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Navratri 2023 Day 2: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र, आरती, भोग और व्रत कथा

पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करने के बाद, हम नवरात्रि 2023 (द्वितीया तिथि) के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं. इसलिए, आइए मां ब्रह्मचारिणी पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र, भोग और आरती के बोलों पर एक नजर डालते हैं. मां ब्रह्मचारिणी से जुड़े रोचक तथ्य  मां ब्रह्मचारिणी ने राजा हिमालय के घर जन्म लिया था. नारदजी की सलाह पर उन्होंने कठोर तप किया, ताकि वे भगवान शिव को पति स्वरूप में प्राप्त कर सकें. कठोर तप के कारण उनका ब्रह्मचारिणी या तपश्चारिणी नाम पड़ा. भगवान शिव की आराधना के दौरान उन्होंने 1000 वर्ष तक केवल फल-फूल खाए तथा 100 वर्ष तक शाक खाकर जीवित रहीं. ब्रह्मचारिणी इस लोक के समस्त चर और अचर जगत की विद्याओं की ज्ञाता हैं। इनका स्वरूप श्वेत वस्त्र में लिपटी हुई कन्या के रूप में है, जिनके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे में कमंडल है। यह अक्षयमाला और कमंडल धारिणी ब्रह्मचारिणी नामक दुर्गा शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र-मंत्र आदि से संयुक्त हैं.  Navratri 2023 Day 3:मां चन्द्रघंटा की पूजा क्यों होती है? मां ब्रह्मचारिणी की पुजा विधि नवरात्रि के दूसरे दिन सूर्योदय से पहले उठें और स्नान-ध्यान करने के बाद मांं ब्रह्मचारिणी की फोटो को चौकी में रखकर गंगाजल छिड़ककर स्नान कराएं और उसके बाद देवी को वस्त्र, पुष्प, फल, आदि अर्पित करें. देवी की पूजा में आज विशेष रूप से सिन्दूर और लाल पुष्प जरूर अर्पित करें. मान्यता है कि नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में केसर की खीर, हलवा या फिर चीनी का भोग लगाने पर शीघ्र ही देवी कृपा प्राप्त होती है और साधक को सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं. मां ब्रह्मचारिणी का पसंदीदा रंग  ऐसा माना जाता है कि देवी ब्रह्मचारिणी को लाल रंग पसंद है, जिसे आमतौर पर इस दिन के भक्तों द्वारा सजाया जाता है। इसे प्यार और समृद्धि का रंग माना जाता है.  मां ब्रह्मचारिणी के लिए भोग और मंत्र  मां ब्रह्मचारिणी के भोग के लिए पंचामृत अर्पित कर सकते हैं । फिर फल, एक पूरा नारियल, केला, पान और सुपारी, हल्दी और कुमकुम चढ़ाएं। आरती गाकर ब्रह्मचारिणी पूजा का समापन करें और कपूर जलाकर देवी को प्रणाम करें या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥  मां ब्रह्मचारिणी की आरती  जय अम्बे ब्रह्मचारिणी माता,  जय चतुरानन प्रिया सुख दाता।  ब्रह्मा जी के मन भाते हो,  ज्ञान सभी को सिखाते हो।  ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा,  जिसको जपे सकल संसार।  जय गायत्री वेद की माता,  जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।  कमी कोई रहाणे न पाए,  कोई भी दुख सहने ना पाए।  मां दुर्गा मंत्र  सर्व मंगला मंगल्ये, शिव सर्वार्थ साधिका   शरण्ये त्रयम्बके गौरी, नारायणी नमोस्तुते   सर्व स्वरूपे सर्वेशे, सर्व शक्ति समन्वयते   भये भ्यस्त्राही नो देवी, दुर्गे देवी नमोस्तुते   एतत्ते वदनं सौम्यं लोचना त्रयभुषितम्   पातु नः सर्वभितिभ्यः कात्यायनि नमोस्तुते   ज्वाला करला मत्युग्राम शेषासुर सुदानम्   त्रिशूलं पातु नो भितर भद्रकाली नमोस्तुते   या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थितः   नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः   

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Navratri 2023 Day 1: मां शैलपुत्री की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र, आरती, भोग और पापन व्रत कथा

