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Kalash Sthapna

Kalash Sthapna 2025: शुभ मुहूर्त और विधान जानें !

Kalash Sthapna, जिसे घटस्थापना भी कहा जाता है, नवरात्रि के नौ दिवसीय पर्व की शुरुआत का प्रतीक है। यह हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमें देवी दुर्गा की ऊर्जा का आह्वान किया जाता है और उनकी दिव्य कृपा प्राप्त की जाती है। यह पवित्र अनुष्ठान वैदिक परंपराओं और नियमों के अनुसार किया जाता है। यदि आप 2025 में कलश स्थापना की योजना बना रहे हैं, तो यहां इसका शुभ मुहूर्त, प्रक्रिया और महत्व की पूरी जानकारी दी गई है। कलश स्थापना का महत्व:Importance of establishing Kalash Kalash Sthapna एक पवित्र अनुष्ठान है जो घर या मंदिर में दिव्य ऊर्जा की स्थापना का प्रतीक है। यह कलश (पवित्र घड़ा) समृद्धि, पवित्रता और देवी की उपस्थिति का प्रतीक है। यह देवी दुर्गा की उपस्थिति को दर्शाता है और उनकी दिव्य शक्ति को आमंत्रित करता है। कलश सकारात्मक ऊर्जा को संचित करता है और वातावरण से नकारात्मकता को दूर करता है। यह नवरात्रि के दौरान भक्ति और पूजा का केंद्र बनता है। Method of Kalash Establishment (Step-by-Step Process):कलश स्थापना की विधि (स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया) Kalash Sthapna करते समय मन, हृदय और वातावरण की शुद्धता आवश्यक होती है। इस प्रक्रिया को ध्यानपूर्वक करें: 1. तैयारी और शुद्धिकरण 2. कलश का चयन और स्थापना 3. देवी का आह्वान (संकल्प और मंत्र) 4. आरती और प्रार्थना अर्पण करें 5. नवरात्रि के नौ दिनों तक पूजन What not to do during Kalash installation: कलश स्थापना के दौरान क्या न करें? निष्कर्ष Kalash Sthapna एक अत्यंत पवित्र और शुभ अनुष्ठान है, जो नवरात्रि की शुरुआत को दिव्यता और सकारात्मकता से भर देता है। सही विधि और शुभ मुहूर्त में इस अनुष्ठान को करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में समृद्धि, सुख और सुरक्षा मिलती है। कलश स्थापना 2025 के लिए पूरी तैयारी रखें और पूरी श्रद्धा से नवरात्रि मनाएं।

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Shradh or pitra paksha

Shradh or pitra paksha:श्राद्ध के अंतिम दिन क्या करें और क्या ना करें…

Shradh or pitra paksha: हर साल पितृ पक्ष के दौरान, लोग अपने स्वर्गवासी पितरों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं, ताकि उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकें. ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति अपने पूर्वजों की संपत्ति का उपभोग तो करते हैं, लेकिन उनका श्राद्ध तर्पण नहीं करते, उन्हें पितृ दोष के कारण कई तरह के दुखों का सामना करना पड़ता है. Shradh or pitra paksha हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार, पितृ पक्ष को अत्यंत महत्वपूर्ण दर्जा दिया गया है, और श्राद्ध द्वारा ही पितरों का ऋण चुकाया जाता है. श्राद्ध का तात्पर्य श्रद्धा से किए गए ऐसे कर्मों से है जो देवात्माओं, महापुरुषों, ऋषियों, गुरुजनों और पितर पुरुषों की प्रसन्नता के लिए किए जाते हैं. यह अपने पितृ पुरुषों के उपकारों के प्रति आभार व्यक्त करने और भक्ति भावना प्रदर्शित करने का एक प्रयत्न है. विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे सकते हैं, इसलिए इन नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है. पितृ पक्ष की शुरुआत कब होगी? (Pitru Paksha Date And Time) वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि 07 सितंबर को देर रात 01 बजकर 41 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इसका समापन 07 सितंबर को ही रात 11 बजकर 38 मिनट पर होगा। ऐसे में दिन रविवार, 07 सितंबर 2025 के दिन से ही पितृ पक्ष की शुरुआत होने जा रही है। इसके साथ ही इसकी समाप्ति सर्व पितृ अमावस्या यानी 21 सितंबर 2025 को होगी। आइए जानते हैं कि श्राद्ध के दौरान किन कार्यों को करना चाहिए और किनसे बचना चाहिए, ताकि आपको अपने पितरों का आशीर्वाद मिल सके: श्राद्ध में क्या करना चाहिए? (Shradh or pitra paksha) 1. कौन करे श्राद्ध: पिता का श्राद्ध पुत्र द्वारा किया जाना चाहिए. यदि पुत्र अनुपस्थित हो, तो उसकी पत्नी श्राद्ध कर सकती है. 2. सही तिथि: वर्ष के किसी भी मास और तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृ पक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है. 3. पकवान और भोग: श्राद्ध में बनने वाले पकवान पितरों की पसंद के होने चाहिए. 4. आवश्यक सामग्री: श्राद्ध में गंगाजल, दूध, शहद और तिल का उपयोग सबसे ज़रूरी माना गया है. 5. ब्राह्मणों को भोजन: श्राद्ध पर ब्राह्मणों को अपने घर पर आमंत्रित करना चाहिए. उन्हें सोने, चांदी, कांसे और तांबे के बर्तन में भोजन कराना सर्वोत्तम माना जाता है. 6. भोजन का समय: मध्यान्हकाल (दोपहर) में ब्राह्मण को भोजन खिलाकर और दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. 7. मंत्र जाप: इस दिन पितर स्तोत्र का पाठ और पितर गायत्री मंत्र आदि का जाप दक्षिणा मुखी होकर करना चाहिए. 8. पशु-पक्षियों को ग्रास: श्राद्ध के दिन कौवे, गाय और कुत्ते को ग्रास (भोजन का अंश) अवश्य डालनी चाहिए, क्योंकि इसके बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है. 9. श्रद्धा-भावना: पिण्ड तो प्रतीक मात्र होते हैं, Shradh or pitra paksha असली समर्पण श्रद्धा-भावना ही होती है. यही श्रद्धा पितर, देव, ऋषि और महापुरुषों को प्रसन्न करने का माध्यम बनती है. 10. नित्य पूजन: नित्य देव पूजन, पितर पूजन, ऋषि आत्माओं का पूजन और सत्स्वरूप ईश्वर का आराधन ही असली श्रद्धा है. श्राद्ध में क्या नहीं करना चाहिए? (Shradh me kya na kare) 1. समय का ध्यान: रात में कभी भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए, क्योंकि रात को राक्षसी का समय माना गया है. संध्या के वक्त भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए. 2. वर्जित भोजन: Shradh or pitra paksha श्राद्ध में कभी भी मसूर की दाल, मटर, राजमा, कुलथी, काला उड़द, सरसों और बासी भोजन आदि का प्रयोग वर्जित माना गया है. 3. तामसी भोजन: Shradh or pitra paksha श्राद्ध के वक्त घर में तामसी भोजन नहीं बनाना चाहिए. 4. नशीले पदार्थ: इस समय हर तरह के नशीले पदार्थों के सेवन से दूरी बनानी चाहिए. 5. शरीर पर प्रयोग: पितृ पक्ष के दिनों में शरीर पर तेल, सोना, इत्र और साबुन आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए. 6. क्रोध और कलह: श्राद्ध करते समय क्रोध, कलह और जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. इन नियमों का पालन कर आप अपने पितरों को संतुष्ट कर सकते हैं Shradh or pitra paksha और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं, जिससे आपके जीवन में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहेगी.

