात पद्मनी और महाराज कृतवीर्ये के परिवार में हुआ था। चन्द्रवंश कृतवीर्ये के पुत्र होने के कारण इन्हे कृतवीर्ये अर्जुन के नाम से भी जाना जाता था। इसके आलावा पुराणों और ग्रंथो मे हैहयाधिपति, सहस्रार्जुन, दषग्रीविजयी, सुदशेन, चक्रावतार, सप्तद्रवीपाधि, कृतवीर्यनंदन, राजेश्वर आदि आदि के नामों का भी वर्णन है। कृतवीर्ये अर्जुन का उल्लेख कई वेद, वाल्मीकि रामयण, महाभारत जैसे कई हिन्दू धर्म ग्रंथो में भी मिलता है । भगवान् विष्णु पुराण के अनुसार कृतवीर्ये -अर्जुन की उत्पाती श्री हरी विष्णु और माता लक्ष्मी द्वारा हुई है। धार्मिक कथाओं और ग्रंथो के अनुसार सहस्रबाहु अर्जुन विष्णु के दसवे अवतार दत्तात्रेय के उपासक थे और अपनी कठोर तपस्या वा भक्ति आराधना से भगवान् दत्तात्रेय को प्रसन्न क्र उनसे 10 वरदान प्राप्त किये थे । जिसमे उन्हें हजार भुजाओ का वरदान भी मिला था और तभी से इनका नाम सहस्रबाहु अर्जुन व बाहुबली भी कहा जाने लगा था। दत्तात्रेय दावरा वरदान पाने के बाद सहस्रबाहु महिस्मती नगरी के चक्रवर्ती सम्राट बन गए थे.. वर्तमान में यह नगरी मध्य प्रदेश में महसेवर नाम के नाम से जाना जाता है। मध्य प्रदेश के वर्तमान शहर माहेश्वर में सहस्रबाहु राजेस्वर नाम का भव्य मंदिर भी है जहा प्रतिवर्ष कार्तिक मॉस की शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को सहस्रबाहु की जयंती मनाई जाती है जो दीवाली के ठीक बाद पड़ती है । सहस्रबाहु अर्जुन की जयंती के समय महेस्वर नगर में उत्सव जैसे माहोल रहता है और कई दिनों तक उनकी पूजा अर्चना भी की जाती है। जो एक बड़े भंडारे के साथ समाप्त होता है। सहस्रबाहु के मंदिर के बीचो बीच शिवलिंग वा राजेश्वर सहस्त्रबाहु जी की समाधि है। जहा लगभग 500 वर्षो से घी के दीपक अखंड प्रज्वलती है। रावण जब पहुंचा सहस्त्रबाहु अर्जुन को हराने हिन्दू शास्त्रों के अनुसार एक बार रावण सहस्रबाहु को हारने की इच्छा से उसके नगर महिस्मती पहुँच गया जो नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ था । रावण नर्मदा नदी के तट पर पहुंच अपनी शक्तियों को बढ़ने के लिए भगवान् शिव की आराधना करने लगा। वही कुछ दूरी पर सहस्रबाहु भी अपनी रानियों के साथ नदी मे जलविहार कर रहे थे और जल विहार करते समय सहस्रबाहु ने अपनी हजारो भुजाओ से नर्मदा नदी के पानी के प्रवाह को रोक दिया। जिससे एक तरफ पानी का जल स्तर बढ़ने लगा अचनाक नदी में पानी जल स्तर बढ़ने से तट के किनारे बना रावण का शिवलिंग भी बह गया । यह देख रावण ने अपने सैनिको को नदी का यू  अचानक जल स्तर बढने का कारण पता लगाने के लिए भेजा। रावण और सहस्त्रबाहु अर्जुन का भयंकर युद्ध जब सैनिको ने रावण से आकर नदी के पानी रुकने की बात बताई तो । रावण क्रोधित हो सहस्रबाहु को युद्ध के लिए ललकारने लगा। इधर सहस्रबाहु भी एक प्रकर्मी योद्धा । रावण द्वारा बार बार ललकारने पर वह भी रावण के समक्ष उपस्थित हो गया और देखते ही देखते दोनों योद्धाओ के बीच महा युद्ध छिड़ गया दोनों के बीच युद्ध बराबरी का हो रहा था । यह महा युद्ध कई दिनों तक चला अंत म सहस्रबाहु अर्जुन ने इस युद्ध से क्रोधित हो अपने विशाल और विकराल रूप मे आ गया। सहस्रबाहु अर्जुन के विकराल रूप के सामने रावण बोना सा प्रतीत हो रहा था । सहस्रबाहु ने रावण को अपनी हाजरो भुजाओ में जकड लिया। रावण ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी फिर भी वह आजाद नहीं हो पाया। सहस्रबाहु ने रावण को बंधी बना अपने कारागार में डाल दिया । लेकिन बाद मे रावण के दादा महर्षि पुलत्श्य ने शास्त्र बहु से रावण को छोड़ने का आग्रह किया और सहस्रबाहु ने रावण को आजाद कर दिया। अंत में रावण ने सहस्रबाहु से मित्रता कर लंका लौट गया।

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विक्रम बेताल की अंतिम कहानी: भिक्षु शान्तशील की कथा

