MYTHOLOGICAL STORIES

भगवान गणेश को क्यों नहीं चढ़ाते तुलसी ?

धर्म ग्रंथो के अनुसार भगवान गणेश को भगवान  श्री कृष्ण का अवतार बताया गया है और भगवान श्री कृष्ण स्वयं भगवान विष्णु के अवतार है। लेकिन जो तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इतनी प्रिय की भगवान विष्णु के ही एक रूप शालिग्राम का विवाह तक तुलसी से होता है वही तुलसी भगवान गणेश को अप्रिय है, इतनी अप्रिय की भगवान गणेश के पूजन में इसका प्रयोग वर्जित है।  पर ऐसा क्यों है इसके सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा है एक बार श्री गणेश गंगा किनारे तप कर रहे थे। इसी कालावधि में धर्मात्मज की नवयौवना कन्या तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया। देवी तुलसी सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए गंगा के तट पर पंहुची। गंगा तट पर देवी तुलसी ने युवा तरुण गणेश जी को देखा जो तपस्या में विलीन थे। शास्त्रों के अनुसार तपस्या में विलीन गणेश जी रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान थे। उनके समस्त अंगों पर चंदन लगा हुआ था। उनके गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण-मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। उनके कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था। तुलसी श्री गणेश के रुप पर मोहित हो गई और उनके मन में गणेश से विवाह करने की इच्छा जाग्रत हुई। तुलसी ने विवाह की इच्छा से उनका ध्यान भंग किया। तब भगवान श्री गणेश ने तुलसी द्वारा तप भंग करने को अशुभ बताया और तुलसी की मंशा जानकर स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर उसके विवाह प्रस्ताव को नकार दिया। श्री गणेश द्वारा अपने विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने से देवी तुलसी बहुत दुखी हुई और आवेश में आकर उन्होंने श्री गणेश के दो विवाह होने का शाप दे दिया। इस पर श्री गणेश ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि तुम्हारा विवाह एक असुर से होगा। एक राक्षस की पत्नी होने का शाप सुनकर तुलसी ने श्री गणेश से माफी मांगी। तब श्री गणेश ने तुलसी से कहा कि तुम्हारा विवाह शंखचूर्ण राक्षस से होगा। किंतु फिर तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में जगत के लिए जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। पर मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा।

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जब श्रीरामचन्द्र जी को कुत्ते ने बताया न्याय का अनोखा तरीका

श्रीरामचन्द्र जी वनवास के बाद अयोध्या लौटे तो खूब धूम-धाम से उनका राजतिलक हुआ। बड़े सम्मान के साथ उन्हें अयोध्या का राजा बनाया गया। राज गद्दी पर बैठने के बाद उन्होंने लक्ष्मण जी को आदेश दिया हुआ था कि भोजन करने से पहले देखो हमारे द्वार पर कोई भूखा तो नहीं है।एक दिन की बात है लक्ष्मण जी ने श्रीरामचन्द्र जी से कहा,’ मैं अभी आवाज लगाकर आया हूं, कोई भी भूखा नहीं है।’ श्रीरामचन्द्र जी ने कहा, ‘ दोबारा जाओ और जोर से आवाज लगाओ शायद कोई भूखा रह गया हो। ‘ श्रीरामचन्द्र जी का आदेश पालन करते हुए लक्ष्मण जी दोबारा बाहर गए और उन्होंने जोर से आवाज लगाई तो कोई आदमी तो नहीं वरन् एक कुत्ते को लक्ष्मण जी ने रोते हुए देखा। अन्दर आ कर उन्होंने श्रीरामचन्द्र जी से कहा, ‘बाहर कोई व्यक्ति भूखा नहीं है बल्कि एक कुत्ता अवश्य रो रहा है। ‘ श्रीरामचन्द्र जी ने उस कुत्ते को अंदर बुलाया और कुत्ते से पूछा, ‘ तुम रो क्यों रहे हो ? ‘ कुत्ते ने कहा, ‘एक ब्राह्मण ने मुझे डंडा मारा है।’ श्रीरामचन्द्र जी ने ब्राह्मण को बुलवाया और उससे पूछा, ‘क्या यह कुत्ता सही बोल रहा है? ‘ ब्राह्मण ने कहा, ‘हां यह मेरे रास्ते में सो रहा था इसलिए मैंने इसे डंडा मारा है। यह कुत्ते जहां-तहां लेट जाते हैं, इन्हें डंडे से ही मारना चाहिए। श्रीरामचन्द्र जी समझ गए कि ब्राह्मण की ही गलती है परंतु ब्राह्मण को क्या कहें सो उन्होंने कुत्ते को पूछा, ‘ब्राह्मण ने तुम्हें डंडा मारा तो तुम क्या चाहते हो? ‘ कुत्ते ने कहा,’भगवान इसे मठाधीश बना दिया जाए।’ कुत्ते की बात सुनकर भगवान मुस्करा दिए और मुस्कराते हुए कुत्ते से पूछा,’ इस ब्राह्मण ने तुम्हें डंडा मारा बदले में तुम इन्हें मठाधीश बनाना चाहते हो। मठाधीश बनने से इनकी बहुत सेवा होगी, काफी चेले बन जाएंगे। इससे तुम्हारा क्या फायदा होगा।’ कुत्ता बोला, मैं भी मठाधीश था। मुझ से कुछ गलत काम हुआ आज मैं कुत्ते की योनि में हूं और लोगों के डंडे खा रहा हूं। ये भी मठाधीश बनेगा फिर कुत्ते की योनि में जाएगा, फिर लोगों के डंडे खाएगा तो इसकी सजा पूरी हो जाएगी।

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सांपो के सम्पूर्ण कुल विनाश के लिए जनमेजय ने किया था ‘सर्प मेध यज्ञ’