Navratri 2023 First Day Puja नवरात्रि के 9 दिन मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा होती है. नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित है. मां शैलपुत्री हिमालयराज की पुत्री हैं. मां दुर्गा के 9 स्वरूप व्यक्ति को जीवन जीने की सीख देते हैं. शैल का अर्थ होता है पत्थर या पहाड़. पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा इसलिए की जाती है, ताकि व्यक्ति जीवन में मां शैलपुत्री के नाम की तरह स्थिरता बनी रहे. अपने लक्ष्य को पाने के लिए जीवन में अडिग रहना जरूरी है, जो कि हमें मां शैलपुत्री की पूजा से मिलता है.  बता दें कि नवरात्रि के दिन कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. इस दिन स्थापना के बाद दुर्गासप्तशती का पाठ किया जाता है. धार्मिक शास्त्रों के अनुसार कलश को भगवान गणेश का स्वरूप माना गया है. जैसे किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश जी से होती है वैसे ही पूजा में कलश पूजा से ही शुरुआत होती है. नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री की ये कथा श्रवण करने या सुनने से  घर में सुख-समृद्धि आती है और मां शैलपुत्री का आशीर्वाद प्राप्त होता है.  माता शैलपुत्री की पूजा सामग्री एक छोटी चुनरी, एक बड़ी चुनरी, कलावा, चौकी, कलश, कुमकुम, पान, सुपारी, कपूर, जौ, नारियल, लौंग. बताशे, आम के पत्ते, केले का फल, देसी घी, धूप, दीपक, अगरबत्ती, माचिस. मिट्टी का बर्तन, माता का श्रृंगार का सामान, देवी की प्रतिमा या फोटो, फूलों की माला. गोबर का उपला, सूखे मेवा, मावे की मिठाई, लाल फूल, एक कटोरी गंगाजल और दुर्गा सप्तशती या दुर्गा स्तुति आदि का पाठ जरूर करें. Navratri 2023 Mata Shailputri puja vidhi नवरात्रों की शुरुआत कलश स्थापना और 9 दिन जलने वाली अखंड ज्योति से होती है. वहीं पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया जाता है. नवरात्रि का पहला दिन माता शैलपुत्री को समर्पित है. इस दिन न केवल हवन और पूजा होती है बल्कि शैलपुत्री से जुड़ी कथा सुननी भी जरूरी होती है. ऐसे में शैलपुत्री की कथा के बारे में पता होना जरूरी है. आज का हमारा लेख शैलपुत्री की कथा पर ही है. आज हम आपको अपने लेख के माध्यम से बताएंगे कि पूजा विधि और शैलपुत्री की कथा पढ़ते हैं आगे… Navratri 2023 Day 2: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र, आरती, भोग और व्रत कथा मां शैलपुत्री कथा Navratri Maa Shailputri Katha ज्योतिष अनुसार मां शैलपुत्री का वाहन वृषभ (बैल) है. हिमालयराज पर्वत की बेटी मां शैलपुत्री हैं. आइए जानें इनके पीछे की कथा के बारे में. एक बार प्रजापति दक्ष (सती के पिता) ने यज्ञ के दौरान भगवान शिव और सती को छोड़कर सभी देवताओं को आमंत्रित किया था. लेकिन सती बिना बुलाए ही यज्ञ में जाने को तैयार थीं. लेकिन भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि ऐसे बिना बुलाए जाना सही नहीं. लेकिन सती नहीं मानी. ऐसे में सती की जिद्द के आगे भगवान शिव ने उन्हें जाने की इजाजत दे दी.  पिता के यहां यज्ञ में सती बिना निमंत्रण पहुंच गई. सती के साथ वहां बुरा व्यवहार किया गया . वहां सती ने अपनी माता के अलावा किसी से सही से बात नहीं की. इतना ही नहीं, सती की बहनें भी यज्ञ में उनका उपहास उड़ाती रहीं. ऐसा कठोर व्यवहार  और पति का अपमान सती बर्दाश नहीं कर पाईं और क्रोधित उन्होंने खुद को यज्ञ में भस्म कर दिया. भगवान शिव को जैसे ही ये समाचार मिला उन्होंने अपने गणों को दक्ष के यहां भेजा यज्ञ विध्वंस करा दिया. शास्त्रों के अनुसार अगले जन्म में सती ने हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और इनका नाम शैलपुत्री रखा गया. अतः नवरात्रि के पहले मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. 

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नवरात्रि के 9 दिन का महत्व (Shardiya Navratri Importance)

नवरात्रि हिंदू धर्म में मनाए जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह नौ दिनों का त्योहार देवी दुर्गा की पूजा के लिए समर्पित है। नवरात्रि के नौ दिनों का प्रत्येक दिन एक विशेष महत्व रखता है। Shardiya Navratri पहला दिन: शैलपुत्री नवरात्रि का पहला दिन शैलपुत्री को समर्पित है। शैलपुत्री देवी दुर्गा का पहला रूप है। उन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना की जाती है। दूसरा दिन: ब्रह्मचारिणी नवरात्रि का दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा का दूसरा रूप है। उन्हें कठोर तपस्या करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है और उनसे मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना की जाती है। तीसरा दिन: चंद्रघंटा नवरात्रि का तीसरा दिन चंद्रघंटा को समर्पित है। चंद्रघंटा देवी दुर्गा का तीसरा रूप है। उनके माथे पर चंद्रमा होने के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इस दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाती है और उनसे बुरी शक्तियों से रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है। चौथा दिन: कुष्मांडा नवरात्रि का चौथा दिन कुष्मांडा को समर्पित है। कुष्मांडा देवी दुर्गा का चौथा रूप है। उन्हें अन्नपूर्णा के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन देवी कुष्मांडा की पूजा की जाती है और उनसे सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। पांचवां दिन: स्कंदमाता नवरात्रि का पांचवां दिन स्कंदमाता को समर्पित है। स्कंदमाता देवी दुर्गा का पांचवां रूप है। उन्हें स्कंद की माता के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी स्कंदमाता की पूजा की जाती है और उनसे संतान प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है। छठा दिन: कात्यायनी नवरात्रि का छठा दिन कात्यायनी को समर्पित है। कात्यायनी देवी दुर्गा का छठा रूप है। उन्हें भगवान शिव की पत्नी के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है और उनसे शक्ति और बुद्धि की प्रार्थना की जाती है। सातवां दिन: कालरात्रि नवरात्रि का सातवां दिन कालरात्रि को समर्पित है। कालरात्रि देवी दुर्गा का सातवां रूप है। उन्हें अंधकार का नाश करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है और उनसे बुरी शक्तियों से रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है। आठवां दिन: महागौरी नवरात्रि का आठवां दिन महागौरी को समर्पित है। महागौरी देवी दुर्गा का आठवां रूप है। उन्हें सफेद रंग के कारण महागौरी कहा जाता है। इस दिन देवी महागौरी की पूजा की जाती है और उनसे मोक्ष की प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है। नौवां दिन: सिद्धिदात्री नवरात्रि का नौवां दिन सिद्धिदात्री को समर्पित है। सिद्धिदात्री देवी दुर्गा का नौवां और अंतिम रूप है। उन्हें सभी सिद्धियों की देवी के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है और उनसे सभी मनोकामनाओं की सिद्धि की प्रार्थना की जाती है। नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान, भक्त देवी दुर्गा की पूजा करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों को आध्यात्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इन दिनों में भक्त अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने और देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रयास करते हैं।