चौबीस बार लगातार प्रयास करने के बाद, आखिरकार राजा विक्रमादित्य शव को श्मशान ले जाने में कामयाब हो जाते हैं और बेताल शव को त्याग देता है। आगे जानिए क्या हुआ जब राजा विक्रमादित्य शव को लेकर योगी के पास पहुंचे। राजा विक्रमादित्य और उसके कंधे पर शव को देखकर योगी बहुत खुश हुआ। उसने खुशी जताते हुए राजा से कहा, “हे राजन, आपने इस मुश्किल काम को करके यह साबित कर दिया कि आप सभी राजाओं में सबसे श्रेष्ठ हैं।” यह कहते हुए उसने राजा के कंधे से शव को उतारा और उसे तंत्र साधना के लिए तैयार करने लगा। जब तंत्र साधना हो गई तो उसने राजा से कहा, “हे राजन, अब आप इसे लेटकर प्रणाम करें।” इतना सुनते ही राजा को बेताल की बात याद आ गई। उसने योगी को कहा, “मुझे ऐसा करना नहीं आता, इसलिए आप मुझे पहले करके बता दें, फिर में ऐसा कर लूंगा।” जैसे ही योगी प्रणाम करने के लिए झुका, राजा ने उसका सिर काट दिया। यह सब देखकर बेताल बहुत खुश हुआ और बोला, “राजन यह योगी विद्वानों का राजा बनना चाहता था, लेकिन अब तुम बनोगे विद्वानों के राजा। मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया, अब तुम्हें जो चाहिए मांग लो।” यह सुनते ही राजा ने बोला, “अगर आप खुश हैं तो मैं यही चाहता हूं कि आपने जो मुझे चौबीस कहानियां सुनाई हैं, उनके साथ यह पच्चीसवीं कहानी भी पूरी दुनिया में मशहूर हो जाए और हर कोई इन्हें आदर के साथ पढ़ें।” बेताल ने यह सुनते ही कहा, “जैसी आपकी इच्छा, ऐसा ही होगा, ये कहानियां ‘बेताल-पच्चीसी’ के नाम से जानी जाएंगी और जो भी इन्हें ध्यान से पढ़ेगा या सुनेगा, उनके पाप खत्म हो जाएंगे।” इतना कहकर बेताल चला गया और उसके जाने के बाद शिवजी ने राजा को दर्शन दिए। शिवजी ने प्रकट होकर राजा से कहा, “तुमने इस दुष्ट योगी को मारकर एक अच्छा काम किया है। अब तुम जल्द ही सात द्वीपों समेत पाताल और पृथ्वी पर राज करोगे। जब तुम्हारा इन सभी चीजों से मन भर जाए, तो तुम मेरे पास चले आना।” इतना कहकर शिवजी वहां से चले गए। इसके बाद राजा अपने नगर गए और वहां जब सब को राजा की वीरता के बारे में पता चला तो सभी ने राजा की प्रशंसा की और खुशियां मनाई। कुछ ही वक्त बाद राजा विक्रमादित्य धरती और पाताल के राजा बन गए। जब उनका मन भर गया, तो वे भगवान शिवजी के पास चले गए। समाप्त कहानी से सीख: बुराई की कभी जीत नहीं होती है। अगर व्यक्ति का मन साफ हो और उसमें धैर्य हो, तो उसे हर जगह मान-सम्मान मिलता है।

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विक्रम बेताल की चौबीसवीं कहानी: रिश्ता क्या हुआ?

विक्रम और बेताल रिश्ता क्या हुआ, बेताल पच्चीसी – चौबीसवीं कहानी राजा विक्रमादित्य कई प्रयासों के बाद बेताल को एक बार फिर पकड़ लेते हैं और श्मशान की ओर चल लेते हैं। हर बार की तरह इस बार भी बेताल नई कहानी सुनाना शुरू करता है। बेताल कहता है…. बहुत समय पहले की बात है। एक राज्य पर मांडलिक नामक का राजा का शासन था। उसकी एक सुन्दर पत्नी और लड़की थी। राजा की पत्नी का नाम चडवती और बेटी का नाम लावण्यवती था। जब लावण्यवती बड़ी हुई और उसके विवाह का समय हुआ, तो राजा मांडलिक के करीबियों ने चुपके से उसका राज्य हड़प लिया और राजा को उसके परिवार के साथ राज्य से बाहर कर दिया। राजा अपनी पत्नी और बेटी के साथ मालव देश की ओर चल दिया, जो उसकी पत्नी चडवती के पिता का राज्य था। चलते-चलते जब रात हो चली, तो उन्होंने वन में ही रात गुजारने का फैसला किया। राजा ने पत्नी और बेटी से कहा कि तुम जाकर कहीं छिप जाओ, क्योंकि यहां पास में भीलों का इलाका है। वह रात को तुम लोगों को परेशान कर सकते हैं। राजा की बात पर पत्नी चडवती और बेटी लावण्यवती वन में जाकर छिप जाती हैं। उसी समय भील राजा पर हमला कर देते हैं। राजा बड़ी बहादुरी से भीलों से लड़ता है, लेकिन अंत में मारा जाता है। भीलों के जाने के बाद जब पत्नी चडवती और बेटी लावण्यवती बाहर आती है, तो वो राजा को मरा हुआ पाती हैं। राजा के शव को देख दोनों बहुत दुखी होती हैं। दोनों मां-बेटी राजा की मौत का शोक मनाते हुए एक तलाब के किनारे जा पहुंचती हैं। तभी चंडसिंह नाम का एक साहूकार अपने बेटे के साथ वहां से गुजरता है। उसे रास्ते में दो महिलाओं के पैरों के निशान दिखाई देते हैं। यह देखकर साहूकार ने अपने बेटे से कह, “अगर ये स्त्रियां मिल जाएं, तो जिससे चाहो तुम शादी कर लेना।” पिता की यह बात सुनकर बेटा कहता है, “पिता जी छोटे पैर वाली उम्र में भी कम होगी। इसलिए, मैं छोटे पैर वाली से ही शादी करूंगा। आप बड़े पैर वाले से शादी कर लेना।” साहूकार की शादी करने की इच्छा नहीं थी, लेकिन बेटे के बार-बार जोर देने पर वह राजी हो जाता है। वो दोनों उत्सुकता से उन पैरों के निशान वाली महिलाओं को ढूंढने में जुट जाते हैं। दोनों जब स्त्रियों को ढूंढते-ढूंढते तलाब के पास पहुंचते हैं, तो उन्हें वो सुन्दर स्त्रियां दिखाई देती हैं। साहूकार आगे बढ़कर स्त्रियों से उनका परिचय पूछता है, तो रानी चडवती सारी आप बीती साहूकार को बता देती हैं। रानी की कहानी सुनकर साहूकार दोनों स्त्रियों को सहारा देने के लिए अपने घर ले आता है। संयोग से रानी चडवती के पैर छोटे और बेटी लावण्यवती के पैर बड़े थे। इसलिए, साहूकार का बेटा रानी चडवती से और साहूकार बेटी लावण्यवती से शादी कर लेता है। उन दोनों की आगे चलकर कई संतान पैदा होती हैं। बेताल पूछता है, “बता विक्रम अब इन दोनों की संतानों का आपस में रिश्ता क्या होगा?” इस सवाल से विक्रम भी सोच में पड़ जाता है। लाख सोचने के बाद भी उसे सही जवाब नहीं सूझता। इसलिए, वह चुपचाप आगे बढ़ता रहता है। ये देखकर बेताल कहता है, “राजन, अगर तुम्हें इसका जवाब नहीं पता, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारे पराक्रम और धीरज से बहुत खुश हूं। मैं इस मुर्दे से निकल जाता हूं और तुम इस मुर्दे को अपने वादे के अनुसार योगी के पास ले जा सकते हो, लेकिन याद रहे जब योगी तुम्हें सिर झुकाकर इस मुर्दे को प्रणाम करने को कहे, तो तुम उनसे कहना कि पहले आप करके दिखाएं कि कैसे करना है। जब योगी सिर झुकाएं, तो तभी अपनी तलवार से उसका सिर काट लेना। उसका सिर काटकर तुम पूरी पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट बन जाओगे। वहीं, अगर तुमने उसका सिर नहीं काटा, तो योगी तुम्हारी बलि दे देगा और सिद्धि प्राप्त कर लेगा।” इतना कहते ही बेताल ने मुर्दे का शरीर छोड़ दिया और राजा विक्रम मुर्दे का शरीर लेकर योगी के पास पहुंच जाते हैं। इसी प्रकार रिश्ता क्या हुआ विक्रम और बेताल की एक अद्भूत कथा समाप्त होती है। कहानी से सीख : बिना तथ्य को जाने किसी भी फैसले को नहीं लेना चाहिए। इससे आगे चलकर परेशानी हो सकती है।