आज हम आपको महाभारत से जुडी एक कथा बताते है। यह कथा पांडव कुल के अंतिम सम्राट जनमेजय (अर्जुन के प्रपौत्र) से जुडी है। जनमेजय ने एक बार पृथ्वी से सांपो का अस्तित्व मिटाने के लिए सर्प मेध यज्ञ किया था जिसमे पृथ्वी पर उपस्तिथ लगभग सभी सांप समाप्त हो गए थे। हालंकि अंत में अस्तिका मुनि के हस्तक्षेप के कारण सांपो का सम्पूर्ण विनाश होने से रह गया था, अन्यथा आज पृथ्वी पर सांपो का अस्तित्व नहीं होता। आइये जानते है कौन थे जनमेजय और क्यों उन्होंने सांपो के सम्पूर्ण विनाश की प्रतिज्ञा ली थी ? राजा परीक्षित को ऋषि ने दिया शाप- महाभारत के युद्ध के बाद कुछ सालों तक पांडवों ने हस्तिनापुर पर राज किया। लेकिन जब वो राजपाठ छोड़कर हिमालय जाने लगे तो राज का जिम्मा अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को दे दिया गया। परीक्षित ने पांडवों की परंपरा को आगे बढ़ाया। लेकिन यहां पर विधाता कोई और खेल, खेल रहा था। एक दिन मन उदास होने पर राजा परीक्षित शिकार के लिए जंगल गए थे। शिकार खेलते-खेलते वह ऋषि शमिक के आश्रम से होकर गुजरे। ऋषि उस वक्त ब्रह्म ध्यान में आसन लगा कर बैठे हुए थे। उन्होंने राजा की ओर ध्यान नहीं दिया। इस पर परीक्षित को बहुत तेज गुस्सा आया और उन्होंने ऋषि के गले में एक मरा हुआ सांप डाल दिया। जब ऋषि का ध्यान हटा तो उन्हें भी बहुत गुस्सा आया और उन्होंने राजा परीक्षित को शाप दिया कि जाओ तुम्हारी मौत सांप के काटने से ही होगी।  राजा परीक्षित ने इस शाप से मुक्ति के लिए तमाम कोशिशे की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। कैसे हुई राजा परीक्षित की मौत- राजा परीक्षित ने हर मुमकिन कोशिश की कि उनकी मौत सांप के डसने से न हो। उन्होंने सारे उपाय किए ऐसी जगह पर घर बनवाया जहां परिंदा तक पर न मार सके। लेकिन ऋषि का शाप झूठा नहीं हो सकता था। जब चारों तरफ से राजा परीक्षित ने अपने आपको सुरक्षित कर लिया तो एक दिन एक ब्राह्मण उनसे मिलने आए। उपहार के तौर पर ब्राह्मण ने राजा को फूल दिए और परीक्षित को डसने वला वो काल सर्प ‘तक्षक’ उसी फूल में एक छोटे कीड़े की शक्ल में बैठा था। तक्षक सांपो का राजा था।  मौका मिलते ही उसने सर्प का रुप धारण कर लिया और राज परीक्षित को डस लिया।राजा परीक्षित की मौत के बाद राजा जनमेजय हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे। जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे। राजा जनमेजय का सर्प मेध यज्ञ- जनमेजय को जब अपने पिता की मौत की वजह का पता चला तो उसने धरती से सभी सांपों के सर्वनाश करने का प्रण ले लिया और इस प्रण को पूरा करने के लिए उसने सर्पमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ के प्रभाव से ब्रह्मांड के सारे सांप हवन कुंड में आकर गिर रहे थे। लेकिन सांपों का राजा तक्षक, जिसके काटने से परीक्षित की मौत हुई थी, खुद को बचाने के लिए सूर्य देव के रथ से लिपट गया और उसका हवन कुंड में गिरने का अर्थ था सूर्य के अस्तित्व की समाप्ति जिसकी वजह से सृष्टि की गति समाप्त हो सकती थी। कैसे खत्म हुआ सर्प मेध यज्ञ:

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महाभारत युद्ध में कौरवों का विनाश करने के लिए श्री कृष्ण को क्यों उठाना पड़ा था सुदर्शन चक्र?

 हम सब जानते है की महाभारत युद्ध में श्री कृष्ण, अर्जुन के सारथि बने थे।  लेकिन युद्ध में एक समय ऐसा भी आया था जब श्री कृष्ण अपना सुदर्शन चक्र लेकर, भीष्म सहित समस्त कौरवों का नाश करने के लिए रण भूमि में कूद पड़े थे। आइए जानते है की कृष्ण जो युद्ध में केवल अर्जुन के सारथि की ही भूमिका निभाने वाले थे, उन्हें आखिर युद्ध क्षेत्र में क्यों कूदना पड़ा और इसका क्या परिणाम निकला? यह घटना महाभारत युद्ध के तीसरे दिन की है। जब रात बीती और सबेरा हुआ तो भीष्म ने अपनी सेना को रणभ्रूमि में चलने की आज्ञा दी। वहां जाकर उन्होंने सेना का गरुड़-व्यूह रचा और उस व्यूह के अग्रभाग में चोंच के स्थान पर वे खुद ही खड़े हुए। दोनों नेत्रों की जगह द्रोणाचार्य और कृतवर्मा थे। शिरोभाग में अश्चत्थामा और कृपाचार्य खड़े हुए। इनके साथ त्रैगर्त, कैकय, और वाटधान भी थे। मद्रक, सिंधुवीर और पंचनददेशीय  वीरों के साथ भूरिश्रवा, शल, शल्य, भगदत व जयद्रथ- ये कण्ठ की जगह खड़े किए गए थे। दुर्योधन पुष्ठभाग पर खड़ा हुआ। कम्बोज, शक और शूरसेनदेशीय योद्धाओं को साथ लेकर विन्द तथा अनुविन्द उस व्यूह के पुच्छभाग में स्थित हुए। अर्जुन ने कौरव सेना की वह व्यूह रचना देखी तो धृष्टद्युम्न को साथ लेकर उन्होंने अपनी सेना का अर्धचंद्राकार व्यूह बनाया। उसके दक्षिण शिखर पर भीमसेन सुशोभित उनके साथ अनेकों अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न भिन्न-भिन्न देशों के राजा थे। भीमसेन के पीछे महारथी विराट और द्रुपद खड़े हुए। उनके बाद धृष्टकेतु थे। धृष्टकेतु के साथ चेदि, काशि और करूष एवं प्रभद्रकदेशीय योद्धाओं के साथ सेना के साथ धर्मराज युधिष्ठिर भी वहां ही थे। उनके बाद सात्यकि और द्रोपदी के पांच पुत्र थे। फिर अभिमन्यु और इरावान थे। इसके बाद युद्ध आरंभ हुआ। रथ से रथ और हाथी से हाथी भिड़ गए। कौरवों ने एकाग्रचित्त होकर ऐसा युद्ध किया की पांडव सेना के पैर उखड़ गए। पांडव सेना में भगदड़ मच गई। पांडव सेना का ऐसा हाल देखकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तुम अगर इस तरह मोह वश धीरे-धीरे युद्ध करोगे तो अपने प्राणों से हाथ धो बैठोगे। यह सुनकर अर्जुन ने कहा केशव आप मेरा रथ पितामह के रथ के पास ले चलिए। कृष्ण रथ को हांकते हुए भीष्म के पास ले गए। अर्जुन ने अपने बाणों से भीष्म का धनुष काट दिया। भीष्मजी फिर नया धनुष लेकर युद्ध करने लगे। भीष्म ने अर्जुन और श्रीकृष्ण को बाणों की वर्षा करके खूब घायल किया। भगवान श्रीकृष्ण ने जब देखा कि पाण्डव सेना के सब प्रधान राजा भाग खड़े हुए हैं और अर्जुन भी युद्ध में ठंडे पढ़ रहे हैं तो तब श्रीकृष्ण ने कहा अब मैं स्वयं अपना चक्र उठाकर भीष्म और द्रोण के प्राण लूंगा और धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों को मारकर पाण्डवों को प्रसन्न करूंगा। कौरवपक्ष के सभी राजाओं का वध करके मैं आज युधिष्ठिर को अजातशत्रु राजा बनाऊंगा। इतना कहकर कृष्ण ने घोड़ों की लगाम छोड़ दी और हाथ में सुदर्शन चक्र लेकर रथ से कूद पड़े। भगवान कृष्ण बहुत वेग से भीष्म की ओर झपटे, उनके पैरों की धमक से पृथ्वी कांपने लगी। वे भीष्म की ओर बढ़े। वे हाथ में चक्र उठाए बहुत जोर से गरजे। उन्हें क्रोध में भरा देख कौरवों के संहार का विचार कर सभी प्राणी हाहाकार करने लगे। उन्हें चक्र लिए अपनी ओर आते देख भीष्म बिल्कुल नहीं घबराए। उन्होंने कृष्ण से कहा आइए-आइए मैं आपको नमस्कार करता हूं। कृष्ण को आगे बढ़ते देख अर्जुन भी रथ से उतरकर उनके पीछे दौड़े और पास जाकर उन्होंने उनकी दोनों बांहे पकड़ ली। भगवान रोष मे भरे हुए थे, अर्जुन के पकडऩे पर भी वे रूक न सके। अर्जुन ने जैसे -तैसे उन्हें रोका और कहा केशव आप अपना क्रोध शांत कीजिए, आप ही पांडवों के सहारे हैं। अब मैं भाइयों और पुत्रों की शपथ लेकर कहता हूं कि मैं अपने काम में ढिलाई नहीं करूंगा, प्रतिज्ञा के अनुसार ही युद्ध करूंगा। तब अर्जुन की यह प्रतिज्ञा सुनकर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गए और वापस रथ पर लौट गए।