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Navratri 2023: शारदीय नवरात्रि में कलश स्थापना के लिए मुहूर्त, जानें सभी तिथियां

Shardiya Navratri 2023 शारदीय नवरात्रि हिंदू धर्म में मनाए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह नौ दिनों का त्योहार देवी दुर्गा की पूजा के लिए समर्पित है। नवरात्रि के पहले दिन, कलश स्थापना की जाती है, जो एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। कलश स्थापना के लिए, एक मिट्टी का कलश लिया जाता है और उसे पानी से भर दिया जाता है। कलश के ऊपर आम के पत्ते, सुपारी, सिक्के और एक कलावा (पवित्र धागा) रखा जाता है। कलश के अंदर एक मुट्ठी जौ के बीज भी डाले जाते हैं। कलश को पूर्व या उत्तर दिशा में एक ऊंचे स्थान पर स्थापित किया जाता है। कलश को स्थापित करने से पहले, एक छोटी सी वेदी बनाई जाती है और उस पर देवी दुर्गा के प्रतीक चिन्ह, जैसे कि अष्टदल कमल, त्रिशूल, चक्र और शंख रखे जाते हैं। कलश स्थापना के बाद, देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। पूजा में देवी दुर्गा के मंत्रों का जाप किया जाता है और उन्हें फूल, मिठाई और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। कलश स्थापना का महत्व कलश स्थापना को नवरात्रि के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक माना जाता है। यह अनुष्ठान देवी दुर्गा की उपस्थिति को घर में आमंत्रित करने के लिए किया जाता है। कलश को देवी दुर्गा का प्रतीक माना जाता है, और यह माना जाता है कि कलश में देवी दुर्गा निवास करती हैं। कलश स्थापना के माध्यम से, भक्त देवी दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने की आशा करते हैं। वे नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान देवी दुर्गा की पूजा करके उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। शारदीय नवरात्रि 2023 में कलश स्थापना का मुहूर्त ज्योतिषाचार्य रामदेव मिश्र ने बताया कि पंचांग के अनुसार शारदीय नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि को यानी पहले दिन कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त 15 अक्टूबर को 11:44 मिनट से दोपहर 12:30 तक है. ऐसे में कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त इस साल 46 मिनट ही रहेगा. कलश स्थापना की विधि कलश स्थापना की विधि इस प्रकार है: कलश स्थापना के बाद, आपको रोजाना कलश की पूजा करनी चाहिए। कलश की पूजा करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है। कलश स्थापना के लिए सामग्री कलश स्थापना के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है: कलश स्थापना का मंत्र कलश स्थापना के दौरान निम्नलिखित मंत्र का जाप किया जाता है: ऊँ देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। इस मंत्र का अर्थ है: हे देवी, जो सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हो। तुम्हें नमस्कार है, तुम्हें नमस्कार है, तुम्हें नमस्कार है, तुम्हें बार-बार नमस्कार है।

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नवरात्री की पूजा कैसे करें NAVRATRI 2023 PUJA VIDHI

नवरात्री का त्योहार हिन्दू धर्म में मां दुर्गा की पूजा और आराधना के रूप में मनाया जाता है। यह पूजा नौ दिनों तक चलती है और इसके दौरान नौ रूपों की पूजा की जाती है, जिनका नाम है – शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदात्री। नवरात्रि की पूजा करने के लिए निम्नलिखित विधियाँ हैं: पूजा सामग्री पूजा विधि नवरात्रि के दौरान व्रत नवरात्रि के दौरान, कई लोग व्रत रखते हैं। व्रत रखने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है। नवरात्रि के दौरान व्रत रखने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए: नवरात्रि के दौरान अन्य अनुष्ठान नवरात्रि के दौरान, कई अन्य अनुष्ठान भी किए जाते हैं, जैसे कि:

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शारदीय नवरात्रि 2023 विशेष क्या है  NAVRATRI

2023 की शारदीय नवरात्रि कई मायनों में विशेष है। इस बार नवरात्रि की शुरुआत रविवार के दिन हो रही है, जो एक शुभ दिन माना जाता है। इसके अलावा, इस बार नवरात्रि के दौरान कई दुर्लभ संयोग भी बन रहे हैं। इनमें से कुछ संयोग निम्नलिखित हैं: इन दुर्लभ संयोगों के कारण, इस बार की शारदीय नवरात्रि को बहुत ही शुभ माना जा रहा है। इस दौरान मां दुर्गा की पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होने की संभावना है। उदाहरण सहित रवियोग के उदाहरण के लिए, हम कह सकते हैं कि इस योग में मां दुर्गा की पूजा करने से आत्मिक और बौद्धिक उन्नति की संभावना बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो किसी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, वह इस योग में मां दुर्गा की पूजा करके परीक्षा में सफलता प्राप्त कर सकता है। या, एक व्यक्ति जो अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है, वह इस योग में मां दुर्गा की पूजा करके अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है। विस्तारित इसके अलावा, 2023 की शारदीय नवरात्रि भारत के लिए एक ऐतिहासिक अवसर भी है। इस बार नवरात्रि के दौरान, भारत में होने वाले विधानसभा चुनावों के नतीजे आने की संभावना है। इसलिए, इस बार की नवरात्रि देश के लिए भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस अवसर पर, देश के सभी लोग मां दुर्गा की पूजा करके देश में शांति, समृद्धि और विकास की कामना कर सकते हैं। वे मां दुर्गा से यह भी प्रार्थना कर सकते हैं कि वे देश के नेताओं को सही दिशा में ले जाने की शक्ति प्रदान करें। कुल मिलाकर, 2023 की शारदीय नवरात्रि कई मायनों में विशेष है। इस दौरान मां दुर्गा की पूजा करके देश और समाज को नई ऊर्जा और शक्ति प्रदान करने की कोशिश करनी चाहिए। NAVRATRI KAB HAI , NAVRATRI KA YOG

