MANDIR

राम जनार्दन मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

भगवान श्रीराम वनवासी स्वरूप में हैं विराजमान राम जनार्दन मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में बना हुआ है। अंकपात क्षेत्र में स्थित राम जनार्दन मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ था। इसमें श्री राम और जनार्दन (विष्णु) का मंदिर हैं। इसमें भगवान के वनवासी स्वरूप के दर्शन होते हैं। भगवान की दाड़ी-मूछ है और माता सीता के हाथ में पौधों को पानी देने वाली झारी और दूसरे हाथ में चवर दिखाई देती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह स्थान एक प्राचीन मंदिर स्थल रहा है क्योंकि यहां स्थापित कई प्रतिमाएं दसवीं और बारहवीं शताब्दी की हैं। इससे इस स्थल को परमारों के काल का माना जाना चाहिए। मंदिर का इतिहास राम जनार्दन मंदिर का निर्माण सत्रहवीं शताब्दी में मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था, मंदिर का रथाकार निर्माण आकर्षक है। अठारहवीं शताब्दी में मराठा राजाओं ने मंदिरों में कुछ संरचनाएं जोड़ीं। मंदिरों की दीवारों पर लगी भव्य तस्वीरें मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं। इन शानदार मंदिरों में कुछ अद्भुत मूर्तियां भी हैं जो 11वीं और 12वीं शताब्दी की हैं। गोवर्धनधारी कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु और महेश की छवि उनकी स्थापत्य भव्यता और मूर्तिकला उत्कृष्टता के लिए बहुत प्रभावशाली हैं। मंदिर का महत्व राम जनार्दन मंदिर में श्रीराम की सांवले रंग के पत्थर की प्रतिमा है। यह देश में दूसरा ऐसा मंदिर है जहां काले रंग में राम जी की मूर्ति है, एक प्रतिमा नासिक के राम मंदिर में है। – होल्कर राजवंश की महारानी अहिल्यादेवी ने राम जनार्दन मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। मंदिर की वास्तुकला मराठा शैली में राम और कृष्ण के जीवन के दृश्यों को दर्शाने वाली पेंटिंग हैं। यह मराठा कला का एक सुंदर उदाहरण है। मराठा शासन के दौरान ही उज्जैन पूना और कांगड़ा शैली के चित्रकारों का मिलन स्थल बन गया। चित्रकला की दो अलग-अलग शैलियों का प्रभाव विशिष्ट है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM सुबह की आरती का समय 06:00 AM – 06:30 AM संध्या आरती का समय 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद राम जनार्दन मंदिर में भक्त श्रद्धा के अनुसार दूध की बनी बर्फी, बूंदी के लड्डू चढ़ाते हैं। श्रद्धालु प्रभु को फल के साथ पूड़ी-खीर का भी भोग लगाते हैं।

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द्वारकाधीश गोपाल मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

चांदी लेपित संगमरमर से बनी भगवान कृष्ण की मूर्ति द्वारकाधीश गोपाल मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। द्वारकाधीश गोपाल मंदिर उज्जैन का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। मुख्य मंदिर में चांदी लेपित संगमरमर से बनी भगवान कृष्ण की दो फुट ऊंची मूर्ति है। यहां जन्माष्टमी के अलावा ‘हरिहर का पर्व’ बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हरिहर के समय भगवान महाकाल की सवारी रात बारह बजे आती है, तब यहां हरिहर मिलन अर्थात् विष्णु और शिव का मिलन होता है। जहां पर उस वक्त डेढ़ दो घंटे पूजन चलता है। मंदिर का इतिहास पुराणों के अनुसार द्वारकाधीश गोपाल मंदिर लगभग दो सौ वर्ष पुराना है। इतिहासकारों की माने तो इस मंदिर का निर्माण दौलतराव सिंधिया की धर्मपत्नी बैजीबाई शिंदे ने 1844 में कराया था, जिसमें मूर्ति की स्थापना 1852 में की गई थी। मंदिर के आसपास विशाल प्रांगण में सिंहस्थ था जहां पर्व के दौरान बाहर से आने वाले लोग विश्राम करते हैं। द्वारकाधीश गोपाल मंदिर का महत्व कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी पर जहां देश भर में भक्त कान्‍हा की भक्ति में डूब जाते हैं, वहीं द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में कान्‍हा के जन्‍म के बाद उनकी आरती नहीं उतारने की परंपरा है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म (जन्माष्टमी) के बाद रोज होने वाली शयन आरती पांच दिनों तक नहीं होती है। मंदिर में पांच दिनों तक कोई भजन पाठ नहीं होता है। क्‍योंकि यह परंपरा करीब 110 सालों से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि यहां जन्म के बाद कान्हा पांच दिनों तक सोते नहीं हैं। मंदिर की वास्तुकला द्वारकाधीश गोपाल मंदिर की वास्तुकला मराठा वास्तुकला का एक सुंदर उदाहरण है। गर्भगृह संगमरमर से जड़ा हुआ है और दरवाजे चांदी से मढ़े हुए हैं। द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में भगवान द्वारकाधीश, शंकर, पार्वती और गरुड़ भगवान की मूर्तियां हैं। ये मूर्तियां अचल है और एक कोने में रानी बैजीबाई की भी ‍मूर्ति है। मंदिर के गर्भगृह में लगा रत्न जड़ित द्वार दौलतराव सिंधिया ने गजनी से प्राप्त किया था, जो सोमनाथ की लूट में वहां पहुंचा था। मंदिर के विशाल स्तम्भ और सुंदर नक्काशी देखने लायक हैं। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 08:30 PM सुबह की आरती का समय 05:00 AM – 06:30 AM संध्या आरती का समय 08:00 PM – 08:30 PM मंदिर का प्रसाद द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में दूध, माखन आदि का नियमित भोग लगाया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार श्री कृष्ण को सूजी का हलवा और पंचामृत का भी भोग लगाते हैं।