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विक्रम बेताल की कहानी: किसका पुण्य बड़ा? – बेताल पच्चीसी तेईसवीं कहानी

रात के अंधेरे और घने जंगल में कुछ देर भटकने के बाद राजा विक्रमादित्य ने फिर से बेताल को अपनी पकड़ में ले लिया। बेताल ने हर बार की तरह कहानी सुनाने और सवालों का सिलसिला जारी रखा। बेताल ने कहानी सुनाना शुरू किया…. एक समय की बात है, मिथलावती नाम का एक नगर था। वहां गुणधिप नाम के राजा का शासन चलता था। राजा से मिलने के लिए रोजाना दूर-दूर से लोग आया करते थे। एक बार उनसे मिलने और उनकी सेवा करने के लिए किसी राज्य से एक युवक आया। युवक ने राजा से मिलने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो राजा से मिल नहीं पाया। अपने साथ युवक जो भी सामान लाया था, वो सब भी खत्म हो गया था। एक दिन की बात है, जब राजा शिकार के लिए जंगल जाते हैं। युवक भी उनके पीछे-पीछे चला जाता है। जंगल इतना घना था कि राजा से उनके नौकर-चाकर बिछड़ जाते हैं। बस राजा और युवक साथ रह जाते हैं। जब राजा जंगल की ओर आगे बढ़ने लगते हैं, तो युवक उन्हें रोकता है। राजा उसकी तरफ देखते हुए कहते हैं, “तुम इतने कमजोर क्यों लग रहे हो।” युवक जवाब देता है, “राजन यह मेरा कर्म दोष है। मैं कई राजाओं के पास रहा हूं, जो हजारों लोगों को पालता है, लेकिन उनकी नजर कभी मुझ पर नहीं पड़ी।” अपनी बात आगे बढ़ाते हुए युवक कहता है, “राजन, छह बातें इंसान को कमजोर बनाती हैं – गलत व्यक्ति से प्रेम, बिना कारण हंसना, स्त्री से बहस करना, बुरे स्वामी के लिए काम करना, गधे पर सवारी और संस्कृत के बिना भाषा। इसके अलावा, पांच चीजें आयु, कर्म, धन, विद्या और यश व्यक्ति के जन्म के साथ ही विधाता उनके नसीब में लिख देता है। जब तक कोई पुण्य करता है, तब तक उसके पास सेवन करने के लिए बहुत से दास होते हैं। जब पुण्य कम हो जाता है, तो भाई ही भाई का दुश्मन बन जाता है, लेकिन राजन, स्वामी की सेवा का फल किसी न किसी दिन जरूर मिलता है।” युवक की इन बातों का राजा पर बहुत असर हुआ। थोड़ी देर बाद दोनों नगर को लौट आए। राजा उस युवक को नौकरी पर रख लेते हैं। कुछ दिन बाद युवक किस काम से बाहर जाता है। उसे रास्ते में एक मंदिर दिखाई देता है। वह अंदर जाता है और वहां स्थापित देवी की पूजा करता है। फिर वह बाहर आता है, तो उसे वहां एक सुंदर स्त्री दिखाई देती है। युवक उस स्त्री पर मोहित हो जाता है। वह स्त्री युवक से कहती है, “तुम पहले इस कुण्ड के पानी से स्नान करों, फिर तुम जो कहोगे वो मैं करूंगी।” स्त्री की बातें सुनकर युवक कुण्ड में उतरकर गोता लगाता है। गोता लगाते ही वह अपने नगर पहुंच जाता है। फिर वह राजा से मिलकर सारी बात बताता है। युवक की बात सुनकर राजा बोलते हैं, “मुझे भी वहां ले चलो, मैं भी यह चमत्कार देखना चाहता हूं।” फिर दोनों घोड़े पर बैठकर मंदिर की ओर चल देते हैं। मंदिर पहुंचकर वो दर्शन करते हैं और जब बाहर निकलते हैं, तो उन्हें वहां एक स्त्री मिलती है, जो राजा पर मोहित हो जाती है। स्त्री राजा से कहती है, “आप जो कहोगे मैं वही करूंगी।” यह सुनकर राजा कहता है, “ तुम इस सेवक से शादी कर लो।” राजा की बात सुनकर स्त्री कहती है, “मुझे तो आप पसंद हो।” फिर राजा उस स्त्री से कहते हैं, “सज्जन इंसान जो कहता है, उस बात को निभाता भी है। इसलिए, तुम्हें अपनी बात का पालन करना चाहिए।” फिर उस स्त्री और युवक का विवाह हो जाता है। इस कहानी को सुनाने के बाद बेताल बोलता है, “हे राजन, अब बताओं कि राजा और सेवक में किसका काम बड़ा हुआ।” राजा विक्रमादित्य ने कहा, “नौकर का काम बड़ा हुआ।” बेताल पूछता है कि कैसे? राजा विक्रमादित्य कहते हैं, “उपकार करना एक राजा का धर्म होता है, लेकिन जिसका धर्म नहीं था उसने उपकार किया है, तो युवक का काम बड़ा हुआ।” राजा का जवाब सुनने के बाद बेताल उड़कर फिर से जंगल के किसी पेड़ पर जाकर लटक जाता है। कहानी से सीख: अपने वादे से इंसान को कभी नहीं मुकरना चाहिए। सच्चे मनुष्य की पहचान यही होती है कि वो किए गए वादे को कैसे पूरा करता है। वो यह नहीं देखता कि वादा पूरा करने के लिए उसे किस चीज का त्याग करना पड़ रहा है।