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Navratri 2023 जानें नवरात्रि में देवी मां का क्यों किया जाता है 16 श्रृंगार, महिलाएं भी ऐसे होती हैं तैयार

शारदीय नवरात्रि का त्योहार मां शक्ति के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है. कहते हैं इन 9 दिनों में मां की सच्चे मन से आराधना करने से जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं. इस साल कब से शुरू हो रहे हैं नवरात्रि: इस साल शारदीय नवरात्रि 15 अक्टूबर 2023, रविवार से प्रारंभ होंगे और 23 अक्टूबर को समापन होगा। 24 अक्टूबर 2023, मंगलवार को विजयादशमी या दशहरा का पर्व मनाया जाएगा। इस साल शारदीय नवरात्रि की दुर्गा अष्टमी 22 अक्टूबर 2023 को है. इस दिन कन्या पूजन और मां महागौरी की उपासना होती है. वहीं शारदीय नवरात्रि की महानवमी 23 अक्टूबर 2023 को है. इस दिन मां सिद्धिदात्रि की पूजा के साथ, कन्या पूजा, हवन किया जाता है. और माता के दर्शन के लिए मंदिरों में जाकर सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं. वहीं इस समय माता की पूजा के लिए देवी मां का 16 श्रृंगार किया जाता है. नवरात्रि के पर्व पर महिलाएं भी देवी मां की पूजा के लिए खूब सज धज कर तैयार होती हैं. नवरात्रि में महिलाएं भी मां को खुश करने के लिए सोलह श्रृंगार करती हैं. आइए जानते हैं मां को खुश करने के लिए कौन से सोहल श्रृंगार किए जाते हैं और इनके पीछे क्या कारण है. फूलों का श्रृंगारसोलह श्रृंगार में फूलों से श्रृंगार करना शुभ माना जाता है. फूलों की महक मन को ताजगी प्रदान करती है. ऐसे में महिलाएं मां को भी फूलों से सजाती हैं और खुद भी फूलों का श्रृंगार करती हैं. बिंदी भारतीय महिलाएं अपने माथे के बीचों-बीच बिंदी लगाती है. महिलाओं की सुंदरता बढ़ाने के साथ इसे उऩके परिवार कीसमृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है. मेहंदीत्योहार हो या घर में कोई शुभ कार्य, महिलाएं अपने हाथों- पैरों मे मेहंदी जरूर रचाती हैं. मेहंदी के बिना हर सुहागन स्त्री काश्रृंगार अधूरा माना जाता है. मांग में सिंदूरमांग में सिंदूर लगाना सुहाग की निशानी है. वहीं सिंदूर लगाने से चेहरे पर निखार आता है. इसके अपने वैज्ञानिक फायदे भी होते हैं. मान्यता है कि मांग में सिंदूर लगाने से शरीर में विद्युत ऊर्जा को नियंत्रित करने में भी मदद मिलती है. गले में मंगल सूत्रमोती और स्वर्ण से युक्त मंगल सूत्र या हार पहनने से ग्रहों की नकारात्मक ऊर्जा को रोकने में मदद मिलती है. कहते हैं कि इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी वृद्धि होती है. गले में स्वर्ण आभूषण पहनने से हृदय रोग संबंधी रोग नहीं होते हैं. हृदय की धड़कन नियंत्रित रहती है. वहीं मोती चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करते हैं. इससे मन चंचल नहीं होता है. नवरात्रि के समय मां को आभूषण पहनाएं जाते हैं और महिलाएं भी ज्वैलरी पहनती हैं. कानों में कुंडलमान्यता है कि कान में आभूषण या बाली पहनने से मानसिक तनाव नहीं होता है. कर्ण छेदन से आंखों की रोशनी तेज होती है. यह सिर का दर्द कम करने में भी सहायक होता है. माथे पर स्वर्ण टिकामाथे पर स्वर्ण टिका महिलाओं की सुंदरता बढ़ाता है. कंगन या चूड़ियांकहते हैं कि हाथों में कंगन या चूड़ियां पहनने से रक्त का संचार ठीक रहता है. इससे थकान नहीं होती है. साथ ही यह हॉर्मोंस को भी बैलेंस्ड रखता है शेर कैसे बना मां दुर्गा का वाहन? | Sher Maa Durga Ki Sawaari बाजूबंदइसे पहनने से भुजाओं में रक्त प्रवाह ठीक बना रहता है. कहते हैं कि इससे दर्द से मुक्ति मिलती है. वहीं इससे सुंदरता में निखार आता है. कमरबंदमान्यता है कि इसे पहनने से पेट संबंधी दिक्क्तें कम होती हैं. कई बीमारियों से बचाव होता है. पायलपायल पैरों की सुंदरता में चार चांद लगाती हैं. वहीं इनको पहनने से पैरों से निकलने वाली शारीरिक विद्युत ऊर्जा शरीर में संरक्षित होती है. कहते हैं कि चांदी की पायल पैरों की हड्डियों को मजबूत बनाती हैं. बिछियाबिछिया को सुहाग की एक प्रमुख निशानी के तौर पर माना जाता है लेकिन इसका प्रयोग पैरों की सुंदरता तक ही सीमित नहीं है. बिछिया नर्वस सिस्टम और मांसपेशियां को मजबूत बनाए रखने में भी मददगार होती है. नथनीनथनी चेहरे की सुंदरता में चार चांद लगाती है. यह एक प्रमुख श्रृंगार है लेकिन इसका वैज्ञानिक महत्व भी है. नाक में स्वर्ण का तार या आभूषण पहनने से महिलाओं में दर्द सहन करने की क्षमता बढ़ती है. अंगूठीअंगूठी पहनने से रक्त का संचार शरीर में सही बना रहता है. इससे हाथों की सुंदरता बढ़ती है. इससे पहनने से आलस कम आता है. काजलकहते हैं कि काजल आंखों की सुरंदता को बढ़ाता है. वहीं आंखों की रोशनी भी तेज करने में सहायक होता है. इससे नेत्र संबंधी रोग दूर होते हैं. मेकअपफेस पर ब्यूटी प्रोडक्ट्स लगाने से चेहरे की सुंदरता बढ़ती है. वहीं इससे महिलाओं के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और उनमें एनर्जी बनी रहती है.