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जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर दफ़्न है श्रीकृष्ण की मौत से जुड़ा एक राज

परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों की भूमि भारत के हृदय में कई ऐसे भी राज दफ़्न हैं, जो कहानियां बनकर आज भी सुने और सुनाए जाते हैं। आज हम आपको भगवान जगन्नाथ की मूर्ति और भगवान श्रीकृष्ण की मौत से जुडी एक ऐसी ही कहानी से परिचित करवा रहे है। हिन्दू धर्म के बेहद पवित्र स्थल और चार धामों में से एक जगन्नाथ पुरी की धरती को भगवान विष्णु का स्थल माना जाता है। जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी एक बेहद रहस्यमय कहानी प्रचलित है, जिसके अनुसार मंदिर में मौजूद भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर स्वयं ब्रह्मा विराजमान हैं। ब्रह्मा कृष्ण के नश्वर शरीर में विराजमान थे और जब कृष्ण की मृत्यु हुई तब पांडवों ने उनके शरीर का दाह-संस्कार कर दिया लेकिन कृष्ण का दिल (पिंड) जलता ही रहा। ईश्वर के आदेशानुसार पिंड को पांडवों ने जल में प्रवाहित कर दिया। उस पिंड ने लट्ठे का रूप ले लिया। राजा इन्द्रद्युम्न, जो कि भगवान जगन्नाथ के भक्त थे, को यह लट्ठा मिला और उन्होंने इसे जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर स्थापित कर दिया। उस दिन से लेकर आज तक वह लट्ठा भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर है। हर 12 वर्ष के अंतराल के बाद जगन्नाथ की मूर्ति बदलती है लेकिन यह लट्ठा उसी में रहता है। इस लकड़ी के लट्ठे से एक हैरान करने वाली बात यह भी है कि यह मूर्ति हर 12 साल में एक बार बदलती तो है लेकिन लट्ठे को आज तक किसी ने नहीं देखा। मंदिर के पुजारी जो इस मूर्ति को बदलते हैं, उनका कहना है कि उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है और हाथ पर कपड़ा ढक दिया जाता है। इसलिए वे ना तो उस लट्ठे को देख पाए हैं और ही छूकर महसूस कर पाए हैं। पुजारियों के अनुसार वह लट्ठा इतना सॉफ्ट होता है मानो कोई खरगोश उनके हाथ में फुदक रहा है।पुजारियों का ऐसा मानना है कि अगर कोई व्यक्ति इस मूर्ति के भीतर छिपे ब्रह्मा को देख लेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसी वजह से जिस दिन जगन्नाथ की मूर्ति बदली जानी होती है, उड़ीसा सरकार द्वारा पूरे शहर की बिजली बाधित कर दी जाती है। यह बात आज तक एक रहस्य ही है कि क्या वाकई भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में ब्रह्मा का वास है।

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जानिए क्यों भगवान श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से जला कर भस्म कर दिया था काशी को ?