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Bhagwat Geeta Padhne Ke Fayde: श्रीमद्भागवत गीता: मानसिक शांति, ऊर्जा और जीवन के उद्देश्य की स्पष्टता के लिए क्यों पढ़नी चाहिए रोज़ाना ?

Bhagwat Geeta Padhne Ke Fayde: क्या आप अपने जीवन में मानसिक शांति, सकारात्मकता और उद्देश्य की स्पष्टता की तलाश में हैं? श्रीमद्भागवत गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है। यह जीवन जीने की कला सीखने का एक ज़रिया है। भगवान श्री कृष्ण ने यह ग्रंथ कुरुक्षेत्र युद्ध के समय अर्जुन को दिया था, जिसमें धर्म और कर्म के महत्व के साथ-साथ मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास बढ़ाने के उपाय भी शामिल हैं। आज के तेज़ और तनावपूर्ण जीवन में, जब लोग अक्सर उलझन और चिंता में फंसे रहते हैं, रोज़ Bhagwat Geeta गीता का पाठ करना मानसिक शांति और जीवन की दिशा समझने का सबसे आसान तरीका बन सकता है। आइए, भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से जानते हैं कि नियमित रूप से भगवद गीता का अध्ययन करने से हमारे जीवन में कौन-कौन से चमत्कारी बदलाव आते हैं। Bhagwat Geeta Padhne Ke Fayde:भगवद गीता पढ़ने के चमत्कारी लाभ: जीवन बदल जाएगा! भगवद गीता का रोज़ाना पाठ करने से कई मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं: 1. मानसिक शांति और नियंत्रण जो व्यक्ति रोज़ाना गीता का पाठ करता है, उसका मन स्थिर और शांत रहता है। चाहे जीवन में कितनी भी परेशानियां आएं, वह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण बनाए रख सकता है। गीता Bhagwat Geeta पढ़ने से व्यक्ति खुद को समझना सीखता है और परिस्थितियों के अनुसार सही फैसले लेने में सक्षम होता है। यह आदत धीरे-धीरे व्यक्ति की सोच को साफ़ और तार्किक बनाती है, जिससे जीवन में उलझन कम होती है। 2. क्रोध और बुराई से मुक्ति गीता पढ़ने वाले व्यक्ति को क्रोध, ईर्ष्या, लालच और मोह के बंधनों से छुटकारा मिलता है। जब व्यक्ति इन नकारात्मक भावनाओं से मुक्त हो जाता है, तो उसके जीवन में सुख और संतोष बढ़ता है। गीता में बताई गई बातें व्यक्ति को यह सिखाती हैं कि किस तरह हर परिस्थिति में संयम बनाए रखा जाए और अपने अंदर की बुराई पर विजय पाई जाए। 3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार और आत्मबल में वृद्धि भगवद गीता पढ़ने से न सिर्फ नकारात्मक ऊर्जा ख़त्म होती है, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी बढ़ता है। व्यक्ति का आत्मबल मज़बूत होता है, वह साहसी बनता है और अपने जीवन के कर्तव्यों को निभाने में निडर बन जाता है। गीता पढ़ना जीवन में एक नैतिक और मानसिक ताक़त का स्रोत बन जाता है। 4. तनाव और चिंता से राहत आज के जीवन में तनाव और चिंता आम बात हो गई है। गीता पढ़ने से व्यक्ति को जीवन के सही और गलत का ज्ञान मिलता है। उसे समझ आता है कि किस स्थिति में क्या करना चाहिए और कैसे खुद को मानसिक रूप से शांत रखा जाए। रोज़ गीता का पाठ करने से व्यक्ति अंदर से मज़बूत होता है और वह किसी भी संकट का सामना धैर्य और समझदारी से कर सकता है। 5. जीवन में उद्देश्य की स्पष्टता गीता पढ़ने से व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को समझता है। वह जानता है कि हर काम का महत्व क्या है और कैसे अपने कर्मों के अनुसार जीवन को सही दिशा दी जा सकती है। यह ज्ञान व्यक्ति को न सिर्फ आत्मनिर्भर बनाता है, बल्कि उसे जीवन में स्थायी संतोष भी प्रदान करता है। निष्कर्ष श्रीमद्भागवत गीता Bhagwat Geeta सिर्फ एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक है जो हमें मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा, क्रोध और चिंता से मुक्ति, और जीवन के उद्देश्य की स्पष्टता प्रदान करती है। Bhagwat Geeta इसे रोज़ाना पढ़ने से आप अपने अंदर एक गहरा बदलाव महसूस करेंगे और जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक धैर्य और समझदारी से कर पाएंगे।

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Bhagavad Gita

Bhagavad Gita: श्रीमद्भागवत गीता जीवन बदलने वाले चमत्कारी लाभ और पाठ के सही नियम – पूर्ण ज्ञान की कुंजी