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STORY OF KALI MATA मां दुर्गा ने क्यों लिया था काली माता का अवतार? जानें यह पौराणिक कथा

शास्‍त्रों के अनुसार मां भगवती ने दुष्‍टों का अंत करने के लिए विकराल रूप धारण किया था जिन्‍हें मां काली के नाम से जाना जाता है. इनकी आराधना से मनुष्य के सभी भय दूर हो जाते हैं.मां दुर्गा का विकराल रूप हैं मां काली और यह बात सब जातने हैं कि दुष्‍टों का संहार करने के लिए मां ने यह रूप धरा था. शास्‍त्रों में मां के इस रूप को धारण करने के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं और उनका व्‍याखान भी वहां मिलता है. हिंदू धर्म में देवी देवताओं में मां दुर्गा का विशेष स्थान है। मान्यता है कि दुर्गा माता की आराधना करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार देवी देवताओं ने सृष्टि को बचाए रखने के लिए समय-समय पर कई अवतार लिए हैं। इसी प्रकार मां भगवती दुर्गा देवी ने भी दुष्टों का संहार करने के लिए अनेक अवतार लिए थे। नवरात्रि के 9 दिनों में दुर्गा माता के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है। जिसमें काली माता के स्वरूप का विशेष महत्व है। पौराणिक ग्रंथों में काली माता अवतार के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। तो आइए जानते हैं पंडित इंद्रमणि घनस्याल से दुर्गा मां के काली माता अवतार लेने के पीछे की पौराणिक कथा के बारे में। इसलिए मां दुर्गा ने लिया था काली माता का अवतार पंडित इंद्रमणि घनस्याल बताते हैं कि एक दारुक नाम का असुर था। दारुक ने कई वर्षों तक तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया था। ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर दारुक को मनचाहा वरदान दिया। ब्रह्माजी द्वारा वरदान मिलने पर दारुक देवों और ब्राह्मणों को प्रताड़ित करने लगा। उसके बाद दारुक ने सभी धार्मिक अनुष्ठान, हवन इत्यादि कार्य बंद करवा दिए और स्वर्ग पर भी अपना अधिकार जमा लिया। तब सभी देवता एकत्रित होकर ब्रह्मा और विष्णु जी के पास गए और दारुक के द्वारा किए गए कृत्यों के बारे में बताया। तब ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा कि दारुक का अंत केवल एक स्त्री ही कर सकती है अर्थात दारुक एक स्त्री के हाथों ही पराजित हो सकता है। तब सभी देवता ब्रह्माजी और विष्णु के साथ स्त्री रूप में प्रकट हुए और दारुक से युद्ध करने के लिए गए।‌ लेकिन दारुक ब्रह्माजी के द्वारा दिए गए वरदान के कारण अत्यंत बलशाली हो गया था। इसलिए उसने सभी देवताओं को परास्त कर दिया। उसके बाद सभी देवता ब्रह्मा जी और विष्णु के साथ शिव जी के पास गए और असुर दारुक के बारे में शिवजी को बताया। महादेव ने पार्वती की तरफ इशारा किया, पार्वती ने अपने एक अंश को शिवजी के शरीर में अदृश्य तरीके से प्रवेश कराया। माता पार्वती का वह अंश भगवान शिव के गले में मौजूद विष से अपना आकार धारण करने लगा। भगवान शिव के गले में विष होने के कारण उस अंश ने काले रंग के वर्ण में परिवर्तित होना शुरु कर दिया। भगवान शिव ने खोला तीसरा नेत्र उसके बाद भगवान शिव ने उस अंश को अपने शरीर में महसूस करके अपना तीसरा नेत्र खोला। उनके नेत्र खोलने से एक काले वर्ण की स्त्री काली माता के रूप में प्रकट हुई। काली माता के माथे पर भी तीसरा नेत्र था। उनका रूप बहुत ही ज्यादा विकराल था। काली माता के कंठ में कराल विष का चिन्ह था। काली माता ने अनेक प्रकार के आभूषण धारण कर रखे थे। उनके हाथ में एक त्रिशूल भी था। काली माता के इस अवतार को देखकर सभी देवता डर कर भागने लगे। माना जाता है कि काली माता के हुंकार मात्र से ही दारुक और अन्य असुर जलकर भस्म हो गए थे। सपने में आग दिखाई देना भविष्य में होने वाली इस घटना का देता है संकेत, जानिए भगवान शिव ने लिया बालक का रूप काली माता के क्रोध की ज्वाला से संपूर्ण लोक अग्नि में भस्म होने लगा। पूरी सृष्टि को जलता देख भगवान शिव ने एक बालक का रूप धारण किया और भगवान शिव शमशान में जाकर बालक स्वरूप में रोने लगे। जब काली माता की दृष्टि भगवान शिव के बालस्वरूप पर पड़ी तो उनमें ममता और वात्सल्य का भाव जाग गया। काली माता ने उस बालक को अपने कलेजे से लगाया और उसे स्तनपान कराने लगी। तब शिव रूपी उस बालक ने दूध के साथ साथ काली माता के पूरे क्रोध को भी पी लिया था। माना जाता है कि माता के क्रोध से 8 मूर्तियां उत्पन्न हुई जिन्हें क्षेत्रपाल के नाम से जाना जाता है।

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Shardiya Navratri 2023 Date: शारदीय नवरात्रि कब से हो रहे शुरू, जानें महत्व, कलश स्थापना का मुहूर्त