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हरसिद्धि माता मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

51 शक्तिपीठों में 13वां शक्तिपीठ हरसिद्धि माता मंदिर भारत के मध्य प्रदेश की धर्मिक नगरी उज्जैन में हरसिद्धि माता का मंदिर स्थित है। जो कि उज्जैन के क्षिप्रा नदी के रामघाट के पास भैरव पर्वत पर स्थित है, माँ हरसिद्धि का यह मंदिर शक्तिपीठों में से एक है। माता सती के 52 शक्तिपीठों में 13वां शक्तिपीठ हरसिद्धि माता मंदिर है। इस स्थान पर देवी सती की कोहनी गिरी थी। मंदिर परिसर में 51 फीट ऊंचे 2 दीप स्तंभ स्थापित हैं। दोनों दीप स्तंभों में लगभग 1 हजार 11 दीपक हैं। बताया जाता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी। मंदिर का इतिहास माता हरसिद्धि की साधना करने से सभी प्रकार की दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसलिए हरसिद्धि माता को ‘मांगल-चाण्डिकी’ के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य जो अपनी बुद्धि, पराक्रम और उदारता के लिए जाने जाते हैं, हरसिद्धि माता मंदिर इन्हीं देवी की आराधना किया करते थे। इसलिए उन्हें भी हर प्रकार की दिव्य सिद्धियां प्राप्त हो गई थीं। हरसिद्धि माता मंदिर इसी कारण मांगल-चाण्डिकी देवी को हरसिद्धि अर्थात हर प्रकार की सिद्धि की देवी नाम दिया गया। विक्रमादित्य का इतिहास करीब 2 हजार वर्ष पुराना है। इसलिए इस मंदिर को भी 2,000 वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर का महत्व पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा विक्रमादित्य देवी को प्रसन्न करने के लिए हर 12 साल में अपना शीश काटकर उन्हें बलि चढ़ा देते थे और बार-बार उनका मस्तक लौट आता था। 11 बार उन्होंने ऐसा किया लेकिन हर बार उनका सिर वापस उनके शरीर पर आ जाता। राजा विक्रमादित्य ने जब 12वीं बार अपना शीश माता को अर्पित किया तो वह वापस नहीं आया और यह मान लिया गया कि उनका शासन पूर्ण हो गया है। हालांकि जिस मुंड को राजा विक्रमादित्य का बताया जाता है वह देवी वैष्णवी है जिनकी पूजा अर्चना मंदिर के पुजारी करते हैं। मंदिर की वास्तुकला हरसिद्धि मंदिर की चारदीवारी के अंदर चार प्रवेश द्वार हैं। वहीं मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर है। द्वार पर सुंदर बंगले बने हुए हैं। बंगले के पास दक्षिण-पूर्व की और एक बावड़ी बनी हुई है, हरसिद्धि माता मंदिर जिसके अंदर एक स्तंभ है। यहां श्री यंत्र बना हुआ स्थान है। इसी स्थान के पीछे भगवती अन्नपूर्णा की सुंदर प्रतिमा है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 07:00 PM सुबह आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM संध्या आरती का समय 06:00 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद हरसिद्धि माता मंदिर में श्रद्धालु देवी को देशी घी के लड्डू का भोग लगाते हैं। वहीं भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार इलायची दाना और बर्फी भी माँ को चढ़ाते हैं और उन्हें प्रसन्न करते हैं।

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मनकामेश्वर मंदिर:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