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विक्रम बेताल की बाईसवीं कहानी: चार ब्राह्मण भाइयों की कथा

जब राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर बेताल को पकड़ा, तो उसने हर बार की तरह एक नई कहानी शुरू कर दी। बेताल ने कहानी सुनाते हुए राजा विक्रमादित्य से कहा…. कुसुमपुर नाम के एक नगर में एक ब्राह्मण परिवार रहा करता था। ब्राह्मण के परिवार में चार बेटे और उसकी पत्नी थी। ब्राह्मण अपने परिवार के साथ सुखी-सुखी जीवन बिता रहा था। एक दिन अचानक ब्राह्मण बीमार हो गया और उसकी हालत दिन-ब-दिन खराब होती चली गई। सेहत में सुधार न होने के कारण एक दिन ब्राह्मण की मौत हो गई। ब्राह्मण की मौत के दुख में उसकी पत्नी भी सती हो गई। ब्राह्मण और उसकी पत्नी की मौत के बाद उनके रिश्तेदारों ने चार लड़कों को अकेला देख उनका सारा धन छीन लिया। पूरी तरह से कंगाल होने पर चारों भाई अपने नाना के यहां रहने चले गए। कुछ दिन तक तो सब ठीक-ठाक चला। बाद में नाना के घर में भी ब्राह्मण के चारों बेटों के साथ बुरा व्यवहार किया जाने लगा। इस स्थिति को देखते हुए चारो भाइयों ने निश्चय किया कि उन्हें कोई विद्या ग्रहण करनी चाहिए, ताकि लोग उनके माता-पिता की तरह ही उनका भी सम्मान करें। यह सोचकर चारो भाई चारों दिशाओं में अलग-अलग चल दिए। चारों भाइयों ने घोर तपस्या की और फलस्वरूप कुछ विशेष विद्याएं हासिल की। जब चारों भाई काफी समय बाद मिले, तो उन्होंने एक-दूसरे को खुद के द्वारा हासिल की गई विद्या के बारे में बताया। एक ने कहा- मैं मरे हुए जीव की हड्डियों पर मांस चढ़ा सकता हूं। दूसरे ने कहा- मैं मांस पर खाल और बाल बना सकता हूं। तीसरे ने कहा- मैं मरे हुए जीव के सभी अंगों का निर्माण कर सकता हूं। चौथे ने कहा- मैं मरे हुए जीव में जान फूंक सकता हूं। सभी ने बारी-बारी हासिल की गई विद्या का गुणगान किया और एक-दूसरे की विद्या की परीक्षा लेने के लिए जंगल पहुंच गए। जंगल में उन्हें एक मरे हुए शेर की हड्डियां मिली। उन्होंने बिना जाने कि यह किस जीव की हड्डियां हैं, उन्हें उठा लिया। पहले ने अपनी विद्या से उन हड्डियों पर मांस चढ़ा दिया। दूसरे ने उस पर खाल और बाल पैदा कर दिए। तीसरे ने उस जीव के सभी अंगों का निर्माण कर दिया। अंत में चौथे ने अपनी विद्या का प्रयोग करके शेर में जान फूंक दी। शेर जीवित होते ही चारों भाइयों को मार कर खा गया। इतना कहते हुए बेताल बोला, “बता विक्रम बता इन चार पढ़े लिखे मूर्ख में सबसे बड़ा मूर्ख कौन था।” विक्रम ने जवाब देते हुए कहा, “इन चार मूर्ख में सबसे बड़ा मूर्ख चौथा भाई था, जिसने शेर में जान फूंके। वजह यह है कि अन्य ने बिना जाने ही शेर के शरीर का निर्माण किया। उन्हें पता ही नहीं था कि वह किस जीव का निर्माण कर रहे हैं। वहीं, चौथे को अच्छी तरह से पता चल चुका था कि यह शेर का ही शरीर हैं। इसके बावजूद उसने शेर के शरीर में जान डाल दी। यही उसकी सबसे बड़ी मूर्खता का प्रमाण है।” विक्रम का जवाब सुनकर बेताल बोला, “विक्रम तूने बिल्कुल ठीक जवाब दिया, लेकिन तूने मेरी शर्त तोड़ दी। मैंने कहा था कि अगल तू बोला, तो मैं वापस पेड़ पर चला जाऊंगा। इसलिए तू बोला और मैं चला। इतना कहकर बेताल एक बार फिर वहीं पेड़ पर जाकर लटक जाता है। इसी के साथ चार मूर्ख विक्रम बेताल कहानी समाप्त होती है। कहानी से सीख: बुद्धि बिना बल का प्रयोग मूर्खता की पहचान है।

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विक्रम बेताल की इक्कीसवीं कहानी: सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा कौन था?