सनातन धर्म में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ हो जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शारदीय नवरात्रि में मां शक्ति के 9 स्वरूपों की उपासना करने से साधक को विशेष लाभ प्राप्त होता है। साथ ही जीवन में आ रही सभी समस्या दूर हो जाती है। हिंदू धर्म में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। बता दें कि हर वर्ष दो नवरात्रि पर मनाए जाते हैं। एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में। आश्विन मास में पड़ने वाली नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्रि की शुरुआत आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से हो जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शारदीय नवरात्रि में घटस्थापना और नौ दिनों तक देवी दुर्गा की उपासना करने से साधक को सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए यहां शारदीय नवरात्रि 2023 तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 14 अक्टूबर रात्रि 11 बजकर 24 मिनट से शुरू होगी और 16 अक्टूबर मध्य रात्रि 12 बजकर 32 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। ऐसे में शारदीय नवरात्रि पर्व का शुभारंभ 15 अक्टूबर 2023, रविवार के दिन होगा। इस विशेष दिन पर चित्रा नक्षत्र और स्वाति नक्षत्र का निर्माण हो रहा है, जिसे शुभ कार्यों के लिए बहुत ही श्रेष्ठ माना जाता है। शारदीय नवरात्रि 2023 घटस्थापना समय शास्त्रों में बताया गया है कि शारदीय नवरात्रि के शुभ अवसर पर घटस्थापना मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त के दौरन तय होता है। घट स्थापना का समय निश्चित चित्रा नक्षत्र के दौरन ही होता है। ऐसे में इस दिन चित्रा नक्षत्र 14 अक्टूबर को शाम 04 बजकर 24 मिनट से 15 अक्टूबर शाम 06 बजकर 13 मिनट तक रहेगा। वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 04 मिनट से सुबह 11 बजकर 50 मिनट के बीच रहेगा, इसलिए घटस्थापना पूजा भी इसी अवधि में की जाएगी। शारदीय नवरात्रि का धार्मिक महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पहले चैत्र नवरात्रि को ही बहुत धूमधाम से मनाया जाता था लेकिन जब भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की तब वह चैत्र नवरात्रि का इंतजार नहीं करना चाहते थे और आश्विन मास की प्रतिपदा को दुर्गा पूजा आयोजित की। तभी से शारदीय नवरात्रि की धूम होने लगी। देवी भागवत पुराण में भी भगवान श्रीराम द्वारा शारदीय नवरात्रि का व्रत और शक्ति पूजन करने का वर्णन मिलता है। इसके साथ ही आश्विन मास में ही मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस पर आक्रमण कर दिया और उससे नौ दिन तक युद्ध किया और दसवें दिन राक्षस का वध कर दिया इसलिए नौ दिन तक मां दुर्गी की पूजा शक्ति के रूप में की जाती है। कलश स्थापना का मुहूर्त शारदीय नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि यानी पहले दिन कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा की पूजा शुरू होती है। शक्ति पूजा से पहले मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त 15 अक्टूबर को 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक है। ऐसे में कलश स्थापना के लिए 46 मिनट का समय दिया गया है। नवरात्रि में इस दिन करें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा नवरात्रि का पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा – 15 अक्टूबर 2023नवरात्रि का दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा – 16 अक्टूबर 2023नवरात्रि का तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा – 17 अक्टूबर 2023नवरात्रि का चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा – 18 अक्टूबर 2023नवरात्रि का पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा – 19 अक्टूबर 2023 नवरात्रि का छठवें दिन मां कात्यायनी की पूजा – 20 अक्टूबर 2023नवरात्रि का सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा – 21 अक्टूबर 2023नवरात्रि का आठवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा – 22 अक्टूबर 2023नवरात्रि का नौवें दिन मां महागौरी की पूजा – 23 अक्टूबर 2023विजयदशमी या दशहरा पर्व – 24 अक्टूबर 2023

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नवरात्रि की शुरूआत के पीछे की पौराणिक कथा क्या है ? 