मनकामेश्वर मंदिर उत्तर प्रदेश सरकार ने मनकामेश्वर मंदिर को एक ऐतिहासिक स्मारक घोषित किया है। मनकामेश्वर मंदिर:त्रिवेणी संगम की नगरी प्रयागराज को सनातन धर्म का केंद्र कहा जाता है। यहां पर कई ऐसे पौराणिक और आध्यात्मिक स्थल मौजूद हैं जो इस नगरी की प्राचीनता और महत्वई को बताते हैं। मनकामेश्वर मंदिर यहां के अनेकों मंदिर रामायण काल और महाभारत काल से जुड़े हैं और इनका वर्णन धर्म ग्रंथों में मिलता है। ऐसा ही एक पौराणिक गंगा,यमुना और सरस्वती के संगम तट पर मौजूद बना है, जिसे मनकामेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। ये मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मान्यता है कि यहां पर आने वाले भक्तों की भगवान शिव हर मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसलिए यहां पर देश के अलग-अलग राज्यों से लोग आते हैं और भोलेनाथ से मनोकामना मांगते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने मनकामेश्वर मंदिर को एक ऐतिहासिक स्मारक घोषित किया है। मनकामेश्वर मंदिर का इतिहास मनकामेश्वर मंदिर का निर्माण 1542 ई. में हुआ था, इसका निर्माण राजपूत वंश के राजा मान सिंह प्रथम ने करवाया था। मनकामेश्वर मंदिर का जिक्र स्कंद पुराण और पदम पुराण में कामेश्वर पीठ के तौर पर मिलता है। ऐसा कहा जाता है मनकामेश्वर कि शिव जी कामदेव को भस्म करने के बाद यहां आकर लिंग के रूप में विराजमान हो गए थे। बताया जाता है कि त्रेता युग में भगवान श्री राम जब वनवास जा रहे थे तो प्रयागराज में अक्षयवट के नीचे अपने भाई लक्ष्मण और माता सीता के साथ रूके थे। यहां से आगे बढ़ने से पहले प्रभु राम ने मंदिर पहुंच कर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था और उन्होंने भगवान शिव से मार्ग में आने वाले बाधाओं से मुक्ति पाने की कामना भी की थी। 14 वर्ष के वनवास के बाद जब श्री राम वापस अयोध्या लौटने लगे तो पुनः यहां पर रुककर भोलेनाथ के दर्शन किये थे। मंदिर का महत्व मान्यता है कि मनकामेश्वर महादेव में 51 सोमवार पूजन अर्चन करने से जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। मनकामेश्वर मंदिर तंत्र साधना के लिए अलग पहचान है। मंदिर में श्री विद्या की तांत्रिक साधना की शिक्षा भी दी जाती है।ऐसा बताया जाता है कि ऐसा कई बार हुआ है, जब मंदिर परिसर में कोई न हो और वातावरण बिल्कुल शांत हो, उसके बाद भी भगवान शिव के जयकारे सुनाई देते हैं। उन्होंने कहा कि जब मनकामेश्वर भगवान की आरती के बाद सयन की अवस्था में होते हैं तब यहां आस-पास के दिव्य शक्तियां पहरा देती है। मंदिर की वास्तुकला मनकामेश्वर मंदिर का निर्माण हिंदू वास्तुकला के मानदंडों के अनुसार किया गया था और यह राजपूत वास्तुकला की भव्यता को दर्शाता है। मनकामेश्वर मंदिर अष्टकोणीय आकार का है और यह एक बड़े आयताकार प्रांगण से घिरा हुआ है। मंदिर के शीर्ष पर विशाल गुंबद बने हैं। मंदिर के गर्भ गृह में साढ़े तीन फुट का शिवलिंग विराजमान है, जिसे स्वयंभू शिवलिंग कहा जाता है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 10:00 PM सुबह आरती का समय 04:30 AM – 05:30 AM मंदिर का प्रसाद मनकामेश्वर मंदिर में भगवान शिव को फल, दूध, दही लड्डू का भोग लगाया जाता है। साथ ही श्रद्धालु शिवलिंग पर बेलपत्र, भांग, धतूरा भी चढ़ाते हैं।

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गुफा मंदिर:भोपाल, मध्‍यप्रदेश , भारत

यह 7 प्राकृतिक गुफाओं से घिरा है, जिसके कारण इसका नाम गुफा मंदिर पड़ा। गुफा मंदिर मध्‍यप्रदेश के भोपाल शहर में लालघाटी पर स्थित भगवान शिव का यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है। यह भोपाल के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। इस मंदिर को पहाड़ काटकर बनाया गया है। यह 7 प्राकृतिक गुफाओं से घिरा है, जिसके कारण इसका नाम गुफा मंदिर पड़ा। इन 7 गुफाओं में से एक गुफा में स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन होते हैं। भगवान शिव के साथ उनका परिवार माता पार्वती, पुत्र गणेश जी, कार्तिकेय व नंदी जी की प्रतिमा भी विराजित है। माना जाता है कि इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन से भाग्य खुल जाता है। सावन, महाशिवरात्रि व नवरात्रि पर यहां बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। मंदिर का इतिहास गुफा मंदिर की खोज साल 1949 में महंत नारायण दासजी त्यागी द्वारा की गई थी। उस समय यहां आसपास घना जंगल व सिर्फ 2 गांव थे। बताया जाता है कि गुफा की खोज करने के बाद महंत गुफा में ही आध्यात्मिक तपस्या में लीन हो गए। आसपास के लोगों को जब इसका पता चला तो वे सभी महंत से मिलने गए। गुफा के अंदर स्वयंभू देख गांव वालों ने यहां एक मंदिर निर्माण की इच्छा जताई। जिसके बाद महंत नारायण दासजी त्यागी ने मंदिर की नींव रखी। 2 अप्रैल 1965 को महंत द्वारा इसका पुनर्निर्माण भी कराया गया। मंदिर में पहाड़ के नीचे प्राकृतिक रूप से गुफा निर्मित गृर्भ गृह में भगवान भोलेनाथ स्वयंभू पिंडी रूप में विराजमान हैं। मंदिर का महत्व कहा जाता है कि गुफा में विराजित शिवलिंग स्वयंभू यानी अपने आप प्रकट हुए थे । गुफा में विराजित ​शिवलिंग पर प्राकृतिक रूप से पानी की बूंदे लगातार गिरती रहती है। माना जाता है कि गुफा मंदिर में सावन माह में ​स्वयंभू शिवलिंग पर जल चढ़ाने से भक्तों के हर कष्ट दूर हो जाते हैं। मंदिर की वास्तुकला बाहर से देखने में गुफा मंदिर दक्षिण भारत के किसी मंदिर जैसा प्रतीत होता है। एक मीनार की तरह 3 खंड ऊंचे शिखर शैली में दिखाई देता है, जोकि अलग-अलग रंगों से की गई सुंदर कलाकृतियों के कारण काफी आकर्षक लगता है। हालांकि, अंदर से मंदिर सिर्फ एक ही खंड यानी प्रथम खंड में निर्मित है। गर्भगृह से गुफा के अलावा यहां एक प्राचीन गुफा है, जहां शिवलिंग विराजित है। यह गुफा सालभर जल से भरी रहती है। गुफा के बाहर लक्ष्मीनारायण जी की सुंदर प्रतिमा है, जहां भगवान विष्णु अपने बैकुण्ड निवास में माता लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं। – मुख्य गुफा में प्रवेश से पहले बाईं ओर भगवान सीताराम का एक सुंदर मंदिर है, जिसमें पूरा राम दरबार सुशोभित है। परिसर में हनुमान जी की एक प्रतिमा है, जिसमें आदीवासी मूर्तिकला की झलक देखने को मिलती है। – मंदिर की दीवारों पर श्रीराधाकृष्ण, हनुमान जी व गणेश जी की सुंदर छवियां चित्रित की गई हैं। परिसर में भगवान परशुराम जी की भी विशाल प्रतिमा विराजमान है। मंदिर का समय गुफा मंदिरन खुलने का समय 06:30 AM – 07:00 PM महादेव के श्रंगार व आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM मंदिर का प्रसाद शिवलिंग पर परंपरा अनुसार शुद्ध जल, दूध, दही, शहद, घी व बेलपत्र का अर्पण किया जाता है।