सम्राट विक्रमादित्य ने योगी को दिए वचन को पूरा करने के लिए एक बार फिर बेताल को पेड़ से उतारकर अपने कंधे पर बैठा दिया। इसके बाद वह योगी के पास चल दिए। रास्ता तय करने के लिए बेताल ने एक नई कहानी शुरू की। बेताल बोला… बहुत समय पहले की बात है। विशाला नाम के राज्य में पदमनाभ नाम का एक राजा राज किया करता था। उसी के राज्य में एक साहूकार रहता था। उस साहूकार का नाम था अर्थदत्त। अर्थदत्त की एक सुंदर लड़की थी, अनंगमंजरी। अनंगमंजरी जब बड़ी हुई तो साहूकार ने मणिवर्मा नाम के एक धनी साहूकार से उसका विवाह कर दिया। मणिवर्मा, अनंगमंजरी को काफी चाहता था, लेकिन अनंगमंजरी, मणिवर्मा को बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी। एक दिन मणिवर्मा किसी काम से अपने राज्य से बाहर गया था और अनंगमंजरी अकेली थी। इसलिए वह अपने घर से कुछ दूर टहलने के लिए निकली। तभी रास्ते में अनंगमंजरी ने राजपुरोहित के लड़के कमलाकर को देखा। कमलाकर को देखते ही अनंगमंजरी को उससे प्रेम हो गया। वहीं, दूसरी ओर कमलाकर भी अनंगमंजरी को मन ही मन चाहने लगा था। अनंगमंजरी बिना देर किए महल के बाग में जाती है और चंडी देवी को प्रणाम करती है। अनंगमंजरी चंडी देवी से हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है, “हे माता, अगर मैं इस जन्म में कमलाकर को नहीं पा सकी, तो अगले जन्म में मैं उनकी ही पत्नी बनूं।” इतना कहते हुए अनंगमंजरी ने अपना दुपट्टा खींचा और पेड़ पर दुपट्टे से फांसी लगाने की तैयारी करने लगी। तभी राज्य की दासी और अनंगमंजरी की सहेली वहां आ गई। सहेली ने कहा, “अनंगमंजरी तुम ये क्या कर रही हो।” इस पर अनंगमंजरी उसे अपनी मन की बात बताती है। यह सुनने के बाद सहेली कहती है, “तुम बिल्कुल भी परेशान न हो। जल्द ही मैं कमलाकर से तुम्हारी मुलाकात करा दूंगी।” सहेली की यह बात सुनकर अनंगमंजरी रुक गई। अगले ही दिन अनंगमंजरी की सहेली ने कमलाकर के साथ उसकी मुलाकात का प्रबंध किया। दोनों एक-दूसरे से मिलने बाग में पहुंचे। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और खुद को रोक न सके। कमलाकर बेताब होकर अनंगमंजरी की ओर दौड़ा। कमलाकर को अपने नजदीक आते देख अनंगमंजरी की धड़कने तेज हो गईं और मारे खुशी के उसकी धड़कने ही रुक गईं। अनंगमंजरी को मरा देख कमलाकर भी बहुत दुखी हुआ, जिससे उसका दिल फट गया और वह भी मर गया। इस बीच मणिवर्मा भी वहां पहुंच गया और अपनी पत्नी को दूसरे आदमी से साथ मृत पड़ा देख बहुत दुखी हुआ। वह अनंगमंजरी को बहुत चाहता था। इसलिए उससे अपनी पत्नी का वियोग सहा नहीं गया और उसने भी प्राण छोड़ दिए। यह सब देख चंडी देवी स्वयं वहां प्रकट हुईं और सबको दोबारा जीवित कर दिया। इतना कहकर बेताल बोला, “बता बिक्रम इन तीनों में सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा कौन था।” जब विक्रम कुछ नहीं बोला तो बेताल ने फिर कहा, “बता विक्रम प्रेम में अंधा कौन था।” बेताल के बार-बार पूछने पर विक्रम ने कहा, “सुनो बेताल, सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा था मणिवर्मा। वजह यह है कि अनंगमंजरी और कमलाकर अचानक मिले और वह उस खुशी के कारण मरे। वहीं, मणिवर्मा यह देख कर शोक में मर गया कि उसकी पत्नी किसी दूसरे से प्रेम करती थी और अपने प्रेम से मिलने की खुशी में मर गई।” यह सुनते ही बेताल बोला, “हां राजन, तुमने बिल्कुल सही जवाब दिया, लेकिन तू बोला तो मैं चला। इतना कहकर बेताल एक बार फिर विक्रम के कंधे से उड़कर पेड़ पर फिर जा लटकता है। इसी के साथ प्रेम में अंधा कौन विक्रम बेताल कहानी समाप्त होती है। कहानी से सीख : किसी भी चीज की अति नुकसानदायक हो सकती है, इसलिए इंसान को हमेशा अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए।

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विक्रम बेताल की बीसवीं कहानी: बालक क्यों हंसा?