नवरात्रि का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है. नवरात्रि में 9 दिनो तक माँ शक्ति की 9 रूपों में पूजा की जाती है. जिसके बारे में आमतौर पर सभी को पता होता है. लेकिन काफी लोगों के मन में सवाल होता है कि नवरात्रि की पूजा क्यों शुरू की गई थी. इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है. अगर आपके मन में भी ऐसा ही सवाल है, तो इस पोस्ट में इसी सवाल का जवाब जानते है. नवरात्रि की शुरूआत के पीछे की पौराणिक कथा  नवरात्रि का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है. नवरात्रि में 9 दिनो तक माँ शक्ति की 9 रूपों में पूजा की जाती है. जिसके बारे में आमतौर पर सभी को पता होता है. लेकिन काफी लोगों के मन में सवाल होता है कि नवरात्रि की पूजा क्यों शुरू की गई थी. इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है. अगर आपके मन में भी ऐसा ही सवाल है, तो इस पोस्ट में इसी सवाल का जवाब जानते है. नवरात्रि के पीछे की पहली पौराणिक कथा कि बात करें, तो ऐसा माना जाता है कि एक बार महिषासुर नाम का एक राक्षस होता था. जोकि ब्रह्मा की पूजा करता था. ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उसे वरदान मांगने को कहा. जिसके बाद उसने कहा कि मुझे कोई देव, दानव या फिर पृथ्वी पर रहने वाला मनुष्य नहीं मार सकता. ब्रह्माजी उसको यह वरदान दे देते हैं. वरदान मिलने के बाद वह बहुत ही निर्दयी हो जाता है तथा तीनों लोकों में आतंक फैलाने लगता है. जिसके बाद ब्रह्मा , विष्णु तथा महेश ने उसके आतंक से छूटकारा दिलाने के लिए माँ शक्ति के रूप में दूर्गा को जन्म दिया. दूर्गा और महिषासुर के बीच घमासान युद्ध हुआ. यह युद्ध 9 दिनों तक चलता रहा. अंत में माँ दूर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया. ऐसा माना जाता है कि तभी से इन 9 दिनों को बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर मनाया जाता है. नवरात्रि के पीछे कि दूसरी पौराणिक कथा कि बात करें, तो ऐसा माना जाता है कि रामायण में राम और रावण के बीच युद्ध हुआ था. उस युद्ध से पहले भगवान राम ने रावण के खिलाफ युद्ध जीतने के लिए रामेश्वरम में 9 दिनों तक माँ शक्ति की अराधना दी थी. जिससे प्रसन्न होकर माँ शक्ति ने राम को विजय श्री का आशिर्वाद दिया. जिसके बाद राम को रावण के खिलाफ विजय प्राप्त हुई. यहीं कारण है कि तब से नवरात्रि की पूजा का शुभारंभ हुआ तथा इन 9 दिनों को नवरात्रि के तौर पर मनाया जाना शुरू हुआ. पहली कथा- श्रीराम को मिला विजयश्री का आशीर्वाद लंका-युद्ध में ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण-वध के लिए चंडीदेवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा और बताए अनुसार चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ 108 नीलकमल की व्यवस्था की गई, वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से चंडी पाठ प्रारंभ किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्रीराम के पास पहुंचाई और परामर्श दिया कि चंडी पाठ यथासंभव पूर्ण होने दिया जाए। इधर हवन सामग्री में पूजा स्थल से एक नीलकमल रावण की मायावी शक्ति से गायब हो गया और राम का संकल्प टूटता-सा नजर आने लगा। भय इस बात का था कि देवी मां रुष्ट न हो जाएं। दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव थी, तब भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग कमलनयन नवकंच लोचन कहते हैं, तो क्यों न संकल्प पूर्ति हेतु एक नेत्र अर्पित कर दिया जाए और प्रभु राज जैसे ही तूणीर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए, तब देवी ने प्रकट हो, हाथ पकड़कर कहा- राम, मैं प्रसन्न हूं और विजयश्री का आशीर्वाद दिया। दूसरी कथा – एक अक्षर ने बदली रावण के यज्ञ की दिशा  किसने रखा था सबसे पहले करवा चौथ का व्रत? जानें पौराणिक कथा  एक बार रावण के चंडी पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धरकर हनुमानजी सेवा में जुट गए। नि:स्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर मांगने को कहा।  इस पर हनुमानजी ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक अक्षर मेरे कहने से बदल दीजिए। ब्राह्मण इस रहस्य को समझ नहीं सके और तथास्तु कह दिया।  मंत्र में जयादेवी… भूर्तिहरिणी में ‘ह’ के स्थान पर ‘क’ उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है।  ‘भूर्तिहरिणी’ यानी कि प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और ‘करिणी’ का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया।  हनुमानजी ने श्लोक में ‘ह’ की जगह ‘क’ करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी। तीसरी कथा- महिषासुर का वध नवरात्रि पर्व से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंसरूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था।  पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजेय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा। और प्रत्याशित  प्रतिफलस्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देखकर देवता विस्मय  की स्‍थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चंद्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और स्वयं  स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्‍वी पर विचरण करना पड़ रहा है।  तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था।  महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के  सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गई थीं। इन 9 दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अंतत: वे महिषासुरमर्दिनी कहलाईं।

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मां दुर्गा के इन 8 मंदिरों में आप भी दर्शन करने पहुंचें

देवी दुर्गा भारत में हिन्दू धर्म के सबसे पूजनीय देवी में से एक हैं। मां दुर्गा को भारत में कष्ट हरणी, पाप नाशनी आदि कई शक्ति के नाम से जाना जाता है। इस साल नवरात्रि 26 सितंबर से लेकर 4 अक्टूबर तक है और 5 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा।  नवरात्रि के पावन दिनों में भक्त भी मां दुर्गा के दर्शन करने के लिए फेमस और पवित्र मंदिरों में जाते रहते हैं। ऐसे में अगर आप भी नवरात्रि में माता का दर्शन करना चाहते हैं तो इन पवित्र मंदिरों में जा सकते हैं। आइए जानते हैं। 1.वैष्णो देवी मंदिर 2.मनसा देवी 3.नैना देवी 4.कामाख्या देवी मंदिर 5.चामुंडा देवी मंदिर 6.करणी माता मंदिर 7.मां ब्रह्मचारिणी मंदिर 8.अम्बा मंदिर 1. वैष्णो देवी मंदिर समुद्र तल से लगभग 15 हज़ार से भी अधिक मीटर की ऊंचाई पर त्रिकुट पहाड़ियों में स्थित वैष्णो देवी मां दुर्गा का पवित्र स्थान है। मान्यताओं के अनुसार जो भी वैष्णो देवी का दर्शन करता है तो उनकी सभी मुरादे पूरी हो जाती हैं। नवरात्रि में यहां लाखों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 2.मनसा देवी कहा जाता है कि उत्तराखंड में स्थित मनसा देवी का नाम इस विश्वास से पड़ा कि देवी अपने भक्तों की सभी मुरादे पूरी कर देती हैं। यह मंदिर इस कदर पवित्र है कि उत्तराखंड के लगभग हर शहर से मां का दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि में यहां हर दिन कार्यक्रम का आयोजन होता है। तुलसी और विष्णु की कहानी  3. नैना देवी उत्तराखंड के नैनीताल में नैनी झील के किनारे स्थित नैना देवी मंदिर भारत के लगभग हर शहर, जिला और कस्बों में फेमस है। इस मंदिर को भारत में स्थित 51 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर देवी सती की आंखों के लिए समर्पित है। कहा जाता है कि मंदिर उसी जगह बना है जहां देवी सती की नज़र पृथ्वी पर गिरी थी। 4. कामाख्या देवी मंदिर असम की राजधानी गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ी के मध्य में स्थित कामाख्या देवी मंदिर एक विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। कामाख्या मंदिर देवी दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस पवित्र मंदिर का जिक्र पौराणिक कथाओं में भी है। नवरात्रि में यहां हर रोज हजारों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 5. चामुंडा देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश में स्थित चामुंडा देवी का मंदिर प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में से एक है। चामुंडा देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां स्थापित देवी को दुर्गा मां के सबसे शक्तिशाली अवतारों में एक माना जाता है। कहा जाता है कि मंदिर के अंदर एक तलब है जिसमें डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं। 6. करणी माता मंदिर भारत के पवित्र दुर्गा मंदिरों में से एक करणी माता राजस्थान के बीकानेर शहर में मौजूद है। यह मंदिर दुर्गा के अवतारों में से एक करणी माता को समर्पित है। इस मंदिर की अनूठी विशेषता चूहों की आबादी हैं जो मंदिर के अंदर निवास करते हैं।   7. मां ब्रह्मचारिणी मंदिर उत्तर प्रदेश के काशी में स्थित मां ब्रह्मचारिणी का मंदिर भी एक प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर है। गंगा किनारे स्थित इस मंदिर में नवरात्र के दिनों में भक्तों की लाइन लगी रहती हैं। कहा जाता है कि जो भी सच्चे मन से मां के दरबार में पहुंचते हैं उसकी सभी मुरादे पूरी हो जाती हैं। 8. अम्बा मंदिर गुजरात के जूनागढ़ में स्थित अंबा मंदिर देवी 51 शक्ति पीठो में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार अगर नवविवाहित जोड़े दर्शन करते हैं तो उनकी सभी मुराद पूरी हो जाती है। नवरात्र के दिनों में यहां देश के हर कोने से लोग पहुंचते हैं।