यह कथा द्वापरयुग की है जब भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को जलाकर राख कर दिया था। बाद में यह वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह कथा इस प्रकार हैः मगध का राजा जरासंध बहुत शक्तिशाली और क्रूर था। उसके पास अनगिनत सैनिक और दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे। यही कारण था कि आस-पास के सभी राजा उसके प्रति मित्रता का भाव रखते थे। जरासंध की अस्ति और प्रस्ति नामक दो पुत्रियाँ थीं। उनका विवाह मथुरा के राजा कंस के साथ हुआ था। कंस अत्यंत पापी और दुष्ट राजा था। प्रजा को उसके अत्याचारों से बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। दामाद की मृत्यु की खबर सुनकर जरासंध क्रोधित हो उठा। प्रतिशोध की ज्वाला में जलते जरासंध ने कई बार मथुरा पर आक्रमण किया। किंतु हर बार श्रीकृष्ण उसे पराजित कर जीवित छोड़ देते थे। एक बार उसने कलिंगराज पौंड्रक और काशीराज के साथ मिलकर मथुरा पर आक्रमण किया। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें भी पराजित कर दिया। जरासंध तो भाग निकला किंतु पौंड्रक और काशीराज भगवान के हाथों मारे गए। काशीराज के बाद उसका पुत्र काशीराज बना और श्रीकृष्ण से बदला लेने का निश्चय किया। वह श्रीकृष्ण की शक्ति जानता था। इसलिए उसने कठिन तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उन्हें समाप्त करने का वर माँगा। भगवान शिव ने उसे कोई अन्य वर माँगने को कहा। किंतु वह अपनी माँग पर अड़ा रहा। तब शिव ने मंत्रों से एक भयंकर कृत्या बनाई और उसे देते हुए बोले-“वत्स! तुम इसे जिस दिशा में जाने का आदेश दोगे यह उसी दिशा में स्थित राज्य को जलाकर राख कर देगी। लेकिन ध्यान रखना, इसका प्रयोग किसी ब्राह्मण भक्त पर मत करना। वरना इसका प्रभाव निष्फल हो जाएगा।” यह कहकर भगवान शिव अंतर्धान हो गए। इधर, दुष्ट कालयवन का वध करने के बाद श्रीकृष्ण सभी मथुरावासियों को लेकर द्वारिका आ गए थे। काशीराज ने श्रीकृष्ण का वध करने के लिए कृत्या को द्वारिका की ओर भेजा। काशीराज को यह ज्ञान नहीं था कि भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण भक्त हैं। इसलिए द्वारिका पहुँचकर भी कृत्या उनका कुछ अहित न कर पाई। उल्टे श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उसकी ओर चला दिया। सुदर्शन भयंकर अग्नि उगलते हुए कृत्या की ओर झपटा। प्राण संकट में देख कृत्या भयभीत होकर काशी की ओर भागी। सुदर्शन चक्र भी उसका पीछा करने लगा। काशी पहुँचकर सुदर्शन ने कृत्या को भस्म कर दिया। किंतु फिर भी उसका क्रोध शांत नहीं हुआ और उसने काशी को भस्म कर दिया।कालान्तर में वारा और असि नामक दो नदियों के मध्य यह नगर पुनः बसा। वारा और असि नदियों के मध्य बसे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ गया। इस प्रकार काशी का वाराणसी के रूप में पुनर्जन्म हुआ।\

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जब ब्रह्मा जी ने ली थी श्रीकृष्ण की परीक्षा, प्रभु की लीला देख हो गए थे अचंभित

जब श्री कृष्ण अपनी बाल्यावस्था में थे यह तब की कथा है। जब ब्रह्मा जी को पता चला कि भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया है तो वो उनके दर्शन करने को आतुर हो गए। वह ब्रह्मलोक से सीधा पृथ्वी पर आ गए। यहां पर उन्होंने मोर मुकुट को अपने सिर पर धारण किए एक बालक को देखा। यह बालक गायों और ग्वालों के साथ मिट्टी में खेल रहा था। यह सब देख ब्रह्मा जी को लगा कि यह बालक विष्णु जी का अवतार कैसे हो सकता है। लेकिन बच्चे के चेहरे पर जो तेज था वह देख ब्रह्मा जी ने कृष्ण जी की परिक्षा लेने का विचार किया। ब्रह्मा जी ने सबसे पहले गायों को वहां से उठा लिया। फिर उन्होंने ग्वालों को भी वहां से हटा दिया। यह उन्होंने तब किया जब श्री कृष्ण गायों को देखने के लिए गए। ब्रह्मा जी गायों और ग्वालों को अपने साथ ब्रह्मलोक ले गए। कुछ समय बाद जब ब्रह्मा जी धरती लोक वापस आए तो वह स्थिति को देख चौंक गए। उन्होंने देखा कि जिन गायों और ग्वालों और गायों को वो अपने साथ ब्रह्मलोक ले गए थे वो सभी कृष्ण जी के साथ पृथ्वी पर खेल रहे थे। फिर उन्होंने ध्यान लगाया और ब्रह्मलोक की स्थिति जानने की कोशिश की। उन्होंने देखा कि जिन गायों और ग्वालों और गायों को वो अपने साथ ब्रह्मलोक ले गए थे वो सभी तो वहीं हैं।इसके बाद उन्हें श्री कृष्ण की लीला समझ आ गई। उन्होंने हाथ जोड़कर कृष्ण जी से क्षमा मांगी। उन्होंने प्रार्थना की वो उन्हें अपने असली रूप में दर्शन दें। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना असली रूप दिखाया। उनके इस रूप के दर्शन करने के लिए कई ब्रह्मा वहां आ गए। इनमें से कुछ ब्रह्मा में तीन सिर तो कुछ के सौ सिर थे। अपने अलावा इतने ब्रह्माओं के देख ब्रह्मदेव ने पूछा, हे प्रभु! ये कैसी लीला है। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा, हे ब्रह्मदेव! इस जगत में केवल आप ही एक ब्रह्मा नहीं हैं। जगत में कई सारे ब्रह्मांड हैं, जहां पर कई ब्रह्मदेव मौजूद हैं। इन सभी का अपना-अपना कार्य है। यह सुनकर ब्रह्मदेव ने उन्हें शीश झुका लिया और उन्हें नमस्कार किया। 

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धनतेरस मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा है