Bhagavad Gita: क्या आप अपने जीवन में शांति, स्पष्टता और सकारात्मकता की तलाश में हैं? सनातन धर्म का एक अमूल्य रत्न, श्रीमद्भागवत गीता, आपको इन सभी की प्राप्ति में मदद कर सकती है। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक अद्भुत दर्शन है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अर्जुन को प्रदान किया था। Bhagavad Gita आज, यह केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनियाभर में लोग गीता के पाठ से लाभ उठा रहे हैं। आइए जानते हैं कि रोजाना Bhagavad Gita गीता पढ़ने से आपको कौन से चमत्कारी लाभ मिल सकते हैं और इसे सही तरीके से पढ़ने के नियम क्या हैं, ताकि आप इसके गूढ़ ज्ञान को आत्मसात कर सकें। Bhagavad Gita: गीता पाठ के अद्भुत लाभ: जब आप इसे जीवन में उतारते हैं:Amazing benefits of reading Geeta: When you implement it in life श्रीमद्भागवत गीता का नियमित अध्ययन आपके जीवन को कई तरह से सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। यह आपको आंतरिक शांति और स्पष्टता प्रदान करती है। 1. मन की शांति और स्थिरता: जो व्यक्ति नियमित रूप से भगवत गीता का पाठ करता है, Bhagavad Gita उसका मन हमेशा शांत रहता है। वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मन पर काबू पाने की क्षमता रखता है। गीता आपको अपने मन को अपनी इच्छानुसार किसी भी कार्य में लगाने की शक्ति देती है। 2. क्रोध, लालच और मोह से मुक्ति: रोजाना गीता का अध्ययन करने वाले लोग कामवासना, क्रोध, लालच और मोह-माया जैसे बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। इन सबसे मुक्ति पाकर व्यक्ति का जीवन सुखमय तरीके से व्यतीत होता है। 3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार और आत्मबल में वृद्धि: प्रतिदिन Bhagavad Gita भगवत गीता का पाठ करने से जीवन से सभी नकारात्मक ऊर्जाएँ दूर होने लगती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। इतना ही नहीं, गीता पढ़ने से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है और वह साहसी व निडर बनकर अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ता रहता है। 4. तनाव से मुक्ति और सही-गलत का ज्ञान: गीता पढ़ने वाला व्यक्ति सच और झूठ, ईश्वर और जीव के ज्ञान को प्राप्त करता है। उसे अच्छे और बुरे की समझ आ जाती है। भगवत गीता का पाठ करने से व्यक्ति को तनाव से भी मुक्ति मिलती है। 5. कर्म और जीवन का गहरा दर्शन: गीता हमें यह ज्ञान देती है कि व्यक्ति को केवल अपने काम और कर्म पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, यह भी समझाती है कि हमारे कर्मों का फल हमें निश्चित ही प्राप्त होगा। Bhagavad Gita गीता हमें जीवन क्या है, इसे कैसे जीना चाहिए, आत्मा और परमात्मा का मिलन कैसे होता है, और अच्छे-बुरे की समझ क्यों ज़रूरी है, जैसे गूढ़ सवालों के जवाब भी देती है। पितृ पक्ष में क्यों करते हैं गीता के अध्याय का पाठ, जानिए – कुल 16 दिन का होता है पितृ पक्ष Bhagavad Gita: गीता पढ़ने का सही तरीका और नियम: पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति के लिए गीता का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए इसे केवल एक बार पढ़ना पर्याप्त नहीं है; बल्कि इसे समझने के चार स्तरों से गुजरना पड़ता है। ज्ञान प्राप्ति के चार स्तर: 1. श्रवण या पठन ज्ञान: पहले आप पढ़ते या सुनते हैं। 2. मनन ज्ञान: फिर, पढ़े-सुने ज्ञान के बारे में चिंतन और मनन करते हैं। 3. निदिध्यासन ज्ञान: यदि वह ज्ञान आपको ठीक और उपयोगी लगता है, तब आप उसका अभ्यास कर उसे अपने जीवन में उतारते हैं। 4. अनुभव ज्ञान: आखिर में, उस ज्ञान का प्रतिफल आपको मिलता है। यदि आप गीता पढ़कर उसके उपदेशों को जीवन में नहीं उतारते हैं, तो उसका फल कैसे मिलेगा? जब हम Bhagavad Gita गीता के उपदेशों को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो निश्चित ही सुपरिणाम सामने आते हैं। कितनी बार पढ़ें गीता? ज्ञान की गहराई: आप जितनी बार गीता का पाठ करेंगे, आपको कुछ नया सीखने को मिलेगा। पहली बार: आप इसे एक अंधे व्यक्ति के रूप में पढ़ते हैं, केवल रिश्तों की समझ मिलती है। दूसरी बार: मन में सवाल जागृत होते हैं कि ऐसा क्यों हुआ। तीसरी बार: आप इसके अर्थ को समझने लगते हैं, हर व्यक्ति अपने तरीके से समझता है। चौथी बार: आप हर एक पात्र से जुड़ी भावनाओं को समझ पाते हैं। पांचवी बार: पूरा कुरुक्षेत्र आपके मन में खड़ा हो जाता है, अलग-अलग कल्पनाएँ होती हैं। छठवीं बार: आप भगवान को अपने सामने अनुभव करने लगते हैं, मानो भगवान स्वयं आपको बता रहे हों। आठवीं बार: आपको पूर्णतः अहसास हो जाता है कि कृष्ण कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही हैं और हम उनके भीतर। पाठ के महत्वपूर्ण नियम: शुभ समय: भगवत गीता पढ़ने के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना जाता है, Bhagavad Gita क्योंकि इस समय मन, मस्तिष्क और वातावरण में शांति व सकारात्मकता होती है। मन की स्थिति: गीता का पाठ हमेशा स्नान के बाद और शांत चित्त मन से ही करना चाहिए। एकाग्रता: पाठ करते समय बीच-बीच में इधर-उधर की बातें नहीं करनी चाहिए और न ही किसी कार्य के लिए बार-बार उठना चाहिए। स्थान: साफ-सफाई वाले स्थान और ज़मीन पर आसन बिछाकर ही गीता का पाठ करना चाहिए। सम्मान: गीता के प्रत्येक अध्याय को शुरू करने से पहले और बाद में भगवान श्रीकृष्ण और गीता के चरण कमलों को स्पर्श करना चाहिए। श्लोक और भावार्थ: क्या पढ़ें और कैसे? गीता गहरा ज्ञान और अर्थ रखने वाली एक आध्यात्मिक पुस्तक है जो मूल रूप से संस्कृत भाषा में है। Bhagavad Gita आज यह कई अनुवादित भाषाओं में उपलब्ध है, लेकिन संस्कृत के अर्थ न समझने के कारण कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि गीता को श्लोक समेत पढ़ना चाहिए या केवल भावार्थ पढ़ना काफी है। गहराई से जुड़ने के लिए: वैसे तो गीता का भावार्थ भी पढ़ने और समझने के लिए काफी है, Bhagavad Gita लेकिन अगर आप उन्हें संस्कृत के श्लोकों के साथ पढ़ते हैं, तो आप गीता से और गहराई से जुड़ पाएंगे। संस्कृत उच्चारण के लाभ: जिस प्रकार संस्कृत के मंत्रों के जाप के अपने फायदे हैं, ठीक वैसे ही गीता के श्लोकों के पाठ के भी अपने मायने और फायदे हैं। संस्कृत भाषा का उच्चारण

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Geeta Adhyay

Geeta Adhyay: पितृ पक्ष में क्यों करते हैं गीता के अध्याय का पाठ, जानिए – कुल 16 दिन का होता है पितृ पक्ष