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राम घाट:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

राम घाट क्षिप्रा नदी के तट पर बना है राम घाट भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर के क्षिप्रा नदी के किनारे बना है। मोक्षदायिनी और उत्तरवाहिनी क्षिप्रा नदी को भगवान महाकाल की गंगा के रूप में जाना जाता है। जानकारों की माने तो भगवान श्रीराम राम घाट ने अपने पिता दशरथ और माता कौशल्या का यहां पर तर्पण किया था। इसलिए क्षिप्रा नदी के तट को रामघाट के रूप में जाना जाता है। आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों के मोक्ष की प्राप्ति के लिए यहां पर तर्पण और पूजा करने के लिए आते हैं। यहां पर कालसर्प और पितृ दोष पूजा होती है। राहु-केतु को शांत करने के लिए भी यहां पूजा की जाती है। मंदिर का इतिहास हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, अमृत मंथन के दौरान क्षिप्रा नदी के समीप स्थित एक सुंदर कुंड में अमृत की कुछ बूंदे गिरी थी, इसलिए क्षिप्रा नदी का महत्व और भी बढ़ जाता है। साथ ही यहां पर भगवान श्रीराम ने अपने पूर्वजों का तर्पण किया था, राम घाट इसलिए क्षिप्रा नदी के इस प्रमुख तट को रामघाट के रूप में जाना जाता है। इस हिसाब से रामघाट का इतिहास भारत के पौराणिक काल से जुड़ा हुआ है। मंदिर का महत्व -रामघाट कुंभ समारोह के संबंध में सबसे पुराने स्नान घाटों में से एक माना जाता है। मेगा कुंभ उत्सव के दौरान लाखों लोग इस स्थान पर आते हैं क्योंकि ऐसी मान्यता है राम घाट कि कि यहां एक डुबकी लगाने से आपके सभी पाप धूल जाते हैं। -रामघाट में ही भगवान श्रीराम ने अपने पिता दशरथ और माता कौशल्या का तर्पण किया था। तब से रामघाट पर पितृ दोष की पूजा होती जा रही है। मंदिर की वास्तुकला रामघाट घाट ऐतिहासिक एवं पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और प्राचीन भारतीय वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। वहीं रामघाट में कई सीढ़ियाँ बनी हुई हैं, जो क्षिप्रा नदी तक जाती हैं। रामघाट के आरती स्थल पर एक भव्य द्वार भी बना हुआ है, जिसकी सुंदरता श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। मंदिर का समय प्रतिदिन होने वाली सायंकाल घाट में संध्या आरती का समय 07:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद रामघाट पर मुख्य रूप से श्रद्धालु कालसर्प पूजा और पितृ दोष पूजा करवाने आते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रसाद चढ़ाते हैं।

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श्री जुगल किशोर जी मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