दीपावली से दो दिन पूर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस का पर्व मनाया जाता है। हिन्दू मान्यता में धनतेरस का काफी महत्त्व है पर आखिर धनतेरस (Dhanteras) क्यों मनाया जाता है ! आइयें जानते हैं पूरी कहानी और कैसे मानते हैं धनतेरस शास्त्रों में वर्णित कथाओं के अनुसार धनतेरस का भगवान विष्णु के वामन अवतार से सम्बन्ध है। माना जाता है समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान भगवान धनवंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धनवंतरि को आयुर्वेद का जनक भी माना जाता है क्योंकि इसी दिन भगवान धनवंतरि का जन्म भी हुआ था। हिन्दुओं में धनतेरस मनाने का काफी महत्त्व है। क्योंकि  धनवंतरी भगवान विष्णु जी के अंशावतार है इसलिए धनवंतरी भी अपने एक हाथ में चक्र और दूसरे हाथ में शंख धारण किये हुए हैं। शंख से सांस की बीमारी दूर होती है और साथ ही साथ वातावरण भी शुद्ध और पवित्र हो जाता है। इनकी दो अन्य भुजाओं में से एक में जलूका और ओषधि और दूसरे हाथ में अमृत से भरा हुआ कलश है। असुरों द्वारा देवताओं के कार्य में बाधा डालने से क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने असुरों के गुरु शुक्राचार्य की एक आंख फोड़ दी। दूसरी और राजा बली भी देवताओं पर अत्याचार कर रहा था। देवताओं को राजा बलि के अत्याचार से मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु एक वामन के अवतार में प्रकट हुए। लेकिन शुक्राचार्य ने भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि को बता दिया कि यदि कोई भी वामन कुछ लेने आये तो मत देना क्योंकि वामन के रूप में विष्णु होंगे जो देवताओं की सहायता के लिए तुमसे सब कुछ छीन लेंगे। पर राजा बलि के  शुक्राचार्य की किसी बात को नहीं माना। जब भगवान विष्णु वामन रूप में राजा बलि के समक्ष आये तो उन्होंने राजा से तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि के मानने पर भगवान रूप में वामन दान करने के लिए कमंडल से जल लेकर उन्हें संकल्प कराने लगे। बलि को दान से रोकने के लिए शुक्राचार्य राजा बलि के कमंडल में छोटा रूप धारण करके प्रवेश कर गए। इससे कमंडल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया। वामन भगवान शुक्रचार्य की चाल को समझ गए। भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कुशा को कमण्डल में इस तरह रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई। शुक्राचार्य छटपटाकर कमण्डल से बाहर आ गए। इस राजा बलि का तीन पग भूमि देने का संकप्ल पूरा हो गया। वामन भगवान ने अपने एक पग से पूरी पृथ्वी का नाप लिया और दूसरे पग में पूरे अंतरिक्ष को नाप लिया। तीसरे पग के लिए राजा बलि को देने कोकुछ नहीं था। उसने अपना सर भगवान के आगे रख दिया और भगवान को अपना सब कुछ दे दिया। इस प्रकार बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुना धन-संपत्ति देवताओं को मिल गई। इस कारण से भी धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है। कैसे मानते हैं धनतेरस  इस दिन धन्वंतरि की पूजा करने से व्यक्ति की हर मनोकामन पूर्ण होती है। उन्हें अपने व्यापार में शुभ लाभ मिलता है और जीवन में धन की कमी नहीं होती। इस दिन अपने सामर्थ्य अनुसार किसी भी रूप में चांदी एवं अन्य धातु खरीदना अति शुभ है। धन संपत्ति की प्राप्ति हेतु कुबेर देवता के लिए घर के पूजा स्थल पर दीप दान करें एवं मृत्यु देवता यमराज के लिए मुख्य द्वार पर भी दीप दान करें। इस दिन अपने घर की सफाई अवश्य करें।

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जानिए क्यों हुआ था समुद्र मंथन – पौराणिक कथा