इस बार भी पेड़ पर लटके बेताल को राजा विक्रमादित्य उतारते हैं और कंधे पर लादकर आगे बढ़ते हैं। बेताल हर बार की तरह राजा विक्रमादित्य को फिर से एक कहानी सुनाता है। बेताल कहता है… एक बार की बात है, चित्रकूट नगर में एक चन्द्रवलोक नाम का राजा राज करता था। उसे शिकार करने का बहुत शौक था। एक बार वो जंगल में शिकार करने निकला, वहां घूमते-घूमते वो रास्ता भटक गया। थककर वो एक पेड़ के नीचे आराम करने लगा। आराम करते हुए उसने एक खूबसूरत कन्या को देखा। उसकी खूबसूरती राजा की आंखों में बस गई। उस लड़की ने फूलों के गहने पहने हुए थे, राजा उस कन्या के पास पहुंचा। वो कन्या भी राजा को देखकर बहुत खुश हुई। इतने में उस कन्या की सहेली ने राजा से कहा कि यह ऋषि की बेटी है। उसकी सहेली की बात सुनकर राजा खुद ही ऋषि के पास गए, उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया। ऋषि ने राजा से पूछा, “राजा आप यहां कैसे?” राजा ने कहा, “मैं यहां शिकार खेलने आया था।” राजा की बात सुन ऋषि ने कहा, “बेटा, तुम क्यों मासूम जीवों को मारकर पाप के भागी बन रहे हो।” ऋषि की बात का राजा पर बहुत असर हुआ। राजा ने कहा, “मुझे आपकी बात समझ आ गई है, अब मैं कभी शिकार नहीं करूंगा।” राजा की बात सुनकर ऋषि बहुत खुश हुए और बोले, “राजा तुम्हें जो मांगना है मांगो।” राजा ने ऋषि की बेटी के साथ शादी करने का प्रस्ताव रखा। ऋषि ने राजा की बात मान ली और बेटी की शादी राजा के साथ कर दी। शादी के बाद राजा अपनी पत्नी को लेकर अपने राज्य के तरफ चल पड़ा। रास्ते में जाते-जाते दोनों को एक भयानक राक्षस मिला। वो राक्षस बहुत ही भयानक था, उसने राजा की पत्नी को खाने की धमकी दी। राक्षस ने कहा, “अगर अपनी रानी को बचाना चाहते हो तो सात दिन के अंदर एक ऐसे ब्राह्मण के बेटे की बलि दो, जो खुद की मर्जी से अपने-आपको समर्पित कर दे और उसकी मौत के वक्त उसके माता-पिता उसके हाथ पकडे रहे।” राजा बहुत डरा हुआ था और उसी डर से उसने राक्षस की बात मान ली। राजा डरते हुए अपने नगर पहुंचा और अपने दीवान को सारी बात बताई। दीवान ने राजा की पूरी बात सुनते हुए राजा को सांत्वना दी और कहा, “आप चिंता मत कीजिये, मैं कुछ उपाय करता हूं।” फिर दीवान ने सात साल के एक बालक की मूर्ति बनवाई और उसे कीमती गहने और कपड़े पहनाएं। उसके बाद दीवान ने उस मूर्ति गांव-गांव और आस-पास के नगरों में भी घुमवाया। साथ ही उसने यह भी कहलवाया कि अगर किसी ब्राह्मण का सात साल का बेटा अपने आपको अपनी मर्जी से बलिदान देगा और बलि के वक्त उसके माता-पिता हाथ-पैर पकड़ेंगे, उसे यह मूर्ती मिलेगी और साथ ही साथ सौ गांव भी मिलेंगे। यह खबर सुनकर एक ब्राह्मण का बेटा राजी हो गया। उसने अपने माता-पिता से कहा, “आपको बेटे कई मिल जाएंगे, मेरे बलिदान से राजा का भला हो जाएगा और आप लोगों की गरीबी भी खत्म हो जाएगी।” माता-पिता ने काफी मना किया, लेकिन बेटा जिद पर अड़ा रहा और अंत में माता-पिता को मनवा लिया। ब्राह्मण माता-पिता अपने बेटे को लेकर राजा के पास गए। राजा सभी को लेकर राक्षस के पास गया। राक्षस के कहे अनुसार, राजा उस बालक की बलि के लिए तैयार हुआ और बलि के वक्त बालक के माता-पिता ने उसके हाथ पकड़े। राजा ने बालक को मारने के लिए जैसे ही तलवार उठाया, बालक जोर से हंस पड़ा। इतने में ही बेताल ने कहानी बीच में ही रोक दी और विक्रमादित्य से हर बार की तरह सवाल पूछ बैठा कि, “बताओ विक्रमादित्य ब्राह्मण का लड़का क्यों हंसा?” राजा ने जवाब देते हुए कहा, “ब्राह्मण का बेटा इसलिए हंसा क्योंकि जब भी कोई आदमी डरता है तो वो सबसे पहले अपने माता-पिता को बुलाता है। अगर माता-पिता नहीं हो तो व्यक्ति राजा को मदद के लिए बुलाता है। अगर राजा भी मदद न कर सके तो व्यक्ति भगवान को मदद के लिए याद करता है, लेकिन यहां तो कोई भी ब्राह्मण के बेटे की मदद के लिए नहीं था। माता-पिता बालक के हाथ पकड़े हुए थे, राजा हाथ में तलवार लिए खड़ा था और राक्षस उसके सामने उसे खाने के लिए तैयार था। ब्राह्मण का बेटा किसी और की भलाई के लिए खुद का बलिदान दे रहा था और इसी कारण वो हंस पड़ा।” इतना सुनकर बेताल खुश हो गया और राजा की तारीफ। फिर तुरंत ही हर बार की तरह उड़कर पेड़ पर जाकर उल्टा लटक गया। कहानी से सीख : मुसीबत के समय चाहे जीतने भी लोग आसपास रहें, लेकिन उसका सामना अकेले ही करना होता है।

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विक्रम बेताल की उन्नीसवीं कहानी: पिण्ड दान का अधिकारी कौन?