श्री जुगल किशोर मंदिर भगवान श्री कृष्ण के बचपन और उनकी लीलाओं के लिए जाना जाता है। श्री जुगल किशोर जी मंदिर:भारत के उत्तर प्रदेश का वृंदावन शहर पौराणिक कथाओं में डूबा हुआ है। इसे भगवान श्री कृष्ण के बचपन और उनकी लीलाओं के लिए जाना जाता है। भगवान श्री कृष्णा और राधा जी की लीलाओ का साक्षी श्री धाम वृन्दावन आज भी अपने आप में अनेकों रहस्यों को समाये हुए है। श्री जुगल किशोर मंदिर वृन्दावन में केशी घाट पर स्थित है, श्री जुगल किशोर जी मंदिर जहां भगवान श्री कृष्ण और राधा जी जुगल रूप में विराजमान है। श्री जुगल किशोर मंदिर में शाम के समय दीपक जलाया जाता है, जिससे इस मंदिर की सुंदरता और बढ़ जाती है। मंदिर का इतिहास india’s famous temple श्री जुगल किशोर मंदिर की इतिहास हजारों साल पुराना है। वृन्दावन में सबसे पुराने मंदिरों में से एक श्री जुगल किशोर मंदिर है, इसका निर्माण वर्ष 1627 में किया गया था। इसका निर्माणकर्त्ता नानकरन था। श्री जुगल किशोर मंदिर एक वैष्णव संप्रदाय का मन्दिर है। श्री जुगल किशोर मंदिर गोविन्द देव, मदनमोहन और गोपीनाथ मन्दिर की ही श्रृंखला में चौथा मंदिर है, जो वृन्दावन के निचले सिरे पर प्रसिद्ध केशी घाट के बगल में स्थित है। मंदिर का महत्व यमुना नदी के किनारे श्री कृष्ण ने अश्व दानव केशी का वध किया था, जिस स्थान पर उन्होंने दानव का वध किया उस स्थान पर केशी घाट बना और यहीं श्री जुगल किशोर मंदिर स्थापना हुई। – श्री जुगल किशोर जी मंदिर का मुख्य आकर्षण केशी घाट है, जो वृंदावन में श्रद्धालुओं के लिए पसंदीदा और पवित्र स्नान/स्नान स्थलों में से एक है। – श्री जुगल किशोर मंदिर में शाम के समय केशी घाट पर आए भक्त सैकड़ों की संख्या में दीपक जलातें हैं, जिससे इस घाट और मंदिर की सुंदरता और बढ़ जाती है। मंदिर की वास्तुकला श्री जुगल किशोर जी मंदिर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित एक सुंदर संरचना है, ये मंदिर इतना ऊंचा है कि इसे यमुना नदी के पार से भी देखा जा सकता है। श्री जुगल किशोर जी मंदिर की वास्तुकला मदन मोहन मंदिर, श्री जुगल किशोर जी मंदिर श्री गोविंद देव मंदिर और श्री मदन मोहन मंदिर से मिलती है। मंदिर के मुख्य द्वार पर गोवर्धन पर्वत उठाए हुए और अपनी प्रिय सखियों से घिरे हुए भगवान श्री कृष्ण की एक सुंदर मूर्ति है। प्रवेश द्वार को पुष्प और पक्षी रूपांकनों से सजाया गया है। मंदिर का शिखर और वास्तुकला सौंदर्य की दृष्टि से मनभावन हैं।श्री जुगल किशोर जी मंदिर इसका सभा कक्ष अन्य मंदिरों की तुलना में अपेक्षाकृत बड़ा है, जिसका क्षेत्रफल 25 वर्ग फुट है और यह पूर्वी दिशा में स्थित है। उत्तरी और दक्षिणी किनारों पर छोटे प्रवेश द्वार हैं। श्री जुगल किशोर जी मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM सुबह दर्शन का समय 08:30 AM – 10:00 AM शयन आरती का समय 11:45 AM – 12:00 PM शाम का भोग का समय 05:30 PM – 06:00 PM शयन आरती का समय 08:10 PM – 08:30 PM सुबह की आरती और परिक्रमा 05:00 AM – 06:00 AM सुबह भोग का समय 11:30 AM – 11:45 AM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:30 PM शाम की परिक्रमा का मसय 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद श्री जुगल किशोर जी को फूलों के साथ माखन, मिश्री, पेड़ा और बर्फी का भोग लगाया जाता है।

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गढ़कालिका मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

स्कन्दपुराण में वर्णित है यह मंदिर गढ़कालिका मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। कालजयी कवि कालिदास गढ़ कालिका देवी के उपासक थे। कालिदास रचित ‘श्यामला दंडक’ महाकाली स्तोत्र एक सुंदर रचना है। ऐसा कहा जाता है कि महाकवि के मुख से सबसे पहले यही स्तोत्र प्रकट हुआ था। यहाँ प्रत्येक वर्ष कालिदास समारोह के आयोजन के पूर्व माँ कालिका की आराधना की जाती है। ‘स्कन्दपुराण’ में चौबीस मातृकाओं में देवी गढ़कालिका का उल्लेख है। गढ़कालिका मंदिर में माँ कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है। मंदिर का इतिहास गढ़कालिका मंदिर के पास जब पुरातत्व विभाग ने खुदाई कराई थी, तो बड़ी ईंट, टकसाल और सकड़ें निकली थीं। अनुमान है कि यह स्थान ईसा पूर्व 500 साल पुराना है। कुछ इतिहासकार गढ़कालिका मंदिर को महाभारतकाल का बताते हैं, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है। बाद में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्टेटकाल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि काकड़ा आरती के बाद मां बाल स्वरूप में दर्शन देती हैं इसलिए यहां रात 2.30 बजे से श्रद्धालुओं की दर्शन के लिए कतार लग जाती है। रावण दहन के बाद श्री राम लौटते समय रुद्रसागर के किनारे रुके थे, तब रात्रि के समय मां और हनुमान जी के बीच युद्ध हुआ था, उस वक्त माता का एक अंश गलित होकर गिर गया। माता का जो अंश गिर गया, वही अंश गढ़कालिका के नाम से विख्यात हुआ। मंदिर की वास्तुकला परमार शासन काल में भी इसके जीर्णोद्धार के प्रमाण मिलते हैं रियासतकाल में सिंधिया राजवंश ने भी मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। नौंवी सदी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार हर्ष विक्रमादित्य ने करवाया था। ‘गढ़’ नामक स्थान पर होने के कारण देवी को गढ़कालिका कहा जाता है। मंदिर परिसर मे अति प्राचीन दीप स्तंभ है। इस दीप स्तंभ में 108 दीप विद्यमान है, इसे नवरात्रि के दिनों में प्रज्वलित किया जाता है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 03:00 AM – 11:00 AM काकड़ आरती का समय 04:00 AM – 05:00 AM महाआरती का समय 09:00 AM – 10:00 AM शयन आरती का समय 10:00 PM – 11:00 PM मंदिर का प्रसाद गढ़कालिका मंदिर में मां को हलवे और खीर-पूड़ी का भोग लगाते हैं। इसके अलावा श्रद्धालु पूरणपोली, दाल, चावल व सब्जी-रोटी का भोग भी लगाते हैं।