यों तो हिंदू धर्म में कई ऐसी पौराणिक कथाएं हैं जिसमे देवताओं और असुरों के बीच युद्ध कथाएं प्रचलित हैं। मगर, सबसे ज्यादा प्रचलित कथा है ‘समुद्र मंथन’आइये जानते हैं समुद्र मंथन से जुड़ी पौराणिक कथा – एक बार दुर्वासा ऋषि एवं उनके शिष्य शिवजी के दर्शनों के लिए कैलाश पर्वत की और जा रहे थे। मार्ग में उन्हें देवराज इन्द्र मिले। इन्द्र ने दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों का बहुत ही आदर सत्कार किया, जिससे दुर्वासा ऋषि अत्यत प्रसन्न हुए और उन्होंने इन्द्र को विष्णु भगवान का ‘पारिजात पुष्प’ दिया। धन सम्पति वैभव एवं इन्द्रासन के गर्व में चूर इन्द्र ने उस ‘पारिजात पुष्प’ को अपने प्रिय हाथी ऐरावत के मस्तक पर रख दिया। उस पुष्प का स्पर्श होते ही ऐरावत हाथी सहसा ही विष्णु भगवान के समान तेजस्वी हो गया। उसने इन्द्र के अवहेलना कर दी और उस दिव्य पुष्प को कुचलते हुए वन की ओर चला गया। इन्द्र को दिए आशीर्वाद के रूप में भगवान विष्णु के पुष्प का तिरस्कार होते देखकर दुर्वाषा ऋषि अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने देवराज इन्द्र को ‘श्री’ (लक्ष्मी) से हीन हो जाने का शाप दे दिया। दुर्वासा ऋषि के शाप के फलस्वरूप लक्ष्मी उसी क्षण स्वर्गलोक को छोड़कर अदृश्य हो गईं। लक्ष्मी के चले जाने से इन्द्र आदि देवता निर्बल और श्रीहीन हो गए। उनका सारा धन वैभव लुप्त हो गया। जब यह खबर दैत्यों (असुरों) को मिली तो उन्होंने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवगण को पराजित कर स्वर्ग पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। उसके बाद निराश होकर इन्द्र देवगुरु बृहस्पति और अन्य देवताओं के साथ ब्रह्माजी की शरण में पहुंचे । तब ब्रह्माजी बोले —‘‘देवेन्द्र इंद्र, भगवान विष्णु के भोगरूपी पुष्प का अपमान करने के कारण रुष्ट होकर भगवती लक्ष्मी तुम्हारे पास से चली गयी हैं। यदि तुम उन्हें पुनः प्रसन्न करने के लिए भगवान नारायण की कृपा-दृष्टि प्राप्त करो तो उनके आशीर्वाद से तुम्हें खोया वैभव (स्वर्ग) पुनः मिल जाएगा।’’ भगवान विष्णु द्वारा समुद्र मंथन का उपाय द्र और अन्य देवताओं के आग्रह पर ब्रह्माजी भी उनके साथ भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। वहाँ परब्रह्म भगवान विष्णु भगवती लक्ष्मी के साथ विराजमान थे। सभी देवगण भगवान विष्णु की स्तुति करते हुए बोले ” हे प्रभु ! आपके श्रीचरणों में हमारा कोटि कोटि प्रणाम। भगवन् ! दुर्वाषा ऋषि के शाप के कारण माता लक्ष्मी हमसे रूठ गई हैं और दैत्यों ने हमें पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया है। अब हम आपकी शरण में हैं, हमारी रक्षा कीजिए। हम सब जिस उद्देश्य से आपकी शरण में आए हैं, कृपा करके आप उसे पूरा कीजिए।” भगवान विष्णु त्रिकालदर्शी हैं, वे पल भर में ही देवताओं के मन की बात जान गए। तब वे देवगणों से बोले—‘‘मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनें, दैत्यों पर इस समय काल की विशेष कृपा है इसलिए जब तक तुम्हारे उत्कर्ष और दैत्यों के पतन का समय नहीं आता, तब तक तुम उनसे संधि कर लो। क्योंकि केवल यही तुम्हारे कल्याण का उपाय है। क्षीरसागर के गर्भ में अनेक दिव्य पदार्थों के साथ-साथ अमृत भी छिपा है। उसे पीने वाले के सामने मृत्यु भी पराजित हो जाती है। इसके लिए तुम्हें समुद्र मंथन करना होगा। यह कार्य अत्यंत दुष्कर है, अतः इस कार्य में दैत्यों से सहायता लो। कूटनीति भी यही कहती है कि आवश्यकता पड़ने पर शत्रुओं को भी मित्र बना लेना चाहिए। तत्पश्चात अमृत पीकर अमर हो जाओ। तब दुष्ट दैत्य भी तुम्हारा अहित नहीं कर पाएंगे । वे जो भी शर्त रखें, उसे स्वाकीर कर लो। यह बात याद रखो कि शांति से सभी कार्य बन जाते हैं, क्रोध करने से कुछ नहीं होता।’’ भगवान विष्णु के परामर्श के अनुसार इन्द्रादि देवगण दैत्यराज बलि के पास संधि का प्रस्ताव लेकर गए और उन्हें अमृत के बारे में बताकर समुद्र मंथन के लिए तैयार कर लिया। समुद्र मंथन के लिए समुद्र में मंदराचल को स्थापित कर वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया। तत्पश्चात दोनों पक्ष अमृत-प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन करने लगे। समुद्र मंथन से निकला अमृत अमृत पाने की इच्छा से सभी बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे। सहसा तभी समुद्र में से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएँ जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। उस विष की ज्वाला से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे और उनकी कान्ति फीकी पड़ने लगी। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर महादेव जी उस विष को हथेली पर रख कर उसे पी गये, किन्तु उसे कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया। उस कालकूट विष के प्रभाव से शिवजी का कण्ठ नीला पड़ गया। इसीलिये महादेव जी को नीलकण्ठ भी कहते हैं। उनकी हथेली से थोड़ा सा विष पृथ्वी पर टपक गया था जिसे साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं ने ग्रहण कर लिया। फिर से समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ और इस बार दूसरा रत्न कामधेनु गाय निकली जिसे ऋषियों ने रख लिया। फिर उच्चैःश्रवा घोड़ा निकला जिसे दैत्यराज बलि ने रख लिया। उसके बाद ऐरावत हाथी निकला जिसे देवराज इन्द्र ने रख लिया। ऐरावत के बाद कौस्तुभमणि समुद्र से निकली उसे विष्णु भगवान ने रख लिया। फिर कल्पवृक्ष निकला और रम्भा नामक अप्सरा निकली। इन दोनों को देवलोक में रख लिया गया। आगे फिर समु्द्र को मथने से लक्ष्मी जी निकलीं। लक्ष्मी जी ने स्वयं ही भगवान विष्णु को वर लिया। उसके बाद कन्या के रूप में वारुणी प्रकट हई जिसे दैत्यों ने ग्रहण किया। फिर एक के पश्चात एक चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष तथा शंख निकले और अन्त में धन्वन्तरि वैद्य अमृत का घट लेकर प्रकट हुये।” धन्वन्तरि के हाथ से अमृत को दैत्यों ने छीन लिया और उसके लिये आपस में ही लड़ने लगे। देवताओं के पास दुर्वासा के शापवश इतनी शक्ति रही नहीं थी कि वे दैत्यों से लड़कर उस अमृत को ले सकें इसलिये वे निराश खड़े हुये उनका आपस में लड़ना देखते रहे। देवताओं की निराशा को देखकर भगवान विष्णु तत्काल मोहिनी रूप धारण कर आपस में लड़ते दैत्यों के पास जा पहुँचे। उस विश्वमोहिनी रूप को देखकर दैत्य तथा देवताओं की तो बात ही क्या, स्वयं ब्रह्मज्ञानी, कामदेव को भस्म कर देने वाले, भगवान शंकर भी मोहित होकर उनकी ओर बार-बार देखने

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पौराणिक कथा : गुरु द्रोणाचार्य एवं शिष्य अर्जुन