हर बार की तरह इस बार भी राजा विक्रमादित्य ने बेताल को अपने कंधे पर लादा और आगे बढ़ने लगे। सफर लंबा था, इसलिए बेताल ने राजा को फिर से एक नई कहानी सुनाई। बेताल कहता है… यह कहानी है विधवा भागवती और उसकी बेटी धनवंती की। भागवती के विधवा होने के बाद उसके पति के रिश्तेदार उसका सारा धन लेकर भागवती और उसकी बेटी को घर से निकाल देते हैं। इसके बाद दोनों मां-बेटी दूसरे नगर के लिए निकल पड़ती हैं। रास्ते में दोनों एक जगह आराम करने के लिए रुकती हैं तो वहां एक सिपाही एक चोर को बांधकर रखे रहता है। चोर को प्यास लगी होती है वो भागवती और उसकी बेटी धनवंती से पानी पिलाने के लिए विनती करता है। पानी पीने के बाद वो मां-बेटी से सारी बातें पूछता है कि उनके साथ क्या हुआ था। सारी बातें सुनने के बाद चोर धनवंती के साथ शादी करने की इच्छा रखता है। यह सुनकर भागवती को गुस्सा आता है और वो उस सिपाही को चोर की बात बताती है। सिपाही भी चोर पर गुस्सा जाहिर करते हुए कहता है कि, “कुछ दिनों में तुम्हें फांसी लगेगी और तुम शादी करने की बात करते हो।” यह सुनकर चोर कहता है, “बहुत पाप किये हैं मैंने, अब लगता है कोई तो हो जो मरने के बाद मुझे पानी दे सके। मेरा कोई बच्चा नहीं है, मैं चैन से मर भी नहीं सकता, भूत बनकर भटकूंगा मैं।” यह सब सुनने के बाद सिपाही वहां चोर को बांधकर आराम करने चला गया। सिपाही के जाने के बाद चोर भागवती और उसकी बेटी धनवंती को अपने छिपाये धन के बारे में बताने लगा, उसने कहा, “अगर आप अपनी बेटी धनवंती की शादी मेरे साथ कर देंगी तो मैं आपको अपने छिपाये धन के बारे में बता दूंगा, मेरे मरने के बाद आप दोनों उस धन के साथ अपनी पूरी जिंदगी आराम से बिता सकेंगी।” उसकी बात सुनकर दोनों सोच में पड़ गईं। धनवंती की मां भागवती ने चोर से पूछा, “तुम यह क्यों करना चाहते हो।” तो चोर ने कहा, “शादी के बाद मेरा जो बच्चा होगा वो मेरे मरने के बाद पिंडदान करेगा, जिससे मुझे मुक्ति मिल जाएगी और मैं भूत नहीं बनूंगा।” ये सब सुनने के बाद  भागवती अपनी बेटी की शादी चोर से कराने के लिए तैयार हो जाती है। दोनों की शादी होती है और जल्द ही दोनों को एक बच्चा भी होता है। कुछ दिनों बाद चोर को फांसी लगा दी जाती है। भागवती और धनवंती काफी दुखी होते हैं। कुछ दिनों बाद भागवती को चोर की बात याद आती है कि एक गुफा में मूर्ति के सामने की जमीन के नीचे उसने खजाना छिपाकर रखा था। दोनों मां-बेटी वहां जाकर देखते हैं और जमीन खोदने लगते हैं, फिर उन्हें वहां सोना-चांदी और पैसे मिलते हैं। धनवंती फिर भी दुखी रहती है और कहती है, “अगर पैसे नहीं मिलते, लेकिन वो जिंदा रहते तो मुझे सबकुछ मिल जाता।” भागवती बेटी को समझाते हुए बोलती है कि, “अगर पैसा है तो सारी खुशी मिल जाएगी।” उसके बाद दोनों मां-बेटी एक नए शहर जाकर खुशी-खुशी अपनी जिंदगी बिताने लगते हैं। कुछ समय बाद भागवती की सहेलियां धनवंती की शादी कराने को लेकर पूछने लगती हैं। भागवती कहती है, “मुझे अपनी बेटी की शादी तो करवानी है, लेकिन लड़का ऐसा होना चाहिए जो घर-जमाई बनकर रहे।” फिर कुछ वक्त बाद एक एक पंडित लड़का उनके घर आता है, जिसके सामने भागवती अपनी बेटी धनवंती के शादी का प्रस्ताव रखती है। उनका बड़ा घर और पैसे देखकर वो लड़का लालच में आकर शादी के लिए हां कर देता है। वो कुछ वक्त तक उनके साथ रहता है और उनका भरोसा जीतने के बाद एक रात घर के सारे गहने और पैसे लेकर भाग गया। इस दुख में धनवंती की मां भगवती की मौत हो गई और धनवंती गरीब और अकेली हो गई। उसके बाद वो उस शहर से अपने बच्चे के साथ दूसरे शहर निकल पड़ी। समय बीतता गया और धनवंती किसी तरह अपना गुजारा करने लगी। धीरे-धीरे धनवंती का बच्चा भी बड़ा होने लगा। एक दिन दोनों मां-बेटे रास्ते में भटक रहे थे कि इतने में उन दोनों की नजर एक राजकुमार पर पड़ी, जिसके गले को एक अजगर ने जकड़ रखा था। धनवंती के बेटे ने उस अजगर को काफी मुश्किलों के बाद राजकुमार के गले से निकाला, लेकिन अफसोस तब तक राजकुमार की मौत हो गई थी। इसी बीच राजकुमार के पिता जो कि उस राज्य के राजा थे वो वहां पहुंच गए। बेटे की मौत से वो काफी दुखी हुए, लेकिन धनवंती के बेटे के साहस को देखते हुए राजा ने धनवंती के बेटे को गोद लेने का फैसला किया। धनवंती और उसका बेटा महराज के यहां रहने लगें। धनवंती का बेटा देखते ही देखते राजमहल और राजा के सारे कार्यों को सीख गया और राजा के बेटे की जगह ले ली। राजा की उम्र बहुत ज्यादा हो गई थी और कुछ वक्त बाद राजा की मौत हो गई। राजा ने मरने से पहले धनवंती के बेटे को सारा राजपाठ सौंप उसे राजा बना दिया। उसके बाद धनवंती ने अपने बेटे से कहा कि पिता की मौत के बाद बेटे को पिता की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और पिंडदान करना होता है। यह बात सुन उसका बेटा अपनी मां धनवंती के साथ पिंड दान करने निकल पड़ा। जब वो नदी के किनारे पहुंचा तो उसे तीन हाथ दिखाए दिए। इतनी कहानी सुनाने के बाद बेताल रुक गया और हर बार की तरह इस बार भी उसने राजा विक्रमादित्य से सवाल पूछा,  “बताओ राजन, उस लड़ने का पिता कौन है? धनवंती का बेटा किस हाथ में पिंड देगा? इसमें एक हाथ उस चोर का है, जिसके साथ धनवंती की शुरुआत में शादी हुई थी। दूसरा हाथ उस आदमी का है, जिसने धन की लालच में धनवंती से विवाह किया था और तीसरा हाथ उस राजा का, जिसने धनवंती के बेटे को गोद लेकर अपने बेटे की तरह रखा था।” विक्रमादित्य ने जवाब दिया, “उस लड़के का पिता वो चोर है, जिसने धनवंती से पूरे रीति-रिवाज के साथ शादी की। दूसरे व्यक्ति ने लालच में

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विक्रम बेताल की अठारहवीं कहानी: ब्राह्मण कुमार की कथा