Geeta Adhyay: श्रद्धा से किया गया कर्म श्राद्ध कहलाता है। अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। श्रद्धा से किया गया कर्म श्राद्ध कहलाता है। अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण की अमावस्या तक कुल 16 दिन तक श्राद्ध रहते हैं। इन 16 दिनों के लिए हमारे पितृ सूक्ष्म रूप में हमारे घर में विराजमान होते हैं। श्राद्ध में श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए। इस पाठ का फल आत्मा को समर्पित करना चाहिए। Geeta Adhyay: पितृ पक्ष में क्यों करते हैं गीता के अध्याय का पाठ, जानिए…. भाद्रपद की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष की शुरुआत होती है, जो कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक कुल 16 दिन का होता है. पितृ पक्ष के इन सोलह दिन हम अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं. हिंदू मान्यता के अनुसार इस दौरान सूक्ष्म रूप से हमारे पितर हमारे घर में विराजमान होते हैं और हमारे द्वारा किये गये श्राद्ध कर्म से तृप्त होते हैं. अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किया गया मुक्ति कर्म ही श्राद्ध कहलाता है और उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं. तर्पण को ही पिंडदान भी कहा जाता है. श्रीमद भगवत गीता के 7वें अध्याय में श्राद्ध कर्म का उल्लेख मिलता है. श्राद्ध के दिन भगवत गीता के सातवें अध्याय का महात्म्य पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए और उसका फल मृतक आत्मा को अर्पण करना चाहिए. बता दें कि Geeta Adhyay श्रीमद भगवत गीता का वो ज्ञान जो भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया था. Geeta Adhyay इस गीता का सातवें अध्याय पितृ मुक्ति और मोक्ष से जुड़ा है. श्राद्ध पक्ष में गीता के सातवें अध्याय का पाठ किया जाता है. जिसका नाम है ज्ञानविज्ञान योग. शास्त्रों में इसे पितरों के कल्याण का सबसे सरल उपाय बताया गया है. कहा जाता है कि पितृ पक्ष में श्रीमद भगवत गीता की कथा को सुनने मात्र से ही पितृ दोष से मुक्ति मिल जाती है. गीता का पाठ पितरों को मोक्ष दिलाने का अटूट साधन है. मान्यता है कि परिवार के किसी पूर्वज की मृत्यु के बाद अगर उसका अंतिम संस्कार भलीभांति नहीं किया जाता है या फिर उसकी कोई इच्छा अधूरी रह जाती है तो उसकी आत्मा अपने घर और आगामी पीढ़ी के इर्द गिर्द ही भटकती रहती है और वहीं अतृप्त आत्मा परिवार के लोगों को कष्ट देकर अपनी इच्छा पूरी करने के लिए दबाव बनाती है. ऐसे ही Geeta Adhyay पितृ दोष को दूर करने के लिए हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि मृत्यु के बाद पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध कर्म ही मृतक को वैतरणी पार कराता है. पितृ पक्ष में भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करना सबसे प्रभावशाली होता है. गीता में श्रीकृष्ण ने खुद कहा है कि ‘सर्व धमार्न परित्यज्य माम एकम शरणम व्रज’ अर्थात सभी परंपराओं और युक्तियों को छोड़कर जो व्यक्ति केवल श्रीकृष्ण की आराधना करता है. उसके लिए बाधाएं अवसर में और कांटे फूल में बदल जाते हैं. श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली वाणी का वर्णन है. इसीलिए जब संकट में भगवत वाणी का श्रवण करने से सभी संकट खुद-ब-खुद टल जाते हैं. मान्यताओं के अनुसार राजा परिक्षित से जब ऋषि शमीक का अपमान किया और ऋगी ऋषि के चलते सात दिन में सर्पदंश से मृत्यु का श्राप मिता तो सभी ऋषि-मुनियों ने श्राप से मुक्ति के जो उपाय बताए वे प्रभावहीन रहे और जब शुकदेव महराज ने उन्हें भागवत का परायण कराया तो कथा का विश्राम होते ही परीक्षित का भय दूर हुआ और उन्हें सदगति प्राप्त हुई. बता दें कि Geeta Adhyay गीता में योग शब्द को एक नहीं, बल्कि कई अर्थों में प्रयोग हुआ है और हर योग अंतिम में भगवान से मिलने के मार्ग से जोड़ता है. योग का मतलब आत्मा का परमात्मा से मिलन है. गीता में योग के कई प्रकार हैं. लेकिन मुख्य रूप से तीन योग ज्ञान योग, Geeta Adhyay कर्म योग और भक्ति योग का वास्ता मनुष्य से अधिक होता है. Geeta Adhyay महाभारत के युदध् के दौरान जब अर्जुन रिश्ते नातों में उलझ कर मोह में बंध रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध भूमि में अर्जुन को बताया था कि जीवन का सबसे बड़ा योग कर्म योग है. उन्होंने बताया था कि कर्म योग से कोई भी प्राणी मुक्त नहीं हो सकता है. उन्होंने कहा कि वह स्वंय अर्थात भगवान भी कर्म योग से बंधे हैं.

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Lord Rama

Where Does Lord Rama Stayed During 14 Years Of Exile: 14 वर्ष के वनवास के दौरान इन स्थानों पर ठहरे थे भगवान श्रीराम

Lord Rama: रामायण की कथा अनुसार जब भगवान राम अपनी पत्नी सीता और भाई के साथ 14 वर्षों के वनवास पर निकल गए थे तब उन्होंने यह समय भिन्न-भिन्न स्थानों पर व्यतीत किया था। आइए जानते हैं उन स्थानों के विषय में जहां श्रीराम ने अपना वनवास बिताया था। बस कुछ ही दिनों में भगवान श्रीराम का राजतिलक होने जा रहा था…. उनकी प्रजा में हर्ष की एक लहर जैसी थी…. लेकिन तब महारानी कैकेयी की दासी मंथरा ने अपनी धूर्त मानसिकता का परिचय देते हुए कैकेयी के मस्तिष्क में विष घोल दिया। उस धूर्त दासी ने कैकेयी को महाराज दशरथ का वो वरदान याद दिलवाया जिसके अनुसार वह उनसे कोई भी दो वरदान मांगने को कहा जिसे वह मना नहीं कर सकते। कैकेयी अपनी दासी मंथरा की बातों में आकर उसके भ्रम जाल में फंस गई और उसने राजा से वे वरदान मांगे जो कहीं ना कहीं रामायण का आधार बने…. पहला वरदान अपने पुत्र भरत को राजगद्द्दी और दूसरा और शायद सबसे कठोर राम को 14 वर्ष का वनवास…. !! कैकेयी के इन दो वरदान मांगने के पीछे भी कई रहस्य हैं… कुछ कहते हैं ईर्ष्या और लालच की वजह से कैकेयी ने अपने पुत्र के लिए राजगद्दी मांगी तो कुछ यह कहते हैं कि कैकेयी यह जानती थी कि राजा दशरथ की मृत्यु पुत्र वियोग की वजह से होगी…..या तो भगवान राम की मृत्यु या फिर वनवास। राम को बचाने के लिए ही कैकेयी ने उनके लिए वनवास मांगा था। Where Does Lord Rama Stayed During 14 Years Of Exile अनुज लक्ष्मण और माता सीता भी प्रभु राम Lord Rama के साथ वनवास के कष्ट भोगने साथ चले थे… इस दौरान उनके साथ क्या-क्या घटनाएं घटित हुई बहुत से लोग इन सभी बातों से अवगत हैं लेकिन शायद आप इस बात से अवगत ना हों कि ये 14 वर्ष उन्होंने कहां-कहां बिताए थे। तो चलिए आपको बताते हैं वनवस का समय प्रभु राम ने कहां-कहां बिताया था। अयोध्या से विदा लेने के पश्चात भगवान Lord Rama राम अपने अनुज और पत्नी के साथ रथ पर बैठकर आर्य सुमंत के साथ तमसा नदी के तट तक पहुंचे थे। तट तक छोड़ने के लिए अयोध्या की प्रजा भी उनके साथ आई थी क्योंकि वह अपने प्रभु को अकेले जाने नहीं दे रही। रात को अपनी प्रजा के साथ प्रभु राम ने वहीं विश्राम किया और सुबह बिना किसी को जगाए मता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ नगर छोड़कर चले गए। कौशल नगरी से प्रस्थान करने के बाद भगवान राम Lord Rama अपने मित्र निषादराज गुह की नगरी श्रृंगवेरपुर के नजदीक वनों में पहुंचे और वहां एक दिन का विश्राम किया। उनके मित्र गुह ने उनका सत्कार किया और अगले दिन उन्होंने सुमंत को रथ लेकर अयोध्या लौट जाने का आदेश दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी पैदल यात्रा आरंभ की… तत्पश्चात उन्होंने केवट के सहारे गंगा नदी को पार किया और कुरई गांव में उतरे। गंगा पार करने के बाद श्रीराम माता सीता, लक्ष्मण तथा निषादराज गुह के साथ प्रयाग की ओर प्रस्थान कर गए…जहां से वे आगे ऋषि भारद्वाज के आश्रम पहुंचे। उन्होंने भारद्वाज ऋषि से अपने रहने के लिए उत्तम स्थान पूछा जिन्होंने यमुना पार चित्रकूट का नाम उन्हें सुझाया। भारद्वाज ऋषि के आश्रम से ही उन्होंने अपने मित्र निषादराज को वापिस लौट जाने का आदेश दिया और स्वयं अपने भाई लक्ष्मण और देवी सीता के साथ चित्रकूट की ओर चल पड़े। चित्रकूट पहुंचने पर उन्होंने वाल्मीकि आश्रम में उनसे भेंट की और मंदाकिनी नदी के किनारे कल्पवास किया। भरत इसी स्थान पर उनसे मिलने पहुंचे थे। इसके कुछ समय पश्चात श्रीराम चित्रकूट से भी चले गए क्योंकि उन्हें यह भय था कि अयिध्या की प्रजा उनसे मिलने यहां आ सकती है, जिससे ऋषि-मुनियों की तपस्या में विघ्न पड़ेगा। दंडकारण्य में पहुंचकर सर्वप्रथम उन्होंने ऋषि अत्री तथा माता अनुसूया के आश्रम पहुंचकर उनसे भेंट की। माता अनुसूया से माता सीता को विभिन्न प्रकार के आभूषण और वस्त्र प्रदान किए… उनसे मिलने के पश्चात वे पुन: अपनी यात्रा के लिए निकल पड़े। Lord Rama श्रीराम ने अपने वनवास काल का ज्यादातर समय दंडकारण्य के वनों में ही बिताया था…यहां उनकी भेंट महान ऋषि अगस्त्य से हुई। अगस्त्य मुनि ने ही उन्हें प6चवटी जाकर निवास करने को कहा था। ऋषि अगस्त्य से आज्ञा पाकर Lord Rama भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण पंचवटी की ओर निकल गए जहां एक कुटीया बनाकर वे रहने लगे। यहां उनकी भेंट जटायु से हुई…जो उनकी कुटिया की रक्षा में प्रहरी के तौर पर तैनात रहते थे। यहीं शूर्पनखा ने Lord Rama श्रीराम और लक्ष्मण को देखा था और यहीं से माता सीता का हरण राक्षस राज रावण द्वारा हुआ था। Lord Rama श्रीराम और लक्ष्मण माता सीता को ढूंढते हुए फिर यहां से निकल गए थे।