यह पौराणिक कथा महाभारत काल का एक प्रसंग है। यह बात उस समय की है जब आचार्य द्रोणाचार्य सभी राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते थे। और सभी राजकुमार गुरु द्रोणाचार्य के साथ ही वन में रहते थे। यों तो सभी राजकुमार धनुर्विद्या में पारंगत थे पर अर्जुन उनके सबसे ज्यादा प्रतिभावान तथा गुरुभक्त शिष्य थे। इसी कारण द्रोणाचार्य भी उनसे प्रसन्न रहते थे।  दूसरी तरफ द्रोणाचार्य को अपने पुत्र अश्वत्थामा पर भी विशेष अनुराग था इसलिए अश्वत्थामा भी धनुर्विद्या में सभी राजकुमारों में अग्रणी थे, लेकिन अर्जुन अश्वत्थामा से भी अधिक प्रतिभावान थे। एक रात की बात है, सभी शिष्य अपने गुरु के साथ भोजन कर रहे थे। तभी अचानक से तेज़ हवा चलने लगती है और दीपक बुझ जाता है। अंधकार होने के बाद भी सभी लोग भोजन  करना जारी रखते हैं। तभी अर्जुन के मन में एक विचार आता है। ‘इतना अंधकार होने के बाद भी भोजन के कौर को हाथ मुँह तक ले जाता है।’ इस विचार के आते है उन्हें समझ आ जाता है की  निशाना लगाने के लिये प्रकाश से अधिक आवश्यकता अभ्यास की है। और उसी दिन से अर्जुन रात्रि के अंधकार में निशाना लगाने का अभ्यास करना आरम्भ कर देते हैं। यह देख आचार्य द्रोणाचार्य बहुत प्रसन्न होते हैं।  एक बार आचार्य द्रोणाचार्य अपने सभी शिष्यों के साथ नदी में स्नान करने गए। जब गुरु द्रोणाचार्य स्नान करने के लिए जाने लगे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि वो अपनी धोती लाना तो भूल ही गए हैं। उन्होंने अपने प्रिये शिष्य अर्जुन से कहा की तुम आश्रम जाओ और मेरी धोती लेकर आओ। गुरु का आदेश पाकर अर्जुन आश्रम की ओर चल दिया। गुरु ने सोचा अभी अर्जुन को आने में तो समय लगेगा, क्यों न मैं सभी शिष्यों को मंत्रशक्ति का महत्त्व समझा दूँ। गुरु द्रोणाचार्यजी ने शिष्यों से कहा, ‘गदा एवं धनुष्य में शक्ति होती है, किन्तु मंत्र में उससे अधिक शक्ति होती है। ऐसा कहकर, गुरु द्रोणाचार्यजी ने भूमि पर एक मंत्र लिखा एवं उसी मंत्र से अभिमंत्रित एक बाण छोडा । उस एक बाण ने वृक्ष के सभी पत्तों को छेद दिया । यह देखकर, सभी शिष्य आश्चर्य में पड गए। कुछ समय बाद अर्जुन गुरु की धोती लेकर वापस आये तो उन्होंने देखा की बृक्ष की सभी पत्तियों के छेद हैं। वो सोचने लगे की जब पहले मैंने देखा था तो ऐसा नहीं था। जरूर गुरु जी ने सभी शिष्यों को कोई रहस्य बताया होगा। यदि कोई रहस्य होगा तो उसके कुछ सूत्र भी होंगे, प्रारंभ होगा, इसके चिह्न भी होंगे। ऐसा सोच वो इधर उधर खोजने लगे। थोड़ी ही देर में उन्हें भूमि पर लिखा हुआ एक मंत्र दिखाई दिया। वृक्षच्छेदन के सामर्थ्य से युक्त यह मंत्र अद्भुत है, यह बात उनके मन में समा गई और उन्होंने यह मंत्र पढना आरंभ किया। जब उसके मन में  दृण विश्वास उत्पन्न हो गया कि यह मंत्र निश्चित रूप में सफल होगा, तब उन्होंने धनुष पर बाण चढाया और मंत्र का उच्चारण कर छोड दिया । तीर वटवृक्ष की सभी पत्तियों पर, पहले बने छेद के समीप दूसरा छेद बन गया। यह देखकर अर्जुन को अत्यंत आनंद हुआ । गुरु जी ने अन्य शिष्यों को जो विद्या सिखाई, वह मैं ने भी सीख गया, ऐसा विचार कर, वह गुरुदेवजी को धोती देने के लिए नदी की ओर चल पड़े। स्नान से लौटने के बाद जब गुरु द्रोणाचार्य ने वटवृक्ष की पत्तियोंपर दूसरा छेद देखा, तो उन्होंने अपने साथ के सभी शिष्यों से प्रश्न किया ; स्नान से पहले वटवृक्ष की सभी पत्तियों पर एक छेद था । अब दूसरा छेद आप में से किसने किया ? सभी शिष्यों ने ना में जबाब दिया। गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन की और देखकर पूछा ; क्या यह तुमने किया है ? अर्जुन कुछ संकोच के साथ बोले ; गुरुजी मैंने आपकी आज्ञा के बिना आपके मंत्र का प्रयोग किया । क्योंकि, मुझे लगा कि आपने इन सबको यह विद्या सिखा दी है, तो आपसे इस विषय में पूछकर आपका समय न गंवाकर अपने आप सीख लूं । गुरुदेवजी, मुझसे चूक हुई हो, तो क्षमा कीजिएगा। अर्जुन की यह बात सुनकर द्रोणाचार्य बहुत ही प्रसन्न हुए और बोले, ” हे अर्जुन तुमने धैर्य दिखाकर एवं प्रयत्न कर उत्तीर्ण हो गए । तू मेरा सर्वोत्तम शिष्य है। तुमसे श्रेष्ठ धनुर्धर होना असंभव है । Pauranik Katha Se Shiksha – प्रत्येक शिष्य को सीखने के प्रति जिज्ञासू और जागरूक होना चाहिए कि गुरु का अंतःकरण अभिमान से भर जाए

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जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत

भगवान शिव को कालों के काल महाकाल हैं। साक्षात् मृत्यु में भी उनका सामना करने का साहस नहीं है। वे मृत्युंजय हैं, अविनाशी हैं, आदि हैं, अनंत हैं। भगवान शिव इतने भोले हैं कि वे अपने भक्त की पुकार पर दौड़े चले आते हैं। उसे मनचाहा वरदान देते हैं और उसके मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। आज हम आपको लिंगपुराण की एक कथा के बारे में बताते हैं, जिसमें काल को भगवान शिव ने प्राण दान दिया और अपने भक्त के विश्वास को टूटने नहीं दिया। आइए पढ़ते हैं यह पौराणिक कथा। भगवान शिव के परमभक्त श्वेतमुनि पर्वत पर एकांत में अपने आराध्य का ध्यान करते और उनकी पूजा करते थे। वे कहते थे कि मृत्यु उनका क्या कर सकती है? उन्होंने तो साक्षात् महाकाल की शरण ली हुई है। उनके आश्रम में शांति और आत्मविश्वास की पवित्रता झलकती थी। उनके तप के बल से आश्रम दिव्यमान था। श्वेतमुनि अपने जीवन काल के अंतिम पड़ाव पर थे। वे मृत्यु से निडर होकर रुद्र अध्याय का पाठ कर रहे थे। उनके जीवन ​का अंतिम श्वास चल रहा था। अचानक वे चौंक पड़े, उनके समक्ष एक विकराल आकृति खड़ी थी। पूरा शरीर काला था और उसने काले वस्त्र धारण कर रखे थे। श्वेतमुनि ने अपने आश्रम के शिवलिंग को करुणामय होकर देखा और ओम नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण किया। उन्होंने शिवलिंग को स्पर्श किया और उस विकराल आकृति से पूछा कि तुमने इस पवित्र आश्रम को अपवित्र करने की हिम्मत कैसे की? इस आश्रम को तो भगवान शिव की कृपा से अभय का आशीष प्राप्त है। उन्होंने दोबारा शिवलिंग को स्पर्श किया।विकराल आकृति वाले काल ने अपना परिचय देते हुए ​​कहा कि अब आप पृथ्वी पर नहीं रह सकते हैं। आपको यमलोक चलना है। इस पर श्वेतमुनि ने शिवलिंग को अपने हाथों से कसकर पकड़ लिया और कहा कि तुमने शिव की भक्ति को चुनौती दी है, क्या तुम्हें नहीं पता है कि भगवान शिव तो स्वयं ही काल के भी काल महाकाल हैं। इस पर काल ने कहा कि शिवलिंग शक्तिविहीन है, निश्चेतन है, पत्थर में महादेव की कल्पना एक भूल है। काल ने श्वेतमुनि को पाश में बांध लिया।मुनि ने कहा कि ये तुम्हारी भूल है। महादेव तो कण कण में व्याप्त हैं। विश्वास के साथ उनका आवाहन करने पर वे अपने भक्त की रक्षा करने आते हैं। तभी भगवान शिव माता पार्वती के साथ वहां प्रकट हो गए। उन्होंने काल को चेताते हुए कहा कि ठहरो! श्वेतमुनि का बात सत्य है। उनका प्रकट होना विश्वास के ही अधीन है। भगवान शिव को देखकर काल प्राणहीन समान हो गया। वह शक्तिहीन हो गया। श्वेतमुनि भगवान शिव की स्तुति करने लगे। इस महादेव ने कहा कि आपकी लिंग उपासना धन्य है। विश्वास की विजय होती है। नंदी के निवेदन करने पर महाकाल शिव ने काल को प्राण दान दे दिया और वे वहां से अंतर्धान हो गए।