बेताल का पीछा करते हुए राजा विक्रामादित्य शिशपा वृक्ष के पास पहुंचे और किसी तरह बेताल को अपने कंधे पर उठाकर आगे बढ़ने लगे। पहले की तरह ही बेताल रास्ता बड़ा होने की वजह से राजन को कहानी सुनाने लगता है। बेताल कहता है… सालों पहले की बात है, जब उज्जैन नगर में राजा महासेन राज किया करता था। उसी राज्य में एक ब्राह्मण रहता था, जिसका नाम वासुदेव था। उसका एक ही बेटा था, गुणकार। नाम का तो वह गुणकार था, लेकिन उसमें कोई गुण नहीं था। वो दिन रात बस जुआ खेलता था। जुए में वह पिता के कमाए सारे पैसे हार जाता। उसकी दो बहन भी थीं। उसे उनका भी ख्याल नहीं था। वो बस दिन-रात जुआ खेलने में ही व्यस्त रहता। अपने बेटे का ऐसा हाल देखकर ब्राह्मण बड़ा परेशान हो गया। एक दिन वासुदेव ने सोचा, मैं जो भी कमाता हूं, उसे भी यह जुएं में उड़ा देता है। यही सोचकर उसने अपने बेटे गुणकार को घर से निकाल दिया। घर से निकलते ही वह दूसरे राज्य पहुंच गया। वहां वह भूखा-प्यासा घूमता रहा, न तो उसे कोई काम मिला और न ही कुछ खाने के लिए। ऐसा होते-होते वह एक दिन बेहोश हो गया। पास से ही गुजर रहे एक सिद्ध पुरुष ने उसे देखा, तो उसे अपने साथ गुफा में ले आए। होश में आने के बाद योगी ने लड़के से पूछा, “क्या खाओगे।” ब्राह्मण पुत्र कहता है, “आप योगी हैं, आपके पास जो होगा आप वही खिला पाएंगे। मैं जो खाना चाहता हूं, शायद वो आपके पास न हो।” इतना सुनते ही योगी ने कहा, “तुम बस बताओ, तुम्हें क्या खाने की इच्छा है।” इतना सुनने के बाद गुणकार ने अपनी इच्छा जाहिर की, जिसे सुनते ही योगी ने अपनी सिद्धि की मदद से उसकी मनपसंद थाली प्रकट कर दी। वह लड़का हैरान रह गया, पहले उसने खान खाया और फिर सिद्ध पुरुष से पूछा, “यह चमत्कार आपने कैसे किया।” योगी ने कुछ कहा नहीं, बस अंदर की ओर जाना का इशारा किया। वह जैसे ही अंदर गया, तो उसे बड़ा सा महल और दासियां दिखाई दीं। सब ने उसकी अच्छे से सेवा की और वह आराम से सो गया। सोकर उठने के बाद उसने सिद्ध पुरुष से दोबारा वही प्रश्न किया। योगी ने कहा, “इससे तुम्हें क्या करना है, तुम यहां कुछ दिन मेहमान की तरह रहो और व्यवस्था का आनंद उठाओ।” ब्राह्मण पुत्र जिद में अड़ गया और कहने लगा कि वो भी यह सिद्धि हासिल करना चाहता है। परेशान होकर योगी ने उसे विधि बता दी और कहा कि जाओ अब मन लगाकर साधना करो। कुछ समय बाद वह साधना पूरी करके आ जाता है। फिर योगी कहता है, “तुम सब कुछ बहुत सही तरीके से कर रहे हो। यह पहला पड़ाव था, जिसे तुमने पार किया है। अब तुम्हें दूसरे पड़ाव की ओर बढ़ना होगा।” उसने कहा, “मैं, ऐसा ही करूंगा, लेकिन दूसरा पड़ाव शुरू करने से पहले मैं एक बार अपने घर जाना चाहता हूं।” सिद्ध योगी ने कहा, “जाओ, जरूर जाओ।” जाने से पहले ब्राह्मण पुत्र ने योगी से अपने परिवार के लिए तोहफे की मांग की। योगी ने अपनी सिद्धि से उसे खूब सारे तोहफे दिए। उसके बाद उसने पैसों की मांग की, सिद्ध पुरुष ने अपनी विद्या के दम पर उसे खूब सारा पैसा भी दिया। उसके बाद उसने अपने लिए अच्छे से कपड़े मांगे, योगी ने उसे वो भी दे दिए। सब कुछ लेकर वह अपने घर पहुंचा, तो उसके परिवार के सभी लोग गुणकार को देखकर दंग रह गए। साथ लाए तोहफे और धन को देखकर उसके ब्राह्मण पिता ने पूछा, “बेटा कहीं तुमने कोई चोरी तो नहीं की है न।” गुणकार ने बड़े गर्व से कहा, “पिताजी मुझे कुछ ऐसा प्राप्त हो गया है, जिसकी मदद से मैं अब सबकी हर इच्छा पूरी कर सकता हूं।” उसके पिता ने गुणकार को संभल कर रहने और अहंकार न करने की सलाह दी। कुछ दिन घर में बिताने के बाद गुणकार दोबारा सिद्ध पुरुष के पास लौट गया। वहां लौटकर उसने दोबारा से साधना शुरू की। बड़ी लगन से वह ध्यान करने लगा। समय के साथ-साथ ब्राह्मण पुत्र ने दूसरा पड़ाव भी पूरा कर लिया। पड़ाव पूरा होने के बाद उसे भी वह विद्या हासिल हो गई। योगी के पास जैसे ही वह विद्या हासिल करके पहुंचा, तो सिद्ध पुरुष बहुत प्रसन्न हुआ। उसने गुणकार से कहा, “तुमने अब विद्या हासिल कर ली है, आज तुम मुझे कुछ भोजन खिलाओ। मुझे भूख लगी है।” यह सुनते ही ब्राह्मण पुत्र बेहद खुश हुआ और सिद्धि की मदद से मन चाहा भोजन हासिल करने के लिए मन में मंत्र पड़ने लगा। काफी देर हो गई, लेकिन भोजन सामने नहीं आया। वह बहुत क्रोधित हुआ और चिल्लाने लगा, मेरी विद्या काम क्यों नहीं कर रही है। मैंने भी सिद्धि हासिल की है, उसका फल मुझे क्यों नहीं मिल रहा है? इतनी कहानी सुनाते ही बेताल चुप हो गया और राजा से पूछने लगा, बताओ इतने मन से पूरी विधि करने के बाद भी उसे सिद्धि हासिल क्यों नहीं हो पाई। विक्रमादित्य कहते हैं, बेताल! सबसे पहला कारण, तो यह है कि वह विद्या हासिल करने से पहले ही घर चला गया। उसके बाद वह विद्या लालच की वजह से हासिल करना चाहता था। लालच के चलते की गई चीजों का फल कभी प्राप्त नहीं होता है। सिद्धि हासिल करने के लिए व्यक्ति को बिना लालच के कर्म करना पड़ता है। कहानी से सीख: हमें कभी भी विद्या हासिल करने का फैसला लालच की वजह से नहीं करना चाहिए और विद्या पर अहंकार हो जाए, तो वह समय पर काम नहीं आती।

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