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Ekadashi

Do not do this work on Ekadashi: एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये काम, वरना पाप के बनेंगे भागी

Do’s and Dont’s on Ekadashi: शास्त्रों में एकादशी तिथि को बहुत पवित्र बताया गया है। इस तिथि के पुण्य फल से जीवन में कभी किसी चीज की कमी नहीं होती है और भगवान का आशीर्वाद बना रहता है। शास्त्रों में एकादशी का महत्व बताते हुए कुछ नियम भी बताए हैं। इन नियमों के अनुसार एकादशी तिथि को भूलकर भी इन कार्यों को करने से बचना चाहिए… हिंदू धर्म में सभी तिथियों में एकादशी तिथि को सर्वश्रेष्ठ माना गया है और एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन किए गए उपवास, जप तप व ध्यान का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि एकादशी का व्रत करने से सांसारिक जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है और अंत में बैकुंठ धाम को प्राप्त करता है। धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि इस पुण्य तिथि पर कुछ ऐसे कार्य हैं, जिनको वर्जित बताया गया। ऐसा करने से जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है और भगवान विष्णु की नाराजगी का भी सामना करना पड़ता है। आइए जानते हैं कि एकादशी के दिन ऐसे कौन से कार्य हैं, जिनको भूलकर भी नहीं करना चाहिए… Do not do this work on Ekadashi: एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये काम एकादशी तिथि पर करें यह कार्य:Do this work on Ekadashi date एकादशी के दिन रात में सोना नहीं चाहिए, यह तिथि बेहद पुण्यदायी होती है। इस तिथि को पूरी रात भगवान विष्णु के भजन गाने चाहिए, मंत्र या आरती करनी चाहिए। भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने बैठकर पूरी रात जागरण करना चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और उनके आशीर्वाद से जीवन में उन्नति के योग बनते हैं। एकादशी तिथि पर ना करें इसका सेवन:Do not consume it on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन भूलकर भी चावल नहीं खाने चाहिए, चाहे आप उपवास ना भी रख रहे हों। धार्मिक कथाओं के अनुसार, एकादशी तिथि के दिन चावल खाने वाला व्यक्ति अगले जन्म में रेंगने वाली योनि में जन्म लेता है। हालांकि अगर आप द्वादशी तिथि को चावल खाते हैं तो आपको इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है एकादशी तिथि पर ना करें ये कार्य:Do not do these things on Ekadashi date एकादशी के दिन दातुन या मंजन करना वर्जित बताया गया है। इसके साथ ही इस दिन क्रोध करना, झूठ बोलना, चुगली करना और दूसरों की बुराई करना, ऐसी चीजों से बचना चाहिए। ऐसा करने से ना केवल परिवार बल्कि पूरे समाज में सम्मान नहीं मिलता और पाप के भागी भी बनते हैं। इन सब कार्यों के करने से अच्छा है कि इस दिन भगवान विष्णु का भजन कर लें। एकादशी तिथि पर ध्यान रखें यह बात:Keep this thing in mind on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन तुलसी के पत्तों को नहीं तोड़ना चाहिए, शास्त्रों में इसे वर्जित बताया गया है। वहीं द्वादशी तिथि को जब पारण करें तो तुलसी के पत्ते से ही करें। लेकिन उस दिन भी व्रती को तुलसी का पत्ता नहीं तोड़ना चाहिए। घर में अगर बच्चा या बुजुर्ग है, जिसने एकादशी का व्रत ना किया हो, उसको पत्ता तोड़ने के लिए द्वादशी तिथि में कहना चाहिए। एकादशी तिथि पर ना करें इन चीजों का सेवन:Do not consume these things on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन कुछ चीजें ऐसी हैं, जिनको खाने से बचना चाहिए। जैसे मसूर दाल, चना दाल, उड़द दाल, गोभी, गाजर, शलजम, पालक का साग आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही इस दिन शारीरिक व मानसिक तौर पर किए जाने वाले बुरे कार्यों को करने से बचना चाहिए। शास्त्रों में एकादशी तिथि को मोक्षदायिनी तिथि कहा गया है इसलिए एकादशी तिथि के दिन इन कार्यों करने से बचना चाहिए। एकादशी तिथि पर भूलकर भी ना करें ये काम:Do not do this work even by mistake on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन पान खाना, चोरी करना, हिंसा करना, क्रोध करना, मैथुन, स्त्रीसंग, कपट आदि चीजों से बचना चाहिए। वहीं अगर आपसे कोई गलती हो जाए तो उसके लिए माफी मांगनी चाहिए। साथ ही इनको आदत बना लेनी चाहिए, जो आपके लिए बेहद फायदेमंद साबित होगी। शारीरिक व मानसिक तौर पर अगर आप किसी को नुकसान पहुंचाते हैं तो यह बहुत गलत है, ऐसा करने से कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

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Puja Path Tips

Puja Path Tips: पूजा के बाद भूल से भी न करें ये काम, वरना मिल सकते हैं विपरीत परिणाम