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महाभारत के सबसे शक्तिशाली अस्त्र सुदर्शन चक्र से जुडी कुछ रोचक कथा

सुदर्शन चक्र पौराणिक कथाओं (Pauranik Katha) के अनुसार ऐसा अस्त्र है जो विरोधी के हर वार को विफल कर देता था ऐसा अस्त्र जो अभेद और अपना कार्य  को  पूरा करने के बाद ही वापस आता था । आखिर महाभारत के बाद सुदर्शन का क्या हुआ और अब सुदर्शन चक्र कहां है और भगवान विषणु जी को यह अस्त्त्र कैसे प्राप्त हुआ था। अखिर भगवान विषणु जी को सुदर्शन चक्र कैसे प्रप्त हुआ दरअसल सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का अस्त्र था और इसे उनके ही अवतार धारण कर सकते थे । यह अस्त्र एक साथ कई कार्य कर सकता था इसके निर्माण के पीछे भी कई अलग-अलग मान्यताएं है । शिव पुराण के अनुसार एक बार भगवान विषणु कैलाश पर्वत पर चले गए और वहां पहुंचकर वह विधि पूर्वक शिव की तपस्या करने लग गए । श्री विष्णु भगवान ने कई हजार नामों से शिवजी की स्तुति कर तथा प्रत्येक नाम उच्चारण के साथ एक कमल पुष्प शिवज को अर्पण करते थे ।  भगवान विष्णु की उपासना कई वर्षों तक निर्वात चलती रही एक दिन भगवान शिव परमात्मा ने विष्णु की भक्ति की परीक्षा लेनी चाही । भगवान विष्णु हर बार की तरह एक कमल पुष्प शिव को अर्पण करने के लिए लेकर आए तब भगवान शिव ने एक कमल पुष्प कहीं छुपा दिया । शिव माया के द्वारा इस घटना का पता भगवान विष्णु को भी नहीं लगा उन्होंने गिनती में एक पुष्प कम पाकर उसकी खोज आरंभ कर दी ।   श्री भगवान विष्णु ने पुरे ब्रह्मांड का भ्रमण कर लिया परंतु उन्हें वह पुष्प नहीं नहीं मिला । तत्पश्चात भगवान विष्णु एक कमल के बदले अपना एक नेत्र उस स्थान अर्पित कर दिया ।   भगवान विष्णु के इस त्याग से खुश होकर भगवान शिव प्रकट हो विष्णु भगवान को सुदर्शान चक्र कि भेट करते है। बोलते है यह चक्र सृष्टि संचालन के कार्य के लिए उपयोग में आएगी । अन्य पुराणों के अनुसार यह बताया गया है कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने सूर्य की अभेद राख से उन्होंने तीन चीजों का निर्माण किया था पहला पुष्पक विमान, त्रिशूल और सुदर्शन चक्र । जबकि ऋग्वेद के अनुसार सुदर्शन चक्र का वर्णन अलग ही तरह से किया गया है इसमें सुदर्शन चक्र को समय का चक्र बताया गया है कि वह समय को भी माप सकता था सुदर्शन चक्र से ही भगवान विष्णु ने माता सती के पार्थिव शरीर के 51 हिस्से किए थे महाभारत काल में भी श्री कृष्णा ने शिशु पाल का वध सुदर्शान चक्र से ही किया था । महाभारत में जब अर्जुन ने जब जयद्रत को सूरज ढलने से पहले मारने  का वचन लिया जब श्री कृष्ण ने  सुदर्शन चक्र से ही सूर्य को ढक लिया था लेकिन इसके बाद सुदर्शन चक्र का कोई भी कोई वर्णन नहीं मिलता । आखिर जब श्री कृष्ण ने देह त्याग किया तब सुदर्शान चक्र का क्या हुआ ? इसका जवाब हमें भविष्य पुराण में मिलता है जिसमें बताया गया है कि सुदर्शन चक्र को भगवान विष्णु या उनके अवतार के सिवा ना ही कोई धारण कर सकता है और न ही कोई चल चला सकता है जब श्री कृष्ण ने देह त्याग किया सुदर्शन चक्र वही धरती में समा गया और भविष्य में जब कल्कि अवतार जन्म लेंगे तब वही सुदर्शन चक्र को दोबारा पृथ्वी गर्भ से ग्रहण करेंगे । कलयुग के अंत के समय जब बुराई अपनी चरम पर होगी तब भगवान परशुराम और हनुमान कलकी अवतार में आएंगे और उन्हें प्रशिक्षण देंगे तब युद्ध में कल्कि अवतार सुदर्शन चक्र को धारण कर उसका उपयोग करेंगे जिससे वह बुराई अंत कर देंगे। परंतु हम ऋग्वेद में बताएं जल चक्र का वर्णन देखें तो सुदर्शन चक्र ऐसा अस्त्र नहीं था जैसा हम समझते हैं । उसमें बताया गया है सुदर्शन चक्र समय के चक्र को कहा गया है । इसी का इस्तेमाल भगवान विष्णु करते हैं समय के अंतराल का उपयोग कर वह किसी बी विरोधी को शक्तिहीन कर देते हैं । महाभारत में भी जब श्री कृष्ण ने अर्जुन को विराट रूप दिखाया था तब सुदर्शन चक्र के इस्तेमाल से ही समय को रोक दिया था तब रुके हुए समय में ही श्री कृष्ण अर्जुन को गीता का पूरा ज्ञान दिया था अगर हम ऋग्वेद के ज्ञान से समझें तो सुदर्शन चक्र कोई भौतिक अस्त्र था ही नहीं जो कोई और देख या धारण कर सके यह सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु का अवैध गुण है जो हमेशा उनके और उनके अवतारों के साथ रहेगा। तो दोस्तों कैसे लगी आपको यह पौराणिक कथा (Pauranik Katha) Comment box मे कमेंट कर बातायें ।

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