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इस्कॉन उज्जैन मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

इसे राधा मदन मोहन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर:भारत के मध्य प्रदेश राज्य के उज्जैन शहर में स्थित इस्कॉन मंदिर आस्था और हिन्दू संस्कृति का एक अनुपम संगम है। इस मंदिर को राधा मदन मोहन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की स्थापना पूरे संसार में भगवान श्रीकृष्ण के संदेश को पहुंचाने के लिए किया गया है। बता दें कि इस्कॉन का पूरा नाम अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ है। इस्कॉन को दुनियाभर में श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार और प्रसार करने के लिए जाना जाता है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर का इतिहास भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली उज्जैन में बने इस्कॉन मंदिर का निर्माण सन् 2006 में हुआ। राजस्थान के मकराना शहर के सफेद संगमरमर से मंदिर का निर्माण किया गया है। यह उज्जैन और इस्कॉन संगठन का एकमात्र पूर्णतः सौर ऊर्जा से संचालित मंदिर है। भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और उनके मित्र सुदामा ने उज्जैन में महर्षि सांदिपनी से शिक्षा प्राप्त की थी। इस वजह से भी उज्जैन में बने इस्कॉन मंदिर से भक्तों का विशेष जुड़ाव है। यह उज्जैन और इस्कॉन संगठन का एकमात्र पूर्णतः सौर ऊर्जा से संचालित मंदिर है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर का महत्व इस्कॉन मंदिर भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं और समाज के दिए उनके संदेशों का प्रचार-पसार करता है। इस्कॉन मंदिर से भक्तों का विशेष जुड़ाव रहता है, खासकर विदेशी भक्त और श्रद्धालु श्री कृष्ण की भक्ति में डूबे रहते हैं। इस्कॉन का सदस्य बनने से पहले श्रद्धालुओं को लहसुन, प्याज, मांस और मछली जैसे तामसिक भोजन का सेवन त्यागना होता है। साथ ही शराब का सेवन भी बंद करना होता है। – इस्कॉन के अनुयायियों के लिए रोजाना शाम के वक़्त करीबन एक घंटे गीता या अन्य किसी धार्मिक ग्रन्थ का पाठ करना अनिवार्य माना जाता है। इसके आलावा सदस्यों को अपनी क्षमता के अनुसार रुद्राक्ष की माला से ‘हरे कृष्णा-हरे रामा’ का जाप करना अनिवार्य होता है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर की वास्तुकला इस्कॉन मंदिर, उज्जैन का निर्माण 2006 में किया गया था। मंदिर में तीन पवित्र स्थान हैं, जिनमें भगवान कृष्ण और राधा के साथ गोपियों, बलराम और कृष्ण और निताई गौर (कृष्ण और बलराम के अवतार) की मूर्तियां हैं। यहां मुरली मनोहर और उनकी प्रेमिका राधा की बेहद खूबसूरत प्रतिमा है। हर इस्कॉन मंदिर की तरह यहां तुलसी बगीचा है। मंदिर की छत पर कमल के फूल के ऊपर रासलीला में लीन श्रीकृष्ण और राधारानी का अद्‍भुत चित्रांकन है। मंदिर का समय 04:30 AM – 01:00 PM मंगला आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM तुसली आरती का समय 05:00 AM – 05:30 AM जाप सत्र का समय 05:30 AM – 06:00 AM दर्शन आरती व गुरु पूजा का समय 07:25 AM – 08:00 AM श्रीमद्भागवत कक्षा का समय 08:00 AM – 10:00 AM राजभोग आरती का समय 12:15 PM – 01:00 PM मंदिर बंद होने का समय 01:00 PM – 04:00 PM धुप आरती का समय 04:00 PM – 04:30 PM संध्या तुलसी आरती का समय 06:45 PM – 07:00 PM गौरा आरती का समय 07:00 PM – 07:30 PM शयन आरती का समय 09:00 AM – 09:15 PM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 09:15 PM मंदिर का प्रसाद इस्कॉन मंदिर में भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार बेसन और बूंदी के लड्डू का भोग भगवान श्री कृष्ण को लगाते हैं।

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पड़िला महादेव मंदिर:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