Puja Path Tips: अगर आप चाहते हैं कि आपकी पूजा सफल और फलदायी हो, तो इन बातों का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। आइए जानते हैं पूजा करने के बाद किन कार्यों को करने से परहेज करना चाहिए।  जब घर में पूजा होती है, तो वातावरण में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह समय न केवल आत्मिक शुद्धि के लिए, बल्कि मानसिक और शारीरिक संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। सभी नियमों के पालन करते हुए पूजा पाठ करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। लेकिन कई बार लोग अनजाने में पूजा के ठीक बाद कुछ ऐसे काम कर लेते हैं, Puja Path Tips जो इस ऊर्जा को प्रभावित कर सकते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपकी पूजा सफल और फलदायी हो, तो इन बातों का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। आइए जानते हैं पूजा करने के बाद किन कार्यों को करने से परहेज करना चाहिए।  Puja Path Tips:मंदिर की सही दिशा इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि आपका मंदिर वास्तु के अनुसार, सही दिशा में होना चाहिए, तभी आपको पूजा का पूर्ण फल मिल सकता है। वास्तु के अनुसार, मंदिर हमेशा घर की उत्तर-पूर्व या फिर पूर्व दिशा में होना चाहिए। Puja Path Tips इन दिशाओं का ध्यान न रखने पर वास्तु दोष उत्पन्न हो सकता है, जिस कारण पूजा-पाठ सफल नहीं होता। इस बात का जरूर रखें ध्यान हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, आप पूजा का पूर्ण फल तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब आप पूजा-पाठ के दौरान स्वच्छता और पवित्रता का पूर्ण रूप से ध्यान रखें, इसलिए हमेशा स्नान करने और सुथरे कपड़े कपड़े पहनने के बाद ही Puja Path Tips पूजा-पाठ आरंभ करें। इसी के साथ मन की स्वच्छता का भी ख्याल रखना जरूरी है। इस बात का खासतौर से ध्यान रखें कि भगवान की उपासना के दौरान आपके मन में बुरे ख्याल न आएं। किस समय करें पूजा हिंदू शास्त्रों में पूजा के लिए उत्तम समय भी बताया गया है, जो ब्रह्म मुहूर्त और सूर्यास्त का समय है। दोपहर का समय भगवान के विश्राम का समय माना जाता है, इसलिए इस दौरान पूजा-अर्चना न करें, वरना आपको इसका कोई फल नहीं मिलता। Puja Path Tips साथ ही आपका मंदिर ऐसे स्थान पर होना चाहिए, जहां आप शांति से बैठकर भगवान का ध्यान कर सकें और किसी तरह की बाधा उत्पन्न न हो। इन सभी बातों का ध्यान रखने पर आपको पूजा का पूर्ण फल मिल सकता है। कटु शब्द न बोलें पूजा के तुरंत बाद अगर आप किसी को अपशब्द कहते हैं या कोसते हैं, तो इसका नकारात्मक प्रभाव सामने आ सकता है। पूजा के दौरान और पूजा के बाद भी अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। मांस और मदिरा का सेवन पूजा के बाद शरीर और मन दोनों पवित्र अवस्था में होते हैं। Puja Path Tips ऐसे में मांस या शराब का सेवन करना आध्यात्मिक रूप से अनुचित माना जाता है। ऐसा करने से आपकी पूजा विफल हो सकती है। बाल और नाखून न काटें यह समय ऊर्जा से भरा होता है, ऐसे में बाल या नाखून काटना शुभ नहीं माना जाता। इससे सकारात्मक ऊर्जा में कमी आ सकती है। अपमान न करें पूजा के बाद यदि आप किसी का अपमान करते हैं या रूखा व्यवहार करते हैं, तो इससे पूजा का फल क्षीण हो सकता है। Puja Path Tips इसलिए आपको नम्रता बनाए रखनी है। साधु-संतों का निरादर न करें अगर पूजा के समय कोई संत या साधु आपके घर आता है, तो उनका आदर करना चाहिए है। उन्हें अनदेखा करना या दरवाजे से लौटा देना अशुभ माना जाता है। भोग ग्रहण न करें ईश्वर को अर्पित भोग को थोड़ी देर बाद ही श्रद्धा के साथ ग्रहण करना चाहिए। इसे तुरंत खाने से उसका आध्यात्मिक महत्व घट जाता है। नमक युक्त भोजन न करें मान्यता है कि पूजा के बाद नमक वाला खाना खाने से शरीर की ऊर्जात्मक अवस्था बिगड़ सकती है। इस समय हल्का और सात्त्विक भोजन ही खाना चाहिए। तुरंत पैर न धोएं पूजा के बाद कुछ समय तक उस ऊर्जा को अपने अंदर समाहित रहने दें। इसलिए कहा जाता है कि पूजा के तुरंत स्नान या पैर धोने  से बचना चाहिए। ऐसा करने से उसका प्रभाव कम हो सकता है।

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What Is The Right Way to worship :पूजा करने का सही तरीका क्या है?

What Is The Right Way to worship: अगर आप गलत विधि और नियमों के साथ worship पूजा करते हैं तो इसका बहुत बुरा परिणाम भुगतना पड़ता है। चलिए जानते हैं पूजा करने का सही तरीका क्या है, साथ ही जानिए पूजा खड़े होकर करनी चाहिए या बैठकर। Puja Vidhi Niyam in Hindi: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है। कहा जाता है कि इसमें इतनी शक्ति होती है कि ये सभी मनोकामना पूरी कर सकती है। वहीं वास्तु में भी इसको लेकर कई नियम बताए गए हैं जिनका पालन करना बेहद जरूरी होता है, तभी पूजा संपूर्ण मानी जाती है। हालांकि जाने-अनजाने में कुछ लोग पूजा के दौरान कई तरह की गलतियां कर बैठते हैं। जिसकी वजह से उन्हें पूजा का फल नहीं मिल पाता और पूजा अधूरी रह जाती है। ऐसे में अगर आप गलत विधि और नियमों के साथ पूजा करते हैं तो इसका बहुत बुरा परिणाम भुगतना पड़ता है। चलिए जानते हैं पूजा करने का सही तरीका क्या है, साथ ही जानिए पूजा खड़े होकर करनी चाहिए या बैठकर।  Puja Kaise Karni Chahiye: बैठकर या खड़े होकर, कैसे करें पूजा?  मान्यताओं के अनुसार, घर के मंदिर में कभी भी खड़े होकर worship पूजा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि खड़े होकर पूजा करना शुभ नहीं माना जाता है साथ ही कोई लाभ भी नहीं मिलता। इसलिए घर पर पूजा-पाठ के दौरान खड़े होकर पूजा न करें।  इस बात का भी ध्यान रखें कि जब भी आप पूजा-पाठ करें तो पहले फर्श पर आसन जरूर बिछाएं और इस पर बैठकर ही पूजा करें। इस बात का भी ध्यान रखें कि कभी भी बिना सिर ढके पूजा नहीं करनी चाहिए। स्त्री हो या पुरुष पूजा करते समय हमेशा सिर को ढक कर ही रखें।   What is the correct method of worship: क्या है पूजा करने की सही विधि?  वास्तु शास्त्र के अनुसार पूजा के दौरान अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए और अपने दाहिने ओर घंटी, धूप, दीप, अगरबत्ती आदि रखनी चाहिए। इस दिशा में मुख करके पूजा-अर्चना करना श्रेष्ठ माना जाता है। क्योंकि पूर्व दिशा शक्ति व शौर्य की प्रतीक है। इस दिशा में पूजा स्थल होने से घर में रहने वालों को शांति, सुकून, धन, प्रसन्नता और स्वास्थ लाभ मिलता है वास्तु शास्त्र के अनुसार, पूजा के दौरान अपनी बाईं ओर पूजन सामग्री जैसे फल फूल, जल का पात्र और शंख रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस तरह पूजा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। इस बात का भी ध्यान रखें कि worship पूजा करते समय अपने माथे पर तिलक जरूर लगाएं।  घर में पूजा स्थल हमेशा उत्तर-पूर्व दिशा में बनाना चाहिए। वास्तु में इस दिशा को शुभ माना जाता है। इस दिशा में पूजा स्थल होने से घर में रहने वालों को शांति, सुकून, धन, घर के भीतर पूजा घर बनवाते समय इस बात का भी ध्यान रखें कि इसके नीचे या ऊपर या फिर अगल-बगल शौचालय नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही भूलकर भी घर की सीढ़ी के नीचे पूजा घर नहीं बनाना चाहिए। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है।) 

