महाशिवरात्रि से जुड़ी पौराणिक कथाएं

भगवान शिव के प्रति अटूट आस्‍था का त्‍योहार महाशिवरात्रि कल यानी सोमवार 4 मार्च को है। इस पर्व को पूरे देश भर में सच्‍ची श्रद्धा और आस्‍था के साथ देश भर में मनाया जाएगा। इस त्‍योहार को लेकर कई प्रकार की मान्‍यताएं प्रचलित हैं। पहली यह कि इस दिन भगवान लिंग के रूप में प्रकट हुए थे और दूसरी मान्‍यता यह है कि इस भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। शिव-पार्वती के विवाह के उत्‍सव के रूप में देश भर में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। महाशिवरात्रि से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। आइए जानते हैं कौन-कौन सी हैं जंगल में एक शिकारी था। अपने शिकार के इंतजार के लिए वह एक पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। बहुत देर इंतजार करने के बाद भी जब कोई शिकार उसके हाथ न लगा तो पेड़ के पत्ते नीचे तोड़कर फेंकने लगा। संयोगवश वह बेल का पेड़ था। उस दिन महाशिवरात्रि का व्रत था।

शिकार का इंतजार करते करते वह थक गया और रात भर पत्ते तोड़ता रहा। सुबह उसे पता लगा कि जहां वह बेलपत्र फेंक रहा था वहां एक शिवलिंग था। इस तरह अनजाने में शिकारी से महाशिवरात्रि का व्रत हो गया और उसे मोक्ष की प्राप्ति हो गई। तब से मोक्ष प्राप्ति की साधना के तौर पर महाशिवरात्रि का व्रत रखने की परंपरा शुरू हो गई।अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन हुआ। मगर समुद्र से अमृत निकलने से पहले कालकूट नाम का विष भी सागर से निकला। ये विष इतना खतरनाक था कि इससे पूरा ब्रह्मांड नष्ट हो सकता था। मगर इस विष को केवल भगवान शिव ही नष्ट कर सकते थे। तब भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। इससे उनका कंठ (गला) नीला हो गया। इस घटना के बाद से भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ गया। मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा विष पीकर पूरे संसार को इससे बचाने की इस घटना के उपलक्ष में ही महाशिवरात्रि मनाई जाती है।