इस मंदिर को पांडेश्वर नाथ महादेव के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में वैसे तो बहुत सारे आध्यात्मिक और ऐतिहासिक धार्मिक स्थल हैं, लेकिन पड़िला महादेव मंदिर का इतिहास अलौकिक है। तीर्थराज प्रयाग के फाफामऊ के थरवई गांव में स्थित इस मंदिर को पांडेश्वर नाथ महादेव के नाम से भी जाना जाता है। बताया जाता है कि पड़िला महादेव मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया था। इस मंदिर की गिनती प्रयाग के पंचकोसी परिक्रमा में होती है और यहां स्वयं भू शिवलिंग है। मंदिर का इतिहास पड़िला महादेव मंदिर को 8,000 साल पुराना बताया जाता है। इस मंदिर का नाम पहले माधव मनोहर नाम था। द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडव पड़िला में आकर काफी समय तक रुके थे। इस दौरान पांडवों ने यहां लिंग की पूजा अर्चना की थी। ऐसी मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान श्री कृष्ण के कहने पर पांडवों ने पड़िला महादेव मंदिर में शिवलिंग पर विधि विधान से पूजा-अर्चना कर मन्नत मांगी थी कि हम पांचों भाई सकुशल हस्तिनापुर पहुंचें। पांडवों की यह मन्नत पूरी भी हुई। पांडवों द्वारा हुई इसी पूजा के बाद इसे पांडेश्वरनाथ धाम कहा जाने लगा। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि श्री कृष्ण की सलाह पर यहां पाण्ड्वों ने अपने वनवासकाल के दौरान भगवान शंकर के लिंग की स्थापना की थी। ऐसी मान्यता है कि पड़िला महादेव मंदिर में शिवलिंग सुबह हरा, दोपहर में भूरा और रात में काले रंग का नजर आता है। भगवान भोलेनाथ के इस पवित्र माह में पांडेश्वरनाथ भगवान भोलेनाथ का हर दिन अलग-अलग श्रृंगार किया जाता है। भगवान भोलेनाथ के अनेक रूपों के अनुरूप शिवलिंग पर श्रृंगार किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अगर लगातार 40 दिन तक पांडेश्वर नाथ धाम में भगवान शिव का दर्शन किया जाए, तो दर्शन करने वाले की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। मंदिर की वास्तुकला पड़िला महादेव मंदिर एक अनूठी स्थापत्य शैली का प्रदर्शन करता है। पूरी तरह से पत्थरों से निर्मित पड़िला महादेव मंदिर नागर शैली में बना है। द्वापर युग में बना यह मंदिर आज भी बिल्कुल वैसा ही है। मंदिर का डिज़ाइन प्राचीन काल की शिल्प कौशल को दर्शाता है, जिससे दिव्यता और पवित्रता का माहौल बनता है। मंदिर के गर्भ गृह के शीर्ष पर विशाल शिखर बना है। छज्जों के रूप में वातायन बनाकर मंडप को महामंडप बनाया गया है। भीतर हवा जाने के लिए वातायन है और मंडप तीन ओर से खुले हैं। मंदिर की दीवारें पुख्ता हैं। मंदिर का समय मंदिर खुलने और बंद होने का समय 05:00 AM – 10:30 PM मंदिर का प्रसाद पांडेश्वर महादेव धाम में भक्त उमापति शिवशंकर को खुश करने के लिए लाल झंडा (निशान) और लाठी चढ़ाते हैं। इसके अलावा मंदिर में आने वाले भक्त फल, फूल, मिठाई के साथ गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, भांग चढ़ाते हैं।

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मदन मोहन मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इस मंदिर को “श्री राधा मदन मोहन मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। मदन मोहन मंदिर उत्तर प्रदेश मथुरा के पावन नगरी वृन्दावन में स्थित है। यह मंदिर वैष्णव संप्रदाय के प्राचीन मंदिरों में से एक है। सप्तदेवालयों में शामिल मंदिरों में यह मंदिर पहले स्थान पर आता है। औरंगजेब के समय मदन मोहन की मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए इसे राजस्थान के करौली में स्थानांतरित कर दिया गया था। इस मंदिर को “श्री राधा मदन मोहन मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर का इतिहास मदन मोहन मंदिर का इतिहास पांच हजार साल पुराना है। ऐसा कहा जाता है कि कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। जबकि ऐतिहासिक अभिलेखों के मुताबिक, एक मुल्तान व्यापारी कपूर राम दास ने श्री सनातन गोस्वामी की देखरेख में 15वीं या 16वीं शताब्दी में इस मंदिर को बनवाया था। मंदिर का महत्व मदन मोहन मंदिर की खास बात और है कि यह मंदिर बहुत ही मजबूती से बना हुआ है। औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ने का बहुत प्रयास किया परन्तु वह इसे तोड़ नहीं पाया। वृन्दावन में भगवान कृष्ण के प्रत्येक मंदिर में प्रतिदिन आरती की जाती है परन्तु मदन मोहन मंदिर में केवल कार्तिक के महीने में ही आरती की जाती है। पांच सौ साल पूर्व चैतन्य महाप्रभु ब्रज वृन्दावन आये तो उन्हें यहाँ पर श्रीकृष्ण की लीलास्थलियों का अनुभास हुआ। वह कुछ समय के बाद बंगाल चले गए। परन्तु उन्होंने अपने अनुयायियों को वृन्दावन में श्रीकृष्ण की लीलास्थलियों को खोजने के लिए भेजा। क्योंकि उस समय वृन्दावन पूर्ण रूप से जंगल बन गया था। चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी वृन्दावन में वास करने लगे। चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी सनातन गोस्वामी एक दिन मथुरा में ओंकार चौबे के घर भिक्षा मांगने गए तो उन्होंने वहां पर 5 साल के बालक को खेलते हुए देखा। उन्होंने चौबे की पत्नी से पूछा की यह बालक आपका है ? माता ने बताया कि यह बालक उन्हें यमुना किनारे खेलता हुआ दिखा, तो उसे अपने घर ले आयी। इसका नाम मदन मोहन है। सनातन गोस्वामी उस बालक को अपने साथ ले गए। वह साधना करने के बाद बिना नमक की बाटी को भोग में ठाकुर जी को अर्पित करते और उस बाटी को बालक को खाने को देते। बालक को बिना नमक की बाटी पसंद नहीं आ रही थी। इस दौरान मुल्तान का एक व्यापारी रामदास कपूर व्यापार हेतु अपनी नाव से यमुना नदी द्वारा आगरा जा रहा था। तभी उसकी नाव खराब हो गयी। नाव ख़राब होने के कारण व्यापारी सनातन गोस्वामी के पास गया। तब सनातन गोस्वामी को मालूम हुआ कि यह नमक का व्यापारी, तो वह समझ गए। जब उस व्यापारी ने गोस्वामी और बालक को देखा,तो मोहित होकर मंदिर निर्माण की इच्छा रखी। मंदिर निर्माण के निर्णय से ही नाव ठीक हो गयी। इसके बाद मंदिर का निर्माण हुआ और मदन मोहन की पूजा होने लगी। मंदिर की वास्तुकला मदन मोहन मंदिर उत्तर भारतीय स्थापत्य शैली में बना हुआ है। यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियाँ है। मंदिर में भगवान कृष्ण के साथ राधा रानी और ललिता सखी की प्रतिमा है। यह मंदिर यमुना नदी से 50 फीट ऊंचा है और यमुना में इसकी नींव 70 फीट नीचे तक है। मंदिर का समय गर्मियों में मदन मोहन मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 11:00 AM गर्मियों में शाम में मदन मोहन मंदिर खुलने का समय 05:00 PM – 05:30 PM सर्दियों में मदन मोहन मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 12:00 PM सर्दियों में शाम में मदन मोहन मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद मंदिर में भगवान कृष्ण के प्रिय व्यंजन “अंगा कड़ी” का भोग लगाया जाता है। साथ ही पुष्प भी चढ़ाये जाते है।