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Morpankh Upay

Morpankh Upay: शिवभक्त सावधान ! सावन में मोरपंख से करें ये उपाय, मिलेगा विष्णु-शिव दोनों का आशीर्वाद

Morpankh Upay In Sawan: हिन्दू धर्म, ज्योतिष और वास्तु की दृष्टि से मोरपंख का विशेष महत्व है। मोरपंख भगवान श्री कृष्ण को प्रिय है। मोर पंख इतना शुभ है कि श्री कृष्ण ने अपने सिर पर धारण किया हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन मास में मोरपंख से जुड़े कुछ उपाय किए जाएं तो भगवान शिव के साथ-साथ श्री विष्णु की भी कृपा प्राप्त हो सकती है। Morpankh Upay: स्वयं के महीने में अगर मोर पंख से जुड़े उपाय किए जाएं तो इससे ग्रह दोष और बुरी नजर के दोष को दूर किया जा सकता है। मोर पंख के ये उपाय पैसों की तंगी,  से मुक्ति में भी बेहद कारगर माना जाता है। सावन महीना 14 जुलाई 2022 से शुरू हो चुका है और 12 अगस्त तक चलेगा। ऐसे में मोरपंक से जुड़े कुछ उपाय करने से न सिर्फ आर्थिक तंगी दूर होती है बल्कि घर में सुख समृद्धि भी आती है। आइए जानते हैं मोरपंख के उन खास उपायों के बारे में।  Morpankh Upay: शिवभक्त सावधान ! सावन में मोरपंख से करें ये उपाय आर्थिक वृद्धि के लिए:For economic growth Morpankh Upay: आर्थिक वृद्धि के लिए मोर पंख का उपाय भी विशेष माना जाता है. मान्यता के अनुसार इसके लिए श्रीकृष्ण और राधा-रानी के मंदिर में मोर पंख की पूजा करनी चाहिए. इसके बाद उस मोर पंख को धन स्थान या तिजोरी में रख दिया जाता है. ऐसा माना जाता है कि मोर पंख के इस उपाय से धन का प्रवाह बना रहता है. साथ ही फिजूलखर्ची पर भी नियंत्रण बना रहता है. बुरी नजर दूर करने के लिए:To ward off the evil eye Morpankh Upay: ऐसा माना जाता है कि बुरी नजर के कारण काम भी बिगड़ने लगता है. साथ ही अनावश्यक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है. ऐसे में इससे बचने के लिए चांदी के ताबीज में मोर पंख डालकर रोज सिर में रखकर सोने से बुरी नजर नहीं लगती. शत्रुओं को शांत करने के लिए:To pacify the enemies मंगलवार के दिन मोर पंख पर हनुमान जी के मस्तक पर सिंदूर लगाकर उस पर शत्रु का नाम लिखकर रात भर पूजा स्थल पर छोड़ दें. इसके बाद अगली सुबह उस मोर पंख को पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है. मान्यता है कि ऐसा करने से शत्रु शांत हो जाते हैं। कालसर्प दोष से छुटकारा: Get rid of Kaalsarp Dosh  सावन के महीने में भगवान भोलेनाथ की आराधना करके कालसर्प दोष से छुटकारा पाया जा सकता है. जिस व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प दोष हो तो उस व्यक्ति को अपने तकिए के कवल में 7 मोरपंख डालकर रखने चाहिए. माना जाता है ये उपाय करने से इस दोष से छुटकारा मिल जाता है. इस उपाय से जुड़ी एक धार्मिक किंवदंति के अनुसार श्री कृष्ण ने भी कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए अपने मुकुट में मोरपंख धारण किया हुआ था.  ग्रह दोषों से मुक्ति का उपाय: Remedy to get rid of planetary defects यदि कुंडली में ग्रह दोष  है तो उसे दूर करने के लिए हाथ में मोर पंख पकड़कर अशुभ ग्रह से जुड़ा मंत्र 21 बार बोलें और फिर पंख पर पानी छिड़ककर उसे पूजा घर में रख लें। कुछ ही दिन में समाधान देखने को मिलेगा। 

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Sawan Kanwar Yatra 2025: पहली बार करने जा रहे हैं कांवड़ यात्रा? जान लें जरूरी नियम और सामग्री