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नवरात्रि में मां दुर्गा के इन 8 मंदिरों में आप भी दर्शन करने पहुंचें, मुरादे होंगी पूरी

वैष्णो देवी मंदिर मनसा देवी नैना देवी कामाख्या देवी मंदिर चामुंडा देवी मंदिर करणी माता मंदिर मां ब्रह्मचारिणी मंदिर\ अम्बा मंदिर देवी दुर्गा भारत में हिन्दू धर्म के सबसे पूजनीय देवी में से एक हैं। मां दुर्गा को भारत में कष्ट हरणी, पाप नाशनी आदि कई शक्ति के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि के पावन दिनों में भक्त भी मां दुर्गा के दर्शन करने के लिए फेमस और पवित्र मंदिरों में जाते रहते हैं। ऐसे में अगर आप भी नवरात्रि में माता का दर्शन करना चाहते हैं तो इन पवित्र मंदिरों में जा सकते हैं। आइए जानते हैं। 1. वैष्णो देवी मंदिर समुद्र तल से लगभग 15 हज़ार से भी अधिक मीटर की ऊंचाई पर त्रिकुट पहाड़ियों में स्थित वैष्णो देवी मां दुर्गा का पवित्र स्थान है। मान्यताओं के अनुसार जो भी वैष्णो देवी का दर्शन करता है तो उनकी सभी मुरादे पूरी हो जाती हैं। नवरात्रि में यहां लाखों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 2. मनसा देवी कहा जाता है कि उत्तराखंड में स्थित मनसा देवी का नाम इस विश्वास से पड़ा कि देवी अपने भक्तों की सभी मुरादे पूरी कर देती हैं। यह मंदिर इस कदर पवित्र है कि उत्तराखंड के लगभग हर शहर से मां का दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि में यहां हर दिन कार्यक्रम का आयोजन होता है। 3. नैना देवी उत्तराखंड के नैनीताल में नैनी झील के किनारे स्थित नैना देवी मंदिर भारत के लगभग हर शहर, जिला और कस्बों में फेमस है। इस मंदिर को भारत में स्थित 51 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर देवी सती की आंखों के लिए समर्पित है। कहा जाता है कि मंदिर उसी जगह बना है जहां देवी सती की नज़र पृथ्वी पर गिरी थी। 4. कामाख्या देवी मंदिर असम की राजधानी गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ी के मध्य में स्थित कामाख्या देवी मंदिर एक विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। कामाख्या मंदिर देवी दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस पवित्र मंदिर का जिक्र पौराणिक कथाओं में भी है। नवरात्रि में यहां हर रोज हजारों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 5. चामुंडा देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश में स्थित चामुंडा देवी का मंदिर प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में से एक है। चामुंडा देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां स्थापित देवी को दुर्गा मां के सबसे शक्तिशाली अवतारों में एक माना जाता है। कहा जाता है कि मंदिर के अंदर एक तलब है जिसमें डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं। 6. करणी माता मंदिर भारत के पवित्र दुर्गा मंदिरों में से एक करणी माता राजस्थान के बीकानेर शहर में मौजूद है। यह मंदिर दुर्गा के अवतारों में से एक करणी माता को समर्पित है। इस मंदिर की अनूठी विशेषता चूहों की आबादी हैं जो मंदिर के अंदर निवास करते हैं।   7. मां ब्रह्मचारिणी मंदिर उत्तर प्रदेश के काशी में स्थित मां ब्रह्मचारिणी का मंदिर भी एक प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर है। गंगा किनारे स्थित इस मंदिर में नवरात्र के दिनों में भक्तों की लाइन लगी रहती हैं। कहा जाता है कि जो भी सच्चे मन से मां के दरबार में पहुंचते हैं उसकी सभी मुरादे पूरी हो जाती हैं। 8. अम्बा मंदिर गुजरात के जूनागढ़ में स्थित अंबा मंदिर देवी 51 शक्ति पीठो में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार अगर नवविवाहित जोड़े दर्शन करते हैं तो उनकी सभी मुराद पूरी हो जाती है। नवरात्र के दिनों में यहां देश के हर कोने से लोग पहुंचते हैं।

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