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राम जानकी मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

यहां दर्शन करने से होती है सुख – सोभाग्य में वृद्धि राम जानकी मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। राम जानकी मन्दिर शहर के मंगलनाथ रोड़ स्थित अंकपात चौराहे पर बना हुआ है। शहर के बीचोंबीच बने इस मंदिर की गिनती पुराने मंदिरों में की जाती है, जिसका समय-समय पर सुंदरीकरण कराया जाता रहा है। मंदिर के राम दरबार में हाजिरी लगाने के लिए देश-प्रदेश से लोग आते हैं और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए पूजन-अर्चन करते हैं। इस मंदिर में माता सीता और प्रभु श्री राम छोटे भाई लक्ष्मण के साथ विराजमान हैं। राम जानकी मंदिर का इतिहास धर्म नगरी उज्जैन में एक से बढ़कर एक पुराने मंदिर हैं, जहां श्रद्धालुओं का हर समय तांता लगा रहता है। राम जानकी मन्दिर भी उनमें से एक है, जानकार इस मंदिर को दशकों पुराना बताते हैं। मीना समाज धर्मशाला की देख-रेख में राम जानकी मंदिर का संचालन होता है। प्रभु श्रीराम की भक्ति जीव को संसार में अनंत सुख देने वाली होती है। भक्त श्री राम की भक्ति में लीन होकर भजन कीर्तन करते हैं, जिससे उनकी और उनको सुनने वालों की आत्मा निर्मल हो जाती हैं। राम जानकी मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति निरन्तर पूरे विधि विधान से राम जानकी मन्दिर में पूजा करता है उस व्यक्ति के सुख – सोभाग्य में वृद्धि होती है और वह अपने जीवन की हर मनोकामना को पूर्ण प्राप्त कर पाता है। जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से इस मंदिर में प्रभु की भक्ति करते हैं, तो प्रभु उनकी हर इच्छा पूरी करते हैं। राम जानकी मन्दिर में आए भक्तों के सारे कष्ट भगवान खत्म कर देते हैं।इस मन्दिर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी की चालीसा का पाठ पूरे मन व आस्था के साथ करने से घर परिवार के लोगों मे अपनत्व बढ़ता है। राम जानकी मंदिर की वास्तुकला राम जानकी मन्दिर में एक मुख्य प्रवेश द्वार है। मंदिर के गर्भ गृह में श्री राम, माता जानकी और लक्ष्मण जी की भव्य मूर्तियां स्थापित है। मंदिर का भव्य और विशाल परिसर है, जिसमें शिव जी और माँ दुर्गा की प्रतिमा भी स्थापित है। मन्दिर की वास्तुकला में आधुनिकता के साथ भारतीय पारंपरिक वास्तुकला की झलक देखने को मिलती हैं। राम जानकी मंदिर का समय मंदिर का खुलने का समय 05:00 AM – 09:30 PM सुबह मंदिर क दर्शन 05:00 AM – 05:30 AM संध्या आरती का समय 09:00 PM – 09:30 PM मंदिर का प्रसाद राम जानकी मन्दिर में भक्त फल और बूंदी के लड्डू का भोग लगाते हैं और मनवांछित फल प्राप्त करते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार इस मंदिर में पूड़ी-सब्जी का भोग भी लगाते हैं।

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