Kanwar yatra 2025: सावन के महीने में पवित्र कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व है. सावन माह की शुरुआत 11 जुलाई 2025 के दिन से हो रही है. ऐसे में कांवड़ यात्रा की शुरुआत भी इसी दिन से शुरू हो जायगी.  Kanwar Yatra 2025 हिन्दू धर्म में भगवान शंकर के प्रिय माह सावन की शुरुआत होने वाली है. 11 जुलाई से सावन का पवित्र महीना शुरू हो जाएगा. सावन की शुरुआत के साथ ही कांवड़ यात्रा का आगाज भी हो जाएगा. कांवड़ यात्रा में शिवभक्त नंगे पांव हाथ में कांवड़ लेकर ज्योतिर्लिंग जाते हैं और गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदी से उनका जलाभिषेक करते हैं. पूरे सावन महीने में ये काम चलता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कांवड़ यात्रा के दौरान कुछ विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है? Kanwar Yatra 2025 इन नियमों का पालन करने से आपकी यात्रा शुभ और सुरक्षित रहती है. उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज ने हमें बताया कि कांवड़ यात्रा के दौरान कौन-कौन से नियमों का पालन करना चाहिए. मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला था, जिसे जगत कल्याण के लिए भगवान शंकर ने पी लिया था, जिसके बाद भगवान शिव का गला नीला पड़ गया और तभी से भगवान शिव नीलकंठ कहलाने लगें. Kanwar Yatra 2025 भगवान शिव के विष का सेवन करने से दुनिया तो बच गई, लेकिन भगवान शिव का शरीर जलने लगा. ऐसे में देवताओं ने उन पर जल अर्पित करना शुरू कर दिया. इसी मान्यता के तहत कांवड़ यात्रा शुरू हुई. Kanwar Yatra 2025: कांवड़ यात्रा 2025 इस वर्ष Kanwar Yatra 2025 कांवड़ यात्रा की शुरुआत 11 जुलाई 2025, शुक्रवार से होगी, जो कि सावन मास का पहला दिन है। यह यात्रा 23 जुलाई 2025 को सावन शिवरात्रि के दिन जलाभिषेक के साथ पूर्ण होगी। हालांकि देवघर जैसे तीर्थस्थलों पर पूरे सावन माह तक श्रद्धालु जल चढ़ाने के लिए कांवड़ यात्रा करते हैं। कांवड़ यात्रा के लिए सामग्री: Material for Kanwar Yatra यदि आप पहली बार कांवड़ यात्रा पर जा रहे हैं, तो कुछ वस्तुओं को अपने साथ अवश्य रखें। Kanwar Yatra 2025 इसमें कांवड़ (लकड़ी या बांस से बनी हुई), गंगा जल भरने के लिए पात्र, सजावट के लिए लाल-पीले वस्त्र और पुष्प, भगवान शिव की मूर्ति, फोटो, त्रिशूल, डमरू, रुद्राक्ष आदि शामिल हैं। इसके साथ ही चलने पर मधुर ध्वनि देने वाली घंटी, भजन, गीत या कीर्तन के लिए ऑडियो सिस्टम, श्रद्धालु के लिए लाल-पीले वस्त्र, गमछा, नी कैप, दातुन भी लेकर जा सकते हैं।  कांवड़ यात्रा के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें: Things to keep in mind during Kanwar Yatra कांवड़ यात्रा एक पवित्र धार्मिक अनुष्ठान है, Kanwar Yatra 2025 इसलिए इस दौरान धूम्रपान, शराब, भांग या किसी भी नशीली वस्तु से दूरी बनाकर रखें। यात्रा के दौरान शुद्ध आचरण, शुद्ध वाणी और मन की पवित्रता बनाए रखें। महाकाल की नगरी में आते हैं सैकड़ो कावड़िया:Hundreds of Kavadias come to the city of Mahakal सावन में हर साल लाखों कांवड़िए महाकाल की नगरी उज्जैन आते हैं और Kanwar Yatra 2025 कांवड़ में गंगाजल भरकर पैदल यात्रा शुरू करते हैं. कांवड़िये अपने कांवड़ में जो गंगाजल भरते हैं, उससे सावन की चतुर्दशी पर भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है. कांवड़ यात्रा से होते हैं कहीं लाभ: What are the benefits of Kanwar Yatra? शास्त्रों के अनुसार, कांवड़ यात्रा भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने का एक अचूक उपाय है. मान्यता है कि सावन के पावन महीने में कांवड़ उठाने वाले भक्त के सभी पाप शाप नष्ट हो जाते हैं. कांवड में जलभकर शिवलिंग का अभिषेक करने वालों पर सालभर भोलेनाथ की कृपा बरसती है. दुख, दोष, दरिद्रता से मुक्ति मिलती है. व्यक्ति हर पल सुख प्राप्त करता है कावड़ यात्रा उठाने से पहले जान लें नियम:Know the rules before undertaking the Kavad Yatra कांवड़ यात्रा पर जाने वाले भक्तों को इस दौरान खास नियमों का पालन करना होता है. इस दौरान भक्तों को पैदल यात्रा करनी होती है. यात्रा के दौरान भक्तों को सात्विक भोजन का सेवन करना होता है. साथ ही आराम करते समय कांवड़ को जमीन पर नहीं बल्कि किसी पेड़ पर लटकाना होता है. अगर आप कांवड़ को जमीन पर रखते हैं तो आपको दोबारा से गंगाजल भरकर फिर से यात्रा शुरू करनी पड़ती है. कांवड़ यात्रा के दौरान बहुत से भक्त नंगे पांव चलते हैं. स्नान के बाद ही कांवड़ को छुआ जाता है.

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Kawad Yatra 2025 Start Date: साल 2025 में कब निकलेगी कांवड़ यात्रा, जानिए यहां महत्व और नियम

Kawad Yatra 2025: श्रावण माह में कांवड यात्रा भी निकलती है, जिसमें हरिद्वार से जल लाकर सावन शिवरात्रि के शुभ अवसर पर भक्त महादेव का अभिषेक करते हैं. Sawan month 2025 : पंचांग के अनुसार, साल 2025 में सावन माह की शुरुआत 11 जुलाई को रात 2 बजकर 6 मिनट से हो रही है और इसका समापन 9 अगस्त को होगा। इस बार सावन पूरे 30 दिनों का रहेगा। चूंकि सावन के पहले दिन से ही कांवड़ यात्रा आरंभ हो जाती है, इसलिए कांवड़ यात्रा 2025 की शुरुआत भी 11 जुलाई से मानी जाएगी। कांवड़ यात्रा सावन शिवरात्रि तक चलती है, जो इस बार अगस्त की शुरुआत में पड़ेगी। इस दौरान श्रद्धालु गंगा जल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। माना जाता है कि इस यात्रा से भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। कब से शुरू होगी कांवड़ यात्रा 2025 – When will Kawad Yatra 2025 start पंचांग के अनुसार, Kawad Yatra 2025 सावन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 11 जुलाई देर रात 02 बजकर 06 मिनट से होगी और समापन अगले दिन यानी 12 जुलाई को देर रात 02 बजकर 08 मिनट पर समापन होगा. ऐसे में सावन माह की शुरुआत 11 जुलाई से होगी. वहीं, इस माह का समापन 09 अगस्त को होगा. ऐसे में कांवड यात्रा की शुरूआत 11 जुलाई से शूरू हो जाएगी और सावन शिवरात्रि के दिन समाप्त. Kanwar Yatra 2025 Importance: सावन की सबसे बड़ी विशेषता Kawad Yatra 2025 कांवड़ यात्रा है, जिसमें भक्त हरिद्वार, गौमुख या गंगोत्री जैसे तीर्थस्थलों से गंगा जल लाकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। यह यात्रा शिवरात्रि तक चलती है और विशेषकर सावन शिवरात्रि के दिन जल चढ़ाने का अत्यंत पुण्यफल माना जाता है। कहा जाता है कि कांवड़ यात्रा की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी। Kawad Yatra 2025 आज यह यात्रा आस्था, श्रद्धा और निष्ठा का प्रतीक बन चुकी है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। Sawan Shivratri Kab Hai:सावन शिवरात्रि कब है? Kawad Yatra 2025 साल 2025 में सावन माह की शिवरात्रि 23 जुलाई को मनाई जाएगी। यह पर्व हर साल सावन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आता है। पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि की शुरुआत 23 जुलाई को सुबह 4 बजकर 39 मिनट से होगी और इसका समापन 24 जुलाई की रात 2 बजकर 28 मिनट पर होगा। इसलिए शिव भक्त 23 जुलाई को सावन शिवरात्रि का व्रत रखेंगे और दिनभर व्रत-पूजन कर रात को भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे। यह दिन भोलेनाथ को प्रसन्न करने और मनोकामनाएं पूर्ण कराने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इसीलिए 23 जुलाई से कांवड़ यात्रा आरम्भ होगी।  कांवड़ यात्रा के प्रकार :Types of Kanwar Yatra कांवड़ यात्रा चार अलग-अलग प्रकारों में की जाती है, जो भक्तों की आस्था, सामर्थ्य और नियमों के अनुसार होती है।  कांवड़ यात्रा के नियम:rules of kanwar yatra

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